बाबा साहब डॉ अम्बेडकर की किताब “जाति प्रथा का विनाश”1936 कुल भाग -22-एक समीक्षा , हम सभी को ये किताब अपने जीवन में जरूर पढ़नी चाहिए

“हर आदमी जो मिल के इस सिद्धांत को दोहराता है की एक देश किसी दूसरे देश पर शासन करने के लिए उपयुक्त नहीं है, उसे यह भी मानना होगा की एक जाति भी दूसरी जाति पर शासन करने के लिए उपयुक्त नहीं है” बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर
स्त्रोत – आंबेडकर की किताब “जाति प्रथा का विनाश”1936

आंबेडकर की किताब “जाति प्रथा का विनाश”1936 कुल भाग -22

इस किताब की शुरवात 1936 में लाहौर के जात पात तोड़क मंडल में बाबासाहेब को अध्यक्ष बनाने के वाले निमंत्रण से होती है जिस में बाबा साहेब को “जाति प्रथा का विनाश” इस विषय पे बोलना था ,जिस में पहले बाबासाहेब मना करते है फिर बाद में मान जाते है लेकीन आखिर में 1936 में लाहौर के जात पात तोड़क मंडल की सभा कैंसिल हो जाती है क्यों की वह बाबा साहेब के हिन्दू धर्म छोड़ने ,हिन्दू धर्म ग्रंथो की श्रेष्ठा नस्ट करना आदि विषय पर सहमति नहीं होती लाहौर के जात पात तोड़क मंडल सभा ख़त्म कर देता है , बाबा साहेब इस जात पात तोड़क मंडल से नाराज़ होते है उन को जो सम्बोधन जात पात तोड़क मंडल में करना था उस की किताब छप चुकी होती है , इस लिए बाबा साहेब इसे बेचने का फैसला लेते है ,”जाति प्रथा का विनाश” बाबा साहेब को जो सभा में बोलना था वही कुछ है

भाग 1

इस भाग में बाबा साहेब सभा का आभार जताते है कुछ ख़ास नहीं है इस भाग में

भाग 2
इस भाग में बाबासाहेब कांग्रेस की बात करते है , वह बताते है कांग्रेस का जन्म एक ऐसे समय हुआ जब समाज को लग रहा था की समाज में प्रगति जब तक नहीं की जा सकती जब तक की हम अपने समाज में व्यापत बुरी प्रथाओं को ख़तम न कर दे ,और इसी उदेश्य के साथ एक सामाजिक सम्मेलन में कांग्रेस की नीव पड़ते है , कांग्रेस के दो हिस्से थे पहला कांग्रेस जो एक देश के राजनीतिक संगठन में कमजोर बिंदुओं को परिभाषित करने के लिए चिंतित थी, और दूसरा हिस्सा था कांफ्रेंस वाला जो समाज में व्यापत बुरी प्रथाओं को खतम करने के लिए कोशिश कर रहा था , पहले कुछ साल दोनों ने मिल के काम किया ,दोनों एक ही पंडाल के नीचे सम्मलेन करते थे ,लेकीन जल्द दोनों में मदभेद नज़र आने लगे जिस का कारण था क्या समाजिक सुधारो के बाद राजनीतिक सुधार किये जाने चाहिए ? सालो से कांग्रेस के यह दोनों धड़े आपस में संतुलन बनाये हुए थे ,लेकिन जल्द ही समाजिक सुधारो वाला धड़ा ख़तम हो गया ,और राजनीतिक सुधारो की तरफ जाने वालो की सख्या बढ़ाने लगी ,ऐसे लोगो की कमी नहीं थी जो राजनीतिक पार्टी से सहानुभूति रखते थे ,समाजिक सुधारो की कोफेस्स को आने वाले कुछ लोग ही बचे ,जल्द ही स्वर्गीय तिलक के नेतृत्व में एक ही पंडाल के नीचे कांफ्रेंस करने की आज्ञा को तिलक ने वापस ले लिया ,और दोनों धड़ो में दुश्मनी बढ़ाने लगी , नौबत यहां तक आ गई की जब सामाजिक कांफ्रेंस वाले हिस्से ने जब अपने पंडाल में कांफ्रेंस करने की कोशिश की तो पंडाल को जलाने की धमकी मिलने लगी , समय के साथ कांग्रेस का राजनीतिक धड़ा जीत गया और सामाजिक सुधारो वाला धड़ा ख़तम हो गया जिसे कांग्रेस के आठवें सेशन जो इलहाबाद में हुआ था सन 1892 में उस में कांग्रेस अध्यक्ष उमेश चन्द्र बनर्जी के इस भाषण से समझा जा सकता है,जिस ने समाजिक कांफ्रेंस की ताबूत में कील का काम किया ,

मुझे उन लोगो के लिए कोई सहनशीलता नहीं है जो कहते है की हम सामाजिक सुधारो से पहले राजनीतिक सुधारो में फिट नहीं होंगे ,मैं दोनों के बीच कोई संबंध देखने में विफल हूं …..क्या हम (राजनीतिक सुधार के लिए) फिट नहीं हैं क्योंकि हमारी विधवाएं अविवाहित रहती हैं और हमारी लड़कियों की अन्य देशों की तुलना में जल्दी शादी कर दी जाती है ,हम क्योंकि हमारी पत्नी और बेटियां अपने दोस्तों के साथ हमारे साथ नहीं चलती हैं?क्योंकि हम हमारी बेटियों को ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज भेजते नहीं हैं?

इस जीत से कई लोग खुश को दुखी भी हुए , इस के बाद बाबासाहेब पेशवा काल आछूतो की स्थिति का वर्णन करते है की पेशवा काल में मराठा राज्य में आछूतो को सड़को पे नहीं चलने देते थे ,क्यों की उनकी परछाई से कोई अपवित्र न हो जाये ,उस समय आछूतो को हाथ या गले में काला धागा पहनना आवश्य था ,ताकि कोई गलती से उन्हें छू न ले और अपवित्र न हो जाये पेशवा की राजधानी पूना में आछूतो को गले में मटका बाँधना पड़ता था ताकि किसी का थूक ज़मीन पर न गिरे और कोई ब्राह्मण उस पर पैर रख अपवित्र न हो जाये ,आछूतो को अपने पीछे बाँधना पड़ता था ताकि उन के पैरो के निशान मिट जाये कोई ब्राह्मण उस पर पैर रख अपवित्र न हो जाये ,इस के बाद इंदौर में बलाई जाति सामाजिक बहिस्कार का जिक्र करते है , गुजरात में एक दलित समुदाय की महलओ पर हुए हमले का जिक्र करते है जिस में दलित महिलाओ को केवल इस लिए मारा जाता है क्यों की उन के पास धातु के बर्तन थे ,गुजरात में एक दलित समुदाय के बच्चो को किस प्रकार सरकरी स्कूल में फरमान जारी कर रोका गया , इलहाबाद में कैसे घी की दावत देने पर दलितों पर हमला किया गया क्यों की दलित घी कैसे खा सकता है

फिर वह बात करते है कांग्रेस की राजनीतिक सुधारो वाला धड़ा क्यों हरा ,वह कहते है की उन्हें हिन्दू समाज में सुधार से कोई मतलब नहीं था वह तो केवल घर में सुधार करना चाहते थे , उच्च समाज की बुरी प्रथाओं को ख़त्म करना चाहते थे इस लिए वह हारे उन्हें जाति प्रथा से कोई ज्यादा लेना देना न थावह केवल उच्च समाज की बुरी प्रथा जैसे बाल विवाह ,विधवा विवाह आदि को समाप्त करना चाहते थे जिस से वह स्वय पीड़ित थे ,उन्हें जाति प्रथा समापत करने से कोई मतलब न था

मुझे लगता है कि राजनीतिक सुधार से पहले सामाजिक सुधार करना जरूरी है ,मुझे लगता है राजनीतिक संविधान सामाजिक सुधार की अनदेखी कर नहीं बन सकता ,फिर इस के लिए वह फर्डीनांड लससले कहे शब्दों का इस्तमाल करते है ,फिर वह पूछते है देश में कम्युनल अवार्ड की क्या उपयोगिता है जो विभिन्न वर्गों और समुदायों के लिए निश्चित अनुपात में राजनीतिक सत्ता का आवंटन करता है ,मुझे लगता है की समाजिक सुधार ही देश के राजनीतिक सविधान की नीव रख रहे है और यह एक तरह से उन की हार है जो राजनीतिक सुधारो को सामजिक सुधारो से ज्यादा महत्त्व देते है ,कम्युनल अवार्ड को देख मुझे ऐसा ही लगता है ,कुछ लोग कह सकते है कम्युनल अवार्ड अल्पसंख्यकों और नौकरशाही के बीच गठबंधन का नतीजा है और अप्रकृतिक है ,तो इस बात को साबित करने के लिए की राजनीतिक सुधार से पहले सामाजिक सुधार करना जरूरी है मेरे पास और उदहारण है , आइए आयरलैंड की ओर चले आयरिश होम रूल का इतिहास हमे क्या बताता है ,जब उत्तरी आयरलैंड और दक्षिणी आयरलैंड के प्रतिनिधि आयरिश होम रूल पर बात करने मिले और श्री रेडमंड, जो दक्षिणी आयरलैंड के प्रतिनिधि थे वह उत्तरी आयरलैंड को हर हाल में आयरिश होम रूल में शामिल करना चाहते थे उत्तरी आयरलैंड के प्रतिनिधि से पूछते है “आप की तरह किसी भी राजनीतिक सुरक्षा उपायों चाहते है हम वह आप को देंगे ,उत्तरी आयरलैंड के प्रतिनधि कहते है भाड़ में जाये तुम्हारे राजनीतिक सुरक्षा उपाय हम बस चाहते है की तुम हम पर हुकूमत न करो किसी भी कीमत पर और आज आप देखे आयरलैंड और उत्तरी आयरलैंड नाम के दो देश आप को एक छोटे दीप पर दिखेंगे ,सवाल उठता है की उत्तरी आयरलैंड के इस रवैये का कारण क्या था उन दोनों का ईसाई धर्म के अलग समुदाय से होना कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट होना यह साबित करता है राजनीतिक सुधार से पहले सामाजिक सुधार करना जरूरी है कुछ लोग इस में भी कह सकते है उन दोनों के बीच साम्राज्यवादी ताकत थी इस लिए वार्ता विफल हुई , तो रोम चलते है वाह जब राजा को ख़तम कर दिया गया तब साम्राज्य कंसोल्स और पोंटिफेक्स मैक्सिमस के बीच विभाजित किया गया था।कॉन्सल में राजा की धर्मनिरपेक्ष प्राधिकारी निहित थी,जबकि उत्तरार्द्ध ने राजा के धार्मिक अधिकार को ग्रहण किया। इस गणतंत्रवादी संविधान ने दो कॉन्सल बनाई एक पेट्रीशियन और दूसरी प्लीबियन ,दूसरी और उसी संविधान ने पोंटिफेक्स मैक्सिमस के तहत पुजारिओं को भी दो भागो में बाटा प्लेबियां और पेट्रीसियन जो कम्युनल राइट के सामान ही था ऐसा क्यों की रोम के गणतंत्रवादी संविधान ने कम्युनल राइट दिए क्यों की प्लेबियां और पेट्रीसियन में जातीय मदभेद था इसलिए ,दोनों अलग अलग जातियों से थे जो दृष्टांत मैंने लिया है वह साबित करते है सामाजिक और धार्मिक समस्याओं का राजनीतिक संविधान पर असर पड़ता है लेकिन यह नहीं माना जाना चाहिए कि दूसरे पर एक का असर सीमित है।

ऐसे इतिहास में कई उदाहरण है की राजनीतिक क्रांतियों को हमेशा सामाजिक और धार्मिक क्रांतियों से पहले किया गया है,लूथर की सामाजिक क्रांति ने यूरोपीय लोगों के राजनीतिक मुक्ति को जन्म दिया इंग्लैंड में धर्मनिरपेक्षतावाद ने राजनीतिक स्वतंत्रता की स्थापना की,यह धर्मनिरपेक्षता थी जिस ने अमेरिकी स्वतंत्रता के युद्ध जीता और धर्मनिरपेक्षता धार्मिक आंदोलन थी।मुस्लिम साम्राज्य के बारे में भी यही सच है। इस से पहले अरब राजनीतिक शक्ति बने वह पैगंबर मोहम्मद द्वारा शुरू की गई से धार्मिक क्रांति से गुजरे थे।यहां तक कि भारतीय इतिहास भी इस निष्कर्ष का समर्थन करता है चन्द्रगुप्त के नेतृत्व में राजनीतिक क्रांति से पहले बुद्ध की धार्मिक और सामाजिक क्रांति ने इस राजनीतिक क्रांति की नीव रखी, शिवाजी के नेतृत्व में राजनीतिक क्रांति से पहले महाराष्ट्र के संतों द्वारा धार्मिक और सामाजिक क्रांति की गई ,सिखों की राजनीतिक क्रांति से पहले गुरु नानक ने धार्मिक और सामाजिक क्रांति की यह उदहारण बताते है की मन और आत्मा की मुक्ति आवश्यक है लोगों के प्रारंभिक राजनीतिक विस्तार के लिए

भाग 3

अब हम खुद को समाजवादियों की तरफ ले चलेंगे,क्या समाजवादी सामाजिक व्यवस्था से उत्पन्न होने वाली समस्या को नजरअंदाज कर सकते हैं?भारत में समाजवादियों ने यूरोप में अपने साथियो का अनुसरण किया है और उन्होंने यूरोप के इतिहास के आर्थिक व्याख्या को भारत में लागू करने की कोशिश की है ? उनका मानना है की इंसान केवल एक आर्थिक प्राणी है , और उस की गतिविधियों और आकांक्षाएं आर्थिक तथ्यों से बंधी है ,वह मानते है की संपत्ति शक्ति का एकमात्र स्रोत है , इस लिए वह मानते है की सामाजिक और राजनीतिक सुधार एक बड़ा भ्रम है , इस के स्थान पर आर्थिक सुधार जिस में संपत्ति को सब में बराबर बाँट दिया जाये सबसे पहले लागु किया जाना चाहिए , कुछ लोग कह सकते है इन का कहना सही है ऐसा सुधार सबसे पहले लागु किया जाना चाहिए ,कुछ लोग यह भी कह सकते है की आर्थिक मकसद केवल एकमात्र उद्देश्य नहीं है जिसके द्वारा मनुष्य क्रियाशील होता है।आर्थिक शक्ति ही एकमात्र शक्ति है मानव समाज शास्त्र का कोई भी छात्र स्वीकार नहीं कर सकता, अक्सर एक व्यक्ति की सामाजिक स्थिति शक्ति और अधिकार का एक स्रोत बन जाती है ,हम इस महात्माओं के आम आदमी पर प्रभाव को देख कर समझ सकते है , वरना भारत में करोड़पति साधुओ और फाकिरों की बातो का पालन क्यों करते हैं?क्यों लाखों दरिद्र अपनी थोड़ी सम्पति को बेच कर बनारस और मक्का चले जाते है ? क्युकी ,भारत के इतिहास में धर्म शक्ति का एक मात्र स्रोत है जहा पुजारी आम आदमी पर अपना प्रभाव रखता है जो किसी मैजिस्ट्रेट से अधिक है और हर चीज़ से आधिक है ? इसलिए हड़तालों और चुनावों जैसे चीज़े भी हमारे देश में धार्मिक मोड़ ले लेती है या उन्हें आसानी से धार्मिक मोड़ दिया जा सकता है ,मनुष्य के ऊपर धर्म की शक्ति का प्रभाव समझने के लिए हम उदाहरण के रूप में रोम के प्लेबियंस (आम लोग ) का मामला लें। यह इस बिंदु पर प्रकाश डालता है,प्लेबियंस (आम लोग ) ने अपने अधिकारों के लिए बड़ी लड़ाई लड़ी और रोमन गणराज्य के तहत सर्वोच्च कार्यकारी में आपने आधिकारो को प्रपात किया और जिस में वे रोम की संसद में आम मतदाताओं द्वारा चुने जा सकते थे और प्लेबियंस कौंसिल में अपना स्थान पा सकते थे। उन लोगो ने कौंसिल में चुने जाने का अधिकार इस लिए प्राप्त किया क्यों की उन्हें लगता था पाट्रिशन (पुजारी वर्ग या रईस ) उन के खिलाफ प्रशासन में भेदभाव करते है। लेकिन क्या उन्होंने इस अधिकार को प्राप्त कर कुछ हासिल किया ? नहीं क्यों नहीं क्यों की वह अपना कोई मजबूत प्रतिनिधि रोम की संसद में नहीं भेज पाए , ऐसा क्यों की जब वह खुद वोट कर अपना प्रतिनिधि चुन सकते थे जो मजबूत प्रतिनिधि रोम की संसद में नहीं भेज पाए ,इस प्रश्न का उत्तर है धर्म का प्रभुत्व मनुष्य के प्रभुत्व से ऊपर होना। क्यों की प्लेबियंस (आम लोग ) उसे ही अपना प्रतिनिधि चुन सकते थे जो डेल्फी नाम की देवी को स्वीकार हो , और इस डेल्फी नाम की देवी के मंदिर के सभी पुजारी पाट्रिशन (पुजारी वर्ग या रईस ) वर्ग के थे , और यह देवी पाट्रिशन (पुजारी वर्ग या रईस ) के माध्यम से ही अपना सन्देश प्लेबियंस (आम लोग ) तक पहुँचती थी। इस लिए प्लेबियंस (आम लोग ) सामान प्रतिनिधित्व होते हुए कभी पाट्रिशन (पुजारी वर्ग या रईस ) जितने ताकतवर न हो पाए। क्यों की जब कभी कोई ताकतवर प्लेबियंस (आम लोग ) चुन कर संसद पहुंच जाता तो पाट्रिशन (पुजारी वर्ग या रईस ) कह देता की यह आदमी डेल्फी देवी को स्वीकार नहीं है यह है धर्म की शक्ति का प्रभाव राजनीतिक और आर्थिक शक्ति पर धर्म को छोड़ने के बजाय, प्लीबेन (आम लोग ) ने भौतिक लाभ को छोड़ दिया, जिसके लिए वे इतनी मेहनत से लड़े थे भारत के सन्दर्भ में भी यही बात है ? क्या यह यह नहीं दिखाता है कि धर्म शक्ति का एक स्रोत हो सकता है पैसा जितना बड़ा नहीं तो उस के बरारबर । समाजवादियों का भ्रम यह मानने में है कि जैसे यूरोपीय सोसाइटी के वर्तमान स्तर में संपत्ति प्रमुख सत्ता का स्त्रोत है , क्या भारत के संदर्भ में भी यही बात सही है ,क्या इस से पहले भी यूरोप में सम्पति सत्ता का स्रोत थी ?धर्म, सामाजिक स्थिति और संपत्ति यह शक्ति और अधिकार दोनों स्रोत हैं, जिस के द्वारा एक आदमी , दूसरे की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने के लिए समक्ष है। इन में से एक एक स्तर पर हावी हो सकती है और दूसरी , दूसरी स्तर पर यही यह एकमात्र अंतर है दोनों में. यदि स्वतंत्रता आदर्श है,अगर स्वतंत्रता का मतलब है एक आदमी के दूसरे पर प्रभाव का विनाश तो आर्थिक सुधार से इसे पाया जा सकता है लेकीन , अगर वह प्रभुत्व धर्म और समाज के आधार पर स्थापित किया गया हो तो उस के लिए सामाजिक और राजनीतिक सुधार जरूरी होंगे जैसे समाजवादी नहीं मानते। इस प्रकार भारत के समाजवादियों द्वारा अपनाई गई आर्थिक व्याख्या के सिद्धांत पर हमला किया जा सकता है।लेकिन मैं समझता हूं कि समाजवादी विवाद की वैधता के लिए इतिहास की आर्थिक व्याख्या आवश्यक नहीं है जो कहती है संपत्ति का बराबर बटवारा करने से सब कुछ ठीक हो जायेगा ? मै अपने समजवादी दोस्तों से पूछना चाहुगा क्या आर्थिक सुधार सामजिक सुधर से पहले लागु किये जा सकते है ? लगता है समजवादी दोस्तों ने इस पर विचार ही नहीं किया मैं उनके साथ अन्याय नहीं करना चाहता?मै पत्र का उदहारण देना चाहूंगा जो एक प्रमुख समाजवादी ने मेरे एक मित्र को लिखा था जिसमें उसने कहा था,मुझे नहीं लगता है कि हम भारत जब तक एक स्वतंत्र समाज का निर्माण कर सकते हैं, जब तक कि एक वर्ग दूसरे का दुर्व्यवहार और दमन करता रहेगा एक समाजवादी होने के कारण में विभिन्न वर्गों और समूहों के सामान उपचार में विशवास करता हु ,जिसे सामजवाद के द्वारा ही पाया जा सकता है। मै समजवादी दोस्त से पूछना चाहूंगा क्या यह कहने मात्र से की ” एक समाजवादी होने के कारण में विभिन्न वर्गों और समूहों के सामान उपचार में विशवास करता हु ” क्या इतना कहना समाजवाद के पुरे सिद्धांत को समझाता है नहीं , अब मै अपने विचार समाजवाद पर रखना चाहूंगा , जिस आर्थिक सुधर की बात समाजवाद करता है है वह तभी लागु की जा सकती है जब सत्ता पर समाजवाद का पूरा कब्ज़ा हो ,और वह कब्ज़ा श्रमजीवी वर्ग का हो। मै सवाल पूछता हु की क्या भारत का श्रमजीवी वर्ग मिल के ऐसी कोई क्रांति करेगा। यह क्रांति तभी संभव है जब सभी को यह विशवास हो की दूसरा जो उस के साथ है वह सत्ता हासिल होने के बाद उस के साथ धर्म या जाति के नाम पर भेदभाव नहीं करेगा , ऐसी कोई क्रांति भारत में तो संभव नहीं है ,चलिए हम मान ले समाजवादीओ ने किसी तरह सत्ता हासिल कर भी ली तो तो वह सामाजिक भेदभाव को मिटाये बिना इसे चला पाएंगे नहीं समाजवाद कुछ नहीं मन को संतुष्ट करने वाला वाकय भर है

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जिस अम्बेडकरवादी भाई ने दलितों को समझाया की देवी देवताबाजी की बजाये शिक्षा और ज्ञान पर ध्यान दो डॉ आंबेडकर और बुद्ध तक पहुँचो , उसको हिन्दू रक्षक आतंकीयो द्वारा मार मार के जय श्री राम बुलवाने वाली घटना टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी है ,इस पोस्ट में उसकी कटिंग प्रस्तुत है

बहुजन समाज के अजेय योद्धा जिन्होंने मनुवादी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को कभी भी स्वीकार नहीं किया, आज बहुजन दर्शन, विचारधारा और रणनीति से लैस हो कर ब्राह्मणवाद को अब तक के इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती दे रहे हैं इन्होने मनुवाद के सामने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है जिस कारण उसका मानसिक संतुलन बिगड़ चुका है.

जिस अम्बेडकरवादी विपिन ने दलितों को समझाया की देवी देवताबाजी मन्दिरबाजी की बजाये शिक्षा और ज्ञान पर ध्यान दो डॉ आंबेडकर और बुद्ध तक पहुँचो , उसको हिन्दू रक्षक आतंकीयो द्वारा दलित के मार मार के जय श्री राम बुलवाने वाली घटना टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी है ,इस पोस्ट में उसकी कटिंग प्रस्तुत है

आप सभा को अपने जीवन में डॉ आंबेडकर द्वारा दिलवाई गयी बाइस प्रतिज्ञा को जानना समझना और मानना चाहिए, देवी देवताबाजी छोड़ना भी इन प्रतिज्ञाओं में शामिल है । कानूनन कोई भी अपनी मर्जी से अपनी धार्मिक मान्यताएं चुन सकता है ये संवैधानिक अधिकार है इस देश में ।

बाबा साहब डॉ अम्बेडकर द्वारा रचित भारतीय संविधान को आसान इंग्लिश और हिंदी वीडियो में जानने का कोर्स मटेरियल है निम्न यूट्यूब वीडियो में , जिनको कोर्स नहीं करना वो भी जरूर सुने और समझें की बाबा साहब की सोच कितनी ज्यादा बड़ी और दूरदर्शी थी जो भयानक विषमताओं से भरे भारत देश को एक साथ रख कर चला रहा है , ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोग तो ऐसे जनकल्याणकारी संविधान की कल्पना तक नहीं कर सकते थे ।

ओशो के विचार में बाबा साहब डॉ अम्बेडकर
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स्त्री है दीन ! उसको पुरुष ने कह रखा है,कि तुम दीन हो ! और मजा यह है कि स्त्री ने भी मान रखा है कि वह दीन है!
असल में हजारों साल तक भारत  में शुद्र समझता था कि वह शुद्र है; क्योंकि हजारों साल तक ब्राहमणों ने समझाया था कि तुम शुद्र हो ! अम्बेडकर के पहले, शुद्रों के पांच हजार साल के इतिहास में कीमती आदमी शुद्रों में पैदा नहीं हुआ ! इसका यह मतलब नहीं कि शुद्रों में बुद्धि न थी और अम्बेडकर पहले पैदा नहीं हो सकता था ! पहले पैदा हो सकता था,लेकिन शुद्रों ने मान रखा था कि उनमें कभी कोई पैदा हो ही नहीं सकता ! वे शुद्र हैं, उनके पास बुद्धि हो नहीं सकती ! अम्बेडकर भी पैदा न होता, अगर अंग्रेजों ने आकर इस मुल्क के दिमाग में थोडा हेर-फेर न कर दिया होता तो आंबेडकर भी पैदा नहीं हो सकता था !

हालांकि जब हमको भारत का विधान बनाना पड़ा, कान्सिटटयूशन बनाना पड़ा, तो ब्राहमण काम नहीं पड़ा, वह शुद्र अम्बेडकर काम पड़ा ! वह बुद्धिमान से बुद्धिमान आदमी सिद्ध हो सका !
लेकिन दौ सौ साल पहले वह भारत  में पैदा नहीं हो सकता था ! क्योंकि शूद्रों ने स्वीकार कर लिया था, खुद ही स्वीकार कर लिया था कि उनके पास बुद्धि नहीं है ! स्त्रियों ने भी स्वीकार कर रखा है कि वे किसी न किसी सीमा पर हीन हैं !….ओशो नारी और क्रांति (पेज संख्या.१७)

 

जनता बहुत बेरहम होती है ये सत्तधारिओं की चापलूसी करती है और समाजसुधारकों का जबरदस्त बुरा। आईये जाने कैसे समाजसुधार की लत में दुनिये के तीन सबसे बड़े समाज सुधारक बुद्ध,कार्ल मार्क्स और डॉ आंबेडकर के परिवार को बेहद दुःख का सामना करना पड़ा …SBMT

इस आर्टिकल की शुरुआत खलील जिब्रान के निम्न वक्तव्य से करते हैं जो एक कहानी में उन्होंने लिखा है
“मैंने जंगल में रहने वाले एक फ़कीर से पूछा कि आप इस बीमार मानवता का इलाज क्यों नहीं करते . तो उस फ़कीर ने कहा कि… तुम्हारी यह मानव सभ्यता उस बीमार की तरह है जो चादर ओढ़ कर दर्द से कराहने का अभिनय तो करता है. पर जब कोई आकर इसका इलाज करने के लिये इसकी नब्ज देखता है तो यह चादर के नीचे से दूसरा हाथ निकाल कर अपना इलाज करने वाले की गर्दन मरोड़ कर अपने वैद्य को मार डालता है और फिर से चादर ओढ़ कर कराहने का अभिनय करने लगता है|
कार्ल मार्क्स और जेनी कोरलीना की शादी हो गई थी,1847 मे उनको लड़का हुआ लड़के का नाम एडगर मार्क्स रखा था। कार्ल मार्क्स अपने परीवार की तरफ ख्याल नहीं देते थे। उनके दिमाग में बस सर्व हरा समाज की उन्नति के लिए कैसी क्रांन्ती  की जाय इसके ऊपर … संशोधन और..चिंतन.. मनन .करते.. थे। और आपने मिशन के लिए कार्यकरता जोड़ते थे। अपने तत्त्व क्रान्तीं की भाषा लोगो को समझाते थे। 1855 में एडगर मार्क्स ८साल का हो चुका था। एक दिन एडगर मार्क्स की तबियत थोड़ी खराब थी। कार्ल मार्क्स भी घर पर ही थे। एडगर मार्क्स अपने पिता के गोद में सोना चाहते थे। कार्ल मार्क्स ने भी मना नहीं किया। वो एडगर को लेकर सो गई पत्नी जेनी कोरलीना एक बाजु में सो गई। ठीक रात में कार्ल मार्क्स के गोद में उनका अकेला प्रिय पुत्र एडगर मर चुका था और कार्ल मार्क्स को पता भी नहीं था।
सुबह उठने के बाद जब पता चला एडगर की जान जा चुकी है तो दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे के गले पड़ ज़ोर ज़ोर से रोने लगे। हमारे साथ ये क्या हो गया। फिर कुछ साल बाद एक पत्रकार ने उनसे इंटरव्यू लिया और पुछा। आपका लडका एडगर मार्क्स आपकी गोद में मर गया आपको पता भी नहीं चला। आप क्या कर रहे थे? कार्ल मार्क्स ने जवाब दिया। मै सर्वहरा समाज के क्रान्तीं के लिए सिद्धांतों का विचार कर रहा था। मैं रात और दिन‌ बस परीवर्तन के सपने देखता था। अमीर लोगों के पास है वो सपंत्ती और देश की चल अचल (नैसर्गिक संपत्ति जमीन) संपत्ति का विकेंद्रीकरण करके गरीब समाज की उन्नति कैसी की जा सकती है? इसके लिए नया सिद्धांत ढूंढ रहा था। नयी क्रान्तीं की योजना बना  रहा था। इसलिए मुझे कुछ पता नहीं चला। वो नयी  क्रान्तीं का नाम था। ..समाजवादी..क्रान्तीं.. और इस नई क्रान्तीं की ओर आधी दुनिया झुक चुकी थी। आज के रशिया और चीन समाजवादी क्रांति की देन है।
बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर जी के भी चार बेटे और एक बेटी थी, सभी अकाल मृत्यु मरे। जब बाबा साहेब के अंतिम बेटे राज रत्न की अचानक मृत्यु हुई। उसी दिन बाबा साहेब को प्रथम गोल मेज कांफ्रेन्स के लिये लन्दन जाना था, वो जाने की तैयारी में इस चिंतन में थे कि किस तरह गांधीजी और मालवीय की चाल को नाकाम किया जाये। कैसे मैं अपने समाज का प्रतिनिधित्व दिला सकता हूँ और भारत के तत्कालिक सात करोड़ बहिष्कृत लोगों को आत्मसम्मान और पहचान दिला सकता हूँ कि तभी बाबा साहेब के बड़े भाई भागकर आये और बोले “भीम” तू कहा जा रहा है। बेटा अब नही रहा।
बाबा साहेब स्तब्ध रह गये फिर अगले पल अपने आपको सभाला और भाई तथा अपनी पत्नी से कहा? आज अगर मैं लन्दन नही पहुंचा तो आज करोड़ो दलित, पिछड़ो, बहिष्कृतों, वंचितों और शोषितों के अधिकारो की गांधी एंड कम्पनी हत्या कर देगे मै मेरे एक बेटे के लिये करोड़ो बेटो को नही मार सकता हूँ और बाबा साहेब लंदन के लिए निकल गए जहाँ उन्होंने अपने भाषण और तर्क से दुनिया को चौंकाया और पृथक निर्वाचन की मांग को स्वीकार करना पड़ा था। ऐसे थे “बाबा साहेब”। बाबा साहेब की जब मृत्यु हुई थी तब उनके पास सम्पत्ति के नाम पर 10 हजार का लोन था जो उन्होंने किताबें खरीदने के लिया था, उनके घर में संसार का सबसे बड़ा निजी पुस्तकालय था जिसमे उस समय 50000 किताबें थी। बाकि नेताओं की संपत्ति का विवरण आप खुद जानते हैं।

गौतम बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद घर वापस लौटे। बारह साल बाद वापस लौटे। जिस दिन घर छोड़ा था, उनका बच्चा, उनका बैटा एक ही दिन का था। राहुल एक ही दिन का था। जब आए, तो वह बारह वर्ष का हो चुका था। और बुद्ध की पत्नी- यशोधरा, बहुत नाराज थी। स्वभावत:। और उसने एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल पूछा।

उसने पूछा कि मैं इतना ही  जानना चाहती हूं;  क्या तुम्हें मेरा इतना भी भरोसा न था कि मुझसे कह देते कि मैं जा रहा हूं| क्या तुम सोचते हो कि मैं तुम्हें रोकती? मैं भी क्षत्राणी हूं। अगर हम युद्ध के मैदान पर तिलक और टीका लगा कर तुम्हें भेज सकते है, तो सत्य की खोज पर नहीं भेज सकेते ? तुमने मेरा अपमान किया है। बुरा अपमान किया है। जाकर किया अपमान ऐसा नहीं। तुमने पूछा क्यों नहीं? तुम कह तो देते कि मैं जा रहा हूं। एक मौका तो मुझे देते। देख तो लेते कि मैं रोती हूं, चिल्लाती हूं, रूकावट डालती हूं।

कहते है बुद्ध से बहुत लोगों ने बहुत तरह के प्रश्न पूछे होंगे। मगर जिंदगी में एक मौका था जब वे चुप रह गए; जवाब न दे पाये। और यशोधरा ने एक के बाद एक तीर चलाए। और यशोधरा ने कहा कि मैं तुमसे दूसरी यह बात पूछती हूं कि जो तुमने जंगल में जाकर पाया, क्या तुम छाती पर हाथ रख कर कह सकते हो कि वह यहीं नहीं मिल सकता था? यह भी भगवान बुद्ध कैसे कहें – कि यहीं नहीं मिल सकता था। क्योंकि सत्य तो सभी जगह है। और भ्रम वश कोई अंजान कह दे तो भी कोई बात मानी जाये, अब तो उन्होंने खुद सत्य को जान लिया है, कि वह जंगल में मिल सकता है, तो क्या बाजार में नहीं मिल सकता? पहले बाजार में थे, तब तो लगता था, सत्य तो यहां नहीं है। वह तो जंगल में ही है। वह संसार में कहां, वह तो संसार के छोड़ देने पर ही मिल सकता है। पर सत्य के मिल जाने के बात तो फिर उसी संसार और बाजार में आना पडा; तब जाना यहां भी जाना जा सकता था सत्य को; नाहक भागे। पर यहां थोड़ा कठिन जरूर है, पर ऐसा कैसे कह दे की यहां नहीं है। वह तो सब जगह है।

भगवान बुद्ध ने आंखे झुका ली। और तीसर प्रश्न जो यशोदा ने चोट की, शायद यशोदा समझ न सकी की बुद्ध पुरूष का यूं चुप रह जाना अति खतरनाक है। उस पर बार-बार चोट कर अपने आप को झंझट में डालने जैसा है| सो इस आखरी चोट में यशोदा उलझ गई। तीसरी बात उसने कहीं, राहुल को सामने किया और कहा कि ये तेरे पिता है। ये देख, ये जो भिखारी की तरह खड़ा है, हाथ में भिक्षा पात्र लिए। यहीं है तेरे पिता। ये तुझे पैदा होने के दिन छोड़ कर भाग गये थे। जब तू मात्र के एक दिन का था। अभी पैदा हुआ नवजात। अब ये लौटे है, तेरे पिता, देख ले इन्हीं जी भर कर। शायद फिर आये या न आये।

तुझे मिले या न मिले। इनसे तू अपनी वसीयत मांग ले। तेरे लिए क्या है इनके पास देने के लिए। वह मांग ले। यह बड़ी गहरी चोट थी। बुद्ध के पास देने को था क्या। यशोधरा प्रतिशोध ले रही थी बारह वर्षों का। उसके ह्रदय के घाव जो नासूर बन गये थे। लेकिन उसने कभी सोचा भी नहीं था कि, ये घटना कोई नया मोड़ ले लेगी।

भगवान ने तत्क्षण अपना भिक्षा पात्र सामने खड़े राहुल के हाथ में दे दिया। यशोधरा कुछ कहें या कुछ बोले। यह इतनी जल्दी हो गया। कि उसकी कुछ समझ में नहीं आया। इस के विषय में तो उसने सोचा भी नहीं था। भगवान ने कहा,बेटा मेरे पास देने को कुछ और है भी नहीं, लेकिन जो मैंने पाया है वह तुझे दूँगा। जिस सब के लिए मैने घर बार छोड़ा तुझे, तेरी मां, और इस राज पाट को छोड़, और आज मुझे वो मिल गया है। मैं खुद चाहूंगा वही मेरे प्रिय पुत्र को भी मिल जाये। बाकी जो दिया जा सकता है। क्षणिक है। देने से पहले ही हाथ से फिसल जाता हे। बाकी रंग भी कोई रंग है? संध्या के आसमान की तरह,जो पल-पल बदलते रहते है। में तो तुझे ऐसे रंग में रंग देना चाहता हूं जो कभी नहीं छुट सकता।

तू संन्यस्त हो जा। बारह वर्ष के बेटे को संन्यस्त कर दिया। यशोधरा की आंखों से झर- झर आंसू गिरने लगे। उसने कहां ये आप क्या कर रहे है। पर बुद्ध ने कहा, जो मरी संपदा है वही तो दे सकता हूं। समाधि मेरी संपदा है, और बांटने का ढंग संन्यास है। और यशोधरा, जो बीत गई बात उसे बिसार दे। आया ही इसलिए हूं कि तुझे भी ले जाऊँ। अब राहुल तो गया। तू भी चल। जिस संपदा का मैं मालिक हुआ हूं। उसकी तूँ भी मालिक हो जा। और सच में ही यशोधरा ने सिद्ध कर दिया कि वह क्षत्राणी थी।

तत्क्षण पैरों में झुक गई और उसने कहा- मुझे भी दीक्षा दें। और दीक्षा लेकर भिक्षुओं में, संन्यासियों में यूं खो गई कि फिर उसका कोई उल्लेख नहीं है। पूरे धम्म पद में कोई उल्लेख नहीं आता। हजारों संन्यासियों कि भीड़ में अपने को यूँ मिटा दिया। जैसे वो है ही नहीं। लोग उसके त्याग को नहीं समझ सकते। अपने मान , सम्मान, अहंकार को यूं मिटा दिया की संन्यासी भूल ही गये की ये वहीं यशोधरा है। 

और आपको ये जान कर दुक्ख होगा की गौतम बुद्ध का एकलौता पुत्र सिद्धार्त गौतम अपने पिता से बहुत पहले ही चल बसा ।

बुद्ध का ममेरा भाई देवदत्त सदा ही बुद्ध को नीचा दिखाने की चेष्टा में लगा रहता था, मगर उसे हमेशा मुँह की ही खानी पड़ती थी।गौतम बुद्ध के पीछे उनके ममेरे भाई ने उनकी पत्नी यशोधरा को बहुत परेशान किया बुरी नज़र डाली, जलन के कारन बुद्ध की कई बार मार डालने की कोशिश की ।

एक बार बुद्ध जब कपिलवस्तु पहुँचे तो अनेक कुलीन शाक्यवंसी राजकुमार उनके अनुयायी बने। देवदत्त भी उनमें से एक था।

कुछ दिनों के बाद देवदत्त मगध से लौट कर जब संघ में वापिस आया तो उसने स्वयं को बुद्ध से श्रेष्ठ घोषित किया और संघ का नेतृत्व करना चाहा। भिक्षुओं को बुद्ध से विमुख करने के लिए उसने यह कहा हैं कि बुद्ध तो बूढ़े हो चुके थे और सठिया गये हैं। किन्तु भिक्षुओं ने जब उसकी कोई बात नहीं सुनी तो वह बुद्ध और संघ दोनों से द्वेष रखने लगा।

खिन्न होकर वह फिर वापिस मगध पहुँचा और अजात शत्रु को महाराज बिम्बिसार का वध करने के लिए प्रेरित किया क्योंकि बिम्बिसार बुद्ध और बौद्धों को प्रचुर प्रश्रय प्रदान करते थे। प्रारंभिक दौर में बिम्बिसार को मरवाने की उसकी योजना सफल नहीं हुई। अत: उसने सोलह धुनर्धारियों को बुद्ध को मारने के लिए भोजा। किन्तु बुद्ध के व्यक्तित्व से प्रभावित हो सारे उनके ही अनुयायी बन गये।

क्रोध में देवदत्त ने तब बुद्ध पर ग्रीघकूट पर्वत की चोटी से एक चट्टान लुढ़काया जिसे पहाड़ से ही उत्पन्न हो दो बड़े पत्थरों ने रास्ते में ही रोक दिया।

देवदत्त के क्रोध की सीमा न रही। उसने एक दिन मगध राज के अस्तबल में जाकर एक विशाल हाथी नालगिरी को ताड़ी पिलाकर बुद्ध के आगमन के मार्ग में भेज दिया। नालगिरी के आगमन से सड़कों पर खलबली मच गई और लोग जहाँ-तहाँ भाग खड़े हुए। तभी बुद्ध भी वहाँ से गुजरे। ठीक उसी समय एक घबराई महिला अपने बच्चे को हाथी के सामने ही छोड़ भाग खड़ी हुई। जैसे ही नालगिरि ने बच्चे को कुचलने के लिए अपने पैर बढ़ाये बुद्ध उसके ठीक सामने जा खड़े हुए। उन्होंने हाथी के सिर को थपथपाया। बुद्ध के स्पर्श से नालगिरि उनके सामने घुटने टेक कर बैठ गया।

नालगिरि हाथी की इस घटना से देवदत्त मगध में बहुत अप्रिय हुआ और उसे तत्काल ही नगर छोड़ कर भागना पड़ा।

भीमा कोरेगाव में शौर्ये दिवस की दोसौवी वर्ष गांठ मानाने पहुंचे दस लाख से भी ज्यादा अम्बेडकरवादियों के एक जत्थे पर कट्टरपंथी हिन्दुओं ने हमला किया जिसके विरोध में आंबेडकरवादियों ने 03-jan-2018 को महाराष्ट्र बंद का आवाहन किया , इस पोस्ट में टाइम्स ऑफ़ इंडिया की इसके बारे में 5,6 और 7 जनवरी 2018 ख़बरों की कॉपी है

आपको क्या लगता है. भारत के नेशनल न्यूज चैनलों पर पहला दलित एंकर हम कब देख पाएंगे? और कितने साल तक इंतजार करना होगा?…Dilip C Mandal

आपको क्या लगता है. भारत के नेशनल न्यूज चैनलों पर पहला दलित एंकर हम कब देख पाएंगे?

और कितने साल तक इंतजार करना होगा?

20 करोड़ से ज्यादा की दलित आबादी नेशनल चैनलों के लिए एक एंकर क्यों नहीं पैदा कर पा रही है? राष्ट्रपति से लेकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और ज्ञान के तमाम क्षेत्र में झंडे गाड़ने वाला समाज मीडिया के सामने जाकर लंगड़ा क्यों हो जाता है.

बोलना नहीं आता?
चेहरा सुंदर नहीं है?
रंग सांवला है?
नाक मोटी है?
ओठ बेढब हैं?
स्मार्ट नहीं है?
ज्ञान नहीं है?

ये सब तो है. फिर समस्या कहां है?

अमेरिकी चैनलों पर कई टॉप एंकर ब्लैक हैं. तो भारत में क्या रंगभेद से भी बड़ी कोई समस्या है?

कहीं यह एक्सक्लूसन यानी जानबूझकर दलितों को बाहर रखने का मामला तो नहीं? इन चैनलों की प्रगतिशीलता की हद यह है कि वे दलितों के बारे में बात तो कर लेंगे, लेकिन किसी दलित को मौका नहीं देंगे.

अगर यह बात आपको परेशान नहीं करती तो आप …अब मैं क्या कहूं? आप वही हैं.

भीमा कोरेगाँव पर NDTV INDIA की आज की बहस कादम्बिनी “शर्मा” और अभिषेक “शर्मा” के बीच पूर्वाग्रही बातचीत में चली गई। दोनों “शर्माओं” ने मिलकर सब चौपट कर दिया। मूल बात को इन दोनों ने उजागर ही नहीं होने दिया।

हालांकि रतनलाल जी और प्रकाश अम्बेडकर जी ने अपनी बातें दमदार तरीके से रखीं… लेकिन मीडिया ने साबित किया कि वह अपने “जनेऊ” से बाहर नहीं निकलेगा… डॉ. Sunil Kumar Suman

 

 

भीमा कोरेगाव में शौर्ये दिवस की दोसौवी वर्ष गांठ मानाने पहुंचे दस लाख से भी ज्यादा अम्बेडकरवादियों के एक जत्थे पर कट्टरपंथी हिन्दुओं ने हमला किया जिसके विरोध में आंबेडकरवादियों ने 03-jan-2018 को महाराष्ट्र बंद का आवाहन किया , इस पोस्ट में टाइम्स ऑफ़ इंडिया की इसके बारे में 3 और 4 जनवरी 2018 ख़बरों की कॉपी है