30-Sep-2012 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:-आम बहुजनों का आम सवाल: मैं इस अम्बेडकरवादी /नीली पार्टी को वोट क्यों दूं इनकी सरकार बनने के बाद मेरी हालत तो सुधरी नहीं, मेरे हाथ में क्या आया?…समयबुद्धा

आम बहुजनों का आम सवाल: मैं इस अम्बेडकरवादी /नीली पार्टी को वोट क्यों दूं इनकी सरकार बनने के बाद मेरी हालत तो सुधरी नहीं, मेरे हाथ में क्या आया?
 
ambedkar rajnitiअरे भाई अपना राजा होने का कभी भी ये मतलब नहीं कि वो आपका घर रुपयों से भर देगा| आप सवर्णों को ही लीजिये कौन से सवर्ण नेता ने कौन से सवर्ण  जनता का घर नोटों से भर दिया| ध्यान रखो आपको उतना ही मिलेगा जितने को लेने कि क्षमता आपने अपने अंदर विकसित कर लोगे| अगर आपमें क्षमता नहीं तो आपका सगा भाई भी राजा बन जाएगा तो भी आप उससे कोई फायदा नहीं उठा सकते| उदाहरण के लिए आपका अपना राजा किसी रोड बनाने का ठेका आपको देना चाहता है पर आपके पास न ही तो उस ठेके को लेने को कंपनी है न संसाधन हैं न ही एक्सपीरियंस है उल्टा आप तो गरीब ही नहीं अनपढ़ भी हो| अब बताओं को ऐसे में आपका राजा आपको कैसे बढ़ा सकता है| हाँ वो आपकी अगली पीढ़ी को अच्छी शिक्षा के इंतज़ाम कर सकता है आपको पढ़ने का हक़ दिल सकता है पर पढाई तो आपने ही करनी होगी| छोटी बुद्धि से सोचा जाए तो मिड डे मील खिला देगा या लैपटॉप बाँट देगा या बल्ब बाँट देगा या कुछ रुपये दे देगा पर उससे कब तक भला हो पायेगा|ये तो गुलाम बांये रखने कि साजिश होती है| क्या अब भी कहोगे कि मेरे हाथ में क्या आया?
 
ध्यान रखो हम वोट इसलिए नहीं देते कि हमारा घर हमारा राजा पैसों से भर दे बल्कि इसलिए देते हैं कि वहाँ पार्लियामेंट में कोई हमारे खिलाफ कानून न पास कर दे, वहाँ हमारे प्रतिनिधि होने ही चाहिए| ताकि हम अपनी क्षमता विकसित करके खुद को खुशाल कर सकें| ध्यान रहे काम तो हमें ही करना है बस हमें काम करने से कोई न रोके ये सुनिश्चित करने को वोट देना है|.
 
इस बात को ऐसे समझो कि आप वोट इसलिए दे रहे हो कि कोई ये कानून न बना दे कि फलां लोगों से वोट देने का या पढ़ने का या आज़ादी का अधिकार छीन लो|एक गलत क़ानून और पीढ़ियों कि सदियों के संगर्ष मेहनत और कमाई मिटटी में मिल जायेगी| आप अपने बचाव को वोट दे रहे हो|इस देश में ऐसे मनुवादी सोच के सांप्रदायिक लोगों को रोकने को वोट दे रहे हो जो ऐसे कानून बना सकते हैं|ध्यान रहे ये भेड़िये लोग भेड़ का खाल पहन कर मीडिया कि चमक दमक में आपके दिमाग में न घुस जाएँ अगर आप मीडिया कि चमक दमक में आ गाय और इनको वोट दे दिया तो समझ लो कि आपने आपनी गर्दन खुद कुल्हाड़ी पर दे मारी, अपनी तो अपनी अपने पूरी कौम की….अब मर्ज़ी आपकी..समयबुद्धा https://samaybuddha.wordpress.com/

बौध धम्म और विभिन्न शाशनकाल में इसकी दशा-दिशा

बुद्ध के जीवनकाल से ही अवन्ति बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बन चुका था। इस क्षेत्र में कई ऐसे महापुरुष हुए जिन्होंने उस क्षेत्र में बौद्ध धर्म के प्रचार- प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।कृपया इस लेख को  अंत तक पढ़ें

 

प्रद्योत- मौर्य काल: इस काल में बौद्ध धर्म के प्रचार कार्य में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका महाकच्छाय ने  की थी। उनका जन्म उज्जयिनी में हुआ था। बुद्ध से मिलकर वे बहुत प्रभावित हुए और बुद्ध के उपदेशों को घर- घर तक प्रभावशाली ढ़ग से पहुँचाया। उनके कहने पर समकालीन राजा प्रद्योत ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती गई। उनके सत्प्रयासों से पूरे क्षेत्र में बौद्ध धर्म एक प्रभावशाली धर्म के रुप में उभरा। चूँकि प्रचार व उपदेश का माध्यम वहाँ की स्थानीय भाषा थी, अतः इसकी पहुँच व्यापक थी।
चूँकि बुद्ध के कुछ शिष्य अवन्ति से थे, अतः यह संभव है कि अशोक से पहले भी उज्जैन व साँची में बौद्धधर्म से जुडी  इमारत बन चुकी होंगी | महावंश में चैत्यागिरि नाम के एक विहार का उल्लेख मिलता है, जिसकी पहचान साँची से की जाती है, जहाँ अशोक ने भी स्तुप व स्तंभ बनवाया था। अशोक से पहले बना यह चैत्य वर्त्तमान स्तुप नहीं हो सकता, क्योंकि स्तुप- पूजन की परंपरा अशोक के समय से ही शुरु होती है।

 

राजकुमारी देवी ने चैत्यगिरि में एक विहार का निर्माण करवाया था, जिसका पुरातात्विक प्रमाण आज भी मिलता है।कहा जाता है कि विदिशा की निवासी देवी, जो बाद में अशोक की पत्नी बनी, पहले से ही बौद्ध थी, लेकिन अशोक ने मोगालिपुत्तातिस व अन्य भिक्षुओं के प्रभाव से व भारतीय लोगों को गेर ब्रह्मण धर्म कि जरूरत के चलते परिस्थितिवश अपन  धर्म परिवर्त्तन किया होगा। अशोक के आश्रय में बौद्ध धर्म का बहुत प्रसार हुआ,उनके  द्वारा ईंट- निर्मित साँची- स्तुप का बाद में कई बार विस्तार हुआ।

 

उज्जैन बौद्ध धर्म का केंद्र बना रहा, यहाँ एक विशाल तथा दो घोड़े स्तुप मिले हैं। ईटों के आकार से पता चलता है कि यह मौर्यकालीन है।संभवतः इसका निर्माण भी अशोक ने ही करवाया था। विदिशा मथुरा मार्ग में स्थित तुमैन (तुम्बवन) ये भी अशोक ने कई स्तुप बनवाए थे। इसके अलावा महेश्वर (महिष्मती) से भी बौद्ध इमारतों के प्रमाण मिले हैं। यहाँ मिले मृदभाण्ड से स्पष्ट हो जाता है कि ये किसी- न- किसी रुप से बौद्ध- धर्मसे संबद्ध थे।

 

शुंग- सातवाहन- शक काल:
अशोक की मृत्यु के बाद पुष्यमित्र शुंग के शासन काल में बौद्ध धर्म के विकास में कई अड़चनें आयी। पुष्यमित्र, जो ब्राह्मण धर्म का कट्टर अनुगामी था, कहा जाता हैकि उसने कई बौद्ध- निवासों को नष्ट करवा दिया तथा साकल (सियाल कोट, पंजाब) के सैन्य अभियान के दौरान कई बौद्ध- भिक्षुओं की हत्या करवाई।
पुष्यमित्र शुंग के उत्तराधिकारी ने अशोक द्वारा ईंट- निर्मित साँची के स्तुप को ऊपर से प्रस्तर- निर्मित एक भित्ति से ढ़का था। साँची का दूसरा तथा तीसरा स्तुप भी शुंगकाल में ही निर्मित है। भरहुत के स्तुप के अभिलेखों से पता चलता है कि विदिशा के राजा रेवतीमित्र व उनकी रानियों ने भरहुत के स्तुप के निर्माण में सहयोग दिया था।

 

कण्व तथा सातवाहन कालमें इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म अपने उत्कर्ष पर था। इसी काल में साँची के मुख्य स्तुप के चारों तरफ तथा तीसरे स्तुप के एक तरफ प्रसिद्ध द्वार बनाये गये। यह निर्माण राजा शतकर्णी के शासन में हुआ।बौद्ध धर्म का अस्तित्व पश्चिमी क्षत्रपों के काल में भी बना रहा।उज्जैन में मिला चाहरदीवारी का हिस्सा, जो संभवतः बौद्ध स्तुप काही एक हिस्सा था, इसी काल में बना माना जाता है।इस काल में साँची बौद्ध तीर्थ का केंद्र बन गया।मालवा व मालवा के बाहर से भी लोग यहाँ आने लगे। इनका उल्लेख यहाँ के अभिलेखों में मिलता है।
प्रद्योत- मौर्य काल में साहित्यिक साक्ष्यों विशेष कर शुरुआती बौद्ध साहित्य तथा जातकों में उस समय के धार्मिक क्रिया- कलापों व मान्यताओं का पता चलता है। अशोक के अभिलेख भी सामान्य लोगों के धर्म संबंधी विश्वास की जानकारी प्रदान करते हैं। इस काल में ब्राह्मण धर्म, बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म, ये तीन धर्म प्रमुख थे। जहाँ प्रद्योत काल में ब्राह्मण धर्म का बोलबाला था, वहीं मौर्यकाल आते- आते बौद्ध धर्म की प्रसिद्धि बढ़ गई।

 

शुंग- सातवाहन- शक काल:

इस काल में वैदिक धर्म का पुनउत्र्थान हुआ। वैष्णव, शैव व अन्य कई छोटे संप्रदाय स्पष्ट रुप से सामने आये। बौद्धधर्म के अनुयायी अभी भी भारी संख्या में थे। मंदिर व मूर्तियों के निर्माण से धर्म से जुड़े मूर्तिकला और वास्तुकला का विकास शुरु हुआ। भवनों एवं शकों जैसे विदेशियों के आने से स्थानीय समाज कई तरह से प्रभावित हुआ। वाणिज्य व्यापार तथा मुद्राके प्रचलन में क्रांति आई।

 
गुप्ता- औलिकर काल: धार्मिक विकास के दृष्टिकोण से विशेष महत्व रखता है, इस काल  में बहुत सारे बदलाव आये। पुराणों की जगह पुराने संहिता व ब्राह्मण साहित्यों ने प्रमुख धार्मिक साहित्यों का रुप ले लिया। यज्ञ व बलि संबंधी जटिलताएँ धीरे- धीरे कम होती गई । विष्णु तथा शिव का महत्व अन्य देवताओं की तुलना में बढ़ गया तथा अन्य देवता गौण हो गये।धर्मों का एक- दूसरे पर भी प्रभाव पड़ा।जैन व बौद्धों ने भ्री ब्राह्मण धर्मावलंबियों की तरह प्रतिमा- पूजन, धार्मिक गीत तथा पूजा संबंधी विधियों को अपनाने लगे। बुद्धा  के अहिंसा के सिद्धांत का प्रभाव ब्राह्मण धर्म पर भी पड़ा और यज्ञ  में बलि व हिंसा को गलत समझा जाने लगा । वैदिक  धर्म के शासको के आश्रय तथा संतों के प्रभाव से वैष्णव तथा शैव धर्म का प्रभुत्व बढ़ता गया। जैन धर्म शहरों में स्थित व्यापारी वर्ग तक सीमित रह गया| आदि शंकरचार्य ने अपनी कुशल निति से ब्रह्मण धर्म का पुनुरुथान व शशक्तिकरण किया  | बौद्ध धर्म के विरोधयों ने  भारत के उपमहाद्वीप के चारों दिशाओं के बौद्ध विहारों को विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों के साथ मिलकर ध्वस्त किया| बात मे  चार ब्राम्हण धर्म के मठों की प्रतिष्ठित करने का कार्य किया गया | बौद्ध धर्म के विरोधयों व मुस्लिम आक्रमणकारियों  कि साठ-गाठ ने भारत का मूल धर्म बौद्ध धर्म को पतन कि तरफ धकेल दिया। तांत्रिक प्रभावों के कारण १२ वीं सदी के बाद से बौद्ध धर्म का पतन शुरु हो गया।इसके बाद बौधों से सारे अधिकार छीन कर उनके विरोधी मनुविधान बनाकर उन्हें दलित बनने पर मजबूर होना पड़ा
 
इस सबका एक मुख्य  कारण बौद्ध भिक्षुओं का निकम्मापन भी है, वक़्त आने पर भी उन्होंने आत्मरक्षा के लिए हथियार उठाने कि बजाये मैत्री कि बात को मानते हुए मरना स्वीकार किया| हमें इतिहास से सीखना पड़ेगा कि सबसे पहले अपनी सुरक्षा अति है उसे बाद कुछ और, अगर हम सुरक्षित ही नहीं तो बौद्ध धर्म कि शिक्षाओं का क्या महत्व रह जाता है| मरने के बाद हम ऐसे सत्य का क्या करेंगे जो हमारी रक्षा तक नहीं कर पाया |
 
आज हमारे लोग  अपने धर्म पर वापस लौट रहे हैं पर अगर हमने इतिहास से सबक नहीं सीखा तो इतिहास हमें फिर सबक सिखा देगा |

बौद्ध मत और मौर्य राजवंश (322-185 ईसा पूर्व)

मौर्य राजवंश

मौर्य राजवंश (322-185 ईसा पूर्व) प्राचीन भारत का एक मूल भारतियों का गेर ब्रह्मण राजवंश था। इसने 137 वर्ष भारत में राज्य किया और भारत के समस्त इतिहास का सबसे शक्तिशाली और जनता प्रिये शाशन दिया ।इस वंश ने वैदिक धर्म की वर्णव्यस्था की असमानता और हिंसक कर्मकांड बंद करवाए और बौद्ध मत अपना कर जनता के  सुख के लिए काम किये, उसी सुशाशन की याद में आज भी हमारा रास्ट्रीय चिन्ह अशोक स्थाम्ब और अशोक चक्र है |

इसकी स्थापना का श्रेय चन्द्रगुप्त मौर्य और उनके मन्त्री आचार्य चाणक्य को दिया जाता है, जिन्होंने नंदवंश के सम्राट घनानन्द को पराजित किया। यह साम्राज्य पूर्व में मगध राज्य में गंगा नदी के मैदानों (आज का बिहार एवं बंगाल) से शुरू हुआ। इसकी राजधानी पाटलिपुत्र (आज के पटना शहर के पास) थी। चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322 ईसा पूर्व में इस साम्राज्य की स्थापना की और तेजी से पश्चिम की तरफ़ अपना साम्राज्य का विकास किया। उसने कई छोटे छोटे क्षेत्रीय राज्यों के आपसी मतभेदों का फ़ायदा उठाया जो सिकन्दर के आक्रमण के बाद पैदा हो गये थे। उसने यूनानियों को मार भगाया। सेल्यूकस को अपनी कन्या का विवाह चंद्रगुप्त से करना पड़ा। मेगस्थनीज इन्हीं के दरबार में आया था।

चंद्रगुप्त की माता का नाम मुरा था शायद  इसी से यह वंश मौर्यवंश कहलाया। चंद्रगुप्त मौर्य के बाद उनके पुत्र बिंदुसार मौर्य ने 298 ई.पू. से 273 ई. पू. तक राज्य किया। बिंदुसार मौर्य  के बाद उनके  पुत्र महान बौद्ध  सम्राट अशोक  मौर्य  273 ई.पू. से 232 ई.पू. तक गद्दी पर रहे। अशोक के समय में कलिंग का भारी नरसंहार हुआ जिससे द्रवित होकर उन्होंने  बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। 316 ईसा पूर्व तक मौर्य वंश ने पूरे उत्तरी पश्चिमी भारत पर अधिकार कर लिया था । सम्राट अशोक  मौर्य   के राज्य में मौर्य वंश का बेहद विस्तार हुआ।

अशोक का धम्म

संसार के इतिहास में अशोक इसलिए विख्यात है कि उसने निरन्तर मानव की नैतिक उन्नति के लिए प्रयास किया। जिन सिद्धांतों के पालन से यह नैतिक उत्थान सम्भव था, अशोक के लेखों में उन्हें धम्मकहा गया है। दूसरे तथा सातवें स्तंभ-लेखों में अशोक ने धम्म की व्याख्या इस प्रकार की है, “धम्म है साधुता, बहुत से कल्याणकारी अच्छे कार्य करना, पापरहित होना, मृदुता, दूसरों के प्रति व्यवहार में मधुरता, दया-दान तथा शुचिता।” आगे कहा गया है कि, “प्राणियों का वध न करना, जीवहिंसा न करना, माता-पिता तथा बड़ों की आज्ञा मानना, गुरुजनों के प्रति आदर, मित्र, परिचितों, सम्बन्धियों, ब्राह्मण तथा श्रवणों के प्रति दानशीलता तथा उचित व्यवहार और दास तथा भृत्यों के प्रति उचित व्यवहार।”

 

सम्राट अशोक के विशाल उदार मन और जनता के सेवा भाव  जानने के लिए उनका एक  शिला लेख पढिये :

सम्राट का आदेश है कि प्रजा के साथ पुत्रवत् व्यवहार हो, जनता को प्यार किया जाए, अकारण लोगों को कारावास का दंड तथा यातना न दी जाए। जनता के साथ न्याय किया जाना चाहिए। सीमांत जातियों को आश्वासन दिया गया कि उन्हें सम्राट से कोई भय नहीं करना चाहिए। उन्हें राजा के साथ व्यवहार करने से सुख ही मिलेगा, कष्ट नहीं। राजा यथाशक्ति उन्हें क्षमा करेगा, वे धम्म का पालन करें। यहाँ पर उन्हें सुख  और  स्वर्ग मिलेगा।

अशोक के उत्तराधिकारी बौद्ध धर्म के दुश्मनों के षडियंत्र के दमन में  अयोग्य निकले। इस वंश के अंतिम राजा बृहद्रथ मौर्य थे । 185 ई.पू. में उसके सेनापति पुष्यमित्र ने उसकी हत्या कर डाली और शुंगवंश नाम का एक नया राजवंश आरंभ हुआ।

मौर्य राजवंश  के शासकों की सूची

 चन्द्रगुप्त मौर्य 322 ईसा पूर्व- 298 ईसा पूर्व

बिन्दुसार मौर्य  297 ईसा पूर्व –272 ईसा पूर्व

अशोक मौर्य  273 ईसा पूर्व –232 ईसा पूर्व

दशरथ मौर्य 232 ईसा पूर्व- 224 ईसा पूर्व

सम्प्रति मौर्य  224 ईसा पूर्व- 215 ईसा पूर्व

शालिसुक मौर्य  215 ईसा पूर्व- 202 ईसा पूर्व

देववर्मन् मौर्य  202 ईसा पूर्व –195 ईसा पूर्व

शतधन्वन् मौर्य 195 ईसा पूर्व 187 ईसा पूर्व

बृहद्रथ मौर्य 187 ईसा पूर्व- 185 ईसा पूर्व

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शुंग वंश

पुष्यमित्र शुंग मौर्य वंश को पराजित करने वाला तथा शुंग वंश (लगभग 185 ई. पू.) का प्रवर्तक था। वह जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय था। मौर्य वंश के अन्तिम राजा बृहद्रथ ने उसे अपना सेनापति नियुक्त कर दिया था। बृहद्रथ की हत्या करके पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य राजगद्दी पर अपना अधिकार कर लिया। पुष्यमित्र शुंग ने 36 वर्षों तक राज्य किया था। क्योंकि मौर्य वंश के अंतिम राजा निर्बल थे और कई राज्य उनकी अधीनता से मुक्त हो चुके थे, ऐसे में पुष्यमित्र शुंग ने इन राज्यों को फिर से मगध की अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया। उसने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की और मगध साम्राज्य का फिर से विस्तार कर दिया।

शुंग वंश की स्थापना

मौर्य वंश का अन्तिम राजा बृहद्रथ था, जिसका सेनापति पुष्यमित्र शुंग था। एक दिन उसने अपनी सब सेना को एकत्र कर उसके प्रदर्शन की व्यवस्था की। सम्राट बृहद्रथ को भी इस प्रदर्शन के अवसर पर निमंत्रित किया गया। सेना पुष्यमित्र के प्रति अनुरक्त थी। सेना के सम्मुख ही पुष्यमित्र द्वारा बृहद्रथ की हत्या कर दी गई, और वह विशाल मगध साम्राज्य का अधिपति बन गया। इस प्रकार पुष्यमित्र शुंग ने शुंग वंशकी नींव रखी। हर्षचरित में बृहद्रथ को प्रतिज्ञादुर्बलकहा गया है। इसका अभिप्राय यह है कि, राज्याभिषेक के समय प्राचीन आर्य परम्परा के अनुसार राजा को जो प्रतिज्ञा करनी होती थी, बृहद्रथ उसके पालन में दुर्बल था। सेना उसके प्रति अनुरक्त नहीं थी। इसीलिए सेनानी पुष्यमित्र का षड़यंत्र सफल हो गया।

बृहद्रथ की हत्या कर पुष्यमित्र का राजा बन जाना ठीक उस प्रकार की घटना है, जैसी की राजा बालक को मारकर श्रेणिय भट्टिय का और राजा रिपुञ्जय को मारकर अमात्य पालक का राजा बनना था। महापद्म नन्द भी इसी ढंग से मगध के राजसिंहासन का स्वामी बना था। मगध साम्राज्य की शक्ति उसकी सुसंगठित सेना पर ही आश्रित थी। वहाँ जिस किसी के हाथ में सेना हो, वह राजगद्दी को अपने अधिकार में कर सकता था। जिस षड़यंत्र या क्रान्ति द्वारा मौर्य वंश का अन्त हुआ, वह 185 ई. पू. में हुई थी।

अश्वमेध यज्ञ

अयोध्या में पुष्यमित्र का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है, जिसमें उसे द्विरश्वमेधयाजीकहा गया है। इससे सूचित होता है, कि पुष्यमित्र ने दो बार अश्वमेध यज्ञ किए थे। अहिंसा-प्रधान बौद्ध और जैन धर्मों के उत्कर्ष के कारण इस यज्ञ की परिपाटी भारत में विलुप्त हो गई थी। अब पुष्यमित्र ने इसे पुनरुज्जीवित किया। सम्भवतः पतञ्जलि मुनि इन यज्ञों में पुष्यमित्र के पुरोहित थे। इसलिए उन्होंने महाभाष्यमें लिखा है-इह पुष्यमित्रं याजयामः‘ (हम यहाँ पुष्यमित्र का यज्ञ करा रहे हैं)। अश्वमेध के लिए जो घोड़ा छोड़ा गया, उसकी रक्षा का कार्य वसुमित्र के सुपुर्द किया गया था। सिन्धु नदी के तट पर यवनों ने इस घोड़े को पकड़ लिया और वसुमित्र ने उन्हें परास्त कर इसे उनसे छुड़वाया। किन विजयों के उपलक्ष्य में पुष्यमित्र ने दो बार अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है।

वैदिक धर्म का पुनरुत्थान

शुंग सम्राट प्राचीन वैदिक धर्म (ब्रह्मण धर्म या आज का हिन्दू धर्म) के अनुयायी था। उस के  समय में बौद्ध और जैन धर्मों का ह्रास होकर वैदिक धर्म का पुनरुत्थान प्रारम्भ हुआ। दिव्यावदानके अनुसार पुष्यमित्र बौद्धों से द्वेष करता था, और उसने बहुत-से स्तूपों का ध्वंस करवाया था, और बहुत-से बौद्ध-श्रमणों की हत्या करायी थी। दिव्यावदान में तो यहाँ तक लिखा है, कि साकल (सियालकोट) में जाकर उसने घोषणा की थी, कि कोई किसी श्रमण का सिर लाकर देगा, तो उसे मैं सौ दीनार पारितोषिक दूँगा। सम्भव है, बौद्ध ग्रंथ के इस कथन में अत्युक्ति हो, पर इसमें सन्देह नहीं कि पुष्यमित्र के समय में यज्ञप्रधान वैदिक धर्म का पुनरुत्थान शुरू हो गया था। उस द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ ही इसके प्रमाण हैं।

 

इस लेख का स्रोत साभार http://bharatdiscovery.org/ है

 

 

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Vipassana Saadhna or Meditation… Dr Prabhat Tondon

जीवन जीने की कला – विपश्यना साधना

ध्यान प्रक्रियायों मे विपशयना ध्यान पद्द्ति भगवान बुद्ध द्वारा अन्वेषित प्रक्रिया सबसे अलग और तर्क और वैज्ञानिक सम्पत है । 

बुद्ध कहते थे ’ इहि पस्सिको’आओ और देख लो । मानने की आवशकता नही है । देखो और फ़िर मान लेना । विपशयना का अर्थ है शांत बैठकर , शवास को बदले बिना ..शवास के प्रति साक्षीभाव । जहाँ प्राणायाम मे शवास को बदलने की चेष्टा की जाती है वही विपशयना मे शवास जैसी है वैसे ही देखने की आंकाक्षा है ।

बुद्ध इसके लिये  किसी धारणा का आग्रह नही करते । और बुद्ध के देखने की जो प्रक्रिया थी उसका नाम है विपस्सना ।
विपसन्ना बहुत सीधा साधा प्रयोग है । अपनी आती जाती शंवास के प्रति साक्षीभाव । शवास सेतु  है , इस पार देह , उस पार चैतन्य और मध्य मे शवास है । शवास को ठीक से देखने का मतलब है कि अनिवार्य रुपेण से हम शरीर को अपने से भिन्न पायेगें । फ़िर शवास अनेक अर्थों मे महत्वपूर्ण है , क्रोध मे एक ढंग से चलती है दौडने मे अलग , आहिस्ता चलने मे अलग , अगर चित्त शांत है तो अलग और अगर तनाव मे है तो अलग । विपस्सना का अर्थ है शांत बैठकर , शवास को बिना बदले देखना । जैसे राह के किनारे बैठकर कोई राह चलते यात्रियों को  देखे , कि नदी तट पर बैठ कर नदी की बहती धार को देखे । आई एक तरगं तो देखोगे और नही आई तो  भी  देखोगे   । राह पर निकलती कारें , बसें तो देखोगे नही तो नही देखोगे । जो भी है जैसा भी है उसको वैसे ही देखते रहो । जरा भी उसे बदलने की कोशिश न करें । बस शांत  बैठकर शवास को देखो । और देखते ही देखते शवास और भी अधिक शांत हो जाती है क्योंकि देख्ने मे ही शांति है ।

हिन्दी मे ध्यान पर बहुत ही कम वीडियो उपलब्ध हैं । Meditation Techniques in Hindi  यू ट्यूब पर उपलब्ध है , मूलत:Spiritual Reality –journey withinका हिन्दी अनुवाद है । न सिर्फ़ यह विपशयना के बारे मे आपको बतायेगा बल्कि और भी ध्यान पद्द्तियों से भी रुबरु करायेगा । य टूयूब पर सीधे देखने के लिये http://youtu.be/L4thsq2m0ic पर क्लिक करें ।

प्राचीन “सोमपुरा बौद्ध विश्वविद्यालय”

प्राचीन “सोमपुरा बौद्ध विश्वविद्यालय” छठे नंबर का था । प्राचीन बंगाल और मगध में पाला राजाओं के अवधि के दौरान वरेन्द्र के विजय अभियान के बाद बनाया (लगभग 810-850) गया था। जिसके धर्मपाल और देवापला उत्तराधिकारी थे पहर्पुर स्तंभ शिलालेख भिक्षु अजयागार्भा के नाम के साथ साथ भदंत महेंद्रपाला उत्तराधिकारी (लगभग 850-854) का उल्लेख है । तारानाथ “पग- सैम जॉन झांग” रिकॉर्ड कि और विद्यालय की मरम्मत “महिपाला” (लगभग 995-1043 ई.) के शासनकाल के दौरान पुनर्निर्मित किया गया था । सोमपुरा बौद्ध विश्वविद्यालय के अवशेष वर्तमान के “बांगलादेश” देश में है । जिसका स्त्रोत सम्राट अशोक के स्तुपो-शिलालेख रहे है।

तिब्बती सूत्रों के अनुसार, “सोमपुरा बौद्ध विश्वविद्यालय” धर्माकयाविधिंद (Buddha moral values)- मध्यमका (Mass communication )- रत्नाप्रदिपा (wisdom) तर्क (Logic), कानून (law), इंजीनियरिंग (Engineering), चिकित्सा विज्ञान (medical sciences) इन विषयों में प्रभुत्व था । तारानाथ के बौद्ध इतिहास के रचनाओं में “पग-सैम-जॉन झांग” का तिब्बती अनुवाद सहित तिब्बती साहित्य के रचना का स्रोत “सोमपुरा बौद्ध विश्विद्याल” रहा है।

इस विश्वविद्यालय में बौद्ध शिक्षा के निल्तिमुल्ल्यो के आधार पर मानवजातिका के विकास के साथ विद्यामुल्क-विज्ञानं के विषय निशुल्क पढाये जाते थे। और लगभग 8500 छात्र के लिये सुविद्धा थी। बौद्धकालीन युग में प्रमुख बौद्ध विश्वविद्यालय के साथ सोमपुरा बौद्ध विश्वविद्यालय का पाला राजाओ द्वारा नेटवर्क का गठन किया गया था । ताकि राज्य पर्यवेक्षण के अंतर्गत ‘सोमपुरा बौद्ध विश्वविद्यालय” को सभी सुविधाए प्राप्त हो और समन्वय के प्रणाली के अंतर्गत इके “अस्तित्व में” लाया जा सके जिसका श्रेय पाला राजाओं दिया जाता है ।

सभी प्राचीन बौद्ध विश्वविद्यालय आपस में संस्थाओं का समूह था, यह इसलिए की राज्य-राज्य में समन्वय स्थापित हो सके और स्थिति में समन्वय बनाए रखने में महान बौद्ध भिक्षु विद्वानों के लिये उपुक्त साबित हो, और आपस को स्थानांतरित करने के लिये इस नेटवर्क समन्वय को बनाए रखने में यह प्रणाली बेहतरीन उपयोग साबित हुई । एक प्रकार “International relations” नेटवर्क स्थापित करने का श्रेय प्राचीन बौद्ध विश्वविद्यालय को दिया जाता है ।

भदंत अतिष दीपांकर, भदंत सृज्नन ने यहाँ कई वर्षों के लिए रुके थे, और तिब्बती भाषा में मध्यमका और रत्नाप्रदिपा के अनुवाद किया, अधिक समय के लिये भदंत आतिश बौद्ध आध्यात्मिक आचार्य के रूप में रहे, भदंत रत्नाकरशांति ने विद्यलय की स्थविर के रूप में सेवा की. भदंत महापंदिताचार्य बोधिभाद्र, निवासी भिक्षु के रूप में सेवा की है, और कई अन्य बौद्ध भिक्षु विद्वानों ने आपने जीवन का कुछ हिस्सा खर्च किया, भदंत कलामहपदा , विर्येंद्र और करुनाश्रीमित्र सहित इस बौद्ध विश्वविद्यालय में अपने जीवन को समर्पित किया, तिब्बती भिक्षुओं 9 वीं और 12 वीं सदियों बीच सोमपुरा बौद्ध विश्वविद्यालय का दौरा किया ।

चतुष्कोणीय 177 कोशिकाओं और केंद्र में पारंपरिक बौद्ध स्तूप की संरचना की गई थी। कमरे आवास और ध्यान के लिए भिक्षुओं द्वारा इस्तेमाल किया गया. एक विशाल सोमपुरा बौद्ध विश्वविद्यालय 27 एकड़ (110.000 m2) में विकशित था । और बुद्ध धर्म के शिक्षा का प्रभाव को प्रदर्शित करता था । एक प्रकार बर्मा के बौद्ध विहार और विश्वविद्यालय की याद ताजा करती है, जावा और कंबोडिया, दक्षिण – पूर्व एशिया को बौद्ध विश्वविद्यालय, वास्तुकला और शिक्षा को भारत के प्रतिनिधित्व के रूप में मानक बन गया था । “विपुलाश्रीमित्र” रिकॉर्ड के वृतान्त चीख-चीख कर कह रहा की बौद्ध विश्वविद्यालय के ग्रंथालयो को कट्टर ब्राम्हणवादियों ने आग लगी थी।

कर्नातादेशातागता ब्रह्मक्सत्रिया को सेन राजवंश, के रूप में जाना जाता है इनके शासन के दौरान, 12 वीं सदी की दूसरी छमाही में विश्वविद्यालय गिरावट शुरू हुई थी । अंततः 13 वीं सदी के दौरान जब क्षेत्र मुस्लिम कब्जे में आया था, लेकिन एक विद्वान भिक्षु लिखते हैं की विश्वविद्यालय को और Pāhāपुर के विहारों को मुस्लिम आक्रमणकारी द्वारा बड़े पैमाने पर विनाश के कोई स्पष्ट निशान नहीं मिलते. पतन, परित्याग, विनाश और मुस्लिम आक्रमण के फलस्वरूप जनसंख्या का विस्थापन अशांति के बीच में बौद्ध नीतीमुल्लयो के विश्वविध्यालयो दास्तान खंडरो में तब्दील हुई, जो आज भी हमें स्मरण कराती है ।(यह चित्र “सोमपुरा बौद्ध विश्विद्याल” का है)
(Ref. Vajrayogini: Her Visualization, Rituals, and Forms by Elizabeth English. Wisdom Publications. ISBN 0-86171-329-X pg 15,) Buddhist Monks And Monasteries Of India: Their History And Contribution To Indian Culture. by Dutt, Sukumar. George Allen and Unwin Ltd, London 1962. pg 352-375, Somapura Mahavihara, Banglapedia: The National Encyclopedia & “The virtual reconstruction of Paharpur vihara”, Khulna University Studies 1 (1): 187-204)