श्री राम बाबु गौतम जी व डॉ प्रभात टंडन के कमेन्ट


 श्री राम बाबु गौतम जी व डॉ प्रभात टंडन के लेख

” जब भारत विश्व गुरु था वो केवल बौध काल ही था ” 

कमेन्ट इतने बेहतर और ज्ञान वर्धक हैं की मैं उन्हें पोस्ट के रूप में इस वेबसाइट पर प्रकाशित कर रहा हूँ

आप दोनों को  धन्यवाद देते होए निवेदन है की आप इस विषय पर अपने लेख भेजें हम उन्हें प्रकाशित करेंगे

आ.  जिलेराज जी,
             नमो बुद्धाय:
आपने बौद्ध काल का इतिहास और उसके समय के विकास का बहुत ही सार्थक शब्दों में
विवेचन किया है | मैंने बौद्ध -गया, सारनाथ, कुशीनगर, पावा (बुद्ध ने अंतिम भोजन किया) ,
केशरिया स्तूप ( जहां राजशाही बस्त्र उतार कर चीवर धारण किया ), वैशाली ( जहां पर
राज नर्तकी – आम्रपाली ने भगवान् बुद्ध को खाने पर आमंत्रित किया , इसी जगह पर एक
लोकतान्त्रिक सत्ता प्रणाली का विकास राजा विशाल के गढ़ में हुआ, हिंदी- पाली देवनागरी
भाषा का विकास हुआ तथा गुप्त काल में ही आज के समय में प्रयोग होने वाली ईंटों का
आविष्कार भी हुआ ), नालंदा – राजगिरी आदि स्थान देखे हुए हैं और जब इनके वारे में
पढता हूँ तो उन स्थानों की याद आती है | बुद्ध की प्रतिमा और उनकी भूमि से सदा के
लिए जुड़ जाता हूँ |
आज मनुवादी इन जगहों पर हिन्दू वादी मंदिरों का निर्माण करके उसे हिन्दू धर्म से जोड़ने
की कोशिश में हैं जो नामुमकिन होगा | हमारे समाज के अलाबा आज अन्य समाज के लोग
भी बुद्ध की  सच्चाई को जान चुके हैं | ब्राह्मणों ने इसे संस्कृत में उतार कर या अनुवाद कर
सारा इतिहास जला दिया है | जिसका प्रमाण आज जला हुआ नालंदा विश्वविद्यालय है |
जहां का वर्णन चीनी यात्री फाहियान और ह्वेनसांग किया है | बुद्ध इतिहास के ये एक बहुत
बड़े प्रमाण हैं जिसके कारण बुद्ध और बुद्ध की शिक्षा का इतना विकास संभव हो सका |
विदेशों (श्री लंका) की धरती पर बुद्ध -धर्म; सम्राट अशोक जैसे महान शासकों द्वारा ले
जाया गया और आज तक उसे संरक्षण देकर सुरक्षित रखा गया |
आपने भी एक सम्माननीय कार्य इस वेब साईट को रच कर किया है | जिससे बुद्ध के ज्ञान
और उसकी अवधि निरंतर बढ़ेगी | आपको बधाई हो |
सादर आभार के साथ – रामबाबू गौतम, न्यू जर्सी
 
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युद्ध नहीं अब बुद्ध चहिए ।
मानव का मन शुद्ध चाहिए ॥

सत्य, अहिंसा, विश्व बंधुता, करुणा, मैत्री का हो प्रसार।
पंचशील अष्टांग मार्ग का पुनः जग में हो विस्तार ॥
समता, ममता, और क्षमता, से, ऐसा वीर प्रबुद्ध चाहिए ।

युध्द नहीं अब बुध्द चहिए ।
मानव का मन शुध्द चाहिए ॥

कपट, कुटिलता, काम वासना, घेर रगी है मानव को ।
कानाचार वा दुराचार ने, जन्म दिया है दानव को ॥
न्याय, नियम का पालन हो अब, सत्कर्मो की बुध्दि चाहिए ।

युध्द नहीं अब बुद्ध चहिए ।
मानव का मन शुद्ध चाहिए ॥

मंगलमय हो सब घर आँगन, सब द्वार बजे शहनाई ।
शस्य श्यामता हो सब धरती, मानवता ले अंगड़ाई ॥
मिटे दीनता, हटे हीनता, सारा जग सम्रद्ध चहिए ।

Dr Prabhat Tandon

 

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