तिपिटक में भगवान बुद्ध की धर्मवाणी संग्रहित है

 

 

तिपिटक में भगवान बुद्ध की धर्मवाणी संग्रहित है
तिपिटक में मुख्यतया भगवान बुद्ध की धर्मवाणी संग्रहित है, जो साधारणतया मानव मात्र के लिए और विशेषतया विपश्यी साधकों के लिए प्रभूत पावन प्रेरणा और महामांगलिक मार्गदर्शन लिए हुए है। संपूर्ण तिपिटक में 84,000 धर्म शिक्षापद (धर्म स्कंध) हैं जिनमें 82,000 भगवान बुद्ध के और 2,000 उन भिक्षुओं के हैं, जो भगवान के परम शिष्य थे।

महास्थविर आनंद ने कहा है- मैंने 82,000… उपदेश भगवान से ग्रहण किए हैं और 2,000 भिक्षुओं से। इस प्रकार मुझे 84,000 उपदेश याद हैं, जो मुझे धर्म की ओर प्रवृत्त करते हैं।

– भिक्षुओं की वाणी में भी भगवान की वाणी ही समाई हुई है। उन्होंने जो कुछ कहा, भगवान से सीखकर ही कहा। इस विषय में आयुष्मान उत्तर का कथन है- हे देवेन्द्र जो सुभाषित हैं, वे सब उन भगवान अरहंत सम्यक संबुद्ध के हैं। उन्हीं से ले-लेकर हम तथा अन्य बोलते हैं।

– उन्होंने जो कुछ भगवान से सुना, सीखा और अपने अनुभव पर उतारा, वही कहा। जिस प्रकार भगवान तथागत ‘यथावादी तथा कारी’ थे, वैसे ही उनके ये प्रबुद्ध शिष्य भी थे। इसलिए इन संतों की वाणी भी बुद्ध वाणी के सदृश्य ही अत्यंत गरिमामयी है। स्वयं अनुभूत सत्य वाणी है अतः सारे तिपिटक को बुद्ध-वाणी कहना समीचीन ही है।

तिपिटक का संपादन, संगायन : तथागत द्वारा उपदेशित सद्धर्म को शुद्ध रूप में चिरस्थायी रखने के लिए स्वयं तथागत ने यह आदेश दिया था- …जिन धर्मों को मैंने स्वयं अभिज्ञात करके तुम्हें उपदेशित किया है, तुम सब मिल-जुलकर बिना विवाद किए अर्थ और व्यंजन सहित उनका संगायन करो जिससे कि यह धर्माचरण चिरस्थायी हो…।

अतः भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात देर-सबेर बुद्ध-वाणी का संपादन, संगायन तो होता ही, परंतु उसे इतना शीघ्र आयोजित किए जाने का एक विशेष कारण उपस्थित हुआ।

वृद्धावस्था में प्रवजित हुए एक नए भिक्षु सुभद्र ने अपनी बाल बुद्धि के कारण भगवान के महापरिनिर्वाण की सूचना पाने पर हर्ष प्रकट करते हुए यह घोर अमांगलिक घोषणा की।

-हम बिलकुल मुक्त हो गए उन महाश्रमण से। उनके ऐसे आदेशों से सदा पीड़ित रहा करते थे कि ‘यह उचित है, यह अनुचित है।’ अब हमारी जो इच्छा होगी वह करेंगे, जो इच्छा नहीं होगी वह नहीं करेंगे। कीचड़ में से कमल की भाँति कभी-कभी घोर अमंगल में से भी महामंगल का प्रादुर्भाव हो जाता है यही हुआ।

सुदूरदर्शी महास्थविर महाकश्यप ने भिक्षु सुभद्र के इन अभद्र शब्दों को सुनकर तत्क्षण यह निर्णय किया कि लोक कल्याणार्थ बुद्धवाणी को चिरकाल तक अविकल रूप में सुरक्षित रखने के लिए शीघ्र ही संगायन का आयोजन करना चाहिए अन्यथा इस प्रकार के अपरिपक्व स्वार्थी लोग इसमें से अपनी अनचाही बातें निकाल देंगे और मनचाही जोड़ देंगे।

इसलिए उन्होंने हम पर अनुकंपा करके पाँच सौ सत्य साक्षी महास्थविरों को एकत्र कर तीन महीने के भीतर ही राजग्रह में प्रथम संगायन का आयोजन किया जिसमें सारी बुद्धवाणी अपने शुद्ध रूप में संपादित एवं संग्रहित की गई।See More

 
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वे 10 बातें जो हम जापानियों से सीख सकते हैं

वे 10 बातेंजोहमजापानियोंसेसीखसकतेहैं:

1| शान्ति – सुनामी के बाद प्रसारित किसी भी वीडियो में छाती पीटते और पछाड़ें मारते जापानी नहीं दिखे| उनका दुःख कुछ कम न था पर जनहित के लिए उन्होंने उसे अपने चेहरे पर नहीं आने दिया|

2| गरिमा – पानी और राशन के लिए लोग अनुशासित कतारबद्ध खड़े रहे| किसी ने भी अनर्गल प्रलाप और अभद्रता नहीं की| जापानियों का धैर्य प्रशंसनीय है|

3| कौशल – छोटे मकान अपनी नींव से उखड़ गए और बड़े भवन लचक गए पर धराशायी नहीं हुए| यदि भवनों के निर्माण में कमियां होतीं तो और अधिक नुकसान हो सकता था|

4| निस्वार्थता – जनता ने केवल आवश्यक मात्रा में वस्तुएं खरीदीं या जुटाईं| इस तरह सभी को ज़रुरत का सामान मिल गया और कालाबाजारी नहीं हुई (जो कि वैसे भी नहीं होती)|

5| व्यवस्था – दुकानें नहीं लुटीं| सड़कों पर ओवरटेकिंग या जाम नहीं लगे| सभी ने एक-दूसरे की ज़रूरतें समझीं|

6| त्याग – विकिरण या मृत्यु के खतरे की परवाह किये बिना पचास कामगारों ने न्यूक्लियर रिएक्टर में भरे पानी को वापस समुद्र में पम्प किया| उनके स्वास्थ्य को होने वाली स्थाई क्षति की प्रतिपूर्ति कैसे होगी?

7| सहृदयता – भोजनालयों ने दाम घटा दिए| जिन ATM पर कोई पहरेदार नहीं था वे भी सुरक्षित रहे| जो संपन्न थे उन्होंने वंचितों के हितों का ध्यान रखा|

8| प्रशिक्षण – बच्चों से लेकर बूढों तक सभी जानते थे कि भूकंप व सुनामी के आने पर क्या करना है| उन्होंने वही किया भी|

9| मीडिया – मीडिया ने अपने प्रसारण में उल्लेखनीय संयम और नियंत्रण दिखाया| बेहूदगी से चिल्लाते रिपोर्टर नहीं दिखे| सिर्फ और सिर्फ पुष्ट खबरों को ही दिखाया गया| राजनीतिज्ञों ने नंबर बनाने और विरोधियों पर कीचड़ उछालने में अपना समय नष्ट नहीं किया|

10| अंतःकरण – एक शौपिंग सेंटर में बिजली गुल हो जाने पर सभी ग्राहकों ने सामान वापस शैल्फ में रख दिए और चुपचाप बाहर निकल गए|

11| राष्ट्र  की संपत्ति की रक्षा अपनी व्यक्तिगत संपत्ति की तरह ही करें: रेलगाड़ी की फटी होई सीट को एक जापानी सिल रहा था उसे देख किसी ने पुछा  “ये तो रेल विभाग का काम है आप क्यों कर रहे है ”  इसपर उसका जवाब था की “ये हमारा कर्त्तव्य है की राष्ट्र  की संपत्ति की रक्षा अपनी व्यक्तिगत संपत्ति से बढ़ कर करें, सयोंग से मेरे पास सुई धागा था तो मैंने अपनी सीट को सिल दिया  ”

12| राष्ट्र से बढ़कर कोई नहीं: बचन में हिंदी की किताब के एक पाठ में लिखा था की जब जापानी बच्चा पहले दिन स्कूल जाता है तो उसे तीन सवाल और जवाब याद कराये जाते हैं

१. सवाल-आप दुनिया में सबसे अच्छा किसे समझते हैं

    जवाब – भगवान बुद्ध को

२. सवाल-अगर आपके देश जापान पर कोई हमला कर दे तो क्या करेंगे

    जवाब:हम हमलावर को किसी भी स्तिथि में माफ़ नहीं करेंगे  न जीवित नहीं छोड़ेंगे

३. सवाल-अगर स्वव भगवान बुद्ध आपके देश पर आक्रमण कर देन तो क्या करोगे

    जवाब: हम भगवान बुद्ध का सर कट लेंगे

 

 

 

सृष्टी को इश्वर ने बनाया इस झूठ को भगवन बुद्ध ने सदियों पहले नकार दिया था जिसे आज विज्ञानं साबित कर रहा है

सृष्टी को इश्वर ने बनाया इस  झूठ को भगवन बुद्ध ने सदियों  पहले नकार दिया था जिसे आज विज्ञानं साबित कर रहा है

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नयी खोज: हिग्स बोसॉन सूक्ष्मतम कण????? –संजीव ‘सलिल”

 
नयी खोज हिग्स बोसॉन सूक्ष्मतम कण????? 
 
संजीव ‘सलिल”
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नई दिल्ली। ब्रह्मांड के निर्माण के रहस्य से इंसान ने आज पर्दा उठाने का दावा किया। इंसान ने वो कण खोज निकाला है जिससे सृष्टि तथा कालांतर में इंसान की रचना हुई। इस कण को गॉड पार्टिकल या ईश्वरीय कण या हिग्स  बोसॉन कहा जा रहा है। इस कण की अनुभूति विशिष्ट यंत्रों से ही संभव है। यह कण सृष्टि रचना में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है इसीलिए इसे ईश्वर के नाम से जोड़कर ‘ईश्वरीय कण’ कहा जा रहा है। भारत में ‘कण–कण में भगवान्’ की मान्यता सनातन है। 
 
स्विटजरलैंड और फ्रांस की सीमा पर जमीन से 100 मीटर नीचे 27 किलोमीटर लंबी सुरंगनुमा प्रयोगशाला में काम करने वाले सैकड़ों वैज्ञानिकों की वर्षों की मेहनत आज रंग लायी। करीब तीस हजार करोड़ रुपए खर्च कर तलाशे गए इस कण को 100 सालों की सबसे बडी खोज कहा जा रहा है। यह खोज अपने पीछे दो अहम सवाल पीछे छोड़ गईं हैं- पहला- क्या इंसान अब ईश्वर बनने की कोशिश में है? क्या वो कुदरत के साथ खेल रहा है? दूसरा- आखिर इस नई खोज से मानवजाति का क्या फायदा होगा? 
 
 
 
सदी का सबसे बड़ा महाप्रयोग सफल :
 
इंसान कुदरत के सबसे बड़े राज को सुलझाने के करीब पहुँच गया है। इस कण की झलक दिखते ही स्विटजरलैंड और फ्रांस की सीमा पर बनी प्रयोगशाला तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी। वैज्ञानिकों ने उस सर्वशक्तिमान कण को खोज निकाला है जो ब्रह्मांड का रचयिता है।
 
50 सालों से सिर्फ किताब और वैज्ञानिक फॉर्मूलों में कैद ईश्वरीय कण की मौजूदगी का ऐलान जिनेवा में 21 देशों के समूह- यूरोपियन ऑर्गेनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च यानि सीईआरएन के हेड ने किया। इस कण की तलाश में सर्न की दो-दो टीमें जुटी थी। उन्हें सभी प्रयोग जमीन के 100 मीटर नीचे बनी 27 किलोमीटर लंबी सुरंगनुमा लार्ज हेडरॉन कोलाइडर यानि एलएचसी में करना था। 21 देशों के 15 हजार वैज्ञानिक सदी के इस महाप्रयोग में जुटे थे। 2008 से लेकर 2012 तक चार सालों में इस सुरंग के भीतर अनगिनत प्रयोग किए गए। स्विटज़रलैंड के परमाणु शोध संगठन (सर्न ) तथा फ़र्मी नॅशनल एक्सेलेटर लैब के अनुसार इस कण का वज़न 125-126 गीगा इलेक्ट्रोन वोल्ट है।
 
लक्ष्य था इस सुरंग के भीतर वैसा ही वातावरण पैदा करना जैसा 14 अरब साल पहले ‘बिग बैंग’ के समय था, जब तारों की भयानक टक्कर से हमारी आकाश गंगा बनी थी। उस आकाश गंगा का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है हमारी पृथ्वी। माना जाता है कि उस समय अंतरिक्ष में हुए उस महाविस्फोट के बाद ही पहली बार ईश्वरीय कण या हिग्स  बोसॉन नजर आये थे।
                                                                                                      
उस बिग बैंग को दोबारा प्रयोगशाला में पैदा करने का काम बेहद जटिल था। उसके लिये इस सुरंग के अन्दर प्रोटोन्स कणों को आपस में टकराया गया। प्रोटोन किसी भी पदार्थ के सूक्ष्म कण होते हैं। जिनकी टक्कर से ऊर्जा निकलती है। माना जा रहा है कि ऐसी असंख्य टक्करों के बाद करीब 300 ईश्वरीय कण पैदा हुए। ये ईश्वरीय कण या गॉड पार्टिकल किसी भी अणु या ऐटम को भार यानि मास और स्थायित्व देते हैं। इस पार्टिकल के जरिए ही अणुओं में स्थायित्व आता है और निराकार से साकार रूप धारण करते हैं। कहा जा सकता है यह कण ही रचना करता है- इसीलिए इसे ईश्वर समान कहा गया है किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है की अन्य पूर्व ज्ञात या भविष्य में ज्ञात होनेवाले कण ईश्वरीय नहीं होंगे। 
 
वैज्ञानिकों के दावे को सही मानें तो कह सकते हैं कि  इंसान ने जीवन की सबसे मुश्किल पहेली सुलझा ली है। वैज्ञानिक अब भी कह रहे हैं कि ये गॉड पार्टिकल कैसा है, इसे जानने में समय लगेगा लेकिन यह खोज विज्ञान की मान्यताएँ और सृष्टि के निर्माण की अवधारणाएँ बदल सकती है।    
 
1969 में ब्रिटेन के रिसर्चर पीटर हिग्स ने सबसे पहले ईश्वरीय कण की मौजूदगी की बात कह कर सबको चौंका दिया था। तब यह कण सिर्फ ‘पार्टिकल फिजिक्स’ की थ्योरी में मौजूद था। आज इतने सालों बाद अपनी उस कल्पना को सच होते देखना हिग्स के लिए बेहद रोमांचक अनुभव था। हिग्स को खास तौर पर सर्न ने इस ऐलान के लिए जिनेवा बुलवाया था। 
 
इंसान इस ब्रह्मांड का फीसदी हिस्सा ही जानता है, हिग्स बोसोन या गॉड पार्टिकल या ईश्वरीय कण, हमारे ज्ञान को नई सीमाएं देगा। इसीलिए इसे सदी की सबसे बड़ी और रोमांचक खोज माना जा रहा है।
सृष्टि संरचना की भारतीय मान्यता::
 

… परमात्मा परमेश्वर का आदि और अन्त नहीं है, वे ही जगत् को धारण करने वाले अनन्त पुरुषोत्तम हैं। उन्हीं परमेश्वर से अव्यक्त की उत्पत्ति होती है और उन्हीं से आत्मा (पुरुष) भी उत्पन्न होता है। उस अव्यक्त प्रकृति से बुद्धि, बुद्धि से मन, मन से आकाश, आकाश से वायु, वायु से तेज, तेज से जल और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई है। हे रुद्र! इसके पश्चात् हिरण्मय अण्ड उत्पन्न हुआ। उस अण्ड में वे प्रभु स्वयं प्रविष्ट होकर जगत् की सृष्टि के लिये सर्वप्रथम शरीर धारण करते हैं (निराकार चित्रगुप्त साकार काया ग्रहण कर कायस्थ होते हैं) । तदनन्तर चतुर्मुख ब्रह्मा का रूप धारण कर रजोगुण के आश्रय से उन्हीं देव ने इस चराचर विश्व की सृष्टि की। 
 
देव, असुर एवं मनुष्यों सहित यह सम्पूर्ण जगत् उसी अण्ड में विद्यमान है। वे ही परमात्मा स्वयं स्रष्टा ( ब्रह्मा) -के रूप में जगत् की संरचना करते हैं, विष्णु रूप में जगत् की रक्षा करते हैं और अन्त में संहर्ता शिव के रूप में वे ही देवसंहार करते हैं। इस प्रकार एकमात्र वे ही परमेश्वर ब्रह्मा केरूप में सृष्टि, विष्णु के रूप में पालन और कल्पान्त के समयरुद्र के रूप में संपूर्ण जगत को विनष्ट करते हैं। सृष्टि के समय वे ही वराह का रूप धारण कर अपने दाँतों से जलमग्न पृथ्वी का उद्धार करते हैं। हे शंकर! संक्षेप में ही मैं देवादि की सृष्टि का वर्णन कर रहा हूं; आप उसको सुनें। 
 
 
सबसे पहले उन परमेश्वर से महातत्व की सृष्टि होती है। वह महातत्व उन्हीं ब्रह्म का विकार है। पञ्च तन्मात्राओं (रूप, रस, गण, स्पर्श और शब्द) की उत्पत्ति से युक्त द्वितीय सर्ग है। उसे भूत-सर्ग कहा जाता है। (इन पञ्चतन्मात्राओं से पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश-रूप में महाभूतों की सृष्टि होती है।) यह तीसरा वैकारिक सर्ग है, (इसमें कर्मेन्दिय एवं ज्ञानेन्दियों की सृष्टि आती है इसलिये) इसे ऐन्द्रिक भी कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति बुद्धिपूर्वक होती है, यह प्राकृत-सर्ग है। चौथा सर्ग मुख-सर्ग है। पर्वत और वक्षादि स्थावरों को मुख्य माना गया है। पाँचवां सर्गतिर्यक् सर्ग कहा जाता है, इसमें तिर्यक्स्रोता (पशु-पक्षी आदि) आते हैं। इसके पश्चात् ऊर्ध्वस्रोतों की सृष्टि होती है। इस छठे सर्ग को देव-सर्ग भी कहा गया है। तदनन्तर सातवाँ सर्ग अर्वाक् स्रोतों का होता है। यही मानुष-सर्ग है।                                               
 
आठवाँ अनुग्रह नामक सर्ग है। वह सात्विक और तामसिक गुणों से संयुक्त है। इन आठ सर्गों में पाँच वैकृत-सर्ग और तीन प्राकृत-सर्ग कहे गये हैं। कौमार नामक सर्ग नवाँ सर्ग है। इसमें प्राकृत और वैकृत दोनों सृष्टियाँ विद्यमान रहती हैं। 
 
 
 
हे रुद्र! देवों से लेकर स्थावरपर्यन्त चार प्रकार की सृष्टि कही गयी है। सृष्टि करते समय ब्रह्मा से (सबसे पहले) मानस पुत्र उत्पन्न हुए। तदनन्तर देव, असुर, पितृ और मनुष्य-इस सर्ग चतुष्टय का प्रादुर्भाव हुआ। इसके बाद जल-सृष्टि की इच्छा से उन्होंने अपने मन कोसृष्टि-कार्य में संलग्न किया। सृष्टि-कार्य में प्रवृत्त होने पर ..ब्रह्मा से तमोगुण का प्रादुर्भाव हुआ। अतः, सृष्टि की अभिलाषा रखने वाले ब्रह्मा की जंघा से सर्वप्रथम असुर उत्पन्न हुए। हे शंकर! तदनन्तर ब्रह्मा ने उस तमोगुण से युक्त शरीर का परित्याग किया तो उस शरीर से निकली हुई तमोगुण की मात्रा ने स्वयं रात्रि का रूप धारण कर लिया। उस रात्रिरूप सृष्टि को देखकर यक्ष और राक्षस बहुत ही प्रसन्न हुए।        
 
 
 
 
 हे शिव! उसके बाद सत्वगुण की मात्रा के उत्पन्न होने परप्रजापति ब्रह्मा के मुख से देवता उत्पन्न हुए। तदनन्तर जब उन्होंने सत्वगुण-समन्वित अपने उस शरीर का परित्याग किया तो उससे दिन का प्रादुर्भाव हुआ, इसीलिये रात्रि में असुर और दिन में देवता अधिक शक्तिशाली होते हैं। उसके पश्चात ब्रह्मा के उस सात्विक शरीर से पितृगणों की उत्पत्ति हुई। इसके बाद ब्रह्मा के द्वारा उस सात्विक शरीर का परित्याग करने पर संध्या की उत्पत्ति हुई जो दिन और रात्रि के मध्य अवस्थित रहती है। तदनन्तर ब्रह्मा के रजोमयशरीर से मनुष्यों का प्रादुर्भाव हुआ। जब ब्रह्मा ने उसका परित्याग किया तो उससे ज्योत्सना (उषा) उत्पन्न हुई, जो प्राक्सन्ध्या के नाम से जानी जाती है। ज्योत्सना, रात्रि, दिन और संध्या – ये चारों उस ब्रह्मा के ही शरीर हैं।    तत्पश्चात् (ब्रह्मा के
रजोगुणमय शरीर के आश्रय से सुधा और क्रोध का जन्म हुआ। उसके बाद ब्रह्मा से ही भूख-प्यास से आतुर एवं रक्त-मांस पीने खाने वाले राक्षसों तथा यक्षों की उत्पत्ति हुई। राक्षसों से रक्षण के कारण राक्षस कहा गया और भक्षण के कारण यक्षों को यक्ष नाम की प्रसिद्धि प्राप्त हुई। तदनन्तर ब्रह्मा के केशों से सर्प उत्पन्न हुए। ब्रह्मा के केश उनके सिर से नीचे गिरकर पुन : उनके सिर पर आरूढ़ हो गये- यही सर्पण है। इसी सर्पण (गतिविरोध ) के कारण उन्हें सर्प कहा गया। 
 
उसके बाद ब्रह्मा के क्रोध से भूतों (इन प्राणियों में क्रोध की मात्रा अधिक होती है) का जन्म हुआ। तदनन्तर ब्रह्मा से गंधर्वों की उत्पत्ति हुई। गायन करते हुए इन सभी का जन्म हुआ था. इसलिये इन्हें गंधर्व और अप्सरा की ख्याति प्राप्त हुई। उसके बाद प्रजापति ब्रह्मा के वक्ष स्थल से स्वर्ग और द्युलोक उत्पन्न हुआ। उनके मुख से अज, उदर- भाग से तथा पार्श्व- भाग से गौ, पैर- भाग से हाथी सहित अश्व, महिष, ऊँट और भेड़ की उत्पत्ति हुई। उनके रोमों से फल -फूल एवं औषधियों का प्रादुर्भाव हुआ। 
 
गौ, अज, पुरुष- ये मेध्य या अवध्य ( पवित्र ) हैं। घोड़े, खच्चर और गदहे प्राप्य पशु कहे जाते हैं। अब मुझ से वन्य पशुओं का सुनो – इन वन्य जन्तुओं में पहले श्वापद ( हिंसकव्याघ्रादि ) पशु दूसरे दो खुरोंवाले, तीसरे हाथी, चौथे बंदर, पाँचवें पक्षी, छठे कच्छपादि जलचर और सातवें सरीसृप जीव ( उत्पन्न हुए ) हैं।
 
उन ब्रह्मा के पूर्वादि चारों मुखों से ऋक्, यजुष्, सामतथा अथर्व – इन चार वेदों का प्रादुर्भाव हुआ। उन्हीं के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, ऊरु- भाग से वैश्य तथा पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। उसके बाद उन्होंने ब्राह्मणों के लिये ब्रह्मलोक, क्षत्रियों के लिये इन्द्रलोक, वैश्यों कै लिये वायुलोक और शूद्रों के लिये गन्धर्व लोक का निर्धारण किया। उन्होंने ही ब्रह्मचारियों के लिये ब्रह्मलोक, स्वधर्मनिरत गहस्थाश्रम का पालन करने वाले लोगों के लिये प्राजापत्यलोक, वानप्रस्थाश्रमियों के लिये सप्तर्षिलोक और संन्यासी तथा इच्छानुकूल सदैव विचरण करने वाले परम तपोनिधियों के लिये अक्षयलोक का निर्धारण किया। 
 
भारत का योगदान::
 
इस महत्वपूर्ण अनुसन्धान में भारत के 100 से अधिक वैज्ञानिक विविध स्तरों पर सम्मिलित रहे। भारतीय वैज्ञानिक डॉ. अर्चना शर्मा प्रारंभ से ही इस महाप्रयोग का हिस्सा रही हैं। इस अनुसन्धान में प्रयोग हुए महा चुम्बक एफिल टोवर से अधिक भारी लगभग 800 टन के हैं तथा भारत में बने हैं।
 
महत्त्व::
 
इस कण की खोज से परमाणु ऊर्जा, कम्प्यूटर, औषध निर्माण, तथा अन्तरिक्ष के अनुसन्धान में महती मदद मिलेगी। . 
 
 

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(साभार – कल्याण संक्षिप्त गरूड़पुराणांक जनवरी – फरवरी 2000)

From: Ram Gautam <gautamrb03@yahoo.com>