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shoodra achoot dalit 

            
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 भगवान् बुद्ध द्वारा बताये गए मार्ग और शिक्षा को जानने के लिए
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“सत्य जाने के मार्ग में इंसान बस दो ही गलती करता है ,एक वो शुरू ही नहीं करता दूसरा पूरा जाने बिना  ही छोड़ जाता है “
 
भले ही हमारा मीडिया में शेयर न हो हम अपना मीडिया खुद हैं  
दोस्तों अगर हम में से हर कोई हमारे समाज के फायदे की बात अपने दस साथिओं जो की हमारे ही लोग हों को मौखिक बताये या SMS या ईमेल या अन्य साधनों से करें तो केवल ७ दिनों में हर बुद्धिस्ट भाई के पास  हमारा सन्देश पहुँच सकता है | इसी तरह हमारा विरोध की बात भी 9 वे दिन तक तो देश के हर आखिरी आदमी तक पहुँच जाएगी | नीचे लिखे टेबल को देखो, दोस्तों जहाँ चाह वह राह, भले ही हमारा मीडिया में शेयर न, हो हम अपना मीडिया खुद हैं :
1ST DAY =10
2ND DAY =100
3RD DAY =1,000
4TH DAY =10,000
5TH DAY =100,000
6TH DAY =1,000,000
7TH DAY =10,000,000
8TH DAY =100,000,000
9TH DAY =1,000,000,000
10TH DAY =1,210,193,422
 
बौध साहित्य बहुत विस्तृत है, अकेला कोई उतना नहीं कर सकता जितना की हम सब मिल कर कर सकते हैं| ये केवल मेरे अकेले की वेबसाईट नहीं,आपकी भी है ,आपसे अनुरोध है की आप बौध धर्म पर अपने आर्टिकल हिंदी में jileraj@gmail.com पर भेजे जिसे हम आपके नाम सहित या जैसा आप चाहें यहाँ पब्लिश करेंगे| आईये किताबों में दबे बौध धम्म के कल्याणकारी ज्ञान को मिल जुल कर जन साधारण के लिए उपलब्ध कराएँ |
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27-Jan-2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- “बौद्ध धम्म पर लौटना भारत देश के लिए बेहद जरूरी क्यों है”…समयबुद्धा

बौध धर्म पर लौटना भारत देश  के लिए बेहद जरूरी क्यों है:

mauryan_empire

अंग्रेजी शाशन में अंग्रेजी के प्रचार के कारण अंग्रेजों ने शिक्षा के दरवाज़े सबके लिए खोल दिए, जिससे संस्कृत जैसे कोड भाषा में छिपा कर रखी शिक्षा धीरे धीरे जनसाधारण तक पहुचने लगी

शिक्षा के दरवाज़े सबके लिए खुलने से सभी ब्रह्मण धर्म जिसे आजकल हिन्दू धर्म कहते हैं, के बारे में समझने लगे हैं की इसका पूरा डिजाइन एक वर्ग विशेष के संवर्धन और तरक्की और भारत के मूलनिवासियो में फूट डालो शाशन करो पर आधारित है

सभी समझने लगे की भारत के सारे बहुजनों को विभिन्न जातीय सम्प्रदायों में बाँट कर देश का ऐसा सत्यानाश किया है की दुनिया में से जो भी ऐरा गैरा आया भारत पर आक्रमण करके जीत गया, सबने भारत पर राज किया है|इतिहास गवाह है की भारत पर अनेकों अनेक विदेशी आक्रमण हुए जिनमे से नों आक्रमण बेहत भीषण थे| ऐसा इसलिए हुया क्योंकि हम जातिओं में बटे थे जिसकी वजह से कभी संगठित नहीं होते |यही आज भी भारत कि दुर्दशा की मुख्य वजह है |

हमारी शिक्षा व्यस्था हमें ये तो पढ़ाती है की हमारा देश सालों तक गुलाम रहा पर ये नहीं बताती की ऐसा जातिगत बटवारा और विदेशी ताकतों के आगे संगठित न होना की वजह से हुआ, भारत देश के सभी समस्याओं की जड़ जातिगत बटवारे में है और जब तक जाती और वर्ण आधारित व्यस्था ख़तम नहीं होगी जब तक भारत की आम जनता यानि बहुजन दुखी रहेगा|

बहुजन का मतलब है वो जनता जो आज एस0 सी0/ एस0 टी0 /ओ0 बी0 सी0 और कंवर्टेड मिनोरिटी के नाम से जानती जाती है जिन्हें धर्म ग्रंथों में शूद्र कहा गया है|ये लोग संगठित नहीं हैं जब एक जाती पर विपत्ति आती है तब दूसरी चुप बैठती है इस तरह सबका अलग अलग शोषण होता रहता है|

भारत का इतिहाद विदेशी आक्रमणों के सामने कमजोर पड़ने का हारने का इतिहास है| पूरे इतिहास में केवल बौद्ध काल या सम्राट अशोक के काल में ही पूरा भारत एकजुट और शक्तिशाली था, उस अच्छे शाशन की याद में हम अशोक चिन्हों को आज की सरकार में इस्तेमाल करते हैं |

इस समस्या का एक ही मूल कारन है वर्ण व्यस्था और जातिवाद और एक ही समाधान है “बौधमय भारत”, केवल बौद्ध धम्म ही विशुद्ध भारतीय धर्म है जो पूर्णतय वैज्ञानिक दृष्टीकोण पर आधारित है| इस धर्म में पाखंड और सामाजिक बटवारे की कोई जगह ही नहीं है| आज का भारत का संविधान में समानता,सबको बराबरी के अधिकार,न्याय को धर्म ईश्वर और पुरोहित से भी बड़ा मानना,सबको धार्मिक छूट,वोट का अधिकार जैसे बौद्ध शाशन प्रणाली को बाबा साहब आंबेडकर ने शामिल करके साबित कर दिया है की भारत केवल बौद्ध शाशन प्रणाली से ही संगठित रह सकता है| सोच कर देखिये की अगर किसी धार्मिक कट्टरपंती ने संविधान बनाया होता और पहले की तरह कुछ जातिओं को बड़ा और कुछ को अधिकार वंचित रखा होता तो कितना बुरा होता|

बौध धर्म हर उस व्यक्ति का धर्म है जो मन से समानता चाहता है और जियो और जीने दो की नीति पर चलता है , समानता (अवसरों की) इसलिए जरूरी है क्योंकि भारत देश की सभी समस्याओं की जड़ जनता का जातिगत और सांप्रदायिक बटवारा है |

आज सामाजिक असमानता या जातिगत आकड़ों पर पार्टी और वोट के आधार पर बनी सरकार कोई भी देश हित का एक सर्व सम्मत फैसला नहीं ले पाती| देश हित के फैसलों के ऊपर वोट बैंक हित हावी हो जाता है | इस सबका खामियाजा भारत और इसकी जनता भुगत रही है|

इतिहास गवाह है की जो भी हिंदुत्व के पाखंड को समझ जाता है वो इसे छोड़ना चाहता है |जैसे जैसे ब्राहमण धर्म की पोल खुलती जा रही है लोग इसे छोड़कर विदेशी धर्मों की तरफ रुख कर रहे हैं जो भारत के लिए अच्छा नहीं| वो ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि स्वदेशी बौद्ध धर्म का बेहद कम प्रचार के कारण इस बेहतरीन विकल्प के बारे में नहीं सोचते और विदेशी धर्म के मिशन के जाल में फस जाते हैं |

विदेशी धर्म भारत की एकता और अखंडता के लिए कितने लायक है आप खुद समझ सकते हैं और हिंदुत्व असमानता और पाखंड को बढ़ता है| इस अवैज्ञानिक धर्म में किसी भी गेर हिन्दू को शामिल करने का कोई प्रवेश द्वार नहीं हैं |फर्ज कीजिये की अगर बहार से कोई कोई अंग्रेज ब्राह्मण धर्मी या हिन्दू बनना चाहे तो उसे किस जाती में शामिल किया जायेगा|

ऐसे में केवल पूर्णतः स्वदेशी बौद्ध धर्म ही भारत की धार्मिक जरूरत का बेहतरीन विकल्प है | केवल बौद्ध धम्म के ही पास ही सभी अधायात्मिक जिज्ञासाओं का सही और वैज्ञानिक वर्णन है| हम सभी जानते हैं की बौद्ध धर्म आस्था पर नहीं प्रमाणिकता पर आधारित है |

भारत देश ही नहीं परमाणु बम्ब के जखीरे पर बैठी ये दुनिया के लिए भी बौद्ध धर्म बेहतरीन मार्ग और विकल्प है|

विशेष कर भारत देश में जिस तरह हर कौम देश और सत्य-मार्ग को छोड़कर केवल अपनी कौम को ही बढ़ावा देने में लगे हैं, उससे भारत देश का भविष्य बहुत डरावना हो सकता है, गृह युद्ध और अपना अपना देश मांगने की स्तिथि को समझा जा सकता है |

इन सभी बातों को असल में बुद्धिजीवी हिन्दू भी समझते हैं पर आंबेडिकरवादियों द्वारा इस धर्म को अपनाने की वजह से खुल कर बौद्ध धर्म को नहीं अपनाते |भारत विरोधी लोगों ने अम्बेडकरवादीओं के लिए धृणा प्रचारित की है और कोई भी इनकी लाइन में खड़ा नहीं होना चाहता| भगवान् बुद्ध ने कहाँ है की “मोह में हम किसी की बुराई नहीं देख सकते और घृणा में हम किसी की अच्छाई नहीं देख पाते “ यही कारन है की संसार के विश्व गुरु रहे लोग आज दलित बनकर
अपने को कमजोर समझने पर मजबूर हैं|

बौद्ध धर्म हर कसोटी पर खरा उतरता है यही कारण है की जो भी इसे ठीक से जान जाता है वो कहीं नहीं जाता, उसे फिर सभी धर्मों की सच्चाई और जड़ें साफ़ दिखने लगती है | आज दुनिया के उन्नत देशों में बौद्ध धम्म का प्रसार बहुत तेज़ी से हो रहा है जैसे अमेरिका, आस्ट्रेलिया यूरोप आदि क्योंकि यहाँ के लोग धार्मिक पाखंड में अंधे नहीं हैं वो तर्क को समजते हैं इसलिए बौद्ध धम्म को भी समझ पा रहे हैं, जब समझ रहे हैं तो अपना रहे हैं|

बौद्ध धम्म का भारत के मीडिया में प्रचार इसलिए नहीं होता क्योंकि ये सभी धर्मों में व्याप्त अंधविश्वास की काट करता है जिससे कई धर्म के नाम पर कमाई करने वालों के हितों पर घोर अघात होता है| इसका प्रचार होने से पहले की तरह भारत से जाती और वर्ण व्यस्था का नाश हो जायेगा और जनता सुखी हो जायेगी पर वो लोग दुखी हो जायेंगे जो जाती और वर्ण व्यस्था के समर्थक हैं, आजशक्ति और धन इन्हीं के हाथों में हैं |

पर जो भी हो धीरे धीरे ही सही सत्य फ़ैल ही जाता है सबका समय आता है आम जनता और बहुजन का भी समय आएगा, जैसे जैसे विज्ञानं बढ़ेगा वैसे वैसे पाखंड कम होता जायेगा फलस्वरूप लोग समझने लगेगें और जाती और वर्ण व्यस्था कमजोर पड़ती जायेगी परिणाम स्वरुप देश का धन जमीन संसाधन और शिक्षा अधि जनता में बाटने लगेगी पहले की तरह राजे महाराजे जमींदार पुरोहित तक ही सीमित नहीं रह जायेगी|यकीन नहीं होता तो सारे बहुजन जिन्हें हम आज एस0 सी0/ एस0 टी0 /ओ0 बी0 सी0 और कंवर्टेड मिनोरिटी के नाम से जानते हैं, वो अपनी आज की स्थिति अपने ३-४ पीढ़े पहले के ही पूर्वजों से तुलना करें तप पता चल जायेगा की आंबेडकर संविधान ने उन्हें वो दिया है वो हज़ारों साल तक मनुविधान ने उनसे छीने रखा|पहले कैसा बुरा हाल था नहीं पता तो मुंशी प्रेमचंद का साहित्य पढ़ो आंबेडकर का साहित्य पढ़ो सब समझ में आ जायेगा| अब घृणा करना बंद करो और जानो बौद्ध धम्म को इसी में है आपका कल्याण, जानो सो सही मानना न मानना तो बाद की बात है …

जियो और जीने दो, बहुजन हिताए बहुजन सुखाये

….समयबुद्धा 27-Jan-2013

https://www.youtube.com/watch?v=Twbh6_ZRDVo

dhamma and dharma

 

LAUGHING BUDDHA

lafing buddha

नमो बुद्धाय,
लाफिंग बुद्ध को चीन के बौध भिक्षु पो ताई की याद में बनाया गया था, जो कि एक अरहत थे, चीनी भासा में पो का अर्थ है थैले वाला I वे लोगो से पैसे मांगते थे और उसे गरीब बच्चो को उपहार में बाट दिया करते थे i वे मोटे थे और उनका पेट बाहर निकला था ….
वे हमेसा लोगो को यही सन्देश देते थे कि इस संसार में किस प्रकाश खुश और सफल रहा जा सकता है …… उनके कुछ सन्देश इस प्रकार है ..
१. बुद्ध के …बताये मार्ग पर चल कर अपने मन को नियंत्रत रखो, जो अपने मन को नियंत्रित कर सकता है वह हमेशा श्रेष्ठ और सफल होगा i अपने आप को हरेक परिस्थितियों में सफल होने योग्य बनावो i
२. जीवन का सर्वोपरि उद्देश्य हमेशा संज्ञानता में जीना और सभी के प्रति करुना और मैत्री का व्यवहार करना है i
३. निरुद्देश्य जीवन मत जीवो , अपना उद्देश्य निर्धारित करो ..याद रखो जो भी उद्देश्य निर्धारित करो उसमे तुम्हारी और सभी कि भलाई निहित होनी चाहिए i

लाफिंग बुद्धा कि उपरोक्त मूर्ति सुख , समृद्धि बेहतर स्वास्थ्य और धन प्राप्ति का प्रतिक मानी जाती है, निश्चय ही जो इन भिक्षु के संदेशो का पालन करेगा , उसके पास सब कुछ होगा …..

 

Emperor Asoka Temple at Ningbo City, Zhejiang Province,Chaina…Article by Satyajit Maurya

“Emperor Asoka Temple at Ningbo City, Zhejiang Province,Chaina”

Article by Satyajit Maurya available on http://www.facebook.com/#!/Satyajitche

चीन देश के बौद्ध धर्म ग्रंथों के रिकॉर्ड के अनुसार चीन देश में सम्राट अशोक का नाम अयुवंग (Ayuwang) है। बुद्ध की विश्वबन्धुता की शिक्षा कई सदियों तक भारत के आसपास के देशों में मैत्री और सौम्सय की कड़ियों के बंधन में बन्धी थी और बन्धी है। बुद्ध की शिक्षा सीमाओं के परे प्रबल प्रचार हो रहा था, किन्तु भारतीय बौद्धानुयायियों को बुद्ध का ‘विश्व धम्म’ के रूप में उभरने की कोई अनुभूति नहीं थी । जब फाहियान चीन देश के ‘हान’ प्रदेश से जेतवन बौद्ध संघाराम (श्रावस्थी, उत्तर प्रदेश) में पहुचा तब भिक्षुओं का संघ फाहियान की अगवानी करते हुए आश्चर्य हुवा की “सिमावर्तीय देशो के वासी भी हमारे नियमो की खोज करने यहाँ तक आ सकते है”।379756_330660583709987_1120752531_n

यदि 2300 वर्ष पूर्व चीन भारत को अनेक वस्तुए भेज रहा था, तो भारत भी उसे बौद्ध धम्म द्वारा समृद्ध बना रहा था। 7-8AD तक विश्व जगत में भारत की पहचान बुद्धत्तरभारत के नाम से थी और है। जिन बातो को दोहरा रहा हूँ, वह इतिहास का अंग बन चुकी है। तभी इन सीधी-सपष्ट बातों की स्विकारोक्ति होनी… ही चाहिए क्यों की सम्राट अशोक ने 3-BCE से बुद्ध के विश्वबन्धुता के शिक्षा सर्वव्यापी-सर्वग्राही सहिष्णुता का प्रबल प्रचार एशिया के साथ पश्चिमी देशो में 84000 स्तुपो-शिलालेखों द्वारा और वाद-संवाद की आचार-सहिंता का व्यापक प्रचार भी किया था।

सम्राट अशोक के कार्यकाल के दौरान निर्माण किये गए 84000 हजार स्तुपो और शिलालेखों में से 19 संघाराम चीन देश में निर्माण किये गए थे, और सम्राट अशोक को चीन देश में अयुवंग (Ayuwang) से जाना जाता है । बुद्ध के महापरिनिर्वान के बाद बुद्ध के शरीर अवशेष धातुओ आठ भागों में अलग करके उनपर स्तूप बनवाये गए थे। और इसी अवशेष धातुओं को सम्राट अशोक ने 84,000 भागों विभाजित करके चीन देश के राजा को देकर उनपर स्तूप बनवाने ले आदेश दिए थे और चीन देश के सम्राट ने 19 बौद्ध स्तूप बनवाकर एक स्तूप सम्राट अशोक के नाम से चीन देश के पश्चिमी जिन वंश (Ningbo City, Zhejiang) (265-316) में बनाया था । जहा बुद्ध के सिर के अवशेष धातु रखे है। मौजूदा सम्राट अशोक के विहार की इमारत को क्विंग राजवंश (1644-1840) के बाद पुनर्निर्माण किया गया और इस नवीनीकरण का काम 1980 में पूरा किया गया, और बौद्ध सांस्कृतिक मूल्यों की देखभाल की जा राही है……..

Buddhist Flag

Buddhist Flag

From The Dhamma Encyclopedia

buddhist flag

A flag (patàka or dhaja) is a piece of fabric of a particular colour or design used for decoration or more usually to represent something. The flag now widely used to represent Buddhism was designed by the American Buddhist Henry Steel Olcott in the 1880’s as a part of his efforts to unite the Buddhists of Sri Lanka in their struggle against foreign missionaries. The flag is rectangular, with six vertical bars – blue, yellow, red, white, orange and finally a combination of all five. These stripes represent the coloured rays that emanated from the Buddha’s body when he attained enlightenment (Vin.I,25).

Colours

The five colours of the flag represent the six colours of the aura that emanated from the body of the Buddha when he attained Enlightenment:

Blue (Nila): Loving kindness, peace and universal compassion
Yellow (Pita): The Middle Path – avoiding extremes, emptiness
Red (Lohita): The blessings of practice – achievement, wisdom, virtue, fortune and dignity
White (Odata): The purity of Dhamma – leading to liberation, outside of time or space
Orange (Manjesta): The Buddha’s teachings – wisdom

 

http://www.dhammawiki.com/index.php?title=Buddhist_flag

ADHARM KYA HAI

अधर्म क्या है? आईये आज इसके बारे में थोडा जानते है…..dhan se dharm chalta hai 

 

अधर्म क्या है? आईये आज इसके बारे में थोडा जानते है…..

१.परा-प्राकृतिक में विश्वास अधर्म है…
गौतम बुद्ध कहते है, ..हर एक घटना का कोई न कोई कारन होता तो है…और वह कारन मानविए या प्राकृतिक होता है….

यदि आदमी ईश्वर से स्वतंत्र नहीं है तो उसके अस्तित्व का क्या प्रयोजन है? यदि आदमी परा प्राकृतिक में विश्वास करेगा तो उसकी बुद्धि का क्या होगा, जब सब कुछ भाग्य में लिखा हुआ है तो उसकी बुद्धि का क्या प्रयोजन है?

२. ईश्वर में विश्वास अधर्म है..
किसी ने आज तक ईश्वर को नहीं देखा और न ही उसके अस्तित्व को प्रमाणित किया….न्याययालय में, कोर्ट में मामला चलेगा तो प्रूफ के कारन ख़ारिज हो जायेगा की ईश्वर है….इश्वाराश्रित धर्म कल्पन्श्रित है ..जब किसी स्त्री से प्रेम होता है, तो बिन देखे ये तो कोरी कल्पना होगी….बिन देखे प्रेम कैसे हो सकता है?
अगर हम किसी ब्रम्हा से उत्पन्न हुए है तो सभी अनित्ये क्यों है? परिवर्तनशील  क्यों है, अस्थिर  क्यों है, अल्पजीवी क्यों है? मरणधर्मी क्यों है? हमें अमर होना था, ईश्वर जैसे….
यदि ईश्वर सर्वासक्तिमान है तो तो फिर आदमी के मन में कुछ करने की इच्छा ही नहीं होगी…न ही कुछ प्रयत्न कारने का संकल्प उनके मन में होगा….
ईश्वर  कल्याण स्वरुप है तो आदमी हत्यारे, व्यभिचारी, जूठे, चुगलखोर , लोभी, द्वेषी, कुकर्मी क्यों है? क्या अच्छे भले ईश्वbuddha handर के रहते फिर आदमी कैसे बुरा हो सकता है?

जिसके पास आंखे है वो देखा कर चलता है ताकी टकराए नहीं या देखकर किसी चीज़ को हटा लेता है…..यदि ईश्वर के आंखे है तो वह दर्दनाक हालत क्यों देखता रहता है……बलात्कारी जब बलात्कार कर रहे होते है तो वह चुपचाप कैसे देख सकता है? अगर उसकी शक्ति इतनी असीम है तो वह उस समय अवतरित क्यों नहीं हुआ? क्यों न्याययालय  की शरण में जाना पड रहा है? ईश्वर उसी समय देखकर सजा क्यों नहीं देता….ईश्वर की जनता सुखी क्यों नहीं है, दरिद्रता, ठगी, जुट क्यों है?ईश्वर को सरे श्रिषटी का रचियेता मानना गलत है

३.आत्मा में विश्वास अधर्म है….

जिसका प्रमाण नहीं वो मन्ना अधर्म है इस तरह आत्मा को मन्ना अधर्म हुआ| विज्ञानं सर्विपरि है विज्ञानं अपनी क्रिया-शील अवस्था से आदमी में उद्धेश विशेष की सिद्धि के लिए प्रेरणा देता है….

४.यज्ञ (= होम, बलि कर्म) में विश्वास अधर्म है….
पशुओं की बलि निर्दयता मात्र है…..आजकल बलि प्रथा कम हुइ है पर येज्ञ किसी न किसी करण वश चालू है…..जो प्रक्रितक संपदाओं को नष्ट करने का षड्येंत्र है….स्वर्ग की निर्मिती करके पापो से बचने का एक झूटी सोच मात्र है..पूजा पाठ के नाम पर पण्डे को पलने की साजिश है…

५.कल्पना के आधार पर विश्वाश अधर्म है….बिना तर्क के विश्वाश करना अधर्म है…=

६.धर्म की पुस्तको का केवल वचन मात्र अधर्म है …. ब्राह्मण धर्म की किताबे पड़कर आजतक कोई अविष्कार नहीं कर पाए….

७.धर्म की किताबो की गलती को स्वीकार नहीं करना अधर्म है…..धर्म की किताबो की गलती की संभावना से परे मानना अधर्म है….
 

बुद्ध के पुनर्जन्‍म का रहस्‍य–ओशो

बुद्ध के पुनर्जन्‍म का रहस्‍य

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बुद्ध के पुनर्जन्‍म का रहस्‍य–ओशो

यह जरा कठिन बात है। इसलिए मैंने कल छोड़ दिया था, क्‍योंकि इसकी लंबी ही बात करनी पड़ेगी, लेकिन फिर भी थोड़े में समझ लें। सातवें शरीर के बाद वापिस लौटना संभव नहीं है। सातवें शरीर की उपलब्‍धि के बाद पुनरागमन नहीं है। वह प्‍वाइंट ऑफ नौ रिटर्न है। वहां से वापिस नहीं आया जो सकता। लेकिन दूसरी बात सही है जो मैंने कही है…..कि बुद्ध कहते है कि मैं एक बार और आऊँगा, मैत्रेय के शरीर में….मैत्रेय नाम से एक बार और वापस लौटूंगा। अब ये दोनों ही बातें तुम्‍हें विरोधी दिखाई पड़ेगी, क्‍योंकि मैं कहता हूं, सातवें शरीर के बाद कोई वापिस नहीं लौट सकता। और बुद्ध का यह वचन है कि वापिस लौटगें और बुद्ध सातवें शरीर को उपलब्‍ध होकर महानिवार्णा में समाहित हो गये है। तब यह कैसे संभव होगा? इसका दूसरा ही रास्‍ता है।

असल में सातवें शरीर में प्रवेश के पहले…..अब तुम्‍हें थोड़ी सी बात समझनी पड़े….जब हमारी मृत्‍यु होती है तो भौतिक शरीर गिर जाता है, लेकिन बाकी कोई शरीर नहीं गिरता। मृत्‍यु जब हमारी होती है तो भौतिक शरीर गिरता है, बाकी छह शरीर हमारे….हमारे साथ रहते है। जब कोई पांचवें शरीर को उपलब्‍ध होता है, तो शेष चार शरीर गिर जाते है और तीन शरीर शेष रह जाते है, पांचवां, छठवाँ और सातवां। पांचवें शरीर की हालत में, यदि कोई चाहे…यदि कोई चाहे…पांचवें शरीर की हालत तो में, तो ऐसा संकल्‍प कर सकता है कि उसके बाकी दूसरे और तीसरे और चौथे शरीर रह जायें। और अगर वह संकल्‍प गहरा किया जाये, और बुद्ध जैसे आदमी को यह संकल्‍प गहरा करने में कोई कठिनाई नहीं है, तो वह अपने दूसरे तीसरे और चौथे शरीर को सदा के लिए छोड़ जा सकता है। ये शरीर शक्‍ति पुंज की तरह अंतरिक्ष मैं भ्रमण करते रहेंगे। दूसरा इथरिक जो भाव शरीर है।

तो बुद्ध की भावनाएं….बुद्ध ने अपने अनंत जन्‍मों की भावनाएं अर्जित की है, वे इस शरीर की संपति है। उसके सब सूक्ष्‍म तरंग इस शरीर में समाहित है। फिर एस्‍ट्रल बॉडी, सूक्ष्म शरीर,इस सूक्ष्‍म शरीर में बुद्ध के जीवन की जितनी सूक्ष्मतम कर्मों की उपलब्धियां है, उन सके संस्‍कार इसमें शेष है। और चौथा शरीर मनस शरीर, मेंटल बॉडी बुद्ध के मनस की सारी अपलब्धि या, और बुद्ध ने जो मनस के बाहर उपलब्‍धियां की है वह भी की तो मन से ही है। उनको अभिव्‍यक्‍ति तो मन से ही देना पड़ती है। कोई आदमी पांचवें शरीर से भी कुछ पाये,सातवें शरीर से भी कुछ पाये,जब भी कहेगा तो उसको चौथे शरीर का ही अपयोग करना पड़ेगा। कहने का वाहन तो चौथा शरीर ही होगा।

तो बुद्ध की जितनी वाणी दूसरे लोगों ने सुनी है, वह बहुत कम है। सबसे ज्‍यादा वाणी तो बुद्ध के ही चौथे शरीर ने सुनी है। जो बुद्ध ने सोचा भी है जिया भी है, देखा भी है, समझा भी है। वह सब चौथे शरीर में संग्रहीत है, ये तीनों शरीर सहज तो नष्‍ट हो जाते है—पांचवें शरीर में प्रविष्‍ट हुए व्‍यक्‍ति के तीनों शरीर नष्‍ट हो जाते है; सातवें शरी में प्रविष्‍ट हुए व्‍यक्‍ति के बाकी छह शरीर नष्‍ट हो जाते है। लेकिन पांचवें शरीर वाला व्‍यक्‍ति यदि चाहे तो इन तीन शरीरों के संघट को, संघट को, अंतरिक्ष में छोड़ सकता है। ये ऐसे ही अंतरिक्ष में छूट जायेंगे, जैसे अब हम अंतरिक्ष में कुछ स्टेशन (विराम-स्‍थल) बना रहे है—वे अंतरिक्ष में यात्रा करते रहेंगे, और मैत्रेय नाम के व्‍यक्‍ति में वे प्रकट होंगे।

सूक्ष्‍म शरीर का परकाया प्रवेश—

तो कभी जो मैत्रेय नाम की स्‍थिति का कोई व्‍यक्‍ति पैदा होगा, उस स्‍थिति का जिसमें बुद्ध के ये तीनों शरीर प्रवेश कर सकें, तो यह तीनों शरीर तब तक प्रतीक्षा करेंगे और उस व्‍यक्‍ति में प्रवेश कर जायेगे। उस व्‍यक्‍ति में प्रवेश करते ही। उस व्‍यक्‍ति की हैसियत ठीक वैसी हो जायेगी जैसी बुद्ध की थी; क्‍योंकि बुद्ध के सारे अनुभव बुद्ध के सारे भाव बुद्ध की सारी कर्म व्‍यवस्‍था का यह पूरा इंतजाम है।

ऐसा समझ लो कि मेरे शरीर को मैं छोड़ जा सकूँ इस घर में—सुरक्षित कर जा सकूँ…

जैसे अभी अमरीका में एक आदमी मरा…कोई तीन साल पहले…तो वह कोई करोड़ों डालर का ट्रस्‍ट कर गय, और कह गया कि मेरे तब तक मेरे शरीर को तब तक बचाना जब तक साइंस(विज्ञान) इस हालत में न आ जाए कि उसको पुनरुज्जीवित कर सके। तो उसके शरीर पर लाखों रूपये खर्च हो रहा है। उसको बिलकुल वैसे ही सुरक्षित रखना है। उसमें जरा भी खराबी न हो जाए। उस समय तक…अगर इस सदी के पूरा होते-होते हम शरीर की पुनरुज्जीवित कर सकें, तो वह शरीर पुनरुज्जीवित हो जायेगा।

निश्‍चित ही,उस शरीर को दूसरी को दूसरी आत्‍मा उपल्‍बध होगी, वह आत्‍मा उपलब्‍ध नहीं हो सकती। लेकिन शरीर वह रहेगा, उसकी आंखे वह रहेंगी, उसके चलने का ढंग यह रहेगा,उसका रंग वह रहेगा, उसका नाक-नक्‍श यह रहेगा—इस शरीर की आदतें उसके साथ रहेंगी। एक अर्थ में वह उस आदमी को रिप्रजेंट (पुन: प्रस्तुत) करेगा, इस शरीर से। और अगर वह आदमी सिर्फ भौतिक शरीर पर ही केंद्रित था, जैसा की होना चाहिए, नहीं तो भौतिक शरीर को बचाने की इतनी आकांशा नहीं हो सकती। तो अगर वह शरीर भौतिक शरीर ही था, बाकी शरीरों का उसे कुछ भी पता नहीं था, तो कोई भी दूसरी आत्‍मा बिलकुल एक्‍ट (क्रिया) कर पायेगी। वह बिलकुल वही हो जायेगी और वैज्ञानिक दावा भी करेंगे कि वह यही आदमी था। जो मर गया था, और इसमें कोई फर्क नहीं करेंगे। उस आदमी की सारी स्‍मृतियां जो इसके भौतिक ब्रेन में संरक्षित होंगी, वह सब जग जायेगी। वह फोटो पहचान कर बात देगा, कि यह मेरी मां की फोटो है। वह बता सकेगा कि यह मेरे बेटे की फोटो है। ये सब मर चुके है तब तक, लेकिन वह फोटो पहचान लेगा। वह अपना गांव पहचान कर बता सकेगा। कि यह रहा मेरा गांव जहां में पैदा हुआ था; और यह रहा मेरा गांव जहां मैं मरा था। और ये-ये लोग थे जब मैं मरा थ तो जिंदा थे। लेकिन यह आत्‍मा दूसरी है। लेकिन ब्रेन के पास जो मैमोरी कंटैंट्स(स्‍मृति सामग्री) है वह दूसरा है।

स्‍मृति का पुनरारोपण—

अभी वैज्ञानिक कहते है कि हम बहुत जल्‍दी स्‍मृति को ट्रांसप्‍लांट (पुन: रोपित) कर पायेंगे। यह संभव हो जायेगा। इसमें कठिनाई नहीं मालूम होती। अगर मैं मरूं तो मेरी अपनी एक स्‍मृति हे….ओर बड़ी संपत्‍ति खोती है दुनिया की; क्‍योंकि में मरता हूं तो मेरी सारी स्‍मृति खो जायेगी। अगर मेरी सारी स्‍मृति की पूरी की पूरी टेप, पूरा यंत्र मेरे मरने के साथ बचा लिया जाये—जैसे हम आँख बचा लेते है अब; कल तक आँख ट्रांसप्लांट नहीं होती थी। अब हो जाती है। अब मेरी आँख से कल कोई दूसरा देख सकेगा। सदा में ही देखू अब यह बात गलत है; अब मेरी आँख कोई दूसरा भी देख सकेगा। और सदा मेरे ह्रदय से मैं ही प्रेम करूं, यह भी गलत है; ह्रदय से कोई दूसरा भी प्रेम कर सकेगा।

अब ह्रदय के सबंध में बहुत वादा नहीं किया जा सकता कि मेरा ह्रदय सदा तुम्‍हारा रहेगा। वैसा वादा करना बहुत मुशिकल है। क्‍योंकि यह ह्रदय किसी और के भीतर से किसी और को वादा कर सकेगा। इसमे अब कोई कठिनाई नहीं रह गयी। ठीक ऐसे ही कल स्‍मृति भी ट्रांसप्‍लांट हो जायेगी। वह सूक्ष्‍म है, बहुत डेली केट (नाजुक) है—इसलिए देर लग रही है। और देर लगेगी। कल मैं मरूं तो जैसे में आज अपनी आँख दे जाता हूं आई बैंक (नेत्र कोष) को, ऐसे ही मैमोरी बैंक (स्मृति कोष) को अपनी स्‍मृति दे जाऊँ, और कहूं कि मरने के पहले मेरी सारी स्‍मृति बचा ली जाये, और किसी छोटे बच्‍चे से ट्रांसप्‍लांट कर दी जाये। तो जिस छोटे बच्‍चे को मेरी स्‍मृति दे दी जायेगी। मुझे जो बहुत कुछ जानना पड़ा,वह उस बच्‍चे को जानना नहीं पड़ेगा। वह जाने हुए ही बड़ा होगा। वह उसकी स्‍मृति का हिस्‍सा हो जायेगा। वह उसको ऐब्जार्बर (अपोषित) कर जायेगा। इतनी बातें वह जानेगा ही। और तब बड़ी मुशिकल हो जायेगी। क्‍योंकि मेरी स्‍मृति उसकी स्‍मृति हो जायेगी। और वह कई मामलों में ठीक मेरे जैसा ही उत्‍तर देगा। और कई मामलो में ठीक मेरे जैसे ही पहचान दिखलायेगा; क्‍योंकि उसके पास ब्रेन (मस्‍तिष्‍क) के पास मेरा ब्रेन है। मेरा मतलब समझ रहे हो तुम?

तो बुद्ध ने एक दूसरी दिशा में प्रयोग किया है—और भी लोगों ने प्रयोग किये है…. और वे वैज्ञानिक नहीं थे। वे आकंल्‍ट (परा वैज्ञानिक) है। उसमे दूसरे, तीसरे और चौथे को संरक्षित करने की कोशिश की गयी है। बुद्ध तो विलीन हो गये। वह जो आत्‍मा थी, वह जो चेतना थी जो इन शरीरों के भीतर जीती थी। वह तो खो गयी। सातवें शरीर से,लेकिन खोने के पहले वह इंतजाम कर गयी है कि यक तीन शरीर ने मरे। वह इनको संकल्प की एक गति दे गई है।

समझ लो कि मैं एक पत्‍थर फेंकूंगा जो से—इतने जोर से फेंकूंगा कि वह पत्‍थर पचास मील जा सके। मैं मर जाऊँ, लेकिन इससे पत्‍थर नहीं गिर जायेगा। जो ताकत मैंने उसको दी है वह पचास तक चलेगी। पत्‍थर यह नहीं कह सकता कि वह आदमी तो मर गया, जिसने यह पत्‍थर फेंका था अब मैं क्‍यों चलू। पत्‍थर को जो ताकत दी गई थी। पचास मिल चलने की, वह पचास मील चलेगा। अब मेरे मरने जीने से कोई संबंध नहीं, मेरी ताकत उस पत्‍थर को लग गयी, अब वह काम करेगा। इसी तरह बुद्ध ने अपने तीन शरीरों के लिए तो ताकत दी और उन्हें छोड़ तब कह दिया थ ये 2500 साल तक जीवित रहेगें। इस बीच अगर कोई मैत्रेय नाम का आदमी पैदा हो गया तो ये उनमें प्रवेश पास सकेगें। वरना वह विनिष्‍ट हो जायेगे।

कृष्‍ण मूर्ति में बुद्ध के अवतरण का असफल प्रयोग—

बुद्ध जो ताकत दे गये है उन तीन शरीरों को जीवित रहने की, वे तीन शरीर जायेंगे। और वह समय भी बता गये थे कितनी देर तक….यानी वह वक्‍त करीब है जब मैत्रेय को जन्‍म लेना चाहिए। कृष्‍ण मूर्ति पर वहीं प्रयोग किया गया था कि इनकी तैयारी कि जाये। वे तीन शरीर इनको मिल जायें। कृष्‍ण मूर्ति के बड़े भाई थे नित्या नंद। पहले उन पर भी यह प्रयोग किया गया था पर उनकी मृत्‍यु हो गई। वह मृत्‍यु इसी प्रयोग में हुई। क्‍योंकि यह बहुत अनूठा प्रयोग था और इस प्रयोग को आत्‍मसात करना आसन बात नहीं थी। कोशिश की गयी की नित्या नंद के तीन शरीर खुद के तो अलग हो जायें और मैत्रेय के तीन शरीर उनमें प्रवेश कर जायें। नित्या नंद तो मर गये, फिर कृष्‍ण मूर्ति पर भी वहीं कोशिश चली। वह भी कोशिश यही थी कि इनके तीन शरीर हटा दिये जायें अरे री प्लेस (बदल) कर दिये जायें। वह भी नहीं हो सका। फिर और एक दो लोगों पर भी वहीं कोशिश की गयी, जॉर्ज अरंडेल पर, क्‍योंकि कुछ लोगों को इस बात का…जैसे ब्‍लाह्रटस्‍की इस सदी में ऑकल्‍ट (परा विज्ञान) के संबंध में जानने वाली शायद सबसे गहरी समझदार औरत थी। उसके बाद ऐनीबेसेंट के पास बहुत समझ थी, लेडबीटर के पास बहुत समझ थी—इन लोगों के पास कुछ समझ थी जो इस सदी में बहुत कम लोगों के पास है।

इनकी बड़ी चेष्‍टा यह भी कि वह तीन शरीरों को जो शक्‍ति दी गयी थी। उसके क्षीण होने का वक्‍त आ रहा है। अगर मैत्रेय जन्म नहीं लेता, तो वह शरीर बिखर सकते है। उनको इतने जोर से फेंका गया था वह समय पूरा हो जायेंगा,और किसी को अब तैयार होना चाहिए कि वह उन तीन शरीरों को आत्‍मसात कर ले। जो व्‍यक्‍ति भी उनको तीनों को आत्‍मसात कर लेगा। वह ठीक एक अर्थ में बुद्ध का पुनर्जन्‍म होगा—एक अर्थ में….मेरा मतलब समझे। बुद्ध की आत्‍मा नहीं लौटेगा। इस व्‍यक्‍ति की आत्‍मा बुद्ध के शरीर ग्रहण करने बुद्ध का काम करने लगेगी—एक दम बुद्ध के काम में संलग्‍न……

इस लिए हर कोई व्‍यक्‍ति नहीं हो सकता इस स्‍थिति में। जो होगा भी, वह भी करीब-करीब बुद्ध के पास पहुंचने वाली चेतना होनी चाहिए। तभी उन तीन शरीरों को आत्‍मसात कर पायेगी, नहीं तो मर जायेगी। तो जो असफल हुआ सारा का सारा मामला, वह इसीलिए असफल हुआ कि उसमें बहुत कठिनाई है। लेकिन फिर भी अभी भी चेष्टा चलती है। अभी भी कुछ छोटे से इज़ोटेरिक सर्कल (गुह्म विद्या मंडल) इसकी कोशिश में लगे है। कि किसी बच्‍चे को वे तीन शरीर मिल जायें। लेकिन अब उतना व्‍यापक प्रचार नहीं चलता, प्रचार से नुकसान हुआ।

कृष्‍ण मूर्ति के साथ संभावना थी कि शायद वे तीन शरीर कृष्‍ण मूर्ति में प्रवेश कर जाते। उसके पास उतनी पात्रता थी। लेकिन इतना व्यापक प्रचार किया गया। प्रचार शुभ दृष्‍टि से किया गया था। कि जब बुद्ध का आगमन हो तो वे फिर से रिकग्‍नाइज़ हो सकें, (पहचाने जा सकें) और यह प्रचार इस लिए भी किया गया था कि बहुत से लोग जो बुद्ध के समय में जीवित थे। उनकी स्‍मृति जगाई जा सके। वे पहचान सके की यह आदमी वहीं है कि नहीं। इस ध्‍यान से प्रचार किया गया था। लेकिन यह प्रचार घातक सिद्ध हुआ। और उस प्रचार ने कृष्‍ण मूर्ति के मन में एक रिएक्‍शन और प्रतिक्रिया को जन्‍म दे दिया। वह संकोची और छुई-मुई व्‍यक्‍तित्‍व है। ऐसा सामने मंच पर होने में उनको कठिनाई पड़ गई। अगर वह चुपचाप और किसी एकांत स्‍थान में यक प्रयोग किया गया होता किसी को न बताया गया होता, जब तक कि घटना घट जाती, तो शायद संभव था कि यह घटना घट जाती। यह नहीं घट पायी। वह बात ही चूक गई।

जापन में जब इस घटना के दिन हजारों बौद्ध भिक्षु ….इंतजार कर रहे थे। कि कृष्‍ण मूर्ति आकर बस यह घोषणा करेंगे की में कृष्‍ण मूर्ति नहीं मैत्रेय हूं और मैत्रेय के तीनों शरीर उसमे प्रवेश कर जाते पर ऐसा नहीं हो सका। कृष्‍ण मूर्ति ने सालों की मेहनत का क्षण में खत्‍म कर दिया। कृष्ण मूर्ति ने अपने शरीर के छोड़ने से इनकार कर दिया। और इस लिए दूसरे शरीर के लिए जगह ही नहीं बन सकी। इस लिए यह घटना असफल हो गइ। और यह बड़ी भारी असफलता थी इस सदी की। जो आकलट साइंस (गुह्म विद्या) को मिली। इतना बड़ा ऐक्सपैरिमैंट (प्रयोग) भी कभी इससे पहले नहीं किया गया था। तिब्‍बत को छोड़ कर कहीं भी नहीं किया जा सका था। तिब्‍बत में बहुत दिनों से उस प्रयोग को करते रहे है, और बहुत सी आत्‍माएं वापस दूसरे शरीरों से काम करती रही है।

तो मरी बात तुम्‍हारे ख्‍याल में आ गयी। उसमें विरोध नहीं है। और मेरी बात में कहीं भी विरोध दिखे तो समझना कि विरोध होगा नहीं। हां कुछ ओर रास्‍ते से बात होगी,इसलिए विरोध दिखाई पड़ रहा है।

reincarnation

http://oshosatsang.org/2010/09/05/%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B0%E0%A4%B9/