बौध धम्म और विभिन्न शाशनकाल में इसकी दशा-दिशा


बुद्ध के जीवनकाल से ही अवन्ति बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बन चुका था। इस क्षेत्र में कई ऐसे महापुरुष हुए जिन्होंने उस क्षेत्र में बौद्ध धर्म के प्रचार- प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।कृपया इस लेख को  अंत तक पढ़ें

 

प्रद्योत- मौर्य काल: इस काल में बौद्ध धर्म के प्रचार कार्य में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका महाकच्छाय ने  की थी। उनका जन्म उज्जयिनी में हुआ था। बुद्ध से मिलकर वे बहुत प्रभावित हुए और बुद्ध के उपदेशों को घर- घर तक प्रभावशाली ढ़ग से पहुँचाया। उनके कहने पर समकालीन राजा प्रद्योत ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती गई। उनके सत्प्रयासों से पूरे क्षेत्र में बौद्ध धर्म एक प्रभावशाली धर्म के रुप में उभरा। चूँकि प्रचार व उपदेश का माध्यम वहाँ की स्थानीय भाषा थी, अतः इसकी पहुँच व्यापक थी।
चूँकि बुद्ध के कुछ शिष्य अवन्ति से थे, अतः यह संभव है कि अशोक से पहले भी उज्जैन व साँची में बौद्धधर्म से जुडी  इमारत बन चुकी होंगी | महावंश में चैत्यागिरि नाम के एक विहार का उल्लेख मिलता है, जिसकी पहचान साँची से की जाती है, जहाँ अशोक ने भी स्तुप व स्तंभ बनवाया था। अशोक से पहले बना यह चैत्य वर्त्तमान स्तुप नहीं हो सकता, क्योंकि स्तुप- पूजन की परंपरा अशोक के समय से ही शुरु होती है।

 

राजकुमारी देवी ने चैत्यगिरि में एक विहार का निर्माण करवाया था, जिसका पुरातात्विक प्रमाण आज भी मिलता है।कहा जाता है कि विदिशा की निवासी देवी, जो बाद में अशोक की पत्नी बनी, पहले से ही बौद्ध थी, लेकिन अशोक ने मोगालिपुत्तातिस व अन्य भिक्षुओं के प्रभाव से व भारतीय लोगों को गेर ब्रह्मण धर्म कि जरूरत के चलते परिस्थितिवश अपन  धर्म परिवर्त्तन किया होगा। अशोक के आश्रय में बौद्ध धर्म का बहुत प्रसार हुआ,उनके  द्वारा ईंट- निर्मित साँची- स्तुप का बाद में कई बार विस्तार हुआ।

 

उज्जैन बौद्ध धर्म का केंद्र बना रहा, यहाँ एक विशाल तथा दो घोड़े स्तुप मिले हैं। ईटों के आकार से पता चलता है कि यह मौर्यकालीन है।संभवतः इसका निर्माण भी अशोक ने ही करवाया था। विदिशा मथुरा मार्ग में स्थित तुमैन (तुम्बवन) ये भी अशोक ने कई स्तुप बनवाए थे। इसके अलावा महेश्वर (महिष्मती) से भी बौद्ध इमारतों के प्रमाण मिले हैं। यहाँ मिले मृदभाण्ड से स्पष्ट हो जाता है कि ये किसी- न- किसी रुप से बौद्ध- धर्मसे संबद्ध थे।

 

शुंग- सातवाहन- शक काल:
अशोक की मृत्यु के बाद पुष्यमित्र शुंग के शासन काल में बौद्ध धर्म के विकास में कई अड़चनें आयी। पुष्यमित्र, जो ब्राह्मण धर्म का कट्टर अनुगामी था, कहा जाता हैकि उसने कई बौद्ध- निवासों को नष्ट करवा दिया तथा साकल (सियाल कोट, पंजाब) के सैन्य अभियान के दौरान कई बौद्ध- भिक्षुओं की हत्या करवाई।
पुष्यमित्र शुंग के उत्तराधिकारी ने अशोक द्वारा ईंट- निर्मित साँची के स्तुप को ऊपर से प्रस्तर- निर्मित एक भित्ति से ढ़का था। साँची का दूसरा तथा तीसरा स्तुप भी शुंगकाल में ही निर्मित है। भरहुत के स्तुप के अभिलेखों से पता चलता है कि विदिशा के राजा रेवतीमित्र व उनकी रानियों ने भरहुत के स्तुप के निर्माण में सहयोग दिया था।

 

कण्व तथा सातवाहन कालमें इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म अपने उत्कर्ष पर था। इसी काल में साँची के मुख्य स्तुप के चारों तरफ तथा तीसरे स्तुप के एक तरफ प्रसिद्ध द्वार बनाये गये। यह निर्माण राजा शतकर्णी के शासन में हुआ।बौद्ध धर्म का अस्तित्व पश्चिमी क्षत्रपों के काल में भी बना रहा।उज्जैन में मिला चाहरदीवारी का हिस्सा, जो संभवतः बौद्ध स्तुप काही एक हिस्सा था, इसी काल में बना माना जाता है।इस काल में साँची बौद्ध तीर्थ का केंद्र बन गया।मालवा व मालवा के बाहर से भी लोग यहाँ आने लगे। इनका उल्लेख यहाँ के अभिलेखों में मिलता है।
प्रद्योत- मौर्य काल में साहित्यिक साक्ष्यों विशेष कर शुरुआती बौद्ध साहित्य तथा जातकों में उस समय के धार्मिक क्रिया- कलापों व मान्यताओं का पता चलता है। अशोक के अभिलेख भी सामान्य लोगों के धर्म संबंधी विश्वास की जानकारी प्रदान करते हैं। इस काल में ब्राह्मण धर्म, बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म, ये तीन धर्म प्रमुख थे। जहाँ प्रद्योत काल में ब्राह्मण धर्म का बोलबाला था, वहीं मौर्यकाल आते- आते बौद्ध धर्म की प्रसिद्धि बढ़ गई।

 

शुंग- सातवाहन- शक काल:

इस काल में वैदिक धर्म का पुनउत्र्थान हुआ। वैष्णव, शैव व अन्य कई छोटे संप्रदाय स्पष्ट रुप से सामने आये। बौद्धधर्म के अनुयायी अभी भी भारी संख्या में थे। मंदिर व मूर्तियों के निर्माण से धर्म से जुड़े मूर्तिकला और वास्तुकला का विकास शुरु हुआ। भवनों एवं शकों जैसे विदेशियों के आने से स्थानीय समाज कई तरह से प्रभावित हुआ। वाणिज्य व्यापार तथा मुद्राके प्रचलन में क्रांति आई।

 
गुप्ता- औलिकर काल: धार्मिक विकास के दृष्टिकोण से विशेष महत्व रखता है, इस काल  में बहुत सारे बदलाव आये। पुराणों की जगह पुराने संहिता व ब्राह्मण साहित्यों ने प्रमुख धार्मिक साहित्यों का रुप ले लिया। यज्ञ व बलि संबंधी जटिलताएँ धीरे- धीरे कम होती गई । विष्णु तथा शिव का महत्व अन्य देवताओं की तुलना में बढ़ गया तथा अन्य देवता गौण हो गये।धर्मों का एक- दूसरे पर भी प्रभाव पड़ा।जैन व बौद्धों ने भ्री ब्राह्मण धर्मावलंबियों की तरह प्रतिमा- पूजन, धार्मिक गीत तथा पूजा संबंधी विधियों को अपनाने लगे। बुद्धा  के अहिंसा के सिद्धांत का प्रभाव ब्राह्मण धर्म पर भी पड़ा और यज्ञ  में बलि व हिंसा को गलत समझा जाने लगा । वैदिक  धर्म के शासको के आश्रय तथा संतों के प्रभाव से वैष्णव तथा शैव धर्म का प्रभुत्व बढ़ता गया। जैन धर्म शहरों में स्थित व्यापारी वर्ग तक सीमित रह गया| आदि शंकरचार्य ने अपनी कुशल निति से ब्रह्मण धर्म का पुनुरुथान व शशक्तिकरण किया  | बौद्ध धर्म के विरोधयों ने  भारत के उपमहाद्वीप के चारों दिशाओं के बौद्ध विहारों को विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों के साथ मिलकर ध्वस्त किया| बात मे  चार ब्राम्हण धर्म के मठों की प्रतिष्ठित करने का कार्य किया गया | बौद्ध धर्म के विरोधयों व मुस्लिम आक्रमणकारियों  कि साठ-गाठ ने भारत का मूल धर्म बौद्ध धर्म को पतन कि तरफ धकेल दिया। तांत्रिक प्रभावों के कारण १२ वीं सदी के बाद से बौद्ध धर्म का पतन शुरु हो गया।इसके बाद बौधों से सारे अधिकार छीन कर उनके विरोधी मनुविधान बनाकर उन्हें दलित बनने पर मजबूर होना पड़ा
 
इस सबका एक मुख्य  कारण बौद्ध भिक्षुओं का निकम्मापन भी है, वक़्त आने पर भी उन्होंने आत्मरक्षा के लिए हथियार उठाने कि बजाये मैत्री कि बात को मानते हुए मरना स्वीकार किया| हमें इतिहास से सीखना पड़ेगा कि सबसे पहले अपनी सुरक्षा अति है उसे बाद कुछ और, अगर हम सुरक्षित ही नहीं तो बौद्ध धर्म कि शिक्षाओं का क्या महत्व रह जाता है| मरने के बाद हम ऐसे सत्य का क्या करेंगे जो हमारी रक्षा तक नहीं कर पाया |
 
आज हमारे लोग  अपने धर्म पर वापस लौट रहे हैं पर अगर हमने इतिहास से सबक नहीं सीखा तो इतिहास हमें फिर सबक सिखा देगा |

9 thoughts on “बौध धम्म और विभिन्न शाशनकाल में इसकी दशा-दिशा

  1. आदि शंकराचार्य यह कोई आदि (प्राचीन) नहीं है, इनका जन्म (788 ईसवी-820 ईसवी) दक्षिण भारत के केरल राज्य के कालडी़ ग्राम में हुआ था। ये अद्वैत वेदान्त के प्रणेता, संस्कृत में उपनिषद के व्याख्याता और वेदों को उन्नत करने का कार्य किया। इसी प्रकार आदि शंकराचार्य ने 788 ईसवी-820 ईसवी में हिन्दू धर्म को स्थापित एवं प्रतिष्ठित किया है। इसे यह स्पष्ट होता है की सनतन धर्म (हिन्दू धर्म) का जन्म 788 ईसवी-820 ईसवी में आदि शंकराचार्य द्वारा हुवा।

  2. बाबाsaheb म्हणतात. The budha was against violence, but he was in favour of justice and where justice repuired he permitted the use of force. हे पटवुन देण्यासाठी बाबांनी एक उदा. दिले आहे. सिँहसेनापती बुध्दांच्या अहिँसेचे आकलन न झाल्याने, आपल्या शंकेचे निराकरण करण्यासाठी जेव्हा बुध्दांकडे गेले. बुध्द अहिँसा शिकवतात तर गुन्हेगाराला शिक्षा करु नये, असे बुध्द शिकवितात काय? आमच्या आया बाया आणि संपतीचे रक्षण धोक्यात आले तरी आम्ही युध्द करु नये हि बुध्दांची शिकवण आहे काय? अहिँसेचा नावाखाली आम्ही अन्याय सहन करावा काय? सत्य आणि न्यायासाठी युध्द करावे लागत असेल तर बुध्द असे युध्द निषिध्द मानतात काय? यावर बुध्द उतरले? मीजे सांगतो त्याचा तुम्ही चुकीचा अर्थ घेतला आहे. गुन्हेगाराला शिक्षा द्यायला हवी आणि निरपराध व्यक्तीची मुक्तता करायला हवी. न्यायधीश गुन्हेगाराला शिक्षा ठोठावत असेल तर तो दोष गुन्हेगाराचा आहे.युध्द होवु द्या. परंतु ते स्वार्थासाठी नसावे.

    • आपके कमेन्ट के लिए हार्दिक धन्येवाद , कृपया इस कमेन्ट को हिंदी या अंग्रेजी में भी लिखें ताकि आपकी बात क्यादा लोगों तक पहुच सके

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