31-Aug-2012 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- “बौद्धों की बात इतनी अच्छी होती है इतनी भलाई वाली होती है फिर भी लोग क्यों नहीं समझते/मानते जबकि ब्राह्मणवादी बात बहुत नुकसानदायक होती है फिर भी लोग उसको समझते हैं और मन से मानते हैं , ऐसा क्यों,रुचिकर एतिहासिक कहानियाँ और संगीत बौद्ध धम्म प्रचार के शशक्त माध्यम हैं”…समयबुद्धाx`

बौद्धों की बात इतनी अच्छी होती है इतनी भलाई वाली होती है फिर भी लोग क्यों नहीं समझते/मानते जबकि ब्राह्मणवादी बात बहुत नुकसानदायक होती है फिर भी लोग उसको समझते हैं और मन से मानते हैं , ऐसा क्यों

 

असल में ये जीवन का सूत्र है की केवल १० प्रतिशत ही अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करते हैं बाकी 90% लोग आम आदमी खाने-कमाने तक अपनी बुद्धि को सीमित रखना चाहते हैं, वो लफड़ों में नहीं पड़ना चाहहते हाँ मनोरंजन चाहते हैं, लोगों को मनोरंजन चाहिए नीरस ज्ञान नहीं। तो बौद्धों लोगों द्वारा नकारे जाने वाली नकारात्मक बात कहने के सकारात्मक पहल करो, अपनी बात को मनोरंजन का जमा पहनकर पेश करो , सब कबूल करेंगे

अपनी बात समझाने के लिए 2 तरीके होते हैं
– एक तो मुद्दे की बात सीधे कह देना
– दूसरा मुद्दे की बात को मनोरंजक ढंग से किस्से-कहानियों गाना मैं समझाना

 

जो दूसरा तरीका है मनोरंजन बनाकर समझाना यह आम आदमी की समझ में आसानी से आ जाता है मुद्दे की बात सीधी बात याने सीधा-सीधा सूत्र यह बौद्धों का तरीका है और लोग इससे नहीं समझ पाते।

रामायण महाभारत जैसी कहानियों के माध्यम से अपने ब्राह्मणवादी एजेंडा लोगों के दिमाग में भरना एक जीवंत उदाहरण है, जो काम बौद्धों के बड़े बड़े त्रिपिटक ग्रन्थ और भिक्कुओं की फ़ौज नहीं कर सकी वो काम केवल दो ग्रंथों ने कर दिया, परिणाम लोग ब्राह्मणवादी समर्थन में आ गए

 

रुचिकर एतिहासिक कहानियाँ और संगीत बौद्ध धम्म प्रचार के शशक्त माध्यम हैं

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बौद्ध धर्म ज्ञान को जनसाधारण तक पहुचाने का पहला शशक्त माध्यम हैरुचिकर एतिहासिक कहानियाँ |

धर्म एक आग की तरह है जिससे फायदा भी होता है नुक्सान भी ये हमपर है हम क्या ग्रहण करते हैं| बौद्ध धम्म की तरफ अग्रसर बहुजन ब्राहमण धर्म या वैदिक धर्म जिसे हम आज हिन्दू धर्म के नाम से जानते हैं उसके समस्त साहित्य से विमुख हो रहा है| उनके ग्रंथों में गलतियाँ भी है अच्छाई भी, ये असल में हमपर निर्भर करता है की हम उनमे से क्या लेते है|ये जीत का नियम है की आप अपने साहित्य को जितनी रूचि से पदथे हो उससे ज्यादा रूचि से अन्य साहित्य को भी पढना और समझना चाहिए जिससे आप अपने बचाव और जीत की सही नीति बना सकें| उदहारण के लिए रामायण को लीजिये हम उसे केवल एक कहानी के रूप में देख सकते हैं या उससे मिलने वाले जीवन उपयोगी नियमों को सीख कर अपना भला कर सकते हैं|आज हिन्दू कहानियों का वर्चस्व है तो हमें उनको केवल नकारना या कमिय नहीं खोजते रह जाना है बल्कि उनकी कामयाबी की वजह को समझना और अपनाना होगा|

जिन्दगी के नियम को दो तरह से सीखा जा सकता है
एक तो सीधे मुद्दे की बात करके 
दूसरा उस मुद्दे की बात को सरल करके कहानी के रूप में|

सीदे कोई भी ज्ञान की बात भाषण लगता है जिसे केवल बुद्धिजीवी समझते है पर आम लोग नापसंद करते हैं, वहीँ कहानी लोगों को रुचिकर लगती है और कहानी याद भी रहती है| अब क्योंकि कहानी याद है तो उससे जुड़ा ज्ञान का सार भी अपने आप याद रहेगा|ये जिन्दगी का नियम है की हमें दूसरों की गलती से सीखना चाहिए क्योंकि खुद गलती करने सीखने के लिए उम्र भी कम पड़ेगी इतना ही नहीं अपना पतन भी हो जायेगा| तो है कहानी और उसके पात्रों के कर्म और उसका अंजाम और कुटिल मनुवादी निति का अध्यन सीखने का बेहतरीन माध्यम |

बौद्ध धर्म में सीधे मुद्दे की बात सूत्र या नियम के जरिये कही गई है वही ज्ञान ब्राहमण धर्म या वैदिक धर्म में रामायण और महाभारत जैसे अनेकों कहानियों द्वारा सिखाने की कोशिश की है जो ज्यादा रुचिकर है| बौद्ध धर्म और ब्राहमण धर्म या वैदिक धर्म के ग्रंथों द्वारा जिन्दगी के नियम सीखने में यही फर्क है|

वैसे बौद्ध धर्म में भी इस तथ्य को समझा गया और जातक कथाएं लिखी गईं, पर उनमे बौद्ध धर्म के सिधान्तों में बहुत मिलावट प्रतीत होती है| बौद्ध धर्म का पतन मौर्य साम्राज्य के पतन के साथ शुरू हुआ और उस साम्राज्य के दुश्मनों ने बौद्ध धर्म के ज्ञान और इतिहास को तहस नहस कर दिया, क्योंकि वे ये जानते थे की अगर ये सुनिश्चित करना है की बौद्ध फिर सर उठा पाए तो उनका इतिहास और ज्ञान मिलावट द्वारा नस्ट कर दिया जाये| इसी कड़ी में उन सभी बातों को बौद्ध धर्म के मूल ग्रंथों में मिलावट कर दिया गया जिनकी खिलाफत के लिए बौद्ध धर्म ने जन्म लिया था, जैसे पुनरजन्म का अंध विश्वास |

बौद्ध धर्म ज्ञान को जनसाधारण तक पहुचाने का दूसरा शशक्त माध्यम हैसंगीत |

वैसे अब धीरे धीरे शुरुआत हो रही है और संगीतमय बौद्ध सिधांत का प्रचार करने की जहाँ तहां कोशिश चल रही है| जैसे इस्लाम में कव्वाली और सूफी संगीत है, हिंदुत्व में तो संगीतमय रामायण पाठ, भजन, कृष्ण लीला गीत आदि | आप खुद सुन कर देखिये उदहारण के लिए भजन सुनिए असल में आप शब्दों के चयन और संगीत को पसंद कर रहे होते हैं पर उसकी आड़ में जिस भी देवता या इश्वर का वो भजन होता है उसे प्रति मन में अनुराग हो जाता है यही हालत कवाली और सूफी संगीत की है| सिख धर्म में भी गुरुवाणी को तबला और हारमोनियम के मद्धम से रुचिकर बनाया जाता है| किसी भी धर्म या समाज को पसंद करें या करें पर उसकाअच्छा संगीत सभी सुन लेंगे| संगीत मीडिया में अपनी पहुच बनाने का बेहतरीन माध्यम है |जहाँ लोग केवल बौद्ध धम्म के नाम से ही कान बंद कर लेते हैं कुछ सुनना ही नहीं चाहते , ऐसे लोग भी संगीत माया धम्म गीत जरूर सुनेंगे|

मैंने महसूस किया है की धार्मिक संगीत में धुनकी लगने का बहुत बड़ा असर होता है| धुनकी का अर्थ है किसी शब्द नाम या संगीत नोट की रटन या धुन लग जाना जो की सुनने वाले के मन को झंकृत कर देता है| कुल मिलकर असल में संगीत के सभी प्रभावशाली गुण धर्म सिधांत के साथ मिलकर उसे और प्रभावशाली बना देते हैं| मैं तो यहाँ तक कहूँगा जी जिसे हम बुरा मानते हैं संगीत उसे भी इस तरह से पेश करने में सक्षम है की वो अच्छा लगने लगे, जैसे अविवाहित युवाओं का अनेतिक प्रेम लीला|

हमारी समस्या ये है की हमारे लोग कभी एक झंडे के नीचे संगठित नहीं रहे न ही रहने दिया गया| हमेशा बिखरे रहे हैं, यही कारन है की हमारे लोग अपने ही लोगों द्वारा किये गया संगर्ष और योगदान को न तो पहचानते हैं न ही उसके श्रेय ले सकने में कामयाब हैं| हमारे लोग कुछ भी अच्छा करते हैं तो वो विरोधी अपने धर्म की शान बढ़ने में इस्तेमाल कर लेते हैं|ऐसा इसलिए क्योंकि बहुजन हमेशा बिना झंडे के ही संगर्ष करते रहे हैं|उदाहरण के लिएदोहेकहने की कला, ये दो लाइन में ज्ञान की शाशाक्त बात कहने का माध्यम है जो कबीर, रविदास जैसे बहुजनों द्वारा स्थापित की गई थी|कई ऐसे वाद्य यन्त्र हैं जो बौद्ध काल में ही खोजे गए थे|अब समय गया है जब हम सभी बहुजनों ये योगदान को बहुजनों के स्थाई और दीर्ग्कालिक झंडे बौद्ध धम्म से जोड़ दें|

तात्पर्य ये है की बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए हमारे इतिहास जिसमे मौर्य समाज के इतिहास से कहानियां उठाई जा सकती है जिनके माध्यम से उत्त्थान, पतन, वीरता, त्याग बलिदान, न्याय आदि अनेकों जिन्दगी के नियमों को बड़े ही रुचिकर ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है| इससे बौद्ध धर्म लोगों में तेज़ी से फैलेगा | केवल भाषण से कुछ होगा आम जनता कभी नहीं समझेगी वो मस्ती समझती है भाषण नहीं| जापान में इसकी शुरुआत हो चुकी है वहां के बौद्ध मॉन्क्स ने भगवान् बुद्ध का सन्देश युवाओं में फ़ैलाने के लिए रॉक बैंड बनाया है , देखिये बी बी सी की निम्न खबर  http://www.bbc.co.uk/news/world-asia-23156929

http://www.youtube.com/watch?v=X4ktCXCqOUw

एक बार एक साधक तथागत बुद्ध के पास आया और उन्हें कहने लगा – “हे गुरु, मेरी इस दुनिया में कोई नहीं सुनता|” इस बात पर बुद्ध ने उसे एक कहानी सुनाई| वह कुछ इस तरह से – “एक गाव में एक आदमी अपने परिवार के साथ रहता था| उसे २ छोटे छोटे बच्चे थे| एक बार उसके घरको अचानक से आग लग गयी| उस समय वो आदमी बहार खड़ा था लेकिन, उसके दोनों बच्चे घर के अंदर खेल रहे थे| उन्हें बहोत आवाज़ देने पर भी वे बाहर नहीं आ रहे थे| और वो आदमी अंदर नहीं जा सकता था| उसे जाने-आनेमे जितना वक्त लगने वाला था उसमे घर गिर सकता था| फिर उसने बच्चो से कहा बच्चो, मैंने तुम्हारे लिए खिलोने लाये है, जल्दी आकर इसे ले जाइये| ऐसा सुनतेही बच्चे दौड़ते हुए चले आये और वे बहार आते ही वो छत गिर गयी|” भगवान बुद्ध ने आगे कहा- “हम सभी इन्सान भी इन बच्चो जैसे ही है| उन्हें भी कुछ न कुछ चाहिये होता है| अगर तुम व्यर्थ बाते करोगे तो तुम्हारा कोई नहीं सुनेगा|” इस प्रकार बुद्ध ने उसे सम्मा वाचा की सीख दी|

हमारे लोग कभी एक झंडे के नीचे संगठित नहीं रहे हमेशा बिखरे रहे हैं, यही कारन है की हमारे लोग अपने ही लोगों द्वारा किये गया संगर्ष और योगदान को तो पहचानते हैं ही उसके श्रेय बहुजन लोगों के स्थाई झंडे बौद्ध धम्म को देते हैं| उदाहरण के लिएदोहेकहने की कला, ये दो लाइन में ज्ञान की शाशाक्त बात कहने का माध्यम है जो कबीर, रविदास जैसे बहुजनों द्वारा स्थापित की गई थी|कई ऐसे वाद्य यन्त्र हैं जो बौद्ध काल में ही खोजे गए थे|अब समय गया है जब हम सभी बहुजनों ये योगदान को बहुजनों के स्थाई और दीर्ग्कालिक झंडे बौद्ध धम्म से जोड़ दें|

समयबुद्धा

jileraj@gmail.com

 

इतिहास नष्ट करने से कौम नष्ट हो जाती है …मिलन कुंदेरा

The first step in liquidating a people is to erase its memory. Destroy its books, its culture, its history, Then have somebody write new books, manufacture a new culture, invent a new history. Before long the nation will begin to forget what it is and what it was. The world around it will forget even faster. The struggle of man against power is the struggle of memory against forgetting. – Milan Kundera.

किसी भी कौम का सम्पूर्ण दमन करना हो तो उसकी किताबें उसके रीती रिवाज संस्कृति  उसके इतिहास तो नष्ट कर दो| उसके बाद नए सिरे से किताबें लिखो,नए रीती रिवाज संस्कृति  आदि पैदा करो , इतिहास को अपने तरीके से खोजो| इससे पहले की जिस देश के साथ ऐसा किया जा रहा है वो भूल जाये की वो क्या था क्या है?  ये सारी दुनिए  उनको भुला देगी| लोगों की शक्ति पाने का संगर्ष असल में याददास्त का भूलने से संगर्ष है …मिलन कुंदेरा

 
 

Milan Kundera (Czech pronunciation: [ˈmɪlan ˈkundɛra]; born 1 April 1929) is the Czech Republic‘s most recognised living writer.[2] Of Czech origin, he has lived in exile in France since 1975, having become a naturalised citizen in 1981. Having written in both Czech and French, he revises the French translations of all his books; these therefore are not considered translations but original works.

Kundera is best known as the author of works such as The Joke, The Book of Laughter and Forgetting and The Unbearable Lightness of Being. His books were banned by the Communist regimes of Czechoslovakia until the downfall of the regime in the Velvet Revolution of 1989. He lives virtually incognito and rarely speaks to the media.[2] A perennial contender for the Nobel Prize in Literature, he has been nominated on several occasions.[3

 
 
 

ज्यादा जानकारी के लिए  इस लिंक को देखें http://en.wikipedia.org/wiki/Milan_Kundera
 
  बौध साहित्य बहुत विस्तृत है, मैं अकेला उतना नहीं कर सकता जितना की हम सब मिल कर कर सकते हैं| ये केवल मेरे अकेले की वेबसाईट नहीं,आपकी भी है ,आपसे अनुरोध है की आप बौध धर्म पर अपने आर्टिकल हिंदी में jileraj@gmail.com पर भेजे जिसे हम आपके नाम सहित यहाँ पब्लिश करेंगे| आईये किताबों में दबे बौध धम्म के कल्याणकारी ज्ञान को मिल जुल कर जन साधारण के लिए उपलब्ध कराएँ ….समयबुद्धा

बुद्ध का सन्देश

बुद्ध का सन्देश

 नमस्कार मित्रों ! भारत भूमि विभिन्न धर्म संस्कृति का देश कहलाता है …हम यहाँ भगवान बुद्ध एवं उनके आम जन को दिए गए संदेशो के विषय में .जानने का प्रयास करेंगे !

कपिलवस्तु में जयसेन नाम का एक शाक्य रहता था ! सिंहहनु उसका पुत्र था ! सिंहहनु का विवाह कच्चाना से हुआ था ,उसके पाँच पुत्र थे ! शुद्धोधन,धौतोधन,शु क्लोदन,शाक्योदन,तथ ा अमितोदन ! पाँच पुत्रों के अतिरिक्त सिंहहनु की दो लड़किया थी अमिता तथा प्रमिता ! परिवार का गोत्र आदित्य था ! शुद्धोधन का विवाह महामाया से हुआ था !

आज से लगभग पूर्व २५०० वर्ष पूर्व नेपाल की तराई में ५६३ ईस्वी वैशाख पूर्णिमा के दिन कपिलवस्तु (ऐसे संकेत मिलते है कि इस नगर का नाम महान बुद्धिवादी मुनि कपिल के नाम पर पड़ा है ) के लुम्बिनी नामक वन मे शाक्य कुल में राजा शुद्धोदन के यहाँ महामाया की कोख से एक बालक का जन्म हुआ !जन्म के पांचवे दिन नामकरण संस्कार किया गया ! बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया !उसका गोत्र गौतम था !इसीलिए वह जनसाधारण में सिद्धार्थ गौतम के नाम से प्रसिद्द हुआ ! सिद्धार्थ के जन्म के सातवे दिन ही उनकी माता का देहांत हो गया !अतः प्रजापति गौतमी ने उनका पालन पोषण किया ! सिद्धार्थ का एक छोटा भाई भी था ,उसका नाम नन्द था ! वह शुद्धोदन का महाप्रजापति से उत्पन्न पुत्र था !उसके चाचा की भी कई संताने थी ! महानाम तथा अनुरुद्ध शुक्लोदन के पुत्र थे तथा आनंद अमितोदन का पुत्र था देवदत्त उसकी बुआ अमिता का पुत्र था ! महानाम सिद्धार्थ की अपेक्षा बड़ा था आनंद छोटा !

बुद्ध धर्म के बारे में आम भारतीय बहुत कम या नहीं के बराबर ही जानता है ! या फिर जो विद्यार्थी मिडिल स्कूल , हाई स्कूल , या कॉलेज में इतिहास पढ़ते , उन्हें एक सामान्य जानकारी के रूप में बुद्ध धर्म के सिद्धांतों के बारे में जानकारी हो जाती है ! हममे से अधिकाँश लोग ये जानते है कि बुद्ध ने ईश्वर , आत्मा , परमात्मा आदि को नकार दिया है ! इसलिए कई लोग इसे नास्तिको का धर्म भी कह देते है ! तो क्या हम ये समझ ले की एक ऐसा धर्म जिसकी मातृभूमि भारत देश रहा हो ! जो इस भारत भूमी में पला बड़ा हो , जो महान सम्राट अशोक , कनिष्क , हर्षवर्धन के समय में अपने चरमोत्कर्ष पे रहा हो और विश्व के कई देशो में जिसके मानने वाले आज भी हो , उनकी प्रासंगिकता आज एकदम से ही समाप्त हो गई ?

 आइये देखे –– बौद्ध जीवन मार्ग सन्देश

१. शुभ कर्म , अशुभ कर्म तथा पाप

 १. शुभ कर्म करो ! अशुभ कर्मो में सहयोग न दो ! कोई पाप कर्म न करो !

२. यही बौद्ध जीवन मार्ग है !

३. यदि आदमी शुभ कर्म करे ! तो इसे पुनः पुनः करना चाहिए ! उसी में चित्त लगाना चाहिए ! शुभ कर्मो का संचय सुखकर होता है !

४. भलाई के बारे में यह मत सोचो कि मै इसे प्राप्त न कर सकूंगा ! बूंद बूंद पानी करके घड़ा भर जाता है ! इसी प्रकार थोडा-थोडा करके बुद्धिमान आदमी बहुत शुभ कर्म कर सकता है !

५. जिस काम को करके आदमी को पछताना न पड़े और जिसके फल को वह आनंदित मन से भोग सके ,उस काम को करना अच्छा है !

६. जिस काम को करके आदमी को अनुताप न हो और जिसके फल को प्रफुल्लित मं से भोग सके ,उस काम को करना अच्छा है !

७. यदि आदमी शुभ कर्म करे ! तो इसे पुनः पुनः करना चाहिए ! उसे उसमे आनन्दित होना चाहिए !शुभ कर्म का करना आनन्ददायक होता है !

८. अच्छे आदमी को भी बुरे दिन देखने पड़ जाते है ,जब तक उसे अपने शुभ कर्मो का फल मिलना आरम्भ नहीं होता ; लेकिन जब उसे अपने शुभ कर्मो का फल मिलना आरम्भ होता है ,तब अच्छा आदमी अच्छे दिन देखता है !

९. भलाई के बारे में यह कभी न सोचे कि मै इसे प्राप्त न कर सकूंगा ! जिस प्रकार बूंद बूंद पानी करके घड़ा भर जाता है ,उसी प्रकार थोडा-थोडा करके भी भला आदमी भलाई से भर जाता है !

१०. शील (सदाचार ) की सुगंध चन्दन, तगर तथा मल्लिका सबकी सुगंध से बडकर है !

११. धुप और चन्दन की सुगंध कुछ ही दूर तक जाती है ,किन्तु शील की सुगंध बहुत दूर तक जाती है !

१२. बुराई के बारे में यझ न सोचे कि यह मुझ तक नही पहुचेगी !जिस प्रकार बूंद बूंद करके पानी का घड़ा भर जाता है ,इसी प्रकार थोडा-थोडा अशुभ कर्म भी बहुत हो जाते है !

१३. कोई भी ऐसा काम करना अच्छा नही ,जिसे करने से पछताना हो और जिस का फल अश्रु मुख होकर रोते हुए भोगना पड़े!

१४. यदि कोई आदमी दुष्ट मं से कुछ बोलता है या कोई काम करता है ,तो दुख: उसके पीछे-पीछे ऐसे ही हो लेता है ,जैसे गाडी का पहिया खीचने वाले (पशु)के पीछे पीछे !

१५. पाप कर्म न करें !अप्रमाद से बचें ! मिथ्या दृष्टी न रखे !

१६. शुभ कर्मो में अप्रमादी हो !बुरे विचारों का दमन करें !जो कोई शुभ कर्म को करने में ढील करता है ,उसका मन पाप में रमण करने लगता है !

१७. जो काम को करने के बाद पछताना पड़े , उसे करना अच्छा नहीं, जिसका फल अश्रु मुख होकर सेवन करना पड़ें!

१८. पापी भी सुख भोगता रहता है , जब तक उसका पाप कर्म नहीं पकता ,लेकिन जब उसका पाप कर्म पकता है, तब वह दुःख भोगता है !

१९. कोई आदमी बुराई को छोटा न समझे और दिल में यह न सोचे कि यह मुझ तक नही पहुच सकेगी ! पानी की बूंदों के गिरने से भी एक पानी का घड़ा भर जाता है ! इसी प्रकार थोडा थोडा पाप कर्म करने से भी मुर्ख आदमी पाप से भर जाता है !

२०. आदमी को शुभ कर्म करने में जल्दी करनी चाहिए और मं को बुराई से दूर रखना चाहिए !यदि आदमी शुभ कर्म को करने में ढील करता है तो उसका मं पाप में रमण करने में लग जाता है !

२१. यदि एक आदमी पाप करे ,तो वह बार बार न करे ! वह पाप में आनंद न माने ! पाप इकठ्ठा होकर दुःख देता है !

२२. कुशल कर्म करे ,अकुशल कर्म न करे ! कुशल कर्म करने वाला इस लोक में सुखपूर्वक रहता है !

२३. कामुकता से दुख पैदा होता है , कामुकता से भय पैदा होता है ! जो कामुकता से एकदम मुक्त है , उसे न दुःख है न भय !

२४. भूख सबसे बड़ा रोग है , संस्कार सबसे बड़ा दुःख है ! जो इस बात को जान लेता है ,उसके लिए निर्वाण साबसे बड़ा सुख है !

२५. स्वयं-कृत,स्वयं-उत्पन्न तथा स्वयं पोषित पाप कर्म ,करने वाले को ऐसे ही पीस डालता है ,जैसे वज्र मूल्यवान मणि को !

२६. जो आदमी अत्यंत दुशील होता है ,वह अपने आप को उस स्थिति में पहुचा देता है ,जहाँ उसका शत्रु उसे चाहता है ! ठीक वैसे ही जैसे अआकाश-बेल उस वृक्ष को ,जिसे वह घेरे रहती है !

२७. अकुशल कर्म तथा अहितकर कर्म करना आसान है ! कुशल कर्म तथा हितकर कर्म करना कठिन है !

 २ लोभ तथा तृष्णा

 १.लोभ और तृष्णा के वशीभूत न हो !

२. यही बौद्ध जीवन मार्ग है !

३.धन की वर्षा होने भी आदमी की कामना की पूर्ती नही होती ! बुद्धिमान आदमी जानता है कि,कामनाओं की पूर्ती में अल्प स्वाद है और दुख है!

४.वह दिव्य काम भोगो में आनंद नही मानता ! वह तृष्णा के क्षय में ही रत रहता है ! वह सम्यक सम्बुद्ध का श्रावक है !

५.लोभ से दुःख पैदा होता है ! लोभ से भय पैदा होता है ! जो लोभ से मुक्त है उसके लिए न दुःख है न भय है !

६.तृष्णा से दुःख पैदा होता है ,तृष्णा से भय पैदा होता है ! जो तृष्णा से मुक्त है उसके लिए न दुःख है न भय है !

७.जो अपने आपको घमंड के समर्पित कर देता है , जो जीवन के यथार्त उद्देश्य को भूलकर , काम भोगो के पीछे पड़ जाता है , वह बाद में ध्यानी की ओर इर्ष्या भरी दृष्टि से देखता है !

८.आदमी किसी भी वस्तु के प्रति आसक्त न हो , वस्तु विशेष की हानि से दुःख होता है ! जिन्हें न किसी से प्रेम है न घृणा है वो बंधन मुक्त है !

९.काम भोग से दुःख होता है ,काम भोग से भय पैदा होता है , जो आसक्ति से मुक्त है ,उसे न दुःख है न भय है !

१०.आसक्ति से दुःख पैदा होता है , आसक्ति से भय पैदा होता है , जो आसक्ति से मुक्त है , उसे न दुःख है न भय है !

११. राग से दुःख पैदा होता है , राग से भय पैदा होता है ! जो राग से मुक्त है , उसे न दुःख है न भय है !

१२.लोभ से दुःख पैदा होता है , लोभ से भय पैदा होता है ! जो लोभ से मुक्त है , उसे न दुःख है न भय है !

१३. जो शीलवान है , जो प्रज्ञावान है , जो न्यायी है , जो सत्यवादी है , तथा जो अपने कर्तव्य को पूरा करता है उससे लोग प्यार करते है !

१४.जो आदमी चिरकाल के बाद प्रवास से सकुशल लौटता है , उसके रिश्तेदार तथा मित्र उसका अभिनन्दन करते है !

१५.इसी प्रकार शुभ-कर्म करने वाले के गुण कर्म परलोक में उसका स्वागत करते है ! सियाह-बख्ती में कब कोई किसी का साथ देता है !….. कि तारीकी में साया भी जुदा इंसां से होता है

 ३.क्लेश और द्वेष

 १.किसी को क्लेश मत दो,किसी को से द्वेष मत रखो !

२.यही बौद्ध जीवन मार्ग है .

३.क्या संसार में कोई आदमी इतना निर्दोष है कि ,उसे दोष नहीं दिया जा सकता ,जैसे शिक्षित घोडा चाबुक की मार की अपेक्षा नही रखता .

४.श्रद्धा ,शील ,वीर्य,समाधि,धम्म-विचय [सत्य की खोज ] , विद्या तथा आचरण की पूर्णता तथा स्मृति[जागरूकता] से इस महान दुःख का अंत करो .

५.क्षमा सबसे बड़ा तप है ,निर्वाण सबसे बड़ा सुख है ऐसा बुद्ध कहते है ! जो दूसरों को आघात पहुचाए ,वो प्रवर्जित नही, जो दूसरों को पीड़ा न दे-वही श्रमण है !

६.वाणी से बुरा वचन न बोलना ,किसी को कोई कष्ट न देना, विनयपूर्वक [नियमानुसार] संयत रहना यही बुद्ध की देशना है .

७.न जीव हिंसा करो , न कराओ !

८.अपने लिए सुख चाहने वाला , जो सुख चाहने वाले प्राणियों को न कष्ट देता है और न जान से मारता है , वह सुख प्राप्त करेगा .

९.यदी एक टूटे भाजन की तरह तुम निःशब्द हो जाओ ,तो तुमने निर्वाण प्राप्त कर लिया ,तुम्हारा क्रोध से कोई सम्बन्ध नही !

१०.जो निर्दोष और अहानिकर व्यक्तियों को कष्ट देता है वह स्वयं कष्ट भोगता है .

११.चाहे वो अलंकृत हो , तो भी यदि उसकी चर्या विषय नही …..यदि वह शांत है , दान्त है ,स्थिर चित्त है ,ब्रम्हचारी है ,दूसरों के छिद्रान्वेषण नही करता फिरता-वह सचमुच एक श्रमण है, एक भिक्षु है !

१२.क्या कोई आदमी लज्जा के मारे ही इतना संयत रहता है कि,उसे कोई कुछ कह न सके ,जैसे अच्छा घोडा चाबुक की अपेक्षा नही रखता ?

१३. यदि कोई आदमी किसी अहानिकर,शुद्ध और निर्दोष आदमी के विरुद्ध कुछ करता है तो,उसकी बुराई आकर उसी आदमी पर पड़ती है ,ठीक वैसे ही जैसे हवा के विरुद्ध फेकी हुई धूल फेकने वाले पर ही आकर पडती है !

 ४.क्रोध और शत्रुता

 १. क्रोध न करो,!शत्रुता को भूल जाओ ! अपने शत्रुओ को मैत्री से जीत लो !

२.यही बौ द्ध जीवन मार्ग है !

३.क्रोधाग्नि शांत होना ही चाहिए !

४.जो यह सोचता रहता है उसने मुझे गाली दी , उसने मेरे साथ बुरा व्यवहार किया,उसने मुझे हरा दिया ,उसने मुझे लूट लिया ,उसका बैर कभी शांत नही होता !

५. जो ऐसे विचार नहीं रखता उसी का बैर शांत होता है !

६.शत्रु शत्रु की हानि करता है, घृणा करने वाला घृणा करने वाले की ,लेकिन अंत में यह किसकी हानि होती है ?

७.आदमी को चाहिए कि क्रोध को अक्रोध से जीते ,बुराई को बलाई से जीते , लोभी को उदारता से जीते ,और झूठे को सच्चाई से जीते !

८.सत्य बोले, क्रोध न् करे ,थोडा होने पर भी दे !

९. आदमी को चाहिए कि,क्रोध का त्याग कर दे , मान को छोड़ दे ,सब बंधनों को तोड़ दे ,जो आदमी नाम-रूप में आसक्त नहीहै,जो किसी भी चीज को मेरी नही समझता है,उसे कोई कष्ट नही होता !

१०.जो कोई उत्पन्न क्रोध को उसी प्रकार रोक लेता है ,जैसे सारथी भ्रांत रथ को,उसे हि मैं [जीवन रथ का] सच्चा सारथी कहता हूँ,शेष तो रस्सी पकड़ने वाले होते है !

११.जय से बैर पैदा होता है ! पराजित आदमी दुखी रहता है ! शांत आदमी जय-पराजय की चिंता छोडकर शुख्पूर्वक सोता है !

१२.कामाग्नि के समान आग नहीं, घृणा के सामान दुर्भाग्य नहीं ! उपादान-स्कंधो के समान दुःख नही, निर्वाण से बढकर सुख नही !

शत शत नमन है तथागत भगवान् बुद्ध जी को.

मैं प्रार्थना करता हूँ की जो ज्ञान का मार्ग भगवान् बुद्ध द्वारा बताया गया है उसमें से अधिक से अधिक का पालन अपने जीवन में कर सकूँ. हे इस्वर अगर तू कहीं है तो मुझे इतनी शक्ति जरूर देना की मैं इन बताये गए आदर्शों का पालन दृढ़ता से कर पाऊं..

इसके साथ साथ ये भी याचना करता हूँ हे प्रभु इस ज्ञान को सबके ह्रदय में भर दे सबको शांति दे सबका कल्याण कर.

भले ही हमारा मीडिया में शेयर न हो हम अपना मीडिया खुद हैं

ध्यान दे:

दोस्तों अगर हम में से हर कोई हमारे समाज के फायदे की बात अपने दस साथिओं जो की हमारे ही लोग हों को मौखिक बताये या SMS या ईमेल या अन्य साधनों से करें तो केवल ७ दिनों में हर बुद्धिस्ट भाई के पास  हमारा सन्देश पहुँच सकता है | इसी तरह हमारा विरोध की बात भी 9 वे दिन तक तो देश के हर आखिरी आदमी तक पहुँच जाएगी | नीचे लिखे टेबल को देखो, दोस्तों जहाँ चाह वह राह, भले ही हमारा मीडिया में शेयर न, हो हम अपना मीडिया खुद हैं :

1ST DAY =10
2ND DAY =100
3RD DAY =1,000
4TH DAY =10,000
5TH DAY =100,000
6TH DAY =1,000,000
7TH DAY =10,000,000
8TH DAY =100,000,000
9TH DAY =1,000,000,000
10TH DAY =1,210,193,422

Weekly online meeting on Buddhism at 10:00 AM EST every Sunday

On Sat, Aug 11, 2012 at 1:14 PM, Vijay Shanker <messenger@webex.com> wrote:


Hello ,

Vijay Shanker invites you to attend this online meeting.

Topic: Weekly Buddh Vihar session at 10:00 AM EST on Sunday
Date: Sunday, August 12, 2012
Time: 10:00 am, Eastern Daylight Time (Indiana, GMT-04:00)
Meeting Number: 809 864 293
Meeting Password: bhantejee

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भगवान् बुद्ध द्वारा बताये गए मार्ग और शिक्षा को जानने के लिए

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सम्राट अशोक और ईरान में बौद्ध धर्म


**सम्राट अशोक और ईरान में बौद्ध धर्म **

शाक्यमुनि बुद्ध के जीवन के दौरान लगभग 5/6th BCE , ईरान में बौद्ध धर्म का पहला प्रवेश करने के ऐतिहासिक उदाहरण मिलते है !! ईरान के आधुनिक विद्धवानो द्वारा ईरान के लोगों की सांस्कृतिक रितिरिवाजोकी अनदेखी की गई है, “ईरान में बौद्ध धर्म” इस विषय की जांच करते समय संक्षिप्त पृष्ठभूमि का परीक्षण किताबी कागज से साथ शुरू होता है। बुद्ध की शिक्षा फारसी साम्राज्य में प्रवेश करते समय वहा की सामाजिक परिस्थितियों के तहत इन क्षेत्रके लोगों में परिवर्तन हुवा था, और आज के उनके धार्मिक रितिरिवाज और पोषाख में प्राचीन ईरानी लोगो की बौद्ध संस्कृती का गहरा प्रभाव दिखाई देता है………….

ऐतिहासिक शाक्यमुनी बुद्ध की शिक्षा ईरान में प्रचार का पहला उदाहरण लगभग 5/6th शताब्दी BCE. में ‘किंवदंती’ बैक्ट्रिया (आधुनिक अफगानिस्तान) के कबीलों द्वारा बुद्ध के जीवन के दौरान किया गया है। बुद्ध के बुद्धत्व प्राप्ति के आठवें सप्ताह में बर्मा के दो व्यापारी भाई जो बुद्ध के शिष्य बन गये थे और बल्ख को लौट (बैक्ट्रिया) कर बौद्ध विहार का निर्माण करने के लिए अपना धन समर्पित (दान) किया था, इस कहानी की ऐतिहासिक वैधता के लिए और ठोस सबूतों के लिए ‘बल्ख रिकॉर्ड’ की गवाही आज भी वहा के एक मसज्जिद को ‘बुखारा’ कहते है। यह एक प्रमुख बौद्ध क्षेत्र में दिखाई देता है, ‘बुखारा’ का अर्थ होता है ‘विहारा’ !! 7 वीं शताब्दी में ईरान लगभग 90 % बुद्ध के शिक्षा के प्रभाव के परिणाम दिखाई देते है और इसी दौरान 7 वीं शताब्दी से अरब मुस्लिम आक्रमण की सुरुवात से बौद्ध नैतिक सांस्कृतिक शिक्षा के सभ्यता के पतन को सुरवात होते नजर आती है…………………

Qandahar, अफगानिस्तान में मिले बौद्ध शिक्षा के नैतिक मानकों promulgating शिला लेख खंभे और 1962 में ग्रीक में मिले शिलालेख को की पूरी तरह Ashokas शिलालेखों के हिस्से के रूप में पहचान हो चुकी है । पहली शताब्दी के दौरान बल्ख रिकॉर्ड के बौद्ध विहार और ग्रीक विद्वान अलेक्जेंडर बहुपठित ईरान के साथ बौद्ध धर्म के रिश्ते का उल्लेख विशेष रूप से संदर्भित करता है । और सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म को संरक्षण से ब्राम्हणवर्ण एक अल्प संप्रदाय बनकर रह गया था, जिसके परिणाम स्वरूप पुष्पमित्र शुंग द्वारा ब्रहदत के ह्त्या के बाद, पुष्पमित्र शुंग और Kanva के कमजोर शासन द्वारा बैक्ट्रिया के यूनानी राजा इस अवधि का फायदा उठाया और गांधार, पंजाब और सिंधु घाटी से चलकर पाटलिपुत्र पर विजय प्राप्त की, Menander अपने शासनकाल के दौरान धार्मिक सहिष्णुता और परोपकार के साथ बौद्ध समुदाय के आदेश के तहत बुद्ध के शिक्षा की नीति अपनाई, वह भदंत नागसेन द्वारा बौद्ध धर्म का अनुयाई था………..

मध्य एशिया के आधुनिक ईरान के क्षेत्र ईरान के लोगों द्वारा बसाया गया ऐसा लगता नहीं, बल्कि यह क्षेत्र ताजिकिस्तान, उजबेकिस्तान, अफगानिस्तान, उत्तर – पश्चिम पाकिस्तान जो सम्राट अशोक के अखंड भारत के रूप में भारत के हिस्सों में सामिल किया गया था। ईरानियों का ईरान यह क्षेत्र तुर्की लोगों के बाद मध्य एशिया के पठार में फैला हुवा नजर आता है और ईरान के विस्तार की तुलना तुर्की के साथ की जा सकती है। छठी शताब्दी BCE के बीच में फारसियों के Achaemanid के कबीले का पारस का उप राजा ‘साइरस’ जो मध्य एशिया में प्रभुत्व के रूप के तहत 553 BCE में एक विद्रोह के शक्ति को जन्म देकर परिणामस्वरूप अपदस्थ नेतृत्व होने के परिणाम दिखाई देते है……………

भारतीय मौर्य राजवंश (324-187 BCE) के राजा अशोक के शासनकाल के तहत, बौद्ध धर्म ईराक के आसपास के क्षेत्र में प्रचार हुवा था, सम्राट अशोक अपने साम्राज्य को दूर के भागों में बौद्ध के शिक्षा के तहत साम्राज्य का भी विस्तार किया था । सम्राट अशोक ने बड़ी संख्या में बौद्ध भिक्षुओं को बुद्ध की शिक्षाओं का प्रसार करने के लिए उत्तर – पश्चिम प्रदेशों और ईरान के क्षेत्र में भेजा गया था, और सम्राट अशोक द्वारा स्थापित रॉक शिलालेखों के अवशेष आज भी मध्य एशिया के ईरानके पठार और उत्तर – पश्चिम प्रदेशों में बौद्ध सांस्कृतिक सभ्यता की दास्तान गहवा देती है और बौद्ध धर्म की ईरानी सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका रही लेकिन ईरानी विद्वानों द्वारा इस इतिहास की अनदेखी की है…………………