25-Feb-2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा की विशेष धम्म देशना :-आओ बौद्ध धम्म में प्रचलित विप्पसना या आनापानसति ध्यान (मैडिटेशन) कि कला को सीखें BUDDHIST MEDITATION TECHNIQUE…समयबुद्धा


आनापानसति ध्यान
समस्त  संसार में सबसे पहले ध्यान का मार्ग खोजने वाले और उसे सभी को बताने वाले महामानव बुद्ध ही थे| आजकल धर्म के ठेकेदारों ने उसी ध्यान कला में कई प्रकार की अपनी काल्पनिक मिलावट करके सत्संग बिजनेस चलाते हैं और वही लोगों को बताकर अपना धंधा चला रहे हैं, जैसे ध्यान पर बैठने पर इश्वर का नाम जपो, माला फेरो आदि| यही होता है जब कोई कमजोर होता है तब उसके संसाधन ताकतवर लोग छीनकर अपना कहने लगते हैं,पर सत्य छुप नहीं सकता |

महामानव बुद्ध  द्वारा  खोजा  एव बताया गया  आनापानसति  ध्यान का अभ्यास करना बहुत सरल है, तनिक भी कठिनाई इसमें नहीं है। यह बहुत ही आसान है। कोई भी सीधे ही आनापानसति ध्यान का अभ्यास आरम्भ कर सकता है, केवल उसे अपने सामान्य श्वास – प्रश्वास के प्रति सजग रहना है।

dhyam meditation

पाली भाषा में,

‘आन’ का अर्थ है श्वास लेना

‘अपान’ का अर्थ है श्वास छोड़ना

‘सति’ का अर्थ है ‘के साथ मिल कर रहना’

गौतम बुध्द ने हज़ारों वर्ष पूर्व ध्यान की यह विधि सिखाई थी। साँस तो हम सभी लेते हैं परन्तु हम इस क्रिया के प्रति जागरूक नहीं होते। ‘आनापानसति’ में व्यक्ति को अपना पूरा ध्यान और जागरूकता अपनी सामान्य श्वसन – प्रक्रिया पर रखने की आवश्यकता होती है। यह आवश्यक है कि हम साँस पर सजगतापूर्वक अपनी निगाह टिकाकर रखें, साँस की क्रिया तो स्वाभाविक रूप से चलती रहनी चाहिए। साँस को किसी भी रूप में रोकना नहीं है, न ही उसे अटका पर रखना है। हमें अपनी ओर से इसकी गति में किसी भी प्रकार का परिवर्तन लाने का प्रयास नहीं करना है। जब मन इधर उधर भागने लगे तो तुरन्त विचारों पर रोक लगा कर पुनः अपने ध्यान को श्वास की सामान्य लय पर ले आना चाहिए। स्वयं को शिथिल छोड़ कर मात्र प्रेक्षक बन जाना चाहिए।

आनापानसति का अभ्यास करते हुए हम एक साथ दो चीज़ें कर सकते हैं: अपनी साँस की प्रेक्षा करना तथा दूसरी बात है – अपनी चेतना का विस्तार होने देना…. जागरूकता को बढ़ा लेना। साँस के प्रति जागरूक रहने का अर्थ है विचारों को मन पर नियन्त्रण न करने देना। ये विचार ही हमारी ऊर्जा को खींचकर बिखरा देते हैं। इसीलिए विचारों के चक्र को  रोक देना चाहिए। साँस के प्रेक्षण का अर्थ है कि हम किसी भी रूप में अपनी भौतिक इन्द्रियों अथवा विचारों द्वारा अपने साँस की लय को प्रभावित न करें, केवल उस पर निगाह ही रखें।

जब हमारे शरीर की ऊर्जा हमारे विक्षुब्ध व अनन्त विचारों द्वारा व्यय कर दी जाती है तो हमारा भौतिक शरीर निर्बल हो जाता है। ऐसी स्थिति में उस पर विविध प्रकार के बाहरी आक्रमण होने लगते हैं। इसके प्रभावस्वरूप व्यक्ति को कई प्रकार के रोग लग जाते हैं, बुढ़ापा आने लगता है और शीघ्र ही वह मृत्यु का ग्रास बन जाता है। जो लोग अपने मन का परिष्कार नहीं करते, उनका मन इसी प्रकार अशांत रहा करता है। जिस प्रकार एक खेत, जिसे कृषि हेतु तैयार न किया हो, खर – पतवार से भर जाता है, उसी प्रकार एक निरंकुश  मन भी अनचाहे विचारों से भर जाता है। अतः आरम्भ में तो ध्यान का अर्थ है मन को शांत व उद्वेलनरहित बनाना। शीघ्र ही एक गहन विश्रामयुक्त अवस्था प्राप्त कर ली जाती है। जब मन विचारों से रिक्त हो जाता है तब अतिशय मात्रा में वैश्विक ऊर्जा शरीर में भरने लगती है। जैसे – जैसे हम ध्यान करते चले जाते हैं, नए गहन अनुभव, नए दृश्य हमें और हम विश्व – चेतना के साथ फिर से जुड़ने लगते हैं। हम एक आश्चर्यों से भरे जगत में पहुँच जाते हैं जो हमारी प्रतीक्षा कर रहा हैं। आप जितना अधिक प्रयास करते हैं जागरूकता को पाना उतना ही अधिक आसान होता जाता है।

आनापानसति ध्यानी होने के लिए व्यक्ति को किसी आश्रम में जाने की आवश्यकता नहीं होती। न तो उसे किसी पवित्र स्थान पर जाना होता है और न ही अपने उत्तरदायित्वों का त्याग करना होता है। हम अपना सामान्य जीवन जी सकते हैं और यह देख सकते हैं कि किस प्रकार ध्यान की शक्ति हमें बदल कर हर क्षेत्र में बेहतर बना देती है। आरम्भ में यह अच्छा होगा कि वरिष्ठ मास्टर्स की उपस्थिति में ध्यान किया जाए। उनकी ऊर्जा का स्तर ऊँचा होता है और उनकी ओर से ऊर्जा बह कर उन लोगों की तरफ आती है जिनका ऊर्जा स्तर नीचा होता है। एक बार हमें तरीका समझ आ जाए फिर किसी मास्टर या गुरु की उपस्थिति की अपेक्षा नहीं रहती। तब हम कभी भी, कहीं भी, अपनी इच्छा से इसका अभ्यास कर सकते हैं। इसके कोई अप्रिय दुष्प्रभाव भी नहीं होते। सीनियर ध्यानियों के साथ अपने अनुभवों बाँट कर हम अपनी प्रगति का मूल्यांकन भी स्वयं कर सकते हैं। यह कला है तो पुरानी पर लाभ सभी को पहुँचाती है।

यह ध्यान एक महानतम उपहार है जो अपने ही प्रयासों से अपने जीवन को दे सकते हैं। ‘आध्यात्मिक स्वास्थ्य’ हमारे सम्पूर्ण स्वास्थ्य का बहुत महत्वपूर्ण व अभिन्न भाग है जिसकी हर व्यक्ति को आवश्यकता है। आनापानसति ध्यान इस आवश्यकता की पूर्ति करता है। इस प्रकार यदि ‘आध्यात्मिक स्वास्थ्य’ जड़ है तो ‘भौतिक स्वास्थ्य’ उसका फल है। ध्यान द्वारा इंसान अपनी शारीरिक व्याधियों के पीछे छिपे सही कारण को समझ सकता है।

बुध्द कहते हैं…. साँस के साथ सजग होकर रहो, आपके भीतर जागरूकता का केन्द्र बन जाएगा… तब आपका शरीर ही ब्रह्माण्ड बन जाएगा।

YOUTUBE पर ध्यान का निम्न  विडियो काफी अच्छा है, जरूर देखे सुने …

ध्यान के बहुविध लाभ हैं

  1. समस्त शारीरिक व्याधियों का पूर्णतया उपचार संभव हो जाता है|
  2. स्मरण शक्ति का विकास होता है|
  3. अनुपयोगी आदतें स्वयमेव समाप्त हो जाती हैं|
  4. मन सदैव शांत व प्रसन्न रहता है|
  5. हम सभी कार्य अधिक कुशलतापूर्वक कर पाते हैं|
  6. नींद के लिए कम समय की आवश्यकता पड़ती है|
  7. सम्बंधों में अधिक गुणवत्ता व तृप्ति का भाव आता है|
  8. विचार शक्ति में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है|
  9. उचित अनुचित में भेद कर पाने की क्षमता बढ़ जाती है|
  10. जीवन का ध्येय बेहतर समझ आने लगता है|

स्वास्थ्य लाभ – समस्त शारीरिक व्याधियाँ मानसिक चिंताओं के फलस्वरूप जन्म लेती हैं सभी मानसिक चिंताएँ बौद्धिक अपरिपक्वता के कारण होती हैं| यह बौद्धिक अपरिपक्वता आध्यात्मिक – ऊर्जा व समझदारी की कमी के कारण पैदा होती है| रोग मूलतः हमारे पूर्वजन्मों के  ऋणात्मक अथवा नकारात्मक कर्मों के कारण पैदा होते हैं| जब तक नकारात्मक कर्म निष्प्रभाव नहीं हो जाते, यह रोग भी हमें छोड़ कर नहीं जाते, इन कर्मों के निराकरण के लिए कोई भी दवा काम नहीं करती|

ध्यान के द्वारा हम प्रचुर मात्रा में आध्यात्मिक ऊर्जा व समझदारी प्राप्त कर लेते हैं| तब हमारी बुद्धि भी परिपक्व होने लगती है| धीरे धीरे सभी मानसिक चिंताएँ समाप्त हो जाती हैं और सभी व्याधियाँ भी अदृश्य होने लगती हैं| ध्यान ही सभी रोगों के उपचार का एक मात्र उपाय है|

स्मरण शक्ति में बढ़ोतरी – ध्यान द्वारा प्राप्त प्रचुर आध्यात्मिक ऊर्जा हमारे मस्तिष्क को अधिक कुशलतापूर्वक काम करने में मदद करती है| हमारा मस्तिष्क अपनी अधिकतम क्षमता के साथ काम कर पाता है| ध्यान द्वारा स्मरण शक्ति में अतिशय वृद्धि होती है| अतएव विद्यार्थियों के लिए तो ध्यान बेहद ज़रूरी है – चाहे वे स्कूल में पढ़ते हों या यूनिवर्सिटी में|

अनुपयोगी आदतों का अंत – हम सभी में कोई न कोई बेकार आदत होती ही है जैसे आवश्यकता से अधिक खाना, सोना अथवा बातें करना, मदिरा पान करना आदि| ध्यान द्वारा प्राप्त आध्यात्मिक ऊर्जा व समझदारी के कारण ये सभी बेकार की आदतें स्वाभाविक रूप से खुद ही मरण को प्राप्त हो जाती हैं|

आनंदयुक्त मन – जीवन में सभी को कभी न कभी पराजय, अपमान व पीड़ा का अनुभव होता ही है| आध्यात्मिक ऊर्जा व ज्ञान से समृद्ध व्यक्ति का जीवन हमेशा शान्तिमय व आनंदमय रहता है चाहे उसके जीवन में पराजय, अपमान व पीड़ा आती रहे|

कार्यकुशलता में बढ़ोतरी – अत्यधिक आध्यात्मिक ऊर्जा व भरपूर आध्यात्मिक ज्ञान होने के कारण व्यक्ति अपने सभी काम, चाहे वे शाररिक हों अथवा मानसिक, अधिक कार्य कुशलता व दक्षता के साथ कर पाता है|

नींद के लिए कम समय की आवश्यकता – ध्यान के द्वारा प्रचुर मात्रा में आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है जबकि नींद द्वारा हमें उसका एक छोटा सा अंश ही मिल पाता है| आधा घंटा यदि गहन ध्यान किया जाये तो उससे मिलनेवाली ऊर्जा छः घंटे की गहरी नींद से प्राप्त होने वाली ऊर्जा के बराबर होती है| इससे शरीर को उतना ही विश्राम व मन को उतनी ही शक्ति मिल जाती है|

गुणात्मक सम्बंध – आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता का अभाव ही ऐसा एक मात्र कारण है जिसके फलस्वरूप हमारे पारस्परिक सम्बंध इतने अधिक अपरिपूरित (unfulfilling) व गुणात्मकता रहित (uniqualitative) हो जाते हैं|

विचार शक्ति – विचारों को अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है| अशांत मन में उठे विचारों में शक्ति होती ही नहीं| इस लिए वे लक्ष्य तक पहुँच नहीं पाते| जिस समय मन शांत अवस्था में होता है, विचार भी शक्ति पा लेते हैं और हमारे सभी संकल्प तुरंत साकार हो जाते हैं|

उचित – अनुचित का विवेक – आध्यात्मिक रूप से परिपक्व व्यक्ति के जीवन में कभी दुविधा नहीं रहती, वह सदैव सही निर्णय ही लेता है|

जीवन का ध्येय – हम सभी एक मकसद से दुनिया में जन्म लेते हैं| हमारा एक स्पष्ट लक्ष्य होता है| एक जीवन का प्रारूप हमारे सामने होता है और एक जीवन योजना होती है| इस बात को आध्यात्मिक रूप से परिपक्व व्यक्ति ही समझ सकता है और अपने विशिष्ट लक्ष्य व जीवन – योजना के प्रति सजग रह सकता है|

ध्यान के दौरान हमारी बुद्धि आध्यात्मिक अज्ञान के अपने ककून को तोड़कर बाहर निकल आती है और अधिक ध्यान करने पर नए नए अनुभव होने लगते हैं और इस ब्रह्माण्ड की असीम सच्चाई की समझ आने लगती है| यही है ‘जागृति’, यही है ‘ज्ञानोदय’ |

…समयबुद्धा

6 thoughts on “25-Feb-2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा की विशेष धम्म देशना :-आओ बौद्ध धम्म में प्रचलित विप्पसना या आनापानसति ध्यान (मैडिटेशन) कि कला को सीखें BUDDHIST MEDITATION TECHNIQUE…समयबुद्धा

  1. jaibhim You are cordonally invited to attend Dhammdesana by Pujya Ven. Aryavanso Guruji (Thailand) at Karmveer Dadasaheb Gaikwad Sabhagrah RTO conner Andheri West Mumbai 400053 in the presence of Ayu. Ratnakarji Gaikwad Ex- Chief Secretery Maharashtra ,CIC.on 3rd Oct At 6 pm.Pl inform to your friends and relatives also.

  2. Pingback: हर पूर्णिमा पर समयबुद्धा कि धम्म देशना यहाँ इस वेब्साईट पर पब्लिश कि जाती है| सन 2013 कि समयबुद्धा कि

  3. only buddhas are reaching to this stage pls. do not attached any gods along with it as shown in video.
    regards

  4. This is very useful media to be aware with Meditation and the various techniques to learn it.. Thanks to all!

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