खोजो मत–पा लो। मांगो मत–पा लो। न कहीं जाना है, न खोजना है। वह परम धन तुम्हारे भीतर है। वह तुम्हारा स्वरूप है, एरनाल्ड ने बुद्ध पर जो अदभुत किताब लिखी है: लाइट ऑफ एशिया। ….OSHO

खोजो मत पा लो🌸🌷🍀🍁🍂🍃🌹🌺🌻🌼🌽🌾🌿
एरनाल्ड ने बुद्ध पर जो अदभुत किताब लिखी है: लाइट ऑफ एशिया। उसमें जो वर्णन है, रात्रि में बुद्ध का घर छोड़ने का, बहुत प्यारा है। देर तक पीना-पिलाना चलता रहा। देर तक नाच-गान चलता रहा। देर तक संगीत चला। फिर बुद्ध सो गए। लेकिन आधी रात अचानक नींद खुल गई। जो नर्तकियां नाचती रही थीं, वे भी थक कर अपने वाद्यों को वहीं पड़ा छोड़ कर फर्श पर ही सो गई हैं। पूरी चांद की रात है। खिड़कियों, द्वार-दरवाजों से चांद भीतर आ गया है।


बुद्ध चांद की रोशनी में ठीक से उन स्त्रियों को देख रहे हैं, जिनको वे बहुत सुंदर मानते रहे हैं। किसी के मुंह से लार टपक रही है, क्योंकि नींद लगी है। किसी की आंख में कीचड़ भरा है। किसी का चेहरा कुरूप हो गया है। कोई नींद में बड़बड़ा रही है। जिसके सुमधुर स्वर सुने थे सांझ, वह इस तरह बड़बड़ा रही है जैसे पागल हो! बुद्ध ने उन सारी सुंदर स्त्रियों की यह कुरूपता देखी और एक बोध हुआ कि जो मैं सोचता हूं, वह मेरी कल्पना है। यथार्थ यह है। आज नहीं कल देह मिट्टी हो जाएगी। आज नहीं कल देह चिता पर चढ़ेगी। इस देह के पीछे मैं कब तक दौड़ता रहूंगा? इन देहों में मैं कब तक उलझा रहूंगा?


यह आघात इतना गहरा था कि वे उसी रात घर छोड़ दिए। उनतीस वर्ष की उम्र कोई उम्र होती है! अभी युवा थे। मगर जीवन का यथार्थ दिखाई पड़ गया। जीवन बड़ा थोथा है। जीवन बिलकुल अस्थिपंजर है। हड्डी-मांस-मज्जा ऊपर से है, भीतर अस्थिपंजर है।
भाग निकले, जितने दूर जा सकते थे। जो सारथी उन्हें ले गया है छोड़ने स्वर्णरथ पर बिठा कर, वह बूढ़ा सारथी उन्हें समझाता है कि आप यह क्या कर रहे हैं? कहां जा रहे हैं? महल की याद करें! इतना सुंदर महल और कहां मिलेगा? यशोधरा की स्मृति करें! इतनी सुंदर स्त्री और कहां मिलेगी? इतना प्यारा राज्य, इतनी सुख-सुविधा, इतना वैभव-विलास–इस सब स्वर्ग को छोड़ कर कहां जाते हो? 


बुद्ध ने लौट कर पीछे की तरफ देखा। पूर्णिमा की रात में उनका संगमरमर का महल स्वप्न जैसा जगमगा रहा है। उस पर जले हुए दीये, जैसे आकाश में तारे टिमटिमाते हों। लेकिन उन्होंने सारथी को कहा, जाना होगा। मुझे जाना ही होगा। क्योंकि तुम जिसे कहते हो महल, मैं वहां सिवाय लपटों के और कुछ भी नहीं देखता हूं। मैं वहां चिंताएं जलती देख रहा हूं। आज नहीं कल, देर नहीं होगी, जल्दी ही सब राख हो जाएगा। 


इसके पहले कि सब राख हो जाए, इसके पहले कि मेरी देह गिरे, मुझे जान लेना है उसको, जो शाश्वत है। यदि कुछ शाश्वत है, तो उससे पहचान कर लेनी है। मुझे सत्य से परिचय कर लेना है; सत्य का साक्षात्कार कर लेना है।
धर्मेंद्र, तुम कहते हो: जो भी मैंने चाहा, उसे पा न सका।


कौन पा सका है? कुछ पा सके, उन्होंने पाकर पाया कि व्यर्थ। कुछ नहीं पा सके, वे भरमते रहे, भटकते रहे। अच्छा ही है कि तुम्हें यह बात समझ में आ गई कि चाह में ही कुछ बुनियादी भूल है; कि चाहो, और पाना मुश्किल हो जाता है! और यह डर सार्थक है कि कहीं परमात्मा को चाहने लगूं, और ऐसा तो न होगा कि उसे भी न पा सकूं!
तुम चौंकोगे। तुमने अगर किसी और से पूछा होता, किन्हीं और तथाकथित संत-महात्माओं से पूछा होता, तो तुम्हें यह उत्तर न मिलता जो उत्तर तुम मुझसे पाओगे। तुम्हारे संत-महात्मा तो कहते, चाहो–परमात्मा को चाहो–जी भर कर चाहो; एकाग्र-चित्त होकर चाहो; जरूर पाओगे।
लेकिन मैं तुमसे कहता हूं, अगर परमात्मा को भी चाहा, तो बस, चूकोगे। चाह चुकाती है। चाह को छोड़ो। चाह को जाने दो। परमात्मा को पाने की विधि है: चाह से मुक्त हो जाना।


थोड़ी देर को, चौबीस घंटे में कम से कम इतना समय निकाल लो, जब कुछ भी न चाहो। उसी को मैं ध्यान कहता हूं। घंटे भर को, दो घंटे को, दिन में या रात, सुबह या सांझ, कभी वक्त निकाल लो। बंद करके द्वार-दरवाजे शांत बैठ जाओ। कुछ भी न चाहो। न कोई मांग, न कोई चाह। शून्यवत! जैसे हो ही नहीं। जैसे मर गए। जैसे मृत्यु घट गई।
ध्यान मृत्यु है–स्वेच्छा से बुलाई गई मृत्यु। ठीक है, श्वास चलती रहेगी, सो देखते रहना। और छाती धड़कती रहेगी, सो सुनते रहना। मगर और कुछ भी नहीं। श्वास चलती है, छाती धड़कती है, और तुम चुपचाप बैठे हो।
शुरू-शुरू में कठिन होगा। जन्मों-जन्मों से विचारों का तांता लगा रहा है, वह एकदम से बंद नहीं हो जाएगा। उसकी कतार बंधी है। क्यू बांधे खड़े हैं विचार। सच तो यह है, ऐसा मौका देख कर कि तुम अकेले बैठे हो, कोई भी नहीं, टूट पड़ेंगे तुम पर सारे विचार। ऐसा शुभ अवसर मुश्किल से ही मिलता है। तुम उलझे रहते हो–काम है, धाम है, हजार दुनिया के व्यवसाय हैं–विचार खड़े रहते हैं मौके की तलाश में कि कब मौका मिले, कब तुम पर झपटें!


लेकिन जब तुम शांत बैठोगे, ध्यान में बैठोगे, तो मिल जाएगा अवसर विचारों को। सारे विचार टूट पड़ेंगे, जैसे दुश्मनों ने हमला बोल दिया हो। कुरुक्षेत्र शुरू हो जाएगा। तरहत्तरह के विचार, संगत-असंगत विचार, मूढ़तापूर्ण विचार, सब एकदम तुम पर दौड़ पड़ेंगे। चारों तरफ से हमला हो जाएगा। उसको भी देखते रहना। लड़ना मत, झगड़ना मत, विचारों को हटाने की चेष्टा मत करना। बैठे रहना चुपचाप। जैसे अपना कुछ लेना-देना नहीं–निष्पक्ष, निरपेक्ष, असंग। जैसे राह के किनारे कोई राहगीर थक कर बैठ गया हो वृक्ष की छाया में, और रास्ते पर चलते लोगों को देखता हो। कभी कार गुजरती, कभी बस गुजरती, कभी ट्रक गुजरता, कभी लोग गुजरते, उसे क्या लेना-देना! कोई इस तरफ जा रहा, कोई उस तरफ जा रहा। जिसको जहां जाना है, जा रहा है। जिसको जो करना है, कर रहा है। राह के किनारे सुस्ताते हुए राहगीर को क्या प्रयोजन है! पापी जाए कि पुण्यात्मा; सफेद कपड़े पहने कोई जाए कि काले कपड़े पहने; स्त्री जाए कि पुरुष; जाने दो जो जा रहा है। रास्ता चलता ही रहता है। चलते रास्ते से राहगीर जो थक कर बैठ गया है, उसे क्या लेना है!


ऐसे ही तुम अपने चित्त के चलते हुए रास्ते के किनारे बैठ जाना, देखते रहना। कोई निर्णय नहीं। कोई पक्ष-विपक्ष नहीं। कोई चुनाव न करना। इस विचार को पकड़ लूं, उसको छोड़ दूं; यह आ जाए, यह मेरा हो जाए; यह न आए, यह कभी न आए–ऐसी कोई भावनाएं न उठने देना। और धीरे-धीरे, आहिस्ता-आहिस्ता एक दिन ऐसी घड़ी आएगी, जब रास्ता सूना होने लगेगा। कभी-कभी कोई भी न होगा रास्ते पर। सन्नाटा होगा। अंतराल आ जाएंगे। उन्हीं अंतरालों में पहली बार तुम्हें परमात्मा की झलक मिलेगी। क्योंकि न कोई चाह है, न कोई कल्पना, न कोई विचार।
परमात्मा की झलक मिलेगी–कहीं बाहर से नहीं; तुम्हारे भीतर ही बैठा है। विचारों की धुंध हट जाती है, तो दिखाई पड़ने लगता है।
जो तुमने प्रेम के अनुभव से जाना है, उस अनुभव को उपयोग कर लेना। जो तुमने अब तक संसार की प्रीति में सीखा है, उस पाठ को भूल मत जाना। चाहत करके तुमने जो देखा है, कि सदा हारे, वह एक बड़ी संपदा है। उस पाठ का अगर उपयोग कर लिया, तो परमात्मा के संबंध में असफल न होना पड़ेगा।
चाहो न–और परमात्मा पाया जा सकता है। लाओत्सू का प्रसिद्ध वचन है: खोजो मत–पा लो। मांगो मत–पा लो। न कहीं जाना है, न खोजना है। वह परम धन तुम्हारे भीतर है। वह तुम्हारा स्वरूप है
🍁 मृत्युार्मा अमृत गमय–प्रवचन-07🍁

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गरीब, वंचितों और महिलाओं को आस्था के नाम पर अमानवीय शोषण से रोकने लिए,अंधविश्वास पर रोक के लिए जरूरत है केंद्रीय कानून की- प्रत्युष प्रशांत

अंधविश्वास पर रोक के लिए जरूरत है केंद्रीय कानून की- प्रत्युष प्रशांत

गरीब, वंचितों और महिलाओं को आस्था के नाम पर अमानवीय शोषण से रोकने लिए जरूरी है कि महाराष्ट्र और कर्नाटक के बाद पूरे देश में अंधश्रद्धा के विरोध में एक केंद्रीय कानून बने, जो जातिगत और जेडर आधारित भेदभाव को खत्म करने में नई शुरुआत हो।

21वीं सदी के दूसरी दहाई में आधुनिकता के तरफ आगे बढ़ते हुए समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी बिल्ली के रास्ता काटने, दूध के उबल कर गिरने या छींक आने से कुछ सेकंड के लिए स्थिर हो जाता है। शुभ-अशुभ की धारणा हर समाज में बनी हुई है जिसके वजह से घर के बाहर हरी मिर्ची-नींबू या नजरबट्ट या लोहे का नाल लगाना आम चलन है। भीड़ का हर तीसरा व्यक्ति चाहे वो पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़ इन आस्थाओं के गिरफ्त में है। सामाजिक जीवन में इन मान्यताओं के प्रभाव को शिक्षित या अशिक्षित समाज में विभाजित नहीं किया जा सकता है क्योंकि सामाजिक परिवेश में यह समान रूप से हर मानव समुदाय पर हावी होती है, इससे मुक्त होने की तमाम कोशिश के बाद भी हम इससे मुक्त नहीं हो पाते है।

सामाजिक जीवन में शुभ-अशुभ व्यवहारों/आचारों से जुड़े हुए तर्को की कई व्याख्याएं है जो आधारहीन अधिक हैवैज्ञानिक कम। अपनी आधारहीन व्याख्याओं के बाद भी यह समाज में समान्य रूप से स्वीकार्य है। आस्थाओं के दुहाई के आड़ में समाज की प्रतिगामी ताकतों ने मानवीय गरिमाओं को कई बार तार-तार किया है और करती रहती है, विशेषकर महिलाओं को। शुभ-अशुभ की इन मान्यताओं का खमियाजा भारतीय समाज में महिलाओं सबसे अधिक भुगतना पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने कुछ सालों पहले एक रिपोर्ट पेश की थीजिसमें भारत में 1987 से2003 तक हजार 556 महिलाओं को डायन या चुड़ैल कह कर मार देने की बात कही गई थी। इस तरह हत्या करने के मामले झारखंड में सबसे आगे है। दूसरे पर ओड़िशा और तीसरे नंबर पर तमिलनाडु है। एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2011 में 240, 2012 में 119, 2013 में 160 हत्याएं अंधविश्वास के नाम पर की गर्इं। अकेले 2001 से2016 तक पांच सौ महिलाओं की हत्या अंधविश्वास से प्रेरित होकर की गई।

मौजूदा समय में इन मान्यताओं के संदर्भ में यह समझना अधिक जरूरी है कि सामाजिक जीवन में शुभ-अशुभ से जुड़ी धारणाओं में धर्म से अधिक भेदभावपूर्ण व्यवहार का प्रभाव सबसे अधिक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन सामाजिक-सांस्कृतिक कुरितियों के साथ जाति और धर्म मूल की राजनीति का इतिहास बहुत पुराना रहा है। औपनिवेशिक देशकाल में भी तमाम प्रगतिगामी संगठन इन अंधविश्वास के विरुद्ध बन रहे कानूनों को विशेष धर्म विरोधी कह दिया जाता है, जबकि कानून का फोकस सभी धर्मो की अनैतिक प्रथाओं/आचारों पर होता है। अंधविश्वासी प्रथाओं/आचारों का विरोध धर्मविरोधी चरित्र के कारण नहीं भेदभाव भरे व्यवहार के कारण होता है।

इसलिए यह समझने की जरूरत है कि इन प्रथाओं/आचारों के विरुद्ध संघर्ष की लड़ाई को कानून के साथ-साथ लोगों की मानसिकता में बदलाव से ही जीता जा सकता है। लोगों के मानसिकता में बदलाव की नियती ही इन प्रथाओं/आचारों के विरुद्ध खड़ी होकर कानून का इस्तेमाल ढ़ाल के रूप में कर सकेगी। जाहिर है कि कानून के साथ-साथ लोगों की मानसिकता में बदलाव के लिए मूलभूत कदम उठाने भी जरूरी हैं।

भारत के संविधान की धारा 51 ए मानवीयता एवं वैज्ञानिक चितंन को बढ़ावा देने में सरकार के प्रतिबद्ध रहने की बात करती हैजो अनुच्छेद राज्य सोच को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी डालता है। मसलन, बच्चों को काटें पर फेंकना या महिला को नग्न करने घुमाना धारा 307 और 354 बी के तहत अपराध है, जो अधिक प्रभावी रूप से सक्रिय नहीं है। प्रत्येक राज्य अपने कानून और व्यवस्था को बनाने के आईपीसी में संसोधन करने के लिए स्वतंत्र है ताकि वह विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा कर सके। इन्हीं प्रयास में कर्नाटक सरकार ने पिछले दिनों ऐतिहासिक अंधविश्वास विरोध बिल प्रीवेंशन एंड इरेडिकेशन आफ इनहयूमन इविल प्रैकिट्सेस एंड ब्लैक मैजिक एक्ट 2017 (अमानवीय प्रथाओं और काला जादू पर रोक एवं उनकी समाप्ति के लिए विधेयक) को पास किया है।

प्रस्तावित कानून में किसी को सिद्धभुक्टी, माता, ओखली, मानव बली जैसी परंपरा जिसमें जान जाने का डर हो को प्रतिबंधित किया है, अंधविश्वासी बातों को फैलना, करतब से इंसानी चमत्कार दिखाना, आग पर चलने के लिए मजबूर करना, किसी के मुंह से लोहे के सलाखे निकालना, काला जादू के नाम पर पत्थर फेंकना, सांप या बिच्छु काटने से घायल व्यक्ति को चिकित्सकीय सहायता न देकर उसके लिए जादुई इलाज का इंतजाम करना, धार्मिक रस्म के नाम पर किसी को निर्वस्त्र करना, भूत के विचार को बढ़ावा देना, चमत्कार करने का दावा करना, अपने आप को घायल करने के विचार को बढ़ावा देना आदि प्रयासों को इस बिल के तहत अपराध के श्रेणी में रखा गया है। अंधविश्वास के लिए महिलाओं और बच्चों के उपयोग को कड़े अपराध की श्रेणी में रखा गया है।

इसके पूर्व महाराष्ट्र सरकार ने भी इस तरह के प्रयास किये है, पर जरूरी है कि इस दिशा में पूरे देश में एक केंद्रीय कानून बने। महाराष्ट्र और कर्नाटक सरकार का अंधविश्वास विरोधी बिल जाति और जेंडर आधारित अपमानजन व्यवहारों/आचारों पर सवाल उठाता है हालांकि इसतरह के बिल के मानवीय प्रावधान समस्या के निवारण को सुलझाने में इसके मूल कारण से भटक जाते है। कानून में सजा के प्रावधान समस्या से फौरी राहत के तरह ही है समस्या के मूल पर कोई चोट नहीं हो पाती है। फिर भी कई तरह के परंपरागत व्यवहारों/आचारों पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कानून जरूरी है ताकि आस्था की नाम लोगों को बेवकूफ बनने से बचाया जा सके और समाज कोवैज्ञानिक दिशा की तरफ प्रेरित किया जा सके।

महाराष्ट्र और कर्नाटक सरकार का मौजूदा बिल इस दिशा में मील का पत्थर माना जा सकता है हालांकि इस बिल में कई तरह की उलझने है जिस दूर किया जाना जरूरी है। अपने अंदर की तमाम विसंगतियों के बावजूद इस तथ्य रेखांकित करना जरूरी है कि मौजूदा बिल भी सही दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है। मौजूदा बिल की प्रासंगिकता को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय स्तर ऐस माहौल बनाए जाने की जरूरत है जिससे जाति और जेंडर आधारित भेदभाव को कम या खत्म किया जा सके।

https://womenwomenia.blogspot.in/2017/12/blog-post_5.html?m=1

बाबासाहेब डा0 भीमराव अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस (6 दिसम्बर) पर विशेष उनके व्यक्तित्व और जीवन पर संक्षिप्त झलकियां… जय सिंह

ambedkar-logoयुगदृष्टा बाबासाहेब डा0 अम्बेडकर भारत की धरती पर तथागत बुद्ध के बाद दूसरे ऐसे महापुरूष हुए हैं जिन्होने भारत की धरती से लुप्त करूणा, मैत्री और बंधुत्व को फिर से स्थापित किया। मध्यप्रदेश के इन्दौर जिले के महू में 14 अप्रैल 1891 चैदहवीं सन्तान के रूप में सूबेदार रामजीराव के परिवार माता भीमाबाई की कोख से जन्में। महाराष्ट्र को अपना कर्म भूमि अपने विद्वतापूर्ण भाषणों, तर्को से परिपूर्ण, प्रतिभा के धनी, दुनिया के महानतम विद्वान, युगपुरूष, युगपरिवर्तक, प्रकाण्ड पंडित, महान राष्ट्र भक्त, भारतीय संविधान के निर्माता, करोड़ो दलित शोषित उपेक्षित जनता के मुक्तिदाता, नारी जाति के उद्धारक, बोधिसत्व बाबासाहेब डा0 भीमराव अम्बेडकर के जीवन पर कुछ संक्षिप्त झलकियां-

 

 

भारत मसीह:

भारत देश और इसकी जनता जो प्रतिक्रांति (बौधों की हार,मौर्ये वंश का पतन,सम्राट अशोक महँ के पोते वृहदत्त की हत्या) के बाद दो हज़ार साल तक शोषण के माह अन्धकार में डूब गया था, उसको बाबा साहब ने प्रकाशित किया| जानवर से भी बत्तर स्तिथि में रह रहे हारे हुए बौद्ध जनता को अछूतपन से मुक्ति दिलाई और भारत में इंसानियत को दोबारा स्थापित किया| कितने ही अवतार,राजा,देवता,महापुरुष,गुरु,राजनेता आये और गए पर प्रतिक्रांति से लेकर बाबा साहब के आने तक कोई भी भारत की जनता का भला नहीं कर पाया| दो हज़ार साल तार गद्दी पर राजा बदलते रहे पर ब्राह्मणों के कृपा पात्र बने रहने के लिए किसी ने भी हारे हुए बौधों की मदत नहीं की, यहाँ तक की मुग़ल शाशकों ने भी | हाँ उन्होंने उन अछूत जातियों को मुसलमान होने की छूट दे दी जो ब्राह्मणवाद से मुक्ति चाहते थे|उत्तर भारत में मौका मिलते ही ब्राह्मणवाद के सताए भारतवासी मुसलमान हो गए और दक्षिण में लोग ईसाई हो गए| जिसको जहाँ मौका मिला वो ब्राह्मणवाद की जंजीरें काट के निकल लिया| कमाल की बात है की आज भी ईसाई/मुसलमान होने के बाद भी ब्राह्मणवाद इनको अछूत मानता है , जिनके खिलाफ घृणा कम नहीं हुई है| पर अब स्तिथि धीरे धीरे बदल रही है ये लोग भी डॉ अम्बेडकर तक पहुच रहे हैं|बाबा साहब अम्बेडकर ने छह हज़ार जातियों में बाँट दी गयी भारत की पिचासी प्रतिशत जनता को न्याय दिलाने के लिए भारत का संविधान रच और उसमे कानून के नज़र में सबको एक बराबर कर दिया |अगर गौर से सोचोगे तो आप जान पाओगे की जो कोई ईश्वर,राजा,देवता,सत्संग,ज्योतिष,पुरोहित,धर्म,यग, पूजा,व्रत,कर्मकांड आधी न दे सके वो “गुलामी और शोषण से आज़ादी” तुम्हारे मसीहा बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने दी है| इस आज़ादी को बचाये रखने के संविधान को बचने के लिए आप क्या कर रहे हो ??

विद्यार्थी-
तंग वातावरण, गरीबी, अर्थभाव के बावजूद सन् 1907 में प्रथम श्रेणी में हाईस्कूल, सन् 1912 में एलीफेन्टन कालेज, बम्बई से फारसी व अंग्रेजी में बी0ए0 परीक्षा उतीर्ण करके राजनीतिशास्त्र में शिक्षा के लिए अमेरिका की न्यूयार्क कोलम्बिया विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। उन्होने इस विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र, और मानवशास्त्र में 1914 में एम0ए0 की परीक्षा उतीर्ण की। 1916 में पी0एच0डी0 की उपाधि प्राप्त करके एम0एस0सी0 (इकोनामिक्स) में दखिला लिये और 1921 में ‘प्रोविन्सयल डीसेंट्रलाइजेशन आफ इम्पीरियल फाइनेन्स इन ब्रिटिश इण्डिया‘ पर तैयार किया गया शोध प्रबन्ध स्वीकार हुआ। 1922 में डी0एस0सी0 तथा वार-एट-ला की डिग्री लन्दन विश्वविद्यालय से प्राप्त की इसके बाद एल0एल0डी0 व डी0लिट0 की उपाधि प्राप्त की। उनका बक्सा देश-विदेश की अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की डिग्रियों से भरा था। पं0 नेहरू डा0 अम्बेडकर को चलता-फिरता विश्वविद्यालय कहते थे, इसी कारण महाराष्ट्र व समीपवर्ती राज्यों में उनका जन्मदिन ‘‘विद्यार्थी दिवस‘‘ के रूप में मनाया जाता है।

सरकारी अफसर-
बी0ए0 पास करने के बाद 1917 में बड़ौदा महाराजा सिवाजीराव गायकवाड़ की स्टेट के फौज में लेफटीनेन्ट के पद पर व अर्थ सचिव के पद पर आरूण हुए। परन्तु स्वाभिमानी होने के कारण छुआछुत की गंदी बीमारी के कारण नौकरी छोड़ दी।

प्राध्यापक-
बड़ौदा स्टेट से नौकरी छोड़कर डा0 अम्बेडकर बम्बई चले गये और वही सीडेनहम कालेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए। उनकी तर्क, तथ्यपरक व विद्वतापूर्ण ढंग से पढ़ाने की शैली के कारण उनके सहयोगी विद्यार्थियों की जगह बैठते थे। बाद में 1928 में बम्बई ला कालेज के प्राध्यापक व प्रिन्सिपल हुए।

विद्याप्रेमी-
शिक्षा सतत् चलने वाली प्रक्रिया है। डा0 अम्बेडकर कहते थे, कि मनुष्य जन्म से लेकर मरने तक विद्यार्थी रहता है। वे स्वंय विद्या के उपासक रहे, वे स्वयं चलता-फिरता विश्वविद्यालय थे। वे विद्या के असितत्व का महत्व जानते थे, इस कारण जुलाई 1945 में पीपुल वेलफेयर सोसाइटी आफ इण्डिया नामक शैक्षणिक संस्था का गठन किया। औरंगाबाद में मिलिंद कालेज, मराठवाड़ा विद्यापीठ, बम्बई में सिद्धार्थ कालेज गठन किया।

सम्पादक-
बाबासाहेब डा0 अम्बेडकर समझते थे कि जिस समाज का हर व्यक्ति पढ़-लिखकर वैचारिक क्रान्ति नहीं लाता तब तक उस समाज का उद्धार नहीं होता। वैचारिक क्रान्ति लाने में प्रेस व अखबार की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिये 1920 में साप्ताहिक पेपर ‘‘मूकनायक‘‘, 1927 में ‘‘बहिष्कृत भारत‘‘, 1930 में ‘‘साप्ताहिक जनता‘‘ व प्रबुद्ध भारत‘‘ निकालकर जनजागृति का शंखनाद कर जनता को जनता के अधिकारों के प्रति सचेत किया।

सफल वकील-
एक वकील की सफलता उसके तर्क तथ्यपूर्ण भाषणों व कानूनी पेचीदगियों की परिभाषा पर पूर्णतया निर्भर करती है। स्वयं एल0एल0डी0 व बार एट ला होने के कारण सभी केस जीते। परन्तु अछूत होने के कारण धर्मान्ध सवर्ण दिन के उजाले में मिलने से कतराते थे, शाम होते ही वरली (मुम्बई) की डबकचाल (मजदूर चाल) का पता पूछते उनके घर कानून की परिभाषा पूछने आते थे।

समाजशास्त्री-

बाबासाहेब अस्पृश्य समाज के होने के कारण उन्हे दर-दर पर अपमान के कड़वे घ्ंट पीने को मजबुर होना पड़ता था, इसलिये उन्होनें समाज के समाजशास्त्री ढाचें का गहन अध्ययन किया। अध्ययन के पश्चात समाजिक विषमता को दूर करने के लिए 1916 में ‘‘भारत में जातिया और उनका मशीनीकरण‘‘, 1948 में ‘‘अछूत कौन‘‘, 1935 में ‘‘जातिभेद का उच्छेदन‘‘ और 1946 में ‘‘अछूत कौन और कैसे‘‘ शोधपूर्ण ग्रन्थ लिखकर सम्पूर्ण भारत व जगत को बताया की आज का शूद्र एक जमाने में भारत का शासनकर्ता था।

नारी उद्धारक-
बाबासाहेब ने 1926 से लेकर 1956 तक भारतीय नारी ‘‘अबला‘‘ का सामाजिक, राजकीय, कानूनी दर्जा बढ़ाने में काफी मेहनत कर एक पूर्ण नारी बनाया। 1954 में सम्पत्ति में बराबर का अधिकर दिलाया। उन्होने हिन्दू स्त्री का ‘‘उत्थान व पतन‘‘ नामक मोटी किताब लिखकर भारतीय नारी की विवेचना की। बाबासाहेब ने कायदे प्रो0 धर पूरे व धर्मशास्त्री पंडित श्री टी0आर0 व्यंकटरामाशास्त्री के साथ बैठकर विचार-विमर्श कर ‘‘हिन्दू कोड बिल‘‘ बनाया जिसके तहत आज हिन्दू स्त्री, पुरूषों से कंधा से कंधा मिलाकर बराबर काम करती है। उन्होने स्वयं पूरे भारत घुम-घुम कर ‘‘स्त्री-जागृति‘‘ का शंखनाद किया।

सामाजिक कार्यकर्ता-
अछूतों की दशा, सार्वजनिक तनाव, कुओं पर पानी भरने में पाबन्दी, नाई द्वारा बाल काटने से इन्कार, मंदिरों में प्रवेश वर्जित, सार्वजनिक तालाबों में वर्जित, मलेच्छ जानवरों की पूजा करना, लेकिन मानव को नकारना, इन कुरीतियों से सम्पूर्ण हिन्दू समाज ग्रसित था। डा0 अम्बेडकर विदेशों में पढ़ाई-लिखाई पूरी कर भारत के शूद्रों के संग्राम में कूद पड़े। सन् 1918 में अस्पृश्य सम्मेलन नागपुर में कर, 1924 में ‘बहिस्कृत हितकारिणी‘ सभा का गठन किया। 19 मार्च 1927 में महाड़ चोबदार तालाब सत्याग्रह तथा 2 मार्च 1930 में नासिक का कालाराम मंदिर सत्याग्रह का कुशल नेतृत्व कर रण बिगुल फूक कर कांग्रेस, गाँधी व मनुवादी मानसिकता के पोषकों की दोहरी नीति को ताक में रखकर पिछड़े वर्ग को मानव अधिकार का नारा दिया।

विधानशास्त्री-
बाबासाहेब को भारतीय संविधान का पिता कहा जाता है। वह स्वयं कानून की उच्चतम उपाधियों से अलंकृत थे। उनकी चिरस्मरणीय कृति ‘‘भारतीय संविधान‘‘ है। जिसे विश्व का सर्वोच्चतम संविधान कहा जाता है जिसको 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में लिखा। इसी कारण विदेशों से कई मानद उपाधियाॅ देकर गौरव प्रदान किया गया।

राजशास्त्री-
डाॅ0 अम्बेडकर वास्तव में देश को नया मोड़ देना चाहते थे। इसलिये उन्होंने कार्यप्रणालियों, उनका प्राचीन व अर्वाचीन इतिहास का अध्ययन कर राजनीतिशास्त्र के जाने माने व्यक्ति बन गये थे। सन् 1939 में ‘संघ बनाम स्वतंत्रता‘, 1940 में ‘‘थाट्स आॅन पाकिस्तान‘‘, 1947 में ‘राज्य व अल्पसंख्यक‘ ग्रन्थ लिखकर उनके व्यक्तित्व की झलक देखने को मिलती है।

अर्थशास्त्री-
बाबासाहेब स्वयं सीडेहनम कालेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे। मार्च 1923 में ‘‘रूपये की समस्या‘‘ उसकी उद्भव व समाधान ग्रन्थ लिखा व पी0एचडी0 की। 1916 में ‘‘भारत का राष्ट्रीय अंश‘‘, 1917 में ‘‘भारत लघु कृषि व उनके समाधान‘‘, 1923 में ‘‘ब्रिटिश भारत में साम्राज्यवादी वित्त का विकेन्द्रीकरण‘‘, 1925 में ‘‘ब्रिटिश भारत में प्रान्तीय वित्त का अभ्युदय‘‘ लिखकर अर्थशास्त्र के क्षितिज पर दीप्तिमान तारे के रूप में छा गये।

राजनीतिज्ञ-
बाबासाहेब कहते थे- समाज के उत्थान के लिए सामाजिक क्रान्ति के बिना राजनैतिक क्रान्ति अधूरी है। जिस समाज के पास राजनीतिक चाभी है, वह हर ताला खोलकर प्रगति करता है। वे आज की तरह गंदी, घिनौनी, भ्रष्ट राजनीति के समर्थक नहीं थे। वे राजनीति में हमेशा विवादास्पद व्यक्ति रहे। 1942 में ‘गांधी व अछूतों की विमुक्ति‘, 1943 में रानाडे, गाॅधी व जिन्ना, 1945 में कांग्रस व गाॅधी ने अछूतों के लिए क्या किया। किताबे लिखकर महात्मापन की पोल खोल दी। 1926 में बम्बई विधानसभा के लिए मनोनीत हुए। उसी समय साइमन कमीशन के सामने साक्ष्य दी। 1930-1931 तथा 1931-1932 में क्रमशः प्रथम व द्वितीय गोलमेज सम्मेलन लंदन में गये और वहां दलितों के लिये अधिकार प्राप्त किये। नवम्बर 1946 में पश्चिम बंगाल के खुलना जिले से संविधान सभा के लिये निर्वाचित हुए। मार्च 1952 में राज्यसभा के लिये निर्वाचित व काका कालेलकर आयोग में साक्ष्य दिया। 1948 में शेड्यूल्ड काॅस्ट फेडरेशन आॅफ इण्डिया व बाद में रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इण्डिया का संविधान लिखा।

स्वाभीमानी मंत्री-
डा0 अम्बेडकर जुलाई 1942 से 19 मई 1948 तक वाइसराय कौलि में श्रम मंत्री रहे। स्वतंत्र भारत में पं0 नेहरू के कहने के अनुसार मंत्रिमण्डल में कानून मंत्री बने। नेहरू अम्बेडकर को मंत्रीमण्डल का हीरा कहते थे, किन्तु चर्चित हिन्दू कोडबिल पर पंडित नेहरू से मतैक्य न होने के कारण तुरन्त त्याग-पत्र देकर एक आदर्श प्रस्तुत किया। बाबा साहेब के निर्वाण के बाद उसी बिल को कांग्रेस ने टुकड़ों-टुकड़ों में बाॅटकर लागू किया।

मजदूर नेता-
वे जानते थे की इस देश की अर्थव्यवस्था में शासन प्रणाली ही श्रमिक वर्ग पर टिकी हुई है, इसलिये उन्होने हमें आगाह किया कि एकजुट संघर्षरत, शोषण के विरूद्ध रहना चाहिये। बम्बई में मजदूरांे की मजदूर चाॅल में रहकर मजदूरों की ज्वलन्त समस्याओं, रहन-सहन के स्तर व मापदण्डों को जानते थे। उन्होंने 1936 में स्वतन्त्र मजदूर दल का गठन किया। कपड़ा मजदूरों को संगठित कर उनके मूल प्रश्न को लेकर सड़क पर उतरे, उन्होंने सबसे पहले मजदूरों का काम करने का समय निश्चित किया जिससे आज सभी कर्मचारी 8 घंटे काम कर अपने सुखी परिवार के साथ रहते है।

धर्मशास्त्री-
बाबासाहेब का जन्म ही धार्मिक कबीर पन्थी परिवार में हुआ था। बचपन में बिना पूजा किये अन्न तक ग्रहण नहीं करते थे। कबीर के दोहे उन्हे कंठस्थ थे। जब उन्होने धर्मान्तर की सिंह गर्जना की उसके पूर्व विश्व के सभी पंथों व धर्मों का गहन अध्ययन किया। बाईबिल पढ़कर पचा डाला, संस्कृत सीखकर हिन्दू धर्म ग्रन्थों का शव परीक्षण कर डाला, उन्हे सभी ग्रंथों में एक ही सूत्र मिला, ‘‘चमत्कारी ईश्वर‘‘ परन्तु बौद्ध धर्म साहित्य में चमत्कारी ईश्वर का अस्तित्व नकार कर मानव कल्याण ही मानव को निर्वाण पद पर प्रतिष्ठित करता है। यह बात मन में समझकर हिन्दू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्मावलम्बी हुए और एक प्रामाणिक ग्रन्थ ‘‘बुद्ध और उनका धम्म‘‘ लिखा, जिसे पढ़कर हर व्यक्ति धन्य हो जाता है।

धम्म उद्धारक-
14 अक्टूबर 1956 दशहरे के दिन बाबा साहब ने नागपुर की दीक्षा भूमि पर लाखों अनुयायियों के साथ सामूहिक धर्म परिवर्तन कर बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इसके बाद धर्म काम में कई बार श्रीलंका गये। 1955 में भारतीय बौद्ध महासभा का गठन कर धार्मिक मंच स्थापित किया।
अन्तिम समय में काठमांडू में आयोजित ‘‘विश्व बौद्ध सम्मेलन‘‘ में भारत का प्रतिनिधित्व नवम्बर 11956 में किये उसके बाद भारत की संसद में अन्तिम भाषण 5 दिसम्बर 1956 को दिये। दिल्ली में 36 अलीपुर रोड स्थित अपने निवास में 6 दिसम्बर 1956 को परिनिर्वाण प्राप्त किये।

brahmanvaad-vs-samvidhan

http://jaisingh-apanibaat.blogspot.in/2013/04/0.html

पूज्य भदंत गलगेदर प्रग्यानन्द महाथेर का पार्थिव शरीर 18 दिन तक रख कर वन्दना, परित्त पाठ किया जा रहा है.अब तक उत्तर प्रदेश के महामहिम राज्यपाल श्री राम नाईक, मुख्यमंत्री मा. योगी आदित्यनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री शुश्री मायावती, उपराष्ट्रपति भारत श्री वेंकइया नायडू भदंत गलगेदर प्रग्यानन्द महाथेर के पार्थिव शरीर का दर्शन कर चुके हैं…Dr Rajesh Chandra (क्या मीडिया में ये खबर आपने कहीं देखी ?)

14 अक्टूबर’1956 को, अशोक विजय दशमी के दिन, नागपुर में, भारत के संविधानशिल्पी बोधिसत्व बाबा साहेब डा. बी आर अम्बेदकर व उनके लाखों अनुयायियों को सप्तवर्गीय भिक्खु संघ द्वारा धम्मदीक्षा दी गयी थी. वे सात भिक्खू इस प्रकार थे- पूज्य भदंत चन्द्रमनी महाथेर(अध्यक्ष) बर्मा से, 2. भिक्खु प्रग्या तिस्स, 3. भिक्खु एम. संघरतन महाथेर, 4. भिक्खु संघरक्षित, 5. भिक्खु सद्धा तिस्स, 6. भिक्खु एच. धम्मानन्द महाथेर, 7. पूज्य भदंत गलगेदर प्रग्यानन्द महाथेर.
पूज्य भदंत गलगेदर प्रग्यानन्द महाथेर सप्तवर्गीय भिक्खु संघ में उस समय सर्वाधिक युवा थे, 28 वर्ष के. सात में से छ भिक्खुओं का पहले ही निधन हो चुका है. महान धम्मक्रांती के अंतिम साक्ष्य भदंत गलगेदर प्रग्यानन्द महाथेर का विगत 30 नवम्बर’2017 को लखनऊ में निधन हो गया. विगत 100 वर्षों में कदाचित यह पहला अवसर है जब भारत में किसी बौद्ध भिक्खु का पार्थिव शरीर 18 दिन तक रख कर पूजा-वन्दना, परित्त पाठ किया जा रहा है.
अब तक उत्तर प्रदेश के महामहिम राज्यपाल श्री राम नाईक, मुख्यमंत्री मा. योगी आदित्यनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री शुश्री मायावती, उपराष्ट्रपति भारत श्री वेंकइया नायडू भदंत गलगेदर प्रग्यानन्द महाथेर के पार्थिव शरीर का दर्शन कर चुके हैं तथा सूत्रानुसार राष्ट्रपति एवं मा. प्रधानमंत्री के भी आने की संभावना है..

भगवान बुद्ध के पावन शरीर का अंतिम संस्कार 7 दिन के बाद हुआ था. परमहंस योगानन्द का अंतिम संस्कार 6 दिन के बाद हुआ था. योगी श्रीअरविंद का संस्कार 5 दिन के बाद हुआ था. परम पावन दालाई लामा के गुरु जमयंग ख्येंत्से का अंतिम संस्कार 6 महीने बाद हुआ था. थाईलैंड के अरहत लांगफा सानोंग का संस्कार 100 दिन के बाद हुआ था. मदर टेरेसा का संस्कार 6 दिन के बाद हुआ था. ऐसे 200 से ज्यादा लिखित उदाहरण उपलब्ध हैं. पूज्य भदंत का पावन पार्थिव शरीर 16 दिसम्बर तक अंतिम दर्शनार्थ लखनऊ में रहेगा. सदकर्मी-पुन्यकर्मी होते हैं वह लोग ज़िनके पार्थिव शरीर को भी उनके प्रेमी-श्रद्धालु अधिक से अधिक दिन रखना चाहते हैं वरना तो घर वाले भी ‘ जल्दी उठाओ जल्दी उठाओ…’ करने लगते हैं…पावन पुरुषों के पार्थिव शरीर को रख कर पुजा-वन्दना, परित्त पाठ की प्राचीन बौद्ध परम्परा है…इसी परम्परा में 3 दिसम्बर’2017 को पूर्णिमा के दिन उपासक संघ द्वारा पूज्य भदंत के पावन पार्थिव शरीर के सान्निद्य में ध्यान साधना तथा धम्म्मपद पाठ होगा. निवेदन है कि समस्त उपासक-उपसिकायें सफेद वस्त्रों में प्रतिभाग करें.

पूज्य भदंत पी सीवली थेरो, जनरल सिकरेटरी महाबोधी सोसाइटी आफ इंडिया, कि अध्यक्षता में संघ द्वारा निर्णय लिया गया है कि बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर को धम्म क्रांति दिवस 14-oct-1956 को बौद्ध धर्म की दीक्षा देने वाले पूज्य भदंत ग. प्राग्यानन्द का पावन शरीर एक सप्ताह तक दर्शनार्थ लखनऊ में रहेगा. अंतिम निर्णय आज शाम संघ की बैठक में होगा…राजेश चंद्रा

अद्यतन समाचार यह है कि पूज्य भदंत गलगेदर प्रग्यानन्द का पार्थिव शरीर कल अर्थात 1 दिसम्बर’2017 को, सुबह 9 बजे बुद्ध विहार, रिसालदार पार्क, लाल कुआं, लखनऊ से शोभा यात्रा के रूप में चलेगा. अंतिम दर्शन के लिए डा. अम्बेदकर महासभा में लगभग 2 घंटे का ठहराव होगा. तदोपरांत पावन शरीर श्रावस्ती के लिए प्रस्थान करेगा. अंतिम संस्कार दोपहर बाद वहीं होगा. वहां स्तूप बनाने की योजना पर भी चर्चा हो रही है. पूज्य भदंत गलगेदर प्रग्यानन्द बोधिसत्व बाबा साहेब के समकालीनों में शायद अंतिम कड़ी थे. एक इतिहास का अवसान हो गया. मेरा उनसे लगभग दो दशक से अधिक सम्पर्क था. आज 30 नवम्बर’2017 सुबह ही अस्पताल में उन्हें देख कर घर आये ही थे कि उनके शांत होने का समाचार आया. विहार में उनके दर्शन करने वालों का तांता लगा है- नेता-राजनेता, अधिकारी, उपासक-उपसिकायें जो कोई भी सुन रहा है, भागा चला आ रहा है…अनिच्चा वत् संखारा…

पूज्य भदंत गलगेदर प्रग्यानन्द महाथेरो के निर्वाण के संदर्भ में आज महाबोधी सोसाइटी आफ इंडिया एंड श्रीलंका के जनरल सिकरेटरी पूज्य भदंत पी सीवली थेरो की अध्यक्षता में आयोजित पूज्य संघ की बैठक में निम्न निर्णय लिए गए:

1. पूज्य भदंत गलगेदर प्रग्यानन्द महाथेरो का पावन पार्थिव शरीर अंतिम दार्शनार्थ दिनांक 16 दिसम्बर’2017 की सुबह 8:30 तक बुद्ध विहार, रिसालदार पार्क, लालकुआं, लखनऊ में रहेगा.
2. दिनांक 16 दिसम्बर’2017 की सुबह 8:30 के बाद पूज्य भदंत का पार्थिव शरीर शोभायात्रा के रुप में डा. अम्बेदकर महासभा, विधानसभा के सामने पहुँचेगा तथा वहां 2 घंटे के लिए ठहराव होगा.
3. तदोपरांत उसी शाम पार्थिव शरीर श्रावस्ती लेजाया जायेगा.
4. 17 दिसम्बर’2017 की दोपहर 1 बजे भदंत के पावन शरीर का अंतिम संस्कार होगा.
5. 18 दिसम्बर को भदंत का 90वाँ जन्मदिन बुद्ध विहार, रिसालदार पार्क, लालकुआं, लखनऊ में मनाया जायेगा.
पूज्य भदंत के प्रति श्रद्धासुमन अर्पित करने के लिए आज महामहिम राज्यपाल उ.प्र. श्री राम नाईक बुद्ध विहार, रिसालदार पार्क, लालकुआं, लखनऊ पधारे. सुत्रों के अनुसार कल सुबह 8 बजे बसपा प्रमुख एवं उ.प्र. की पूर्व मुख्यमंत्री शुश्री मायावती तथा 8:30 बजे उपमुख्यमंत्री मा. केशव प्रसाद मौर्य भदंत के प्रति श्रद्धासुमन अर्पित करेंगें.

 

With reference to the passing away of Ven. Bhadant Galgedar Pragyanand on 30th Nov’2017 Ven. Bhadant Galgedar Pragyanand’s body will remain at Lucknow in Buddha Vihar, Risaldar Park, Lalkuan till the morning of 16th December by 8:30 a.m. for final DARSHAN of his nationwide and worldwide followers ….Rajesh chandra

With reference to the passing away of Ven. Bhadant Galgedar Pragyanand on 30th Nov’2017, in the chairmanship of Ven. P Seewalee Thero, General Secretary Mahabodhi Society of India and Sri Lanka, Ven. Bhikkhu Sangha decided as following:
Ven. Bhadant Galgedar Pragyanand’s body will remain at Lucknow in Buddha Vihar, Risaldar Park, Lalkuan till the morning of 16th December by 8:30 a.m. for final DARSHAN of his nationwide and worldwide followers .
On 16th December’2017 by 8:30am his sacred body will move from Vihar and have a stoppage at Dr. Ambedkar Mahasabha opposite Vidhan Sabha, Lucknow for at least 2 hours. Finally it will reach to Shravasti by same evening.
Final ceremonies of Bhanteji’s body will be performed at Shravasti on 17th December by 1 p.m.
On 18th December it is 90th Birthday of Ven. Galgedar Pragyanand. This function will be celebrated again at Lucknow at Buddha Vihar Risaldar Park Lucknow in his memory.
His Highness Governor of Uttar Pradesh Mr Ram Naik visited today at Buddha Vihar, Risaldar Park, Lucknow to pay him homage. Sources are saying that BSP chief and Ex. CM of Uttar Pradesh Ms Mayavati will visit Vihar tomorrow 2nd December’2017 by 8am in morning.

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