28-Dec-2012 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:”हमें आज भीख मांगने वाले निर्बल भिक्षु नहीं चाहिए बल्कि परीपक्व व् गुणवान QUALITY बौद्ध भंते या धम्म्दूत की जरूरत है”


हमें आज परीपक्व व् गुणवान QUALITY बौद्ध भंते या धम्म्दूत की जरूरत है

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बौद्ध काल में बौद्ध भंते या धम्म्दूत इतनी परीपक्व व् गुणवान थे की वे बड़े

से बड़े

धाम दुरंधर को अपनी तर्क शक्ति और बौद्ध सिद्धांतों की महानता के बल पर बौद्ध धम्म में परिवर्तित कर लिया करते थे| नागसेन और राजा मिलिंद की पुस्तक मिलिंद पन्नो इसका एक उदाहरण है|

क्या आज हमारे पास ऐसे गुणवान भंते हैं , अगर नहीं तो क्यों नहीं हैं ? ये हमें सोचना होगा इसका समाधान करे बिना धाम का कारवां आगे नहीं बढ़ सकता|
आईये सबसे पहले बौद्ध धम्मानुसार भिक्षु और उपाशक अर्थात बौद्ध जनता में फर्क समझते हैं

१. भिक्षु शादी नहीं कर सकता ……..उपासक (गृहस्थ) कर सकता है.

2. भिक्षु की कोई सम्पति नहीं हो सकती……उपासक(गृहस्थ) की हो सकती है

3. भिक्षु के लिए प्राणी -हत्या अनिवार्य तौर पर वर्जित है……..उपासक (गृहस्थ) ( अवस्था -विशेष में) जीव-हत्या कर भी सकता है……

४. पंचशील दोनों के लिए सामान है. लेकिन भिक्षु के लिए वह व्रत की तरह है ( भिक्षु के लिए दंडनिय भी है.)…..उपासक(गृहस्थ) के लिए वह अनुकरनिय्शिल- मात्र है….

५. भिक्षु गृह त्याग करता है, संसार त्याग नहीं करता….वह अपने घर को इसलिए छोड़ता है ताकी उसे उन लोगो की सेवा करने का अवसर और मौका मिल सके जो अपने – अपने घर में बुरी तरह आसक्त है, दुखी है, चिंता में पड़े है, जिन्हें चैन नहीं और सहायेता की अपेक्षा है….

६. भिक्षु के लिए सारा संसार ही अप घर है…
व्येक्तिगत साधन में कोई कितना भी ऊँचा क्यों न हो यदि कोई भिक्षु पीड़ित मानवता की और से उदासीन है तो वह भिक्षु नहीं है.

७. भिक्षु को धर्म (धम्म ) प्रचार के लिए संघर्ष करना चाईए….भिक्षु के लिए संघटित संघ भी होता है…
|आज बहुजन समाज तेजी से बौध धम्म की तरफ लौट रहा है| इसलिए वो समय आ गया है जब हमें धम्म की पिछले ढाई हज़ार साल में भारत में दुर्दशा के कारण और निवारण खोजने होंगे|भगवन बुद्धा ने कहा है की बिना सोचे समझे परम्पराओं की नक़ल केवल कष्ट ही बढ़ता है| मेरा मानना है की मुख्य कारण ‘भिक्षा माँगना’ है जिसने धम्म जी जड़ को ही कमजोर कर दिया है| इसीलिए मैं बौद्ध भंते को भिक्षु न कहकर धम्मदूत या धम्माधिकारी कहने/मानने की देशना देता हूँ|इन धम्मदूतों के जीवन निर्वाह की जिम्मेदारी बौद्ध समाज की है,इसके लिए हर पूर्णिमा को बौद्ध विहार में चंदा इकट्टा करना होगा …समयबुद्धा

मेरा मानना है की जिन्दगी के 10% दुःख धन से दूर किये जा सकते हैं| यदि हमारे धम्मदूतों को अपनी आजीविका की चिंता नहीं रहेगी तो वे और भी ज्यादा तत्पर होकर धम्म प्रचार कर पाएंगे|मैंने ऐसा भी देखा है की बौद्ध विहार पर एक भी उपासक झाकने नहीं आता इस कारण बौद्ध भिक्षु को घर घर जाकर भीक मांगनी पड़ती है| जो समय वो भीक मांगने और बदले में दुत्कार पाने में लगता है वही समय यदि धम्म प्रचार में लगे तो ज्यादा भला होगा| हमारे समाज में प्रतिभा के धनि कई बुद्धिमान लोग हैं जो धम्म के लिए अद्भुत योगदान कर सकते हैं पर उनकी चिंता है की अगर वो अपना जीवन धम्म को दे दें तो उनके पास आजीविका के लिए भिक्षा मांगे के अलावा कोई चारा नहीं रह जायेगा, ये सोच वे पीछे हट जाते हैं|

धयान रहे पुरातन काल में राजाश्रय अर्थात राजा के खजाने पर बौद्ध भिक्षु की आजीविका चलती थी|मतलब बौद्ध धम्म राजाश्रित है, अब हमें इसे जनताप्रिये और आत्मनिर्भर बनाना है| आज के युग में जो राजा(गोवेर्नमेंट) है वो बौद्ध धम्म का कितना भला करना चाहता है आप समझ सकते हो |

5 thoughts on “28-Dec-2012 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:”हमें आज भीख मांगने वाले निर्बल भिक्षु नहीं चाहिए बल्कि परीपक्व व् गुणवान QUALITY बौद्ध भंते या धम्म्दूत की जरूरत है”

  1. Buddhism is not an intellectual way but a practical way. To spread Dhamma GYAN PRATAP (power of knowledge) is not enough but it is needed DHYAAN PRATAP (power of meditation) and SHEEL PRATAP (power of morality). Associated with these two elements GYAN PRATAP shall be effective otherwise lectures and books means nothing, change none.

    • Dear Chandra ji,

      I am greatful that you commented on my article, please keep contributing.I agree that teachings of Buddhism are error free, but limitation is that level which you are talking is for high IQ people.So still after 2500 years of worst phase, will we not try to consider comman man in our religion.

      Secondly reply my one question AMONG SAFTY to SURVIVE (LIFE) and knowing truth (Buddhism Theory) what is important. If one person or community will die what they will do of truth and wisdom.Dont you remember or know how manny Buddhist monks were murdered,Thwey were also full of Dhamma GYAN PRATAP. We have to learn from our mistakes and Practical approach is LIFE safty first then anything else. Religion and philosophy is nothing but a tool of being safe and let community being safe.

      I just know one thing and tell everybody one thing…there are other religions which will come in competetion of survival with Buddhism at some point of time. So our community thinks that this religion DHAMMA will be able to counter that situation, but in front of DEATH will this philosophy work.

      Cicero says—[Tusc., i. 31.]—“that to study philosophy is nothing but to prepare one’s self to die.”

      That is why people say Buddhism as self hypnotism, whereby one attains a level where his life become useless and as good as death, so killing such person is acceptable.

      Think of peak of Buddhism ,Think of a fact that 20% of population become BHIKSHU and begging in street, Is is acceptable…a major chunk of population become good for nothing….

      I believe that Religion is institution for human safty and survival .We have to learn form our MISTAKES in past otherwise History will repeat,and I dont want my community to be misguided towards sure DEATH.

      I am open to discuss and debate may be my thinking change or I know chances of correction are always there…Keep writing

      Suraksha hai to Satye hai
      SAMAYBUDDHA

  2. Me ajeet singh bauddh dhamm ke liye har tarah se samrpit hu. yeh jeevan lord buddha ke naam kar chuka hu.aap to bus aadesh laro. Namoh buddhai…

    • ok

      1-Kripya bhagwaan buddha ke gyan ki baaten yahan hindi likh kar jileraj@gmail.com par bhejo,unhen yahan publish karenge
      2- jyada se jyada apne logon ko is website ko apni email ID se join karvaao taki viharon ka prasar ho sake

      apna number do hum aapko call karte hain…

      Namo Buddhay

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