great Urdu Poet Allama Ikbaal GAZAL on Shoodra/Baudh worst status in INDIA


महान उर्दू लेखक/शायर अल्लामा इकबाल जी के द्वारा लिखी गयी एक ग़ज़ल “पैगाम” प्रस्तुत है 
हम इस प्यारी ग़ज़ल के लिए उन्हें शत शत नमन करते हैं

कौम ने पैग़ाम-ए-गौतम की ज़रा परवा न की
क़द्र पहचानी न अपने गौहर-ए-यक-दाना की

आह बदकिस्मत रहे, आवाज़-ए-हक़ से बेख़बर
ग़ाफ़िल अपने फल की शीरीनी से होता है शजर

आशकार उसने किया जो ज़िन्दगी का राज़ था
हिन्द को लेकिन खयाली फलसफे पे नाज़ था

शमा-ए-हक़ से जो मुनव्वर हो ये वोह महफ़िल न थी
बारिश-ए-रहमत हुई, लेकिन ज़मीं काबिल न थी

आह शूद्र के लिए हिंदोस्तां ग़मखाना है
दर्द-ए-इंसानी से इस बस्ती का दिल बेगाना है

बरहमन सरशार है अब तक मय-ए-पिन्दार में
शमा-ए-गौतम जल रही है महफ़िल-ए-अग्यार में

बुतकदा फिर बाद मुद्दत के मगर रोशन हुआ
नूर-ए-इब्राहीम से आज़र का घर रोशन हुआ

फिर उठी आखिर सदा तौहीद की पंजाब से 
हिन्द को एक मर्द-ए-कामिल* ने जगाया ख़्वाब से 

मर्द-ए-कामिल= महान इंसान (यह संबोधन उन्होंने गुरु नानक देव जी के लिए किया है)

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To those who understand English, Translation of this URDU poem is as follows: 

The nation did not care for the message of Gautam at allAllama-Iqbal-640x480
The value of its own single pearl
1 it did not appreciate at all

Ah! The unfortunate nation remained unaware of the call of the Truth
The tree is unaware of the sweetness of its own fruit

He exhibited whatever the secret of life was
But India proud of its visionary philosophy was

The assembly which could be illuminated by Truth’s light was not this
The rain of mercy did come but the soil was not suitable!

Ah ! India is a place of sorrow for the Shudra
This habitation’s heart is unaware of human sympathy

The Brahman is still intoxicated with the wine of arrogance
Gautam’s candle is alight in the assembly of strangers2

However, the temple again became lighted after eons
The house of ÿzar became lighted with Ibrahâm’s light

At last the call of Tawéâd  rose from the Punjab again!

A perfect man roused India from its slumber again!

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उर्दू/अंग्रेजी को समझने में दिक्कत हो सकती है इसलिए इसका हिंदी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है

इस देश ने गौतम बुद्धा के महान सन्देश की परवाह नहीं की
इन्होने अपने एकमात्र इकलौते मोती को बिलकुल भी नहीं सराहा

आह ये देश कितना दुर्भाग्यशाली है जो सत्य जानने के बुलावे से अनजान रहा
ये देश वो पेड़ है जो अपने ही फल की मिठास से अपरिचित रहा 

उन्होंने जो भी प्रमाणित सत्य था सबको खुलकर बता दिया
पर इस देश को अपने काल्पनिक पुरोहितवादी ढोंग पर नाज रहा

ये देश वो महफ़िल न बन सकी जो सत्य की रौशनी से जगमगाती
इस देश पर करुणा की बारिश हुई(बुद्धाज्ञान के रूप में) पर इस देश की जमीन उसे लेने के काबिल न हुई

आह भारत देश को इन शूद्र(बौद्ध)  के लिए असहनीय दुखों से भर दिया है
इंसान के दर्द और दुखों से इस बस्ती के ह्रदय पर कोई असर नहीं होता

आज भी ब्राह्मण अपने झूठे अहम् में चूर है
भगवान् बुद्धा के ज्ञान की रेशनी अनजानों में फ़ैल रही है

जो भी हो अब युगों बाद फिर लगता है कि सत्य का मंदिर रौशन हुआ
इब्राहम(सत्य) कि रौशनी से एक बार फिर इस का दमन रौशन हुआ

आखिरकार पंजाब से फिर तौहीद (गुरु नानकदेव जी) उठे है
इस महान इंसान या गुरु ने फिर लोगों को नींद से जगा दिया  

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शायद उन्हें आंबेडकर के बारे पता नहीं होगा पर अगर यहाँ तौहीद उन्हें भी लिख देते तो कोई फर्क न था| इसी सिलसिले में कुछ कोटेशन देखें:

“अगर आपमें क्षमता नहीं है तो आपके सगे भाई के राजा बनने पर भी आप कोई फायदा नहीं उठा पाएंगे पर यदि आपमें क्षमता है तो आप अपने दुश्मनों से भी फायदा निकाल सकते हैं, इसलिए व्यक्तिगत, सामाजिक और निति क्षमता बढ़ाने में लगे रहो”…समयबुद्धा

 “हमारे लोग  हजारों साल तक मंदिर प्रवेश की सख्त मनाही और अत्याचार सहकर भी  तेतीस करोड़ देवी देवताओं की पूजा करते रहे पर कोई उद्धार न हो सका|जो काम तेतीस करोड़ देवी देवता मिल कर भी हजारों सालों में नहीं कर सके वही काम बोधिसत्व डॉ भीम राव अम्बेडकर ने कुछ ही सालों में कर दिखाया| अब ये फैसला आपके हाथों  में है की आप अभी भी अपने शोषणकारियों  के काल्पनिक देवी देवताओं से सहारे की उम्मीद करते हैं या अपनी बुद्धि,अम्बेडकर विचारधारा और बुद्ध की शरण में जाकर ज्ञान से अपना जीवनोद्धार करते हैं|”…समयबुद्धा

 “विद्या बिना मति गई
मति बिना नीति गई
नीति बिना गति गई
गति बिना धन गया
धन बिना शूद्र पीढ़ियों तक गुलाम हुए
इतना घोर अनर्थ मात्र अविद्या के कारण ही हुआ” … आचार्य ज्योतिबा फूले

 “वही कौम तरक्की करती है जिस कौम में क़ुरबानी देने और लेने की जज्स्बा और क्षमता होती है|” …..बाबा साहेब डॉ भीम राव अम्बेडकर

 समझदार ब्राह्मणों को भी अब अहसास होने लगा है एक उदाहरण देखिये:

                            “वह अपूर्व  समय होगा जब शताब्दीयों   से पददलित, निर्वाक जनता समुन्द्र की लहरों के सामान गर्जन से अपना अधिकार मांगेगी | उस दिन हमारी सभी कल्पनाएँ न जाने क्या रूप धारण कर लेंगी जिन्हें हम भारतीय सभ्यता,हिन्दू संस्कृति आदि अस्पष्ट और भुलावे वाले शब्दों में प्रकट करते हैं |मैं हैरानी के साथ सोचता हूँ की हम में बस महान एतिहासिक घटना को सहतने का साहस है क्या ? यदि नहीं तो धैर्य और त्याग के साथ साहस बटोरना होगा,हमें उन सारी सुख सुविधाओं को जो हम अब तक भोगते आये हैं उनके लिए छोड़ना  होगा जो अब तक नागे भूखे और तृषित हैं| यदि वे समाज के पथ प्रदर्शन के लिए भी आगे आयें तो सहर्ष ही साफ़ दिल से हमें उन्हें नेतृत्व प्रदान करना होगा| हमें अपने पुरातन अहम् त्याग कर उन्हें गले लगाना होगा |आज हमारा कर्तव्य उनके प्रति दया दिखाना नहीं न्याय करना है,वे दया नहीं मांगते हैं न्याय मांगते हैं| यदि उन्हें न्याय नहीं मिला तो वे जबरन उसे ले लेंगे |”  …  हिंदी लेखक व् उपन्यासकार हज़ारी प्रसाद द्विवेदी

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