ADHARM KYA HAI


अधर्म क्या है? आईये आज इसके बारे में थोडा जानते है…..dhan se dharm chalta hai 

 

अधर्म क्या है? आईये आज इसके बारे में थोडा जानते है…..

१.परा-प्राकृतिक में विश्वास अधर्म है…
गौतम बुद्ध कहते है, ..हर एक घटना का कोई न कोई कारन होता तो है…और वह कारन मानविए या प्राकृतिक होता है….

यदि आदमी ईश्वर से स्वतंत्र नहीं है तो उसके अस्तित्व का क्या प्रयोजन है? यदि आदमी परा प्राकृतिक में विश्वास करेगा तो उसकी बुद्धि का क्या होगा, जब सब कुछ भाग्य में लिखा हुआ है तो उसकी बुद्धि का क्या प्रयोजन है?

२. ईश्वर में विश्वास अधर्म है..
किसी ने आज तक ईश्वर को नहीं देखा और न ही उसके अस्तित्व को प्रमाणित किया….न्याययालय में, कोर्ट में मामला चलेगा तो प्रूफ के कारन ख़ारिज हो जायेगा की ईश्वर है….इश्वाराश्रित धर्म कल्पन्श्रित है ..जब किसी स्त्री से प्रेम होता है, तो बिन देखे ये तो कोरी कल्पना होगी….बिन देखे प्रेम कैसे हो सकता है?
अगर हम किसी ब्रम्हा से उत्पन्न हुए है तो सभी अनित्ये क्यों है? परिवर्तनशील  क्यों है, अस्थिर  क्यों है, अल्पजीवी क्यों है? मरणधर्मी क्यों है? हमें अमर होना था, ईश्वर जैसे….
यदि ईश्वर सर्वासक्तिमान है तो तो फिर आदमी के मन में कुछ करने की इच्छा ही नहीं होगी…न ही कुछ प्रयत्न कारने का संकल्प उनके मन में होगा….
ईश्वर  कल्याण स्वरुप है तो आदमी हत्यारे, व्यभिचारी, जूठे, चुगलखोर , लोभी, द्वेषी, कुकर्मी क्यों है? क्या अच्छे भले ईश्वbuddha handर के रहते फिर आदमी कैसे बुरा हो सकता है?

जिसके पास आंखे है वो देखा कर चलता है ताकी टकराए नहीं या देखकर किसी चीज़ को हटा लेता है…..यदि ईश्वर के आंखे है तो वह दर्दनाक हालत क्यों देखता रहता है……बलात्कारी जब बलात्कार कर रहे होते है तो वह चुपचाप कैसे देख सकता है? अगर उसकी शक्ति इतनी असीम है तो वह उस समय अवतरित क्यों नहीं हुआ? क्यों न्याययालय  की शरण में जाना पड रहा है? ईश्वर उसी समय देखकर सजा क्यों नहीं देता….ईश्वर की जनता सुखी क्यों नहीं है, दरिद्रता, ठगी, जुट क्यों है?ईश्वर को सरे श्रिषटी का रचियेता मानना गलत है

३.आत्मा में विश्वास अधर्म है….

जिसका प्रमाण नहीं वो मन्ना अधर्म है इस तरह आत्मा को मन्ना अधर्म हुआ| विज्ञानं सर्विपरि है विज्ञानं अपनी क्रिया-शील अवस्था से आदमी में उद्धेश विशेष की सिद्धि के लिए प्रेरणा देता है….

४.यज्ञ (= होम, बलि कर्म) में विश्वास अधर्म है….
पशुओं की बलि निर्दयता मात्र है…..आजकल बलि प्रथा कम हुइ है पर येज्ञ किसी न किसी करण वश चालू है…..जो प्रक्रितक संपदाओं को नष्ट करने का षड्येंत्र है….स्वर्ग की निर्मिती करके पापो से बचने का एक झूटी सोच मात्र है..पूजा पाठ के नाम पर पण्डे को पलने की साजिश है…

५.कल्पना के आधार पर विश्वाश अधर्म है….बिना तर्क के विश्वाश करना अधर्म है…=

६.धर्म की पुस्तको का केवल वचन मात्र अधर्म है …. ब्राह्मण धर्म की किताबे पड़कर आजतक कोई अविष्कार नहीं कर पाए….

७.धर्म की किताबो की गलती को स्वीकार नहीं करना अधर्म है…..धर्म की किताबो की गलती की संभावना से परे मानना अधर्म है….
 

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