4 भगवान् बुद्ध का जीवन परिचय   29 comments

इस प्रवचन में ओशो भगवान बुद्ध की विशेषताओं पर प्रकाश डालते है.
इस प्रवचन को सुनने के बाद यही प्रतीत होता है की ,बुद्ध को ओशो ne ठीक से समझ पाया है

भगवान् बुद्ध  का जीवन परिचय 

 भगवान् बुद्ध  के बारे में कुछ भी कहना सूरज को दिया दिखाने जैसाहै,उनके व्यक्तित्व और सिद्धांत के आगे कोई नहीं टिक सकताजो एक बार बौध धम्म कोठीक से समझ लेता है वो फिर कहीं नहीं जा सकता| बौद्ध धर्म को पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं और यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है।  भगवान् बुद्ध  को गौतम बुद्ध ‘, ‘ महात्मा बुद्ध आदि नामों से भी जाना जाता है। वे संसार प्रसिद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक हैं। बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है। आज बौद्ध धर्म सारे संसार के चार बड़े धर्मों में से एक है। इसके अनुयायियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। इस धर्म के संस्थापक भगवान् बुद्ध  राजा शुद्धोदन के पुत्र थे और इनका जन्म स्थान लुम्बिनी नामक ग्राम था। वे छठवीं से पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जीवित थे। उनके गुज़रने के बाद अगली पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ैला गया और अगले दो हज़ार सालों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फैल गया। आज बौद्ध धर्म में तीन मुख्य सम्प्रदाय हैं- थेरवाद‘, ‘महायान और वज्रयान

जन्म - भगवान् बुद्ध  का मूल नाम सिद्धार्थ था। सिंहली, अनुश्रुति, खारवेल के अभिलेख, अशोक के सिंहासनारोहण की तिथि, कैण्टन के अभिलेख आदि के आधार पर  भगवान् बुद्ध  की जन्म तिथि 563 ई.पूर्व स्वीकार की गयी है। इनका जन्म शाक्यवंश के राजा शुद्धोदन की रानी महामाया के गर्भ से लुम्बिनी में वेशाक  पूर्णिमा के दिन हुआ था। शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी में उनका जन्म हुआ। सिद्धार्थ के पिता शाक्यों के राजा शुद्धोधन थे। भगवान् बुद्ध  को शाक्य मुनि भी कहते हैं। सिद्धार्थ की माता मायादेवी उनके जन्म के कुछ देर बाद मर गई थी। कहा जाता है कि फिर एक ऋषि ने कहा कि वे या तो एक महान राजा बनेंगे, या फिर एक महान साधु। लुम्बिनी में, जो दक्षिण मध्य नेपाल में है, सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में भगवान् भगवान् बुद्ध  के जन्म की स्मृति में एक स्तम्भ बनवाया था। मथुरा में अनेक बौद्ध कालीन मूर्तियाँ मिली हैं। जो मौर्य काल और कुषाण काल में मथुरा की अति उन्नत मूर्ति कला की अमूल्य धरोहर हैं। भगवान् बुद्ध  की जीवन-कथाओं में वर्णित है कि सिद्धार्थ ने कपिलवस्तु को छोड़ने के पश्चात् अनोमा नदी को अपने घोड़े कंथक पर पार किया था और यहीं से अपने परिचारक छंदक को विदा कर दिया था।

 लुंबिनीग्राम-कपिलवस्तु के पास ही लुम्बिनी ग्राम स्थित था, जहाँ पर भगवान् बुद्ध  का जन्म हुआ था। इसकी पहचान नेपाल की तराई में स्थित रूमिनदेई नामक ग्राम से की जाती है। बौद्ध धर्म का यह एक प्रमुख केन्द्र माना जाने लगा। महान सम्राट अशोक अपने राज्य-काल के बीसवें वर्ष धर्मयात्रा करते हुए लुम्बिनी पहुँचे  थे । उन्होंने इस स्थान के चारों ओर पत्थर की दीवाल खड़ी कर दी। वहाँ उन्होंने एक स्तंभ का निर्माण भी किया, जिस पर उनका  एक लेख ख़ुदा हुआ है। यह स्तंभ अब भी अपनी जगह पर विद्यमान है। विद्वानों का ऐसा अनुमान है कि महान सम्राट अशोक की यह लाट ठीक उसी जगह खड़ी है, जहाँ भगवान् बुद्ध  का जन्म हुआ था। अशोक ने वहाँ के निवासियों को कर में भारी छूट दे दी थी। जो तीर्थयात्री वहाँ आते थे, उन्हें अब यहाँ यात्रा-कर नहीं देना पड़ता था। वह कपिलवस्तु भी आये  हुए थे भगवान् गौतम भगवान् बुद्ध  के जिस स्तूप का निर्माण शाक्यों ने किया था, उसे उन्होंने आकार में दुगुना करा दिया था। लुम्बिनी में जन्म लेने वाले भगवान् भगवान् बुद्ध  को काशी में धर्म प्रवर्त्तन करना पड़ा। त्रिपिटक तथा जातकों से काशी के तत्कालीन राजनीतिक महत्त्व की सहज ही कल्पना हो जाती है। प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में भगवान् भगवान् बुद्ध  काल में (कम से कम पाँचवी शताब्दि ई.पूर्व) काशी की गणना चम्पा, राजगृह, श्रावस्ती, साकेत एवं कौशाम्बी जैसे प्रसिद्ध नगरों में होती थी। भगवान् बुद्ध  (सिद्धार्थ) के जन्म से पहले उनकी माता ने विचित्र सपने देखे थे।शुद्धोदन ने सिद्धार्थ को चक्रवर्ती सम्राट बनाना चाहा, उसमें क्षत्रियोचित गुण उत्पन्न करने के लिये समुचित शिक्षा का प्रबंध किया, किंतु सिद्धार्थ सदा किसी चिंता में डूबे दिखाई देते थे। अंत में पिता ने उन्हें विवाह बंधन में बांध दिया। एक दिन जब सिद्धार्थ रथ पर शहर भ्रमण के लिये निकले थे तो उन्होंने मार्ग में जो कुछ भी देखा उन्होंने उनके जीवन की दिशा ही बदल डाली। एक बार एक दुर्बल वृद्ध व्यक्ति को, एक बार एक रोगी को और एक बार एक शव को देख कर वे संसार से और भी अधिक विरक्त तथा उदासीन हो गये। पर एक अन्य अवसर पर उन्होंने एक प्रसन्नचित्त संन्यासी को देखा। उसके चेहरे पर शांति और तेज़ की अपूर्व चमक विराजमान थी। सिद्धार्थ उस दृश्य को देख-कर अत्यधिक प्रभावित हुए।

गृहत्याग - बालक  सिद्धार्थ के मन में निवृत्ति मार्ग के प्रति नि:सारता तथा निवृति मर्ण की ओर संतोष भावना उत्पन्न हो गयी। जीवन का यह सत्य सिद्धार्थ के जीवन का दर्शन बन गया। विवाह के उपरान्त उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। पुत्र जन्म का समाचार मिलते ही उनके मुँह से सहसा ही निकल पड़ा- राहु‘- अर्थात बंधन। उन्होंने पुत्र का नाम राहुलरखा। इससे पहले कि सांसारिक बंधन उन्हें छिन्न-विच्छिन्न करें, उन्होंने सांसारिक बंधनों को छिन्न-भिन्न करना प्रारंभ कर दिया और गृहत्याग करने का निश्चय किया। एक महान रात्रि को 29 वर्ष के युवक सिद्धार्थ ज्ञान प्रकाश की तृष्णा को तृप्त करने के लिये घर से बाहर निकल पड़े। कुछ विद्वानों का मत है कि गौतम ने यज्ञों में हो रही हिंसा के कारण गृहत्याग किया। कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार गौतम ने दूसरों के दुख को न सह सकने के कारण घर छोड़ा था।

ज्ञान की प्राप्ति - गृहत्याग करने के बाद सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में भटकने लगे। बिंबिसार, उद्रक, आलार एवम् कालाम नामक सांख्योपदेशकों से मिलकर वे उरुवेला की रमणीय वनस्थली में जा पहुँचे। वहाँ उन्हें कौंडिल्य आदि पाँच साधक मिले। उन्होंने ज्ञान-प्राप्ति के लिये घोर साधना प्रारंभ कर दी। किंतु उसमें असफल होने पर वे गया के निकट एक वटवृक्ष के नीचे आसन लगा कर बैठ गये और निश्चय कर लिया कि भले ही प्राण निकल जाए, मैं तब तक समाधिस्त रहूँगा, जब तक ज्ञान न प्राप्त कर लूँ। सात दिन और सात रात्रि व्यतीत होने के बाद, आठवें दिन वैशाख पूर्णिमा को उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और उसी दिन वे तथागत हो गये। जिस वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ वह आज भी बोधिवृक्षके नाम से विख्यात है। ज्ञान प्राप्ति के समय उनकी अवस्था 35 वर्ष थी। ज्ञान प्राप्ति के बाद तपस्सुतथा काल्लिकनामक दो शूद्र उनके पास आये। भगवान् बुद्ध  नें उन्हें ज्ञान दिया और बौद्ध धर्म का प्रथम अनुयायी बनाया। बोधगया, बिहार से चल कर वे सारनाथ पहुँचे तथा वहाँ अपने पूर्वकाल के पाँच साथियों को उपदेश देकर अपना शिष्य बना दिया। बौद्ध परंपरा में यह उपदेश धर्मचक्र प्रवर्त्तननाम से विख्यात है।  भगवान् बुद्ध  ने कहा कि इन दो अतियों से सदैव बचना चाहिये-

-काम,मोह,धन,विलास आदि सुखों में अधिक लिप्त होना तथा

-शरीर से कठोर साधना करना। उन्हें छोड़ कर जो मध्यम मार्ग मैंने खोजा है, उनका अनुसरण  करना चाहिये।

यही उपदेश इनका धर्मचक्र प्रवर्तनके रूप में पहला उपदेश था। अपने पाँच अनुयाइयों के साथ वे वाराणसी पहुँचे। यहाँ उन्होंने एक श्रेष्ठि पुत्र को अपना अनुयायी बनाया तथा पूर्णरुप से धर्म प्रवर्त्तनमें जुट गये। अब तक उत्तर भारत में इनका काफ़ी नाम हो गया था और अनेक अनुयायी बन गये थे। कई वर्षों बाद महाराज शुद्धोदन ने इन्हें देखने के लिये कपिलवस्तु बुलवाना चाहा, लेकिन जो भी इन्हें बुलाने आता वह स्वयं इनके उपदेश सुन कर इनका अनुयायी बन जाता था। इनके शिष्य घूम-घूम कर इनका प्रचार करते थे।

भगवान् बुद्ध  की शिक्षा-मनुष्य जिन दु:खों से पीड़ित है, उनमें बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे दु:खों का है, जिन्हें मनुष्य ने अपने अज्ञान, ग़लत ज्ञान या मिथ्या दृष्टियों से पैदा कर लिया हैं उन दु:खों का प्रहाण अपने सही ज्ञान द्वारा ही सम्भव है, किसी के आशीर्वाद या वरदान, देवपूजा,यग,ब्रह्मणि कर्मकांडों, ज्योतिष आदि  से उन्हें दूर नहीं किया जा सकता। सत्य या यथार्थता का ज्ञान ही सम्यक ज्ञान है। हम अपने जन्म से मरण तक जो भी करते हैं उस सबका एक ही अंतिम मकसद होता है-स्थाई खुशी या निर्वाण  अत: सत्य की खोज- ‘निर्वाण या स्थाई ख़ुशी’ के लिए परमावश्यक है। खोज अज्ञात सत्य की ही की जा सकती है,यदि सत्य किसी शास्त्र, आगम या उपदेशक द्वारा ज्ञात हो गया है तो उसकी खोज नहीं। अत: बुद्ध ने अपने पूर्ववर्ती लोगों द्वारा या परम्परा द्वारा बताए सत्य को और वेद पुराण जैसे हर काल्पनिक धर्म ग्रंथों को नकार दिया और अपने लिए नए सिरे से सत्य की खोज की। बुद्ध स्वयं कहीं प्रतिबद्ध नहीं हुए और न तो अपने शिष्यों को उन्होंने कहीं बांधा। उन्होंने कहा कि मेरी बात को भी इसलिए चुपचाप न मान लो कि उसे बुद्ध ने कही है। उस पर भी सन्देह करो और विविध परीक्षाओं द्वारा उसकी परीक्षा करो। जीवन की कसौटी पर उन्हें परखो, अपने अनुभवों से मिलान करो, यदि तुम्हें सही जान पड़े तो स्वीकार करो, अन्यथा छोड़ दो। यही कारण था कि उनका धर्म रहस्याडम्बरों से मुक्त, मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत एवं हृदय को सीधे स्पर्श करता था। संसार में केवल गौतम बुद्ध का सिद्धांत ही ऐसा है तो हर युग में हर परिस्थिथि में एक सा ही लाभकारी  है जबकि अन्य धर्मों के सिद्धांत वैज्ञानिक  तरक्की और समय गुजरने के बाद झूठे साबित होते जाते हैं | ऐसा इसलिए है क्योंकि बौध धम्म में ऐसा कुछ भी स्वीकार नहीं होता जिसका प्रमाण उपलब्ध न हो यही बौध धम्म का सार है |

त्रिविध धर्मचक्र प्रवर्तन- भगवान बुद्ध प्रज्ञा व करुणा की मूर्ति थे। ये दोनों गुण उनमें उत्कर्ष की पराकाष्ठा प्राप्त कर समरस होकर स्थित थे। इतना ही नहीं, भगवान बुद्ध अत्यन्त उपायकुशल भी थे। उपाय कौशल बुद्ध का एक विशिष्ट गुण है अर्थात वे विविध प्रकार के विनेय जनों को विविध उपायों से सन्मार्ग पर आरूढ़ करने में अत्यन्त प्रवीण थे। वे यह भलीभाँति जानते थे कि किसे किस उपाय से सन्मार्ग पर आरूढ़ किया जा सकता है। फलत: वे विनेय जनों के विचार, रूचि, अध्याशय, स्वभाव, क्षमता और परिस्थिति के अनुरूप उपदेश दिया करते थे। भगवान बुद्ध की दूसरी विशेषता यह है कि वे सन्मार्ग के उपदेश द्वारा ही अपने जगत्कल्याण के कार्य का सम्पादन करते हैं, न कि वरदान या ऋद्धि के बल से, जैसे कि शिव या विष्णु आदि के बारे में अनेक कथाएँ पुराणों में प्रचलित हैं। उनका कहना है कि तथागत तो मात्र उपदेष्टा हैं, कृत्यसम्पादन तो स्वयं साधक व्यक्ति को ही करना है। वे जिसका कल्याण करना चाहते हैं, उसे धर्मों (पदार्थों) की यथार्थता का उपदेश देते थे। भगवान बुद्ध ने भिन्न-भिन्न समय और भिन्न-भिन्न स्थानों में विनेय जनों को अनन्त उपदेश दिये थे। सबके विषय, प्रयोजन और पात्र भिन्न-भिन्न थे। ऐसा होने पर भी समस्त उपदेशों का अन्तिम लक्ष्य एक ही था और वह था विनेय जनों को दु:खों से मुक्ति की ओर ले जाना। निर्वाण ही उनके समस्त उपदेशों का रस है।

अंतिम उपदेश एवं परिनिर्वाण- बौद्ध धर्म का प्रचार बुद्ध के जीवन काल में ही काफ़ी हो गया था, क्योंकि उन दिनों कर्मकांड का ज़ोर काफ़ी बढ़ चुका था और पशुओं की हत्या बड़ी संख्या में हो रही थी। इन्होंने इस निरर्थक हत्या को रोकने तथा जीव मात्र पर दया करने का उपदेश दिया। प्राय: 44 वर्ष तक बिहार तथा काशी के निकटवर्त्ती प्रांतों में धर्म प्रचार करने के उपरांत अंत में कुशीनगर के निकट एक वन में शाल वृक्ष के नीचे वृद्धावस्था में इनका परिनिर्वाण अर्थात शरीरांत हुआ। मृत्यु से पूर्व उन्होंने कुशीनारा के परिव्राजक सुभच्छ को अपना अन्तिम उपदेश दिया। कुशीनगर बुद्ध के महापरिनिर्वाण का स्थान है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले से 51 किमी की दूरी पर स्थित है। बौद्ध ग्रंथ महावंश में कुशीनगर का नाम इसी कारण कुशावती भी कहा गया है। बौद्ध काल में यही नाम कुशीनगर या पाली में कुसीनारा हो गया। एक अन्य बौद्ध किंवदंती के अनुसार तक्षशिला के इक्ष्वाकु वंशी राजा तालेश्वर का पुत्र तक्षशिला से अपनी राजधानी हटाकर कुशीनगर ले आया था। उसकी वंश परम्परा में बारहवें राजा सुदिन्न के समय तक यहाँ राजधानी रही। इनके बीच में कुश और महादर्शन नामक दो प्रतापी राजा हुए जिनका उल्लेख गौतम बुद्ध ने किया था।

मुख से निकले अंतिम शब्द-भगवान बुद्ध ने जो अंतिम शब्द अपने मुख से कहे थे, वे इस प्रकार थे-

“हे भिक्षुओं, इस समय आज तुमसे इतना ही कहता हूँ कि जितने भी संस्कार हैं, सब नाश होने वाले हैं, प्रमाद रहित हो कर अपना कल्याण करो।” यह 483 ई. पू. की घटना है। वे अस्सी वर्ष के थे। 

 jileraj@gmail.com

 

Posted January 12, 2012 by SAMAYBUDDHA

29 responses to “4 भगवान् बुद्ध का जीवन परिचय

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  1. PANCHSHEEL AUR ASHTAGANIK MARG KA SIMPLE WORDING MEIN HINDI MATERIAL IS MEIN DARJ NAHIN

  2. aap ne isme ek bahut badi galti ki he ……………….jisse log buddha dharam chod rahe he
    ……………………..kia jiyotisi sahi hoti he………
    to aap log kahete he nahi…………………
    fir isme jiyotisi ki baat kiu batai apne………….
    pls remove it…………
    it is a big mistake
    ye saval mere kai dost putchte he…………………me unko javab nahi de pati

  3. ………………………….or biksu bhi yahi galti kar rahe he …………..logo se punar janm ki bat kar rahe he india me

    • deakho dear,

      Actually jab Badud shashak arthath Maury samrajye ka jab patan hua to uske baad baudhon ka daman chakra chala tha jiske tahat sare sahitye ya to nast kar diya gaya ya us wakt ke hindu buddhijeeviyon ne usmain apna agenda gusa diya. main aapko bataon to bharat se baudh dharm ko bilkul ukaad diya gaya tha wo to angrejon se khudai kar kar ke baudh ke khandit moorti nikal ke study karke isko ek nai shuruaat di,Fir babasaheb ne sare bahujanon ko ahsaas kara diya ki wo asal me baudh hain hindu nahin aur unhen wapas baudh dharm pe lautna chahiye…

      kher mudde ki baat ye hai ki wo jo milawat hai wo abhi tak chal rahi hai, doosra baudh bhikshoo me se kaion ne to bas apne jeevan chalne ke liye bhikshoo bane hain. unhen dhamm ke ABCD nahin aati bas choga pahan liya aur mangte khate hain. JAB tak quality ke Bhante nahin hone ye dharm aage nahin badeha.

      aaj ke poonjiwadi yug me quality ke bhante sirf DHAN se aayenge, isliye baudh viharon me DHAN ke avagaman ki jaroorat hai.

      dhyan rahe

      Bhay se bhakti,sangthan se suraksha aur Dhan se dharm chalta hai

  4. muje iska javab jaldi dena pls https://www.facebook.com/sapna.ambedkar

  5. हम कब तक सवालों से भागते रहेगे
    किया जियोतिसी सही होती हे ???????????????????????????????
    भगवान् बुद्ध (सिद्धार्थ) के जन्म से पहले उनकी माता ने विचित्र सपने देखे थे। पिता शुद्धोदन ने ‘आठ‘ भविष्य वक्ताओं से उनका अर्थ पूछा तो सभी ने कहा कि महामाया को अद्भुत पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। यदि वह घर में रहा तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा और यदि उन्होंने गृह त्याग किया तो संन्यासी बन जाएगा
    इस चेप्टर को हटाना चाहिए ?

  6. aapne yaha hindu devi devtao ke photo kiu laga rakhe he 1 photo

    • aap bhi to amit hoke sapna ban rahe ho ….Dear Amit see NAFRAT is not solution to anything I agree that Hindu devi devta are useless and just imajination of PUROHITS, But plz be mature and realise that this picture here is just in context with Article

  7. y r great

  8. हिन्दी में सरल शव्दों में पर्शन उत्तर में बुद्द की जीवनी चाहिए, मैं ने पहले भी आप को प्रार्थना की थी, मैं चाहता हूँ की इस पर एक टेस्ट बना कर बचों का टेस्ट लिया जाये
    इसी प्रकार का टेस्ट मैं ने डॉ.बाबा सहिब पर बनाया है,इस पर काफी खर्चा आया था, मेहनत भी काफी करनी पड़ी थी, इस टेस्ट को में पिछले तीन सालों से ले रहा हूँ! हमारे बचों को अगर हम बुद्ध की
    शुरूं से ही बाकफीयत करबा देते हैं तो इस के दूरगामी परिणाम आ सकते हैं ऐसा मेरा सोचना है !

  9. भगवान् बुद्ध (सिद्धार्थ) के जन्म से पहले उनकी माता ने विचित्र सपने देखे थे। पिता शुद्धोदन ने ‘आठ‘ भविष्य वक्ताओं से उनका अर्थ पूछा तो सभी ने कहा कि महामाया को अद्भुत पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। यदि वह घर में रहा तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा और यदि उन्होंने गृह त्याग किया तो संन्यासी बन जाएगा

    इस चेप्टर को नही हटाना चाहिए…
    क्योंकी ये एक सपना हैं। सपने में इंसान कुच्छ भी देख सकता है।

    रही बात भविष्य की तो ये बाते बुध्द जनम के पहेले की है। जो ब्राह्मणोंने कही है, भविष्य देखना एक उस समय की प्रथा थी और आज भी चल रही है। भविष्य देखना एक अनुमान लगाना होता था जो आज लोगो को लुटने का धंदा बन चुका है। बुध्द की माता सपने मे एक हाथी और साधू को देखती है। हाथी से यह अनुमान लगाया गया की होनेवाला बच्चा राजा होगा क्यों की राजा लोगो की सवारी हाथी घोडे हि थे। और बुध्द राजा के पुत्र मतलब होनेवाला राजा। साधू से अंदाजा लगाया गया की कोयी ज्ञानी पुरुष होगा। उस समय साधू को ही ज्ञानी मानते थे।

    इंसान दिन रात जो सोचता रहता है वही विचार चित्र के रुप में सपना बनकर रात को आते है। कुच्छ सपने याद रहते है कुच्छ नही रहते है। यही सपना महामाया को याद रहा होगा।

    लिखान मे अलंकारशास्र का उयोग भी कीया जाता है। जिस तराह कोई लडकी ब्युटीपार्लर मे सजती है। वैसाही लिखान मे अलंकारशास्र का उपयोग सजाने के लिए कीया जाता है। वो वास्तविक जिवन से अलग लगता है। जैसे कोई लडकी सजने के बाद वास्तविकता से अलग लगती है। जो अलंकारशास्र जानता है वोही ऐसी बाते जल्दीसे समज सकता है। डाँ. बाबासाहब आंबेडकरजीने भी बुध्दा अँड हिज धम्मा में इसी सपने का जिक्र कीया है। लेकीन गोतम बुध्द का गृहत्याग उन्होने तार्कीक अधार पर लिखा है। बुध्द को जो तीन दृश्य दिखे वो २९ वे साल मे देखे यह बात बुध्दी को जचती नही है।

  10. Namo Buddhay !!!
    Bhavantu Sarve Mangalam !!!
    Aaj ke vertmaan parivesh me Buddha ke vichaar ki sarthakta ko samjhana ati aavashak ho gaya hai. Aap sabhi ka paryaas saraahniya hai.
    Er S K Maurya

  11. mai aap se kahana chahata hu ki boudh bhagwan kisi avatar vad ko nahi mante phir unke janm par ye char hath wale or ye kis kis ki photo laga ke rakhi hai ye bahut hi bhaddi hai

  12. मै जानन चाह्ता हु कि बुद्ध के जन्म कोइ अवतार से सम्बन्द नहि है तो उनके जन्म पर ये चर हाथ वाले ओर किन लोगो कि तस्वीर लागाई है ये बहुत भद्दी दिख रही है
    ये हिन्दु धर्म के देवतावो कि लग रही है जो बहुत गन्दी है

    • चार हाथ वाली तस्वीर हटा दी गई है, पर आपसे अनुरोध है की कट्टर न बने ये नुकसान दायक होगा, ये आपको विरोधी की निति नहीं समझने देगा| हम जितने ध्यान से अपना साहित्य पढ़ते हैं उससे कहीं ज्यादा ध्यान से विरोधी का साहित्य पढना चाहिए वरना हार निश्चित है|

  13. Bhagwan Budhaa koi.Sabse pehle is duniya me kisine samja hoga to vo h..Wishw Ratna Dr.Br Ambedkar…Aur ye puri duniya Janto His

  14. Bhagwan Budhaa koi.Sabse pehle is duniya me kisine samja hoga to vo h..Wishw Ratna Dr.Br Ambedkar…Aur ye puri duniya JantI Hai….

  15. Aap kehte ho ….bhagwan Budha ko asho. Ne samja…..samja hota to vo Budha is prachar Q nahi kiya babasahab ne Pure Bharat ko Budhmay kiya….. JAY BHIM

  16. osho ek brahmanwadi mohara hai…..jisaka baudha se aur bauddha dharm se koi nata nahi ahi…….

  17. what is bodhisattva?

  18. what is buddha vandana

  19. buddha sirial telecast on zee tv every sunday at 11 am plese watch

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