29-oct-2012 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- “बहुजनों को अन्य धर्मों में कन्वर्ट की जगह अपने बौद्ध धम्म में ही क्यों लौटना उचित है…समयबुद्धा


बहुजनों को अन्य धर्मों में कन्वर्ट की जगह अपने बौद्ध धम्म में ही क्यों लौटना उचित है 

bahujan

धर्म असल में परिवार,कौम,देश,सरकार अदि की ही तरह एक ‘संस्था’ मात्र है| संस्था किसी लक्ष्य के लिए बनाई जाती है,जो समय के साथ बड़ी हो जाती है | धर्म संस्था का मुख्य लक्ष्य उससे जुडी कौम के व्यक्तिगत और सामाजिक सुरक्षा की नीति निर्धारण और क्रियान्वयन है|बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने कई सालों तक  विभिन्न धर्मों का अध्ययन किया और बौध धर्म को चुना| उन्होंने कहा था की

अगर में शोषित समाज से भी होता तो भी एक अच्छा इंसान होने के नाते मैं सर्व जीवा हितकारी बौद्ध धम्म ही चुनता

बाबा साहब ने बौद्ध धर्म यूं ही नहीं स्वीकार किया था, वो बुद्ध की अच्छाई से ही प्रभावित नहीं हुए थे बल्कि उनको पता था की उनकी अनुपस्थिति मे बुद्ध का धर्म ही अछूतो को मुक्ति दिला सकता है, उन्हे बुद्धि, बल, ऐश्वर्य के शिखर पर पहुचा सकता है। बौद्ध धर्म ने ये काम बहुत पहले भी किया था, तभी ब्राह्मणो की बौद्धों से भयानक लड़ाई हुई थी। बौद्ध धर्म ने सारी वर्णव्यवस्था ध्वस्त कर दी थी। बुद्ध ने संघ मे सबको समान स्थान दिया, लेकिन ये समानता सामाजिक स्रत तक पहुच गयी, बुद्ध की ही क्रांति का नतीजा था की उनके मृत्यु के 100 साल के अंदर ही शूद्र राजा बन गए, नन्द वंश पहले शूद्र राजाओं का वंश था। मौर्य वंश भी शूद्र राजाओं का वंश था। बाबा साहब को पता था की उनकी अनुपस्थिति मे बौद्ध धर्म ही उनका स्थान पूरा कर सकता है, और कोई नहीं। उनका सारा संघर्ष बौद्ध मार्ग पर ही लड़ा गया था। उनको सारी सफलता बुद्ध पाठ पर चलकर ही मिली थी।

ये बहुत बड़ा विषय है जिस पर मैं अलग से किताब लिख रहा हूँ पर क्योंकि ये भूमिका से सम्बन्ध रखता है तो इसे अछूता छोड़ जाना ठीक न होगा,कुछ तथ्य  यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ  :

  • अन्य धर्मों की तरह बौध धर्म/धम्म का उद्देश्य किस इश्वरी शक्ति और उसकी किताब के बहाने सामाजिक संगठन बनाकर व्यक्ति को इश्वर और उसके ठेकेदारों के भरोसे छोड़ना नहीं है अपितु उसे इस लायक बनाना है की वो अपना भला खुद कर सके इसीलिए भगवन बुद्ध की मूर्ति पर “अतः दीपो भव” अर्थात अपना दीपक खुद बनो किसी पर भी निर्भर न रहो, लिखने का चलन है|
  • बौद्ध धम्म को हम धर्म न कहकर धम्म इसलिए कहते हैं क्योंकि अन्य धर्मों की तरह केवल आस्था,गुटबाजी,पुरोहितवाद, ईश्वरवाद और उनसे जुडी मान्यताओं पर नहीं चलता| इसका लक्ष्य मानव में ऐसे मानसिक योग्यता पैदा करना है जिससे वो असत्य को पहचान और नकार सके, सत्य और प्रमाणिकता के बिना कुछ भी स्वीकार न करे, ईश्वरवाद रुपी शोषक और पुरोहित पालक सिधांत का बहिष्कार कर सके, परिणाम स्वरुप अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से दुखों का कारण जानकार निरंतर निवारण कर सके|
  • संसार में अगर कुछ सर्वोपरि और शक्तिशाली है तो वो बुद्धि और ज्ञान है और समस्त बौध धम्म में बुद्धि के विकास  पर बहुत जोर दिया गया है|
  • इसके लिए निम्नलिखित पञ्च शील और अष्टांगिक  मार्ग का प्रावधान है:

*पञ्च शील:

-पाणातिपाता वेरमणी सिक्खापदम् समदियामी – मैं जीव हत्या से विरत (दूर) रहूँगा, ऐसा व्रत लेता हूँ.

-अदिन्नादाना वेरमणी सिक्खापदम् समदियामी – जो वस्तुएं मुझे दी नहीं गयी हैं उन्हें लेने (या चोरी करने) से मैं विरत रहूँगा, ऐसा व्रत लेता हूँ.

-कामेसु मिच्छाचारा  वेरमणी सिक्खापदम् समदियामी – काम (रति क्रिया) में मिथ्याचार करने से मैं विरत रहूँगा ऐसा व्रत लेता हूँ.

-मुसावादा वेरमणी सिक्खापदम् समदियामी – झूठ बोलने से मैं विरत रहूँगा, ऐसा व्रत लेता हूँ.

-सुरामेरयमज्जपमादट्ठाना वेरमणी सिक्खापदम् समदियामी – मादक द्रव्यों के सेवन से मैं विरत रहूँगा, ऐसा वचन लेता हूँ

ये पांच वचन बौद्ध धर्म के अतिविशिष्ट वचन हैं और इन्हें हर गृहस्थ इन्सान के लिए बनाया गया था

*अष्टांग मार्ग: बौद्ध धर्म के अनुसार, चौथे आर्य सत्य- दुःख निरोध पाने का रास्ता – अष्टांग मार्ग है। जन्म से मरण तक हम जो भी करते है उसका अंतिम मकसद केवल ख़ुशी होता है,तो  निर्वाण(स्थायी ख़ुशी)  सुनिश्चित करने के लिए हमें जीवन में इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए:

१. सम्यक दृष्टि : चार आर्य सत्य में विश्वास करना
२. सम्यक संकल्प : मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा करना
३. सम्यक वाक : हानिकारक बातें और झूठ न बोलना
४. सम्यक कर्म : हानिकारक कर्में न करना
५. सम्यक जीविका : कोई भी स्पष्टतः या अस्पष्टतः हानिकारक व्यापार न करना
६. सम्यक प्रयास : अपने आप सुधारने की कोशिश करना
७. सम्यक स्मृति : स्पष्ट ज्ञान से देखने की मानसिक योग्यता पाने की कोशिश करना
८. सम्यक समाधि : निर्वाण पाना और अहंकार का गायब होना

  • बौध धम्म पूर्णतः वैज्ञानिकता पर आधारित धर्म है जहाँ प्रमाणिकता के बिना कुछ भी स्वीकार्य नहीं, जबकि अन्य सभी धर्मों के सिद्धांत केवल आस्था और परंपरा के बल पर चल  रहे हैं| अब भी दुनियां में ऐसा बहुत कुछ है जो वैज्ञानिकता और इंसान के समझ के परे है जिसे अन्य धर्म अपने धर्म से जोड़कर जनता को अपने साथ मिलाये रखते हैं| मूल बुद्ध धम्म शिक्षाओं में ऐसा नहीं है, भगवान् बुद्ध ने इस विषय में कहा है संसार के सभी तथ्यों को दो भागों में बाटा है

-एक वर्णनिये अर्थात जिसे अस्तित्व हो या तर्क से प्रमाणित किया जा सके उदाहरण के लिए जीवन में दुःख के कारन और निवारण

-दूसरा अवर्णनिये जिसका जवाब कल्पना से देने की बजाये तथागत ने उसे आने वाले समय पर छोड़ दिया|तथागत दूर द्रष्टा थे वे जानते थे कि जिसका वर्णन उस समय नहीं किया जा सकता जब सवाल उठाया गया हो पर ये संभव है की समय बीतने के साथ वैज्ञानिक तरक्की उस सवाल का जावाब दे देगी| उदाहरण के लिए खगोलिग़ घटनाओं सूरज चाँद अदि को देविये शक्ति  की कल्पना की बजाये अवर्णनिये छोड़ा|आज के वैज्ञानिक युग में हम जानते हैं की सत्ये क्या है जबकि बाकि के सभी धर्मों में जिस भी सवाल का प्रमाणिक जवाब नहीं मिला उसका काल्पनिक जवाब खोज कर धर्म ग्रन्थ से जोड़ दिया गया जो आस्था बन गई|

  • भारत देश की हर समस्या की जड़ सामाजिक बटवारे की वजह से फैले असुरक्षा की भावना में है जिसकी वजह से हर कोई बस अपने को शक्तिशाली कर लेना चाहता है जिसके लिए चाहे उसे भ्रस्टाचार और गद्दारी  ही क्यों न करना पड़े| इस  समस्या का एक ही जवाब है “बौधमय भारत”, केवल बौध धर्म ही विशुद्ध भारतीय धर्म है जो पूर्णतय वैज्ञानिक दृष्टीकोण पर आधारित है| इस धर्म में पाखंड और सामाजिक बटवारे की कोई जगह ही नहीं है|
  • बौध धर्म हर उस व्यक्ति का धर्म है जो मन से समानता चाहता है और जियो  और जीने दो की नीति पर चलता है ,  समानता (अवसरों की) इसलिए जरूरी है क्योंकि भारत देश की सभी समस्याओं की जड़ जनता का जातिगत और सांप्रदायिक बटवारा है |
  • सामाजिक असमानता या जातिगत आकड़ों  पर पार्टी और वोट  के आधार पर बनी सरकार कोई भी देश हित का एक सर्व सम्मत फैसला नहीं ले पाती| देश हित के फैसलों के ऊपर वोट बैंक हित हावी हो जाता है |
  • ये तय है की जो भी हिंदुत्व के पाखंड को समझ जाता है वो इसे छोड़ना चाहता है |जैसे जैसे पाखंड की परतें खुल रहीं हैं  लोग इसे छोड़कर विदेशी धर्मों की तरफ  रुख कर रहे हैं क्यों स्वदेशी बौद्ध धर्म का बेहद कम प्रचार के कारण इस बेहतरीन  विकल्प के बारे में नहीं सोचते और विदेशी धर्म के मिशन के जाल में फस जाते हैं |
  • विदेशी धर्म भारत की एकता और अखंडता के लिए कितने लायक है आप खुद समझ सकते हैं और हिंदुत्व असमानता और पाखंड को बढ़ता है| इस अवैज्ञानिक धर्म में किसी भी गेर हिन्दू को शामिल करने का कोई प्रवेश द्वार नहीं हैं |
  • ऐसे में केवल पूर्णतः स्वदेशी बौद्ध धर्म ही भारत की धार्मिक जरूरत का बेहतरीन विकल्प है | केवल बौद्ध धम्म के ही पास ही  सभी अधायात्मिक जिज्ञासाओं का सही और वैज्ञानिक वर्णन है< हम सभी जानते हैं की बौद्ध धर्म आस्था पर नहीं प्रमाणिकता पर आधारित है |
  • भारत देश ही नहीं परमाणु और रसाइनिक बम्ब के जखीरे  पर बैठी ये दुनिया के लिए भी बौद्ध धर्म बेहतरीन मार्ग और विकल्प है
  • विशेष कर भारत देश में जिस तरह हर कौम देश और सत्य-मार्ग को छोड़कर केवल अपनी कौम को ही बढ़ावा देने में लगे हैं, उससे भारत देश का भविष्य बहुत डरावना हो सकता है|
  • इन सभी बातों को असल में बुद्धिजीवी हिन्दू भी समझते हैं पर आंबेडिकरवादियों द्वारा इस धर्म को अपनाने की वजह से खुल कर बौद्ध धर्म को नहीं अपनाते | भगवान् बुद्ध ने कहाँ है की “मोह में हम किसी की बुराई नहीं देख सकते और घृणा  में हम किसी की अच्छाई नहीं देख पाते “
  • अगर आप बौध धर्म का अन्य सभी धर्मों से निष्पक्ष होकर तुलनात्मक अध्यान करें तो आप अपने विवेक से जान जायेंगे की अंतिम सत्ये तो यही है बाकि तो बस सामाजिक गुटबाजी और पुरोहित वर्ग को पालने का पाखंड है | बौद्ध धर्म हर कसोटी पर खरा उतरता है यही कारण है की जो भी इसे ठीक से जान जाता है वो कहीं नहीं जाता, उसे फिर सभी धर्मों की सच्चाई और जड़ें साफ़ दिखने  लगती है |
  • भारत के सम्पूर्ण इतिहास में केवल बौध काल ही ऐसा समय है जब भारत अपनी चरम उन्नति पर था और दुनिया भर से लोग पढने यहाँ आते थे|नालंदा,तक्षशिला आदि अनेकों बौध विश्वविधालय ने शिक्षा के दरवाज़े सबके लिए खोल दिए जो इससे पहले संस्कृत जैसी कोड भाषा में वर्ग विशेष तक ही सीमित थे | केवल बौध काल  में ही भारत विश्व गुरु बना |
  • आज इस धर्म का प्रचार मीडिया में इसलिए नहीं होता क्योंकि ये सभी धर्मों में व्याप्त अंधविश्वास की काट करता है जिससे कई धर्म के नाम पर कमाई करने वालों के हितों पर घोर अघात होता है
  • पर जो भी हो धीरे धीरे ही सही सत्य फ़ैल ही जाता है  |

 बौद्ध धर्म साहित्य  के विषय में लोग अक्सर कहते हैं कि इसमें कई बार भ्रामक स्तिथि बन जाती है , असल में ये एक  प्राचीन साहित्य है और आधुनिक युग तक पहुचते पहुचते इसमें काफी मिलावट हो गई है|इसी वजह से कई बार भटकाव कि स्थिथि बन जाती  है, खासकर उस समय कि ब्रह्मणि मिलावट ने तो अर्थ का अनर्थ कर दिया है,पर जब आप मूल सिद्धांत समझ जाते हैं तो वो मिलावट आपको साफ़ समझ में आने लगती है,समय आने पर इसे भी ठीक कर दिया जायेगा | मूल  बौद्ध सिद्धांत और मार्ग सबके लिए हैं ये इतने अच्छे हैं कि आप इनसे  किसी और धार्मिक गुट में रहने के बावजूद अपना जीवन सवार सकते हो, पर संघ में लौट आने से आप और भी ज्यादा लाभान्वित होते हो|

इस्लाम के बुद्धिजीवी वर्ग भी बौद्ध धम्म का कायल है, उदाहरण स्वरुप महान उर्दू लेखक/शायर अल्लामा इकबाल जी के द्वारा लिखी गयी एक ग़ज़ल प्रस्तुत है :

कौम ने पैग़ामगौतम की ज़रा परवा की

क़द्र पहचानी अपने गौहरयकदाना की

 

आह बदकिस्मत रहे, आवाज़हक़ से बेख़बर

ग़ाफ़िल अपने फल की शीरीनी से होता है शजर

 

आशकार उसने किया जो ज़िन्दगी का राज़ था

हिन्द को लेकिन खयाली फलसफे पे नाज़ था

 

शमाहक़ से जो मुनव्वर हो ये वोह महफ़िल थी  

बारिशरहमत हुई, लेकिन ज़मीं काबिल थी

 

आह शूद्र के लिए हिंदोस्तां ग़मखाना है

दर्दइंसानी से इस बस्ती का दिल बेगाना है

 

बरहमन सरशार है अब तक मयपिन्दार में

शमागौतम जल रही है महफ़िलअग्यार में

 

बुतकदा फिर बाद मुद्दत के मगर रोशन हुआ

नूरइब्राहीम से आज़र का घर रोशन हुआ

 

फिर उठी आखिर सदा तौहीद की पंजाब से

हिन्द को एक मर्दकामिल* ने जगाया ख़्वाब से

इस ग़ज़ल का हिंदी रूपांतरण इस प्रकार है:

इस देश ने गौतम बुद्धा के महान सन्देश की परवाह नहीं की

इन्होने अपने एकमात्र इकलौते मोती को बिलकुल भी नहीं सराहा

आह ये देश कितना दुर्भाग्यशाली है जो सत्य जानने के बुलावे से अनजान रहा

ये देश वो पेड़ है जो अपने ही फल की मिठास से अपरिचित रहा

उन्होंने जो भी प्रमाणित सत्य था सबको खुलकर बता दिया

पर इस देश को अपने काल्पनिक ढोंग पर नाज रहा

ये देश वो महफ़िल न बन सकी जो सत्य की रौशनी से जगमगाती

इस देश पर करुणा की बारिश हुई पर जमीन उसे लेने के काबिल न हुई

आह हिन्दुस्तान इन शूद्र(बहुजन)  के लिए असहनीय दुखों से भरा है

इंसान के दर्द और दुखों से इस बस्ती के ह्रदय पर कोई असर नहीं होता

आज भी ब्राह्मण अपने झूठे अभिमान के नशे में चूर है

भगवान् बुद्धा के ज्ञान की रेशनी अनजानों में फ़ैल रही है

जो भी हो अब युगों बाद फिर लगता है कि सत्य का मंदिर रौशन हुआ

इब्राहम कि रौशनी से एक बार फिर इस का दमन रौशन हुआ

आखिरकार पंजाब से फिर एक ही इश्वर/सत्य की लहर उठी है

इस महान इंसान या गुरु ने फिर लोगों को नींद से जगा दिया

मर्दकामिल= महान इंसान (यह संबोधन उन्होंने गुरु नानक देव जी के लिए किया है शायद उन्हें आंबेडकर के संगर्ष के बारे पता नहीं होगा पर अगर यहाँ उन्हें भी लिख देते तो कोई फर्क न था)

इस देश के हारे हुए बौद्धों ने अपनी सत्ता के पतन से लेकर आंबेडकर संविधान लागू होने तक लगभग ढाई हज़ार साल गुलाम बनकर भूखे, नंगे, बेइजति, अशिक्षा और डर से भरा नर्किये जीवन जिया| आज किसी भी इश्वर के नाम पर बनी पुरोहितपालक  लूटशाला जाने से पहले इस देश का दलित खुद से ये क्यों नहीं पूछता की तब ये ‘इश्वर’ कहाँ था,इसने तब हमारे लिए कुछ क्यों नहीं किया| आज आंबेडकर संगर्ष के चलते थोड़ी सम्पन्नता आई है तब क्यों अपनाया?पता नहीं हमारे लोग कब समझेंगे की इश्वर और शैतान एक ही कल्पना के दो रूप हैं जिन्हें हर देश के शोषक पुरोहित्वर्ग वक्त और जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करके आम जनता पर परोक्ष या अपरोक्ष रूप से शाशन करते हैं|

मैं जानता हूँ आस्था अंधी होती है आप लोग ये नहीं समझ सकते की इश्वर के नाम पर आप जहाँ जाते हो वो लूटशाला आपके शोषक के संवर्धन के लिए है| हो सके तो मेरी एक विनती मान लो, आप जाना चाहते हो जाओ पर  कम से कम अपने शोषणकारी को दान देकर और मजबूत मत करो|तुम्हारे आस्था के ही शब्दों में कहूँ तो इश्वर हमको देता है हम उसे कैसे दे सकते हैं|अगर दान ही करना है तो क्यों अम्बेडकरवादी विचारों को फ़ैलाने में अपना धन खर्च नहीं करते| सदा ध्यान रखना आपके दान से ही आपको गुलाम रखने की योगना बनायीं और क्रियान्वित की जाती है|अगर आप ये बात नहीं समझ सकते तो शोषण सहने के लिए तैयार रहो|…

अब ये फैसला आपके हाथों  में है की आप अभी भी अपने शोषणकारियों  के काल्पनिक देवी देवताओं से सहारे की उम्मीद करते हैं या अपनी बुद्धि,अम्बेडकर विचारधारा और बुद्ध की शरण में जाकर ज्ञान से अपना जीवनोद्धार करते हैं |

समयबुद्धा

jileraj@gmail.com

8 thoughts on “29-oct-2012 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- “बहुजनों को अन्य धर्मों में कन्वर्ट की जगह अपने बौद्ध धम्म में ही क्यों लौटना उचित है…समयबुद्धा

  1. मै बहुत बहुत आभारी हुँ ।अध्ययन कर्नेका मौका मीला ।

  2. boudha dharam ka itihas jankar khushi. our dukh hota he unlogo ki soch per jo jan kar bhi anjan bante hae.

  3. बहुत ही बढिया पोस्ट !! शायद अब तक की सबसे अच्छी !! तथ्यों और सच्चाई के बिलकुल करीब … लिखते रहे ऐसा ही सदा…
    भवतु सब मंगल …

  4. Pingback: 16-MAR-2014 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा विशेष धम्म देशना: बौद्ध धम्म पर दस बुनियादी सवाल जवाब.…सम

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