तथागत गौतम बुद्ध का ‘धम्म’ की अन्य धर्मों से बिलकुल अलग है, इसे धर्म न समझ लेना वरना बुद्धत्व और दुखो से मुक्ति प्राप्त नहीं कर पाओगे

jano tabi manoइस संसार को किसने बनाया, यह एक सामान्य प्रशन है ,इस दुनिया को ईश्वर ने बनाय यह वैसा ही सामन्य सा उत्तर है

 इस सृष्टि रचयिता के कई नाम है , अलग प्रांत और देशानुसार अलग यदि यह पूछा जाये कि तथागत  गौतम बुद्ध ने ईशवर को सृष्टि कर्ता के रुप में स्वीकार किया तो उत्तर हैनही बुद्ध इश्वर नहीं हैं  वो तो मनो वैज्ञानिक हैं महामानव हैं दार्शनिक हैं चिकित्सक हैं समाज शास्त्री हैं क्रन्तिकारी हैं   बुद्ध ने कहा कि ईशवराश्रित धर्म कल्पनाश्रित है , इसलिये ऐसे धर्म का  मानव कल्याण में कोई उपयोग नही है बुद्ध ने इस प्रशन को ऐसे ही नही छोड दिया उन्होने इस प्रशन के नाना पहलूऒं पर विचार किया है

हिंदी के धर्म शब्द को पाली भाषा में धम्म कहते हैं, पर क्योंकि अन्य धर्मों और बौद्ध धर्म में बहुत ज्यादा फर्क है पर सारा मीडिया बौद्ध धर्म को अन्य धर्मों के समतुल्य खड़ा करने में लगा है ऐसे में जनसाधारण के लिए बौद्ध धम्म को सही से समझना बेहद मुश्किल हो जाता है|जब लोग बौद्ध विचारधारा को धर्म के रूप में नहीं धम्म के रूप में ग्रहण करेंगे तभि लबन्वित हो सक्ते है|आप कह सकते हो की शब्द से क्या फर्क पड़ता है, इससे वही फर्क पड़ता है जैसे हिंसक यज्ञ  भंग करने वाला भंगी आज अपशब्द हो गया है,बुद्धिमान व्यक्ति के लिए पंडित शब्द का प्रयोग,यूनिवर्स के लिए जातिसूचक शब्द  ब्रह्माण्ड  की संकपना, रक्षा करने वाले को राक्षश और राक्षश का आज मतलब है अधर्मी| शब्दों में बहुत बात होती है\ कोई ऐसे ही श्रेष्ठ नहीं है वो हर मोर्चे पर काम कर रहा होता है इतने बारेक मोर्चे पर भी काम किया जय जिसे हम कभी ध्यान ही नहीं दे पाते|टीवी के विज्ञापनों में भी केवल कुछ ही जातिसूचक उपनाम आते हैं,क्या ये जरूरी है,इतने बड़े देश में सिर्फ यही लोग हैं|क्या केवल नाम से काम नहीं चलेगा|खेर ये उनका संगर्ष है वो अपनी जगह सही हैं सवाल ये है की आप का संगर्ष क्या है ?

बुद्ध के धम्म‘ की परिभाषा हिदू धर्म , इस्लाम धर्म और ईसाई और यहूदी आदि धर्मों से बिलकुल अलग है ।अन्य  धर्मों  की तरह को बुद्ध विचारधारा को धर्म नही कहते अपितुधम्मकहते हैं   धर्म या मजहब से बुद्ध का कोई लेना देना नही ।धम्म से बुद्ध का अर्थ हैजीवन का शाशवत नियम ,जीवन का सनातन नियम इससे हिंदू , मुसलमान , ईसाई का कुछ लेना देना नही इसमें धर्म/मजहबों के झगडे का कोई संबध नही यह तो जीवन की बुनियाद में जो नियम काम कर रहा है , एस धम्मो सनंतनो, वह जो शशवत नियम है , बुद्ध उसकी बात करते हैं और जब बुद्ध कहते हैं : धम्म  की शरण मे जाओ , तो वे यह नही कहते कि किस धर्म की शरण मे बुद्ध कहते हैं कि धम्म जीवन जीने के बहतरीन सूत्र या नियम हैं ।ये  शशवत नियम क्या है ? उस सूत्र या  नियम की शरण मे जाओ उस नियम से विपरीत मत जाओ नही तो दुख पाओगे ऐसा नही कि कोई परमात्मा कही बैठा है कि जो तुमको दंड देगा कही कोई परमात्मा नही है बुद्ध के लिये संसार एक नियम है अस्तित्व एक नियम है ज्ब तुम उसके विपरीत जाते हो तो विपरीत जाने के कारण ही दुख पाते हो

एक आदमी नशे में डांवाडोल चलता है और अपना घुंटना फ़ोड लेता है तो ऐसा नही है कि परमात्मा ने शराब पीने का उसे दंड दिया बुद्ध के यह बातें बचकानी लगती हैं वह आदमी स्वयं ही गिरा क्योंकि वह गुरुतवाकर्षण के नियम के विरुद्ध जा रहा था उसकी शराब उसके लिये दंड बन गई गुरुतवाकर्षण का नियम है कि तुम अगर डांवाडोल हुये, उलटे सीधे चले तो गिरोगे ही क्योंकि धरती का केंद्र अपनी और खीचता है  जो नियम के साथ चलते हैं उन्हें नियम संभाल लेता है और जो नियम के विपरीत चलते हैं वे अपने हाथ स्वयं ही गिर पडते हैं

भगवान्बुद्ध जिसे धम्म  कहते हैं वह धर्म /मजहब या रीलीजिन से सर्वाथा अलग है जहाँ मजहब या रीलीजन व्यक्तिगत चीज है वही दूसरी ओर धम्म एक समाजिक वस्तु है वह प्रधान रुपसे और आवशयक रुप से सामाजिक है  धम्म का मतलब है सदाचरण , जिस का अर्थ है जीवन के सभी क्षेत्रों में एक आदमी का दूसरे आदमी के प्रति अच्छा व्यवहार इससे स्पस्ट है कि यदि कही परस्पर दो आदमी भी साथ रहते हों तो चाहे चाहे उन्हें धम्म के लिये जगह बनानी पडेगी दोनॊ में से एक भी बचकर नही जा सकता जब कि यदि कही एक आदमी अकेला हो तो उसे किसी धर्म की आवशकता नही धम्म की  नहीं  ये तो जनसँख्या नियंत्रण और व्यस्था के नियम  होते हैं  

 धम्म क्या है ?  धम्म  की आवशयकता क्यूं है ? भगवान्बुद्ध के अनुसार  धम्म  के दो प्रधान तत्व हैंप्रज्ञा और करुणा ।प्रज्ञा का अर्थ है बुद्धि ( निर्मल बुद्धि या विवेक ) भगवान्बुद्ध ने प्रज्ञा को अपने धर्म के दो स्तम्भों में से एक माना है , क्योंकि वह नही चाहते थे किमिथ्या विशवासों ;’ के लिये कोई जगह बचे

करुणा कया है ? और किसके लिये ? करुंणा का अर्थ है दया , प्रेम और मैत्री इसके बगैर तो समाज जीवित रह सकता है और तो समाज की उन्नति हो सकती है प्रज्ञा और करुणा का अलौकिक मिश्रण ही तथागत का  धम्म  है

समयबुद्धा ने कहा है 

“धम्म क्या है अगर इसका एक वाक्य में उत्तर देना हो तो मैं यही कहूँगा की ये ऐसा मार्ग या तरीका है जिससे  मनुष्य में ऐसी मानसिक योग्यता उत्पन्न हो जाती है जिसके बाद वो अपनी बुद्धि को समय और परिस्थिथि के हिस्साब से सही इस्तेमक करके दुखों से मुक्त जीवन जी सकता है, इतना ही नहीं वो संसार का सर्वज्ञ न्यायकर्ता बन सकता है|बुद्ध का ‘धम्म’ को अन्य धर्मो के  सामान न समझना ये काफी अलग है।  इसे श्रद्धा और भक्ति से नहीं बुद्धि और समझ से पाओगे। ये किसी सम्प्रदाए विशेष के लिए ही नहीं है सम्पूर्ण मानवता के लिए है। ” 

संविधान दिवस (26NOV) विशेषः भारत का भविष्य बना था संविधान…Adv. Nitin Meshram(सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता) [आम जनता और लालची बेरहम राजनीतिक/कॉरपोरेट लुटेरों के बीच सिर्फ संविधान खड़ा है, जिस दिन वो लोग इसे हटाने में कामयाब हो गए, तो फिर जनता गुलामी करने को मजबूर हो जायेगी, और तब कोई ईश्वर या भगवान् बचा नहीं पायेगा| सरकारी संस्थाओं का कमजोर होना व सेठों/धर्म का ताकतवर होते जाना बेहत चिंताजनक बात है]

ambedkar_5भारत का संविधान 26 नवंबर 1949 में स्वीकार किया गया. संविधान के मायने क्या होते हैं, शायद उस समय भारत के लोगों को यह पता नहीं था. लेकिन दुनिया में संविधान का महत्व स्थापित हो चुका था. अमेरिका में 1779 में संविधान बन चुका था. हालांकि यूनाइटेड किंगडम (यूके) में उस तरह का संविधान नहीं है लेकिन वहां MAGNA CARTA जैसी संवैधानिक अधिकारों की व्यवस्था कायम हो चुकी थी जिसके तहत राजा ने अपनी जनता के साथ अपने अधिकारों को बांट लिया था. वहां अब तक इसी तरह के कई सेटेलमेंट से बनी व्यवस्था कायम है और 15 जून 2015 में उसके MAGNA CARTA को 800 साल होने वाले हैं. संविधान असल में समूह में बंटे लोग जो राष्ट्र बनना चाहते हैं, को मानवीय अधिकार दिलाता है. इसके तहत लोगों के लिए स्वतंत्रता, बंधुता, न्याय और समानता की व्यवस्था कि निर्माण किया जाता है. यह सभी मनुष्यों को एक समान अधिकार देता है और मनुष्यों के बीच भेदभाव को अपराध भी घोषित करता है. 1950 के बाद विश्व के लगभग 50 देशों ने अपना संविधान बनाया. भारत उनमें सबसे पहले है. हालांकि यहां यह भी साफ करना जरूरी है कि आजादी का आंदोलन और भारत के संविधान का आपस में कोई संबंध नहीं है. दोनों अलग-अलग घटनाएं हैं. जब सन् 1928 में साइमन कमीशन का भारत में आगमन हुआ तो उस समय कंस्टीट्यूशनल सेलेटमेंट  की बात उठी, क्योंकि भारत एक विभाजित देश है और यह कई जातियों, धर्मों, रीति-रिवाजों, समुदायों और क्षेत्रों में बंटा हुआ है. ब्रिटिश लोग और भारत के लोग दोनों इस बात को जानते थे. संविधान निर्माण के जरिए इस बिखरे हुए लोगों के समुदाय को एक राष्ट्र करने की कोशिश की गई. हालांकि भारत इसमें कितना सफल हो पाया है, यह एक गंभीर बहस का मुद्दा है.

जब अंग्रेज भारत छोड़ कर जाने को तैयार हुए औकी प्रक्रिया शुरू हुई तो इससे पहले कंस्टीटयूशनल सेटेलमेंट की बात उठी. अंग्रेजों ने यह तय करना जरूरी समझा कि भारत को सत्ता के हस्तानांतरण के बाद भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था ही लागू हो. इस पूरी प्रक्रिया में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की प्रमुख भूमिका रही. अगर हम बाबासाहेब के संपूर्ण जीवन को देखें तो यह साफ होता है कि कंस्टीट्यूशन सेटेलमेंट को लेकर वह कितने गंभीर थे. बाबासाहेब इस बात को लेकर हमेशा सक्रिय रहें कि भारत में कंस्टीट्यूशनल सेटेलमेंट कैसे हो. उनका मानना था कि देश में सामाजिक क्रांति तभी स्थायी होगी जब उसे संवैधानिक गारंटी होगी. क्योंकि वह संविधान के जरिए देश में समानता स्थापित करना चाहते थे. वह चाहते थे कि जाति और जन्म के आधार पर किसी काम को करने की बाध्यता या फिर न करने की मनाही न हो. डॉ. आंबेडकर संविधान के जरिए इन चीजों को खत्म करना चाहते थे. वह चाहते थे कि संविधान के जरिए भारत से असमानता खत्म हो और समानता आए. लोगों को उनके मूलभूत अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) को लेकर गारंटी मिले.

के.सी वैरी (Kenneth Wheare) नाम के एक संवैधानिक विशेषज्ञ ने मार्डन कांस्टीट्यूशन नाम से एक किताब लिखी है. उन्होंने यह किताब 1950 के बाद बने कई देशों के संविधान का अध्ययन करने के बाद लिखी है. किताब में उसने बताया है कि आखिर किसी देश को संविधान की जरूरत क्यों पड़ती है? उन्होंने तीन परिस्थितियों में संविधान की जरूरत बताया. पहली स्थिति के तौर पर उनका कहना है कि किसी देश में सामाजिक क्रांति के बाद जब आजादी मिलती है और सत्ता किसी एक के हाथ से निकल कर दूसरे के पास जाती है तो इस क्रम में कई बदलाव आते हैं. तब आप पहले के नियम-कानून को मानते नहीं है और आपके पास नए नियम-कानून होते नहीं है. ऐसी स्थिति में जिन चीजों को आप चाहते हैं उन्हें संवैधानिक वैद्यता (Sanctity) की जरूरत होती है. संविधान को लेकर दूसरी स्थिति तब होती है कि जब किसी देश को दूसरे देश की गुलामी से मुक्ति मिलती है. इसी क्रम में तीसरी स्थिति यह होती है कि अगर किसी देश में पहले से ही संवैधानिक लोकतंत्र था पर उसमें कोई संकट आ गया और उसने काम करना बंद कर दिया. इन तीनो पस्थितियों में संविधान की जरूरत होती है. भारत के संदर्भ में बात करें तो यहां दो स्थितियां एक साथ थी. भारत में सामाजिक क्रांति कामयाब हो रही थी, वहीं दूसरी ओर देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो रहा था. संवैधानिक तौर पर भारत में जाति और वर्ण जैसी व्यस्था और मनुस्मृति के तहत बनाए गए कानून के खत्म होने का वक्त आ गया था. शाहूजी महाराज, जोतिबा फुले, नारायणा गुरु और बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के माध्यम से देश में जो सामाजिक क्रांति आई थी, उसे अपनी एक पहचान चाहिए थी. इन दोनों स्थितियों में भारत में भी संविधान की जरूरत थी. हालांकि यहां यह कहना ज्यादा सही होगा कि भारत में राजनीतिक क्रांति की बजाय सामाजिक क्रांति की वजह से संविधान बना है. क्योंकि जो लोग राजनीतिक क्रांति में सक्रिय थे वो नहीं चाहते थे कि भारत में संविधान हो. वह बिना संविधान के ही भारत देश को चलाना चाहते थे. लेकिन भारत में सामाजिक क्रांति के कारण इतने ज्यादा मजबूत थे कि राजनीतिक लोग चाह कर भी संविधान निर्माण को रोक नहीं पाएं. डॉ. आंबेडकर के लगातार सक्रिय रहने के कारण ब्रिटिशर्स भी भारत में मौजूद सामाजिक असमानताओं को समझ चुके थे और संविधान के पक्ष में थे. इस तरह से भारत का संविधान बनने की प्रक्रिया पर मुहर लगी.

इन सारी चीजों की वजह से 9 अगस्त 1946 को 296 सदस्यों की संविधान सभा बनी. देश का विभाजन होने के कारण इसमें से 89 सदस्य चले गए. इस तरह भारतीय संविधान सभा में 207 सदस्य बचे और इसकी पहली बैठक में सिर्फ 207 सदस्य ही उपस्थित थे.

इसमें बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर पहली बार 9 दिसंबर 1946 को बंगाल से चुनकर आए. इसके तुरंत बाद भारत का विभाजन हो गया, जिसके बाद बाबासाहेब जिस संविधान परिषद की सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे उसे पाकिस्तान को दे दिया गया. इस तरह बाबासाहेब का निर्वाचन रद्द हो गया. यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि विभाजन के वक्त जिस तरह डॉ. आंबेडकर के प्रतिनिधित्व वाले हिस्से को पाकिस्तान को दे दिया गया, उसे भी तमाम जानकारों ने कांग्रेस की साजिश करार दिया है. यह इसलिए किया गया ताकि डॉ. आंबेकर संविधान सभा में नहीं रह पाएं. हालांकि इन साजिशों को दरकिनार करते हुए बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर दुबारा 14 जुलाई 1947 को चुन कर आएं. यहां बाबासाहेब के दुबारा संविधान सभा में चुने जाने को लेकर लोगों में यह भ्रम है कि कांग्रेस ने उन्हें सपोर्ट किया. जबकि हकीकत कुछ और है और ऐसा कह कर सालों से लोगों को गुमराह किया जा रहा है. इतिहास और सच्चाई यह है कि अगर बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर संविधान सभा (Constituent Assembly) में नहीं होते तो भारत का संविधान नहीं बन पाता. मान्यवर कांशी राम साहब ने भी इस बात को कहा है. दूसरी बात, डॉ. आंबेडकर जब 14 जुलाई 1947 को दुबारा चुन कर के आएं, उसके बाद ही यह घोषणा हुई कि 15 अगस्त को अंग्रेज भारत को सत्ता का हस्तानांतरण करेंगे. असल में डॉ. आंबेडकर जब पहली बार संविधान सभा में चुन कर आएं और विभाजन के बाद अपने निर्वाचन क्षेत्र के पाकिस्तान में चले जाने के कारण संविधान सभा का हिस्सा नहीं रहे, उस वक्त यूनाइटेड किंगडम (यूके) की पार्लियामेंट में इंडियन कांस्टीटूएंट असेंबली का बहुत कड़ा विरोध हुआ. और विरोध को दबाने के लिए नेहरू को यूके के नेताओं को समझाने के लिए ब्रिटेन जाना पड़ा था. इस विरोध की गंभीरता को इससे भी समझा जा सकता है कि कद्दावर नेता चर्चिल ने यहां तक कह दिया कि भारतीय लोग संविधान बनाने के लायक नहीं हैं. इन लोगों को आजादी देना ठीक नहीं होगा. दूसरी बात, ब्रिटिशर्स अल्पसंख्यकों के हितों को लेकर काफी गंभीर थे. तात्कालिक स्थिति में यूके पार्लियामेंट का कहना था कि अगर भारत में कंस्टीट्यूशनल सेटेलमेंट होता है तो इसमें अल्पसंख्यकों के हितों की गारंटी नहीं होगी. क्योंकि बाबासाहेब का कहना था कि शेड्यूल कॉस्ट और शेड्यूल ट्राइब नहीं हैं. खासतौर पर अछूत हिन्दू नहीं है. बाबासाहेब ने इसको साबित करते हुए अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए सेपरेट सेफगार्ड ( अलग विशेषाधिकार) की बात कही थी. बाबासाहेब की इस बात पर यूके के पार्लियामेंट में बहुत लंबी बहस हुई थी. इस बहस से यह स्थिति पैदा हो गई थी कि अगर भारत में अधिकार के आधार पर, बराबरी के अधिकार पर अल्पसंख्यकों (इसमें एससी, एसटी भी थे) के अधिकारों का सेटेलमेंट नहीं होगा तो भारत का संविधान नहीं बन पाएगा और इसे वैद्यता नहीं मिलेगी. और अगर संविधान नहीं बनेगा तो फिर भारत को आजादी (तथाकथित) नहीं मिलेगी. ऐसी स्थिति में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर को बाम्बे से चुनकर लाना कांग्रेस और पूरे देश की मजबूरी हो गई थी. यहां एक तथ्य यह भी कहा जाता है कि बैरिस्टर जयकर ने डॉ. आंबेडकर के लिए अपना त्यागपत्र दिया था. जबकि ऐसा नहीं है, बल्कि कांग्रेस के कुछ अगड़े नेताओं के साथ मतभेद होने के कारण जयकर ने इन सारी बातों से पहले ही अपना इस्तीफा दे दिया था.

यानि बाबासाहेब को दुबारा चुनकर लाना पूरे देश की मजबूरी हो गई थी. क्योंकि अगर बाबासाहेब को चुनकर नहीं लाया जाता तो देश का संविधान नहीं बन पाता और ऐसी स्थिति में भारत को आजादी मिलने में और वक्त लग सकता था. हालांकि ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के पास संविधान लिखने वाला कोई दूसरा नहीं था. बल्कि इसमें तथ्य यह है कि अगर बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर कांस्टीट्यूशनल असेंबली में नहीं होते तो भारत के अछूतों के अधिकारों का संवैधानिक सेटेलमेंट होने की बात नहीं मानी जाती और इससे भारत के संविधान को मान्यता नहीं मिलती. भारत को बड़े लोकतंत्र के तौर पर भी दर्जा नहीं मिल पाता. क्योंकि तब यह माना जाता कि संविधान में भारत के बड़े वर्ग (एससी/एसटी) के अधिकारों और स्वतंत्रता की बात संविधान में नहीं है. यह बात इससे भी साबित होती है क्योंकि एच. एल ट्राइव नाम के एक अमेरिकी संवैधानिक विशेषज्ञ ने कंस्टीट्यूशनल च्वाइसेस नाम की किताब लिखी है. उसमें उसका यह कहना है कि जब संविधान बनता है और उसमें बराबरी की बात होती है तो यह बराबरी दो तरह की होती है. एक कानूनी बराबरी होती है और दूसरी असली बराबरी होती है. जो कानूनी बराबरी होती है वो लोगों को समानता का अधिकार देती है.

भारतीय संविधान के तीन लक्ष्य माने जाते हैं. साथ ही इसकी तीन चुनौतियां भी हैं. संविधान का पहला लक्ष्य और चुनौती सामाजिक क्रांति है. दूसरा लक्ष्य एवं चुनौती राजनैतिक क्रांति है. इसी संदर्भ में तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कारक अल्पसंख्यक अधिकारों का सेटलमेंट है. जिस सामाजिक क्रांति की बदौलत भारत के संविधान का निर्माण हुआ, उसमें शाहूजी महाराज, जोतिबा फुले, नारायणा गुरु, बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर का बहुत बड़ा योगदान था. इन तमाम महापुरुषों के संघर्षों के बाद बाबासाहेब आंबेडकर के जरिए भारत में जो सामाजिक क्रांति आई, वह एकमात्र कारण है जिससे भारत के संविधान का निर्माण हुआ. यह नहीं होता तो भारत का संविधान नहीं होता. और अगर संविधान नहीं होता तो लोगों के मूलभूत अधिकारों की गारंटी भी नहीं होती. यानि बोलने की, लिखने की, अपनी मर्जी से पेशा चुनने की, संगठन खड़ा करने की, मीडिया चलाने की आजादी नहीं होती. जातिगत भेदभाव को गलत नहीं माना जाता, छूआछूत को कानून में अपराध घोषित नहीं किया जाता.

भारतीय लोगों को संविधान की जरूरत थी. संविधान की जरूरत इसलिए थी क्योंकि उनको एक राष्ट्र बनना था. संविधान के निर्माण के लिए कई समितियां बनी थी. इसमें से बाबासाहेब ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन और एडवाइजरी कमेटी, फंडामेंटल राइट सबकमेटी, माइनारिटी कमेटी और यूनियन कंस्टीट्यूशन कमेटी के सदस्य थे. भारतीय संविधान का इतिहकार Granville Austin ने एक किताब लिखी है, जिसमें उसने डॉ. अंबेडकर को भारतीय संविधान सभा का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति माना है. भारतीय संविधान एक बहुत लंबी प्रक्रिया के बाद बना. 30 अगस्त 1947 को इसकी पहली बैठक हुई. संविधान बनाने के लिए कंस्टीटूएंट असेंबली को 141 दिन का काम करना पड़ा. शुरुआती दौर में इसमें 315 आर्टिकल पर विचार किया गया था. 8 शेड्यूल डिस्कस किए गए थे. ड्राफ्टिंग कमेटी ने 343 आर्टिकल पर विचार किया, 13 आर्टिकल शेड्यूल किया. इसमें 7635 संशोधनों का प्रस्ताव किया गया था, जिसमें 2473 संशोधन संविधान सभा में लाए (मूव किए) गए. 395 आर्टिकल और 8 शेड्यूल के साथ भारत के लोगों ने भारत के संविधान को अपने प्रिय मुक्तिदाता बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के जरिए 26 नवंबर 1949 को भारत को सुपुर्द किया. आज भारत के संविधान में 448 आर्टिकल हैं. असल में नंबरों के हिसाब से यह आज भी 395 ही है लेकिन बीच-बीच में यह (1) (2) या फिर (a) और (b) के जरिए बढ़ता रहा है. यह 22 हिस्सों में विभाजित है और इसके 12 शेड्यूल हैं. संविधान बनने के बाद अब तक संसद के सामने 120 संशोधन लाए गए लेकिन इसमें से 98 संशोधन ही स्वीकार किए गए.

इस पूरी प्रक्रिया में विशेष यह है कि भारत ने जो संविधान बनाया उससे भारत के नागरिकों को मूलभूत अधिकार मिले. लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस समता, बंधुता, भेदभाव मुक्त भारत के उद्देश्यों को लेकर भारत का संविधान बना क्या वह हमें हासिल हो पाया है?  इस प्रश्न के आलोक में देखें तो यह हमें सौ फीसदी तो हासिल नहीं हो पाया है लेकिन यह कहा जा सकता है कि भारत के संविधान ने देश में चमत्कार (Miracle) कर के दिखाया है. दुनिया में जितना बड़ा चमत्कार पहले कभी नहीं हुआ, वह भारत में हुआ. देश का संविधान इसकी वजह बना. अगर विभिन्न देशों से तुलना कर के देखें तो इंग्लैंड के लोगों को भी अधिकार टुकड़ों में मिले. इंग्लैंड की महिलाओं को सबसे पहले 1920 में वोटिंग का अधिकार मिला. इसी तरह अमेरिका का संविधान 1779 में ही बन गया था लेकिन वहां के संविधान में ब्लैक लोगों को नागरिकता नहीं थी. 1865 में जब अमेरिकी संविधान में 13वां संशोधन लाया गया तब अमेरिका के काले लोगों को नागरिकता मिली. यहां यह बताना जरूरी है कि अमरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 1857 में काले लोगों को ड्रेड स्टॉक ( Dred Scott) केस में अमरिकी नागरिक मानने से इंकार कर दिया था. इस परिपेक्ष्य में अब्राहम लिंकन 1863 में 13वें संशोधन का प्रारूप लेकर आएं, जिससे काले लोगों को अमरिकी नागरिकता हासिल हुई. भारत का संविधान बनने तक अमेरिकी संविधान में वहां के ब्लैक का मामला पूरी तरह सुलझा नहीं था. 1965 में जाकर अमेरिका में ब्लैक का मामला कुछ हद तक सुलझ पाया. जबकि दूसरी ओर भारत के संविधान में सबसे पहले यह घोषित किया गया कि सभी मनुष्य समान हैं. जाति, धर्म, जन्म, वर्ण, वर्ग, स्थान आदि से परे देश के सभी मनुष्यों को बराबर माना गया. संविधान में साफ तौर पर लिखा गया कि भारत भूमि पर सर्व मनुष्य मात्र समान है. संविधान ने सबको एक सूत्र में पिरोते हुए सभी को ‘भारतीय’ माना और ‘हिन्दुस्तान’ नाम को मिटा दिया. (हिन्दुस्तान पेट्रोलियम जैसे नाम भी असंवैधानिक हैं.)

संविधान बनने के पूर्व भारत के दो-ढ़ाई हजार साल के इतिहास को देखने पर यह बात असंभव मालूम पड़ती है. लेकिन डॉ. आंबेडकर और भारत के संविधान के कारण यह संभव हो पाया. यह इसकी पहली देन है. संविधान की जो दूसरी देन है, वह यह कि जाति, धर्म, वर्ग, वर्ण, भाषा, स्थान, लिंग आदि जो-जो चीजें भारत के लोगों को बांटती थी, संविधान ने इस आधार पर भेदभाव को गैरकानूनी और असंवैधानिक घोषित कर दिया. साथ ही मनु द्वारा बनाए हिन्दू धर्म के सारे नियमों को अपराध घोषित कर दिया. संविधान के निर्माण के बाद जो तीसरी खास बात हुई, वह यह थी कि जिन लोगों ने इस देश पर शासन करने का सपना तक नहीं देखा था, संविधान के अधिकार मिलने के बाद इसे हकीकत में पूरा कर दिखाया. जिस देश में रानी के पेट से ‘राजा’ पैदा होता था, उस देश में ‘संविधान’ से राजा पैदा होने लगा. इस तरह से संविधान ने भारत के भविष्य का निर्माण किया है.

हालांकि भारत के पास इतना सुंदर संविधान होने के बावजूद भी वह एक बड़े संकट से गुजर रहा है. क्योंकि संविधान के जरिए सामाजिक क्रांति का जो लक्ष्य रखा गया था, वह उद्देश्य अब तक हासिल नहीं हो पाया है. दूसरा, संविधान के जरिए जिस राजनीतिक लोकतंत्र को हासिल करने का भरोसा जताया गया था, वह भी अभी अधर में ही है. तीसरा जो सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य है वह यह है कि भारत में जो वंचित तबका (डिस्क्रीमिनेटेड कम्यूनिटी) है, उसका सेटेलमेंट नहीं हो पाया है. क्योंकि जो गरीब हैं वह उसी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं (अपवाद छोड़कर) जो वंचित हैं. जो अशिक्षित हैं वह उसी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं जो वंचित हैं. 99 फीसदी मामलों में जिन महिलाओं का जबरन शोषण होता है, वह भी इसी डिस्क्रीमिनेटेड कम्यूनिटी से ताल्लुक रखती हैं. यह अपने आप में बहुत बड़ी समस्या है. हाल ही में संविधान के जरिए शिक्षा का, काम का और भोजन का अधिकार दिया गया है लेकिन इस तरह की योजनाएं इसलिए कारगर नहीं हैं क्योंकि इसे लागू करने वाले लोग ईमानदार नहीं हैं. 25 नवंबर 1949 को बाबासाहेब ने संविधान सभा में भाषण देते हुए कहा था कि संविधान कितना भी अच्छा हो वह अपने आप लागू नहीं होता है, उसे लागू करना पड़ता है. ऐसे में जिन लोगों के ऊपर संविधान लागू करने की जिम्मेदारी होती है, यह उन पर निर्भर करता है कि वो संविधान को कितनी ईमानदारी और प्रभावी ढ़ंग से लागू करते हैं. असल में भारतीय संविधान के सही ढ़ंग से लागू न हो पाने की वजह से सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले भारत के लोगों का विकास प्रभावित होने लगा है. यह तकरीबन रूक सा गया है. आज दुनिया में 7 बिलियन लोग हैं. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र ने एक बेहतर विश्व बनाने का सपना देखा है. हालांकि वह ऐसा करने में तब तक कामयाब नहीं हो सकता जब तक वो भारत के 120 करोड़ (एक बिलियन से ज्यादा) की आबादी की समस्याओं को हल नहीं कर देते. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र का जो सपना है कि दुनिया में समता हो, बंधुत्व हो, एकता तो, महिलाओं और दलितों की समस्या खत्म हो जाए तो इसमें वह तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक की भारत की समस्या खत्म नहीं हो जाती. यदि दुनिया को समता, बंधुत्व, गरीबी मुक्त, अशिक्षा मुक्त करना है, दुनिया को अगर मानवतावादी जगह बनानी है तो भारत में भारत के संविधान को सही तरीके से लागू करना होगा. दुनिया के लोगों ने जो सपना देखा है वह तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक भारत का संविधान कामयाब नहीं होता. यानि भारत के संविधान की कामयाबी ही दुनिया को कामयाबी के रास्ते पर ले जाने में सक्षम है. इसे उस रूप में लागू करना होगा, जिस रूप में इसे लागू करने का सपना बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने देखा था.

– लेखक सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं.

 

http://www.dalitdastak.com/news/ambedkar-make-constitution-was-made-future-of-india–2671.html

“ट्रोलर” शब्द को जानों ये वो लोग हैं जो सोशल मीडिया पर भीड़ बनाकर ब्राह्मणवाद विरोधी बातों करने वाले लोगों को गन्दी गली देते हैं ,धमकाते हैं , ताकि उसे लगे की वो अकेला और बेचारा है, और डर से वो सत्य बोलने बंद कर दे | ऐसे ट्रोल करने वालों के नाम डॉ ओम सुधा की प्यार भरी पाती ….डॉ. ओम सुधा

(मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया में ट्रोल की परिभाषा :
ट्रॉल इण्टरनेट स्लैंग में ऐसे व्यक्ति को कहा जाता है जो किसी ऑनलाइन समुदाय जैसे चर्चा फोरम, चैट रुम या ब्लॉग आदि में भड़काऊ, अप्रासंगिक तथा विषय से असम्बंधित सन्देश प्रेषित करता है। इनका मुख्य उद्देश्य अन्य प्रयोक्ताओं को वाँछित भावनात्मक प्रतिक्रिया हेतु उकसाना अथवा विषय सम्बंधित सामान्य चर्चा में गड़बड़ी फैलाना होता है। हमलावर प्रेषक के अलावा संज्ञा ट्रॉल का प्रयोग भड़काऊ सन्देश के लिये भी हो सकता है, जैसे “तुमने शानदार ट्रॉल पोस्ट किया”। यद्यपि शब्द ट्रॉल तथा इससे सम्बद्ध कार्य ट्रॉलिंग मुख्यतः इण्टरनेट सम्भाषण से जुड़े हैं, परन्तु हालिया वर्षों में मीडिया के अवधान ने इन लेबल का प्रयोग ऑनलाइन दुनिया से बाहर भी भड़काऊ एवं उकसाऊ कार्यों से जोड़ दिया है। )

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प्रिय ट्रोलरों, 

आज आपको यह ख़त लिखते हुए मैं भावुक हुआ जा रहा हूँ। अरे नहीं भाई, मैं मज़ाक नहीं उड़ा रहा हूँ। बल्कि, ये सच है। इसका सबसे बड़ा कारण ये है की वो आप ही हैं जिसने सोशल मीडिया पर मेरी पहचान बनाने में सबसे ज्यादा मदद की है। आप ट्रोलर ना होते तो हम कहाँ होते। जब भी मैंने कोई पोस्ट लिखा आप अपने अद्भुत-अनोखे गालियों के साथ आ गए और हमें गालियों से ही टोल दिया।
विद्या कसम खाकर कहता हूँ की मेरे जिस पोस्ट पर आपलोगों ने मुझे गालियाँ नहीं डी हैं, उसे सौ लाईक भी नहीं मिले हैं। सोशल मिडिया पर आपलोगों की महिमा अपरम्पार है। आपलोग कभी अकेले आते हैं कभी टोलियों में आते हैं। कसम से जिसदिन आप अपनी टोली के साथ मेरे किसी पोस्ट पर गालियों से आक्रमण करते हैं उस दिन मेरे पोस्ट की बल्ले बल्ले हो जाती है। आपलोगों के टोली निर्माण की प्रक्रिया भी अनुकरणीय है।
आप अपने बंधू ट्रोलर को कमेन्ट में टैग करके बाकायदा उनको निमंत्रण देते हैं। कसम से भाई साब मैं आपलोगों के उस तरीके का कायल हो गया हूँ। फिर तो धडाधड गालियाँ, एक से एक गालियाँ। दिन बन जाता है मेरा। फिर उस दिन मेरे फोल्लोवेर भी बढ़ जाते हैं। मेरे निर्माण में आपलोगों का जो अमूल्य योगदान है मैं साथ जनम में भी उस एहसान को नहीं चुका पाउँगा।
लोग आपको चाहे जो कहें पर आपकी भाषा का मैं कायल हूँ। कमाल की शब्दावली है आपकी। अद्भुत गालियाँ , मैं तो आपलोगों की क्रियेटिविटी पर हैरान हूँ। मुझे इस बात का बहुत दुःख है की आपलोगों की इस प्रतिभा को अबतक यथोचित सम्मान नहीं मिल पाया है। आपलोगों पर तंज कसने वालों ने कभी सोचा है की  आपलोग ना होते तो भारत में गालियों की समृद्ध परम्परा का कब का सत्यानाश हो गया होता। वो आप ही हैं की गालियों को ना केवल बचाया है बल्कि सोशल मिडिया पर इसे व्यापकता भी दी है।
आपलोगों से पूछने के लिए वैसे तो मेरे पास बहुत से सवाल हैं, पर आजकल सवाल पूछना देशद्रोह है इसलिए आग्रह पूर्वक एक दो बात पर आपसे जानकारी लेकर अपना ज्ञानवर्धन करना चाहता हूँ।  मैं यह जान्ने के लिए बहुत उत्सुक हूँ की  आपलोगों का गाली देने का कोई ओफ्फिसियल आवर है। जैसे हमलोग नौकरी पर जाते हैं दस से पांच या कभी भी आप गाली दे देते हैं।  आपलोग अपना नेट पैक खुद भरवाते हैं या कोई और डलवा देता है?
आपलोग किसी ऑफिस में बैठकर ट्रोलिंग करते हैं या कहीं से भी ? आपलोगों को ट्रोलिंग की ट्रेनिंग डी जाती है या ऐसे ही शुरू हो जाते हैं? आपलोगों का वेतन कैसे निर्धारित होता है। पर गाली कमीशन है या फिर मंथली पेमेंट मिलता है ? सवाल तो बहुत हैं पर मैं देशद्रोही होने का रिस्क नहीं ले सकता हूँ।
मेरी दिलचस्पी यह जान्ने में भी है की  आप अपने घर में इसी भाषा और इन्ही शब्दों का इस्तेमाल करते होंगे। भाई, पिता, बेटे के साथ ऐसी भाषा बोलते हैं तो चलेगा आखिर आपने उन्ही से सिखा होगा पर आपसे मेरा व्यक्तिगत  आग्रह है की अपने घर की महिलाओं के साथ ऐसे शब्दों का प्रयोग मत करियेगा। और हाँ, ये भी ध्यान रकियेगा की किसी माध्यम से उनको पता न चले की आप ऐसी भाषा में लिखते हैं। उनको बुरा लगेगा…

बहरहाल , थोडा लिखा है ज्यादा समझिएगा…

भारत माता की जय।।

                आपका अपना

Dr OM Sudha
डॉ ओम सुधा

 

(लेखक दलित चिंतक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

http://www.nationaldastak.com/story/view/dr-om-sudha-s-open-letter-to-trollers

 

इनके फेसबुक वेबपेज पर जाने का लिंक नीचे दिया है https:// http://www.facebook.com/IamWithRavishKumar/

NDTV 18-nov-2016 प्राइम टाइम इंट्रो :राष्ट्रवाद के नाम पर नियंत्रण का खेल|(दुनिया भर में राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीती चमकाने का ट्रेंड चल गया है) आजकल नए प्रकार के अथारीटेरियन (अधिकारवादी या सत्तावादी )सरकारों का उदय हो चुका है. ये सरकारें विपक्ष को खत्म कर देती हैं. थोड़ा बचा कर रखती हैं ताकि लोकतंत्र का भ्रम बना रहे… RAVISH KUMAR NDTV


प्राइम टाइम इंट्रो : राष्ट्रवाद के नाम पर नियंत्रण का खेल !!

दुनिया भर में सरकारों के कामकाज़ का तरीका बदल रहा है. सरकारें बदल रही हैं. धारणा यानी छवि ही नई ज़मीन है. उसी का विस्तार ही नया राष्ट्रवाद है. मीडिया अब सरकारों का नया मोर्चा है. दुनिया भर की सरकारें मीडिया को जीतने का प्रयास कर रही हैं. हर जगह मीडिया वैसा नहीं रहा जैसा होने की उम्मीद की जाती है. अमेरिका के चुनाव में डोनल्ड ट्रंप की जीत के बाद वहां लोग जागे तो जीते हुए को हराने की मांग करने लगे हैं. ट्रंप के ख़िलाफ़ रैलियां होने लगी कि आप हमारे राष्ट्रपति नहीं हैं. ट्रंप के बहाने फिर से उन्हीं सवालों पर बहस होने लगी है कि समय के बदलाव को पकड़ने में मीडिया और चिंतनशील लोग क्यों चूक जा रहे हैं. 19 नवंबर 2016 के इकोनोमिस्ट में एक लेख छपा है.

http://www.economist.com/news/international/21710276-all-around-world-nationalists-are-gaining-ground-why-league-nationalists
शीर्षक है लीग ऑफ नेशनलिस्ट. यह लेख इस सवाल की पड़ताल करता है कि पूरी दुनिया में राष्ट्रवाद का उभार क्यों हो रहा है. क्यों इस उभार को बड़े महानगरों में जमे बुद्धिजीवि नहीं समझ पा रहे हैं कि राष्ट्रवाद आज की राजनीति का अभिन्न अंग हो गया है. ट्रंप ने अपने भाषणों में अमेरिका के गौरव और सीमा रेखाओं पर दीवारें खड़ी करने का नारा दिया है. दुनिया के कई मुल्कों में इस तरह की बोली बोलने वालों के पीछे भीड़ आ रही है. यह गुस्सा है तो किसके खिलाफ गुस्सा है. किसकी नाकामी के खिलाफ गुस्सा है. ट्रंप ने खुलेआम कहा कि बाहर के मुल्कों से काम करने आए लोगों को अमेरिका से निकालेंगे. अमेरिका से बिजनेस करने वाली बाहर की कंपनियों में अमेरिकी लोगों की नौकरी के लिए कोटा मांगेंगे. मेक्सिको की सीमा पर दीवार बनाएंगे. इस तरह का राष्ट्रवाद आजकल हर जगह उभर रहा है. अपने मुल्क से मोहब्बत की यह शर्त ज़्यादा मुखर होने लगी है कि आप किसी और मुल्क से नफरत करते हैं. किसी के प्रति अविश्वास को उभारना होता है.
फ्रांस लंदन, पोलैंड, रूस, अमेरिका, ऑस्ट्रिया के नेता इन्हीं मुद्दों पर लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं. इन्हीं मुद्दों पर सत्ता में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं. ग्लोबल दौर में सब यही समझ रहे थे कि अब सब ग्लोबल नागरिक बन चुके हैं. ये तमाम नेता अतीत के गौरव की बात करते हैं. फिर से अमेरिका को महान बनाना है. भारत को सोने की चिड़िया का देश बनाना है. फ्रांस को महान बनाना है. फ्रांस से लेकर अमेरिका के नेता अपने मुल्कों का नाम पूरी दुनिया में फिर से रौशन करने की इस तरह से बातें कर रहे हैं जैसे क्लास रूम से ग्लोब खो गया है. लोग मुल्कों के नाम भूल गए हों और कोई कोलंबस या वास्कोडिगामा फिर से दुनिया को खोजने निकला हो.
पिछले साल न्यूयॉर्क टाइम्स में एक लेख छपा था. इकनोमिक्स की प्रोफेसर सर्जेई गुरीव और राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर डेनियल त्रेसमन का यह लेख कहता है कि आजकल नए प्रकार के अथारीटेरियन (अधिकारवादी या सत्तावादी )सरकारों का उदय हो चुका है. ये सरकारें विपक्ष को खत्म कर देती हैं. थोड़ा बचा कर रखती हैं ताकि लोकतंत्र का भ्रम बना रहे. इन सरकारों ने ग्लोबल मीडिया और आईटी युग के इस्तेमाल से विपक्ष का गला घोंट दिया है. अति प्रचार, दुष्प्रचार यानी प्रोपेगैंडा का खूब सहारा लिया जाता है. सेंशरशिप के नए नए तरीके आ गए हैं. सूचना संबंधी तरकीबों का इस्तमाल होता है ताकि रेटिंग बढ़ सके. नागरिकों को अहसास दिलाया जाता रहता है, आपके पास दूसरा विकल्प नहीं है. हमीं श्रेष्ठ विकल्प हैं. इस लेख में इन शासकों को नया ऑटोक्रेट कहा गया है जो मीडिया को विज्ञापन की रिश्वत देते हैं. मीडिया पर केस करने की धमकी देते हैं. नए नए निवेशकों को उकसाते हैं कि सरकार की आलोचना करने वाले मीडिया संस्थान को ही ख़रीद लें. मीडिया पर नियंत्रण इसलिए ज़रूरी है कि अब सब कुछ धारणा है. आपको लगना चाहिए कि हां ये हो रहा है. लगातार विज्ञापन और भाषण यकीन दिलाते हैं कि हो रहा है. ज़मीन पर भले न हो रहा हो.
रूस के राष्ट्रपति पुतीन ने पश्चिम की एक बड़ी पी आर कंपनी Ketchum को हायर किया ताकि वो क्रेमलिन के पक्ष में पश्चिम के देशों में लॉबी कर सकते. कुछ लोग पश्चिम के नेताओं को नियुक्त कर लेते हैं. जैसे नुरसुलतान ने टोनी ब्लेयर को किया या उनके किसी फाउंडेशन में चंदा दे देते हैं. इंटरनेट पर युद्ध सा चल रहा है. वहां लगातार ज़मीन कब्ज़े जैसा अभियान चल रहा है. गाली देने वाले और धमकाने वाले ट्रोल्स को पैसे देकर रखा जाता है. इनका काम होता है व्हाट्सऐप और ट्वीटर पर दिन रात विरोधी के खिलाफ अफवाहों का बाज़ार बनाए रखना. ये ट्रोल्स आपके कमेंट बाक्स को सत्ता पक्ष की बातों से भर देते हैं. आपकी आलोचना को गाली गाली देदेकर अहसास करा देते हैं कि पूरी दुनिया आपके खिलाफ है. विपक्ष की मीडिया साइट को खत्म करना भी इनकी रणनीति का हिस्सा होता है. पर पूरी तरह से विपक्ष को समाप्त नहीं किया जाता है. थोड़ा सा बचा कर रखा जाता है ताकि लोकतंत्र का भ्रम बना रहे.दुनिया भर में सरकारों के कामकाज़ का तरीका बदल रहा है. सरकारें बदल रही हैं. धारणा यानी छवि ही नई ज़मीन है. उसी का विस्तार ही नया राष्ट्रवाद है. मीडिया अब सरकारों का नया मोर्चा है. दुनिया भर की सरकारें मीडिया को जीतने का प्रयास कर रही हैं. हर जगह मीडिया वैसा नहीं रहा जैसा होने की उम्मीद की जाती है.अमेरिका के चुनाव में डोनल्ड ट्रंप की जीत के बाद वहां लोग जागे तो जीते हुए को हराने की मांग करने लगे हैं. ट्रंप के ख़िलाफ़ रैलियां होने लगी कि आप हमारे राष्ट्रपति नहीं हैं. ट्रंप के बहाने फिर से उन्हीं सवालों पर बहस होने लगी है कि समय के बदलाव को पकड़ने में मीडिया और चिंतनशील लोग क्यों चूक जा रहे हैं. 19 नवंबर 2016 के इकोनोमिस्ट में एक लेख छपा है.

शीर्षक है लीग ऑफ नेशनलिस्ट. यह लेख इस सवाल की पड़ताल करता है कि पूरी दुनिया में राष्ट्रवाद का उभार क्यों हो रहा है. क्यों इस उभार को बड़े महानगरों में जमे बुद्धिजीवि नहीं समझ पा रहे हैं कि राष्ट्रवाद आज की राजनीति का अभिन्न अंग हो गया है. ट्रंप ने अपने भाषणों में अमेरिका के गौरव और सीमा रेखाओं पर दीवारें खड़ी करने का नारा दिया है. दुनिया के कई मुल्कों में इस तरह की बोली बोलने वालों के पीछे भीड़ आ रही है. यह गुस्सा है तो किसके खिलाफ गुस्सा है. किसकी नाकामी के खिलाफ गुस्सा है. ट्रंप ने खुलेआम कहा कि बाहर के मुल्कों से काम करने आए लोगों को अमेरिका से निकालेंगे. अमेरिका से बिजनेस करने वाली बाहर की कंपनियों में अमेरिकी लोगों की नौकरी के लिए कोटा मांगेंगे. मेक्सिको की सीमा पर दीवार बनाएंगे. इस तरह का राष्ट्रवाद आजकल हर जगह उभर रहा है. अपने मुल्क से मोहब्बत की यह शर्त ज़्यादा मुखर होने लगी है कि आप किसी और मुल्क से नफरत करते हैं. किसी के प्रति अविश्वास को उभारना होता है.
फ्रांस लंदन, पोलैंड, रूस, अमेरिका, ऑस्ट्रिया के नेता इन्हीं मुद्दों पर लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं. इन्हीं मुद्दों पर सत्ता में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं. ग्लोबल दौर में सब यही समझ रहे थे कि अब सब ग्लोबल नागरिक बन चुके हैं. ये तमाम नेता अतीत के गौरव की बात करते हैं. फिर से अमेरिका को महान बनाना है. भारत को सोने की चिड़िया का देश बनाना है. फ्रांस को महान बनाना है. फ्रांस से लेकर अमेरिका के नेता अपने मुल्कों का नाम पूरी दुनिया में फिर से रौशन करने की इस तरह से बातें कर रहे हैं जैसे क्लास रूम से ग्लोब खो गया है. लोग मुल्कों के नाम भूल गए हों और कोई कोलंबस या वास्कोडिगामा फिर से दुनिया को खोजने निकला हो.
पिछले साल न्यूयॉर्क टाइम्स में एक लेख छपा था. इकनोमिक्स की प्रोफेसर सर्जेई गुरीव और राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर डेनियल त्रेसमन का यह लेख कहता है कि आजकल नए प्रकार के अथारीटेरियन सरकारों का उदय हो चुका है. ये सरकारें विपक्ष को खत्म कर देती हैं. थोड़ा बचा कर रखती हैं ताकि लोकतंत्र का भ्रम बना रहे. इन सरकारों ने ग्लोबल मीडिया और आईटी युग के इस्तेमाल से विपक्ष का गला घोंट दिया है. अति प्रचार, दुष्प्रचार यानी प्रोपेगैंडा का खूब सहारा लिया जाता है. सेंशरशिप के नए नए तरीके आ गए हैं. सूचना संबंधी तरकीबों का इस्तमाल होता है ताकि रेटिंग बढ़ सके. नागरिकों को अहसास दिलाया जाता रहता है, आपके पास दूसरा विकल्प नहीं है. हमीं श्रेष्ठ विकल्प हैं. इस लेख में इन शासकों को नया ऑटोक्रेट कहा गया है जो मीडिया को विज्ञापन की रिश्वत देते हैं. मीडिया पर केस करने की धमकी देते हैं. नए नए निवेशकों को उकसाते हैं कि सरकार की आलोचना करने वाले मीडिया संस्थान को ही ख़रीद लें. मीडिया पर नियंत्रण इसलिए ज़रूरी है कि अब सब कुछ धारणा है. आपको लगना चाहिए कि हां ये हो रहा है. लगातार विज्ञापन और भाषण यकीन दिलाते हैं कि हो रहा है. ज़मीन पर भले न हो रहा हो.
रूस के राष्ट्रपति पुतीन ने पश्चिम की एक बड़ी पी आर कंपनी Ketchum को हायर किया ताकि वो क्रेमलिन के पक्ष में पश्चिम के देशों में लॉबी कर सकते. कुछ लोग पश्चिम के नेताओं को नियुक्त कर लेते हैं. जैसे नुरसुलतान ने टोनी ब्लेयर को किया या उनके किसी फाउंडेशन में चंदा दे देते हैं. इंटरनेट पर युद्ध सा चल रहा है. वहां लगातार ज़मीन कब्ज़े जैसा अभियान चल रहा है. गाली देने वाले और धमकाने वाले ट्रोल्स को पैसे देकर रखा जाता है. इनका काम होता है व्हाट्सऐप और ट्वीटर पर दिन रात विरोधी के खिलाफ अफवाहों का बाज़ार बनाए रखना. ये ट्रोल्स आपके कमेंट बाक्स को सत्ता पक्ष की बातों से भर देते हैं. आपकी आलोचना को गाली गाली देदेकर अहसास करा देते हैं कि पूरी दुनिया आपके खिलाफ है. विपक्ष की मीडिया साइट को खत्म करना भी इनकी रणनीति का हिस्सा होता है. पर पूरी तरह से विपक्ष को समाप्त नहीं किया जाता है. थोड़ा सा बचा कर रखा जाता है ताकि लोकतंत्र का भ्रम बना रहे !!

RAVISH KUMAR ji from NDTV

गुजरात में दलितों का नया आंदोलन: जाति की निशानी सरनेम को हटाकर माता-पिता का नाम जोड़ा जा रहा…http://khabar.ndtv.com/

gujrat dalit protestअहमदाबाद: मेहसाणा के डॉ. नयन नंदाबेन जयंतीलाल पेशे से डॉक्टर हैं, लेकिन फिलहाल आईएएस की तैयारी कर रहे हैं. वर्ष 2013 में कौन बनेगा करोड़पति में जब उन्‍होंने 25 लाख रुपये जीते थे, तब इनका नाम नयन सोलंकी था, लेकिन अभी कुछ दिन पहले उन्‍होंने अपना सरनेम हटाकर माता-पिता का नाम जोड़ लिया है. मकसद है जाति व्यवस्था की निशानी को हटा देना औऱ साथ ही लिंगभेद के खिलाफ भी लड़ाई.

नयन कहते हैं कि उनके जन्म से लेकर उनके पूरे विकास में उनके माता और पिता दोनों का ही योगदान है तो हर जगह सर्टिफिकेट में सिर्फ पिता का नाम ही क्यों आता है.. दोनों को बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए. वो कहते हैं, ‘ये तो एक शुरुआत है, अगर ऐसे और विचार लेकर समाज आगे बढे़गा तो जाति व्यवस्था जैसी बुराईयां समाज के अंदर से खत्म की जा सकती हैं’.

ये पूरी मुहिम चला रहे हैं दलितों के कुछ संगठन. ऊना कांड के बाद बनी संघर्ष समिति के कार्यकर्ता कौशिक मंजुला बाबुभाई का कहना है कि ‘ये लड़ाई जाति व्यवस्था और लिंगभेद दोनों के खिलाफ है. वो कहते हैं कि ये विचार पहले से ही चल रहा है, लेकिन ऊना कांड में जाति व्यवस्था के नाम पर दलितों के साथ जो बर्बरता नजर आई, उसके बाद इस विचार का अमल तेज़ हो गया है.

उनका दावा है कि अब तक करीब 50 से ज्यादा लोग ये विचार अपना चुके हैं, जिसमें पूरे गुजरात से डॉक्‍टर, वकील समेत कई ऐसे लोग हैं, जो जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ना चाहते हैं.

 जातिसूचक सरनेम हटाने के आंदोलन पहले भी चलते रहे हैं. बिहार में जयप्रकाश नारायण के कहने पर कई लोग आज भी अपने सरनेम में कुमार या कुमारी लगाते हैं, जिससे जाति सूचकता खत्म हो गई है, लेकिन पहली बार ये कमान उन लोगों के हाथ में दिख रही है जो जाति व्यवस्था की मार सबसे ज्यादा झेलते रहे हैं.

दलित संगठन आने वाले समय में इस मुहिम को लेकर और भी कार्यक्रम करने वाले हैं, लेकिन इन्हें लगता है कि सवर्ण लोग भी अगर जुड़ें तो समाज सुधार में और भी सफलता मिल सकती है.

संविधान की ‘समीक्षा’ बनाम संविधान की ‘सुरक्षा’…प्रो. रतन लाल

यह पोस्ट मेरी ओर से सफाई भी है और भारत में ‘दलित/सर्वहारा’ मुक्ति की चुनौतियों को समझने का अल्प प्रयास भी है. इसलिए पहले सफाई:

पिछले डेढ़ वर्ष से ही सोशल मीडिया पर एक्टिव हुआ हूँ. अपने अल्प-ज्ञान से थोड़ा बहुत लिखने का प्रयास करता रहता हूँ. आपके कमेंट्स मेरी समझ को बढ़ाने ऑक्सीजन का काम करते रहते हैं, लेकिन मेरे कुछ मित्रों को मेरे बारे में कुछ गलतफहमी हुई है. मैं न तो कोई बड़ा सिद्धांतकार हूँ और न ही नेता. पारिवारिक और व्यवसायिक जीवन से जो समय बचता है, थोड़ा-बहुत लिख लेता हूँ और यदा-कदा प्रगतिशील आन्दोलनों में भागीदारी भी कर लेता हूँ. इसलिए आपके सभी सवालों का जवाब देने में और सभी समस्यायों का समाधान ढूँढने में असहाय और असमर्थ महसूस करता हूँ.

प्रसिद्द समाजशास्त्री हैबरमॉस ने कहा है कि अब दुनिया Mono-Causal होगी, अर्थात् किसी एक मुद्दे के इर्द-गिर्द आन्दोलन का स्वरुप तय होगा और फिर विस्तार. जैसे – बीजेपी ‘राम-राम’ करते-करते आज सबसे बड़ी ‘राष्ट्रवादी’ पार्टी बन है है और मिथकीय राम उनके ‘राष्ट्र’ का पर्याय. इस बात को थोड़ा सरल तरीके से समझने की कोशिश करता हूँ. मान लीजिए पानी में लोहा काटना हो तो कैसे कटता है, वेल्डिंग मशीन तो पानी में जा नहीं सकता? लोहे को पानी की धार से ही काटा जाता है, अर्थात पानी के concentration लेवल को बढ़ाकर. शायद आन्दोलन में भी यही फार्मूला लागू होगा, या होता है. इसलिए जो साथी दुनिया की सारी समस्यायों का एक साथ समाधान करना चाहते हैं, उन्हें उनका प्रयास मुबारक.

बहरहाल, प्रसिद्द इतिहासकार D.D. Kosambi ने लिखा है, “मार्क्सवाद इतिहास का पर्याय नहीं, इतिहास को   समझने की एक विधि है.” लेनिन ने मार्क्स को अपने काल और परिस्थिति के अनुसार पढ़ा, माओ ने भी अपनी काल और परिस्थिति के अनुसार मार्क्स को पढ़ा– नतीजा सामने है. बाद की स्थितियों पर अभी मैं नहीं जाना चाहता, लेकिन यह तो सत्य है कि लेनिन और माओ ने क्रांति को ज़मीन पर उतारा. अब यक्ष प्रश्न यह है कि भारत के ‘क्रांतिकारियों’ ने मार्क्स को भारत की परिस्थितियों के अनुसार ज़मीन पर उतारा– शायद नहीं! क्या वे वर्ग, जाति, जेंडर, और ‘संस्कृति’ के संबंधों में ‘शक्ति’ के ‘सम्बन्ध’ और ‘खेल’ को समझ पाए– शायद  नहीं. इस विषय पर कभी विस्तार से!

अब प्रश्न है, कैसे हो बदलाव? दुनिया भर में क्रांतियों का इतिहास बतलाता है कि इन क्रांतियों की वैचारिक अगुआई बुद्धिजीवी वर्ग ने की है. यदि मार्क्सवादी शब्दावली में कहें तो बुर्जुआ वर्ग ने नेतृत्व प्रदान किया है. लेकिन क्या भारत में दलितों, आदिवासियों या ‘पिछड़ों’ का वह वर्ग तैयार हुआ है– शायद नहीं! आज़ादी के बाद आरक्षण के द्वारा थोड़ा बहुत जो लोग पढ़ पाए, वे अधिकारी, डॉक्टर और इंजिनियर बने. पहली पीढ़ी थी, घर-परिवार संभालना इत्यादि में ही जीवन गुजर गई. फिर व्यवसायिक सेंसर और अपने बड़े अधिकारीयों एवं नेताओं के ‘मनुवादी’ आतंक ने उन्हें हमेशा डर के साए में  ही रखा. इसलिए संभव है मजबूरन उन्हें ‘चुप्पी’ बनाए रखना पड़ा.  आखिर यह बौद्धिक जमात कहाँ से आएगा?

विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों ही बौद्धिक निर्माण के केंद्र हैं. लेकिन एक साजिश के तहत विश्वविद्यालयों और शोध संस्थान से इस पूरे ‘जमात’ को बाहर रखा गया. अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में 1997 में और पिछड़ा वर्ग के लिए 2007 में आरक्षण लागू किया गया. लेकिन  क्या इन वर्गों को इन संस्थानों में समुचित प्रतिनिधित्व मिला? यक़ीनन नहीं, अभी भी पर्याप्त हेरा-फेरी है. फिर भी कुछ लोग शिक्षण संस्थानों में आये हैं. लेकिन ज्यादातर लोग पहली पीढ़ी के ही हैं, इसलिए घर-परिवार इत्यादि की उलझनें तो हैं ही, ‘मनुवादी’ सोच वाले प्रिंसिपल, वाईस-चांसलर, डायरेक्टर का आतंक अलग से. इसलिए ज्यादातर लोग डर के मारे अपने संस्थान में ही नहीं बोल पाते, व्यवस्था पर क्या बोलेंगे?

हाँ, यह बात जरुर है कि अब कुछ लोगों ने लिखना-पढ़ना, व्यवस्था पर प्रश्न उठाना शुरू कर दिया है. लेकिन समस्या यह है कि जैसे दुनिया का हर ‘क्रांतिकारी’ अपने को ज्यादा ‘क्रांतिकारी’ और दूसरे को प्रति-क्रांतिकारी समझता है, उसी तरह से वंचितों की यह छोटी सी ‘बौद्धिक’ जमात, आपस में ही एक दूसरे से बड़ा ‘सिद्धान्तकार’ और ‘क्रांतिकारी’ साबित करने में लगा हुआ है. ऐसे ज्यादातर ‘बुद्धिजीवी’ चाहते है कि इन्हें हर जगह मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया जाय, TA, DA भी मिले, ज़मीन बंगला भी हो और लोग इन्हें ही सबसे बड़े ‘क्रांतिकारी’ समझें.

जनाब, जिस दिन आप एक कार्यकर्ता बनकर लोगों के लिए दरी बिछाना शुरू कर देंगे, जेब से कुछ पैसा ढीला करना शुरू कर देंगे, स्थितियां जरुर बदलेंगी. मैं आशावादी हूँ, इतना तो स्पष्ट है विचार मंथन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. विश्वविद्यालयों में बढ़ते प्रतिनिधित्व और लगातार दमन इस बात का प्रतीक है कि परंपरागत सोच वालों को दर्द होना शुरू हो गया है. रोहित वेमुला ही ‘आत्म-हत्या’, और देश भर के विश्वविद्यालयों में ‘परम्पगत’ मानसिकता पर सवाल उठाने वाले शिक्षकों और छात्रों का दमन अकारण नहीं है.

अब थोड़ी सी चर्चा संविधान की:

संविधान को लेकर आजकल दो तरह की चर्चाएँ आम हैं: पहला, ‘संघ परिवार’ बार-बार संविधान की समीक्षा की बात कर रहा है और दूसरा देश में कई संगठन हैं जो संविधान बचाओ आन्दोलन चला रहे हैं. अब प्रश्न है कि संविधान समीक्षा के क्या निहितार्थ हैं? क्या इसके प्रजातंत्रीय और संघीय स्वरुप को बदल कर ‘हिंदूवादी’, मनुवादी संविधान बनाने की मंशा है? मैं समझता कोई भी दस्तावेज़, ‘सम्पूर्ण’ और ‘पवित्र’ नहीं होता. काल, परिस्थित और परिवर्तन के अनुसार उस दस्तावेज़ में भी परिवर्तन/संशोधन होते हैं. भारत के संविधान में लगातार संशोधन का होना भी इस बात का प्रमाण है.

हाँ, यदि संघ-परिवार, संविधान की समीक्षा कर उसे ‘हिंदूवादी’ स्वरुप में बदलने का प्रयास कर रहा है, तो उसका विरोध करने की जरुरत है. कम से कम यह तो प्रयास करने की जरुरत है कि संविधान हमें जो मौलिक और अन्य अधिकार देता है उसकी रक्षा हो सके.
अंत में,

आखिर कौन घबराता है ‘समीक्षा’ से? 

समीक्षा तो इस बात कि होनी चाहिए कि आज़ादी के सत्तर साल बाद भी संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित स्वतंत्रता, समता, बंधुता और न्याय क्यों नहीं प्राप्त किया जा सका है? देश में अमीरी और गरीबी की खाई क्यों बढ़ती जा रही है? चालीस प्रतिशत से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे क्यों है? अल्पसंख्यक, दहशत में क्यों है? संसाधनों में समुचित भागीदारी क्यों नहीं हुई है?

देश के तमाम संसाधन – अर्थ, राजनीति, अफसरशाही, न्यायपालिका, शिक्षा – कुछ परिवारों और समुदायों के नियंत्रण में क्यों है? यदि संविधान की ‘समीक्षा’ इस दिशा में हो तो स्वागत है, नहीं तो………संघर्ष जारी रहे!!! जय भीम!!!!

नोट: भाषा मर्यादित रखें, परिवर्तन धैर्य का काम है, थोड़ा धैर्य रखें और ईमानदार प्रयास जारी रखें!
source: http://www.nationaldastak.com/story/view/-constitution-review-versus-his-security

   

prof-ratan-lal

Dilip C Mandal Speech At Bamcef Convention 2016 on burning topics like Govt. Policies for SC/ST/OBC & Minorities, Juvenile justice, Caste census, Brahminical controlled Media,Reservation Cap, Caste controlled Bureaucracy,one dominant caste in savarnas etc. in HINDI

 

Dilip C Mandalp एक जंतर देते हैं…
आप 99.99 प्रतिशत किसी भारतीय की जाति का पता कर सकते हैं. बस उनसे हौले से पूछ लीजिये की जाति जनगणना होनी चाहिए या नहीं …
अगर वो जाति जनगणना से मना करता है तो वो सवर्ण है ..
अगर चाहता है तो बहुजन है..
ट्राय करिए , अगर गलत निकला तो जंतर के पैसे वापस…

hazari-prasad-dwedi