27-March-2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:-“धर्म वास्तव में क्या है?धर्म की लोग किसी भी तरह व्याख्या करें पर असल में धर्म किसी कौम के लिए संसार में अपना अस्तित्व बचाये रखने की नीति के सिवाए और कुछ नहीं|”…समयबुद्धा

धर्म की लोग किसी भी तरह व्याख्या करें पर असल में धर्म किसी कौम के लिए संसार में अपना अस्तित्व बचाये रखने की नीति के सिवाए और कुछ नहीं| ….समयबुद्धा

जब भी धर्म की किसी नीति की पोल खुल जाती है तो नई नीति बना ली जाती है इसलिए धर्म की सही परिभाषा देन संभव नहीं पर फिर भी हमें सबसे पहले ‘धर्म’ शब्द को समझना होगा, इसके लिए निम्न परिभाषाओं एव तथ्यों पर ध्यान दीजिये:धर्म की कुछ बुद्धि जीवियों द्वारा दी गई परिभाषाएं:

-धर्म एक सभ्यता विकास की एक संस्था है

-धर्म का क्रमिक विकास

-धर्म पुरोहित पालक मान्यताओं का मार्केटिंग ब्रांड है

-धर्म एक स्थाई कौमी संगठन का झंडा है

-धर्म ने गुज़रे वक्त में कानून का काम किया है

-धर्म ने गुज़रे वक्त में विज्ञानं का काम किया है

-धर्म साहित्य कौमी सुरक्षा का लेख जोखा है

-धर्म जनता पर शाशन का राजनयिक औजार है

-धर्म सभी बड़े नरसंघार का कारन रहा है

-धर्म ने गुज़रे वक्त में विज्ञान का काम किया है

-निश्ते ने कहा है “आस्था क्या है सच को न जानने की इच्छा ही आस्था है “

-राहुल सांकृत्यायन ने कहा है “धर्म या मजहब का असली रूप क्या है ? मनुष्य जाती के शैशव की मानसिक दुर्बलताओं और उस से उत्पन्न मिथ्या विश्वासों का समूह ही धर्म है , यदि उस में और भी कुछ है तो वह है पुरोहितों, सत्ता-धारियों और शोषक वर्गों के धोखेफरेब, जिस से वह अपनी भेड़ों को अपने गल्ले से बाहर नहीं जाने देना चाहते”

-धर्म इंसान के दुःख का कारण रहा है|विश्व के समस्त इतिहास में नरसंघार और खूनी युद्धों का मूल कारन धर्म ही रहा है और अगर लोगों ने धर्म और इश्वर को नहीं छोड़ा तो दुःख और कत्लेआम जरी रहेगा|… शकील प्रेम

-ध्‍यान रखना धर्म तुम्‍हारे लिए अफीम न बन जाए। धर्म अफीम बन सकता है। खतरा है। धर्म जागरण भी बन सकता है और गहन मूर्च्‍छा भी। सब कुछ तुम पर निर्भर है। होशयार, जहर को भी पीता है और औषधि हो जाती है। नासमझ, अमृत भी पीए तो भी मृत्‍यु घट सकती है।…ओशो रजनीश

-धर्म अफीम का नशा है…कार्ल मार्क्‍स

-धर्म केवल एक निजी मामला नहीं है… लेनिन

‘राजनीति अल्पकालीन धर्म है और धर्म दीर्घकालीन राजनीति’… डॉ॰ राममनोहर लोहिया

ओह माय गॉड नमक हिंदी फिल्म का निम्न डाइलोग यहाँ दिया जा सकता है: “धर्म केवल इंसान को बेबस बनता है या आतंकवादी ”

मध्ययुग में विकसित धर्म एवं दर्शन के परम्परागत स्वरूप एवं धारणाओं के प्रति आज के व्यक्ति की आस्था कम होती जा रही है। मध्ययुगीन धर्म एवं दर्शन के प्रमुख प्रतिमान थे- स्वर्ग की कल्पना, सृष्टि एवं जीवों के कर्ता रूप में ईश्वर की कल्पना, वर्तमान जीवन की निरर्थकता का बोध, अपने देश एवं काल की माया एवं प्रपंचों से परिपूर्ण अवधारणा। उस युग में व्यक्ति का ध्यान अपने श्रेष्ठ आचरण, श्रम एवं पुरुषार्थ द्वारा अपने वर्तमान जीवन की समस्याओं का समाधान करने की ओर कम था, अपने आराध्य की स्तुति एवं जय गान करने में अधिक था।…WikiPedia

धर्म एक बहुत ही पेचिदा शब्द है जिसकी सही सही व्याख्या कर पाना संभव नहीं है|कभी दया दिखाना धर्म है तो कभी युद्ध भी धर्म हो जाता है, कभी अश्लीलता कि खिलाफत धर्म है तो कभी नंगी मूर्तियों और लिंग की पूजा धर्म हो जाता है,कभी दुखियों की मदत धर्म होता है तो कभी दुखी लोगों फुसलाकर उनके धन को दान करवा लेना धर्म हो जाता है|जितना भी इस शब्द की सम्मेक्षा की जाती है यही उत्तर निकलता है की धर्म उतना अच्छा नहीं है जितना जनता को समझाया जाता है|

डर, पुरोहितवादी षडीयंत्र और आस्था से जन्मी कल्पनाएँ एव परम्पराएँ ही धर्म है।समय समय बौद्धों (जागरूक इंसान) की सहायता से लोग सत्य जान भी जाते हैं पर पुरोहित वर्ग अपनी अजीविका सुनिश्चित करने हेतु षडीयंत्र द्वारा सत्य को परिवर्तित व् दबा देते हैं| अब धर्म का जो भावार्थ ग्रहण किया जाता है वो है ईश्वरीय सिद्धांत में भरोसा, आत्मा में विश्वास, इश्वर और परा प्रकृति की पूजा, कर्मकांड करना, गलती की दोषी आत्मा का सुधार,परम्पराओं को जरी रखना,धर्मानुष्ठान, खुशबू,रौशनी,सर झुकाना,फूल चादर अदि वस्तुए चढ़ा के, बलि, पुराने लोगों की कल्पना पर आधारित धर्म ग्रंथों को अंतिम सत्य मानना, संगीत और गायन से लीला बखान और तारीफ अदि से इश्वर को प्रसन्न रखना| इतना ही नहीं धर्म के नाम पर प्रचलित किसी भी मान्यता पर ऊँगली उठाने वाले को मार डालना भी धर्म का हिसा रहा है और आज भी है|

जनता की कुछ मान्यता और परम्पराएँ होती हैं जिनको वो शांति से करना चाहती है,जो धर्म के बिना भी किया जा सकता है,उनको धर्म की जरूरत नहीं।सत्ताधारी के सरंक्षण में पुरोहित वर्ग जनता की मान्यता और परंपरा के साथ अपना स्वार्थ और सत्ताधारी का एजेंडा मिलाकर धर्म के रूप में सुनियोजित करता है| असल में धर्म वो औज़ार और साधन है जिससे सत्ताधारी लोग आम जनता को एक विचार मत में पिरो कर अपनी सत्ता में उनका विश्वास बनाये रखते हैं, आम जनता कि इससे बस इतना भला होता है कि उसकी कौम को सत्ताधारी से सुरक्षा मिल जाती है ।धर्म असल में आग की तरह है ये घर बना भी सकता है और जला भी सकता है|ये अच्छा भी हो सकता है बुरा भी हो सकता है, इसकी अच्छाई और बुराई एक व्यक्ति या समस्त जनता पर निर्भर नहीं करती ये असल में पुरोहित वर्ग और सत्ताधारी पर निर्भर करती है|धर्म की अच्छाई और बुराई निर्भर करती है की पुरोहित वर्ग को सत्ताधारी ने कितनी छूट और कितना सरक्षण दे रखा है, कितना अंकुश कर रखा है |यही कारन है की आप किसी भी देश का इतिहास उठा लो पुरोहित वर्ग राजा के दरबार में साथ साथ ही मिलेगा|आज भी धर्म वही फलता फूलता है जिसे राजसत्ता का सरक्षण मिला होता है|

इस बात को बौद्ध धम्म में बहुत अच्छी तरह से समझा और इलाज किया गया है| बौध धम्म में पुरोहित वर्ग अर्थात बौद्ध भंते या भिक्खुओं के लिए कठोर नियम बनाये गए हैं, उनको संसार की भौतिक वस्तुओं और धन के संग्रह से रोक गया गया है| वे अपने लिए धम्म द्वारा धन अर्जित नहीं कर सकते वे दिन के एक भोजन के सिवा जनता पर किसी भी प्रकार का बोझ नहीं बन सकते|वे अपने सरक्षण के लिए सत्ताधारी पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं| केवल मूल बौद्ध धम्म ही एकमात्र ऐसा मार्ग है जो इश्वर,धर्म और पुरोहित वर्ग की सत्ता के बिना एक दुःख राहित संसार बनाने को प्रतिबद्ध है|

हम धर्म और इश्वर की जितनी भी समीक्षा करेंगे हम यही पाएंगे की ये आम जनता के लिए फायेदेमंद कम और नुकसानदायक ज्यादा हैं, वही ये पुरोहित्वर्ग और सत्ताधारी के लिए हर तर से फायदेमंद हैं|अब क्योंकि सत्ताधारी के पास धन,संपत्ति और शक्ति होती है तो उसका इन दोनों को बढ़ावा देना हम समझ सकते हैं|

darshnik skeka

 

समस्त इतिहास में मानवता और जीवों को अगर किसी चीज़ ने सबसे ज्यादा दुःख पहुचाया होगा तो वो है “धर्म और ईश्वर कि परिकल्पना” का पुरोहित/शाषक वर्ग द्वारा दुरूपयोग करना|संसार के सभी मतभेदों,युद्धों,नरसंहारों, देश और सीमा बनने के कारन, किसी के अमीर होने का कारन, किसी के भूखों मरने का कारन, इन सबका एक ही कारन है “धर्म और ईश्वर कि परिकल्पना” का पुरोहित/शाषक वर्ग द्वारा दुरूपयोग करना|

 

डर, पुरोहितवादी षडीयंत्र और आस्था से जन्मी कल्पनाएँ एव परम्पराएँ ही धर्म है।समय समय बौद्धों (जागरूक इंसान) की सहायता से लोग सत्य जान भी जाते हैं पर पुरोहित/शाषक वर्ग अपनी अजीविका सुनिश्चित करने हेतु षडीयंत्र द्वारा सत्य को परिवर्तित व् दबा देते हैं| अब धर्म का जो भावार्थ ग्रहण किया जाता है वो है ईश्वरीय सिद्धांत में भरोसा, आत्मा में विश्वास, इश्वर और परा प्रकृति की पूजा, कर्मकांड करना, गलती की दोषी आत्मा का सुधार,परम्पराओं को जरी रखना,धर्मानुष्ठान, खुशबू,रौशनी,सर झुकाना,फूल चादर अदि वस्तुए चढ़ा के, बलि, पुराने लोगों की कल्पना पर आधारित धर्म ग्रंथों को अंतिम सत्य मानना, संगीत और गायन से लीला बखान और तारीफ अदि से इश्वर को प्रसन्न रखना| इतना ही नहीं धर्म के नाम पर प्रचलित किसी भी मान्यता पर ऊँगली उठाने वाले को मार डालना भी धर्म का हिसा रहा है और आज भी है|

 

इतना होते हुए भी लोग धर्म इतना क्यों चाहते हैं क्योंकि इसकी सच्चाई लोगों को बतायी नहीं जाती,बलपूर्वक छुपाई जाती है|इतना ही नहीं जब भी धर्म की किसी नीति की पोल खुल जाती है तो नई नीति बना ली जाती है इसलिए धर्म की सही और पूरी परिभाषा देना संभव नहीं पर फिर भी हमें सबसे पहले ‘धर्म’ शब्द को समझना होगा| धर्म एक बहुत ही पेचिदा शब्द है जिसकी सही सही व्याख्या कर पाना संभव नहीं है|कभी दया दिखाना धर्म है तो कभी युद्ध भी धर्म हो जाता है, कभी अश्लीलता कि खिलाफत धर्म है तो कभी नंगी मूर्तियों और लिंग की पूजा धर्म हो जाता है,कभी दुखियों की मदत धर्म होता है तो कभी दुखी लोगों फुसलाकर उनके धन को दान करवा लेना धर्म हो जाता है|जितना भी इस शब्द की सम्मेक्षा की जाती है यही उत्तर निकलता है की धर्म उतना अच्छा नहीं है जितना जनता को समझाया जाता है|

 

मेरे परिभाषा तो ये है कि

 

“धर्म की लोग किसी भी तरह व्याख्या करें पर असल में धर्म किसी कौम के लिए संसार में व्याप्त मानवीय वर्गों के संघर्ष में अपना अस्तित्व बचाये रखने की नीति के सिवाए और कुछ नहीं|”

 

इसके आलावा भी धर्म पर काफी विचार करने के बात कई परिभाषाएं निकल के आयीं जानने के लिए मेरी निम्न परिभाषाओं एव तथ्यों पर ध्यान दीजिये:

 

-धर्म काल्पनिक ईश्वर और शैतान को फायदे के लिए इस्तेमाल करने कि निति है|
-धर्म एक सभ्यता विकास की एक संस्था है
-धर्म का क्रमिक विकास
-धर्म पुरोहित पालक मान्यताओं का मार्केटिंग ब्रांड है
-धर्म एक स्थाई कौमी संगठन का झंडा है
-धर्म ने गुज़रे वक्त में कानून का काम किया है
-धर्म ने गुज़रे वक्त में विज्ञानं का काम किया है
-धर्म साहित्य कौमी सुरक्षा का लेख जोखा है
-धर्म जनता पर शाशन का राजनयिक औजार है
-धर्म सभी बड़े नरसंघार का कारन रहा है
-धर्म ने गुज़रे वक्त में विज्ञान का काम किया है

 

धर्म की विश्व के कुछ जेन माने बुद्धि जीवियों द्वारा दी गई परिभाषाएं देखिये:

 

-निश्ते ने कहा है “आस्था क्या है सच को न जानने की इच्छा ही आस्था है “

 

-राहुल सांकृत्यायन ने कहा है “धर्म या मजहब का असली रूप क्या है ? मनुष्य जाती के शैशव की मानसिक दुर्बलताओं और उस से उत्पन्न मिथ्या विश्वासों का समूह ही धर्म है , यदि उस में और भी कुछ है तो वह है पुरोहितों, सत्ता-धारियों और शोषक वर्गों के धोखेफरेब, जिस से वह अपनी भेड़ों को अपने गल्ले से बाहर नहीं जाने देना चाहते”

 

-धर्म इंसान के दुःख का कारण रहा है|विश्व के समस्त इतिहास में नरसंघार और खूनी युद्धों का मूल कारन धर्म ही रहा है और अगर लोगों ने धर्म और इश्वर को नहीं छोड़ा तो दुःख और कत्लेआम जरी रहेगा|… शकील प्रेम (धर्म एक अफीम)

 

-ध्‍यान रखना धर्म तुम्‍हारे लिए अफीम न बन जाए। धर्म अफीम बन सकता है। खतरा है। धर्म जागरण भी बन सकता है और गहन मूर्च्‍छा भी। सब कुछ तुम पर निर्भर है। होशयार, जहर को भी पीता है और औषधि हो जाती है। नासमझ, अमृत भी पीए तो भी मृत्‍यु घट सकती है।…ओशो रजनीश

 

-धर्म अफीम का नशा है…कार्ल मार्क्‍स

 

-धर्म केवल एक निजी मामला नहीं है… लेनिन

 

‘राजनीति अल्पकालीन धर्म है और धर्म दीर्घकालीन (सदियों चलने वाली) राजनीति’… डॉ॰ राममनोहर लोहिया

 

ओह माय गॉड नमक हिंदी फिल्म का निम्न डाइलोग यहाँ दिया जा सकता है: “धर्म केवल इंसान को बेबस बनता है या आतंकवादी ”

 

मध्ययुग में विकसित धर्म एवं दर्शन के परम्परागत स्वरूप एवं धारणाओं के प्रति आज के व्यक्ति की आस्था कम होती जा रही है। मध्ययुगीन धर्म एवं दर्शन के प्रमुख प्रतिमान थे- स्वर्ग की कल्पना, सृष्टि एवं जीवों के कर्ता रूप में ईश्वर की कल्पना, वर्तमान जीवन की निरर्थकता का बोध, अपने देश एवं काल की माया एवं प्रपंचों से परिपूर्ण अवधारणा। उस युग में व्यक्ति का ध्यान अपने श्रेष्ठ आचरण, श्रम एवं पुरुषार्थ द्वारा अपने वर्तमान जीवन की समस्याओं का समाधान करने की ओर कम था, अपने आराध्य की स्तुति एवं जय गान करने में अधिक था।…WikiPedia

 

जनता की कुछ मान्यता और परम्पराएँ होती थीं जिनको वो शांति से करना चाहती है,जो धर्म के बिना भी किया जा सकता है,उनको धर्म की जरूरत नहीं।भारत में आप देखोगे कि ज्यादातर त्यौहार खेती और फसल से जुड़े हैं जिसका किसी धर्म से लेना देना न था| पर धर्म के ठेकेदारों ने अपने देवी देवता और कर्मकांड इसमें जबर्दस्ती गुसेड़ दिए और भोली भली जनता को ठगना शुरू कर दिया|

 

सत्ताधारी के सरंक्षण में पुरोहित वर्ग जनता की मान्यता और परंपरा के साथ अपना स्वार्थ और सत्ताधारी का एजेंडा मिलाकर धर्म के रूप में सुनियोजित करता है| असल में धर्म वो औज़ार और साधन है जिससे सत्ताधारी लोग आम जनता को एक विचार मत में पिरो कर अपनी सत्ता में उनका विश्वास बनाये रखते हैं, आम जनता कि इससे बस इतना भला होता है कि उसकी कौम को सत्ताधारी से सुरक्षा मिल जाती है ।धर्म असल में आग की तरह है ये घर बना भी सकता है और जला भी सकता है|ये अच्छा भी हो सकता है बुरा भी हो सकता है, इसकी अच्छाई और बुराई एक व्यक्ति या समस्त जनता पर निर्भर नहीं करती ये असल में पुरोहित वर्ग और सत्ताधारी पर निर्भर करती है|धर्म की अच्छाई और बुराई निर्भर करती है की पुरोहित वर्ग को सत्ताधारी ने कितनी छूट और कितना सरक्षण दे रखा है, कितना अंकुश कर रखा है |यही कारन है की आप किसी भी देश का इतिहास उठा लो पुरोहित वर्ग राजा के दरबार में साथ साथ ही मिलेगा|आज भी धर्म वही फलता फूलता है जिसे राजसत्ता का सरक्षण मिला होता है|

 

इस बात को बौद्ध धम्म में बहुत अच्छी तरह से समझा और इलाज किया गया है| बौध धम्म में पुरोहित वर्ग अर्थात बौद्ध भंते या भिक्खुओं के लिए कठोर नियम बनाये गए हैं, उनको संसार की भौतिक वस्तुओं और धन के संग्रह से रोक गया गया है| वे अपने लिए धम्म द्वारा धन अर्जित नहीं कर सकते वे दिन के एक भोजन के सिवा जनता पर किसी भी प्रकार का बोझ नहीं बन सकते|वे अपने सरक्षण के लिए सत्ताधारी पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं| केवल मूल बौद्ध धम्म ही एकमात्र ऐसा मार्ग है जो इश्वर,धर्म और पुरोहित वर्ग की सत्ता के बिना एक दुःख राहित संसार बनाने को प्रतिबद्ध है|

 

हम धर्म और इश्वर की जितनी भी समीक्षा करेंगे हम यही पाएंगे की ये आम जनता के लिए फायेदेमंद कम और नुकसानदायक ज्यादा हैं, वही ये पुरोहित्वर्ग और सत्ताधारी के लिए हर तर से फायदेमंद हैं|अब क्योंकि सत्ताधारी के पास धन,संपत्ति और शक्ति होती है तो उसका इन दोनों को बढ़ावा देना हम समझ सकते हैं|

 

darshnik skeka

 

धर्म की लोग किसी भी तरह व्याख्या करें पर असल में धर्म किसी कौम के लिए संसार में अपना अस्तित्व बचाये रखने की नीति के सिवाए और कुछ नहीं|

 

भारत के बहुजनों का धर्म सदियों से बौद्ध धम्म रहा है पर इतिहास में सत्ता के संगर्ष के दौरान बौद्ध धम्म नीति हार गई और बहुजन अपनी सुरक्षा के लिए ईसाइयत और इस्लाम की तरफ चले गए, जो नहीं गए वही आज के दलित हैं| आज हमने बौद्ध धम्म के उसी हार वाले स्वरुप को अपना लिए तो फिर से हार निश्चित है| अगर सुरक्षा चाहते हो तो धम्म में बहुजन सुरक्षा नीति को बदलना और विकसित करना ही होगा|सब जानते हैं की धम्म सबसे बेहतर है पर यहाँ सुरक्षा न होने के कारण बहुजन चाहकर भी अपना नहीं पा रहे|

 

सबसे शक्तिशाली है सरकार उससे भी शक्तिशाली है संविधान पर इस सबसे शक्तिशाली है सेना और सेना से भी ज्यादा क्या शक्तिशाली है – धर्म | धर्म क्या है ?धर्म जनता के मन वचन और कर्मों को नियंत्रित करना वाला सबसे शक्तिशाली औज़ार होता है|शायद अब आप समझ गए होंगे कि क्यों सेना में धर्म पढ़ाने वालों को भर्ती किया जाता है|

 

धर्म कोई सर्वभौम चिरकालिक चीज़ नहीं है ये मानव सभ्यता की एक संस्था मात्र है| धर्म कोई अनिवार्य संस्था नहीं इसके बिना बहुत ख़ुशी से जिया जा सकता है| धर्म असल में परिवार,कौम,देश,सरकार अदि की ही तरह एक ‘संस्था’ मात्र है| संस्था किसी लक्ष्य के लिए बनाई जाती है, जो समय के साथ बड़ी हो जाती है और लोग उसी को अंतिम सत्य मान लेते हैं| हर संस्था या संगठन के पीछे कोई न कोई उद्धेश्य अवश्य होता है| कोई भी संस्था उसके संस्थापक के छोटे से सपने के रूप में जन्म लेती है| उस संस्था की विचारधारा और मिशन जिन लोगों को अच्छा लगता है वो उससे जुड़ते जाते हैं और इस प्रकार लोगों का संगठन बनता है| धर्म संस्था की शुरुआत भी ऐसे ही होती है|

 

बौद्ध धम्म के संस्थापक भगवन बुद्धा थे जिन्होंने दुखों के मूल कारण खोजने ,तब प्रचलित ब्राह्मण धर्म,आस्था और परम्पराओं को नकार के नए सिरे से सत्य स्थापित करने हेतु बनाया गया| इस्लाम के संस्थापर मुहम्मद थे,श्री शकील प्रेम अपनी पुस्तक ‘धर्म एक अफीम’ में लिखते हैं की इस्लाम भी एक व्यति द्वारा सोचा गया सपना था जो की सामाजिक न्याय स्तापित करने और अलग अलग कबीलों में बटे लोगों के अपनी मान्यताओं के लिए खूने युद्धों को बंद करके उनको संगठित करना था| इसाई धर्म के संस्थापक इसु मसीह को बताया जाता है, पर ये भी सर्व विदित है की आज उपलब्ध बाएबल में कई बात कई बदलाव किये गए हैं| अब जब चहुँ और धर्म से आगे लोग सोच रहे हैं तो पश्चिम में एक नई बहस छिड़ी ही है, जिसका मुद्दा है क्या जेसस एक बुद्धिस्ट मोंक थे, क्या इश्वर विरोधी बातों के कारन उनको सूली पर चदय गया क्या उसे बाद उनको इश्वर घोषित कर दिया गया? इस विषय पर यौतुबे पर कई विडियो मिल जायेंगे| डा विन्ची कोड जैसी हॉलीवुड फिल्मे इस विषय पर बहुत से खुलासे करती है और कई सवाल खड़े करतीं|

 

ब्राह्मण धर्म या वैदिक धर्म जिसे हम आज हिन्दू धर्म के नाम से जानते हैं,वेदों को ही प्रमाणित और अंतिम सत्य मानना इसका प्रमुख मकसद था पर ये इसका कोई एक मकसद नहीं है ये समय,जगह और जरूरत के हिसाब से अपना नाम, रूप, मान्यता और परंपरा बदलता रहता है, ये एक वर्ग विशेष के संवर्धन और सत्ता बनाये रखने हेतु समर्पित प्रतीत होता है| इसका डिजाइन बाकि के धर्मों से थोडा अलग है| जहाँ बाकि के धर्म उसके संस्थापक द्वारा जनता के जीवन में सुधार के उपदेशों पर आधारित होते हैं वहीँ इसमें जनता की भावनाओं को अधर बनाकर उनके लिए रुचिकर तौर तरीके और त्यौहार बनाये जाते हैं चाहे वो उनका भला करे या न करे, उदहारण के लिए नशीली वस्तुएं, जुआ,शोर शराबा,पहाड़ों और नदियों की यात्रायें,नग्न मूर्ती,लिंग की पूजा, पुरुष प्रधानता हेतु सती प्रथा, देवदासी के नाम पर नारी देह शोषण,रंगों और रौशनी का सम्मिश्रण,नाटक नौटंकी और संगीत अदि अनेकों अनेक इसके डिजाइन की बुनियाद हैं| डिजाइन की इन बुनियादी बातों को बहुत से उधारानों और कथाओं द्वारा समझया और प्रमाणित किया जा सत है| यही कारन है की भले ही इसमें शोषण होता हो पर लोग इसे पसंद करते हैं और इन लोगों को ज्ञान और सत्य की बात अगर कोई समझाए तो ये लोग यही कहेंगे की मैं खुश हूँ तुझे क्या?

 

कभी ये अपनी मान्यताओं के लिए बहुत की कट्टरवादी और रुदिवादी था पर जब आज कट्टरवाद को दूसरों पर थोपना है तो खुद को उसे छोड़ना ही पड़ेगा| आजकल इसमें जो भी जो कुछ करना चाहता है उसे वो करने की आज़ादी है बस उस वर्ग विशेष की सत्ता और श्रेष्टता सुनिश्चित रहनी चाहिए| ये सब बातें कोई नई नहीं है ये सब पहले भी कई लोग समझाते आये हैं, पर के केवल बुद्धिजीवी तक ही सीमित रहतीं है लोगों को भाषण नहीं चाहिए उन्हें चाहिए मस्ती और फायेदा जिसे वो खुद अनुभव कर सकें| सदियों में ऐसे सत्य विचार कभी कभी बहुत जोर पकड़ लेते हैं और तब क्रांति होती है और कुछ सालों या कुछ सदियों के लिए जनता समर्थक व्यस्था चलती है| ऐसे में ये वर्ग विशेष अपनी सत्ता और श्रेष्टता को बनाये रखने के लिए धर्म पर संकट कि घोषणा करते हैं|इसके बाद ये बुद्धिजीवी वर्ग साम, दाम, दंड, भेद,नरसंघार,युद्ध कैसे भी सत्ता और श्रेष्टता वापस पाने कि कायावाद में लग जाते हैं, जिसमें भोले भले लोग नासमझी में इनका साथ देकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं|बौद्ध धम्म इन्हीं महामौकपरस्त,दयाशून्य सत्ता के खिलाफ क्रांति है जिसे आम लोग नहीं समझ पा रहे|

 

जहाँ धर्म इश्वर को सबसे ऊपर रखता है और दावा करता है की उसी ने सबको बनाया वो ही सब सुख दुःख का जिम्मेवार है, वहीँ धम्म मानता है की इंसान की बुद्धि ने इश्वर को बनाया, हमारे कर्म, प्रकृति और सरकारी नीतियां हमारे सुख दुःख की जिम्मेवार हैं|धम्म ऐसी व्यस्था का पक्षधर है जहाँ मानवता,शांति,विज्ञान,कानून और न्याय को धर्म और इश्वर से भी जरूरी माना जाए|आज का अमबेडकर संविधान इसी बौद्ध सोच पर आधारित है, जरा सोच कर देखो की अगर संविधान किसी कट्टर मानसिकता के व्यक्ति ने लिखा होता तो क्या हाल होता|ये जिंदगी का बुनियादी नियम है कि जब किसी भी चीज़ कि अति हो जाती है तब उसका पतन होता है|सामाजिक बटवारा और धन केंद्रित व्यवस्था कर्मकांड,पुरोहितवाद,पाखंड,ईश्वरवाद,अन्याय,झूठ और धर्म जब अपने चरम पर पहुच जाते हैं तब उससे हो रहे नुक्सान का लोगों को अहसास होता है| जब अहसास होता है तब वो विद्रोह कर देते हैं| परिणाम स्वरुप समानता और मानवता केंद्रित व्यस्था,विज्ञानं,पुरोहितों के हक़ छीनना,तर्कवादी मानसिकता एव चलन,न्याय,सत्य,अनीश्वरवाद और धम्म का उदय होता है|फिर धीरे धीरे धम्म भी बढ़ता जाता है और इसे बढ़ता देख वही पाखंडी लोग इससे जुड़ जाते हैं और धम्म में अंदर ही अंदर मिलावट करके धम्म को गलत साबित करने में लग जाते हैं|धीरे धीरे यही लोग चरम पर पहुचे धम्म के तथाकथित नुक्सान लोगों को समझने लगते हैं और लगों को भड़का कर विद्रोह करवा देते हैं| इस तरह फिर से वही पाखंड का राज आ जाता है| भारत के इतिहास और कुछ इन्हीं दोनों विचारधाराओं के संगर्ष कि कहानी है, समय के साथ नाम और रूप बदलते गए जिन्हें हम आज विभिन्न धर्म के नामों से जानते हैं|ये विचारधाराये और इनके विचारक और प्रचारक और उनका लिखित साहित्य ही धर्म है जिसका पुरोहित अपनी रोटी कमाने के लिए दोहन करते है| विदेशी आक्रमणकारियों कि भूमिका केवल किसी विचारधार के पक्ष या विपक्ष में रही है|ध्यान रही धम्म के चरम पर धर्म आता है धर्म के चरम पर धम्म आता है ये चक्र यूं ही चलता रहेगा|बौद्ध धम्म का चक्र यही समझाता है कि इतिहास अपने को दोहराता रहता है|DHAMMA or DHARMA


DHAMMA or DHARMA

POWER OF SILENCE (मौन की शक्ति ) …Ahibaran Singh

POWER OF SILENCE (मौन की शक्ति )

मौन रहना त्याग है, तपस्या है। मौन रहने से शरीर में ऊर्जा बढ़ती है। मौन के बल से कई सिद्धियां प्राप्त कर सकते हैं। महावीर 12 वर्ष व महात्मा बुद्ध 10 वर्ष तक मौन रहने के उपरांत ज्ञान प्राप्त कर सके। महर्षि रमण व चाणक्य भी मौन के उपासक थे। मौन इस अवस्था में खतरनाक होता है जब मन में विषय-वासना का तांडव चल रहा हो और जुबान बंद हो। मौन आत्मा का श्रृंगार है। जो मौन को जान गया वह जग जीत गया। यदि लोग आवश्यकतानुसार बोलें तो 90 प्रतिशत झगड़े स्वयं खत्म हो जाएंगे। इंसान को उतना ही बोलना चाहिए जितना बोलने से काम चल जाए। ज्यादा बोलने से शरीर की ऊर्जा क्षीण होती है। जो मौन की भाषा जानता है वह शब्दों का अच्छा प्रयोग करता है। यदि व्यक्ति एक हफ्ता गंभीर मौन में बिताए तो वह एक घंटा सार्थक बोलने योग्य होता है। अधिक बोलने वालों से लोगों का विश्वास उठ जाता है। कुछ लोग च्यादा बोलकर मुसीबत मोल ले लेते हैं। सोचें-समझें, विचारें और फिर बोलें। इसका एक सूत्र यह है कि प्रतिक्रिया तभी व्यक्त करें जब ऐसा करना आवश्यक-अपरिहार्य हो जाए। बिना मांगे दी गई प्रतिक्रिया का विशेष मूल्य नहीं होता। इसलिए?जब जरूरी हो और जितना जरूरी हो, उतना ही बोलें।0
वास्तव में जगत में सारे अच्छे विचार मौन से उत्पन्न होते हैं। मानसिक शांति के लिए मौन अमृत समान है। प्राय: वाद-विवाद होने पर मन का संतुलन बिगड़ जाता है। इसका सबसे अच्छा समाधान है मौन। जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए शुद्ध भोजन व गहन निद्रा आवश्यक है उसी प्रकार मानसिक स्वास्थ्य के लिए मौन। सोने से एक घंटा पूर्व व प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में एक घंटा मौन रहकर प्रभु की शरण में चले जाएं, शांति व खुशी की अनुभूति होगी। शांत रहें, मौन रहें, खुश रहें। जो लोग मौन का महत्व समझते हैं वे अपने जीवन में कभी असफल नहीं होते, क्योंकि मौन हजार शब्दों से भी अधिक मूल्यवान होता है।

by Ahibaran Singh

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धम्म दान महादान’ धन से विचारों का प्रचार ही उत्थान का एकमात्र मार्ग है

 
 
धम्म दान महादान’ धन से विचारों का प्रचार ही उत्थान का एकमात्र मार्ग है
 
 
“धम्म दान महादान’ धन से विचारों का प्रचार ही उत्थान का एकमात्र मार्ग हैबाबा साहेब द्वारा लिखित “भगवन बुद्धा और उनका धम्म” जैसी 300-400 पन्नो की किताब मार्किट में करीब 300-400 रूपए की ही बिकती है। इतने रूपए हमारे गाँव में बसने वाली जनता के लिए खर्च करना मुश्किल है।पर उन तक बाबा साहेब और भगवान् बुद्धा का सन्देश पहुचना जरूरी है ,तो ये समाज के सक्षम लोगों का फर्ज बनता है की वे ऐसी पुस्तकें गाँव में पहुचने के लिए समयबुद्धा मिशन ट्रस्ट की मदत करें। किताबें एक हज़ार के लौट में छपती  हैं, 300-400 पन्नो की किताब के कागज़,टाइप और छपाई का एक हज़ार किताबों के लौट की लगत करीब  50000 है या कहें  1 किताब का खर्च करीब 50 रूपए मात्र आता है जो की 300-400  रूपए की बिकती है। हम जानते हैं की एक हज़ार से कम के लौट में छापी नहीं होगी और होगी तप बहुत महंगी पड़ेगी दूसरा  एक आदमी अकेला 50000 रूपए आज की तरीक में खर्च नहीं करेगा, जागरण या साईं संध्या करवा लेगा पर  बौध धम्म के नाम पर तो नहीं करगा पर क्या एक आदमी 5000 रूपए भी खर्च नहीं करेगा।Image1121
 
इस हिसाब से पचास हज़ार की रकम इकट्टा करने के लिए पाच हज़ार के दस दानदाता चाहिए जिससे 1000 किताबे छपेंगी और हर किसी के हिस्से में सौ किताबें आएँगी बाटने के लिए जिसे वो हमसे ले सकता है या हमारे संसथान को दूर गाँव में बांटने के लिए छोड़ सकता है। कई लोग अपनी तस्वीर और दान को दिखाना चाहते हैं तो वो भी इस किताब में छापा जा सकता है । 
 
क्या कोई है जो ऐसा करने का इच्छुक हो, जब 10 आदमी हो जयगे तभी पैसे लिए जायेंगे वो भी चेक से या ड्राफ्ट से। इसी तरह अगर बीस आदमी हो जाये तो हर आदमी को केवल ढाई हज़ार देना होगा और उसे 50 किताबें मिल जाएँगी।
 
इसी तरह हम हर साल कलेंडर छापते हैं जिसमें केवल बौध की तस्वीर ही नहीं होती बल्कि लिखित सन्देश भी होते हैं जैसे
 
-बौध धर्म पर 10 बुनियादी सवाल-जवाब जैसे हमारा धार्मिक किताब,चिन्ह,स्थल,परंपरा  त्यौहार अदि क्या है
-भगवन बुद्ध के प्रभावशाली वचन
-धम्म प्रचार के चुने हुए प्रभावशाली सन्देशdhammpad_boudhopadishsangrah_hindi10832_medium
 
अच्छा कलेंडर आज-कल करीब दस हज़ार के हज़ार छपते हैं, ज्यादा छपवाने पर उससे भी कम लगत आती है। मतलब अगर आप 1000 रूपए दान देते हैं तो आपको मिलता है एक सौ कलेंडर जिसे आप अपने हिसाब से बाँट सकते हैं ।केलेंडर की विशेषता है की ये साल भर टगा रहता है किताब की तरह कोने में नहीं होता और पूरा साल अनेकों लोग इससे प्रेरणा लेते हैं ।
 
नोट: समय बुद्धा मिशन ट्रस्ट के सभी कार्यकर्त्ता उछ शिक्षित, जुझारू, संगर्शील और आर्थिक रूप से सक्षम हैं जिनमे टुच्चापन नहीं है । बौध धम्म के प्रचार में समर्पित लोग ही कृपया आवेदन करे, बदनामी फ़ैलाने और हिम्मत तोड़ने वाले अलग रहें ।
 
आवेदन के लिए कृपया jileraj@gmail.com पर मेल करें  अपनी इच्छा प्रकट करें। एक लौट के मेम्बर पूरे होने के बाद आपको धन के लिए संपर्क किया जायेगा कृपया तब विश्वास न तोड़े ।
 
हमारा मकसद बौध धम्म का प्रचार है पर ये भी एक कडवा सच है की धन के  ये नहीं हो सकता । हम ये भी जानते हैं की अजनबी को धन देना एक विश्वास और अविश्वास का मुद्दा है । यदि आप ट्रस्ट में न देना चाहे तो   ट्रस्ट का ये काम आप लोग अपने खास विश्वस्निये दोस्त के साथ मिल कर भी कर सकते हो ।
 
 
ध्यान रहे अगर आप सौ रूपए कमाते हैं तो उसमें से अगर 5 रूपए धम्म संगठन पर खर्चा नहीं किया तो  पूरे  बचाने  के चक्कर में वो दिन दूर नहीं जब पूरे 100 रुपये छीनने वाले सामने होंगे ।
 
ध्यान रहे :
 
धन से धर्म चलता है, धर्म से संगठन चलता है और संगठन से सुरक्षा होती है और सुरक्षा ही सर्वोपरि जरूरत है, बाकि की सभी चीज़े जैसे रोटी,कपडा,माकन,शिक्षा,संसाधन,संतान अदि आत्म  सुरक्षा के बाद ही आते हैं ।
 
बुद्धा धम्म को हम नहीं बढेंगे तो कौन बढ़ायेगा|नीरसता और अलास्ये त्यागो कुछ तो करो

अलसस्स कुतो सिप्पं,
असिप्पस्स कुतो धनं।
अधनस्स कुतो मित्तं,
अमित्तस्स कुतो सुखं।
असुखस्स कुतो पुञ्ञंण,
अपुञ्ञसस्स कुतो वरं॥ बर्मीस भिक्खु छक्किभिन्दिसिरि के ग्रन्थ लोकनीति से उद्धृत

भाव : आलसी व्यक्ति को शिल्प अर्थात् उद्यमी कला तथा परिश्रम की प्राप्ति नहीं होती। शिल्प रहित व्यक्ति को धन की प्राप्ति असंभव है। धनहीन के मित्र नहीं होते और मित्रहीन व्यक्ति सुखी नहीं रहता। बिना सुख के पुण्य नहीं मिलता तथा पुण्य रहित मानव श्रेष्ठ नहीं कहलाता। सार यह है कि आलस्य सभी वस्तुओं को नष्ट कर देता है। भगवान् बुद्ध का अन्तिम सन्देश भी अप्रमाद रहित कार्य करने हेतु प्रेरित करने वाला था। (वयधम्मा संखारा, अप्पमादेन सम्पादेथ। महापरिनिब्बानसुत्त) अतः अब समय है इस तन्द्रा तथा आलस्य को त्यागकर अपना दीपक स्वयं बनने की। (अत्त दीपो भव।)

 

इसके अलावा ऐसे बाहर के कई संगठन / प्रकाशक हैं जो बुद्ध साहित्य से जुडी किताबों का निशुल्क वितरण का काम करते हैं , उनसे संपर्क किया जा सकता है । ऐसे ही ताईवान की एक संस्था है , “ The Corporate Body of the Buddha Educational Foundation, Taiwan ” जो अंगेजी के अलावा हिन्दी और अन्य कई भारतीय भाषा में पुस्तके छापती और वितरित करती है। डा अम्बेडकर की “ भगवान बुद्ध और उनका धम्म “ मुझे इसी संस्था से निशुल्क प्राप्त हुय़ी थी , इसके अलावा और ही कई पुस्तकें मैं यहाँ से मँगा चुका हूँ ।

“ The Corporate Body of the Buddha Educational Foundation, Taiwan ” की साईट पर जाने के लिये http://www.budaedu.org/en/book/ पर जायें । कम संख्या मे व्यक्तिगत रूप से मगाने के लिये आन्लाइन फ़ार्म भरें और अधिक संख्या के लिये फ़ैक्स/मेल/ से संपर्क करें जिसका विवरण इनकी साइट पर उपलब्ध है ।

हिन्दी / पालि/और अन्य भारतीय भाषाओं में पुस्तकों की लिस्ट http://www.budaedu.org/en/book/II-08main.php3 पर उपलब्ध है । इसके अलावा अगर आप कम्पयूटर पर pdf के जरिये पढना चाहते हैं तो कुछचपुस्तकों को सीधे अपने सेट मे डाउअनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये http://www.budaedu.org/ebooks/6-IN.php पर जाये । हाँ , डा अम्बेडकर की “ भगवान बुद्ध और उनका धम्म “ पुस्तक pdf में उपभ्ध नही है , इसको सीधे फ़ार्म भरकर ही मँगाया जा सकता है ।

आत्म-सुरक्षा सर्वोपरि है, जब व्यक्ति सुरक्षित है तभी धम्म या धर्म उपदेश उसके काम का है

आत्म-सुरक्षा सर्वोपरि है, जब व्यक्ति सुरक्षित है तभी धम्म या धर्म उपदेश उसके काम का है

भगवान गौतम बुद्ध उस समय वैशाली में थे। उनके धर्मोपदेश जनता बड़े ध्यान से सुनती और अपने आचरण में उतारने का प्रयास करती थी। बुद्ध का विशाल शिष्य वर्ग भी उनके वचनों को यथासंभव अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने के सत्कार्य में लगा हुआ था। एक दिन बुद्ध के शिष्यों का एक समूह घूम-घूमकर उनके उपदेशों का प्रचार कर रहा था कि मार्ग में भूख से तड़पता एक भिखारी दिखाई दिया।

उसे देखकर बुद्ध के एक शिष्य ने उसके पास जाकर कहा- अरे मूर्ख! इस तरह क्यों तड़प रहा है? तुझे पता नहीं कि तेरे नगर में भगवान बुद्ध पधारे हुए हैं। तू उनके पास चल, उनके उपदेश सुनकर तुझे शांति मिलेगी। भिखारी भूख सहन करते-करते इतना शक्तिहीन हो चुका था कि वह चलने में भी असमर्थ था।Buddha26

सायंकाल उस शिष्य ने तथागत को इस प्रसंग से अवगत कराया। तब बुद्ध स्वयं भिखारी के पास पहुंचे और उसे भरपेट भोजन करवाया। जब भिखारी तृप्त हो गया तो वह सुख की नींद सो गया। शिष्य ने आश्चर्यचकित हो पूछा- भगवन्! आपने इस मूर्ख को उपदेश तो दिया ही नहीं,बल्कि भोजन करा दिया। भगवान बुद्ध मुस्कराकर बोले- वह कई दिनों से भूखा था। इस समय भरपेट भोजन कराना ही उसके लिए सबसे बड़ा उपदेश है। भूख से तड़पता मनुष्य भला धर्म के मर्म को क्या समझेगा?

कथा का सार यह है कि प्रत्येक सिद्धांत अथवा सर्वस्वीकृत आचरण सभी परिस्थितियों में लागू नहीं होता। परिस्थिति के अनुसार उसका पालन, अपालन या परिवर्तन मान्य किया जाना ही श्रेष्ठ आचरण है।

समयबुद्धा ने कहा है- “हम सभी अपनी जिन्दगी में जो कुछ भी करते हैं जैसे प्रेम, घृणा, शिक्षा, रिश्ते, धर्म, संगठन, न्याय, अन्याय, धंधा, नौकरी, अमन, झगडा अदि इन सबका अंतिम मकसद क्रमानुसार आत्मसुरक्षा,संतानोत्पत्ति और आराम के संसाधन जुटाना होता है| धर्म असल में समान विचारों पर आधारित संगठन ही है जिसका लक्ष्य सुरक्षा है|धर्म हमारी सुरक्षा के लिए है,इसीलिए किसी ने कहा है की धर्म की रक्षा स्वेव् की रक्षा है|”

कई धनवान धर्म गुरु अपने दुखी भक्तों से अक्सर कहते रहते हैं अगर दुःख से बचना है तो सब सांसारिक सुख जैसे धन त्याग दो या धर्म के नाम पर पुरोहितों को दान दे दो |अगर किसी भी धर्म से आप ये समझे की सब त्याग कर दरिद्र हो जाओ दुःख मिट जायेगा तो बहुत गलत समझे|

बौद्ध धम्म किसी इश्वर पूजा या संगठन या पुरोहित पालन के लिए नहीं है ये असल में व्यक्ति को दुःख से बचाने के फिलोसोफी या दर्शन है|समयबुद्धा का कहना है की

 “जीवन के ७०% दुःख धन से दूर किये जाते हैं ये जमीनी सच्चाई है और रहेगी| बौद्ध धम्म का मध्यम मार्ग धन सम्पन्नता पर भी लागू होता है| न तो अति गरीबी से दुःख दूर होगा न अति अमीरी से,गौर से देखा जाये तो संसार में बजाये धनवान और दरिद्र के माध्यम आए का वर्ग ज्यदा सुखी है|”

किसी ने सही कहा है की धन सबसे अच्छा नौकर है पर सबसे बुरा स्वामी|

जब भारत विश्व गुरु था वो केवल बौध काल ही था

पुरोहितवादी,सवर्ण,धार्मिक बाबा  जिस युग को भारत का स्वर्णिम युग कहते  है
जब भारत सोने की चिड़िया था जब भारत विश्व गुरु था
वो केवल बौध काल ही था जव तक्षशिला और नालंदा  जैसे विश्व विधालय सर्व साधारण के लिए खुले |
वर्ना उससे पहले ब्राह्मणों ने सारी विद्या को संस्कृत में कोड करके 
केवल अपनी कौम तक सीमित रक्खी थी, तो भारत विश्व गुरु कैसा बन सकता था, सोचिये जरा?
 
अशोक काल के स्वर्णिम युग की याद में आज भी हमारा राष्ट्रीय चिन्ह अशोक चिन्ह ही है  
 
बौध धर्म अपनाओ और भारत को उन्नत और अखंड बनाओ,
विदेशी धर्म अपनाने से देश के टुकड़े होने का खतरा है  
 
 
बुद्ध के इस सुंदर गीत को आप यू ट्यूब (you Tube)  पर सुन सकते हैं | 
 
                                     ये बुद्ध की धरती.
         ये बुद्ध की धरती, युद्ध न चाहे- चाहे अमन परस्ती | 
         ये बुद्ध की धरती, युद्ध न चाहे- चाहे अमन परस्ती |
                     ये बुद्ध की धरती-    बुद्धं सरघं गच्छामि,
                                                धम्मं सरघं गच्छामि,
                                                 संघं सरघं गच्छामि |
 
          ये बुद्ध का भारत, प्रबुद्ध भारत, पूर्ण समर्थक शांति का,
                                                 पूर्ण समर्थक शांति का —
         सम्मान बड़ा अहिंसा का यहाँ, मुंह काला निर्थक क्रांति का, 
                                          मुंह काला निर्थक क्रांति का — 
         जग वालो अमन का व्रत लेकर- जग वालो अमन का व्रत लेकर
                                           संसार संवारो भ्रान्ति का —
          है हिंसक नीती युद्ध की नीती धरो अहिंसक नीती ||
                                                 ये बुद्ध की धरती—
          ये बुद्ध की धरती, युद्ध न चाहे- चाहे अमन परस्ती | 
                     ये बुद्ध की धरती-    बुद्धं सरघं गच्छामि,
                                                धम्मं सरघं गच्छामि,
                                                 संघं सरघं गच्छामि |
 
          संसार को अपना घर समझो, गौतम ने अमर सन्देश दिया |
                                               गौतम ने अमर सन्देश दिया — 
          जियो स्वयं और जीने दो, औरों को यही उपदेश दिया |
                                               औरों को यही उपदेश दिया —
          मानव को जहां मानवता दी, मानव को जहां मानवता दी   
                                             जीवन को वही उपदेश दिया |
           है पतन की अर्थी और वह कुर्ती, आदर्शों की वुरती ||
                                                     ये बुद्ध की धरती —
           ये बुद्ध की धरती, युद्ध न चाहे- चाहे अमन परस्ती | 
                      ये बुद्ध की धरती-    बुद्धं सरघं गच्छामि,
                                                 धम्मं सरघं गच्छामि,
                                                 संघं सरघं गच्छामि |
           
            जो बुद्ध ने मानव हित में किया, उस कार्य का उत्तम क्या कहना |
                                                    उस कार्य का उत्तम क्या कहना — 
            जनहित ही उनका था जीना, जनहित ही उनका था मरना |
                                                     जनहित ही उनका था मरना —
              फिर सत्य अहिंसा शांति में – फिर सत्य अहिंसा शांति में,
                                                       क्या रिक्र हमारा हो गहना |
              यह ज्ञान की ज्योति अखंड जलती, दमके सारी जगती || 
                                                           ये बुद्ध की धरती—
               ये बुद्ध की धरती, युद्ध न चाहे- चाहे अमन परस्ती | 
               ये बुद्ध की धरती-         बुद्धं सरघं गच्छामि,
                                                धम्मं सरघं गच्छामि,
                                                 संघं सरघं गच्छामि |
                                —————————

बहुजन राजनीती के पितामहा मान्यवर साहब कांशीराम जी के जन्मदिन 15 मार्च अर्थात क़ुरबानी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं|

बाबा साहब ने सत्य कहा है ‘वही कौम तरक्की करती है जिस कौम में क़ुरबानी देने और लेने वाले लोग होते हैं’| इसका जीवंत उदाहरण kashiramबहुजन की भलाई के लिए भगवान बुद्धा का राजपाठ की क़ुरबानी|सम्राट अशोक ने धम्म विरोधियों की क़ुरबानी ली तब जाकर भारत की शुशाशन दिया स्वव बाबा साहब चाहते तो बहुत ऊँचे पद लेकर अपना जीवन शांति से बिता सकते थे पर उन्होंने सारा निजी जीवन समाज के लिए आर्थिक तंगी में काटा परिणाम हमारे लोगों की दशा हर तरह से सुधरी| इसके बाद हमारे साहब कांशीराम जी ने क़ुरबानी दी, समाज के लिए शादी नहीं की घर नहीं बनाया परिणाम जो समाज अपने लिए इज्जत तक की उम्मीद नहीं कर सकता था उसे इस देश पर राज करने लायक बनाया|क़ुरबानी ही वो चीज़ है जिससे तरक्की होती है,क़ुरबानी तो देनी ही पड़ती है,खुद दोगे तो सबका फायदा, खुद नहीं दोगे तो  जबरन दबंगी से ले ली जाएगी और तब फायेदा नहीं केवल कलंकित मौत ही मिलेगी|इसीलिए मैं अपने समाज को क़ुरबानी की अहमियत समझाने के लिए साहब कांशीराम जी के जन्मदिन १५-मार्च को क़ुरबानी दिवस के रूप में एक त्यौहार मानाने पर हमेशा जोर देता हूँ| हमें इस दिन अपने समाज के लिए अपना कुछ कुर्बान करना चाहिए जैसे समय,धन,विचारों का फैलाव,मूर्ती लगाना आदि अनेकों तरीके से क़ुरबानी दी जा सकती है|कुछ नहीं सूझे और किसी पर विश्वास न हो तो इतना तो कर ही सकते हो की कुछ रूपए खर्च कर के बाबा साहब की किताबे खरीद कर दूर दराज में बाँट तो सकते ही हो|क़ुरबानी दो आगे बढ़ो|

बहुजन राजनीती के पितामहा मान्यवर साहब कांशीराम जी के जन्मदिन १५ मार्च अर्थात क़ुरबानी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं|…समयबुद्धा

SamayBuddha Quotation of the Week 13/03/2013

2 tarah ke log

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

दुनियांमेंदोतरहकेलोगहोतेहैं

-एकजोअपनीवर्तमानदशासेखुशहैं, अपनाइतिहासजाननानहींचाहतेऔरभविष्यकेलिएकोईनीतिऔरसंगर्षनहीं,ऐसेलोगक्याजियेक्यामरे| इनकोकोईनहींउठासकताइनकादमननिश्चितहै

-दुसरेजोअपनेइतिहाससेसबकलेकरभविष्यकीनीतिबनातेऔरउसकोअमलमेंलानेकोसंगर्षकरतेहैं|येअपनेआपकोशोषणकरनेलायकबुलंदकरलेतेहैंयेइनकाअधिकारहै|

असलमेंसंगर्षऔरज्ञानउनलोगोंकेलिएहैजोअपनीवर्तमानस्तिथिकोबदलनाचाहतेहैं|आपसोचियेआपकिसतरफहैं ?