उत्तर भारत में भी दिखेगा लार्ड बुद्धा टीवी चैनल TATA SKY 1064 channel

उत्तर भारत में भी दिखेगा लार्ड बुद्धा टीवी चैनल

Lord Buddha TV उपलब्ध है ;-
. टाटा स्काई चंनेल नंबर 1064,
वीडियोकॉन D2H 493,
इन केबल महाराष्ट्र मुम्बई 532,
 हैथवे देल्ही आणि हरियाणा,854,
GTPL गुजरात 597,
DEN मुम्बई 875,
DEN Delhi 199,
ICC Pune 869,
Hathway कर्नाटक 741,
केरल त्रावणकोर डिजिटल 536,
आंध्रप्रदेश सिटी केबल 621,
आसाम V एंड S केबल 827,
 मिज़ोरम Zonet डिजिटल 193,
 गोवा भीमारिद्धि डिजिटल 518,
झारखंड GTPL 852,
बिहार मौर्य सिटी केबल 575,
ओरिसा EM डिजिटल 412,
वेस्ट बंगाल सिटी नेटवर्क 552,
 वेस्ट बंगाल डीजी केबल 892,
 उत्तराखंड त्रिवेणी डिजिटल 706,
 उत्तरप्रदेश सिटी केबल 561,
उत्तरप्रदेश आगरा sea डिजिटल 565,
 उत्तरप्रदेश मुजफ्फरनगर शर्मा डिजिटल केबल 406,
 उत्तरप्रदेश लखनऊ डेन केबल 879,
राजस्थान सिटी केबल 561,
राजस्थान उधमपुर नेटवर्क 670,
छत्तीसगढ़ सिटी 561 आणि 537,
छत्तीसगढ़ हैथवे 854,
मध्यप्रदेश सिटी केबल 561,
इंदौर SR 476,
मध्यप्रदेश Damoh Digital 724,
महाराष्ट UCN विदर्भ 466
.. जयभीम

दलितों और शोषितों की आवाज बुलंद करने वाला बुद्धा टीवी चैनल अब उत्तर भारत में भी जल्दी ही प्रसारित होगा. इस संबंध में बीते 25 मार्च को चैनल की ओर से जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें चैनल को उत्तर भारत में सुचारू ढंग से प्रसारित करने पर चर्चा हुई. कार्यक्रम को आयोजित करने का मुख्य उद्देश्य राज्य और भाषा दोनो दृष्टियों से इस चैनल का प्रसार करना था. कार्यक्रम में बुद्धा टी.वी. चैनल के संस्थापक तथा अध्यक्ष “भैयाजी खेरकर” (महाराष्ट्र), प्रो. विमल थोराट (जे.एन.यू.), अयूर इण्डिया टी.वी. के श्री आर.के. पाशान, उत्तर भारत में बुद्धा टी.वी. चैनल का काम संभालने वाले राजकुमार गौतम (ग़ाज़ियाबाद) सहित डॉ. एस.एन. गौतम और राष्ट्रीय शोषित परिषद के अध्यक्ष जय भगवान जाटव सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे.

कार्यक्रम को सबसे पहले बुद्धा टी.वी. चैनल के संस्थापक भैयाजी खेरकर ने सम्बोधित किया. उन्होंने चैनल की स्थापना में आने वाली अड़चनों की विस्तार से चर्चा की. उन्होंने बताया कि चैनल प्रसारित करने के लिए केबल ऑपरेटरों ने 50 करोड़ की माँग की थी तथा चैनल को शुरू करने में लगभग 100 करोड़ का आंकड़ा बताया. लेकिन अपनी सूझबूझ और अटल इरादों के बल पर उन्होंने ऐसी अनोखी पहल की जिससे बिना ऑपरेटरों को पैसा बाँटे ही नागपुर से इसके प्रसारण की शुरुआत हो गयी. इस चैनल को शुरू करवाने के लिए खेरकर जी ने अपने सहयोगियों के साथ व्यापक रणनीति बनाते हुए लोगों को इन ब्राह्मणवादी मानसिकता वाले प्रसारकों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया. नागपुर के बौद्ध सहित वहां की जनता ने भी पूरा साथ देते हुए ऑपरेटर्स को धमकियां देना शुरू किया कि यदि उनके सौ चैनल के बदले बौद्धों का एक चैनल प्रसारित नहीं किया गया तो वे लोग अपना कनेक्शन कटवा लेंगे. इस धमकी से प्रसारक बिना शुल्क के ही इस चैनल को प्रसारित करने पर राजी हो गए. नागपुर, अकोला सहित विदर्भ के 11 जिलों में यह चैनल दिखाया जाने लगा. इसी प्रकार महाराष्ट्र के अन्य भागों में भी लोगों ने इसी प्रकार संघर्ष करके इस चैनल की शुरुआत कराई. मुंबई में दादर से इसके प्रसारण की शुरुआत हुई.

खेरकर जी ने ये भी बताया कि चेम्बूर में लगभग 1500 लोग इस चैनल को शुरू कराने के लिए सड़कों पर उतर आये थे. पुणे एवं औरंगाबाद जिलों में प्रशासनिक हस्तक्षेप के द्वारा इस चैनल की शुरुआत कराई गयी. भैयाजी खेरकर ने भारतीय मीडिया पर धर्मनिरपेक्ष न होने का आरोप लगाते हुए कहा कि बोधगया में हर साल लगभग 200 देशों के बौद्ध अनुयायी आते हैं और विशाल एवं भव्य कार्यक्रम होते हैं लेकिन उनका लाइव प्रसारण कभी नहीं दिखाया जाता जबकि नासिक और इलाहाबाद में होने वाले कुम्भ मेलों का लाइव प्रसारण दिखाया जाता है. इसके अतिरिक्त उन्होने बताया कि इस भारतवर्ष पर प्राचीन काल के सभी महापुरुषों में से सर्वाधिक एहसान तथागत बुद्ध का तथा आधुनिक भारत पर बाबा साहब का है लेकिन पूर्वाग्रह से ग्रस्त भारतीय मीडिया इन बातों को लोगों को न तो बताना चाहती है और न ही दिखाना चाहती है. उन्होने ये भी कहा कि बाबा साहब ने दलितों पर कम, भारतवर्ष पर ज्यादा एहसान किया है लेकिन यहां की तथाकथित चौथा स्तम्भ यानि मीडिया उन्हे केवल दलितों का मसीहा कहकर उनके व्यक्तित्त्व को एकदम सीमित कर देती है.

इन सभी बातों को घर-घर तक पहुँचाने के लिए उन्होने दिल्ली के प्रबुद्ध वर्ग का आह्वान करते हुए चैनल की शुरुआत के लिए महाराष्ट्र जैसे संघर्ष का नारा बुलन्द किया. कार्यक्रम के एक अन्य वक्ता आर.के. पाशान ने बुद्धा टी.वी. चैनल को चलाने के लिए सबको आगे आकर संघर्ष करने का आह्वान किया. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रो. विमल थोराट ने चैनल की उपयोगिता एवं महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्तमान में सारे चैनलों की चाबी या तो ब्राह्मण वर्ग के हाथ में है या फिर उस मानसिकता वाले लोगों के हाथ में है, ऐसी स्थिति में यह बहुत आवश्यक है कि सारे लोग मिलकर इस चैनल को आरम्भ करवाने के लिए संघर्ष करें और विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए तन-मन-धन से सहयोग के लिए आगे आएं. दिल्ली में चैनल के प्रसारण की जिम्मेदारी संभालने वाले राजकुमार गौतम जी ने बताया कि बुद्धा टी.वी. चैनल की शुरुआत उत्तर प्रदेश में 14 अक्टूबर सन् 2011 को गाजियाबाद से हुई और अब वे इसे पूरे दिल्ली प्रदेश में प्रसारित करवाने के लिए प्रयासरत हैं. अन्य वक्ताओं में फ़िल्म इंस्टीट्यूट पुणे से 1974-75 में ऐक्टिंग के क्षेत्र में स्नातक तथा दलित समाज की एवं महिलाओं की समस्याओं को आवाज देने वाली सुजाता पारमिता, डॉ. एस.एन. गौतम, आसाराम गौतम और जय भगवान जाटव ने भी कार्यक्रम को सम्बोधित किया. कार्यक्रम में जवाहरलाल नहरू विश्वविद्यालय के छात्रों एवं अध्यापको सहित दिल्ल्ली तथा आसपास के कई कार्यकर्ता सहित अनेक गण्यमान्य लोग उपस्थित थे.

गौरतलब है कि बुद्धा टी.वी. चैनल की शुरूआत 26 नवम्बर 2010 को दीक्षाभूमि नागपुर से हुई थी. भारत में बौद्ध जगत के प्रसार के लिए उठाया गया यह पहला इलेक्ट्रॉनिक मीडिया है. वर्तमान में यह चैनल 4 राज्यों में प्रसारित हो रहा है. इनमें से पूरे महाराष्ट्र सहित मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के 70% भाग में तथा कर्नाटक के 30% भाग में सुचारू रूप से चल रहा है.
-शत्रुध्न प्रकाश
(साभार : दलित मत @ http://dalitmat.com/index.php/kala-sahitya/1057-lord-buddha-tv-in-north-india.html)

 

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Topic: Weekly Buddh Vihar session at 9:30AM EST on Sunday
Date: Sunday, March 25, 2012
Time: 9:30 am, Eastern Daylight Time (Indiana, GMT-04:00)
Meeting Number: 804 082 670
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बुद्धचरितम / Budhcharit

बुद्धचरितम / Budhcharit

बुद्धचरित महाकवि अश्वघोष की कवित्व-कीर्ति का आधार स्तम्भ है, किन्तु दुर्भाग्यवश यह महाकाव्य मूल रूप में अपूर्ण ही उपलब्ध है। 28 सर्गों में विरचित इस महाकाव्य के द्वितीय से लेकर त्रयोदश सर्ग तक तथा प्रथम एवम् चतुर्दश सर्ग के कुछ अंश ही मिलते हैं। इस महाकाव्य के शेष सर्ग संस्कृत में उपलब्ध नहीं है। इस महाकाव्य के पूरे 28 सर्गों का चीनी तथा तिब्बती अनुवाद अवश्य उपलब्ध है। महाकाव्य का आरम्भ बुद्ध के गर्भाधान से तथा बुद्धत्व-प्राप्ति में इसकी परिणति होती है। यह महाकव्य भगवान बुद्ध के संघर्षमय सफल जीवन का ज्वलन्त, उज्ज्वल तथा मूर्त चित्रपट है। इसका चीनी भाषा में अनुवाद पांचवीं शताब्दी के प्रारम्भ में धर्मरक्ष, धर्मक्षेत्र अथवा धर्माक्षर नामक किसी भारतीय विद्वान ने ही किया था तथा तिब्बती अनुवाद नवीं शताब्दी से पूर्ववर्ती नहीं है। इसकी कथा का रूप-विन्यास वाल्मीकि कृत रामायण से मिलता-जुलता है।

  • बुद्धचरित 28 सर्गों में था जिसमें 14 सर्गों तक बुद्ध के जन्म से बुद्धत्व-प्राप्ति तक का वर्णन है। यह अंश अश्वघोष कृत मूल संस्कृत सम्पूर्ण उपलब्ध है। केवल प्रथम सर्ग के प्रारम्भ सात श्लोक और चतुर्दश सर्ग के बत्तीस से एक सौ बारह तक (81 श्लोक) मूल में नहीं मिलते हैं। चौखम्बा संस्कृत सीरीज तथा चौखम्बा विद्याभवन की प्रेरणा से उन श्लोकों की रचना श्री रामचन्द्रदास ने की है। उन्हीं की प्रेरणा से इस अंश का अनुवाद भी किया गया है।
  • 15 से 28 सर्गों की मूल संस्कृत प्रति भारत में बहुत दिनों से अनुपलब्ध है। उसका अनुवाद तिब्बती भाषा में मिला था। उसके आधार पर किसी चीनी विद्वान ने चीनी भाषा में अनुवाद किया तथा आक्सफोर्ट विश्वविद्यालय से संस्कृत अध्यापक डाक्टर जॉन्सटन ने उसे अंग्रेजी में लिखा। इसका अनुवाद श्रीसूर्यनारायण चौधरी ने हिन्दी में किया है, जिसको श्री रामचन्द्रदास ने संस्कृतपद्यमय काव्य में परिणत किया है।*
  • बुद्धचरित और सौन्दरनन्द महाकाव्य के अतिरिक्त अश्वघोष के दो रूपक-शारिपुत्रप्रकरण तथा राष्ट्रपाल उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त अश्वघोष की जातक की शैली पर लिखित ‘कल्पना मण्डितिका’ कथाओं का संग्रहग्रन्थ है।*

कथावस्तु

  • बुद्धचरित की कथावस्तु गौतम बुद्ध के जन्म से लेकर निर्वाण-प्राप्ति तथा धर्मोपदेश देने तक परिव्याप्त है। कपिलवस्तु जनपद के शाक्वंशीय राजा शुद्धोदन की पत्नी महारानी मायादेवी एक रात स्वप्न में एक गजराज को उनके शरीर में प्रविष्ट होते देखती है। लुम्बिनीवन के पावन वातावरण में वह एक बालक को जन्म देती है। बालक भविष्यवाणी करता है- मैंने लोककल्याण तथा ज्ञानार्जन के लिए जन्म लिया है। ब्राह्मण भी तत्कालीन शकुनों और शुभलक्षणों के आधार पर भविष्यवाणी करते हैं कि यह बालक भविष्य में ऋषि अथवा सम्राट होगा। महर्षि असित भी राजा से स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि आपका पुत्र बोध के लिए जन्मा है। बालक को देखते ही राजा की आंखों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती है। राजा अपने शोक का कारण बताता है कि जब यह बालक युवावस्था में धर्म-प्रवर्तन करेगा तब मैं नहीं रहूँगा। बालक का सर्वार्थसिद्ध नामकरण किया जाता है। कुमार सर्वार्थसिद्ध की शैशवावस्था से ही सांसारिक विषयों की ओर आसक्त करने की चेष्टा की गई। उन्हें राजप्रासाद के भीतर रखा जाने लगा तथा बाह्य-भ्रमण प्रतिषिद्ध कर दिया गया। उनका विवाह यशोधरा नामक सुन्दरी से किया गया, जिससे राहुल नामक पुत्र हुआ।
  • समृद्ध राज्य के भोग-विलास, सुन्दरी पत्नी तथा नवजात पुत्र का मोह भी उन्हें सांसारिक पाश में आबद्ध नहीं कर सका। वे सबका परित्याग कर अन्तत: विहार-यात्रा के लिए बाहर निकल पड़े। देवताओं के प्रयास से सर्वार्थसिद्ध सर्वप्रथम राजमार्ग पर एक वृद्ध पुरुष को देखते हैं तथा प्रत्येक मनुष्य की परिणति इसी दुर्गति में देखकर उनका चित्त उद्धिग्न हो उठता है। वे बहुत दिनों तक वृद्धावस्था के विषय में ही विचार करते रहे। उद्यान भूमि में आनन्द की उपलब्धि को असम्भव समझकर वे पुन: चित्त की शान्ति के लिए बाहर निकल पड़ते हैं। इस बार देवताओं के प्रयास से उन्हें एक रोगी दिखाई देता है। सारथि से उन्हें ज्ञात होता है कि सम्पूर्ण संसार में कोई भी रोग-मुक्त नहीं है। रोग-शोक से सन्तप्त होने पर भी प्रसन्न मनुष्यों की अज्ञानता पर उन्हें आश्चर्य होता है और वे पुन: उद्विग्न होकर लौट आते हैं।
  • तृतीय विहार-यात्रा के समय सर्वार्थसिद्ध को श्मशान की ओर ले जाया जाता हुआ मृत व्यक्ति का शव दिखाई देता है। सारथि से उन्हें ज्ञात होता है कि प्रत्येक व्यक्ति का अन्त इसी प्रकार अवश्यम्भावी है इससे उद्धिग्न हाकर सर्वार्थसिद्ध विहार से विरत होना चाहते हैं। उनकी इच्छा न होते हुए भी सारथि उन्हें विहारभूमि ले जाता है। यहाँ सुन्दरियों का समूह भी उन्हें आकृष्ट नहीं कर पाता है। जीवन की क्षणभंगुरता, यौवन की क्षणिकता तथा मृत्यु की अवश्यंभाविता का बोध हो जाने पर जो मनुष्य कामासक्त होता हैं, उसकी बुद्धि को लोहे से निर्मित मानकर सर्वार्थसिद्ध वहां से भी लौट आते हैं।
  • अपनी अन्तिम विहार-यात्रा में सर्वार्थसिद्ध को एक संन्यासी दिखाई देता है। पूछने पर पता चलता है कि वह जन्म-मरण से भयभीत होकर संन्यासी बन गया है। संन्यासी के इस आदर्श से प्रभावित होकर सर्वार्थसिद्ध भी संन्यास लेने का संकल्प करते हैं। परन्तु राजा उन्हें संन्यास की अनुमति नहीं देते हैं। तथा सर्वार्थसिद्ध को गृहस्थाश्रम में ही आबद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। प्रमदाओं का विवृत और विकृत रूप देखकर सर्वार्थसिद्ध के मन में वितृष्णा और घृणा का भाव उत्पन्न होता है। वे मन ही मन सोचते हैं कि स्त्रियों की इतनी विकृत और अपवित्र प्रकृति होने पर वस्त्राभूषणों से वंचित होता हुआ पुरुष उनके अनुराग-पाश में आबद्ध होता है।
  • विरक्त सर्वार्थसिद्ध सारथि छन्दक को साथ लेकर और कन्थक नामक अश्व की पीठ पर आरूढ़ होकर अर्घरात्रि में नगर से बाहर निकलते हैं तथा प्रतिज्ञा करते हैं-‘जन्म और मृत्यु का पार देखे बिना कपिलवस्तु में प्रवेश नहीं करूंगा।’ नगर में दूर पहुँचकर सर्वार्थसिद्ध अपने सारथि तथा अश्व को बन्धन-मुक्त कर तपोवन में ऋषियों के पास अपनी समस्या का समाधान ढूंढने के लिए जाते हैं, परन्तु उन तपस्वियों की स्वर्ग-प्रदायिनी प्रवृत्ति से उन्हें सन्तोष नहीं होता है। वे एक जटिल द्विज के निर्देशानुसार दिव्य ज्ञानी अराड् मुनि के पास मोक्ष-मार्ग की शिक्षा ग्रहण करने के लिए चले जाते हैं। इधर सारथि छन्दक और कन्थक नामक घोड़े को ख़ाली देखकर अन्त:पुर की स्त्रियां बैलों से बिछुड़ी हुई गायों की भांति विलाप करने लगती हैं। पुत्र-मोह से व्यग्र राजा के निर्देशानुसार मन्त्री और पुरोहित कुमार का अन्वेषण करने के लिए निकल पड़ते हैं। राजा बिम्बसार सर्वार्थसिद्ध को आधा राज्य देकर पुन: गृहस्थ धर्म में प्रवेश करने का असफल प्रयास करते हैं। परन्तु आत्मवान को भोग-विलासों से सुख-शान्ति की प्राप्ति कैसे हो सकती है? अन्तत: राजा प्रार्थना करता है कि सफल होने पर आप मुझ पर अनुग्रह करें। निवृत्ति-मार्ग के अन्वेषक सर्वार्थसिद्ध को अराड् मुनि ने सांख्य-योग की शिक्षा दी, परन्तु उनके उपदेशों में भी सर्वार्थसिद्ध को शाश्वत मोक्ष-पथ परिलक्षित नहीं हुआ।
  • अन्त में सर्वार्थसिद्ध गयाश्रम जाते हैं। यहाँ उन्हें सेवा लिए प्रस्तुत पांच भिक्षु मिलते हैं। गयाश्रम में गौतम तप करते हैं, किन्तु इससे भी उन्हें अभीष्ट-सिद्धि नहीं मिलती है। उन्हें यह अवबोध होता है कि इन्द्रियों को कष्ट देकर मोक्ष-प्राप्ति असम्भव है, क्योंकि सन्तप्त इन्द्रिय और मन वाले व्यक्ति की समाधि पूर्ण नहीं होती। समाधि की महिमा से प्रभावित सर्वार्थसिद्ध तप का परित्याग कर समाधि का मार्ग अंगीकार करते हैं।
  • अश्वत्थ महावृक्ष के नीचे मोक्ष-प्राप्ति के लिए प्रतिश्रुत राजर्षिवंश में उत्पन्न महर्षि सर्वार्थसिद्ध को समाधिस्थ देखकर सारा संसार तो प्रसन्न हुआ, पर सद्धर्म का शत्रु मार भयभीत होता है। अपने विभ्रम, हर्ष एवम् दर्प नामक तीनों पुत्रों तथा अरति, प्रीति तथा तृषा नामक पुत्रियों सहित पुष्पधन्वा ‘मार’ संसार को मोहित करने वाले अपने पांचों बाणों को लेकर अश्वत्थ वृक्ष के मूल में स्थित प्रशान्तमूर्ति समाधिस्थ सर्वार्थसिद्ध को भौतिक प्रलोभनों से विचलित करने का असफल प्रयास करता है। यहीं सर्वार्थसिद्ध का मार के साथ युद्ध है। इस में मार की पराजय तथा सर्वार्थसिद्ध की विजय होती है। समाधिस्थ सर्वार्थसिद्ध धैर्य और शान्ति से मार की सेना पर विजय प्राप्त कर परम तत्त्व का परिज्ञान प्राप्त करने के लिए ध्यान लगाते हैं। ध्यान के माध्यम से उन्हें सफलता मिलती है। वे अष्टांग योग का आश्रय लेकर अविनाशी पद तथा सर्वज्ञत्व को प्राप्त करते हैं।
  • इस प्रकार मूल संस्कृत में उपलब्ध बुद्धचरित के 14 सर्गों में भगवान बुद्ध का जन्म से लेकर बुद्धत्व-प्राप्ति तक विशुद्ध जीवन-वृतान्त वर्णित है। पन्द्रहवें सर्ग से लेकर अठारहवें सर्ग तक का शेष भाग तिब्बती भाषा में प्राप्त है। आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के संस्कृत अध्यापक डा॰ जॉन्स्टन ने तिब्बती तथा चीनी भाषा से उसका अंग्रजी में भावानुवाद किया था, जिसका श्रीसूर्यनारायण चौधरी ने हिन्दी भाषा में अनुवाद किया। उसी का संस्कृत पद्यानुवाद जबलपुर महन्त श्रीरामचन्द्रदास शास्त्री ने किया है। यद्यपि महन्त श्री रामचन्द्रदास शास्त्री ने अनुवाद अश्वघोष के मूल के समकक्ष बनाने का यथासाघ्य प्रयास किया है, फिर भी मूल तो मूल ही होता है। अनुवाद कभी भी मूल का स्थान नहीं ले सकता।
  • अश्वघोष प्रणीत मूल बुद्धचरित का चौदहवां सर्ग बुद्धत्व-प्राप्ति में समाप्त होता है। उसके बाद के सर्गों में क्रमश: बुद्ध का काशीगमन, शिष्यों को दीक्षादान, महाशिष्यों की प्रव्रज्या, अनाथपिण्डद की दीक्षा, पुत्र-पितासमागम, जैतवन की स्वीकृति, प्रव्रज्यास्रोत, आम्रपाली के उपवन में आयुनिर्णय, लिच्छवियों पर अनुकम्पा, निर्वाणमार्ग, महापरिनिर्वाण, निर्वाण की प्रशंसा तथा धातु का विभाजन विषय वर्णित है। बुद्धचरित के 15 से 28वें सर्ग तक इस अनूदित भाग में भगवान बुद्ध के सिद्धान्तों का विवेचन है। अधिकतर अनुष्टुप् छन्द में विरचित बुद्धचरित के इस द्वितीय भाग में शास्त्रीजी ने सर्ग के अन्त में संस्कृत-काव्य-सरणि के अनुरूप वसन्ततिलका आदि छन्दों का भी प्रयोग किया है।
  • 28 सर्गों में रचित बुद्धचरित के मूल 14 सर्गों तक के प्रथम भाग में 1115 तथा 15 से 28 सर्ग तक अनूदित द्वितीय भाग में 1033 श्लोक हैं। भगवान बुद्ध के विशुद्ध जीवनवृत्त पर आधारित इस महाकाव्य की कथावस्तु को वर्णनात्मक उपादानों से अलंकृत करने का महाकवि अश्वघोष ने सफल प्रयास किया है। इस महाकाव्य के सरल एवं प्रभावोत्पादक वर्णनों में अन्त:पुर-विहार, उपवन-विहार, वृद्ध-दर्शन, रोगी-दर्शन, मृतक-दर्शन, कामिनियों द्वारा मनोरंजन, वनभूमि-दर्शन, श्रमणोपदेश, सुन्दरियों का विकृत रूप-दर्शन, महाभिनिष्क्रमण, वन-यात्रा, छन्दक-कन्थक-विसर्जन, तपस्वियों से वार्तालाप, अन्त:पुर-विलाप तथा मारविजय उल्लेखनीय हैं।
  • महाकवि अश्वघोष ने उपर्युक्त विषयों का काव्योचित शैली में वर्णन कर इस महाकाव्य के सौष्ठव का संवर्धन किया है तथा काव्य को सरस बनाने के लिए इन वर्णनों का समुचित संयोजन किया है। काव्य को दर्शन और धर्म के अनुकूल बना लेना अश्वघोष की मौलिक विशेषता है। बुद्धचरित में कवि का यह वैशिष्ट्य पद-पद पर परिलक्षित होता है। अश्वघोष ने इस महाकाव्य के माध्यम से बौद्ध-धर्म के सिद्धान्तों का प्रचार करने का सफल प्रयास किया है। विशुद्ध काव्य की दृष्टि से बुद्धचरित के प्रथम पांच सर्ग तथा अष्टम एवम् त्रयोदश सर्ग के कुछ अंश अत्यन्त रमणीय हैं। इसमें यमक, उपमा और उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों की कवि ने अत्यन्त रमणीय योजना की है। इस महाकाव्य में स्वाभाविकता का साम्राज्य है। आध्यात्मिक जीवन तथा तथागत भगवान बुद्ध के विशुद्ध एवम् लोकसुन्दर चरित्र के प्रति कवि की अगाध श्रद्धा के कारण इस महाकाव्य में भावों का नैसर्गिक प्रवाह इस महाकाव्य को उदात्त भावभूमि पर प्रतिष्ठित करता है। मानवता को अभ्युदय और मुक्ति का सन्देश देने के अभिलाषी अश्वघोष के व्यक्तित्व की गरिमा के अनुरूप ही उनका यह काव्य भी भगवान बुद्ध के गौरवपूर्ण व्यक्तित्व से मण्डित है।