ज्ञान का मार्ग


एक समय भगवान बुद्ध श्रावस्ती में मिगारमाता के पुष्वाराम मे विहार कर रहे थे. धम्म का ज्ञान प्राप्त करने और बुद्ध को सुनने के लिये मोग्गालन नामक ब्राहमण लेखाकार भी अकसर वहां आता था. एक दिन वह कुछ जल्दी आ गया और भगवान को अकेले पाकर बोला, “भगवन, मेरे मन में यह प्रश्न उठता है कि आपके पास बहुत दूर से आनेवाले कुछ लोग तो कम समय में ही परम ज्ञान को उपलब्ध हो जाते हैं पर बहुत से लोग लंबे समय से आपके निकट रहते हुए भी इस सुख की प्राप्ति नही कर पाते हैं. आप जैसा अद्भुत शिक्षक और पथप्रदर्शक होते हुये भी कुछ को निर्वाण सुख प्राप्त होता है और कुछ को नही? तो भगवन, अपनी करुणा से ही आप सबको निर्वाण सुख दे कर भवसागर से मुक्ति क्यों नही प्रदान कर देते?” बुद्ध ने मोग्गालन से कहा, ” ब्राहमण, मै तुम्हें इस प्रश्न का उत्तर दूंगा, लेकिन पहले तुम मुझे यह बताओ कि क्या तुम राजगृह (राजगिरी) आने-जाने का मार्ग अच्छी तरह से जानते हो?” मोग्गालन मे कहा, “गौतम, मैं निश्चित ही राजगृह का आने-जाने का मार्ग भली प्रकार से जानता हूँ.” बुद्ध ने कहा, “अब तुम मुझे बताओ, कोई आदमी आता है और तुमसे राजगृह का मार्ग पूछता है लेकिन उसे छोड़कर वह अलग मार्ग पकड़ लेता है. तुम उसे पूर्व में जाने को कहते हो पर वह पश्चिम में चल देता है. फिर एक दूसरा आदमी आता है और वह भी तुमसे रास्ता पूछता है और तुम उसे उसे भी ठीक-ठीक वैसे ही रास्ता बताते हो जैसा तुमने पहले को बताया था और वह तुम्हारे बताये रास्ते पर चलकर सकुशल राजगृह पहुँच जाता है. यदि पहले व्यक्ति ने तुम्हारे बताये मार्ग का अनुसरण नहीं किया तो क्या इसमें तुम्हारा दोष बनता है?” ब्राहमण बोला, “भगवन, यदि पहला व्यक्ति मेरी बात पर ध्यान नहीं देता तो मैं क्या कर सकता हूँ? मेरा काम तो केवल रास्ता बताना है.” भगवान बुद्ध बोले, “तो ब्राहमण, तथागत का काम भी केवल मार्ग बताना होता है.”

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