आत्म-सुरक्षा सर्वोपरि है, जब व्यक्ति सुरक्षित है तभी धम्म या धर्म उपदेश उसके काम का है


आत्म-सुरक्षा सर्वोपरि है, जब व्यक्ति सुरक्षित है तभी धम्म या धर्म उपदेश उसके काम का है

भगवान गौतम बुद्ध उस समय वैशाली में थे। उनके धर्मोपदेश जनता बड़े ध्यान से सुनती और अपने आचरण में उतारने का प्रयास करती थी। बुद्ध का विशाल शिष्य वर्ग भी उनके वचनों को यथासंभव अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने के सत्कार्य में लगा हुआ था। एक दिन बुद्ध के शिष्यों का एक समूह घूम-घूमकर उनके उपदेशों का प्रचार कर रहा था कि मार्ग में भूख से तड़पता एक भिखारी दिखाई दिया।

उसे देखकर बुद्ध के एक शिष्य ने उसके पास जाकर कहा- अरे मूर्ख! इस तरह क्यों तड़प रहा है? तुझे पता नहीं कि तेरे नगर में भगवान बुद्ध पधारे हुए हैं। तू उनके पास चल, उनके उपदेश सुनकर तुझे शांति मिलेगी। भिखारी भूख सहन करते-करते इतना शक्तिहीन हो चुका था कि वह चलने में भी असमर्थ था।Buddha26

सायंकाल उस शिष्य ने तथागत को इस प्रसंग से अवगत कराया। तब बुद्ध स्वयं भिखारी के पास पहुंचे और उसे भरपेट भोजन करवाया। जब भिखारी तृप्त हो गया तो वह सुख की नींद सो गया। शिष्य ने आश्चर्यचकित हो पूछा- भगवन्! आपने इस मूर्ख को उपदेश तो दिया ही नहीं,बल्कि भोजन करा दिया। भगवान बुद्ध मुस्कराकर बोले- वह कई दिनों से भूखा था। इस समय भरपेट भोजन कराना ही उसके लिए सबसे बड़ा उपदेश है। भूख से तड़पता मनुष्य भला धर्म के मर्म को क्या समझेगा?

कथा का सार यह है कि प्रत्येक सिद्धांत अथवा सर्वस्वीकृत आचरण सभी परिस्थितियों में लागू नहीं होता। परिस्थिति के अनुसार उसका पालन, अपालन या परिवर्तन मान्य किया जाना ही श्रेष्ठ आचरण है।

समयबुद्धा ने कहा है- “हम सभी अपनी जिन्दगी में जो कुछ भी करते हैं जैसे प्रेम, घृणा, शिक्षा, रिश्ते, धर्म, संगठन, न्याय, अन्याय, धंधा, नौकरी, अमन, झगडा अदि इन सबका अंतिम मकसद क्रमानुसार आत्मसुरक्षा,संतानोत्पत्ति और आराम के संसाधन जुटाना होता है| धर्म असल में समान विचारों पर आधारित संगठन ही है जिसका लक्ष्य सुरक्षा है|धर्म हमारी सुरक्षा के लिए है,इसीलिए किसी ने कहा है की धर्म की रक्षा स्वेव् की रक्षा है|”

कई धनवान धर्म गुरु अपने दुखी भक्तों से अक्सर कहते रहते हैं अगर दुःख से बचना है तो सब सांसारिक सुख जैसे धन त्याग दो या धर्म के नाम पर पुरोहितों को दान दे दो |अगर किसी भी धर्म से आप ये समझे की सब त्याग कर दरिद्र हो जाओ दुःख मिट जायेगा तो बहुत गलत समझे|

बौद्ध धम्म किसी इश्वर पूजा या संगठन या पुरोहित पालन के लिए नहीं है ये असल में व्यक्ति को दुःख से बचाने के फिलोसोफी या दर्शन है|समयबुद्धा का कहना है की

 “जीवन के ७०% दुःख धन से दूर किये जाते हैं ये जमीनी सच्चाई है और रहेगी| बौद्ध धम्म का मध्यम मार्ग धन सम्पन्नता पर भी लागू होता है| न तो अति गरीबी से दुःख दूर होगा न अति अमीरी से,गौर से देखा जाये तो संसार में बजाये धनवान और दरिद्र के माध्यम आए का वर्ग ज्यदा सुखी है|”

किसी ने सही कहा है की धन सबसे अच्छा नौकर है पर सबसे बुरा स्वामी|

5 thoughts on “आत्म-सुरक्षा सर्वोपरि है, जब व्यक्ति सुरक्षित है तभी धम्म या धर्म उपदेश उसके काम का है

  1. baat to ye bilkul sahi hain or bhook k alava bhi kayi esi mushkilen hoti hain insan ki jindagi m ki vo unhi m uljha rehta hai,udharan k liye ager kisi insan k hath ya per kharab hain to vo apne dukh m uljha rahega,vo na to samajik ho pata hai or na hi apni jindagi ji pata hai fir sath hi vo dhram ko kya samajh payega or kya vo khush reh payega ,ager thek siksha na mil paye ese insan ko to vo bus apne dukh m hi chupchap jindagi jeeta chala jata hai,kyunki us insan ko koi samajh hi ni pata or na hi koi uske dukh ko kum kur pata hai,islie mujhe lgta hai ki vo dharam ni samajh sukta.

    • Hi Brijesh, Thanks for understanding and comments, Buddhism is solution for all types of Dukkha, Half knowledge is dangerous, It is similar to example if I say you arrogant without understanding backgroung of your beheviour.so saying Buddhism as of no use is similar, Belive me Buddhism will help you a lot, BAS BUDDHA AUR UNKI SHIKSHA ME LAGAN LAGA LO,EK EK VAKYE TUMKO KHUSHI DEGA.

      Every person in this word have his own sorrows, as age increase these sorrows increase. This is part of life we have to learn to deal with it and buddhism will help you. solution of your problem is seeking peace and happiness within yourself not outside world.

      Raise your queries we will try to answer.

    • भगवान् बुद्धा ने कहाँ है

      “सत्य जाने के मार्ग में इंसान बस दो ही गलती करता है ,एक वो शुरू ही नहीं करता दूसरा पूरा जाने बिना ही छोड़ जाता है “

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