मानव जीवन में दुखों की मुक्ति का रास्ता है सिर्फ बौद्ध दर्शन का मध्यम मार्ग – अरविन्द आलोक

जब हम बुद्ध द्वारा कही गई बातों का मनन करते हैं , तो जो बात सबसे पहले हमारे मन को छूती है , वह है उनके द्वारा मानव मन को दी गई स्वतंत्रता। मन की प्रधानता पर जितना जोर बुद्ध ने दिया , उतना शायद ही किसी और ने दिया हो। उन्होंने कहा कि जैसे गाड़ी का पहिया बैल के पैरों के पीछे-पीछे घूमता है , उसी तरह हमारे जीवन का कार्य व्यापार हमारे मन के पीछे-पीछे चलता है। ‘ इसका आशय यह है कि मन के मुताबिक ही हर कार्य संपन्न होता है।

कर्म पर आप कितना भी बल दें , उससे क्या लाभ , जब मन ही स्वस्थ और स्वच्छ न हो। सुमार्ग पर जाना बहुत ही कठिन है , यदि मन गुस्सा या मैला हो। मन के द्वारा ही मानवीय गुणों को सीखा और सींचा जा सकता है। जीवन के आदर्शों को अपनाने में मन का बहुत बड़ा योगदान होता है। इसलिए प्रयास होना चाहिए कि मन की बुराइयों को दूर कर मन लायक संस्कार गढ़ें।

बौद्ध दर्शन में ऐसे मूल्यों को प्राप्त करना और उन्हें अपनी दिनचर्या में लागू करने के लिए जिस मार्ग की आवश्यकता होती है- वह है अष्टांगिक मार्ग। अष्टांगिक मार्ग का अर्थ है आठ अंगों वाला मार्ग , आठ तत्वों वाला मार्ग। ऐसी राह जिस पर चलने के लिए आठ बातों का ध्यान रखना है। वे आठ बातें कौन कौन सी हैं ? वे हैं सम्यक दृष्टि , सम्यक वचन , सम्यक काम , सम्यक आजीव , सम्यक व्यायाम , सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि। इन्हीं को मिला देने से अष्टांगिक मार्ग बन जाता है। अष्टांगिक मार्ग पर चलने से सभी मानवीय मूल्यों का स्वयं ही मन में विकास हो जाता है।

व्यक्ति मानव के सबसे अच्छे संस्कारों से ओतप्रोत हो कर सम्यक जीवन जीना सीखता है। इस अष्टांगिक मार्ग को ही बुद्ध ने मध्यम मार्ग कहा , जिस पर चलना बहुत कठिन नहीं है। कोई भी व्यक्ति इस मार्ग पर चल सकता है और चलकर सुखी जीवन जी सकता है।

बुद्ध ने मध्यम मार्ग का रास्ता दिखा कर मानव का बहुत बड़ा हित किया। जब सभी लोग और सभी देश अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं और कोई भी किसी से कम नहीं होने की बात कर रहा है- ऐसे में ‘ मध्यम मार्ग ‘ एक बहुत बड़ा समाधान हो सकता है मानव और विश्व की सारी परेशानियों को दूर करने का। बीच का रास्ता अपनाओ और सभी बाधाओं को पार कर जाओ-यही मूल मंत्र है सम्यक जीवन जीकर परम लक्ष्य को प्राप्त करने का। मध्यम मार्ग अपनाने से व्यक्ति के मन को कोई ठेस नहीं पहुंचती। उसका सम्मान रह जाता है और टकराव तथा संताप की स्थिति भी पैदा नहीं होती। इसके विपरीत हमें मैत्री और सद्भाव का लाभ मिलता है।

इसी भाव से तो विश्व में शान्तिपूर्ण मानव समाज के विचार को साकार करने में सफलता मिलेगी। नई पीढ़ी के लिए तो बुद्ध का यह दर्शन सबसे ज्यादा उपयोगी है। उसे मन की स्वतंत्रता देकर भविष्य के लिए उपयोगी बनाया जा सकता है। कुंठाओं में डूबे युवा न तो अपने आप का विकास कर सकते हैं और न देश का। स्वतंत्र मन के माध्यम से ही स्वतंत्र समाज और संपन्न राष्ट्र की बात की जा सकती है।

बंधा हुआ और विचलित मन कभी पर्याप्त परिणाम और परिमाण नहीं दे सकता। इसलिए जरूरी है कि नई पीढ़ी को हम आजादी दें , बंधन मुक्त करें। लेकिन कितनी स्वतंत्रता दें ? क्या पूरी तरह से छोड़ दें ? नहीं , मध्य मार्ग पर रहें- वीणा के तार को थोड़ा कसें , थोड़ा ढील दें। लेकिन आजाद हो कर युवा पीढ़ी भी क्या करे ? इस स्वतंत्रता के उपभोग में भी मध्यम मार्ग का अनुसरण उपयोगी है। क्योंकि मध्यम मार्ग जहां हमारे मन के मान की रक्षा करता है , वहीं अनेकानेक कुविचारों से भी बचाता है। अच्छे कर्मों का संचय और बुरे कार्यों का त्याग-मध्यम मार्ग के माध्यम से ही सम्भव है।

इसके लिए ‘ मिलाजुला कर ‘ कह सकते हैं कि ‘ मध्यम मार्ग ही मानव की मुक्ति का मार्ग है! ‘ वही मानव को जीवन सागर पार कराने वाला यान भी है , चाहे आप संसारी की तरह जीवन का सुख पाना चाहें या निर्वाण ही प्राप्त करना चाहें।

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https://hindi.speakingtree.in/article/content-246850

 

 

आज शिक्षक दिवस पर आओ जाने पहली शिक्षिका माता सावित्री बाई फुले को जिन्होंने भारत के हजारों साल के इतिहास में पहली बार महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार खोले…सिद्धार्थ

आधुनिक भारतीय पुनर्जागरण के दो केंद्र रहे हैं- बंगाल और महाराष्ट्र. बंगाली पुनर्जागरण मूलत: हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं के भीतर सुधार चाहता था और इसके अगुवा उच्च जातियों और उच्च वर्गों के लोग थे. इसके विपरीत महाराष्ट्र के पुनर्जागरण ने हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं को चुनौती दी. वर्ण-जाति व्यवस्था को तोड़ने और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व के खात्मे के लिए संघर्ष किया. महाराष्ट्र के पुनर्जागरण की अगुवाई शूद्र और महिलाएं कर रही थीं. इस पुनर्जागरण के दो स्तंभ थे- सावित्री बाई फुले और उनके पति जोतिराव फुले.

हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपरा में शूद्रों और महिलाओं को एक समान माना गया है. ग्रंथों में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि – स्त्री और शूद्र एक समान होते हैं. हिंदू धर्मशास्त्र ये भी कहते हैं कि – स्त्री और शूद्र अध्ययन न करें. ये स्थापित मान्यताएं थीं और सभी वर्णों के लोग इनका पालन करते आए थे.

हिंदू धर्म, समाज व्यवस्था और परंपरा में शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए तय स्थान को आधुनिक भारत में पहली बार जिस महिला ने संगठित रूप से चुनौती दी, उनका नाम सावित्री बाई फुले है. वे आजीवन शूद्रों-अति शूद्रों की मुक्ति और महिलाओं की मुक्ति के लिए संघर्ष करती रहीं.

ईसाई मिशनरियों से मिली पढ़ने की सीख

उनका जन्म नायगांव नाम के गांव में 3 जनवरी 1831 को हुआ था. यह महाराष्ट्र के सतारा जिले में है, जो पुणे के नजदीक है. वे खंडोजी नेवसे पाटिल की बड़ी बेटी थीं, जो वर्णव्यस्था के अनुसार शूद्र जाति के थे. वे जन्म से शूद्र और स्त्री दोनों एक साथ थीं, जिसके चलते उन्हें दोनों के दंड जन्मजात मिले थे.

ऐसे समय में जब शूद्र जाति के किसी लड़के के लिए भी शिक्षा लेने की मनाही थी, उस समय शूद्र जाति में पैदा किसी लड़की के लिए शिक्षा पाने का कोई सवाल ही नहीं उठता. वे घर के काम करती थीं और पिता के साथ खेती के काम में सहयोग करती थीं. पहली किताब उन्होंने तब देखी, जब वे गांव के अन्य लोगों के साथ बाजार शिरवाल गईं. उन्होंने देखा कि कुछ विदेशी महिला और पुरुष एक पेड़ के नीचे ईसा मसीह की प्रार्थना करते हुए गाना गा रहे थे. वे जिज्ञासावश वहां रुक गईं, उन महिला-पुरुषों में किसी ने उनके हाथ में एक पुस्तिका थमायी. सावित्रा बाई पुस्तिका लेने में हिचक रही थीं. देने वाले ने कहा कि यदि तुम्हे पढ़ना नहीं आता, तब भी इस पुस्तिका को ले जाओ. इसमें छपे चित्रों को देखो, तुम्हें मजा आयेगा. वह पुस्तिका सावित्री बाई अपने साथ लेकर आईं.

जब 9 वर्ष की उम्र में उनकी शादी 13 वर्षीय जोतिराव फुले के साथ हुई और वे अपने घर से जोतिराव फुले के घर आईं, तब वह पुस्तिका भी वे अपने साथ लेकर आई थीं.

फातिमा शेख और सावित्री बाई बनी शिक्षिका: 1 जनवरी को खोला स्कूल

जोतिराव फुले सावित्री बाई फुले के जीवनसाथी होने के साथ ही उनके शिक्षक भी बने. जोतिराव फुले और सगुणा बाई की देख-रेख में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करन के बाद सावित्री बाई फुले ने औपचारिक शिक्षा अहमदनगर में ग्रहण की. उसके बाद उन्होंने पुणे के अध्यापक प्रशिक्षण संस्थान से प्रशिक्षण लिया. इस प्रशिक्षण स्कूल में उनके साथ फातिमा शेख ने भी अध्यापन का प्रशिक्षण लिया. यहीं उनकी गहरी मित्रता कायम हुई. फातिमा शेख उस्मान शेख की बहन थीं, जो जोतिराव फुले के घनिष्ठ मित्र और सहयोगी थे. बाद में इन दोनों ने एक साथ ही अध्यापन का कार्य भी किया.

फुले दंपत्ति ने 1 जनवरी 1848 को लड़कियों के लिए पहला स्कूल पुणे में खोला. जब 15 मई 1848 को पुणे के भीड़वाडा में जोतिराव फुले ने स्कूल खोला, तो वहां सावित्री बाई फुले मुख्य अध्यापिका बनीं. इन स्कूलों के दरवाजे सभी जातियों के लिए खुले थे. जोतिराव फुले और सावित्री बाई फुले द्वारा लड़कियों की शिक्षा के लिए खोले जा रहे स्कूलों की संख्या बढ़ती जा रही थी. इनकी संख्या चार वर्षों में 18 तक पहुंच गई.

फुले दंपत्ति के ये कदम सीधे ब्राह्मणवाद को चुनौती थे. इससे उनके एकाधिकार को चुनौती मिल रही थी, जो समाज पर उनके वर्चस्व को तोड़ रहा था. पुरोहितों ने जोतिराव फुले के पिता गोविंदराव पर कड़ा दबाव बनाया. गोविंदराव पुरोहितों और समाज के सामने कमजोर पड़ गए. उन्होंने जोतिराव फुले से कहा कि या तो अपनी पत्नी के साथ स्कूल में पढ़ाना छोड़ें या घर. एक इतिहास निर्माता नायक की तरह दुखी और भारी दिल से जोतिराव फुले और सावित्री बाई फुले ने शूद्रों-अति शूद्रों और महिलाओं की मुक्ति के लिए घर छोड़ने का निर्णय लिया.

जब सावित्री बाई पर फेंका गया गोबर और पत्थर

परिवार से निकाले जाने बाद ब्राह्मणवादी शक्तियों ने सावित्री बाई फुले का पीछा नहीं छोड़ा. जब सावित्री बाई फुले स्कूल में पढ़ाने जातीं, तो उनके ऊपर गांव वाले पत्थर और गोबर फेंकते. सावित्री बाई रुक जातीं और उनसे विनम्रतापूर्वक कहतीं, ‘मेरे भाई, मैं तुम्हारी बहनों को पढ़ाकर एक अच्छा कार्य कर रही हूं. आप के द्वारा फेंके जाने वाले पत्थर और गोबर मुझे रोक नहीं सकते, बल्कि इससे मुझे प्रेरणा मिलती है. ऐसे लगता है जैसे आप फूल बरसा रहे हों. मैं दृढ़ निश्चय के साथ अपनी बहनों की सेवा करती रहूंगी. मैं प्रार्थना करूंगी की भगवान आप को बरकत दें.’ गोबर से सावित्री बाई फुले की साड़ी गंदी हो जाती थी, इस स्थिति से निपटने के लिए वह अपने पास एक साड़ी और रखती थीं. स्कूल में जाकर साड़ी बदल लेती थीं.

शिक्षा के साथ ही फुले दंपत्ति ने समाज की अन्य समस्याओं की ओर ध्यान देना शुरू किया. सबसे बदतर हालत विधवाओं की थी. ये ज्यादातर उच्च जातियों की थीं. इसमें अधिकांश ब्राह्मण परिवारों की. अक्सर गर्भवती होने पर ये विधवाएं या तो आत्महत्या कर लेतीं या जिस बच्चे को जन्म देती, उसे फेंक देतीं. 1863 में फुले दंपत्ति ने बाल हत्या प्रतिबंधक गृह शुरू किया. कोई भी विधवा आकर यहां अपने बच्चे को जन्म दे सकती थी. उसका नाम गुप्त रखा जाता था.

इस बाल हत्या प्रतिबंधक गृह का पोस्टर जगह-जगह लगाया गया. इन पोस्टरों पर लिखा था कि ‘विधवाओं! यहां अनाम रहकर बिना किसी बाधा के अपना बच्चा पैदा कीजिए. अपना बच्चा साथ ले जाएं या यहीं रखें, यह आपकी मर्जी पर निर्भर रहेगा.’ सावित्री बाई फुले बालहत्या प्रतिबंधक गृह में आने वाली महिलाओं और पैदा होने वाले बच्चों की देखरेख खुद करती थीं. इसी तरह की एक ब्राह्मणी विधवा काशीबाई के बच्चे को फुले दंपत्ति ने अपने बच्चे की तरह पाला. जिनका नाम यशवंत था.

सत्यशोधक समाज का नेतृत्व

सामाजिक परिवर्तन के लिए जोतिराव फुले ने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी. उनकी मृत्यु के बाद सत्यशोधक समाज की बागडोर सावित्री बाई फुले के हाथों में सौंपी गई. 1891 से लेकर 1897 उन्होंने इसका नेतृत्व किया. सत्यशोधक विवाह पद्धति को भी अमलीजामा पहनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.

सावित्री बाई फुले आधुनिक मराठी की महत्वपूर्ण कवयित्री भी थीं. उनका पहला काव्य संकलन 1854 में काव्य फुले के रूप में प्रकाशित हुआ, जब उनकी उम्र 23 वर्ष थी. 1892 में उनकी कविताओं के दूसरा संग्रह ‘बावन काशी सुबोध रतनाकर’ प्रकाशित हुआ. यह बावन कविताओं का संग्रह है. इसे उन्होंने जोतिराव फुले की याद में लिखा है और उन्हीं को समर्पित किया है. सावित्री बाई फुले के भाषण भी 1892 में प्रकाशित हुए. इसके अतिरिक्त उनके द्वारा लिखे पत्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. ये पत्र उस समय की परिस्थितियों, लोगों की मानसिकता, फुले के प्रति सावित्री बाई की सोच और उनके विचारों को सामने लाते हैं.

1896 में एक एक बार फिर पुणे और आस-पास के क्षेत्रों में अकाल पड़ा. सावित्री बाई फुले ने दिन-रात अकाल पीड़ितों को मदद पहुंचाने लिए एक कर दिया. उन्होंने सरकार पर दबाव डाला कि अकाल पीड़ितों को बड़े पैमाने पर राहत सामग्री पहुंचाए. शूद्रों-अति शूद्रों और महिलाओं की शिक्षिका और पथप्रदर्शक मां सावित्री बाई का जीवन अनवरत अन्याय के खिलाफ संघर्ष करते और न्याय की स्थापना के लिए बीता. उनकी मृत्यु भी समाज सेवा करते ही हुई.

1897 में प्लेग की वजह से पुणे में महामारी फैल गई. वे लोगों की चिकित्सा और सेवा में जुट गईं. स्वंय भी इस बीमारी का शिकार हो गईं. 10 मार्च 1897 को उनकी मृत्यु हुई. उनकी मृत्यु के बाद भी उनके कार्य और विचार मशाल की तरह देश को रास्ता दिखा रहे हैं.

(लेखक हिंदी साहित्य में पीएचडी हैं और फ़ॉरवर्ड प्रेस हिंदी के संपादक हैं.)

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पहली बार महिलाओं के लिए शिक्षा का द्वार खोलने वाली सावित्री बाई फुले

आरक्षण विरोधियों के दिमाग में क्या चल रहा होता है? उनका तर्कशास्त्र क्या है? वे जो कर रहे होते हैं, वो क्यों करते हैं? आरक्षण के खिलाफ झाड़ू लगाने या जूते साफ करने के पीछे उनका क्या चिंतन है?इन सवालों का जवाब जानने के लिए पढ़िए…Dilip C Mandal

 

https://hindi.news18.com/news/rajasthan/jaipur-in-ujjain-priests-demanded-dakshina-from-rss-chief-mohan-bhagwat-to-abolish-reservation-from-the-country-hydrnr-2387110.html?fbclid=IwAR1XJdWffTB2AguDExBCgklQd2qLMSUGbjt0npIBzleIwmR2XKvc7EvZ9-o

 

आरक्षण के खिलाफ झाड़ू लगाने और जूता पॉलिश करने का मतलब

बोधिसत्व गुरु रविदास मंदिर तुगलकाबाद दिल्ली मामला 23 अगस्त 2019:- मंदिर पुनस्तापना के धरना प्रदर्शन के बाद भीम आर्मी प्रमुख मान्यवर चंद्रशेखर आज़ाद समेद 98 लोगों को गिरफ्तार किया गया, मायावती ने खुद को इस मामले से अलग बताया , दिल्ली में आम आदमी की सरकार ने समर्थन के बात की … TOI, The Wire

 

 

https://www.news18.com/news/india/day-after-violent-protest-in-delhi-mayawati-distances-herself-from-ravidas-temple-agitation-2279877.html

 

 

 

बोधिसत्व गुरु रविदास मंदिर तुगलकाबाद दिल्ली मामला 22 अगस्त 2019 को लाखों बहुजनों ने भीम आर्मी के मान्यवर चंद्रशेखर की अगुवाई में धरना प्रदर्शन निकला,आइये सुनते हैं क्या बोलना चाहते हैं बहुजन लोग … source: TOI,BBC,youtube

मंदिर के पुनर निर्माण की मांग की गयी

 

दिल्ली के तुगलकाबाद में 510 वर्ष पुराना गुरु रविदास जी का मंदिर तोड़ दिया गया है सरे देश में जबरदस्त प्रदर्शन है खासकर हरयाणा पंजाब और दिल्ली में । विदित हो की 1 मार्च 1509 दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान सिंकदर लोधी ने ये जमीन का एक टुकड़ा रविदास को दान किया था…Source Times of INDIA

जानें रविदास मंदिर का इतिहास 

1 मार्च 1509 
दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान सिंकदर लोधी ने जमीन का एक टुकड़ा रविदास को दान किया।

1509 
रविदास के समर्थकों द्वारा जमीन पर एक तालाब और एक आश्रम बनाया गया।

1949-1954
रविदास के समर्थकों ने गुरु रविदास जयंती समारोह समिति के अंतर्गत वहां एक मंदिर का निर्माण किया।

1959 
तत्कालीन रेलवे मंत्री बाबू जगजीवन राम ने इस मंदिर का उद्घाटन किया।

9 अगस्त 2019 
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुरु रविदास जयंती समारोह समिति ने शीर्ष अदालत के आदेश के बावजूद जंगली इलाके को खाली नहीं करके गंभीर उल्लंघन किया है। गुरु रविदास जयंती समारोह समिति बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के बीच सुप्रीम कोर्ट में केस में सर्वोच्च अदालत ने डीडीए से 10 अगस्त तक वहां से निर्माण को हटाने का आदेश दिया था।

10 अगस्त 2019
डीडीए ने निर्माण को हटाया।

12 अगस्त 2019
आप के सीनियर लीडर और दिल्ली के समाज कल्याण मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि देश में करोड़ों लोग संत रविदास पर आस्था रखते हैं और लोगों की आस्था का ध्यान रखते हुए यहां मंदिर को पुन: स्थापित कराया जाना चाहिए।

 

महामानव तथागत गौतम बुद्ध का सारनाथ मे प्रथम धम्मोपदेश जो उन्होंने अपने उन पांच साथियो को दिया जो तपस्या करते समय निरज्जना नदी के तट पर उनके साथ थे पर काय-कलेश का पथ त्याग देने पर क्रोधित होकर उन्हे छोड्कर चले गए थे.

ज्ञान प्राप्ति के बाद गौतम बुद्ध ने  सारनाथ मे , अपने उन पांच साथियो को उपदेश देने का निर्णय किया,  जो तपस्या करते समय निरज्जना नदी के तट पर उनके साथ थे, और जो सिद्धार्थ गौतम द्वारा तपस्या और काय-कलेश का पथ त्याग देने पर क्रोधित होकर उन्हे छोड्कर चले गए थे..
  • कुशल क्षेम को बाते करने के बाद बुद्ध से परिव्राजकों ने प्रश्न किया कि क्या अब भी तपश्चर्या तथा कार्य-क्लेश में उनका विश्वास था।  बुद्ध का उत्तर नकारात्मक था।
  • बुद्ध ने कहा, दो सिरे की बाते थी, एक काम भोग का जीवन और दूसरा कार्य-क्लेश का जीवन।
  • एक का कहना है, खाओ पीयो मौज उड़ाओ क्योंकि कल तो मर ही जाना है। दूसरे का कहना है , सभी वासनाओं ( इच्छाओं ) का मूलोच्छेद कर दो क्योंकि वे पुनर्जन्म का कारण हैं। उन्होंने दोनों को मनुष्य के योग्य नहीं माना।
  • वे मध्यम – मार्ग ( मज्झिम पटिपदा ) को मानने वाले थे, जो कि न तो काम-भोग का मार्ग है और न कार्य- क्लेश का मार्ग है ।
  • बुद्ध ने परिव्राजकों से कहा,” मेरे इस प्रश्न का उत्तर दो कि जब तक तुम्हारे मन में सांसारिक अथवा अलौकिक भोगों की कामना बनी रहेगी , क्या तुम्हारा समस्त कार्य – क्लेश व्यर्थ नहीं होगा ? उन्होंने उत्तर दिया, “जैसा आप कहते हैं वैसा ही है ।”
  • “काय – क्लेश का शोक – संतप्त जीवन गुजारने से आप काम- तृष्णा की अग्नि से कैसे मुक्त हो सकते हैं ?” उन्होंने उत्तर दिया , “जैसा आप कहते हैं वैसा ही है।”
  • “जब आप अपने आप पर विजय पा लेंगे तभी आप कामतृष्णा की अग्नि से मुक्त होंगे, तब आप में सांसारिक काम -भोग की कामना न रहेगी और तब आपकी स्वाभाविक इच्छाएं आपको दूषित नहीं करेंगी। आपको अपनी शारीरिक आवश्यकताओं के अनुसार ही खाना – पीना ग्रहण करना चाहिए। “
  • “सभी तरह की विषयासक्ति कमजोर बनाती है । विषयों में आसक्त प्राणी वासनाओं का गुलाम होता है । सभी काम – भोगों की इच्छा करना अपमानजनक और अभद्र है । लेकिन मैं तुम्हें कहता हूं कि शरीर की स्वाभाविक आवश्यकताओं की पूर्ति करना बुराई नहीं है । शरीर को स्वस्थ बनाए रखना एक कर्तव्य है। अन्यथा आप अपने मनोबल को दृढ़ और स्वच्छ नहीं बनाए रख सकेंगे और पज्जा ( प्रज्ञा ) रूपी प्रदीप भी प्रज्वलित नहीं कर सकेंगे।”
  • “हे परिव्राजको ! ये दो अंत की बातें हैं जिससे प्राणी को सदा बचना चाहिए – एक ओर उन चीजों में संलग्न रहने की आदत से जिनका आकर्षण वासनाओं एवं मुख्यतः विषयासक्ति पर निर्भर करता है – यह संतुष्टि प्राप्त करने का निम्नकोटि का तथा विधर्मी मार्ग है ; अयोग्य है , हानिकारक है तथा दूसरी ओर आदत के अनुसार इसका अभ्यास , तपश्चर्या अथवा काय – क्लेश जो दुखदायी है , अयोग्य है तथा हानिकर है ।
  • “इन दोनों सिरे की बातों से अलग एक मध्यम मार्ग है । यह समझ लो कि यही मार्ग है, जिसकी में देसना देता हूं ।”
  • पांचों परिव्राजकों ने उनकी बात ध्यान से सुनी । यह न जानते हुए कि बुद्ध के मध्यम मार्ग का क्या उत्तर दें , उन्होंने प्रश्न किया , ” जब हम आपको छोड़कर चले आए थे तो उसके बाद आप क्या करते रहे ?” तब बुद्ध ने उन्हें बताया कि किस प्रकार वह बोधगया पहुंचे, कैसे उस पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान लगाकर बैठे और किस प्रकार लगातार चार सप्ताह के ध्यान के बाद उन्हें वह सम्बोधि प्राप्त हुई जिससे वह नए मार्ग का आविष्कार कर सके ।
  • यह सुनकर परिव्राजक उस नए मार्ग के बारे में जानने के लिए अत्यंत अधीर हो उठे । उन्होंने बुद्ध से निवेदन किया कि वे उन्हें विस्तार से बताएं ।
  • बुद्ध ने स्वीकार किया ।
  • बुद्ध ने बात आरंभ करते हुए बताया कि, उनका मार्ग जो सद्धम्म है, उसे आत्मा और परमात्मा से कुछ लेना – देना नहीं है। उनके सद्धम्म को इस बात से कोई सरोकार नहीं कि मरने के बाद जीवन का क्या होता है। उनके सद्धम्म को कर्म – कांड के क्रिया-कलापों से भी कुछ लेना-देना नहीं है। 
  • बुद्ध के धम्म का केंद्र बिंदु मनुष्य है और इस पृथ्वी पर अपने जीवन काल में एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के साथ सम्बंध का होना है ।
  • बुद्ध ने कहा, यह उनका प्रथम आधारतत्त्व ( अभिधारणा ) है ।
  • उनका दूसरा आधारतत्त्व था कि प्राणी दुख, कष्ट और दरिद्रता में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। संसार दुख से भरा है और धम्म का उद्देश्य मात्र यही है कि संसार के इस दुख को कैसे दूर किया जाए। इसके अतिरिक्त सद्धम्म और कुछ नहीं है।
  • दुख के अस्तित्व की स्वीकृति और दुख को दूर करने का मार्ग दिखाना ही उनके धम्म का आधार है ।
  • धम्म के लिए एकमात्र यही सही आधार और औचित्य हो सकता है । जो धर्म इस बात को स्वीकार नहीं करता, वह धर्म ही नहीं है ।
  • “ हे परिव्राजको ! वास्तव में जो भी समण ( धम्मोपदेशक ) यह नहीं समझते कि संसार में दुख है और उस दुख को दूर करना ही धम्म की प्रमुख समस्या है, मेरे विचार में उन्हें समण ही नहीं मानना चाहिए । न ही वे समझने वाले हैं और न ही यह जान पाए हैं कि इस जीवन में धम्म का सही अर्थ क्या है ।”
  • तब परिव्राजकों ने पूछा, “यदि आपके धम्म का आधार दुख का अस्तित्व और उसे दूर करना है, तब हमें बताइए कि आप का धम्म दुख का नाश कैसे करता है।”
  • तब बुद्ध ने उन्हें समझाया कि उनके धम्म के अनुसार यदि हर मनुष्य ( i ) पवित्रता के पथ पर चले, ( ii ) धम्म परायणता के पथ पर चले, ( iii ) सील-मार्ग पर चले, तो इससे सभी दुखों का अंत हो जाएगा। 
  • और उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने ऐसे धम्म का आविष्कार कर लिया है।
संदर्भ ः बाबासाहब डो. भीमराव आंबेड्कर लिखित “बुद्ध और उनका धम्म”