25-Feb-2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा की विशेष धम्म देशना :-आओ बौद्ध धम्म में प्रचलित विप्पसना या आनापानसति ध्यान (मैडिटेशन) कि कला को सीखें BUDDHIST MEDITATION TECHNIQUE…समयबुद्धा

आनापानसति ध्यान
समस्त  संसार में सबसे पहले ध्यान का मार्ग खोजने वाले और उसे सभी को बताने वाले महामानव बुद्ध ही थे| आजकल धर्म के ठेकेदारों ने उसी ध्यान कला में कई प्रकार की अपनी काल्पनिक मिलावट करके सत्संग बिजनेस चलाते हैं और वही लोगों को बताकर अपना धंधा चला रहे हैं, जैसे ध्यान पर बैठने पर इश्वर का नाम जपो, माला फेरो आदि| यही होता है जब कोई कमजोर होता है तब उसके संसाधन ताकतवर लोग छीनकर अपना कहने लगते हैं,पर सत्य छुप नहीं सकता |

महामानव बुद्ध  द्वारा  खोजा  एव बताया गया  आनापानसति  ध्यान का अभ्यास करना बहुत सरल है, तनिक भी कठिनाई इसमें नहीं है। यह बहुत ही आसान है। कोई भी सीधे ही आनापानसति ध्यान का अभ्यास आरम्भ कर सकता है, केवल उसे अपने सामान्य श्वास – प्रश्वास के प्रति सजग रहना है।

dhyam meditation

पाली भाषा में,

‘आन’ का अर्थ है श्वास लेना

‘अपान’ का अर्थ है श्वास छोड़ना

‘सति’ का अर्थ है ‘के साथ मिल कर रहना’

गौतम बुध्द ने हज़ारों वर्ष पूर्व ध्यान की यह विधि सिखाई थी। साँस तो हम सभी लेते हैं परन्तु हम इस क्रिया के प्रति जागरूक नहीं होते। ‘आनापानसति’ में व्यक्ति को अपना पूरा ध्यान और जागरूकता अपनी सामान्य श्वसन – प्रक्रिया पर रखने की आवश्यकता होती है। यह आवश्यक है कि हम साँस पर सजगतापूर्वक अपनी निगाह टिकाकर रखें, साँस की क्रिया तो स्वाभाविक रूप से चलती रहनी चाहिए। साँस को किसी भी रूप में रोकना नहीं है, न ही उसे अटका पर रखना है। हमें अपनी ओर से इसकी गति में किसी भी प्रकार का परिवर्तन लाने का प्रयास नहीं करना है। जब मन इधर उधर भागने लगे तो तुरन्त विचारों पर रोक लगा कर पुनः अपने ध्यान को श्वास की सामान्य लय पर ले आना चाहिए। स्वयं को शिथिल छोड़ कर मात्र प्रेक्षक बन जाना चाहिए।

आनापानसति का अभ्यास करते हुए हम एक साथ दो चीज़ें कर सकते हैं: अपनी साँस की प्रेक्षा करना तथा दूसरी बात है – अपनी चेतना का विस्तार होने देना…. जागरूकता को बढ़ा लेना। साँस के प्रति जागरूक रहने का अर्थ है विचारों को मन पर नियन्त्रण न करने देना। ये विचार ही हमारी ऊर्जा को खींचकर बिखरा देते हैं। इसीलिए विचारों के चक्र को  रोक देना चाहिए। साँस के प्रेक्षण का अर्थ है कि हम किसी भी रूप में अपनी भौतिक इन्द्रियों अथवा विचारों द्वारा अपने साँस की लय को प्रभावित न करें, केवल उस पर निगाह ही रखें।

जब हमारे शरीर की ऊर्जा हमारे विक्षुब्ध व अनन्त विचारों द्वारा व्यय कर दी जाती है तो हमारा भौतिक शरीर निर्बल हो जाता है। ऐसी स्थिति में उस पर विविध प्रकार के बाहरी आक्रमण होने लगते हैं। इसके प्रभावस्वरूप व्यक्ति को कई प्रकार के रोग लग जाते हैं, बुढ़ापा आने लगता है और शीघ्र ही वह मृत्यु का ग्रास बन जाता है। जो लोग अपने मन का परिष्कार नहीं करते, उनका मन इसी प्रकार अशांत रहा करता है। जिस प्रकार एक खेत, जिसे कृषि हेतु तैयार न किया हो, खर – पतवार से भर जाता है, उसी प्रकार एक निरंकुश  मन भी अनचाहे विचारों से भर जाता है। अतः आरम्भ में तो ध्यान का अर्थ है मन को शांत व उद्वेलनरहित बनाना। शीघ्र ही एक गहन विश्रामयुक्त अवस्था प्राप्त कर ली जाती है। जब मन विचारों से रिक्त हो जाता है तब अतिशय मात्रा में वैश्विक ऊर्जा शरीर में भरने लगती है। जैसे – जैसे हम ध्यान करते चले जाते हैं, नए गहन अनुभव, नए दृश्य हमें और हम विश्व – चेतना के साथ फिर से जुड़ने लगते हैं। हम एक आश्चर्यों से भरे जगत में पहुँच जाते हैं जो हमारी प्रतीक्षा कर रहा हैं। आप जितना अधिक प्रयास करते हैं जागरूकता को पाना उतना ही अधिक आसान होता जाता है।

आनापानसति ध्यानी होने के लिए व्यक्ति को किसी आश्रम में जाने की आवश्यकता नहीं होती। न तो उसे किसी पवित्र स्थान पर जाना होता है और न ही अपने उत्तरदायित्वों का त्याग करना होता है। हम अपना सामान्य जीवन जी सकते हैं और यह देख सकते हैं कि किस प्रकार ध्यान की शक्ति हमें बदल कर हर क्षेत्र में बेहतर बना देती है। आरम्भ में यह अच्छा होगा कि वरिष्ठ मास्टर्स की उपस्थिति में ध्यान किया जाए। उनकी ऊर्जा का स्तर ऊँचा होता है और उनकी ओर से ऊर्जा बह कर उन लोगों की तरफ आती है जिनका ऊर्जा स्तर नीचा होता है। एक बार हमें तरीका समझ आ जाए फिर किसी मास्टर या गुरु की उपस्थिति की अपेक्षा नहीं रहती। तब हम कभी भी, कहीं भी, अपनी इच्छा से इसका अभ्यास कर सकते हैं। इसके कोई अप्रिय दुष्प्रभाव भी नहीं होते। सीनियर ध्यानियों के साथ अपने अनुभवों बाँट कर हम अपनी प्रगति का मूल्यांकन भी स्वयं कर सकते हैं। यह कला है तो पुरानी पर लाभ सभी को पहुँचाती है।

यह ध्यान एक महानतम उपहार है जो अपने ही प्रयासों से अपने जीवन को दे सकते हैं। ‘आध्यात्मिक स्वास्थ्य’ हमारे सम्पूर्ण स्वास्थ्य का बहुत महत्वपूर्ण व अभिन्न भाग है जिसकी हर व्यक्ति को आवश्यकता है। आनापानसति ध्यान इस आवश्यकता की पूर्ति करता है। इस प्रकार यदि ‘आध्यात्मिक स्वास्थ्य’ जड़ है तो ‘भौतिक स्वास्थ्य’ उसका फल है। ध्यान द्वारा इंसान अपनी शारीरिक व्याधियों के पीछे छिपे सही कारण को समझ सकता है।

बुध्द कहते हैं…. साँस के साथ सजग होकर रहो, आपके भीतर जागरूकता का केन्द्र बन जाएगा… तब आपका शरीर ही ब्रह्माण्ड बन जाएगा।

YOUTUBE पर ध्यान का निम्न  विडियो काफी अच्छा है, जरूर देखे सुने …

ध्यान के बहुविध लाभ हैं

  1. समस्त शारीरिक व्याधियों का पूर्णतया उपचार संभव हो जाता है|
  2. स्मरण शक्ति का विकास होता है|
  3. अनुपयोगी आदतें स्वयमेव समाप्त हो जाती हैं|
  4. मन सदैव शांत व प्रसन्न रहता है|
  5. हम सभी कार्य अधिक कुशलतापूर्वक कर पाते हैं|
  6. नींद के लिए कम समय की आवश्यकता पड़ती है|
  7. सम्बंधों में अधिक गुणवत्ता व तृप्ति का भाव आता है|
  8. विचार शक्ति में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है|
  9. उचित अनुचित में भेद कर पाने की क्षमता बढ़ जाती है|
  10. जीवन का ध्येय बेहतर समझ आने लगता है|

स्वास्थ्य लाभ – समस्त शारीरिक व्याधियाँ मानसिक चिंताओं के फलस्वरूप जन्म लेती हैं सभी मानसिक चिंताएँ बौद्धिक अपरिपक्वता के कारण होती हैं| यह बौद्धिक अपरिपक्वता आध्यात्मिक – ऊर्जा व समझदारी की कमी के कारण पैदा होती है| रोग मूलतः हमारे पूर्वजन्मों के  ऋणात्मक अथवा नकारात्मक कर्मों के कारण पैदा होते हैं| जब तक नकारात्मक कर्म निष्प्रभाव नहीं हो जाते, यह रोग भी हमें छोड़ कर नहीं जाते, इन कर्मों के निराकरण के लिए कोई भी दवा काम नहीं करती|

ध्यान के द्वारा हम प्रचुर मात्रा में आध्यात्मिक ऊर्जा व समझदारी प्राप्त कर लेते हैं| तब हमारी बुद्धि भी परिपक्व होने लगती है| धीरे धीरे सभी मानसिक चिंताएँ समाप्त हो जाती हैं और सभी व्याधियाँ भी अदृश्य होने लगती हैं| ध्यान ही सभी रोगों के उपचार का एक मात्र उपाय है|

स्मरण शक्ति में बढ़ोतरी – ध्यान द्वारा प्राप्त प्रचुर आध्यात्मिक ऊर्जा हमारे मस्तिष्क को अधिक कुशलतापूर्वक काम करने में मदद करती है| हमारा मस्तिष्क अपनी अधिकतम क्षमता के साथ काम कर पाता है| ध्यान द्वारा स्मरण शक्ति में अतिशय वृद्धि होती है| अतएव विद्यार्थियों के लिए तो ध्यान बेहद ज़रूरी है – चाहे वे स्कूल में पढ़ते हों या यूनिवर्सिटी में|

अनुपयोगी आदतों का अंत – हम सभी में कोई न कोई बेकार आदत होती ही है जैसे आवश्यकता से अधिक खाना, सोना अथवा बातें करना, मदिरा पान करना आदि| ध्यान द्वारा प्राप्त आध्यात्मिक ऊर्जा व समझदारी के कारण ये सभी बेकार की आदतें स्वाभाविक रूप से खुद ही मरण को प्राप्त हो जाती हैं|

आनंदयुक्त मन – जीवन में सभी को कभी न कभी पराजय, अपमान व पीड़ा का अनुभव होता ही है| आध्यात्मिक ऊर्जा व ज्ञान से समृद्ध व्यक्ति का जीवन हमेशा शान्तिमय व आनंदमय रहता है चाहे उसके जीवन में पराजय, अपमान व पीड़ा आती रहे|

कार्यकुशलता में बढ़ोतरी – अत्यधिक आध्यात्मिक ऊर्जा व भरपूर आध्यात्मिक ज्ञान होने के कारण व्यक्ति अपने सभी काम, चाहे वे शाररिक हों अथवा मानसिक, अधिक कार्य कुशलता व दक्षता के साथ कर पाता है|

नींद के लिए कम समय की आवश्यकता – ध्यान के द्वारा प्रचुर मात्रा में आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है जबकि नींद द्वारा हमें उसका एक छोटा सा अंश ही मिल पाता है| आधा घंटा यदि गहन ध्यान किया जाये तो उससे मिलनेवाली ऊर्जा छः घंटे की गहरी नींद से प्राप्त होने वाली ऊर्जा के बराबर होती है| इससे शरीर को उतना ही विश्राम व मन को उतनी ही शक्ति मिल जाती है|

गुणात्मक सम्बंध – आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता का अभाव ही ऐसा एक मात्र कारण है जिसके फलस्वरूप हमारे पारस्परिक सम्बंध इतने अधिक अपरिपूरित (unfulfilling) व गुणात्मकता रहित (uniqualitative) हो जाते हैं|

विचार शक्ति – विचारों को अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है| अशांत मन में उठे विचारों में शक्ति होती ही नहीं| इस लिए वे लक्ष्य तक पहुँच नहीं पाते| जिस समय मन शांत अवस्था में होता है, विचार भी शक्ति पा लेते हैं और हमारे सभी संकल्प तुरंत साकार हो जाते हैं|

उचित – अनुचित का विवेक – आध्यात्मिक रूप से परिपक्व व्यक्ति के जीवन में कभी दुविधा नहीं रहती, वह सदैव सही निर्णय ही लेता है|

जीवन का ध्येय – हम सभी एक मकसद से दुनिया में जन्म लेते हैं| हमारा एक स्पष्ट लक्ष्य होता है| एक जीवन का प्रारूप हमारे सामने होता है और एक जीवन योजना होती है| इस बात को आध्यात्मिक रूप से परिपक्व व्यक्ति ही समझ सकता है और अपने विशिष्ट लक्ष्य व जीवन – योजना के प्रति सजग रह सकता है|

ध्यान के दौरान हमारी बुद्धि आध्यात्मिक अज्ञान के अपने ककून को तोड़कर बाहर निकल आती है और अधिक ध्यान करने पर नए नए अनुभव होने लगते हैं और इस ब्रह्माण्ड की असीम सच्चाई की समझ आने लगती है| यही है ‘जागृति’, यही है ‘ज्ञानोदय’ |

…समयबुद्धा

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ISLAMIC ARCHITECT HAVE FULL EFFECT OF BUDDHISM ARCHITECT

इस्लामिक वास्तुकला पर बौद्ध का सम्पूर्ण प्रभाव है, आईये इस तथ्य को जानें:
 
ये वैज्ञानिक तथ्य है कहीं और मैडिटेशन करने की बजाये पैगोडा या गुम्मतद के नीचे ध्यान की अवस्था में जल्दी पंहुचा जाता है |

बौद्ध लोग हजारों साल पहले जानते थे की गुम्मद या पैगोडा का  मुख्य काम मेडिटेसन या धयान की अवस्था में जल्दी पहुचना होता है|इसीलिए सभी बौद्ध विहार में गुम्मद या पैगोडा बनाने का चलन है|

महान मौर्य सम्राट अशोक के काल में बौद्ध वास्तुशिल्प का काफी निर्माण हुवा था। दक्षिण अरब के प्राचीन Himyante किंगडम (dating) से 6 वीं शताब्दी AD (cir: 115 ई.पू. …525 AD) एक उल्लेखनीय खोज की गई, जहा ‘Ammyad Shukaymim’ संगमरमरी खड़िया पत्थर में नक़्क़ाशीदार प्रतिमा सटीक बुद्ध के छवि जैसी दिखती है, यह मूर्ति का शिलालेख ‘शाक्य मुनि बुद्ध’ के नाम के साथ तुलना हो चुकी है और आज भी वह अरब की बुद्ध मूर्ति ‘आदर्श मिशाल’ के लिए Al-Azhar-University, Cario Egipt और ‘On the establishment of the Buddha’s peaceful religion in Arabia” by Maha Thera Ven. Dr. Paravahara Pannananda, the Chancellor of the Ruhunu University of Sri Lanka, में मिलती है। साथ ही साथ Department of Disarmament and Development, UNO, New York द्वारा अन्य मूर्तियों को पूर्व ईसाई यहूदियों से लिया गया है।

 
TOMB AND PAGODA
इस्लाम पूर्व अरब राजाओं द्वारा निर्मित धार्मिक स्थलों और मंदिरों और बाद में मोहम्मद और उनके अनुयायियों द्वारा विनियोजित मस्जिद के गुम्बज के संरचनाओं के वास्तुशिल्प के प्रकार बौद्ध स्मारकों के सटीक (replicas) है । भारत में बौद्ध स्तूप, श्रीलंका, और अन्य बौद्ध राज्य के इस तथ्य को साबित कर देता है की आज भी हर मस्जिद पर बौद्ध वास्तुशिल्प के गुम्बज का एक जैसी छत है । और उन शुरुआती पूर्व इस्लामी धार्मिक स्थलों में, मूर्तिकला और अन्य personages के चित्रण के अंदर दीवारों पर पेंटिंग में कलात्मक रूप बौद्ध वास्तुशिल्प कला का प्रतिनिधित्व है……….वर्तमान में सिनाई अराबा, के बौद्ध ऐतिहासिक साहित्यिक और पुरातात्विक जानकारी पर आधारित सबूत का पता लगाने के लिए मध्य-पूर्व और पश्चिम एशिया अरब, फारस सीरिया – फ़िलिस्तीन इसराइल के लिए एक कदम है, बुद्ध के जीवनकाल के दौरान प्राचीन दस्तावेजों, की खोज हमारे जीवन का अंतिम लक्ष और हमारे लिए अति महत्वपूर्ण है…..
 
FROM FACEBOOK POSRING OF  NILIMA MAURYA (via Dr Rajesh Chandra)
 
 
 
बहुजन लेखक डॉ सुख लाल धनि ने कहा है की “ये संभव है की इस्लाम का बुत परस्ती शब्द बुद्ध परस्ती का ही बिगड़ा हुआ रूप हो|इस्लाम में जिस प्रकार बुत(मूर्ती) पूजा को नाजायज ठहराया गया है बहुत संभव है की ये बौध धम्म पतन और इस्लाम उदय  के बीच ये एक मुद्दे के रूप में विकसित हुआ हो जो समय के साथ उनकी धार्मिक मान्यता बन गई”

If Police do not register FIR -Hemender Singh Hemu

 

पब्लिक आउटरेज न्यूज़ पेपर
अगर पुलिस एफआईआर दर्ज न करे

पुलिस अधिकारियों को जनता से शिष्टतापूर्वक व्यवहार करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। अगर पुलिस एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी करे , दुर्व्यवहार करे , रिश्वत मांगे या बेवजह परेशान करे , तो इसकी शिकायत जरूर करें।

… क्या है एफआईआर
किसी अपराध की सूचना जब किसी पुलिस ऑफिसर को दी जाती है तो उसे एफआईआर कहते हैं। यह सूचना लिखित में होनी चाहिए या फिर इसे लिखित में परिवतिर्त किया गया हो। एफआईआर भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अनुरूप चलती है। एफआईआर संज्ञेय अपराधों में होती है। अपराध संज्ञेय नहीं है तो एफआईआर नहीं लिखी जाती।
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आपके अधिकार

– अगर संज्ञेय अपराध है तो थानाध्यक्ष को तुरंत प्रथम सूचना रिपोर्ट ( एफआईआर ) दर्ज करनी चाहिए। एफआईआर की एक कॉपी लेना शिकायत करने वाले का अधिकार है।

– एफआईआर दर्ज करते वक्त पुलिस अधिकारी अपनी तरफ से कोई टिप्पणी नहीं लिख सकता , न ही किसी भाग को हाईलाइट कर सकता है।

– संज्ञेय अपराध की स्थिति में सूचना दर्ज करने के बाद पुलिस अधिकारी को चाहिए कि वह संबंधित व्यक्ति को उस सूचना को पढ़कर सुनाए और लिखित सूचना पर उसके साइन कराए।

– एफआईआर की कॉपी पर पुलिस स्टेशन की मोहर व पुलिस अधिकारी के साइन होने चाहिए। साथ ही पुलिस अधिकारी अपने रजिस्टर में यह भी दर्ज करेगा कि सूचना की कॉपी आपको दे दी गई है।

– अगर आपने संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को लिखित रूप से दी है , तो पुलिस को एफआईआर के साथ आपकी शिकायत की कॉपी लगाना जरूरी है।

– एफआईआर दर्ज कराने के लिए यह जरूरी नहीं है कि शिकायत करने वाले को अपराध की व्यक्तिगत जानकारी हो या उसने अपराध होते हुए देखा हो।

– अगर किसी वजह से आप घटना की तुरंत सूचना पुलिस को नहीं दे पाएं , तो घबराएं नहीं। ऐसी स्थिति में आपको सिर्फ देरी की वजह बतानी होगी।

– कई बार पुलिस एफआईआर दर्ज करने से पहले ही मामले की जांच – पड़ताल शुरू कर देती है , जबकि होना यह चाहिए कि पहले एफआईआर दर्ज हो और फिर जांच – पड़ताल।

– घटना स्थल पर एफआईआर दर्ज कराने की स्थिति में अगर आप एफआईआर की कॉपी नहीं ले पाते हैं , तो पुलिस आपको एफआईआर की कॉपी डाक से भेजेगी।

– आपकी एफआईआर पर क्या कार्रवाई हुई , इस बारे में संबंधित पुलिस आपको डाक से सूचित करेगी।

– अगर थानाध्यक्ष सूचना दर्ज करने से मना करता है , तो सूचना देने वाला व्यक्ति उस सूचना को रजिस्टर्ड डाक द्वारा या मिलकर क्षेत्रीय पुलिस उपायुक्त को दे सकता है , जिस पर उपायुक्त उचित कार्रवाई कर सकता है।

– एएफआईआर न लिखे जाने की हालत में आप अपने एरिया मैजिस्ट्रेट के पास पुलिस को दिशा – निर्देश देने के लिए कंप्लेंट पिटिशन दायर कर सकते हैं कि 24 घंटे के अंदर केस दर्ज कर एफआईआर की कॉपी उपलब्ध कराई जाए।

– अगर अदालत द्वारा दिए गए समय में पुलिस अधिकारी शिकायत दर्ज नहीं करता या इसकी प्रति आपको उपलब्ध नहीं कराता या अदालत के दूसरे आदेशों का पालन नहीं करता , तो उस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के साथ उसे जेल भी हो सकती है।

– अगर सूचना देने वाला व्यक्ति पक्के तौर पर यह नहीं बता सकता कि अपराध किस जगह हुआ तो पुलिस अधिकारी इस जानकारी के लिए प्रश्न पूछ सकता है और फिर निर्णय पर पहुंच सकता है। इसके बाद तुरंत एफआईआर दर्ज कर वह उसे संबंधित थाने को भेज देगा। इसकी सूचना उस व्यक्ति को देने के साथ – साथ रोजनामचे में भी दर्ज की जाएगी।

– अगर शिकायत करने वाले को घटना की जगह नहीं पता है और पूछताछ के बावजूद भी पुलिस उस जगह को तय नहीं कर पाती है तो भी वह तुरंत एफआईआर दर्ज कर जांच – पड़ताल शुरू कर देगा। अगर जांच के दौरान यह तय हो जाता है कि घटना किस थाना क्षेत्र में घटी , तो केस उस थाने को ट्रांसफर हो जाएगा।

– अगर एफआईआर कराने वाले व्यक्ति की केस की जांच – पड़ताल के दौरान मौत हो जाती है , तो इस एफआईआर को Dying Declaration की तरह अदालत में पेश किया जा सकता है।

– अगर शिकायत में किसी असंज्ञेय अपराध का पता चलता है तो उसे रोजनामचे में दर्ज करना जरूरी है। इसकी भी कॉपी शिकायतकर्ता को जरूर लेनी चाहिए। इसके बाद मैजिस्ट्रेट से सीआरपीसी की धारा 155 के तहत उचित आदेश के लिए संपर्क किया जा सकता है।

 

Donate to Dr. ambedkar Student front of india(DASFI)

Dr. ambedkar Student front of india(DASFI) is a progressive student organisation actively working in different colleges , universities of india. The number of members of DASFI are increasing day by days. 
DASFI organised different awareness events for student and society in different parts of india and having many brances in different states like HARYANA, UP, MP etc.

DASFI is using different forms of communication for spreading awareness among the students.DASFI has organised many college and state level programs at different places and different universities /college. 

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For Donation Dr. Ambedkar Student Front of India (DASFI)Sachin Anaarya Dasfi
State Bank Of India
Ac/No- 32089875304
… IFCS code- SBIN0001531
Holder- Sachin
State Bank of India (SBI)
Red Cross, Bhiwani, Haryana.Sanjay Boddh Dasfi
A/c- 65134422257
Holder- Sanjay
State Bank of Patiala (SBP)
Branch- model town, rohtak, haryana
IFCS code- STBP0000185

संसाधनों की कमी के बावजूद  13 राज्यों में DASFI का झंडा लहरा दिया है। यदि आज हमारे पास संसाधन होते तो समस्त भारत देश में DASFI का परचम लहरा रहा होता।
बहुजन युवा शक्ति को सलाम……

 

हमारा संगर्षबल है अपना शिक्षित और साधन संपन्न वर्ग, पर दुःख की बात ये है की वो अपने सुखों में इतना चूर है कि उसे संगर्ष कि जरूरत ही महसूस नहीं होती|अगर उससे संगर्ष कि बात करो तो ऐसे बिदक जाता है जैसे अपराध कर दिया हो|एक कहावत है-‘जाके पैर न फटी बिवाई सो का जाने पीर पराई’| जब इनके साथ अन्याय होता है तब इनको समाज क़ी याद आती है पर तब तक देर हो चुकी होती है| जिस समाज के शशक्तिकरन में इन्होने कोई योगदान नहीं दिया वो इनका लिए तब क्या कर सकेगा? इसके विपरीत मनुवादी लोग सुख में भी संगर्ष नहीं छोड़ते इसीलिए वो शासक हैं और हमारे लोग सुख में बावरे होकर सब भूल जाते हैं इसलिए शोषित होते हैं|क्या हम अपने शोषण के इस मूल कारण को कभी समझ पायेंगे?…समयबुद्धा

Dr. S.L. Dhani’s (IAS-Retd.)comments on our POST “great Urdu Poet Allama Ikbaal GAZAL on Shoodra/Ba​udh worst status in INDIA”

551218_385305801510569_1531122496_n In Photo Dr S.L. Dhani on right with President of INDIA Gyani Zail Singh in Rastrapati Bhavan=>
 
2013/2/14 S L Dhani <drslldhani185@gmail.com>

Samaybuddha,

Today, you have provided me with some intellectual pleasure by searching and presenting, what seems to you to be the best treasure, supposedly aimed at helping the Dalits, by Allama Iqbal through his poem about the Sudras of Manusmriti or Hinduism, which was then put by him in words through Urdu poetry.

The concerned lines of Allama Iqbal unravelling the unforgettable truth about the Sudras,  in Urdu cannot be called a Gazal, since it is reserved for a sweet dialogue between two lovers in a particular poetical form. They apparently qualify the title of a nazma, since they are devoted to explain the particular truth in a poetical narration, which has got its own immense value.

But whether it is called as gazal or nazma, its value cannot be minimised as one unfolding the greatest truth that has exposed the fraud, which has been perpetrated for millennia, and which was kept concealed by the enemies of humanity under the series of layers of conceit and falsehood, in the name of questionable spirituality through the ages.

But the poetical composition of Iqbal does not seem to cover and concern the plight of the Ati-Sudras or the then Untouchables or the Depressed Classes, for the simple reason that the word Sudra stands for those who are today referred to as OBCs as distinguished from the then Untouchables or modern Dalits.

 Surely, the philosophy underlying this composition appearing to be great thinking and exposition were devoted to Guru Nanak as is clear from the composition, since they had been emancipated in Punjab region undoubtedly by the medieval saints, out of whom Guru Nanak came to enjoy the best prominence on account of becoming the propounder of Sikhims, which continues to be the main religion of Punjabis at large.

The specific distinction between the Sudras and Ati-Sudras or the then Untouchables actually came to be recognised after the publication of the analytical works of Dr. Ambedkar, who had named the latter classes as Depressed Classes.

Iqbal was born in 1877 and died in 1938. He studied in England and taught there. He was a practicing lawyer. He had even a stint in Punjab Politics, since he was elected to Punjab Legislative Assembly in 1927. 

He had also taken part in Round Table Conferences held between 1930 and 1932.He was the first one to give birth to the ideas of Pakistan.

Had Iqbal any sympathy for the Ati-Sudras  or modern Dalits also, he would have surely mentioned Dr. B R Ambedkar, by name. Could he be uninformed about the unmistakable role of Dr. B R Ambedkar, who was his (Iqbal’s) political contemporary for a long time, which fact is confirmed by the fact that both of them had been participants in Round Table Confernces during 1930 to 1932?

If so, his lines could have been made applicable by him to Dr. Babasaheb Ambedkar,  as you have rightly anticipated this possibility.

Present day Indians politicians take great pride in Iqbal  for the lines “ Hindi hain hum, watan hai Hindostan hamara.” Is it very clear that he was addressing these words to Hindus and Indians as such and not specifically to Muslims alone?

Anyhow, it cannot be assumed that Allama Iqbal, better known as Mohammad Iqbal,  was totally oblivious of the historical and unprecedented role of Dr. BR Ambedkar in Round Table Conference (RTCs) leading to the announcement of the Communal Award, through the modification of which,  who had become instrumental in raising the masses, accounting for  90 per cent Indian population to human level  (through Poona Pact of 1932.

It appears that Mohammad Iqbal had not yet graduated to the level of even recognizing the existence of the Depressed Classes or modern Dalits and that he was still involved with the traditional fight between Hindu and Muslim leadership in both political and religious senses.

Had he done otherwise, he would have  surely advised to take a better human stand than that the Muslims then had taken while being in RTCs, when they had decided to consider the controversy regarding granting of human rights to Depressed Classes as internal matter of the Hindus alone, in keeping with the general attitude adopted by other religious minorities.

This attitude can be underlined to suggest that the Dalits of India cannot legitimately expect any support from such minorities even in their contemporary fight for their full  emancipation.

Further, even if the religious minorities are seen as making common issues with Dalit politics as in UP, it cannot be assumed that the former are pro-Dalits, since they have been apparently aiming at serving their own limited and selfish political interests and they have been only using the apparent Dalit solidarity, seemingly achieved through BSP politics.

I am sorry to say that if Iqbal did not intentionally take the specific notice of Dr. B R Ambedkar and his fight for the dumb and dumb Depressed Classes. Iqbla’s concern for Sudras could be only at his intellectual level and it had not yet travelled to lower down to his heart.

At best, he was concerned only to further the limited Muslim political interests as against caste Hindu interests as distinguished from Dalit interests represented solely by Dr. B R Ambedkar.

Samaybudhha! I hope you will appreciate my point of view, which I believe is not much different from that of yours in as much as it pertains to the serving of the best Dalit interests in all fileds, at the present stage that stood submerged in the mire of varna vyavastha, in which exploitative and oppressive philosophy stood targeted against the masses.

Unfortunately, those standing for politics of Hindutva are still taking misplaced pride in furthering their selfish interests through the philosophy which was rejected 2500 years ago by the Buddha.dr SL Dhani Image1120 Image1121

But that philosophy of the Buddha has still not become irrelevant, since the flag bearers of Hindutva have been trying to enlist the support even at international level with the help of so-called Hindu liberalism, which is nothing buy practical Buddhism.

Dr S.L. Dhani (IAS-Retd.)

Banujan Writer,Vishnary and Thinker

Author of more than 2 dozen of massive and Enlightning  books

TRIPPLE FILTER TEST by great philosopher Sukrat from Ancient UNAAN

प्राचीन यूनान में सुकरात को महाज्ञानी माना जाता था. एक दिन उनकी जान पहचान का एक व्यक्ति उनसे मिला
सत्य अच्छाई उपयोगिता

और बोला, ” क्या आप जानते हैं मैंने आपके …एक दोस्त के बारे में क्या सुना ?”

“एक मिनट रुको,” सुकरात ने कहा, ” तुम्हारे कुछ बताने से पहले मैं चाहता हूँ कि तुम एक छोटा सा टेस्ट पास करो. इसे ट्रिपल फ़िल्टर टेस्ट कहते हैं.”

“ट्रिपल फ़िल्टर ?”

” हाँ, सही सुना तुमने.”, सुकरात ने बोलना जारी रखा.” इससे पहले की तुम मेरे दोस्त के बारे कुछ बताओ , अच्छा होगा कि हम कुछ समय लें और जो तुम कहने जा रहे हो उसे फ़िल्टर कर लें. इसीलिए मैं इसे ट्रिपल फ़िल्टर टेस्ट कहता हूँ. पहला फ़िल्टर है सत्य.

क्या तुम पूरी तरह आश्वस्त हो कि जो तुम कहने जा रहे हो वो सत्य है?

“नहीं”, व्यक्ति बोला, ” दरअसल मैंने ये किसी से सुना है और ….”

” ठीक है”, सुकरात ने कहा. ” तो तुम विश्वास के साथ नहीं कह सकते कि ये सत्य है या असत्य. चलो अब दूसरा फ़िल्टर ट्राई करते हैं, अच्छाई का फ़िल्टर. ये बताओ कि जो बात तुम मेरे दोस्त के बारे में कहने जा रहे हो क्या वो कुछ अच्छा है ?”

” नहीं , बल्कि ये तो इसके उलट…..”526509_527319413975616_1200066380_n

“तो”, सुकरात ने कहा , ” तुम मुझे कुछ बुरा बताने वाले हो , लेकिन तुम आश्वस्त नहीं हो कि वो सत्य है. कोई बात नहीं, तुम अभी भी टेस्ट पास कर सकते हो, क्योंकि अभी भी एक फ़िल्टर बचा हुआ है: उपयोगिता का फ़िल्टर. मेरे दोस्त के बारे में जो तू बताने वाले हो क्या वो मेरे लिए उपयोगी है?”

“हम्म्म…. नहीं , कुछ ख़ास नहीं…”

“अच्छा,” सुकरात ने अपनी बात पूरी की , ” यदि जो तुम बताने वाले हो वो ना सत्य है , ना अच्छा और ना ही उपयोगी तो उसे सुनने का क्या लाभ?” और ये कहते हुए वो अपने काम में व्यस्त हो गए.