2Aug-2012 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:-वर्ण व्यस्था या जातिवाद और इसको बढ़ावा देने वाले भारत की सभी समस्याओं की जड़ है …समयबुद्धा


एक बार एक क्लास में मास्टर जी ने सोचा की आज बच्चो की इम्तिहान लिया जाए की वो राष्ट्रवादी तथ्यों को कितना जानते व समझते हैं इसलिए उन्होंने  पहली बेंच से सवाल का आरम्भ कियापहले लड़के से पूछा : भारत की एक समस्या बताओ ?

लड़के ने कहा : गरीबी ….दुसरे लड़के से भी वही सवाल : भारत की एक समस्या बताओ ?दुसरे लड़के ने कहा : आतंकवाद|तीसरे लड़के से पूछा : भारत की एक समस्या बताओ?तीसरे ने कहा : भ्रष्टाचार| इस तरह वो हर एक लड़के से सवाल पूछते गए सबने ने अलग अलग जवाब दिए कोई कहता पकिस्तान …कोई अशिक्षा …कोई कहता कन्या भ्रूण हत्या ..कोई कहता बेरोजगारी ….कोई कहता नेता, इस तरह से क्रम आगे बढ़ता गया|

कक्षा में कुल 101 विध्यार्थी थे ….अब तक मास्टर जी कुल 100 से त्याही सवाल पूछ चुके थे और सभी 100 छात्रों ने अलग अलग समस्या बताई किसी ने बड़ी बड़ी समस्या बताई तो किसी ने छोटी लेकिन सब ने अलग अलग समस्या बताई अब बारी थी छात्र नम्बर 101 की ……वो हमेशा कक्षा में अव्वल आता था मास्टर जी ने पासा पलटा मास्टर जी ने उस लड़के की बुद्धिमता जांचने केलिए सवाल बदला और कहा : यहाँ जितनो ने जितनी भी समस्या बताई है सब का निदान बताओ ? इन सभी समस्यों को समाधान बताओ ? वो बालक तनिक भी नहीं घबराया ..उसने उलटे मास्टर जी से पूछामास्टर जी 100 समस्या का एक हल बताऊ या 100 समस्या के 100 हल बताऊ, अब मास्टर जी चौक पड़े ….वो सोचने लगे इतनी साड़ी समस्या का एक हल कैसे हो सकता हैं उनकी उतेजना बढती जा रही थी मास्टर जी ने कहा : 100 समस्या का एक हल संभव हैं क्या ?बालक ने कहा : बिलकुल हैं …मास्टर जी : बताओ ज़रा ………….आपको पता है बालक ने क्या कहा

बालक ने कहा : मास्टर जी .इन सब समस्या का एक ही हल हैं और वो है इस देश से जातिवाद को ख़तम कर दो सब ठीक हो जायेगा,क्योंकि इस देश में सब अपनी जाती के लिए जीते-मरते हैं देश के लिए नहीं|जातिवाद को ख़तम करने का एक ही तरीका है की सामान जाती विवाह बंद करा कर अंतर जाती विवाह को बढ़ावा दिया जाए,तब एक ही पहचान बचेगी “भारतीय” | (ये बात जातिवाद से लाभ पाने वालों को समझ में नहीं आएगी|)

“हमारी समस्याएं मनुष्य निर्मित हैं, इसलिये इन्हें मनुष्य ही सुलझा सकता है कोई काल्पनिक इश्वरिये शक्ति नहीं…समयबुद्धा”

जातिवाद की वजह से भारत में करीब दो से ढाई हज़ार साल तक कोई वैज्ञानिक तरक्की नहीं की, क्या इसका अफ़सोस नहीं है किसीको| जरा सोच कर देखिये की अगर भारत के स्वर्णिम काल बौद्ध काल में स्थापित विश्व विद्यालयों जैसे नालंदा,तक्षशिला अदि में अनुसन्धान चलता रहता तो आज विश्व का राजा अमेरिका नहीं भारत होता| उद्धरण के लिए वाशिंग मशीन लेते हैं, भारत में वाशिंग मशीन का आविष्कार नहीं हो सकता था, क्योंकि आविष्कार करने का ठेका जिन्होंने अपने पास रखा था, वे अपने कपड़े मुफ्त में धुलवाकर धोने वाले पर एहसान करते थे, और जिन पर मुफ्त कपड़े धोने का बोझ (सेवा कार्य ही जिनका धर्म था) था, उन्हें ज्ञान-विज्ञान से दूर रखा गया….इससे आप समझ सकते हैं कि भारत में पिछले 2000 साल में एक भी आविष्कार क्यों नहीं हुआ| श्रम को सस्ता और ज्ञान को महान बनाए रखने और दोनों के बीच भेद रखने के साइड इफेक्ट|

जाति एक राजनैतिक विचार और संस्था है और इसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है. इसलिए एक नास्तिक व्यक्ति मजे से जातिवादी हो सकता है… धर्म बदलने पर जाति नहीं बदलती. यह भी इस बात का प्रमाण है कि जाति धार्मिक संरचना नहीं है… जाति पावर स्ट्रक्चर है, और इस नाते शुद्ध राजनीतिक संस्था है, जिसके जरिए एक समूह दूसरे समूह के मुकाबले अपनी श्रेष्ठता कायम करता है. इसलिए धर्म सुधार आंदोलन जाति का नाश नहीं कर पाए…. लोकतंत्र नाम की एक आधुनिक राजनीतिक संस्था ने जाति का सबसे ज्यादा नुकसान किया है. लोहे को लोहा काटता है

जरा गौर से सोचो दलित साहित्य के नाम पर बहुजनो के ऊपर अत्याचार का प्रचार दुसरे नज़रिये से मनुवादियों का महिमा गान भी तो हुआ जो बहुजनों को मानसिक रूप से कमजोर और विरोधियों को अपने इतिहास पर गर्व करने का मौका देता है| हमारे लोग ज्यादातर समय इस चर्चा में लगाते हैं कि मनुवादियों में क्या बुराईयां हैं? उन्होंने बहुजनों के साथ क्या बुरा किया?हम कब तक इसी चर्चा को करते रहेंगे? अब समय आ गया है जब चर्चा का सवाल ये नहीं है कि क्या बुरा किया बल्कि ये होना चाहिए कि कैसे किया? वो क्या नीतियां और संघर्ष थे, हमारी नीतियों और संघर्ष में क्या कमियां थीं?हमारे लोग संगठित क्यों नहीं ?अब हम कैसे अपने को सुरक्षित और खुशाल बनायें? इन सब सवालों से मेरा तात्पर्य ये ही की केवल बुराई पकड़ने से कुछ न होगा, अपना और विरोधियों के निति,संघर्ष,नजरिया और दिशा को समझो और ये बात मन में बैठा लो की जब तक आपकी निति,संघर्ष,नजरिया और दिशा विरोधी से ज्यादा बेहतर नहीं होगा तब तक बदलाव नहीं आ सकता| भारत में अस्तित्व का संगर्ष है और जो फिट होगा वही सरवाइब करेगा…समयबुद्धा

 

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4 thoughts on “2Aug-2012 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:-वर्ण व्यस्था या जातिवाद और इसको बढ़ावा देने वाले भारत की सभी समस्याओं की जड़ है …समयबुद्धा

  1. —– Forwarded Message —–
    From: Madhusudan H Jhaveri
    To: Prof. Sukalyan Sengupta , TK Roy (TK and Nita)
    Cc: Bharatendra Rai , Ugta Bharat
    Sent: Fri, 27 Dec 2013 13:12:39 -0500 (EST)
    Subject: Recommended Article By m: ‘इतिहास- मिशनरियों के गुप्त पत्रों का’

    Link at the bottom.
    जाति-संस्था ने एक गढ़ की भांति मतान्तरण रोक रखा था।

    ‘इतिहास- मिशनरियों के गुप्त पत्रों का’
    Posted By डॉ. मधुसूदन On December 27, 2013 (1:14 pm) In साहित्‍य

    -डॉ. मधुसूदन-history

    ॐ– मिशनरियों को मतांतरण में दारूण निराशा क्यों हाथ लगी?

    ॐ– क्योंकि जाति-संस्था ने एक गढ़ की भांति मतान्तरण रोक रखा था।

    ॐ– इसीलिए, जाति रूपी गढ तोड़कर इसाई मिशनरी हमारा मतान्तरण करना चाह्ते थे।

    ॐ– इसलिए हमें भ्रमित कर जाति समाप्त करना उद्देश्य था, ताकि कन्वर्ज़न का धंधा सरल हो।

    ॐ — स्वस्थ जाति-व्यवस्था हमारी रक्षक थी, भक्षक नहीं ?

    ॐ– पूर्वी-भारत की (आज बंगला-देशी ) प्रजा, बौद्ध हुयी –जाति-हीन हुयी– तो इस्लामिक हो गयी।

    ॐ– अफगानिस्तान भी पहले हिंदु से बौद्ध हुआ, तो जाति-विहीन हुआ, अतः इस्लाम मे मतांतरित हो गया।

    ॐ– विवेकानंद, सावरकर, नेहरू, (तीनों का अलग अलग ऐसा ही कथन है।)

    ॐ –”जाति-संस्था ही धर्मांतरण में, सब से बड़ा अवरोध है।” –इसाई मिशनरी ड्युबोइस

    (एक) मिशनरीयों का नेता, रॉबर्ट काल्ड्वेल

    “कास्ट्स ऑफ माइण्ड ” पुस्तक में, मिशनरीयों का नेता, रॉबर्ट काल्ड्वेल निराश हो कर पृष्ठ १३६ पर जो लिखता है; उसका भावानुवाद:

    “देशी (भारतीय) सुसंस्कृत हो या असंस्कृत हो; ऊंची जातिका हो, या नीची जाति का ; सारा हिंदू समाज जाति के ताने-बाने से सुसंगठित है। और सारे समाज की मान्यताएं युगानुयुगों से, धर्म के ऐसे कड़े संगठन से जाति जाति में -कुछ ऐसी बंधी होती है, कि, सारा हिंदू-समाज, बिलकुल नीचले स्तर तक, संगठित होता हैं। बस इसी कारण उसका इसाई मत में धर्मान्तरण बहुत कठिन होता है। ऐसी कठिनाइयां उन उद्धत जंगली अनपढ
    वनवासियों के धर्मान्तरण की अपेक्षा कई गुना अधिक होती है।

    Article taken from Pravakta | प्रवक्‍ता.कॉम : Online Hindi News & Views Portal of India – http://www.pravakta.com
    URL to article: http://www.pravakta.com/the-secret-letters-of-missionaries-history

  2. यदि प्रवक्ता पर टिप्पणी छोडेंगे, तो, उत्तर भी दिया जाएगा।–डॉ. मधुसूदन पी.एच. डी. (प्रोफ़) University Of Masschusetts, DARTMOUTH.

      • जरा गौर से सोचो दलित साहित्य के नाम पर बहुजनो के ऊपर अत्याचार का प्रचार दुसरे नज़रिये से मनुवादियों का महिमा गान भी तो हुआ जो बहुजनों को मानसिक रूप से कमजोर और विरोधियों को अपने इतिहास पर गर्व करने का मौका देता है| हमारे लोग ज्यादातर समय इस चर्चा में लगाते हैं कि मनुवादियों में क्या बुराईयां हैं? उन्होंने बहुजनों के साथ क्या बुरा किया?हम कब तक इसी चर्चा को करते रहेंगे? अब समय आ गया है जब चर्चा का सवाल ये नहीं है कि क्या बुरा किया बल्कि ये होना चाहिए कि कैसे किया? वो क्या नीतियां और संघर्ष थे, हमारी नीतियों और संघर्ष में क्या कमियां थीं?हमारे लोग संगठित क्यों नहीं ?अब हम कैसे अपने को सुरक्षित और खुशाल बनायें? इन सब सवालों से मेरा तात्पर्य ये ही की केवल बुराई पकड़ने से कुछ न होगा, अपना और विरोधियों के निति,संघर्ष,नजरिया और दिशा को समझो और ये बात मन में बैठा लो की जब तक आपकी निति,संघर्ष,नजरिया और दिशा विरोधी से ज्यादा बेहतर नहीं होगा तब तक बदलाव नहीं आ सकता| भारत में अस्तित्व का संगर्ष है और जो फिट होगा वही सरवाइब करेगा…समयबुद्धा

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