अनुसंधान (research) ;- सम्भवत: शाक्यों और कोलियों में रोहिणी नदी के पानी को लेकर झगड़े ही बुद्ध के गृह त्याग का सच था ।

buddh-yuddh-chod-gayeअनुसंधान (research) ;- सम्भवत: शाक्यों और कोलियों में रोहिणी नदी के पानी को लेकर झगड़े ही बुद्ध के गृह त्याग का सच था ।

आज का विषय ;- बौद्ध धम्म साहित्य में विरोधियों ने जबरदस्त मिलावट की है। उदाहरण तैार पर गौतम बुद्ध ने ‘घर त्याग की घटना’ इसका कारन वह कहानी नहीं है जिसमे बुद्ध ने वृद्ध मनुष्य , रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर विचलित हो चले थे बल्कि युद्ध को टालने की कोशिश थी |

1 ) ;- माना जाता है कि बुद्ध के गृह त्याग के पीछे वह कहानी है जिसमे बुद्ध ने वृद्ध मनुष्य , रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर विचलित हो चले थे और उसी के फ़लस्वरुप उन्होने गृह त्याग किया ।

2 ) ;- यह कितना तर्क संगत लगता है जब कि उनके पिता माँ और उनके राज्य के मंत्री गण स्वयं वृद्ध हो चले थे क्या वह कभी बीमार नही पडे थे।

3 ) ;-कहानी तर्कसंगत नहीं लगती । हाँलाकि इसे ही प्रचलित कहानियों मे माना गया है । डा. भदन्त आनन्द कौसात्यायन के अनुसार त्रिपिटक के किसी भी ग्रन्थ में गृहत्याग के इस कथानक का कहीं उल्लेख नहीं है। फ़िर यह उल्लेख बार – बार क्युं पाया जाता है ।
डा. कौसात्यायन का मत है कि वृद्ध, रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर गृहत्याग की मान्यता ‘‘वे अट्टकथाएँ हैं, जिन्हें बुद्धघोष तथा अन्य आचार्यों ने भगवान बुद्ध के एक हजार वर्ष बाद परम्परागत सिंहल अट्टकथाओं का आश्रय ग्रहण कर पाली भाषा में लिखे थे।

अत्त्द्ण्डा भवं जातं , जनं पस्सच मेषकं।
संवेनं कित्त्यिस्सामि यथा संविजितं मया ॥ १ ॥
फ़न्दमानं पजं दिस्वा मच्छे अप्पोदके यथा ।
अज्जमज्जेहि व्यारुद्धे दिस्वा मं भयमाविसि ॥२॥
समन्तसरो लोको, दिसा सब्बा समेरिता ।
इच्छं भवन्मत्तनो नाद्द्सासिं अनोसितं ।
ओसाने त्वेव व्यारुद्धे दिस्वा अरति अहु ॥३॥

4 ) ;-अर्थ :‘‘शस्त्र धारण मतलब – मुझमें वैराग्य मे भय उत्पन्न हुआ अपर्याप्त पानी में जैसे मछलियां छटपटाती हैं वैसे एक-दूसरे से विरोध करके छटपटाने वाली प्रजा को देखकर मेरे मन में भय उत्पन्न हुआ। चारों ओर का जगत असार दिखायी देने लगा सब दिशाएं काँप रही थी ऐसा लगा और उसमें आश्रय का स्थान खोजने पर निर्भय स्थान नहीं मिला, क्योंकि अन्त तक सारी जनता को परस्पर विरुद्ध हुए देखकर मेरा जी ऊब गया।

5 ) ;-महामाया कोलीय वंश की राजकुमारी थीं। मतलब बुद्ध का ननिहाल। घर राज्य त्यागना बुद्ध का (कोलीय वंश ननिहाल) से युद्ध को रोकना।

6 ) ;-संघ ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध का प्रस्ताव पारित किया, जिसका सिद्धार्थ गौतम ने विरोध किया।

 

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कुछ कहावतें याद आ गयी

– हाथ पर हाथ धार के बैठे रहने से कुछ नहीं होता, आओ संगर्ष करें
– शांति से वही जी सकते हैं जो युद्ध के लिए तैयार हों
– युद्ध में हार ही किसी भी कौम के दलितीकरण का मुख्य कारन होता है

– अपनी पोल खुद ही उघाड़ना
– कबूतर पर जब बिल्ली हमला करती है तो वो आँखे बंद कर के सोचता है की बिल्ली अब नहीं है

-लातों की देवी बातों से नहीं मानती

 

पैरेलल सिनेमा का दुखिया चमार (सदगति-1981) मतलब दिग्गज महानतम अभिनेता ओम पूरी के निधन पर उनको अंतिम नमस्कार, ओम मणि पद्मे हूँ |RIP बहुजन जाग्रति मिशन में ओम पूरी जी जा योगदान सदा याद किया जाता रहेगा|…समयबुद्धा

om-puri-dukhiya-chamar-of-sadgati-mooviesadgatiपैरेलल सिनेमा का दुखिया चमार (सदगति-1981) मतलब दिग्गज महानतम अभिनेता ओम पूरी के निधन पर उनको अंतिम नमस्कार, ओम मणि पद्मे हूँ |इस दुखद मौके पर पैरेलल सिनेमा की यादें ताज़ा हो गयीं, आईये जाने कैसे पैरेलल सिनेमा वास्तव में बहुजन सिनेमा था, जो धन की ताकत के आगे टिक न पाया|

एक जमाना था जब एंटी ब्राह्मणवादी सेंटीमेंट भारत में चरम पर था,क्या राजनीती क्या सिनेमा सब जगह बहुजन अपनी पकड़ बना लेना चाहते थे, राजनीती में मंडल कमीशन वो मोड़ था जो कई पिछड़े राजनीतिज्ञों को सामने लाया|सत्तर अस्सी के दसक में अम्बेडकरवाद के चलते पढ़ा लिखा वर्ग खूब जागरूक हो गया था जिन्होंने बहुजन उत्थान में बहुत योगदान दिया, जागरूक होना अब भी जारी है, अब गरीब अनपढ़ और युवा भी अम्बेडकरवाद से तेजी से जुड़ रहे हैं| सिनेमा भी इस जनचेतना से कैसे अछूता रहता, नाना पाटेकर,श्री ओम पूरी, नसीरूदीन शाह, स्मिता पाटिल,सबाना आज़मी, सत्यजीत रे अदि अनेकों लोगों ने इस जनचेतना में ही अपना हुनर निखारा|

 

भारत के  बहुजन (एससी/एसटी/ओबीसी/माइनॉरिटीज) और उनका जीवन की कहानी और उनके दुःख मुख्य सिनेमा से गायब था,मुख्य सिनेमा में तो केवल अमीर और सुन्दर लोगों की कहानियां चाहिए हुई थी| तो एससी/एसटी/ओबीसी/माइनॉरिटीज लोगों की कहानी लेकर आया  बहुजन सिनेमा, जिसे ब्राह्मणवादी मीडिया ने पैरेलल सिनेमा बताया और इस बात का खूब प्रचार किया की ये फिल्मे आर्ट फिल्मे होती हैं इनसे पैसा नहीं कमाया जाता, पर बिमा धन के कोई हेतु नहीं चलता |और परिणाम ये निकल की पैरेलल सिनेमा का पतन हो गया|

यहाँ मैं दो फिल्मों का उल्लेख करना चाहूँगा एक ओम पूरी अभिनीत फिल्म  “सदगति 1981”, दूसरी नाना पाटेकर अभिनीत फिल्म “दीक्षा 1991” | ये फिल्मे मैंने बचपन में दूरदर्शन पर देखी थी, अब ऐसी फिल्मे कहीं प्रसारित होती मालूम नहीं पड़ती शायद मीडिया में ब्राह्मणवादी वर्चस्व के  बढ़ जाने के कारन होगा|

ओम पूरी जी द्वारा अभिनीत  फिल्म  सदगति 1981 में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है की बोलीवुड की फ़िल्म है जिसके निर्देशक सत्यजित राय हैं। ये फिल्म हिंदी के मशहूर लेखक श्री प्रेमचंद की कहानी सदगति पर आधारित है। इस फिल्म में मशहूर आर्टिस्ट ओम पुरी, स्मिता पाटिल और मोहन अगासे ने मुख्य भूमिका निभाई है।इस फिल्म में दिखाया गया है की कैसे मानसिक रूप से गुलाम व्यक्ति ब्राह्मणवाद से अपना शोषण होने देता है और शोषण सहते सहते मर जाता है। मानसिक गुलामी दिनिया की सभी गुलामियों में सबसे बुरी गुलामी है जो की मर जाने से भी बुरी है।ये फिल्म इन्टरनेट पूरी व् सही प्रिंट में उपलब्ध है, आप वहां से मुफ्त में डाउनलोड कर सकते है, लिंक निम्न प्रकार से है :

नाना पाटेकर अभिनीत फिल्म “दीक्षा 1991”  में बनी हिन्दी भाषा  की बोलीवुड  फ़िल्म है जिसके निर्देशक अरुण कॉल हैं। ये फिल्म कन्नड़ भाषा के लेखक श्री यु0 आर0 अनंतमूर्ति के उपन्यास पर आधारित है।इस फिल्म को 1992 का बेहतरीन फिल्म का रास्ट्रीय पुरुस्कार एव 1992 का फिल्मफेर बेस्ट क्रिटिक अवार्ड मिला है ,इतना ही नहीं ये फिल्म 1993 में अन्तर्रराष्ट्रिय फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित की गई थी। इस फिल्म के  निर्माता हैं National Film Development Corporation of इंडिया.इस फिल्म के मुख्य कलाकार हैं नाना पाटेकर ,मनोहर सिंह विजय कश्यप, राजश्री सावंत अदि हैं । इस फिल्म में बहुजन गुलाम युवक कोगा (नाना पाटेकर) ब्राह्मणवादी ज्ञान से प्रभावित होकर उसे सीखना चाहता है पर जब वो इसको पास से देखता और अनुभव करता है तो उसे अमानवीयता और धर्मिक अत्याचार,शोषण,बेइज़्ज़ती,गोर जातिवाद ही दिखाई पड़ता है ।ये फिल्म इन्टरनेट पर पूरी व् सही प्रिंट में उपलब्ध है, आप वहां से मुफ्त में डाउनलोड कर सकते है, लिंक निम्न प्रकार से है :

 

पैरेलल/बहुजन सिनेमा के पतन के कारन:

पहला कारन तो धन की कमी ही होगा|ये जीवन सूत्र होता है की किसी भी कार्य को सफल होने के लिए दो चीज़ें चाहिए होतीं है एक विचारधारा दूसरा धन, यहाँ विचारधारा की कमी नहीं थी पर जब धन ही नहीं होगा तो फिर कुछ नहीं हो पाता|पैरेलल सिनेमा के दिग्गजों ने कमरशल सिनेमा के ऑफर स्वीकारे और धीरे धीरे बहुजन सिनेमा गर्त में चला गया|

इसका दूसरा मुख्य कारन जो मैं समझता हूँ की जनता “दुःख” नहीं देखना चाहती,सवर्ण तो चाहेंगे ही क्यों बहुजन भी अपने जीवन से ही दुखी हैं वो और दुःख क्या देखेंगे|बहुजन जनता के दुखी जीवन का चित्रण जब बहुजन ही नकारेंगे तो फिर कौन उसे पोसेगा| इसीलिए फिर अशील/दोअर्थी  संगीत  डांस,लहंगा घुमाना, दारूबाजी, मंदिरबाजी,धन वैभव,राजनीती दबंगई, अदि परोसा जाने लगा और यही चल रहा है|बहुजन अपनी दुर्दशा के लिए खुद ही जिम्मेदार हैं|

 

तीसरा कारन इस सिनेमा में गंभीर सामग्री, यथार्थवाद और प्रकृतिवाद, समय की सामाजिक राजनैतिक जलवायु पर आधारित तथ्यों और पटकथा पर गहरी नजर और समझ चाहिए थी, जबकि  आम गरीब जनता या बहुजनों को मुश्किल तत्यों को समझने में नहीं मनोरंजन में रुचि होती है| ये बिलकुल बौद्ध धम्म की ही तरह है, जो जनता को वही बताता है जो जनता के हित में हो पर उसमे कोई मनोरंजन नहीं इसलिए जनता उसे अस्वीकारती रहती है| स्कूटी शिक्षा की बजाये मौजमस्ती, दावती की जगह चाट-चट्टो हमेशा ही चुने जाते है,चाहे इनसे नुक्सान ही क्यों न हो|

 

विकिपीडिया के अनुसार :

“समानांतर/पैरेलल सिनेमा एक भारतीय सिनेमा है, ये लोकप्रिय हिंदी सिनेमा जो कीआज बॉलीवुड के रूप में जाना जाता है  उसके एक विकल्प के रूप में 1950 के दशक में पश्चिम बंगाल राज्य में शुरु हुआ एक फिल्म आंदोलन है।

ये इटली के नेओरेअलिस्म आंदोलन  से प्रेरित था जिसमे इटली में आम गरीब जनता की कहानियों को सिनेमा में उतरा गया, इसको इटली सिनेमा का स्वर्णिम काल कहा जाता है|समानांतर सिनेमा  फ्रेंच न्यू वेव और जापानी नई लहर से पहले शुरू हुआ और 1960 के दशक की भारतीय नई लहर या पैरेलल सिनेमा के लिए एक अग्रदूत साबित हुआ। आंदोलन शुरू में बंगाली सिनेमा के नेतृत्व में और इस तरह के सत्यजीत रे, मृणाल सेन, ऋत्विक घटक, तपन सिन्हा और दूसरों के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित फिल्म निर्माताओं का उत्पादन किया गया था। बाद में यह भारत और बांग्लादेश के अन्य फिल्म उद्योगों में प्रसिद्धि प्राप्त की।इसमें बहुत ही गंभीर सामाजिक पृष्टभूमि को चित्रित किया जाता था|

बहुजन जाग्रति मिशन में ओम पूरी जी जा योगदान सदा याद किया जाता रहेगा| आपकी देह का अंत हुआ  है आपकी आवाज़ और कर्म सदा भारतवासियों को सचेत और जागरूक रखेंगे

अश्रुपूर्ण श्रधांजलि

…समयबुद्धा

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इस विषय में वर्तमान युग के महानतम भारतवासी पत्रकार एव जागृत बौद्ध श्री दिलीप सी मंडल जी का पक्ष इस प्रकार है:

 

 

सावित्री बाई फूले जी के जन्मदिन 3 जनवरी (भारतवासी शिक्षक दिवस) की हार्दिक शुभकामनाएं|देश की पहली महिला शिक्षिका व नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता एक ऐसी महिला जिन्होंने उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह, तथा विधवा-विवाह निषेध जैसी कुरीतियां के विरूद्ध अपने पति, ज्योतिबा फुले के के साथ मिलकर काम किया। ऐसी देश की पहली महिला शिक्षिका को हमारा शत-२ नमन….जयप्रकाश बौद्ध & प्रमिला बौद्ध

देश की प्रथम शिक्षिका, क्रांतिज्योति माता सावित्रीबाई फुले (January 3, 1831)

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देश की पहली महिला शिक्षिका व नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता एक ऐसी महिला जिन्होंने उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह, तथा विधवा-विवाह निषेध जैसी कुरीतियां के विरूद्ध अपने पति, राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले के के साथ मिलकर काम किया। ऐसी देश की पहली महिला शिक्षिका को हमारा शत-२ नमन…

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सावित्रीबाई फुले देश की पहली महिला अध्यापिका व नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता थीं, जिन्होंने अपने पति राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले के सहयोग से देश में महिला शिक्षा की नींव रखी। सावित्रीबाई फुले एक मूलनिवासी बहुजन परिवार में जन्मी महिला थीं, लेकिन उन्होंने उन्नीसवीं सदी में महिला शिक्षा की शुरुआत के रूप में घोर ब्राह्मणवाद के वर्चस्व को सीधी चुनौती देने का काम किया था। उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह, तथा विधवा-विवाह निषेध जैसी कुरीतियां बुरी तरह से व्याप्त थीं। उक्त सामाजिक बुराईयां किसी प्रदेश विशेष में ही सीमित न होकर संपूर्ण भारत में फैल चुकी थीं। महाराष्ट्र के महान समाज सुधारक, विधवा पुनर्विवाह आंदोलन के तथा स्त्री शिक्षा समानता के अगुआ राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले की धर्मपत्नी सावित्रीबाई ने अपने पति के सामजिक कार्यों में न केवल हाथ बंटाया बल्कि अनेक बार उनका मार्ग-दर्शन भी किया। लेकिन भारत के इतिहास फुले दंपति के कामों का सही लेखा-जोखा नहीं किया गया।

👉🏿भारत के पुरूष प्रधान समाज ने शुरु से ही इस तथ्य को स्वीकार नहीं किया कि नारी भी मानव है और पुरुष के समान उसमें भी बुद्धि है एवं उसका भी अपना कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व है । उन्नीसवीं सदी में भी नारी गुलाम रहकर सामाजिक व्यवस्था की चक्की में ही पिसती रही। अज्ञानता के अंधकार, कर्मकांड, वर्णभेद, जात-पात, बाल-विवाह, मुंडन तथा सतीप्रथा आदि कुप्रथाओं से सम्पूर्ण नारी जाति ही व्यथित थी। ब्राह्मण व धर्मगुरू यही कहते थे, कि नारी पिता, भाई, पति व बेटे के सहारे बिना जी नहीं सकती। मनु स्मृति ने तो मानो नारी जाति के आस्तित्व को ही नष्ट कर दिया था। मनु ने देववाणी के रूप में नारी को पुरूष की कामवासना पूर्ति का एक साधन मात्र बताकर पूरी नारी जाति के सम्मान का हनन करने का ही काम किया। हिंदू-धर्म में नारी की जितनी अवहेलना हुई उतनी कहीं नहीं हुई। हिंदू शास्त्रों के अनुसार नारी और शुद्र को विद्या का अधिकार नहीं था और कहा जाता था कि अगर नारी को शिक्षा मिल जायेगी तो वह कुमार्ग पर चलेगी, जिससे घर का सुख-चैन नष्ट हो जायेगा। ब्राह्मण समाज व तथाकथित अन्य उच्चकुलीन समाज में सतीप्रथा से जुड़े ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें अपनी जान बचाने के लिये सती की जाने वाली स्त्री अगर आग के बाहर कूदी तो निर्दयता से उसे उठा कर वापिस अग्नि के हवाले कर दिया जाता था। अंततः अंग्रेज़ों द्वारा सतीप्रथा पर रोक लगाई गई। इसी तरह से ब्राह्मण समाज में बाल-विधवाओं के सिर मुंडवा दिये जाते थे और अपने ही रिश्तेदारों की वासना की शिकार स्त्री के गर्भवती होने पर उसे आत्महत्या तक करने के लिये मजबूर किया जाता था। उसी समय राष्ट्रपिता फुले एवं माता सावित्रीबाई फुले ने समाज की रूढ़ीवादी परम्पराओं से लोहा लेते हुये कन्या विद्यालय खोले।

👉🏿इन्ही विषम परिस्थितियों मे सावित्रीबाई का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले में नायगांव नामक छोटे से गॉव में हुआ। इनके पिता का नाम खंडोजी नवसे पाटिल और माँ का नाम लक्ष्मी था। १८४० में ९ वर्ष की अवस्था में उनका विवाह पूना के ज्योतिबा फुले के साथ हुआ। इसके बाद सावित्री बाई का जीवन परिवर्तन आरंभ हो गया। वह समय शूद्र, अति शूद्र और स्त्रियों के लिए नैराश्य और अंधकार का समय था। समाज में अनेक कुरीतियाँ फैली हुई थीं और नारी शिक्षा का प्रचलन नहीं था। विवाह के समय तक सावित्री बाई फुले की स्कूली शिक्षा नहीं हुई थी और ज्योतिबा फुले तीसरी कक्षा तक पढ़े थे। लेकिन उनके मन में सामाजिक परिवर्तन की तीव्र इच्छा थी। इसलिये इस दिशा में समाज सेवा का जो पहला काम उन्होंने प्रारंभ किया, वह था अपनी पत्नी सावित्रीबाई को शिक्षित करना। सावित्रीबाई की भी बचपन से शिक्षा में रुचि थी और उनकी ग्राह्य शक्ति तेज़ थी। भारत में नारी शिक्षा के लिये किये गये पहले प्रयास के रूप में राष्ट्रपिता फुले ने अपने खेत में आम के वृक्ष के नीचे विद्यालय शुरु किया। यही स्त्री शिक्षा की सबसे पहली प्रयोगशाला भी थी, जिसमें सगुणाबाई क्षीरसागर व सावित्री बाई विद्यार्थी थीं। उन्होंने खेत की मिटटी में टहनियों की कलम बनाकर शिक्षा लेना प्रारंभ किया। सावित्रीबाई ने देश की पहली भारतीय स्त्री-अध्यापिका बनने का ऐतिहासिक गौरव हासिल किया।

👉🏿सावित्री-ज्योतिबा दम्पति ने १ जनवरी सन १८४८ को पूना के बुधवारा पेठ में पहला बालिका विद्यालय खोला। यह स्कूल एक मराठी सज्जन भिंडे के घर में खोला गया था। सावित्रीबाई फुले इस स्कूल का प्रधानाध्यापिका बनीं। धर्म-पंडितों ने उन्हें अश्लील गालियां दी, धर्म डुबोने वाली कहा तथा कई लांछन लगाये, यहां तक कि उनपर पत्थर एवं गोबर तक फेंका गया। भारत में ज्योतिबा तथा सावि़त्री बाई ने शुद्र, अति शुद्र (मूलनिवासी बहुजन) एवं स्त्री शिक्षा का आंरभ करके नये युग की नींव रखी। इसी वर्ष उस्मान शेख के बाड़े में प्रौढ़-शिक्षा के लिए एक दूसरा स्कूल खोला गया। दोनों संस्थाएँ अच्छी चल निकलीं। दबी-पिछड़ी जातियों के बच्चे, विशेषरूप से लड़कियाँ बड़ी संख्या में इन पाठशालाओं में आने लगीं। इससे उत्साहित होकर देख ज्योतिबा दम्पति ने अगले ४ वर्षों में ऐसे ही १८ स्कूल विभिन्न स्थानों में खोले।

👉🏿सावित्री-ज्योतिबा दम्पति ने अब अपना ध्यान बाल-विधवा और बाल-हत्या पर केन्द्रित किया. उन्होंने विधवा विवाह की परंपरा प्रारंभ की और २९ जून १८५३ में बाल-हत्या प्रतिबंधक-गृह की स्थापना की. इसमें विधवाएँ अपने बच्चों को जन्म दे सकती थी और यदि शिशु को अपने साथ न रख सकें तो उन्हें यहीं छोड़कर भी जा सकती थीं। इस अनाथालय की सम्पूर्ण व्यवस्था सावित्रीबाई फुले सम्भालती थी और बच्चों का पालन पोषण माँ की तरह करती थीं। ज्योतिबा-दम्पति संतानहीन थे। उन्होंने १८७४ में काशीबाई नामक एक विधवा ब्राहमणी के नाजायज बच्चे को गोद लिया। यशवंतराव फुले नाम से यह बच्चा पढ़लिखकर डाक्टर बना और आगे चलकर फुले दम्पति का वारिस भी।
👉🏿उनका ध्यान खेत-खलिहानों में काम करने वाले अशिक्षित मजदूरों की ओर भी गया। १८५५ में ऐसे मजदूरों के लिए फुले दंपत्ति ने रात्रि-पाठशाला खोली. उस समय अस्पृश्य जातियों के लोग सार्वजानिक कुएँ से पानी नहीं भर सकते थे १८६८ में अतः उनके लिये फुले दंपत्ति ने अपने घर का कुआँ खोल दिया। सन १८७६-७७ में पूना नगर आकाल की चपेट में आ गया। उस समय सावित्री बाई और ज्योतिबा दम्पति ने ५२ विभिन्न स्थानों पर अन्न-छात्रावास खोले और गरीब जरूरतमंद लोगों के लिये मुफ्त भोजन की व्यवस्था की।

👉🏿ज्योतिबा ने स्त्री समानता को प्रतिष्ठित करने वाली नई विवाह विधि की रचना की। उन्होंने नये मंगलाष्टक (विवाह के अवसर पर पढ़े जाने वाले मंत्रा) तैयार किए। वे चाहते थे कि विवाह विधि में पुरुष प्रधान संस्कृति के समर्थक और स्त्री की गुलामगिरी सिद्ध करने वाले जितने मंत्र हैं, वे सारे निकाल दिए जाएँ। उनके स्थान पर ऐसे मंत्र हों जिन्हें वर-वधू आसानी से समझ सकें। ज्योतिबा के मंगलाष्टकों में वधू वर से कहती है -‘‘स्वतंत्रता का अनुभव हम स्त्रियों को है ही नहीं। इस बात की आज शपथ लो कि स्त्री को उसका अधिकार दोगे और उसे अपनी स्वतंत्रता का अनुभव करने दोगे। ’’ यह आकांक्षा सिर्फ वधू की ही नहीं, गुलामी से मुक्ति चाहने वाली हर स्त्री की थी।

👉🏿कहते हैं – एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं। ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने हर स्तर पर कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और कुरीतियों, अंध श्रद्धा और पारम्पारिक अनीतिपूर्ण रूढ़ियों को ध्वस्त कर गरीबों – शोषितों के हक में खड़े हुए। १८४० से १८९० तक पचास वर्षो तक ज्योतिबा और सावित्रीबाई ने एक प्राण होकर समाज सुधार के अनेक कामों को पूरा किया।

👉🏿२८ नवंबर १८९० को ज्योतिबा फुले के परिनिर्वाण के बाद सावित्रीबाई ने बड़ी मजबूती के साथ इस आन्दोलन की जिम्मेदारी सम्भाली और सासवड, महाराष्ट्र के सत्य-शोधक समाज के अधिवेशन में ऐसा भाषण दिया जिसने दबे-पिछड़े लोगों में आत्म-सम्मान की भावना भर दी। सावित्रीबाई का दिया गया यह भाषण उनके प्रखर क्रन्तिकारी और विचार-प्रवर्तक होने का परिचय देता है।

👉🏿१८९७ में जब पूना में प्लेग फैला तब वे अपने पुत्र के साथ लोगों की सेवा में जुट गई. सावित्रीबाई की आयु उस समय ६६ वर्ष की हो गई थी फिर भी वे निरंतर श्रम करते हुए तन-मन से लोगों की सेवा में लगी रही। इस कठिन श्रम के समय उन्हें भी प्लेग ने धर दबोचा और १० मार्च १८९७ में उनका परिनिर्वाण हो गया।
आज उस महान विरांगना, भारत की महान एवं प्रथम नारी शिक्षिका  ,परम पूज्यनिया माता सवित्री बाई फूले का जन्म दिन है आइये  हमसब मिल कर संकल्प लें  कि इनके विचारों को जन जन तक पहुँचायेगे और फुले ,अम्बेडकर के सपनो का भारत बनाएंगे ।आप सभी को इस अवसर पर हार्दिक मंगल कामना, सादर 🙏नमो बुद्धाय🙏 जय भीम🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
जयप्रकाश बौद्ध
प्रान्तीय उपाध्यक्षABAKKA
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
प्रमिला बौद्ध
जिला महासचिव
विश्व बौद्ध महासंघ गाजीपुर

 

https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%88_%E0%A4%AB%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A5%87

सावित्री बाई फूले जी के जन्मदिन 3 जनवरी (भारतवासी शिक्षक दिवस) की हार्दिक शुभकामनाएं|इस बात का अहसास GOOGLE.COM को भी है,देखिये गूगल के इस आइकॉन में गुरुमाता की अपने बच्चों के साथ मन को छु लेने वाली छवि, गूगल को बहुत बहुत साधुवाद

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आज भारत की पहले बहुजन शिक्षिका माता सावित्री बाई फूले जी के जन्मदिन 3 जनवरी (भारतवासी शिक्षक दिवस) का अहसास गूगल को भी है, ये और बात है की जिनके लिए इन्होंने काम किया उन लोगों को अहसास न हो, इसीलिए तो इन लोगों का पिछड़ापन नहीं छूट पाता| देखिये गूगल के इस आइकॉन में गुरुमाता की अपने बच्चों के साथ मन को छु लेने वाली छवि, गूगल को बहुत बहुत साधुवाद…जय भीम नमो बुद्धाय

जब राष्ट्रपिता जोतिराव फुले जी और सावित्रीबाई फुले जी ने आंदोलन शुरू किया था तब पूना के ब्राम्हण गालिया बक रहे थे। विरोध कर रहे थे।शुद्र ( ओबीसी),अतिशूद्र( अनुसूचित जाति, जनजाति,घुमन्तु जनजातियाँ ) को ब्राम्हणो की व्यवस्था से आज़ाद करने का काम फुले दाम्पत्य कर रहे थे। आज पढ़े लिखे लोग ही फुले दाम्पत्य के संघर्ष और उद्देश्य को भूल चुके है। जब राष्ट्रपिता जोतिराव फुले जी को किसी ने भी साथ सहयोग नहीं दिया तब सावित्री बाई फुले जी ने दिया। बहुत सालो तक अपने मयके नहीं गयी थी।एक बार गयी तो अपने भाई ने झगड़ा किया और ब्राम्हण दोनों के कार्य के बारे में क्या चिल्लाते है यह बताया तब सावित्री बाई फुले अपने पति को खत लिखकर कहती है कि अब मेरा पूरा यकीन हो गया है कि हम जो कार्य शुद्र अतिशूद्र को जगाने का कर रहे है इसकी चर्चा मेरे मइके तक आयी है हम जल्द ही हमारे लक्ष को देश भर में पूरा करेंगे। ब्राम्हणो का विरोध हो रहा है इसका मतलब हम जित रहे है। ऐसी सोच सावित्री बाई फुले जी की थी। उनका लक्ष के प्रति इतनी कर्मठता की अब भी हमारे समाज को प्रेरित करती है।
माता सावित्रीबाई फुले जी से प्रेरणा लेकर राष्ट्रिय मूलनिवासी महिला संघ की करोडो करोडो महिलाएं आज पूरे देश भर में व्यवस्था परिवर्तन का महान कार्य कर रही है। मूलनिवासी बहुजन और उनका देश विदेशी ब्राम्हणो से आज़ाद होगा यह ख्वाब था राष्ट्रपिता जोतिराव फुले जी और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले जी का। इसे पूरा करने का आज उनके जयंती पर दृढ़ निश्चय करे!!!

आज देश की पहली महिला शिक्षक, समाज सेविका, कवि और वंचितों की आवाज उठाने वाली सावित्रीबाई ज्‍योतिराव फुले की पुण्यतिथि  है. पेश हैं उनके बारे में दस खास बातें….

1. इनका जन्‍म 3 जनवरी, 1831 में दलित परिवार में हुआ था.

2. 1840 में 9 साल की उम्र में सावित्रीबाई की शादी 13 साल के ज्‍योतिराव फुले से हुई.

3. सावित्रीबाई फुले ने अपने पति क्रांतिकारी नेता ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले. उन्‍होंने पहला और अठारहवां स्कूल भी पुणे में ही खोला.

 4. सावित्रीबाई फुले देश की पहली महिला अध्यापक-नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता थीं.

5. उन्‍होंने 28 जनवरी 1853 को गर्भवती बलात्‍कार पीडि़तों के लिए बाल हत्‍या प्रतिबंधक गृह की स्‍थापना की.

6. सावित्रीबाई ने उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह और विधवा विवाह निषेध जैसी कुरीतियां के विरुद्ध अपने पति के साथ मिलकर काम किया.

7. सावित्रीबाई फुले ने आत्महत्या करने जाती हुई एक विधवा महिला काशीबाई की अपने घर में डिलवरी करवा उसके बच्चे यशंवत को अपने दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया. दत्तक पुत्र यशवंत राव को पाल-पोसकर इन्होंने डॉक्टर बनाया.

8. महात्मा ज्योतिबा फुले की मृत्यु सन् 1890 में हुई. तब सावित्रीबाई ने उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिये संकल्प लिया.

9. सावित्रीबाई की मृत्यु 10 मार्च 1897 को प्लेग के मरीजों की देखभाल करने के दौरान हुई.

10. उनका पूरा जीवन समाज में वंचित तबके खासकर महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष में बीता. उनकी एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है जिसमें वह सबको पढ़ने लिखने की प्रेरणा देकर जाति तोड़ने और ब्राह्मण ग्रंथों को फेंकने की बात करती हैं…

जाओ जाकर पढ़ो-लिखो, बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती

काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो

ज्ञान के बिना सब खो जाता है, ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है

इसलिए, खाली ना बैठो,जाओ, जाकर शिक्षा लो

दमितों और त्याग दिए गयों के दुखों का अंत करो, तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है

इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो, ब्राह्मणों के ग्रंथ जल्दी से जल्दी फेंक दो.

(मराठी कविता का हिंदी अनुवाद )

http://aajtak.intoday.in/education/story/10-point-about-savitribai-phule-1-802692.html

 

https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%88_%E0%A4%AB%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A5%87

एक ऐसा भी युग गुजर है जब पिटाई से बचने के लिए अछूत(सामाजिक बहिष्कृत) बना दिए गए भारतवादी लोग अपने सरे शरीर पर “राम ” का नाम गुदवा लेते थे| आज भी ऐसे कुछ लोग बचे हैं छत्तीसगढ़ के जमगहन गांव में रहते हैं 76 साल के महेतर राम टंडन…..कुलदीप सरदार

‘गाल पर राम का नाम तो थप्पड़ कैसे मारोगे बाबू?

पीके फिल्म में मार से बचने के लिए आमिर द्वारा देवी देवता का स्टीकर गाल पे लगाने की प्रेरणा शायद यही से मिली हो
अक्सर देखा गया है की जहाँ कहीं भी सीढ़ियों पर लोगों के थूकने की सम्भावना होती है तो उनको रोकने के लिए देवी देवताओं की टाइल लगा देते हैं

Mahettar Ram Tandon, 76, a follower of Ramnami Samaj, who has tattooed the name of the Hindu god Ram on his full body, poses for a picture inside his house in the village of Jamgahan, in the eastern state of Chhattisgarh, India, November 17, 2015. "It was my new birth the day I started having the tattoos," Tandon said. "The old me had died." "The young generation just don't feel good about having tattoos on their whole body," he added. "That doesn't mean they don't follow the faith." REUTERS/Adnan Abidi  PICTURE 9 OF 31 - SEARCH "RAMNAMI" FOR ALL IMAGES TPX IMAGES OF THE DAY      - RTX2205I

Mahettar Ram Tandon, 76, a follower of Ramnami Samaj, who has tattooed the name of the Hindu god Ram on his full body, poses for a picture inside his house in the village of Jamgahan, in the eastern state of Chhattisgarh, India, November 17, 2015. “It was my new birth the day I started having the tattoos,” Tandon said. “The old me had died.” “The young generation just don’t feel good about having tattoos on their whole body,” he added. “That doesn’t mean they don’t follow the faith.” REUTERS/Adnan Abidi PICTURE 9 OF 31 – SEARCH “RAMNAMI” FOR ALL IMAGES TPX IMAGES OF THE DAY – RTX2205I

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‘राम नाम के हीरा मोती लूट सके तो लूट’

लेकिन पॉलिटिकल फरमे में कोई हल्का व्यंग्यकार कह दे कि ‘राम नाम के वोट हैं काफी, लूट सके तो लूट’, तो गलत नहीं होगा. राजनीति में राम के डेब्यू के बाद से उनकी भक्ति पर बड़े-बड़े दावे किए गए हैं. लेकिन आपको बताते हैं उनके बारे में, जो एक समय सबसे बड़े राम भक्त कहलाते थे और इसमें कहीं कोई राजनीति नहीं थी.

ये है हिंदुस्तान का ‘रामनामी’ समुदाय. इस समुदाय के लोग पूरे शरीर पर, यहां तक कि जीभ और होठों पर भी ‘राम नाम’ गोदवा लेते थे. शरीर पर राम नाम का टैटू (गोदना), रामनामी चादर, मोरपंख की पगड़ी और घुंघरू इनकी पहचान थी. मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की भक्ति और गुणगान ही इनकी जिंदगी का एकमात्र मकसद था. भजन गाते और मस्त रहते. यह ऐसी संस्कृति थी, जिसमें राम नाम को कण-कण में बसाने की परपंरा रही. पूर्वी मध्य प्रदेश, झारखंड के कोयला क्षेत्र और छत्तीसगढ़ में फैले रामनामी समुदाय ने एक सदी तक इस अनूठी परंपरा को बचाए रखा. फिर कई वजहों से उनकी संख्या घटती चली गई.

लंबे समय तक ये बदलाव की हवा से अछूते और आदिम रीति-रिवाजों और परंपराओं से जकड़े हुए रहे. लेकिन बाद के दौर में नई पीढ़ी इन परंपराओं से बचने लगी. रायगढ़, रायपुर और बिलासपुर जिले के रामनामियों में दो दशक पहले ही आधुनिकता ने पैठ बनानी शुरू कर दी थी. पक्की सड़कों, डाक और बिजली के खंभों के जरिये वे शहरों से जुड़ गए और फिर उनकी प्राथमकिताएं बदल गईं. पूरे शरीर पर राम नाम गोदने की परंपरा तो अब लगभग खत्म ही हो चुकी है.

अछूत होने की निशानी बन गया गोदना फिर भी इस परंपरा की कहानी आकर्षित करती है. दरअसल इस आस्था की जड़ें ऐतिहासिक छुआछूत और जातीय भेदभाव में हैं. कभी अटूट निष्ठा का प्रतीक रहा इनका गोदना इनके अछूत (दलित) होने की पहचान बन गया था.

अक्टूबर 1992 में ‘इंडिया टुडे’ के एक अंक में इन पर स्टोरी छपी थी. इस स्टोरी में रामनामी समुदाय के गजानंद प्रसाद बंजारा कहते हैं कि राम नाम गोदवाने, रामनामी चादर और पंखों की पगड़ी से उनकी जाति पता चलती है और वे पिछड़ी जातियों से होने वाले बुरे बर्ताव के शिकार बन जाते है. बहुत संभव है कि इस जातीय पहचान से बचने के लिए भी बहुत सारे लोगों ने राम नाम गोदवाना छोड़ दिया हो.

कहा जाता है कि 19वीं सदी के आखिर में हिंदू सुधार आंदोलन के दौरान इन लोगों ने ब्राह्मणों के रीति-रिवाज अपना लिए. इससे ब्राह्मणों का गुस्सा भड़क उठा. उनके गुस्से से त्रस्त रामनामियों ने सचमुच राम नाम की शरण ली. वे उन दीवारों के पीछे जा छिपे, जिन पर राम नाम अंकित था. जब ये दीवारें भी ब्राह्मणों की प्रताड़ना से उन्हें नहीं बचा पाईं तो उन्होंने शरीर पर राम नाम गोदाने को आखिरी हथियार के तौर पर अपनाया कि शायद यह कोई चमत्कार दिखाए.

माना जाता है कि छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा के चारपारा गांव में एक दलित युवक परसराम ने 1890 के आसपास रामनामी संप्रदाय की स्थापना की. इसे भक्ति आंदोलन से जोड़ा जाता है, लेकिन इसे सामाजिक और दलित आंदोलन के रूप में देखने वालों की संख्या भी कम नहीं है.

http://www.thelallantop.com/tehkhana/ramnami-community-who-tattoo-their-whole-body-with-the-name-of-lord-ram/

1 जनवरी, शौर्य दिवस की आप सबको बधाई।1818 को इसी दिन केवल 500 महार सैनिकों ने 29000 पेशवाई फ़ौज को हराकर भारत को जातिमुक्त और लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में पहला ऐतिहासिक क़दम बढ़ाया।

shaurye-divas-ambedkar-koregaon-battleसभी भारतवासियों को १ जनवरी शौर्ये दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं, ये वही दिन है जिसको बाबा साहब ने शौर्ये दिवस घोषित किया और कोरेगांव शौर्ये मेमोरियल पर हर साल जाते थे |पेशवा बाजीराव-II के 28000 सैनिक थे। मात्र 500 महार सैनिकों ने पेशवा ब्राह्मण की शक्तिशाली फौज को हरा दिया। सैनिको को उनकी वीरता और साहस के लिए सम्मानित किया गया। ये पेशवा वही थे जिनके राज्ये में भारतवासी/मूलनिवासी अछूत बना दिए गए थे और इनकी गले में हांड़ी और कमर में झाड़ू बाँध के चलने का सख्त आदेश था, इनकी परछाई तक अछूत मानी जाती थी इसलिए इनको सिर्फ दोपहर को ही निकलने की आज़ादी थी जब परछाई छोटी होती है|

‘भीमा कोरेगांव’ जहां लिखा गया BAHUJAN शौर्य का गौरवशाली इतिहास

“वो सिर्फ 500 थे, लेकिन दिल में जज़्बा था कि जातिवाद को हराना है.. वे जान पर खेल गए, कई तो कट मरे, पर आख़िरकार… भीमा कोरेगांव के मैदान से पेशवा ब्राह्मण की फ़ौज भाग गई। 1818 को इसी दिन महार सैनिकों ने पेशवाई को हराकर भारत को जातिमुक्त और लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में पहला ऐतिहासिक क़दम बढ़ाया”

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की यह लाइन दलितों के शौर्य की उस कहानी को कहती है जो आज से लगभग दो सौ साल पहले घटित हुई थी। वह साल 1818 था जब आज के ही दिन यानि 1 जनवरी 1818 को पूरी दुनिया भर में दलित समाज के शौर्य की गाथा लिखी गई थी।

यह घटना जहां दलितों की शौर्यगाथा है तो वहीं मनुवादियों के मुंह पर कालिख। इस महान गाथा में 500 नायकों ने हिस्सा लिया था। ये लोग बहुजन समाज के नायक हैं। इस ऐतिहासिक दिन को याद करते हुए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर हरसाल 1 जनवरी को उस महान स्थान पर जाकर उन वीर दलितों का नमन किया करते थे।

1 जनवरी 1818 को कोरेगांव के युद्ध में महार सैनिकों ने ब्राह्मणवादी पेशवाओं को धूल चटा दी थी। बाबासाहेब ने अपनी किताब राइटिंग्स एंड स्पीचेस (अंग्रेज़ी) के खंड 12 में ‘द अनटचेबल्स एंड द पेक्स ब्रिटेनिका’ में इस तथ्य का वर्णन किया है। यह कोरेगांव की लड़ाई थी, जिसके माध्यम से अंग्रेजों ने मराठा साम्राज्य को ध्वस्त कर भारत में ब्रिटिश राज स्थापित किया। यहां 500 महार सैनिकों ने पेशवा राव के 28 हजार सैनिकों की फौज को हराकर देश से पेशवाई का अंत किया।

कोरेगांव भीमा नदी के तट पर महाराष्ट्र के पुणे के पास स्थित है। 01 जनवरी 1818 को सर्द मौसम में एक ओर कुल 28 हजार सैनिक जिनमें 20000 हजार घुड़सवार और 8000 पैदल सैनिक थे, जिनकी अगुवाई पेशवा बाजीराव-II कर रहे थे तो दूसरी ओर बॉम्बे नेटिव लाइट इन्फेंट्री के 500 महार सैनिक, जिसमें महज 250 घुड़सवार सैनिक ही थे। आप सोच सकते हैं कि सिर्फ 500 महार सैनिकों ने किस जज्बे से लड़ाई की होगी कि उन्होंने 28 हजार पेशवाओं को धूल चटा दिया।

दूसरे शब्दों में कहें तो एक ओर ब्राह्मण राज बचाने की फिराक में पेशवा थे तो दूसरी ओर पेशवाओं के पशुवत अत्याचारों से बदला चुकाने की फिराक में गुस्से से तमतमाए महार। आखिरकार इस घमासान युद्ध में पेशवा की शर्मनाक पराजय हुई। 500 लड़ाकों की छोटी सी सेना ने हजारों सैनिकों के साथ 12 घंटे तक वीरतापूर्वक लड़ाई लड़ी।

भेदभाव से पीड़ित अछूतों की इस युद्ध के प्रति दृढ़ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि महार रेजिमेंट के ज्यादातर सिपाही बिना पेट भर खाने और पानी के लड़ाई के पहले की रात 43 किलोमीटर पैदल चलकर युद्ध स्थल तक पहुंचे। यह वीरता की मिसाल है। इस युद्ध में मारे गए सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक चौकोर मीनार बनाया गया है, जिसे कोरेगांव स्तंभ के नाम से जाना जाता है। यह महार रेजिमेंट के साहस का प्रतीक है। इस मीनार पर उन शहीदों के नाम खुदे हुए हैं, जो इस लड़ाई में मारे गए थे। 1851 में इन्हें मेडल देकर सम्मानित किया गया।

इस युद्ध में पेशवा की हार के बाद पेशवाई खतम हो गयी थी और अंग्रेजों को इस भारत देश की सत्ता मिली। इसके फलस्वरूप अंग्रेजों ने इस भारत देश में शिक्षण का प्रचार किया, जो हजारों सालों से बहुजन समाज के लिए बंद था।

*शौर्य दिवस का इतिहास*👈🏿

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11 मार्च सन 1689 को  पेशवाओ ने हमारे शम्भाजी महाराज को खत्म कर उनके शरीर के अनगिनत टुकड़े कर तुलापुर नदी में फेक दिये थे और कहा कि जो भी इनको हाथ लगायेगा उसका क़त्ल कर दिया जायेगा। काफी समय तक कोई भी आगे नहीं आया पर महार जाति के एक पहलवान ने हिम्मत दिखाई और आगे आया जिसका नाम गणपत पहलवान था , वह शम्भाजी महाराज के सारे शरीर के हिस्सों को इकठ्ठा करके अपने घर लाया और उसकी सिलाई कर के मुखाअग्नि दी ।
          शम्भाजी  महाराज की समाधी आज भी उसी महारवाडे इलाके में स्थित है। ये सूचना मिलते ही पेशवाओ ने गणपत महार पहलवान का सर कलम कर दिया और समुची महार जाति को दिन में गाँव से बहार निकलने पर पाबन्दी लगा दी और कमर पे झाड़ू और गले में मटका डालने का फरमान लागू कर दिया था और पुरे पुणे शहर में यह खबर फैला दी कि गणपत महार पहलवान देवतुल्य हो गया है इसलिए वो भगवान की भेट चढ़ गया!   ।
          शम्भाजी महाराज की मृत्यु के बाद महार जाति के लोगो पर खूब अत्याचार इन पेशवाओ (सनातनी ब्रह्मणो ) द्वारा किये जाने लगे थे।महार जाति शुरू से ही मार्शल जाति थी , पर पेशवाओ ने अब इन लोगो पर मार्शल लॉ (सेना में लड़ने पर रोक ) लगा दिया था।
    महार अब इनके जुल्म से तंग आ चुके थे और अपने स्वाभिमान और अधिकार के लिए आंदोलन करने की सोच रहे थे …..।
        उस दौरान अंग्रेज भारत में आये ही थे पर वो पेशवाओ की बलशाली सेना पर विजय नहीं कर पा रहे थे , तभी महार जाति का एक नवयुवक सिद्धनाक पेशवाओ से मिलने गया और कहने लगा की वैसे तो हमारी अंग्रेजो की ओर से लड़ने की कोई इच्छा नहीं है मगर तुम हमारे सारे अधिकार और सम्मान हमे दे देते है तो हम अंग्रेजो को यहाँ से भगा देंगें , इस पर पेशवाओ ने कहा की तुम्हे यहाँ सुई के बराबर भी जमीन नहीं मिलेगी। यह सुनते ही सिद्धनाक ने पेशवा को चेतावनी देते हुए कहाँ की अब तुमने अपनी मृत्यु को स्वयं ही निमंत्रण दे दिया है , और अब तुम्हे कोई नहीं बचा सकता , अब हम रण भूमि में ही मिलेंगे ।
      अब सिद्धनाक अंग्रेजो से मिला और उनसे कहने लगा कि तुम हमे अपने अधिकार और सम्मान लौटा दो , तो हम आपकी तरफ से इन पेशवाओ से लड़ने के लिए तैयार है ।
    अंग्रेजो ने सिद्धनाक की बाते मान ली ।
   तब सिद्धनाक 500 महार सैनिको के साथ  शम्भाजी महाराज की समाधी पर जाता है और महाराज की समाधी को नमन करते हुए शपथ लेता है कि हम शाम्भाजी महाराज के खून का बदला जरूर लेंगे। और उसके बाद सात दिन तक चले युद्ध में भूखे प्यासे रहकर महारो के 500 वीरो ने पेशवाओ के 28000 सैनिकों के टुकड़े – टुकडे करके उनको नेस्तानाबूत कर दिया था
     वो दिन था 01 जनवरी  1818 इसलिए ये दिन “शौर्य दिवस ” नाम से जाना जाता  है ।
  जहाँ स्वयं बाबा साहेब डॉ भीम राव आंबेडकर जी ने इन महार वीरो के लिए अपने अश्रु बहाये थे और प्रत्येक साल 01 जनवरी को बाबा साहेब उन वीर योद्धाओं को श्रदांजली अर्पित करने के लिए जाते थे। तो आओ हम भी याद करे हमारे उन महान वीर योद्धाओं को जिन्होंने हमारे लिए इतनी बड़ी लड़ाई लड़ी थी ।
जय भीम ! जय भारतीय मूलनिवासी!
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जेएनयू में रोहित वेमुला कांड दोहराने की कोशिश कर रहा प्रशासन- निष्कासित छात्र|कन्हैया मामले पर आसमान सिर पर उठा लेने वाले चैनल बहुजन छात्रों के निष्कासन मामले पर खामोश क्यों? …National Dastak

जेएनयू पर लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि इस संस्थान में भी दलित-पिछड़े और आदिवासी तथा मुस्लिम छात्रों के साथ भेदभाव होता रहा है। जिसे लेकर समय-समय पर यहाँ के छात्र आन्दोलन भी करते रहे हैं।

Read full news from from following links

http://www.nationaldastak.com/story/view/jnu-vc-suspended-bpsa-president-rahul-and-others

http://www.nationaldastak.com/story/view/jnu-bahujan-students-pc

http://www.nationaldastak.com/story/view/where-is-the-main-stream-media-

http://www.nationaldastak.com/story/view/om-sudha-asked-some-questions-to-left-behalf-of-jnu

 

आपको इंटरेस्ट नहीं इन बातों में कोई नहीं कल को आपके भी बच्चे कॉलेज जाएंगे तब उनको भी ऐसे ही भेदभाव का सामना करना होगा, तब बाकि लोभ भी इंटरेस्ट नहीं लेंगे| अगर ऐसे मुद्दों पर सरे भारतवासी एकजुट नहीं होते तो वो दिन दूर नहीं पर पढ़ने पढने का अधिकार खतरे में होगा| अपने बच्चे का एडमिशन तो कराया होगा स्कूल में, एडमिशन फॉर्म में तीसरा कॉलम में जाती पूछते हैं हर स्कूल में, खासकर प्राइवेट स्कूल में, जानते हैं क्यों? पहले तो नहीं पूछते थे अभी क्यों पूछने लगे हैं| जागो देखो ब्राह्मणवाद तेज़ी से फ़ैल रहा है आपके आस पास| क्या आप में से कोई बताएगा की स्कूक कालेज के फॉर्म में जाती धर्म  पूछने का क्या मतलब है क्या जरूरत है ?

 

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BAAPSA : Birsa Ambedkar Phule Students’ Association