सुप्रीम कोर्ट के वकील ,बहुजन विचारक एव एक्टिविस्ट एडवोकेट श्री आर0 आर० बाग की मान्यवर साहब कांशीराम जी के बारवे परिनिर्वाण दिवस पर चर्चा , हमें लगता है ये हम सबको सुनना और समझना चाहिए

 

जिस समाज की गैर राजनीतिक जड़े मजबूत नहीं होती उस समाज की राजनीति कभी कामयाब नहीं हो सकती -मान्यवर कांशीराम साहब को नमन

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बहुजन विचारक एव एक्टिविस्ट डॉ विवेक कुमार को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के Sociology Department के Chairperson (HoD) (विभागाध्यक्ष) का पदभार ग्रहण करने पर समयबुद्धा मिशन से बहुत बहुत बधाई

बहुजन विचारक एव एक्टिविस्ट डॉ विवेक कुमार को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के Sociology Department के Chairperson (HoD) (विभागाध्यक्ष) का पदभार ग्रहण करने पर समयबुद्धा मिशन से बहुत बहुत बधाई

आज की गरीबी सत्ता और धर्म के गठजोड़ से हजारों वर्षों में तैयार हुई है जिससे उबरने का एकमात्र तरीका है जागरूकता….-शकील प्रेम

आज की गरीबी सत्ता और धर्म के गठजोड़ से हजारों वर्षों में तैयार हुई है जिससे उबरने का एकमात्र तरीका है जागरूकता.

जागरूक समाज के लिए सबसे जरूरी है शिक्षा व्यवस्था को वैज्ञानिक और तर्क संगत किया जाये लेकिन वो सम्भव नही क्योंकि शिक्षा की बागडोर जिन हाथों में है वो लोग कभी ऐसा होने नही देंगे ऐसे में हम जैसे जागरूक लोगों का ये नैतिक कर्तव्य है कि हम इस ओर कदम बढ़ाएं समाज को जागरूक करें अपने सीमित संसाधनों के बावजूद कुछ ऐसा करें जिससे नई पीढ़ी तक वैज्ञानिक चिंतन पहुंच सके.

इसी सोच के साथ हम जैसे कुछ लोगों ने एक योजना तैयार की है जिसके प्रेरणास्रोत इस ग्रुप के एडमिन जितेंद्र जी हैं उन्हीं के मार्गदर्शन में हम एक “मानव निर्माण केंद्र” की स्थापना करना चाहते हैं असल मे ये एक स्कूल होगा जहां से युगपुरुषों की मैन्यूफैक्चरिंग की जाएगी.

एक चंद्रगुप्त पूरे एशिया को बदल सकता है एक बुद्ध पूरी दुनिया को बदल सकता है और एक अंबेडकर पूरे देश को बदलने की क्षमता रखता है ये युगपुरुष तो दुबारा पैदा नही हो सकते लेकिन ऐसे महापुरुषों का निर्माण किया जा सकता है प्रकृति हर बच्चे को एक समान पैदा करती है समय परिवेश और परिस्थितियां मिलकर इंसान की किस्मत का निर्माण करते हैं यही तीनों चीजे मिलकर किसी को राजा बनाती हैं तो कोई फकीर बनता है.

परमहंस ने विवेकानंद का निर्माण किया चाणक्य ने चंद्रगुप्त को बनाया और कांसीराम ने मायावती को तैयार किया तीन आदमियों ने तीन युगपुरुष देश को दिए और इन तीन लोगों ने करोड़ों को बदला.

हम एक ऐसी संस्थान खड़ी करना चाहते हैं जहां से ऐसे सैंकड़ों हजारों युगप्रवर्तक तैयार किये जा सकें ये संभव है बस इस ओर सार्थक कदम बढाने की जरूरत है.

हम नालंदा यूनिवर्सिटी के तर्ज पर एक ऐसी शैक्षणिक संस्था का निर्माण करना चाहते हैं जहाँ हम बच्चों में नैतिक मूल्ययुक्त एजुकेशन के साथ नेतृत्व और देश की समस्याओं की वैज्ञानिक समझ विकसित कर उन्हें इसके निदान के लिए तैयार कर सकें.

इस मकसद के लिए हमने जो शुरुआती योजना बनाई है वो अभी सिर्फ खयाली पुलाव से ज्यादा कुछ नही है आप सभी लोगों के सहयोग और समर्थन के बाद ही हम आगे बढ़ सकते हैं ये काम किसी अकेले आदमी के बस का नही है न ही दो चार आदमी मिलकर ही इतना बड़ा बीड़ा उठा सकते हैं हमे कुछ कर्मठ और प्रबुद्ध साथियों की जरूरत है जो तन मन और धन से इस मिशन से जुड़ सकें.

अगर हम सच मे कुछ बदलना चाहते हैं तो ठोस कदम उठाने ही होंगे और एक शिक्षण संस्थान से बेहतर विकल्प कोई हो नही सकता अगर इस विषय मे आपका कोई सुझाव हो तो अवश्य बताइये.

मैं गलत हूँ तो मेरा मार्गदर्शन कीजिये.

-शकील प्रेम

कक्षा एक के बच्चे को कक्षा दस की पढाई समझ में नहीं आ सकती , डॉ आंबेडकर की २२ प्रतिज्ञा समझने के लिए और फिर मानने के लिए पहले बहुत कुछ जानना जरूरी है ,सच बताने का भी अपना एक विज्ञान है इसका भी अपना एक नियम है……डॉ मिथिलेश 


सच बताने का भी अपना एक विज्ञान है इसका भी अपना एक नियम है या यह कहें और नियमों जैसे ही इसके नियम हैं l कहने का मतलब यह है अगर कक्षा एक के बच्चे को 12 के बच्चे की चीजें पढ़ाएंगे तो उसे नहीं समझ में आएगी उसको लगेगा यह बकवास है l हां कक्षा 1 के बच्चे के साथ अगर आप खेलेंगे उसको क्या खा गिनती पहाड़ा बताएंगे तो उसको समझ में आएगा l ठीक यही कि हमारे समाज में होती है कोई अंधविश्वासी क्यों है अंधविश्वास के पीछे उसकी बचपन के बाद से तर्क न करने की आदत और उस की ढेर सारी अज्ञानता है l तो हमें धीरे-धीरे एक-एक चीज करके लोगों को तर्क करने की आदत डालनी होगी और उन्हें मूलभूत शिक्षा देनी होगी l अगर हम उनसे डायरेक्ट यह बात करें कि भगवान नहीं है भूत प्रेत नहीं है जादू टोना नहीं है तो वह यह सब बातें नहीं मानेंगे l

हमें पहले इसकी जड़ खोजना होगा कि आखिर लोग भूत-प्रेत क्यों मांगते हैं लोग जादू टोना क्यों मानते हैं l इस सवाल पर जब हम विचार करेंगे तो हमें यह समझ में आता है कि जो लोग जादू टोना या भूत प्रेत मानते हैं उनको यह जानकारी नहीं है कि पेट दर्द पेट झरना टाइफाइड मलेरिया यह ढेर सारी बीमारी कीटाणुओं से होती है l उनको यह नहीं पता है कि कुछ मानसिक बीमारी भी होती है जिसमें कि मेनिया डिप्रेशन स्किजोफ्रेनिया यह अन्य चीजें होती हैं जिसकी वजह से आदमी को कई बार रस्सी साफ दिखती है यह कई बार कुछ भी नहीं होता तो भी दिखता है या भूत-प्रेत जैसी चीजें दिखती हैं l जब लोगों को यह जानकारी होगी कि कीटाणुओं से बीमारी होती है मानसिक तनाव से कुछ बीमारियां हो सकती हैं l

तो फिर जानकारी होने के बाद वह जादू टोना भूत प्रेत के चक्कर में ना पढ़कर दिखाएंगे डॉक्टर को मतलब कि अंधविश्वास में नहीं पड़ेंगे या कम पड़ेंगे l इसी तरह से प्रकृति में ढेर सारी घटनाएं होती हैं जिसके बारे में वह नहीं जानते हैं तो  भगवान की देन यह चमत्कार या जादू टोना भूत प्रेत के चक्कर में पड़ जाते हैं l

कहने का मतलब अगर समाज में हमें अंधविश्वास दूर करना है तो हमें चिंतन करना होगा की अंधविश्वास की जड़ कहां पर है यह अलग-अलग व्यक्ति में अलग-अलग होती है लेकिन एक चीज का मन होती है की तर्क ना करने की आदत और अशिक्षा l

अब आइए तर्क न करने की आदत पर विचार करें बचपन में बच्चा तर्कशील होता है वह बहुत सवाल करता है मम्मी पापा यह बात कैसे मम्मी-पापा को वह बात  कैसे लेकिन जब मम्मी पापा जवाब देने में सक्षम नहीं होते हैं तो बच्चे को डांट देते हैं यही प्रक्रिया स्कूल में भी होती है जो बच्चा बहुत जिज्ञासु होता है उसको डांट करके चुप करा दिया जाता है l और फिर अंततः ज्यादातर बच्चे सवाल पूछना छोड़ देते हैं कोई चीज जैसे बताया जाता है वैसे मान लेते हैं l कुछ बच्चे जो पार करना नहीं छोड़ते जिज्ञासु बने रहते हैं वह विद्रोही स्वभाव के जाने जाते हैं l

हमारी बुद्धिमानी और सार्थकता इसमें नहीं है कि किसी के हम अंधविश्वास पर चोट करें या किसी के आस्था पर चोट करें बल्कि हम इस बात का विश्लेषण करें फला व्यक्ति इतने अंधविश्वास में क्यों हैं उसकी जड़ कहां पर है कई बार अंधविश्वास की जड़ उसकी परेशानियों में होती हैं तो हमें उन चीजों के बारे में विचार करके धीरे धीरे उस व्यक्ति को समझना चाहिए और समझाना चाहिए l

डॉ मिथिलेश

डॉ आंबेडकर की २२ प्रतिज्ञा समझने के लिए और फिर मानने के लिए पहले बहुत कुछ जानना जरूरी है ,

https://samaybuddha.wordpress.com/dr-ambedkar-dwara-dilai-gayi-22-pratigyayen/

बुद्ध और धम्म के बारे में चर्चा करते हुए हमे बाबा साहब डॉ अम्बेडकर को हमेशा साथ में रखना होगा। अन्य धर्मगुरु या विपस्सना सिखाने वाले लोग अध्यात्म या रहस्यवाद सिखाने के क्रम में या मानसिक शान्ति हेतु काउंसिलिंग करने के क्रम में दुबारा वेदान्तिक और ब्राह्मणवादी शब्दों का और शैली का इस्तेमाल करने लगते हैं। …… संजय श्रमण


बुद्ध और धम्म के बारे में चर्चा करते हुए हमे अंबेडकर को हमेशा साथ में रखना होगा। अन्य धर्मगुरु या विपस्सना सिखाने वाले लोग अध्यात्म या रहस्यवाद सिखाने के क्रम में या मानसिक शान्ति हेतु काउंसिलिंग करने के क्रम में दुबारा वेदान्तिक और ब्राह्मणवादी शब्दों का और शैली का इस्तेमाल करने लगते हैं।

ये लोग हृदय से तो बुद्ध को समर्पित हैं लेकिन इन्हें ब्राह्मणवादी चालबाजियों की समझ नहीं है इसलिए विपस्सना सिखाने वाले गुरुओं को भी अंबेडकर के चश्मे से देखना होगा। विपस्सना के नाम पर आजकल ओशो के शिष्य पुनर्जन्म और कर्म का विस्तारित सिद्धांत सिखा रहे हैं। हर शहर में बुद्धत्व को प्राप्त छुटभैये अवतार बैठे हुए हैं और बुद्ध के नाम पर जाने क्या क्या सिखा रहे हैं। इनसे बचना जरुरी है।

ऐसे सभी लोगों से बचने के लिए सबसे जरुरी उपाय है कि आप अंबेडकर को पढ़ें उन्होंने बुद्ध पर जो कुछ लिखा है उसे गहराई से समझें।

लेकिन आजकल खुद अंबेडकर को ही इस्तेमाल किया जाने लगा है। कुछ दाढ़ी वाले बाबा लोग भी लंबे समय से समाज में सक्रीय हैं जो न केवल बुद्ध को ढाल बनाकर पुनर्जन्म सिखा रहे हैं अंबेडकर के नाम पर ईश्वर, जगत की रचना परमात्मा की कृपा और न जाने क्या क्या सिखा रहे हैं।

जो मित्र किसी तरह से किन्ही आचार्यों से विपस्सना सीख रहे हैं या ध्यान इत्यादि कर रहे हैं वे भी बुद्ध के प्रति गहरी श्रद्धा तो रखते हैं लेकिन ब्राह्मणवाद और वेदांत की चाल को बिलकुल नहीं समझते। एक बहुत बड़े विपस्सना गुरु ने बुद्ध के साथ पुनर्जन्म को जोड़ दिया है।

जबकि बुद्ध खुद ही आत्मा और पुनर्जन्म को नकार चुके हैं। अंबेडकर और उनके पहले पी एल नरसू ने भी गहरे अध्ययन और विश्लेषण से अनत्ता और पुनर्जन्म के नकार को स्थापित कर चुके हैं। लेकिन दलित बहुजनों को पुनर्जन्म और जन्म जन्मांतर तक चलने वाले कर्म के सिद्धांत में फसाया जा रहा है।

ध्यान साधना और मानसिक शान्ति के नाम पर आजकल ओशो के बहुत सारे सन्यासी और उनसे लोगों को बरगलाने की तरकीब सीख चुके लोग बुद्ध और विपस्सना के नाम पर दलितों बहुजनों को दुबारा वेदांत में धकेलने का षड्यंत्र चला रहे हैं।

इनकी चालबाजियों में भोले भाले बहुजन मित्र फंस रहे हैं और जिस तरह सवर्ण हिन्दू अपने वेद वेदांत की रक्षा के लिए तर्क देते हैं उसी तरह दलित बहुजन मित्र भी पुनर्जन्म को सीधे सीधे नकारने की बजाय पुनर्जन्म को स्वीकार करते हुए उसका समर्थन करते हैं। साथ ही यह घोषित करते हैं कि बुद्ध ने पुनर्जन्म का समर्थन किया है। ऐसे लोग बुद्ध को और उनकी अनत्ता को बिलकुल नहीं समझते।

ऐसे मित्र ये भी मानते है कि बुध्द पूर्व जन्म में ब्राह्मण थे। इस मुद्दे पर बात करें तो कहने लगते हैं ब्राह्मण शब्द का अर्थ वो नही जो आप समझते हैं। अब ये बिल्कुल वही तर्क और तरीका है जो वेदांती लोग अपनाते हैं। इसका इतना ही अर्थ हुआ कि विपस्सना सिखाने वालों ने अच्छे खासे बहुजन कार्यकर्ताओं को कितनी सफाई से पुनर्जन्म, ब्राह्मण, कर्म से बनी वर्ण व्यवस्था इत्यादि के पक्ष में खड़ा कर दिया है। ये उनकी सबसे बड़ी सफलता है।

एक मित्र अभी कह रहे थे कि त्रिपिटक में बुद्ध ने पुनर्जन्म को सत्य कहा है। ये मित्र ओशो एवं एक अन्य विपस्सना गुरु से प्रभावित हैं और ओशो जैसे लोगों के वाकजाल में फंसकर बुद्ध को शंकाराचार्य की तरह समझ रहे हैं। ऐसे मित्र स्वयं का और बुद्ध के साथ ही अंबेडकर के मिशन का नुक्सान कर रहे हैं।

ब्राह्मणवादियों की चालबाजी समझने के लिए आपको अंबेडकर को पढ़ना होगा। ये ब्राह्मणवादी वेदांती खेमे में तो हैं ही, ये दलित बहुजनों में भी गुसकर ध्यान समाधि अनुभूति इत्यादि सिखा रहे हैं, ये अंबेडकर की क्रांति के लिए बड़ा खतरा है। अगर आपने किसी असावधानी वश ब्राह्मणवादी शब्दावली का इस्तेमाल किया तो आप फिर से वेदांत के दलदल में फंस जायेंगे।

ध्यान समाधी इत्यादि के अनुभवों की बात करना खतरनाक है। ये बातें इतनी बेबूझ हैं कि एक ही अनुभव के आधार पर कोई आत्मा को सिद्ध करता है कोई अनात्मा को सिद्ध करता है कोई परमात्मा को सिद्ध करता है। ध्यान के दौरान शान्ति के अनुभव को कुछ लोग आत्मा का अनुभव बताते हैं कुछ परमात्मा का अनुभव बताते हैं और इसी को कुछ शुन्य का अनुभव बताते हैं।

लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि हर शब्द के साथ पूरा दर्शन और धार्मिक परम्परा जुडी है। जो लोग ब्राह्मणवादी षड्यंत्र में दलितों को फिर से घसीटना चाहते हैं वे विपस्सना और बुद्ध के नाम पर सीधे सीधे आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म सिखा रहे हैं।

इनमे से 90 प्रतिशत लोग ओशो के सन्यासी हैं जो अपने गुरु की तरह शब्दजाल बुनते हुए बुद्ध जीसस मुहम्मद और जरथुस्त्र तक के मुंह से वेदांत और ब्रह्मसूत्र कहलवा लेते हैं। चूँकि ये साथ में बुद्ध की प्रशंसा भी करते जाते हैं इसलिए दलितों को लगता है कि ये लोग बुद्ध के मूल दर्शन का प्रचार कर रहे हैं।

ये बात ध्यान से नोट करनी होगी। ओशो जैसे जो लोग बुद्ध का बहूत महिमामण्डन करते हुए पुनर्जन्म को स्थापित कर रहे हैं वे असल में बुद्ध का इस्तेमाल कर रहे हैं शंकराचार्य को स्थापित करने के लिए। लेकिन ये बात हमारे दलित बहुजन लोग नहीं समझ रहे हैं।

वे ठीक से पढ़ते नहीं और भारत के इतिहास में चलते आये दार्शनिक व्यभिचार को समझे बिना भावुकता में बुद्ध के साथ आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म को जोड़ देते हैं।

इसलिए सभी मित्रों से निवेदन है कि पहले अंबेडकर को समझ लीजिये। थोड़ा सा पढ़ने की आदत डालिये। आप जिस दिशा में बुद्ध को और विपस्सना की चर्चा करते हुए भावुक हो जाते हैं वहीं सबसे बड़ा खतरा पैदा हो जाता है।

जब अंबेडकर पुनर्जन्म को सीधे सीधे नकार रहे हैं और बुद्ध आत्मा सहित विस्तारित कर्म के सिद्धांत को खारिज कर रहे हैं तो आपको ओशो जैसे किसी बाबा के प्रभाव में आकर वेदांती दलदल में गिरने की आवश्यकता नहीं है।

ब्राह्मणवाद की चालबाजी से खुद बचिए और दूसरों को बचाइये। ब्राह्मणवाद का केन्द्रीय सूत्र पुनर्जन्म ही है। इसे सीधे सीधे नकारे बिना अगर आप शब्दजाल में उलझेंगे तो इसी जाल में आपको ओशो जैसे लोग फंसाकर आपको वेदांती बना देंगे।

इसलिए कभी भी अनिर्णय में न फसें। निर्णायक रूप से पुनर्जन्म को नकारिये और बुद्ध को समझने के लिए आगे बढिए।

– संजय श्रमण

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