31-Aug-2012 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- “रुचिकर एतिहासिक कहानियाँ और संगीत बौद्ध धम्म प्रचार के शशक्त माध्यम हैं”…समयबुद्धाx`


रुचिकर एतिहासिक कहानियाँ और संगीत बौद्ध धम्म प्रचार के शशक्त माध्यम हैं

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बौद्ध धर्म ज्ञान को जनसाधारण तक पहुचाने का पहला शशक्त माध्यम हैरुचिकर एतिहासिक कहानियाँ |

धर्म एक आग की तरह है जिससे फायदा भी होता है नुक्सान भी ये हमपर है हम क्या ग्रहण करते हैं| बौद्ध धम्म की तरफ अग्रसर बहुजन ब्राहमण धर्म या वैदिक धर्म जिसे हम आज हिन्दू धर्म के नाम से जानते हैं उसके समस्त साहित्य से विमुख हो रहा है| उनके ग्रंथों में गलतियाँ भी है अच्छाई भी, ये असल में हमपर निर्भर करता है की हम उनमे से क्या लेते है|ये जीत का नियम है की आप अपने साहित्य को जितनी रूचि से पदथे हो उससे ज्यादा रूचि से अन्य साहित्य को भी पढना और समझना चाहिए जिससे आप अपने बचाव और जीत की सही नीति बना सकें| उदहारण के लिए रामायण को लीजिये हम उसे केवल एक कहानी के रूप में देख सकते हैं या उससे मिलने वाले जीवन उपयोगी नियमों को सीख कर अपना भला कर सकते हैं|आज हिन्दू कहानियों का वर्चस्व है तो हमें उनको केवल नकारना या कमिय नहीं खोजते रह जाना है बल्कि उनकी कामयाबी की वजह को समझना और अपनाना होगा|

जिन्दगी के नियम को दो तरह से सीखा जा सकता है
एक तो सीधे मुद्दे की बात करके 
दूसरा उस मुद्दे की बात को सरल करके कहानी के रूप में|

सीदे कोई भी ज्ञान की बात भाषण लगता है जिसे केवल बुद्धिजीवी समझते है पर आम लोग नापसंद करते हैं, वहीँ कहानी लोगों को रुचिकर लगती है और कहानी याद भी रहती है| अब क्योंकि कहानी याद है तो उससे जुड़ा ज्ञान का सार भी अपने आप याद रहेगा|ये जिन्दगी का नियम है की हमें दूसरों की गलती से सीखना चाहिए क्योंकि खुद गलती करने सीखने के लिए उम्र भी कम पड़ेगी इतना ही नहीं अपना पतन भी हो जायेगा| तो है कहानी और उसके पात्रों के कर्म और उसका अंजाम और कुटिल मनुवादी निति का अध्यन सीखने का बेहतरीन माध्यम |

बौद्ध धर्म में सीधे मुद्दे की बात सूत्र या नियम के जरिये कही गई है वही ज्ञान ब्राहमण धर्म या वैदिक धर्म में रामायण और महाभारत जैसे अनेकों कहानियों द्वारा सिखाने की कोशिश की है जो ज्यादा रुचिकर है| बौद्ध धर्म और ब्राहमण धर्म या वैदिक धर्म के ग्रंथों द्वारा जिन्दगी के नियम सीखने में यही फर्क है|

वैसे बौद्ध धर्म में भी इस तथ्य को समझा गया और जातक कथाएं लिखी गईं, पर उनमे बौद्ध धर्म के सिधान्तों में बहुत मिलावट प्रतीत होती है| बौद्ध धर्म का पतन मौर्य साम्राज्य के पतन के साथ शुरू हुआ और उस साम्राज्य के दुश्मनों ने बौद्ध धर्म के ज्ञान और इतिहास को तहस नहस कर दिया, क्योंकि वे ये जानते थे की अगर ये सुनिश्चित करना है की बौद्ध फिर सर उठा पाए तो उनका इतिहास और ज्ञान मिलावट द्वारा नस्ट कर दिया जाये| इसी कड़ी में उन सभी बातों को बौद्ध धर्म के मूल ग्रंथों में मिलावट कर दिया गया जिनकी खिलाफत के लिए बौद्ध धर्म ने जन्म लिया था, जैसे पुनरजन्म का अंध विश्वास |

बौद्ध धर्म ज्ञान को जनसाधारण तक पहुचाने का दूसरा शशक्त माध्यम हैसंगीत |

वैसे अब धीरे धीरे शुरुआत हो रही है और संगीतमय बौद्ध सिधांत का प्रचार करने की जहाँ तहां कोशिश चल रही है| जैसे इस्लाम में कव्वाली और सूफी संगीत है, हिंदुत्व में तो संगीतमय रामायण पाठ, भजन, कृष्ण लीला गीत आदि | आप खुद सुन कर देखिये उदहारण के लिए भजन सुनिए असल में आप शब्दों के चयन और संगीत को पसंद कर रहे होते हैं पर उसकी आड़ में जिस भी देवता या इश्वर का वो भजन होता है उसे प्रति मन में अनुराग हो जाता है यही हालत कवाली और सूफी संगीत की है| सिख धर्म में भी गुरुवाणी को तबला और हारमोनियम के मद्धम से रुचिकर बनाया जाता है| किसी भी धर्म या समाज को पसंद करें या करें पर उसकाअच्छा संगीत सभी सुन लेंगे| संगीत मीडिया में अपनी पहुच बनाने का बेहतरीन माध्यम है |जहाँ लोग केवल बौद्ध धम्म के नाम से ही कान बंद कर लेते हैं कुछ सुनना ही नहीं चाहते , ऐसे लोग भी संगीत माया धम्म गीत जरूर सुनेंगे|

मैंने महसूस किया है की धार्मिक संगीत में धुनकी लगने का बहुत बड़ा असर होता है| धुनकी का अर्थ है किसी शब्द नाम या संगीत नोट की रटन या धुन लग जाना जो की सुनने वाले के मन को झंकृत कर देता है| कुल मिलकर असल में संगीत के सभी प्रभावशाली गुण धर्म सिधांत के साथ मिलकर उसे और प्रभावशाली बना देते हैं| मैं तो यहाँ तक कहूँगा जी जिसे हम बुरा मानते हैं संगीत उसे भी इस तरह से पेश करने में सक्षम है की वो अच्छा लगने लगे, जैसे अविवाहित युवाओं का अनेतिक प्रेम लीला|

हमारी समस्या ये है की हमारे लोग कभी एक झंडे के नीचे संगठित नहीं रहे न ही रहने दिया गया| हमेशा बिखरे रहे हैं, यही कारन है की हमारे लोग अपने ही लोगों द्वारा किये गया संगर्ष और योगदान को न तो पहचानते हैं न ही उसके श्रेय ले सकने में कामयाब हैं| हमारे लोग कुछ भी अच्छा करते हैं तो वो विरोधी अपने धर्म की शान बढ़ने में इस्तेमाल कर लेते हैं|ऐसा इसलिए क्योंकि बहुजन हमेशा बिना झंडे के ही संगर्ष करते रहे हैं|उदाहरण के लिएदोहेकहने की कला, ये दो लाइन में ज्ञान की शाशाक्त बात कहने का माध्यम है जो कबीर, रविदास जैसे बहुजनों द्वारा स्थापित की गई थी|कई ऐसे वाद्य यन्त्र हैं जो बौद्ध काल में ही खोजे गए थे|अब समय गया है जब हम सभी बहुजनों ये योगदान को बहुजनों के स्थाई और दीर्ग्कालिक झंडे बौद्ध धम्म से जोड़ दें|

तात्पर्य ये है की बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए हमारे इतिहास जिसमे मौर्य समाज के इतिहास से कहानियां उठाई जा सकती है जिनके माध्यम से उत्त्थान, पतन, वीरता, त्याग बलिदान, न्याय आदि अनेकों जिन्दगी के नियमों को बड़े ही रुचिकर ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है| इससे बौद्ध धर्म लोगों में तेज़ी से फैलेगा | केवल भाषण से कुछ होगा आम जनता कभी नहीं समझेगी वो मस्ती समझती है भाषण नहीं| जापान में इसकी शुरुआत हो चुकी है वहां के बौद्ध मॉन्क्स ने भगवान् बुद्ध का सन्देश युवाओं में फ़ैलाने के लिए रॉक बैंड बनाया है , देखिये बी बी सी की निम्न खबर  http://www.bbc.co.uk/news/world-asia-23156929

http://www.youtube.com/watch?v=X4ktCXCqOUw

एक बार एक साधक तथागत बुद्ध के पास आया और उन्हें कहने लगा – “हे गुरु, मेरी इस दुनिया में कोई नहीं सुनता|” इस बात पर बुद्ध ने उसे एक कहानी सुनाई| वह कुछ इस तरह से – “एक गाव में एक आदमी अपने परिवार के साथ रहता था| उसे २ छोटे छोटे बच्चे थे| एक बार उसके घरको अचानक से आग लग गयी| उस समय वो आदमी बहार खड़ा था लेकिन, उसके दोनों बच्चे घर के अंदर खेल रहे थे| उन्हें बहोत आवाज़ देने पर भी वे बाहर नहीं आ रहे थे| और वो आदमी अंदर नहीं जा सकता था| उसे जाने-आनेमे जितना वक्त लगने वाला था उसमे घर गिर सकता था| फिर उसने बच्चो से कहा बच्चो, मैंने तुम्हारे लिए खिलोने लाये है, जल्दी आकर इसे ले जाइये| ऐसा सुनतेही बच्चे दौड़ते हुए चले आये और वे बहार आते ही वो छत गिर गयी|” भगवान बुद्ध ने आगे कहा- “हम सभी इन्सान भी इन बच्चो जैसे ही है| उन्हें भी कुछ न कुछ चाहिये होता है| अगर तुम व्यर्थ बाते करोगे तो तुम्हारा कोई नहीं सुनेगा|” इस प्रकार बुद्ध ने उसे सम्मा वाचा की सीख दी|

हमारे लोग कभी एक झंडे के नीचे संगठित नहीं रहे हमेशा बिखरे रहे हैं, यही कारन है की हमारे लोग अपने ही लोगों द्वारा किये गया संगर्ष और योगदान को तो पहचानते हैं ही उसके श्रेय बहुजन लोगों के स्थाई झंडे बौद्ध धम्म को देते हैं| उदाहरण के लिएदोहेकहने की कला, ये दो लाइन में ज्ञान की शाशाक्त बात कहने का माध्यम है जो कबीर, रविदास जैसे बहुजनों द्वारा स्थापित की गई थी|कई ऐसे वाद्य यन्त्र हैं जो बौद्ध काल में ही खोजे गए थे|अब समय गया है जब हम सभी बहुजनों ये योगदान को बहुजनों के स्थाई और दीर्ग्कालिक झंडे बौद्ध धम्म से जोड़ दें|

समयबुद्धा

jileraj@gmail.com

 

4 thoughts on “31-Aug-2012 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- “रुचिकर एतिहासिक कहानियाँ और संगीत बौद्ध धम्म प्रचार के शशक्त माध्यम हैं”…समयबुद्धाx`

  1. I do compose lyrics of depicting the Dhamma related theme in Hindi.I am in search of a Music composer & devoted singer. Can someone help me to come up with C/Ds?

    • hello ashok, We are glad to know that. very good…what is your location, can you share one lyrics on dhamma….we will search for buddhist music composer at your location…

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