भगवान बुद्ध और अवतारवाद का अधूरा सत्य..डॉ प्रभात टन्डन

ये आर्टिकल साभार  ब्लॉग   http://preachingsofbuddha.blogspot.in से लिया गया है जिसका लिंक  प्रकार से है

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हम  इस आर्टिकल के लेखक डॉ प्रभात टन्डन के आभारी हैं  जिन्होंने इतने महत्वपूर्ण तथ्य जन साधारण के लिए उपलब्ध करवाए

इस  आर्टिकल के साथ संलग्न चित्रों का वर्णन :

1. बलरामपुर में द्रौपदी मन्दिर मे भगवान बुद्ध की मूर्ति
2. हिन्दू मन्दिरों मे भगवान बुद्ध की मूर्ति पाये जाने का एक दुर्लभ चित्र
3. Vishnu as Buddha making gesture of dharmacakrapravartana flanked by two disciples ( साभार : विकीपीडिया )

यह अजीब सा विरोधाभास है  कि एक तरफ़  तो हिन्दू धर्म मे भगवान बुद्ध को विष्णु  का नंवा अवतार माना जाता  हैं और दूसरी  तरफ़ हिन्दू मन्दिरों में बुद्ध की मूर्ति को ढूँढ पाना एक दुर्लभ कार्य है । पिछ्ले साल हरिद्वार और देहारदून से लौटते समय मेरे मन मे यही विचार उमडते रहे । उन दिनों हरिद्वार मे कोई बौद्ध  सम्मेलन चल रहा था । लौटते समय मेरी मुलाकात ट्रेन में जिन महिला से हुयी , वह भी उसी सम्मेलन का हिस्सा थी । बनारस की रहने वाली श्रीमती मालती तिवारी सारनाथ में  केन्द्रीय तिब्बती अध्यन्न विशवविधालय ( Central University of Tibetan Studies (CUTS) ,  Sarnath ) में  अध्यापन कार्य करती हैं  । बुद्ध धम्म मे उनकी गहन रुचि थी और बातों –२ मे ज्ञात हुआ कि उनका शोध  कार्य डां अम्बेड्कर और बौद्ध धर्म  पर केन्द्रित था । लेकिन मेरे इस प्रशन  पर वह चुप रही ।

गत वर्ष ही दीपावली के अगले दिन श्रावस्ती जाने का अचानक प्रोग्राम बन गया । श्रावस्ती से लौटते समय बलरामपुर में द्रौपदी मन्दिर मे भगवान बुद्ध की मूर्ति को देखकर मै अचरज मे पड गया । ऊपर का यह चित्र उसी मन्दिर से ही है ।

अवतार वाद की यह  फ़िलोसफ़ी मेरे मन मे कभी भी मूर्त  रुप न ले पाई । अगर ईमानदारी से भगवान बुद्ध को विष्णु का अवतार माना गया होता तो हर मंदिर में आज उनकी मूर्ति होती ।

लेकिन ऐसा क्यूं  है कि  भगवान बुद्ध को हिन्दू धर्म में पूर्ण रुप से स्वीकार नही किया गया ।  हिन्दू पुराणॊं मे इसे इस तरीके से पेश किया गया है जिसे ज़्यादातर बौद्ध अस्वीकार्य और बेहद अप्रिय मानते हैं। कुछ पुराणों में ऐसा कहा गया है कि भगवान विष्णु ने बुद्ध अवतार इसलिये लिया था जिससे कि वो “झूठे उपदेश” फैलाकर “असुरों” को सच्चे वैदिक धर्म से दूर कर सकें, जिससे देवता उनपर जीत हासिल कर सकें। इसका मतलब है कि बुद्ध तो “देवता” हैं, लेकिन उनके उपदेश झूठे और ढोंग हैं। ये बौद्धों के विश्वास से एकदम उल्टा है: बौद्ध  गौतम बुद्ध को कोई अवतार या देवता नहीं मानते, लेकिन उनके उपदेशों को सत्य मानते हैं। कुछ हिन्दू लेखकों (जैसे जयदेव) ने बाद में यह भी कहा है कि बुद्ध विष्णु के अवतार तो हैं, लेकिन विष्णु ने ये अवतार झूठ का प्रचार करने के लिये नहीं बल्कि अन्धाधुन्ध कर्मकाण्ड और वैदिक पशुबलि रोकने के लिये किया था।
लेकिन फ़िर सच क्या है ? क्या यह ब्राहम्ण्वादी  मानसिकता का बौद्ध दर्शन को सोखने की एक चाल थी ? संभवत: यह ही सच है !! मगर कैसे ? श्री आलोक कुमार पाण्डेय की पुस्तक , “ प्राचीन भारत ” जो मैने अभी हाल ही मे फ़िल्पकार्ड से मँगाई थी , इस विषय पर काफ़ी प्रकाश डालती है । आलोक जी जो सन २००२ बैच के IAS  हैं , उन्होने निष्पक्ष रुप से इसकी विवेचना की है । आप  लिखते हैं ,

लगभग छ्ठी ई.पू. में गंगा घाटी में रहने वालों के धार्मिक जीवन मे अनेकों परिवर्तन देखने को मिले । तत्कालीन परम्परावादी ब्राहम्ण धार्मिक व्यवस्था के विरोध मे लोग उठ खडे हुये तथा आन्दोलन का स्वरुप इतना तीव्र हो उठा कि ईशवर की सत्ता तक को अस्वीकार करने वाले सम्प्रदाय एवं मत अस्तित्व में  आये । तत्कालीन ग्रंथों में लगभग ६२ मुख्य और अनेक छोटे –२ धार्मिक सम्प्रदायों का परिचय मिलता है जो इस बात का परिचायक  है कि धर्म की जडता के विषय मे कितना असंतोष था । ……. प्रशन उठता है कि वह कौन से कारण थे जिनके चलते इस प्रकार का धार्मिक आन्दोलन उठ खडा हुआ । इन्हें निम्म रुप से समझा जा सकता है :

१. आर्थिक २. धार्मिक ३. सामाजिक ४. राजनैतिक

सम्भवत: नास्तिक सम्प्रदाओं के उदय के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण आर्थिक ही थे । यह शती लोहे के उपकरणों के कृषि मे प्रयोग होने की शती थी । हाँलाकि इसके पूर्व लोहे का ज्ञान हो चुका था किन्तु ज्यादतर वे शास्त्रास्त्रॊं  में प्रयुक्त होते थे । ……लौह उपकरणो के ज्ञान से विस्तूत मैदानों  की प्राप्ति हुई । इस विस्तूत मैदान पर अब गहन कृषि प्रारम्भ  हुई जिससे एक वर्ग को खाध सामग्री की चिन्ता से मुक्ति मिली और वे व्यापार , वाणिज्य और शिल्प कलाओं मे लग गये । …खेती  के लिये पशुओं की आवशयकता पडी । विशेष रुप से उन पशुओं की जो कृषि के काम आते थे जबकि  ब्राहम्ण धर्म की कर्मकाण्डीय यज्ञ परम्परा मे बलि दी जाती थी । इससे एक धार्मिक द्धंदं खडा हुआ । कृषक वर्ग और शिल्प या वाणिज्य से जुडे हुये लोगों ने ब्राहम्णीय परम्परा का विरोध किया ।

राम शरण शर्मा के अनुसार , “ वैदिक प्रथानुसार पशु अंधाधुंध माए जा रहे थे , यह खेती की प्रगति मे बाधक हुआ । यदि नई कृषि मूलक अर्थव्यवस्था को बचाना था तो पशुधन को संचित करना आवाशयक था । ” इस समय जितने भी नास्तिक संप्रदाओं ने पनपना प्रारम्भ किया सबने ब्राहम्णीय व्यवस्था का विरोध किया । इन सबमें बौद्ध और जैन धर्मों का स्वर सर्वाधिक तीव्र था । इन संप्रदाओं ने पशुओं को सुखदा और अन्नदा कहा और उनके वध का विरोध किया ।

यह समय व्यापार , वाणिज्य एवं नगरीय क्रांति का समय था । ६००-३२३ ई.पू. में लगभग ६२ नगरों का अस्तित्व था । व्यापार वाणीज्य से प्राप्त धन को एकत्र कर के वैशय वर्ग ने अपने निवास नगरों मे बनाये ।….. व्यापारियों ने निरंतर ब्राहम्णीय व्यवस्था का विरोध किया । एक अन्य कारण वैशव वर्ग का इन सम्प्रदाओं की ओर आकर्षित होना था क्योंकि व्यापार से इस वर्ग ने अकूत धन प्राप्त कर लिया था जब्कि हर तरफ़ महत्ता ब्राहम्णॊ की थी वह इस समृद्ध वर्ग को स्वीकार नही हुआ । अनाथपिण्डक , घोषित जैसे विभिन्न श्रेषठियों ने इसी कारण बौद्ध/जैन सम्प्रदाओं को मुक्त हस्त दान दिया । ऋण का कार्य ब्राहम्णीय परम्पराओं मे दूषित कार्य कहा गया था जबकि यह वैशवों तथा व्यपारियों का मुख्य कार्य था ।…. इन सबके अतिरिक्त नास्तिक सम्प्रदाओं का उदय चूँकि ब्राहम्णीय परम्परा के विरुद्ध हुआ था इसी कारण उनकी सहानुभूति हर उस वर्ग के प्रति थी जो आर्थिक रुप से कमजोर था और इसी  कारण इन समस्त वर्गॊ ने तन , मन और धन से इन सम्प्रदाओं के वर्धन हेतु कार्य किया । इन सम्प्रदाओं का ऐसा दृष्टिकोण बुद्ध के उस कथन से मिलता है जिसमे उहोने कहा कि , “ कृषकों को बीज , श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक और व्यवसासियों को धन देना चाहिये । “

धार्मिक कारणॊं के चलते हुये भी जैन/ बौद्ध सम्प्रदाऒ के उदय को बल मिला । ब्राहम्णीय व्यवस्था , देवों की कृपा को मानवों के शुभ के लिये आवशयक मानती थी । देवों को प्रसन्न करने के लिये विभिन्न उपाय किये जा रहे थे जो अब कर्मकाण्डॊं में बदल गये थे और जटिल से जटिलतर होते जा रहे थे । वैदिक ऋचाओं का स्थान मंत्रों ने ले लिया था तथा मंत्रों के माध्यम से देवों को वश मे करने की बात कही जा रही थी जो मंत्रों का ज्ञान नही रखते थे , वे अब जादू टोने तथा तंत्र  मंत्रों का सहारा लेने लगे थे । समाज का निम्म वर्ग इनके चक्कर मे फ़ँस कर भट्काव की स्थिति मे था । यह एक असंतोष का कारण बना ।पशु बलि और यज्ञीय कर्म कांडं  वे दूसरे तत्व थे जो सामान्य जनता को कष्ट ही देते थे । अनेक श्रोत यज्ञ कई –२ वर्षॊं तक चलते थे जिसमें यज्ञ कराने वाले को अनेकों दास – सासियाँ उपहार स्वरुप प्रदान की जाती थी । जहाँ  पहले ६ ऋषियों द्वारा यज्ञ कराया जाता था , उत्तर वैदिक काल मे आगे चलकर इनकी सँख्या १६ हो गयी थी | दूसरी ओर नास्तिक सम्प्रदाऒ   ने सदैव इसका विरोध किया । बुद्ध ने कहा , “ ब्राहम्ण , लकडी नही अपितु आन्तरिक ज्योति जला । “

सामाजिक कारणॊं का भी नास्तिक सम्प्रदाओं के उदय मे महती योगदान था । तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में चार वर्णॊं की स्थापना पूर्णरुपेण  हो चुकी थी तथा ब्राहम्ण एंव छत्रिय , दो सामाजिक उच्च वर्णॊ में सम्मलित थे जबकि वैशय एवं शूद्र को महत्व प्राप्त नही था । इस प्रकार समाज दो वर्गों मे विभाजित हो चुका था :

१. गैर उत्पादक वर्ग : ब्राहम्ण , छत्रिय

२. उत्पादक वर्ग : वैशय , शूद्र

समाज के उत्पादक वर्ग होते हुये भी उचित सम्मान न हो पाने के कारण वैशय एंव शूद्र वर्गों मे असंतोष व्याप्त था । इतना ही नही समाज का वर वर्ग जो उत्पादन मे कही शामित ही नही था सर्वाधित उपभोग करता था तथा इसे इसके पशचात अनेकों विशेषधिकार मिले हुये थे । तत्कालीन साहित्य से ज्ञात होता है कि गौतम , आपस्तंब आदि ऋषियों ने ऐसी व्यवस्था  बनाई थी कि ब्राहम्ण वर्ग को सर्वाधिक घोर अपराध करने पर भी सबसे कम द्ण्ड मिलता था । वैशव वर्ग व्यपार – वाणिजय के फ़लस्वरुप  अत्याधिक संपदा एकत्रित कर चुका था किन्तु उसे भी उचित आदर प्राप्त नही होता था । “  महाजनी , ऋण आदि जैसे कार्यों को ब्राहम्णीय व्यवस्था मे अपमान की दृष्टि से देखा जाता था “ राम शरण शर्मा

शूद्रों की दशा तो अत्यन्त खराब थी । शूद्र वध जैसे अपराध के लिये भी अपराधी को वही दण्ड दिया जाता था जो कौवे , उलूक आदि की हत्या के लिये दिया जाता था । मातंग जातक एवं चित्तसंभूत जातकों मे दी हुई कथायें शूद्रॊं पर होने वाले अत्याचारों का वर्ण करती है । नास्तिक सम्प्रदाय ने इन सबका प्रबल विरोध किया । जहाँ एक ओर वैशवों के ऋण , महाजनी एवं दास सम्बन्धी अधिकारों को मान्यता दी , वही बौद्ध धर्म ने सभी वर्णॊ के लिये अपने दरवाजे  खोल दिये । सामाजिक संदर्भ में भी बुद्ध ने जातिवाद का घोर विरोध किया , वस्तुत:  तपस्सु एवं भाल्लुक जैसे शूद्रॊ को बुद्ध ने संघ मे प्रथम प्रवेश दिया । विभिन्न धार्मिक पाखंडो एवं यज्ञीय कर्मकांडो का उन्होने विरोध किया तथा सरल और आडम्बररहित  मार्ग का प्रतिपादन किया । बुद्ध ने अपने सिद्धांत पालि भाषा मे दिये जो जनसामान्य एवं लोकोन्मुखी स्वरुप को दर्शाता है ।  बुद्ध ने कर्मकांडो का विरोध करने के पीछे मुख्य तर्क यह दिया कि समाज मे जन्म के अनुसार कोई उच्च या निम्म नही होता है । उच्चता का निर्धारण कर्म से होता है ।  इसी प्रकार ब्राहम्ण एवं छत्रियों ने भी नास्तिक सम्प्रदाओं जैसे बौद्ध एवं जैन सम्प्रदाओं का सहयोग किया ।

आशर्चजनक तथ्य यह कि बुद्ध जिन उच्च जातियों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे संघ मे सम्मिलित होने का उनका प्रतिशत सर्वाधिक था यथा –

जाति  आवृति प्रतिशत
छत्रिय 706 51.5%
ब्राहम्ण 400 29.1%
वैशव 155 11.02%
शूद्र 110 8.3%

भिक्षुओं का जातीय आधार ( विनय एवं सुत्त पिटक के आधार पर ) साभार : श्री आलोक पान्डॆ

राजनैतिक कारणो का नास्तिक सम्प्रदाओं के उदय मे दो प्रकार से सकरात्मक उपयोग रहा ।

१. ब्राहम्ण – राजन्य द्धंद

२. गणराज्यों का स्वतंत्र वातावरण

ब्राहम्ण एवं क्षत्रिय राजन्य वर्ग के मध्य उत्तरवैदिक काल से द्धंद आरम्भ हो चुका था । प्रवाहण्जाबालि , अशवपति तथा मिथिला के विदेह जैसे विद्धान ने कई ब्राहम्णॊ को ज्ञान के स्तर पर पिछाडा था । परिस्थितियाँ ऐसी थी कि ब्राहम्ण हर ओर से लेने वाले थे जबकि क्षत्रियों को देना भी पडता था ऐसी स्थिति में द्धंद सामने जब आया तो वास्तविक शक्ति क्षत्रियों को देकर ब्राहम्ण ने आदरसूचक प्रथम स्थान ले लिया । ऐसी स्थिति में नास्तिक संप्रदाओं ने राजन्य वर्ग का पक्ष लिया और इसी कारण इस वर्ग का समर्थन हासिल किया । अजातशत्रु , बिम्बसार , प्रसेनजित और आगे चलकर अशोक आदि का समर्थन बौद्ध एंव जैन धर्मॊ को न मिला होता तो इन धर्मॊ का वास्तविक रुप कुछ और ही होता ।

हाल ही में रिलीज हुई “ OH MY GOD “ जिन्होने देखी हो वह आसानी से समझ सकते हैं कि अवतार कैसे और क्यूं बनाये जाते हैं । फ़िल्म में परेश रावल ( कांजीलाल  की भूमिका में ) जब ईशवर के होने या न होने पर प्रशन खडा करता है , धर्म के नाम पर धन्धा कर रहे धंधेवाजों की जब पोल खोलने लगता है तो अंत मे वही दुकान चलाने वाले उसको ही अवतार घोषित कर देते हैं ।  देखिये एक झलक OH MY GOD से  http://youtu.be/BkO4Hgg4YMI

बुद्ध को अवतार साबित करना महज एक दिखावा और ढोंग है , सच तो यह है कि बुद्ध धम्म और  हिंदू धर्म में कही दूर दूर तक कोई समानता नही है ,  हाँ समानता है कि हिन्दू  , जैन , सिक्ख और चार्वाक दर्शन की तरह बुद्ध धम्म का दर्शन भी भारत की गौरवशाली पंरपरा से ही उत्पन्न हुआ है . यह विदेशी संस्कृतियों की तरह किसी को जबरन या लालचवश  धर्मातरण पर मजबूर नही करता , किसी के ऊपर बिलावजह अत्याचार करने की अनुमति नही देता , हाँ कुछ सोचने को मजबूर अवशय करता है  । यह आप पर निर्भर करता है कि अपने द्धीप आप अवंय बनना चाहते हैं या दूसरे के सहारे अपनी नैया पार करना चाहते हैं ।

अप्प दीपो भव ! ( अपना प्रकाश स्वयं बनो )  Be your own LAMP !  Realize yourself and the World !!

डॉ प्रभात टन्डन

कबीर – एक महान क्रन्तिकारी

kabeerकबीर – एक महान क्रन्तिकारी – कबीर साहब के आश्रम के पास एक मंदिर था। एक दिन कबीर साहब की बकरी मंदिर के अन्दर प्रवेश कर गयी। मंदिर का पुजारी ब्राम्हण कबीर साहब के पास पहुंचा और कहा ‘कबीर’! तुम्हारी बकरी मंदिर में प्रवेश कर गयी है जो ठीक नहीं है। कबीर साहब ने जवाब दिया – पंडित! जानवर है, प्रवेश कर गयी होगी, मै तो नहीं गया। जवाब सुनकर मंदिर का पुजारी ब्राह्मण निरुत्तर हो गया।

ऐसे बाहर के कई संगठन / प्रकाशक हैं जो बुद्ध साहित्य से जुडी किताबों का निशुल्क वितरण का काम करते हैं

ऐसे बाहर के कई संगठन / प्रकाशक हैं जो बुद्ध साहित्य से जुडी किताबों का निशुल्क वितरण का काम करते हैं , उनसे संपर्क किया जा सकता है । ऐसे ही ताईवान की एक संस्था है , “ The Corporate Body of the Buddha Educational Foundation, Taiwan ” जो अंगेजी के अलावा हिन्दी और अन्य कई भारतीय भाषा में पुस्तके छापती और वितरित करती है। डा अम्बेडकर की “ भगवान बुद्ध और उनका धम्म “ मुझे इसी संस्था से निशुल्क प्राप्त हुय़ी थी “ The Corporate Body of the Buddha Educational Foundation, Taiwan ” की साईट पर जाने के लिये http://www.budaedu.org/en/book/ पर जायें । कम संख्या मे व्यक्तिगत रूप से मगाने के लिये आन्लाइन फ़ार्म भरें और अधिक संख्या के लिये फ़ैक्स/मेल/ से संपर्क करें जिसका विवरण इनकी साइट पर उपलब्ध है ।
हिन्दी / पालि/और अन्य भारतीय भाषाओं में पुस्तकों की लिस्ट http://www.budaedu.org/en/book/II-08main.php3 पर उपलब्ध है । इसके अलावा अगर आप कम्पयूटर पर pdf के जरिये पढना चाहते हैं तो कुछ पुस्तकों को सीधे अपने सेट मे डाउअनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये http://www.budaedu.org/ebooks/6-IN.php पर जाये । हाँ , डा अम्बेडकर की “ भगवान बुद्ध और उनका धम्म “ पुस्तक उपभ्ध है , इसको सीधे फ़ार्म भरकर ही मँगाया जा सकता है ।

A comment by Dr Prabhat Tondon

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25-APRIL-2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- “शूद्र ,अछूत,राक्षश,हरिजन की तरह “दलित” शब्द भी कलंक है इसे त्यागो, अपने लिए सम्मानजनक सम्बोधन चुनो बहुजन/बौद्ध बनो” …समयबुद्धा

जब भगवन बुद्धा ने हमको बहुजन और श्रमण कहा जब साहब कांशीराम ने हमें बहुजन बनाने को कहा, जब बाबा साहब ने कभी हमें दलित नहीं कहा, तो फिर हमारे लोग अपने लिए विरोधियों का दिया हुआ नाम दलित क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं|खुद को दलित कहने से आपको केवल अपमान ही मिलेगा, हो सकता है जरा सी झूठी सहानुभूति मिल भी जाए पर अगर सम्मान चाहिए तो आपको बहुजन बौद्ध बनना ही पड़ेगा | ये जिन्दगी का नियम है की कमजोर कोई कोई नहीं और शक्तिशाली का सब साथ देते हैं|आखित कब तक आप दलित बने रहोगे ?
कुछ बेवकूफों को अपने शूद्र होने का अफ़सोस नहीं है बल्कि अपनी विरोधियों का गुलाम होने में फक्र है

“ज्ञात हो कि शूद्र ,अछूत,राक्षश की तरह “दलित” शब्द भी धम्म विरोधियों द्वारा फैलाया गया भ्रामक जाल है जो भारतीय बहुजनों  की इस पीढ़ी और आने वाली पीढयों को मानसिक रूप से कमजोर बनाये रखेगा। दलित शब्द कलंक है इसे त्यागो,अपने लिए ऐसे सम्भोधन चुनो जो आपकी शक्ति दिखाए कमजोरी नहीं| दलित शब्द कमजोरी बताता है,खुद को बौद्ध कहो और गौरवशाली विजेता बौद्ध इतिहास से जोड़ो |खुद को बहुजन कहो, बहुजन शब्द जनसंक्या बल दर्शाता है जिसमें सभी 6000 जातियां में बटे भारतीय लोग आते हैं|इन छह हज़ार जातियों में से कुछ को छोड़कर ९५% जातियां कभी खुद को दलित कहलवाना पसंद नहीं करेंगी, इससे तो वो हिन्दू रहना पसंद करेंगे| कमजोर के साथ कोई नहीं जुड़ना चाहता|इन छह हज़ार जातियों में कई जातियां ऐसी हैं जो उन्नत हैं वे बहुजन होते हुए भी अपने भाइयों से घृणा करते हैं उनपर अत्याचार करते हैं क्योंकि वो खुद को हिन्दू और इनको दलित समझते हैं|जबकि बहुजन निति कहती है की हमें ऐसे लोगों को अगड़े बहुजन और दलितों को पिछड़े बहुजन कहना और कहलाना होगा|इससे इन लोगों को लगेगा की हाँ दोनों ही बहुजन हैं| ये बहुत गहरी बात है गहरी नीति है इसे समझने के लिए उतना मानसिक स्थर होना जरूरी है | इज्ज़त मांगी नहीं जाती कमाई जाती है,जब तुम अपनी इज्ज़त खुद करोगे तभी तो दुनिया भी करेगी

धम्म विरोधियों की सबसे बड़ी ताकत ये है की उनमे से एक निति बनता है और बाकि साब उसको मानते हैं चलते हैं क्योंकि उनमें उस निति को समझने कीक्षमता होती है| वहीँ हमारे लोगों को नीति समझ में ही नहीं आती अपने दिमाग में जो भी भरा है वो उसे बदलने को टायर नहीं उल्टा विरोध करते हैं|उदाहरण के लिए छह हजार जातियों में बंटे भारत की संतानों को हम उनकी अलग अलग जाती से और आंबेडकरवादियों को दलित कहकर सम्भोदित करने की बजाये  हम कहते हैं की इन सभी को भगवन बुद्धा और साहब कांशीराम का दिया हुआ नाम “बहुजन” कहो|जब तक दलित बने रहोगे आपके अपने लोग जो SC/ST/OBC/Minorities में आते हैं वही आपके साथ नहीं जुडेगें| जब तक संगठित नहीं होगे तो स्तिथि कैसे बदलेगी|दलित को दलित बनाये रखने के लिए वो लोग संगर्ष कर रहे हैं आप अपने को उठाने के लिए क्या कर रहे हो|हमारे लोग अक्सर शिकायत करते मिल जायेंगे की वैदिक/ब्राह्मण धर्म का नाम बदल कर हिन्दू रख लिया |उनमें निति बने समझने और सामूहिक रूप से लागू करने क्षमता थी, उन्होंने समय और परिस्थिति को समझ कर नाम रखने और बदलने की निति लागू की,संगठन देखिये की बाकि के सभी मनुवादियों ने इस नाम का महत्व समझा और अपनाया,क्या हमारे लोगों में है ये क्षमता? |परिणाम इस निति से बहुत से बहुजन को अपने शूद्र होने का अफ़सोस नहीं है बल्कि हिन्दू होने का गर्व करते हैं और हमारे लोग केवल शिकायत करते हैं …. उस वर्ग विशेष का संगठन  देखिये की से लाख अन्याय होने के बावजूद कोई  विरोध नहीं करता| पर हमारे लोगों को देखो निति की कीमत और फायदा तो समझते नहीं हैं उल्टा भरपूर विरोध करते हैं |इस तरह क्या दलित अपनी दुर्दशा का खुद ही जिम्मेदार नहीं है ?

जातिसूचक शब्द, शूद्र ,अछूत,राक्षश की तरह “दलित”  शब्द का सम्भोदन आपको आपके विरोधियों द्वारा दिया गया है| उन्होंने आपको इन्हीं नामों से सरे इतिहास में बेईज्ज़त किया है|मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ क्या आप उन्हीं के दिए नामों में खुश हो?क्या आप अपने लिए कोई इज्जतदार नाम रखना या चुनना नहीं चाहते| आप आने लिए अपने लिखित और मौखिक व्यवहार  में बहुजन /बौध शब्द का प्रयोग कर विरोधियों को करने दो उनके बनाये शब्धों का प्रयोग आप खुद क्यों करते हो| समय आने पर उनको भी सम्मानजनक शब्द स्वीकार करने पर बाध्य होना  पड़ेगा| नाम में बहुत बात होई है हमारे लोग इसे नहीं समझ पाते|बस किसी भी तरह जैसे तैसे पैदा हो गए कुछ भी कलुआ,चंगु,मंगू ,अदि शब्दों से अपने आप नाम पड़ जाता है| नाम के आगे विजय को सूचित करता हुआ टायटल  तो इस्टेमाल करते ही नहीं है क्योंकि ये लोग अपना इतिहास ही नहीं जानते|जबकि इनके विरोधी अपना खानदानी नाम बड़े गर्व से अपने नाम के पीछे  लगाये घुमते हैं|कुछ सोचते ही नहीं बाद जैसे तैसे जीते हैं बेहतरी के लिए कुछ नहीं करना चाहते|जब अपना खुद का नाम आप नहीं रख पाते तो फिर अपनी कौम का नाम क्या रखोगे| तो बस आपके विरोधयों ने रख दिया जो उनकी अच्छा लगा| एक और बात है नाम में ज्यादा जोर देने से भी फर्क नहीं पड़ेगा ये कर्मों से जुड़ा होता है| उदाहरण के लिए सफाई कर्मचारी को नाम बदल कर राजाधिकारी रख दे पर वो अपना काम न बदले तो जब भी राजाधिकारी नाम बोल जायेगा तो वो निम्नता को ही सूचित करेगा| केवल अच्छा नाम रख लेबे से भी समाधान नहीं होगा उसे अच्छा बनाना  भी होगा|

अछूतपन बौद्धों पर लगाया गया कलंक है, हमे इससे खुद को और बाबा साहब को आजाद करने की जरूरत है। तभी बाबा साहब के सपने को साकार कर पाएंगे। बाबा साहब ने हमे दलित नाम नहीं दिया था, उन्होने हमे केवल ‘अनुसूचित जाति’ नाम दिया था और अपने अनुयायियों से बौद्ध धम्म अपनाने की अपील की थी। उनके 2 बड़े सपने थे, पहला की कोई अनुसूचित जाति का व्यक्ति भारत का हुक्मरान हो, और दूसरा की ये लोग बौद्ध धम्म का सारे संसार मे प्रचार करें, बौद्ध धम्म का प्रचार करना ही मानवता की सेवा करना है। इनके अनुयाई अपने बाबा साहब के सपनों से बहुत दूर दिखाई देते हैं, बाबा साहब ये सारे काम अपने जीवन मे ही करना चाहते थे पर उम्र ने साथ नहीं दिया। उन्होने अपने धर्म ग्रहण के 15 वर्षों के अंदर भारत के बौद्ध देश होने की कल्पना की थी, ये लोग अभी भी ‘दलित’ जैसे घटिया तमगों से चिपके हुए हैं। सपना क्या खाक पूरा करेंगे!!!!!!!!!!!!!!!

इस देश में बौद्ध क्रांति होकर दबा दी गई, बाबा साहब आंबेडकर आके चले गए, पर अफ़सोस कुछ जागरूक लोगों को छोड़कर बाकी पूरा बहुजन समाज आज भी सो रहा है| इस देश में बहुजन ने अपने उद्धारक को  देखने को आँखे नहीं खोली, उनकों सुनने को कान नहीं खोले, उनके बारे में अपनी अगली पीढ़ी को बताने को अपनी जबान नहीं खोली|बहुजनों की दुर्दशा केवल इसलिए नहीं है क्योंकि उसके विरोधी धनि और शक्तिशाली हैं बल्कि इसलिए भी है क्योंकि वो 6000 से ज्यादा जातियों में बटा हुआ है|जब एक जाती का दमन होता है तो बाकि 5999 जातियां चुपचाप देखती और दमन करने में परोक्ष या अपरोक्ष रूप से विरोधितों की मदत करती हैं|अफ़सोस डॉ आंबेडकर और भगवान् बुद्धा जो की समस्त बहुजन समाज के मार्गदाता  हैं सारा अन्भिग्ये बहुजन समाज उनको केवल दलितों तक सीमित रककर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं”.

बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने १९५६ में बुद्ध के धम्म की दीक्षा ली, परन्तु वास्तविक बुद्ध का प्रचार 1932-1935 से ही सुर किया था, बाबासाहेब डॉ. आम्बेकर ने जितने भी उपदेश लोगो को दिए उसमे अनेको बार बुद्ध का उल्लेख करने मे कोई कही कसर नहीं छोड़ी है। इसके अनेको भाषणों के उदारण दे सकते है। 9/10/2012 का आदरणीय बहन मायवती का भाषण सुना, लगभग आ. बहन मायवती ने 100 जादा बार दलित शब्द का प्रयोग करके बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, के बुद्धवाद का अपमान करने में कोई कसर नहीं छोडती। इनके साथ इनके कार्यकर्ता भी बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर का अपमान करने में कही कसर नहीं छोड़ते। इसी प्रकार बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, के नाम से चलने वाले गैर राजनेतिक संघटन, चाहे बामसेफ हो या और कोई भी बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, के बुद्धवाद का अपमान करने में कही कोई कसर नहीं छोड़ते।

जो लोग दलित-शुद्र-अतिशूद्र शब्दों का प्रयोग करते है, उनसे निवेदन है की उन्होंने Dr. Ambedkar, writing & Speeches, सम्पूर्ण खंड पड़े और विशेष करके Vol. 18-3 पड़े। दलित-शुद्र-अतिशूद्र यह शब्द बुद्धिज्म के विकास के लिए कैसे घातक है, यह डॉ. आम्बेडकर ने अपने भाषणों से लोगो को समजाया है। (Ref. Dr. Ambedkar, writing & Speeches, Vol. 18-3,) और यह भी स्पष्ट किया है की मेरे जीवनकाल के अंतिम दिन बुद्ध के प्रचार के लिए समर्पित करूंगा। जिन लोगो ने दलित इस शब्द को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल की है और दलित-शुद्र-अतिशूद्र शब्दों का प्रयोग करते है यह लोग दुनिया में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के घोर विरोधी और डॉ. आंबेडकर के बौद्धवाद के हत्यारे है।

the bombay cronical

हमारे लोग हर वक़्त खुद पर हुए अन्याय की   शिकायत करते रहते हैं , ठीक है कीजिये जनजागरण भी जरूरी है|अगर पुराने अत्याचार की चर्चा नहीं करेंगे तो आज की  आराम तलब पीढ़ी को कैसे पता चलेगा की ये समय आराम का नहीं शक्ति इकठ्ठा करने का है|इस सब प्रचार प्रसार में मेरी इच्छा ये है की जब भी कोई कहीं कोई शिकायत या अत्याचार की चर्चा करता है वो उसके अंत में उसका  समाधान निति, जो भी उसके मन में हो जरूर लिखे|कमेंट में भी लोग समाधान लिखें| आज बहुजन के बड़ते वर्चस्व की शिकायत ब्राह्मणवादी लोग तो नहीं कर रहे उनका जवाब होता है – हर बार नई नीति बनाते और लागू करते हैं | हमारे लोग क्यों निति नहीं बनाते, अगर कोई बनाये भी तो बाकि उसे नहीं समझते, उद्धरण के लिए मैंने हर बार कहा की दलित शब्द का प्रयोग न करो पिछड़े बहुजन कहो, ओ बी सी को अगड़े बहुजन कहो, एस टी को आदिवासी बहुजन कहो| हम सब बहुजन हैं इस शब्द से ही सबकी संबोधित करो तो आपस में एक होने की भावना जागृत होगी| पर क्या इस बात को कोई समझा, हमारे लोग बड़े गर्व से दूसरों का दिया नाम दलित लगा कर घूम रहे हैं और सारे संगर्ष पर पानी फेर रहे हैं| ध्यान रहे कमजोर का कोई नहीं होता जब तक दलित बने रहोगे आपके अपने लोग ओ बी सी और एस टी भी आपका साथ नहीं देंगे, वो भी घृणा करेंगे|

…समयबुद्धा

jileraj@gmail.com

बौद्ध धम्म मत ने पंडित दामोदर स्वामी को बनाया राहुल सांकृत्यायन

बौद्ध  धम्म मत ने पंडित दामोदर स्वामी को बनाया राहुल सांकृत्यायन
 
भगवान् बुद्धा ने कहा है “मोह में हम किसी की बुराई नहीं देख पते और घृणा में किसी की अच्छाई ” 
 
आज बौध धर्म का सबसे बड़ा नुक्सान ये बात कर रही है की ये दलितों का धर्म है जिसके वजह से इसे लोग समझने के लिए भी तयार नहीं जबकि ये वो मत है की इसे जो भी एक बार ठीक से समझ ले उसे फिर दुनिया में किसी भी धर्म के सिद्धांत खोकले लगते हैं। कहा जाता है जी बौध और ब्राह्मण एक दुसरे के परस्पर विरोधी रहे हैं पर असल में ये बात केवल राजनेतिक कारणों से ही सही है। धार्मिक कारणों से तो क्या ब्राह्मण क्या मुसलमान क्या इसाई क्या अन्य कोई बौध मत के आगे कोई ज्यादा देर तक इसे अपनाने से खुद को नहीं रोक सकता। ऐसा इसलिए नहीं की ये सबसे अच्छा धर्म है बल्कि इसलिए की केवल यहाँ सत्य और तर्क  ज्यादा  है बाकि जगह कल्पना,गुटबाजी और पुरोहितवाद ज्यादा है । इसी कड़ी में प्रस्तुत है बौध धम्म महाज्ञाता श्री  राहुल सांकृत्यायन का छोटा सा परिचय :

बौध धम्म महाज्ञाता श्री  राहुल सांकृत्यायन (जन्म- 9 अप्रैल, 1893; मृत्यु- 14 अप्रैल, 1963) को हिन्दी यात्रा साहित्य का जनक माना जाता है। वे एक प्रतिष्ठित बहुभाषाविद थे और 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में उन्होंने यात्रा वृतांत तथा विश्व-दर्शन के क्षेत्र में साहित्यिक योगदान किए। बौद्ध धर्म पर उनका शोध हिन्दी साहित्य में युगान्तरकारी माना जाता है, जिसके लिए उन्होंने तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक भ्रमण किया था।

राहुल सांकृत्यायन जी का जन्म 9 अप्रैल, 1893 को पन्दहा ग्राम, ज़िला आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। राहुल सांकृत्यायन के पिता का नाम गोवर्धन पाण्डे और माता का नाम कुलवन्ती था। इनके चार भाई और एक बहिन थी,  भाइयों में ज्येष्ठ राहुल जी थे। पितृकुल से मिला हुआ उनका नाम ‘केदारनाथ पाण्डे’ था। बचपन से ही वे अन्धविश्वास और कर्मकांड को पसंद नहीं करते थे,धर्म की जिज्ञासा पूर्ती उन्हें  सन् 1930 ई. में  लंका में बौद्ध मत को समझने से मिली जिसके बाद उन्होंने बौध मत को हिंदी में उपलब्ध करने में अपना सारा जीवन लगा दिया । उन्होंने भगवान् बुद्धा और उनके धम्म मार्ग से पिता के सामान प्रेम किया और खुद को बेटा मानकर भगवान् बुद्धा के बेटे राहुल के नाम पर अपना नाम भी राहुल रख लिया ।बौद्ध होने के पूर्व राहुल जी ‘दामोदर स्वामी’ के नाम से भी पुकारे जाते थे। ‘राहुल’ नाम के आगे ‘सांस्कृत्यायन’ इसलिए लगा कि पितृकुल सांकृत्य गोत्रीय है।

कट्टर सनातनी ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी सनातन या ब्राह्मण या हिन्दू धर्म की रूढ़ियों को राहुल जी ने अपने ऊपर से उतार फेंका और जो भी तर्कवादी धर्म या तर्कवादी समाजशास्त्र उनके सामने आते गये, उसे ग्रहण करते गये और शनै: शनै: उन धर्मों एवं शास्त्रों के भी मूल तत्वों को अपनाते हुए उनके बाह्य ढाँचे को छोड़ते गये।

सनातन धर्म से, आर्य समाज से और बौद्ध धर्म से साम्यवाद-राहुल जी के सामाजिक चिन्तन का क्रम है, राहुल जी किसी धर्म या विचारधारा के दायरे में बँध नहीं सके। ‘मज्झिम निकाय’ के सूत्र का हवाला देते हुए राहुल जी ने अपनी ‘जीवन यात्रा’ में इस बौध धर्म पर अपने हिंदी साहित्य का स्पष्टीकरण इस प्रकार किया है-
“बड़े की भाँति मैंने तुम्हें उपदेश दिया है, वह पार उतरने के लिए है, सिर पर ढोये-ढोये फिरने के लिए नहीं-तो मालूम हुआ कि जिस चीज़ को मैं इतने दिनों से ढूँढता रहा हूँ, वह मिल गयी”।385px-Rahul_Sankrityayan

बौध धर्म पर उनके कुछ हिंदी लेखन निम्न प्रकार से हैं
*  बुद्धचर्या’ (1930 ई.)
*  धम्मपद’ (1933 ई.)
*  विनय पिटक’ (1934 ई.)
*  महामानव बुद्ध’ (1956 ई.)
*  मज्झिम निकाय – हिंदी अनुवाद (1933)
*  दिघ निकाय –  हिंदी अनुवाद  (1935 ई.)
*  संयुत्त निकाय –  हिंदी अनुवाद
*  ऋग्वैदिक आर्य 
*  दर्शन दिग्दर्शन 
*  तुम्हारी  क्षय – भारतीय जाती व्यवस्था, चल चलन पर व्यंग

घुमक्कड़ी स्वभाव वाले राहुल सांकृत्यायन सार्वदेशिक दृष्टि की ऐसी प्रतिभा थे, जिनकी साहित्य, इतिहास, दर्शन संस्कृति सभी पर समान पकड़ थी। विलक्षण व्यक्तित्व के अद्भुत मनीषी, चिन्तक, दार्शनिक, साहित्यकार, लेखक, कर्मयोगी और सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत रूप में राहुल ने जिन्दगी के सभी पक्षों को जिया। यही कारण है कि उनकी रचनाधर्मिता शुद्ध कलावादी साहित्य नहीं है, वरन् वह समाज, सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, विज्ञान, धर्म, दर्शन इत्यादि से अनुप्राणित है जो रूढ़ धारणाओं पर कुठाराघात करती है तथा जीवन-सापेक्ष बनकर समाज की प्रगतिशील शक्तियों को संगठित कर संघर्ष एवं गतिशीलता की राह दिखाती है। ऐसे मनीषी को अपने जीवन के अंतिम दिनों में ‘स्मृति लोप’ जैसी अवस्था से गुजरना पड़ा एवं इलाज हेतु उन्हें मास्को भी ले जाया गया। पर घुमक्कड़ी को कौन बाँध पाया है, सो अप्रैल १९६३ में वे पुन: मास्को से दिल्ली आ गए और १४ अप्रैल, १९६३ को सत्तर वर्ष की आयु में दार्जिलिंग में सन्यास से साम्यवाद तक का उनका सफर पूरा हो गया पर उनका जीवन दर्शन और घुमक्कड़ी स्वभाव आज भी हमारे बीच जीवित है।राहुल जी घुमक्कड़ी के बारे मे कहते हैं:

“मेरी समझ में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है घुमक्कड़ी। घुमक्कड़ से बढ़कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता। दुनिया दुख में हो चाहे सुख में, सभी समय यदि सहारा पाती है तो घुमक्कड़ों की ही ओर से। प्राकृतिक आदिम मनुष्य परम घुमक्कड़ था। आधुनिक काल में घुमक्कड़ों के काम की बात कहने की आवश्यकता है, क्योंकि लोगों ने घुमक्कड़ों की कृतियों को चुरा के उन्हें गला फाड़–फाड़कर अपने नाम से प्रकाशित किया। जिससे दुनिया जानने लगी कि वस्तुत: तेली के कोल्हू के बैल ही दुनिया में सब कुछ करते हैं। आधुनिक विज्ञान में चार्ल्स डारविन का स्थान बहुत ऊँचा है। उसने प्राणियों की उत्पत्ति और मानव–वंश के विकास पर ही अद्वितीय खोज नहीं की, बल्कि कहना चाहिए कि सभी विज्ञानों को डारविन के प्रकाश में दिशा बदलनी पड़ी। लेकिन, क्या डारविन अपने महान आविष्कारों को कर सकता था, यदि उसने घुमक्कड़ी का व्रत न लिया होता। आदमी की घुमक्कड़ी ने बहुत बार खून की नदियाँ बहायी है, इसमें संदेह नहीं, और घुमक्कड़ों से हम हरगिज नहीं चाहेंगे कि वे खून के रास्ते को पकड़ें। किन्तु घुमक्कड़ों के काफले न आते जाते, तो सुस्त मानव जातियाँ सो जाती और पशु से ऊपर नहीं उठ पाती। अमेरिका अधिकतर निर्जन सा पड़ा था। एशिया के कूपमंडूक को घुमक्कड़ धर्म की महिमा भूल गयी, इसलिए उन्होंने अमेरिका पर अपनी झंडी नहीं गाड़ी। दो शताब्दियों पहले तक आस्ट्रेलिया खाली पड़ा था। चीन, भारत को सभ्यता का बड़ा गर्व है, लेकिन इनको इतनी अक्ल नहीं आयी कि जाकर वहाँ अपना झंडा गाड़ आते।”

पुरस्कार
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन को सन् 1958 में ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ और सन् 1963 भारत सरकार द्वारा ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया।

मृत्यु
राहुल सांकृत्यायन को अपने जीवन के अंतिम दिनों में ‘स्मृति लोप’ जैसी अवस्था से गुजरना पड़ा एवं इलाज हेतु उन्हें मास्को ले जाया गया। मार्च, 1963 में वे पुन: मास्को से दिल्ली आ गए और  अप्रैल, 1963 को सत्तर वर्ष की आयु में संन्यास से साम्यवाद तक का उनका सफर पूरा हो गया।

 Below Photo provides to us by   

Dr. Jaywant Khandare
S.R.F(Pali Language)
Rashtriya Sanskrit Sansthan(Deemed University)
Lucknow Campus .Lucknow, UP INDIA.

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‘DHAMMDAAN MAHADAAN’ DHAN SE VICHARON KA PRACHAR UTTHAN KA EKMATRA MARG HAI

 
“धम्म दान महादान’ धन से विचारों का प्रचार ही उत्थान का एकमात्र मार्ग है
 
 
“धम्म दान महादान’ धन से विचारों का प्रचार ही उत्थान का एकमात्र मार्ग हैबाबा साहेब द्वारा लिखित “भगवन बुद्धा और उनका धम्म” जैसी 300-400 पन्नो की किताब मार्किट में करीब 300-400 रूपए की ही बिकती है। इतने रूपए हमारे गाँव में बसने वाली जनता के लिए खर्च करना मुश्किल है।पर उन तक बाबा साहेब और भगवान् बुद्धा का सन्देश पहुचना जरूरी है ,तो ये समाज के सक्षम लोगों का फर्ज बनता है की वे ऐसी पुस्तकें गाँव में पहुचने के लिए समयबुद्धा मिशन ट्रस्ट की मदत करें। किताबें एक हज़ार के लौट में छपती  हैं, 300-400 पन्नो की किताब के कागज़,टाइप और छपाई का एक हज़ार किताबों के लौट की लगत करीब  50000 है या कहें  1 किताब का खर्च करीब 50 रूपए मात्र आता है जो की 300-400  रूपए की बिकती है। हम जानते हैं की एक हज़ार से कम के लौट में छापी नहीं होगी और होगी तप बहुत महंगी पड़ेगी दूसरा  एक आदमी अकेला 50000 रूपए आज की तरीक में खर्च नहीं करेगा, जागरण या साईं संध्या करवा लेगा पर  बौध धम्म के नाम पर तो नहीं करगा पर क्या एक आदमी 5000 रूपए भी खर्च नहीं करेगा।
 
इस हिसाब से पचास हज़ार की रकम इकट्टा करने के लिए पाच हज़ार के दस दानदाता चाहिए जिससे 1000 किताबे छपेंगी और हर किसी के हिस्से में सौ किताबें आएँगी बाटने के लिए जिसे वो हमसे ले सकता है या हमारे संसथान को दूर गाँव में बांटने के लिए छोड़ सकता है। कई लोग अपनी तस्वीर और दान को दिखाना चाहते हैं तो वो भी इस किताब में छापा जा सकता है । 
 
क्या कोई है जो ऐसा करने का इच्छुक हो, जब 10 आदमी हो जयगे तभी पैसे लिए जायेंगे वो भी चेक से या ड्राफ्ट से। इसी तरह अगर बीस आदमी हो जाये तो हर आदमी को केवल ढाई हज़ार देना होगा और उसे 50 किताबें मिल जाएँगी।
 
इसी तरह हम हर साल कलेंडर छापते हैं जिसमें केवल बौध की तस्वीर ही नहीं होती बल्कि लिखित सन्देश भी होते हैं जैसे
 
-बौध धर्म पर 10 बुनियादी सवाल-जवाब जैसे हमारा धार्मिक किताब,चिन्ह,स्थल,परंपरा  त्यौहार अदि क्या है
-भगवन बुद्ध के प्रभावशाली वचन
-धम्म प्रचार के चुने हुए प्रभावशाली सन्देश
 
अच्छा कलेंडर आज-कल करीब दस हज़ार के हज़ार छपते हैं, ज्यादा छपवाने पर उससे भी कम लगत आती है। मतलब अगर आप 1000 रूपए दान देते हैं तो आपको मिलता है एक सौ कलेंडर जिसे आप अपने हिसाब से बाँट सकते हैं ।केलेंडर की विशेषता है की ये साल भर टगा रहता है किताब की तरह कोने में नहीं होता और पूरा साल अनेकों लोग इससे प्रेरणा लेते हैं ।
 
नोट: समय बुद्धा मिशन ट्रस्ट के सभी कार्यकर्त्ता उछ शिक्षित, जुझारू, संगर्शील और आर्थिक रूप से सक्षम हैं जिनमे टुच्चापन नहीं है । बौध धम्म के प्रचार में समर्पित लोग ही कृपया आवेदन करे, बदनामी फ़ैलाने और हिम्मत तोड़ने वाले अलग रहें ।
 
आवेदन के लिए कृपया jileraj@gmail.com पर मेल करें  अपनी इच्छा प्रकट करें। एक लौट के मेम्बर पूरे होने के बाद आपको धन के लिए संपर्क किया जायेगा कृपया तब विश्वास न तोड़े ।
 
हमारा मकसद बौध धम्म का प्रचार है पर ये भी एक कडवा सच है की धन के  ये नहीं हो सकता । हम ये भी जानते हैं की अजनबी को धन देना एक विश्वास और अविश्वास का मुद्दा है । यदि आप ट्रस्ट में न देना चाहे तो   ट्रस्ट का ये काम आप लोग अपने खास विश्वस्निये दोस्त के साथ मिल कर भी कर सकते हो ।
 
 
ध्यान रहे अगर आप सौ रूपए कमाते हैं तो उसमें से अगर 5 रूपए धम्म संगठन पर खर्चा नहीं किया तो  पूरे  बचाने  के चक्कर में वो दिन दूर नहीं जब पूरे 100 रुपये छीनने वाले सामने होंगे ।
 
ध्यान रहे :
 
धन से धर्म चलता है, धर्म से संगठन चलता है और संगठन से सुरक्षा होती है और सुरक्षा ही सर्वोपरि जरूरत है, बाकि की सभी चीज़े जैसे रोटी,कपडा,माकन,शिक्षा,संसाधन,संतान अदि आत्म  सुरक्षा के बाद ही आते हैं ।

some videos and quotes on ASHOKA THE GREAT on ASHOKA JAYANTI (18-April)

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Documentary on Ashoka the Great- SamayBuddha Mishan

Bharat Ek Khoj- Episode on Ashoka the great SAMAYBUDDHA MISHAN

Bharat ek Khoj Episode on ASHOKA the great…SAMAYBUDDHA MISHAN

‘महान अशोक’ के “महान वचन” //”चाहे ‘मैं’ खाना, खाता होऊं, या ‘महल’ में ‘आराम’ कर रहा होऊं, चाहे ‘शयनगार’ में रहूँ या ‘उद्यान’ में, चाहे ‘बगीचे’ में ‘टहलता’ होऊ… या ‘सवारी’ पर होऊं’ या कहीं के लिए, ‘कूच’ कर रहा होऊं / हर ‘जगह’, हर ‘समय’ ‘प्रतिवेदक’ (फरियादी) ‘प्रजा’ का हाल मुझे ‘सुनाएँ //” ………….. सम्राट अशोक महान

सम्राट अशोक महान से पहले या बाद में कभी कोई ऐसा राजा या सम्राट नहीं हुआ जिसने अखंड भारत जितने बड़े भूभाग पर राज किया हो| सम्राट अशोक महँ का काल ही भारत का सबसे स्वर्णिम काल था जब भारत विश्व गुरु था सोने की चिड़िया था| साडी जनता खुशाल और बेदभाव रहित थी|कमाल की बात ये है की सम्राट अशोक महान की उन्हीं की मात्रभूमि भारत में नज़रअंदाज क्यों किया जा रहा है? क्या इसके पीछे भी वही घृणा की भावना है जो भगवान् बुद्धा, बाबा साहब जैसे महानतम महापुरुषों की महानता को न देख पाने की इच्छा के पीछे है| क्या हम इस सब को देखते हुए कह सकते हैं की अपने देश में अपना राज है?

The Emperor Ashoka who was the greatest and mightiest King of India. There was not a single king before him or after him who could rule such a huge Indian continent ever after. The only king who ruled and governed his kingdom with peace and love. The king on his reign India ws known as “Golden Bird”.
WHY is he been ignored in his own mother land???
Ur views??

सभी बहुजनों को महान बौद्ध सम्राट अशोक की जयंती (18 एप्रिल) की हार्दिक शुभकामनाएं…article-by-satyajit-maurya

**महान सम्राट अशोक की जयंती 18 एप्रिल 2013 को आती है**
महान सम्राट अशोक का नाम चीन देश के बौद्ध धर्म ग्रंथों के रिकॉर्ड के अनुसार चीन देश में अयुवंग (Ayuwang) है। बुद्ध की विश्वबन्धुता कि शिक्षा कई सदियों तक भारत के आसपास के देशों में मैत्री और सौम्सय की कड़ियों के बंधन में बन्धी थी और बन्धी है। बुद्ध की शिक्षा सीमाओं के परे प्रबल प्रचार हो रहा था, किन्तु भारतीय बौद्धानुयायियों को बुद्ध का विश्व ‘धम्म’ के रूप में उभरने की कोई अनुभूति नहीं थी। जब फाहियान चीन देश के ‘हान’ प्रदेश से जेतवन बौद्ध संघाराम (श्रावस्थी, उत्तर प्रदेश) में पहुचा तब भिक्षुओं का संघ फाहियान की अगवानी करते हुए आश्चर्यचकित हुवा की “सिमावर्तीय देशो के वासी भी हमारे नियमो की खोज करने यहाँ तक आ सकते है”।ashoka

महान सम्राट अशोक ने 273 BC to 232 BC. तक बुद्ध के विश्वबन्धुता के शिक्षा सर्वव्यापी-सर्वग्राही सहिष्णुता का प्रबल प्रचार एशिया के साथ पश्चिमी देशो में 84000 स्तुपो-शिलालेखों द्वारा और वाद-संवाद की आचार-सहिंता का व्यापक प्रचार भी किया था। यदि चीन भारत को अनेक वस्तुए भेज रहा था, तो भारत भी उसे बौद्ध धम्म द्वारा समृद्ध बना रहा था। 7-8 Century AD तक विश्व जगत में भारत की पहचान बुद्धत्तरभारत के नाम से थी और है। जिन बातो को दोहरा रहा हूँ वह इतिहास का अंग बन चुकी है, तभी इन सीधी-सपष्ट बातों की स्विकारोक्ति होनी ही चाहिए।

महान सम्राट अशोक के कार्यकाल के दौरान बुद्ध के महापरिनिर्वान के शरीर “अवशेष धातुओं” को 84,000 भागों विभाजित करके 84000 हजार स्तुपो का निर्माण किया था। और चीन देश के राजा को बुद्ध के शरीर ‘अवशेष धातु’ देकर उन्हें स्तूप बनवाने के आदेश दिए थे। और चीन देश के सम्राट ने चीन देश में 19 बौद्ध स्तूप बनवाकर एक स्तूप सम्राट अशोक के नाम से चीन देश के पश्चिमी जिन वंश (Ningbo City, Zhejiang, 265-316) में बनाया था। जहा बुद्ध के सिर के अवशेष धातु रखे है। मौजूदा सम्राट अशोक के विहार की इमारत को क्विंग राजवंश (1644-1840) के बाद पुनर्निर्माण किया गया। और इस नवीनीकरण का काम 1980 में पूरा करके बौद्ध सांस्कृतिक नैतिकमूल्यों की देखभाल की जा रही है।

महान सम्राट अशोक, विश्व जगत के इतिहास में मानव कल्याणकारी राजा थे, जिसके शासन में बुद्ध के धम्मकाया के नैतिकमूल्यों के आधार पर जपान से मिस्त्र तक बाली से लेकर यूनान तक समता-स्वातंत्र्य-बन्धुता और न्याय का सुवर्ण युग का विशाल भवन खडा था। नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री डॉ. अमर्त्य सेन के कथन के अनुसार सम्राट अशोक के काल में दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत की भागीदारी 35% थी। और सम्राट अशोक के काल में भारत जागतिक (ग्लोबल) महाशक्ति था। ”लेकिन उस महान सम्राट अशोक के जयन्ती को लेकर भारत सरकार,राज्य सरकार के साथ देश की जनता ओझल दिखाई देती है।इसका कारन क्या हो सकता है जरा सोचेंगे तो आप खुद ही समझ सकते हैं?

महान सम्राट अशोक के समय बौद्धकालखंड के अखंडभारत का बजेट 36 करोड़ का था, (Ref. Historical Geography of Ancient India by Sir Alexander Cunningham)। बौद्धकालीन अखंड भारत में बुद्ध के नैतिकमूल्यों के आधार पर जातीविहीन शील संपन्न गुणों से उच्च आदर्श विचारोका सामजिक विकास 92% था तो आर्थिक विकास दुनिया के “दो” रुपये तो भारत का “एक” रुपया था, सामाजिक-आर्थिक विषमता ना के बराबर। अगर बुद्ध की सामाजिक-आर्थिक निति ‘सामूहिक जीवनचर्या’ अर्थात 84000 स्तुपो और संघरामो से बौद्ध नैतिकमुल्यों के साथ अन्य विषयों की नि:शुल्क दी जाने वाली शिक्षा, खेतिका और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का राष्ट्रीयकरण यह सम्राट अशोक के राज्य की सामाजिक और आर्थिक नितिया थी। अगर यह बौद्ध सामाजिक और आर्थिक नीतिया कार्यांवित होती तो यह बजेट 1956 में 84 हजार लाख करोड़ होता, ओर भारत के आम आदमीकी महीने कि इन्कम 7 लाख 65 हजार होती।

महान सम्राट अशोक के सान्निध्य में बुद्ध की वादसंवाद की प्रतिबद्धता की परम्परा खुले विचार विमर्श के संवर्धन के समाधान का एशिया के उपमहाद्वीपो और पश्चिमी देशो का संसार का प्रथम समेलन का आयोजन ई.पूर्व. तीसरी शताब्दी में भारत में हुवा था। इस समेलन में विश्व जगत में बौद्ध नितिमुल्लयो के सभ्य संस्कृती में व्यक्तिक अधिकारों और स्वतंत्रा के प्रभाव के साथ पुलों-भवनों और प्राद्दोगिकी के संवर्धन की चर्चाये हुई थी। और इस समृद्ध शक्तिशाली अखंड ‘बुद्धत्तर’ भारत के परम्परा के स्त्रोत की गूंज अमेरिका स्थित “सयुक्त राष्ट्र संघ” में आज भी “व्यक्तिक अधिकारों और स्वतंत्रा” पर चर्चाये होते रहती है।

महान सम्राट अशोक द्वारा उत्कृष्ट बौद्ध स्मारकों, विहारों, और संघाराम और उनमे स्थापित की गई बुद्ध की मूर्तियों और चित्र संसार में श्रेष्टतम कृतियों में गणना होती है। बुद्ध के शिक्षा का सांस्कृतिक क्षेत्रों के साथ गणित और विज्ञान पर पड़े पारस्परिक प्रभावों पर विचार करते हुए यह विद्धित होता है की संसार के पुल,भवन और प्राद्दोगिकी के संवर्धन के निर्माण की कला का स्त्रोत बौद्ध संस्कृति की देन है। इसलिए बौद्ध सम्राट कनिष्क (पेषावर, पाकिस्थान) ने कहा है की “वादसंवाद की प्रतिबद्धता की परम्परा खुले विचार विमर्श, पुलों-भवनों और प्राद्दोगिकी के संवर्धन का सीधा सबंध बौद्ध विचारो और सिद्धान्तो से है”। अर्थात बुद्ध की शिक्षा वास्तविक मानव और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया है। और इसकी प्रारम्भिक प्रेरणा बुद्ध और उनके संघ के बौद्ध भिक्षुओ और भिक्षुणियो से ही मिली है। यदि किसी को इन रचनाओं में किसी को संदेह हो तो वह व्यक्ति नितान्त निरक्षर और उजड़ड ही होंगा।485346_347293812051902_1391234576_n

महान सम्राट अशोक के चौमुख प्राचीन सुवर्णयुग के अखंडभारत के विकास का आधार बुद्ध के नैतिकमूल्यों कि शिक्षा के आधुनिक भारत के प्रतिक चार दिशाओं के सिंह और धम्म चक्र, स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र के अखंडता के चिरस्थाई के लिए देश के जनमानस को बुद्धत्तरभारत के चौमुख नैतिकमूल्यों के विकासात्मक कार्यो के संस्करण की प्रेरक गाथा के प्रति बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर ने अपनी सन्मान जनक कृतज्ञता प्रकट करते हुए विश्व जगत में भारत के बौद्ध कालीन सुवर्ण युग को गौरवान्वित किया। जिसके लिए विश्व जगत बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर के संघर्षमय जीवन के लिए सदेव ऋणी है।

महान सम्राट अशोक के विशाल धम्मकाया के जनकल्याणकार्यो की दिघदर्शक कि गूंज जपान से मिस्त्र तक बाली से लेकर यूनान तक गौरवान्वित थी। इसीलिए बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने उनके कार्यो को और भी गौरवान्वित करने के लिए कहा “विजया दशमी” का पर्व महान बौद्ध सम्राट अशोक इनके विजय दिन के उपलक्ष में बड़े हर्ष उल्लाहस के साथ मनाई जानी चाहिए” (Ref . writings & Speeches Vol-18/3 pp 482 )। और इस दिन (14 October 1956) को बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर ने महास्थविर भदंत चंद्रमणि से बुद्ध के धम्म की दीक्षा लेकर 5 लाख लोगो धम्म दीक्षा दी और “विजया दशमी” को विश्व जगत में गौरवान्वित किया।

महान सम्राट अशोक की जयंती “एप्रिल” माह को लेकर चीन, थाईलैंड, बर्मा, श्रीलंका, लाओस और भी एशिया के बौद्ध राष्ट्रों में एक मत है। भलेही जन्म तिथि को लेकर कुछ तांत्रिक दृष्टी से भिन्नयता हो सकती है। भारत में सर्वाधिक प्रचलित (सरकारी तौरपर ) शक सम्वंत का नवर्ष अप्रैल के मध्य में आरम्भ होता है। अगर हम वर्ष 2544 के बुद्धनिर्वाण सम्वंत को देखे तो सम्राट अशोक, का 304 BC, का आरम्भ भी अप्रैल के मध्य से सुरु होता है। श्रीलंका में पहली शती ई.पु. से बुद्धनिर्वाण सम्वंत के प्रयोग के प्रमाण विद्धमान है। और बुद्धनिर्वाण सम्वंत यह कलिस्मवंत के प्रयोग के सभी प्रमाणों से अधिक पुराने है(Ref. The Agrumentative Indian by Dr.Amartya Sen pp.290)। और एशिया के बौद्ध राष्ट्रों में इसी बुद्धनिर्वाण सम्वंत के प्रयोग के प्रमाणों से ‘अप्रैल’ के मध्य में सम्राट अशोक की जयंती बड़े हर्ष उल्लाहस के साथ मनाई जाती है। ठीक इसी प्रकार उत्तरी भारत के प्रदेशो के कुछ हिस्सों में महान अशोक सम्राट की जयंती अप्रैल में मनाई जाती है। 10 अप्रैल 2010 में चीन में सम्राट अशोक की जयंती के उपलक्ष में कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जिसमे देश के पूर्व विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा गए थे।

अंत: हम बुद्धनिर्वाण सम्वंत के प्रयोग को देखे तो 304 BC, का आरम्भ अप्रैल के मध्य से सुरु होता है, जिसे “चैत्र शुल्क अष्टमी” कहा जाता है। इसे हम स्वीकारते है तो सम्राट अशोक की जयंती 18 एप्रिल 2013 को आती है। देशवाशियो को निवेदन है की सम्राट अशोक की जयंती इस तिथि को बड़े हर्ष उल्लाहस के साथ मनाये और उस सुवर्ण युग के बौद्ध नैतिकमुल्लो के मैत्री और सौमनस्य के सुखद सुहास के विकास के लिए विश्व जगत में मानवकल्याण की बौद्ध नैतिक सभ्य संस्कृति की समता-स्वातंत्र्य-बन्धुता और न्याय के ज्ञानमाला की करुना और सत्य, अहिंसा सेवार्थ के कार्यो के प्रचार को प्रबल प्रवाह के साथ प्रवाहित करे।

लेखक : सत्यजित मौर्या,

नागपुर – 440017 

  http://www.facebook.com/home.php#!/Satyajitche

selected letters to SAMAYBUDDHA MISHAN on 122nd JAYANTI of Bodhisattva Dr Ambedkar

14 apr as nat hol

===========from Ambedkar International Center =========================================

Dear SAMAY BUDDHA,

 
 
Hearty Jai Bhim wishes to you all on 122nd Babasaheb Dr.B.R.Ambedkar Birth Anniversary!

Once someone asked Babasaheb Dr. B.R. Ambedkar what is your message to your people, people who have no access to Education, Oppressed, Poor, Starving and Suffering from poverty and what not! Babasaheb said, my life is my Message for my People!

 
What did he mean by it! I feel, he tried to leave his life as a lesson for US ALL!
There is lot to learn from Babasaheb, his determination, his sufferings, his sacrifices, his education, his dedication, his commitment, his undying spirit and never say die attitude etc!
Babasaheb had to bury 4 of his children at very young age because he could not provide them Medicines. He lost his wife also because he could not provide decent medicines. And friends he could not provide medicines for them because he was busy fighting for us. Busy fighting for our moms, our dads and our children! We are here because he and many of our mahapurushas gave up their very family & everything to see us all here.
Let us take inspiration from him and thousands of our brethern who believed in him who gave up their lives to give us this future we are enjoying. Let us pledge to Payback to the Society in whatever tiny, mini way we can! Please ACT!
 
We feel as Babasaheb’s followers, it is our minimum courtesy & duty to give our 10% of time, talent and treasure to take his caravan forward. We owe it to thousands & crores of villagers/ancestors who sacrificed their lives for us. 
 
Let us look that single reason which compels us to be together and forget those thousand things that may divide us. 
With high hopes and Sincere Jai Bhim salutes to each one of you!
 

http://www.youtube.com/watch?feature=player_detailpage&v=yv6aU-_9xQ0 (Babasaheb Movie in English)

 

http://www.youtube.com/watch?feature=player_detailpage&v=lgDGmYdhZvU (India Untouched – Current state of Affairs in India)

 
“Man is mortal. Everyone has to die some day or the other. But one must resolve to lay down one’s life in enriching the noble ideals of self-respect and in bettering one’s human life. We are not slaves. Nothing is more disgraceful for a brave man than to live life devoid of self-respect.” – Babasaheb Dr.B.R.Ambedkar
 
“If you ask me, my ideal would be the society based on liberty, equality and fraternity. An ideal society should be mobile and full of channels of conveying a change taking place in one part to other parts.” – Babasaheb Dr.B.R.Ambedkar

“You must abolish your slavery yourselves. Do not depend for its abolition upon god or a superman. Remember that it is not enough that a people are numerically in the majority. They must be always watchful, strong and self-respecting to attain and maintain success. We must shape our course ourselves and by ourselves.” – Babasaheb Dr.B.R.Ambedkar

Sabhiko Babasahab ka janam din bahut bahut mubarak ho!   

Sincere Regards,

Sandeep & AIC Team

secretary@ambedkarinternationalcenter.org

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================Lyric written by Sakya Mohan:========================================

Sakya Mohan wrote a lyric in English on our Liberator Babasaheb, when he came to USA in 2008. 

 

Indomitable Leader

 

Indomitable leader Ambedkar

The leader of Dalits

Redeemer of the Dalits

We call him Babasaheb

The Father of Dalits!

            Quit hinduism

            Quit casteism

            Quit racism

            Ours is humanism

 

Voice of Babsaheb

Echoed in caste-India

Speech of Babasaheb

Annihilated hindu dharma

Writings of Ambedkar

Educated Untouchables

You know His own life mission

It was our liberation!

Quit hinduism

            Quit casteism

            Quit racism

            Ours is humanism

 

After writing constitution

He said He’ll burn it

He was born a hindu

He never died a hindu

He reached the root of Buddha

Along with lakhs of Dalits

He broke the ribs of casteism

Defeated Gandhi hinduism!

            Quit hinduism

            Quit casteism

            Quit racism

            Ours is humanism

 

 In Dhamma,

Sakya Mohan

Philadelphia

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==========================Dr S.L. Dhani (IAS-r)==============================

India officially celebrates the 122nd birth anniversary of Bharat Ratna Babasaheb Dr. B R Ambedkar, who was the first Law Minister of Independent India and the Chief Architect of Constitution of India, who was instrumental in conferring human rights on about 20 % population of India comprising the Depressed Classes or modern Dalits which constitute the weakest sections of India.

dr SL DhaniAnalytically speaking, each of the weaker sections is much higher than every stronger section of India in absolute sense and on human scale.

Each weaker section respects humanity but the latter can worship animals and hates such of the human beings who are weak and meek because of the exploitative and oppressive philosophy and practices of the latter, which are still being perpetrated in the name of religion, God and fake spirituality, against the spirit of Constitution.

Unabated atrocities and organised rapes of the women of Dalits, the weakest sections of Hindu India are still being reported even from the states which are being ruled by Congress Party, which is heading UPA government at the Centre and still the concerned governments are claiming that they are running on Constitutional lines.

None of the widely acknowledged uppermost classes or castes has ever been able to produce a single person, through the ages, like Babasaheb Dr. B R Ambedkar, who equals the best qualities of head and heart of his.

It is an act of sheer ingratitude that the democratic India has neglected him and the Constitution of India, framed by him as its chief architect, on the voluntary request of the Congress government even when he had himself never been a member of that party and had been its worst opponent by maintaining that Indian National Congress, which claims to have won freedom of India, had been a Brahmin-Bania Combine or a syndicate of temple worshippers and traders.

The condition of Dr. Ambedkar’s exhibits in his Memorial being shown in a Video today on Facebook is one of the unpardonable proofs of neglect of Dr. Ambedkar and the values he cherished.

No civilized country can respect another country from heart who does not respect its own Constitution and its chief architect.   

        

Dr S.L. Dhani (IAS-retd.)

drslldhani185@gmail.com

IAS (R), Advocate; MA PhD LL B MDPA; Certificat​e from Cranfield School of Management​, Cranfield (UK), 1979; Recipient of President of India’s Silver Medal (1971); and of Babasaheb Dr. B R Ambedkar National Award (1985) Manvantara Theory of Evolution of Univesrse, based on Vedas and Puranas (1975); Authored Politics of Gods: Churning of the Ocaen (1984);and Hindu Scheme of Things: Socio-Poli​tical Analysis of Manusmriti (1987), debated in The Tribune,, Chandigarh​;. Published Indian Freedom Struggle New Insigh

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=================From Mr Ram Babu Gautam (New Jersy,America)==============================

प्रबुद्धभारत के जनक 

भारतरत्न डॉ. भीम राव अंबेडकर के 122वें जन्मदिवस पर 

           सभी को हार्दिक शुभकामनाओं के साथ

 

                 झुका है आज आसमां भी

   भुलायें  कैसे तुमको जीवन जिसने जिया हमारे लिए,

   झुका है आज आसमां भी, डॉ. अंबेडकर तुम्हारे लिए |

 

लिखीं हैं जिन्होंने कहानियाँ अपनी जवानी लुटालुटाके,

उनके अपमान को भी लिखा है, इतिहास मिटामिटाके,

निशानियाँ सहज मिटतीं नहीं जो पत्थरों पे गईं हैं उभारीं

खोदके पढ़ लेंगे उनके निशां दर्द जो सहा सर कटाकटाके |

 

हम भी झुके नहीं हैं कटाने सर, बस झुके हैं अंबेडकर तुम्हारे लिए ||

पार कीं हैं तुमने डूबी कस्तियाँ अपना तनमन लुटालुटाके,

मनुस्मृति को जलाया थामनुवादी इतिहास जलाजलाके,

प्रबुद्धभारत की सोच जागी है जागा है अब सोया उदगार

तनमन से लुटे हैं पर फिर भी साथ हैं वक्त से  पीटतेपिटाते |

 

भूलना अब हमारे वश की बात नहीं किया जो अर्पण हमारे लिए ||

 

इतिहास भी इसने समझाया हमें अपमानजुल्मों से गिरागिराके,

दूध के धुले नहीं हैं ये मनुवादी समझ रहे हैं हम इनको गिनगिनाके,

धोखा और दगा पूर्वजों ने सहा पर अब तुम्हें कोई मौका मिलेगा नहीं  

लिखा है इतिहास जो भीम ने संविधान का हर प्रष्ठ ये सजासजाके |

 

अंतिम सांस तक लड़ना है बहुजनों को जैसे अंबेडकर लड़ा था हमारे लिए ||

 

फैसले जो भीम ने किये थे बहुजनों को ऊपर उठाउठाके,

दीवारों पर लिख सकेंगे शासन और कलम चलाचलाके,

दिल्ली का दर्द हमने जाना है माना कि सत्ता मिलके रहेगी 

पुराने वक्त से अब ये नई पीढ़ी लड़ेगी सब भुलाभुलाके |

 

पाना होगा वह अपनी जमीं को अधिकार जिसने दिया लड़के हमारे लिए ||

                         ————-

                  रामबाबू गौतम, न्यू जर्सी ( अमेरिका )

                       अप्रैल 13, 2013 )

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================संजय बौद्ध, राष्ट्रिय अध्यक्ष,Dr. Ambedkar Student Front of India (DASFI)============

डॉ अम्बेडकर जयंती को राष्ट्रिय अवकाश घोषित कराने हेतु “हस्ताक्षर अभियान”
हमने 1 लाख हस्ताक्षर कराने और लक्ष्य रखा है। कृपा इस आन्दोलन में सहयोग करे और इस मुहीम को सफल बनाये।

 बाबा साहब आंबेडकर ने आपको क्या दिया ?
एडमिशन के लिए फॉर्म लेने गए, कैटेगिरी बताई और सस्ता फॉर्म लिया |
एडमिशन लेने गए, कैटेगिरी का सर्टिफिकेट लगाया और एडमिशन लिया |dasfi
जॉब लेने गए, कैटेगिरी का सर्टिफिकेट लगाया और जॉब ली |
और तो और
ये बेतुके स…वाल करने का हक भी बाबा साहब ने ही दिया है।
जब सब कुछ बाबा साहब ने दिया, तो बाबा साहब आंबेडकर के लिए लड़ाई से समय हम क्यों पीछे हटे ?
ज्यादा से ज्यादा लोग इस मुहीम को सहयोग करे और बाबा साहब के जन्मोत्सव को राष्ट्रिय अवकाश घोषित कराये।
जय भीम जय प्रबुद्ध भारत,नमो बुद्धाय

आयोजक:-
डॉ अम्बेडकर स्टूडेंट फ्रंट ऑफ़ इंडिया(DASFI)
Dr. Ambedkar Student Front of India (DASFI)
वेबसा…इट :- www.dasfi.in

संपर्क करे :-
संजय बौद्ध
राष्ट्रिय अध्यक्ष, DASFI.
ई-मेल :- sboddh@gmail.com

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selected Openions  on concern subject:

अंग्रेजों की संगती में सवर्णों को भी सदबुद्धि आई और पाखंड के अन्धकार का अहसास हुआ| अंग्रेज़ो के शासन काल में उन्नीस्वी सदी के प्रारंभ से यहाँ पुनर्जागरण काल का उदय हुआ जिसके नायक यहीं के उच्च वर्गिए लोग थे जो अँग्रेज़ी शिक्षा, संस्कृति से प्रभावित हो कर देश में बदलाव लाने को प्रयत्नशील हुए| मैं अपनी निजी जिन्दगी से कहूं तो मेरा जितना हित ब्रह्मण समाज ने किया उतना अपने समाज ने नहीं किया|ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे जिनकी चर्चा इस अद्याय को बेहद लम्बा कर देगा फिर भी एक उदाहरण हेतु आधुनिक युग के मौलिक निबंधकार, उत्कृष्ट समालोचक एवं सांस्कृतिक विचारधारा के प्रमुख उपन्यासकार आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के निम्न शब्द यहाँ प्रस्तुत हैं:

 “वह अपूर्व  समय होगा जब शताब्दीयों   से पददलित, निर्वाक जनता समुन्द्र की लहरों के सामान गर्जन से अपना अधिकार मांगेगी | उस दिन हमारी सभी कल्पनाएँ जाने क्या रूप धारण कर लेंगी जिन्हें हम भारतीय सभ्यता,हिन्दू संस्कृति आदि अस्पष्ट और भुलावे वाले शब्दों में प्रकट करते हैं |मैं हैरानी के साथ सोचता हूँ की हम में बस महान एतिहासिक घटना को सहतने का साहस है क्या ? यदि नहीं तो धैर्य और त्याग के साथ साहस बटोरना होगा,हमें उन सारी सुख सुविधाओं को जो हम अब तक भोगते आये हैं उनके लिए छोड़ना  होगा जो अब तक नागे भूखे और तृषित हैं| यदि वे समाज के पथ प्रदर्शन के लिए भी आगे आयें तो सहर्ष ही साफ़ दिल से हमें उन्हें नेतृत्व प्रदान करना होगा| हमें अपने पुरातन अहम् त्याग कर उन्हें गले लगाना होगा |आज हमारा कर्तव्य उनके प्रति दया दिखाना नहीं न्याय करना है,वे दया नहीं मांगते हैं न्याय मांगते हैं| यदि उन्हें न्याय नहीं मिला तो वे जबरन उसे ले लेंगे |”   

 सनातन धर्म के महान विद्वान् स्वामी विकेकनान्दा ने जब संसार भ्रमण किया और भारत की संकुचित विचारधरा को जब बहार की उन्नत विचारधारा से तुलना की तो उन्होंने भी माना है की सारा पुरोहितवाद बेहद नुकसानदायक है इसे ख़त्म करना चाहिएजापान और चीन जैसे बौध देशों की उन्नत सोच ने उन्हें बहुत प्रभावित किया, उन्ही के शब्दों में पढ़िए:

मेरी केवल यह इच्छा है कि प्रतिवर्ष यथेष्ठ संख्या में हमारे नवयुवकों को चीन जापान में आना चाहिए। जापानी लोगों के लिए आज भारतवर्ष उच्च और श्रेष्ठ वस्तुओं का स्वप्नराज्य है। और तुम लोग क्या कर रहे हो? … जीवन भर केवल बेकार बातें किया करते हो, व्यर्थ बकवाद करने वालो, तुम लोग क्या हो? आओ, इन लोगों को देखो और उसके बाद जाकर लज्जा से मुँह छिपा लो। सठियाई बुध्दिवालो, तुम्हारी तो देश से बाहर निकलते ही जाति चली जायगी! अपनी खोपडी में वर्षों के अन्धविश्वास का निरन्तर वृध्दिगत कूडाकर्कट भरे बैठे, सैकडों वर्षों से केवल आहार की छुआछूत के विवाद में ही अपनी सारी शक्ति नष्ट करनेवाले, युगों के सामाजिक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वाले, भला बताओ तो सही, तुम कौन हो? और तुम इस समय कर ही क्या रहे हो? …किताबें हाथ में लिए तुम केवल समुद्र के किनारे फिर रहे हो। तीस रुपये की मुंशीगीरी के लिए अथवा बहुत हुआ, तो एक वकील बनने के लिए जीजान से तडप रहे होयही तो भारतवर्ष के नवयुवकों की सबसे बडी महत्वाकांक्षा है। तिस पर इन विद्यार्थियों के भी झुण्ड के झुण्ड बच्चे पैदा हो जाते हैं, जो भूख से तडपते हुए उन्हें घेरकर रोटी दो, रोटी दो चिल्लाते रहते हैं। क्या समुद्र में इतना पानी भी रहा कि तुम उसमें विश्वविद्यालय के डिप्लोमा, गाउन और पुस्तकों के समेत डूब मरो ? आओ, मनुष्य बनो! उन पाखण्डी पुरोहितों को, जो सदैव उन्नत्ति के मार्ग में बाधक होते हैं, ठोकरें मारकर निकाल दो, क्योंकि उनका सुधार कभी होगा, उन्के हृदय कभी विशाल होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकडों वर्षों के अन्धविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को ज़डमूल से निकाल फेंको। आओ, मनुष्य बनो। कूपमंडूकता छोडो और बाहर दृष्टि डालो। देखो, अन्य देश किस तरह आगे बढ रहे हैं। क्या तुम्हे मनुष्य से प्रेम है? यदि हाँतो आओ, हम लोग उच्चता और उन्नति के मार्ग में प्रयत्नशील हों। पीछे मुडकर मत देखो; अत्यन्त निकट और प्रिय सम्बन्धी रोते हों, तो रोने दो, पिछे देखो ही मत। केवल आगे बढते जाओ। भारतमाता कम से कम एक हज़ार युवकों का बलिदान चाहती हैमस्तिष्कवाले युवकों का, पशुओं का नहीं। परमात्मा ने तुम्हारी इस निश्चेष्ट सभ्यता को तोडने के लिए ही अंग्रेज़ी राज्य को भारत में भेजा है संख्याशक्ति, धन, पाण्डित्य, वाक चातुर्य, कुछ भी नहीं, बल्कि पवित्रता, शुध्द जीवन, एक शब्द में अनुभूति, आत्मसाक्षात्कार को विजय मिलेगी!” source: http://hi.wikiquote.org/wiki/स्वामी_विवेकानन्द

 स्वामी विवेकानंदा ने इस विषय में कहा है

 यदि कोई भंगी हमारे पास भंगी के रूप में आता है, तो छुतही बिमारी की तरह हम उसके स्पर्श से दूर भागते हैं। परन्तु जब उसके सीर पर एक कटोरा पानी डालकर कोई पादरी प्रार्थना के रूप में कुछ गुनगुना देता है और जब उसे पहनने को एक कोट मिल जाता हैवह कितना ही फटापुराना क्यों होतब चाहे वह किसी कट्टर से कट्टर हिन्दू के कमरे के भीतर पहुँच जाय, उसके लिए कहीं रोकटोक नहीं, ऐसा कोई नहीं, जो उससे सप्रेम हाथ मिलाकर बैठने के लिए उसे कुर्सी दे! इससे अधिक विड्म्बना की बात क्या हो सकता है? आइए, देखिए तो सही, दक्षिण भारत में पादरी लोग क्या गज़ब कर रहें हैं। ये लोग नीच जाति के लोगों को लाखों की संख्या मे ईसाई बना रहे हैं।वहाँ लगभग चौथाई जनसंख्या ईसाई हो गयी है! मैं उन बेचारों को क्यों दोष दूँ? हें भगवान, कब एक मनुष्य दूसरे से भाईचारे का बर्ताव करना सीखेगा।

 वो तो शुक्र है की वे केवल दक्षिण के धर्म परिवर्तन की बात कर रहे हैं अगर उत्तर भारत की करते तो इस्लाम का भी नाम ऐसे ही लेना पड़ता|source: http://hi.wikiquote.org/wiki/स्वामी_विवेकानन्द

united we stand

नालंदा विश्‍वविद्यालय, जहाँ ज्ञान प्राप्‍त किए बिना शिक्षा अधूरी मानी जाती थी—सुबोध कुमार नंदन

नालंदा विश्‍वविद्यालय, जहाँ ज्ञान प्राप्‍त किए बिना शिक्षा अधूरी मानी जाती थी—सुबोध कुमार नंदन

नालंदा विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना सम्राट अशोक ने बौद्ध विहार के रूप में करवाई थी। एक लंबे समय तक यहाँ बौद्ध विषयों का अध्‍ययन-अध्‍यापन चलता रहा। विश्‍वविद्यालय के रूप में इसका अभ्‍युदय गुप्‍त शासक कुमार गुप्‍त के शासन काल में हुआ। कुमार गुप्‍त (414-455) के पश्‍चात् अन्‍य गुप्‍तवंशीय सम्राटों (तथागत गुप्‍त नरसिंह गुप्‍त एवं बालादित्‍य) ने भी इसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया और यहाँ एक-एक विहार का निर्माण करवाया। लगभग 11वीं शताब्‍दी तक हिंदू तथा बौद्ध राजाओं ने विहारों के निर्माण की यह परंपरा कायम रखी। परिणामस्‍वरूप शिक्षा और ज्ञान के केंद्र के रूप में नालंदा की ख्‍याति अंतरराष्‍ट्रीय हो गई। ऐसे भी प्रमाण मिलते हैं कि तथागत बुद्ध के जीवन काल में भी नालंदा एक सांस्‍कृतिक केंद्र था, किंतु उनके समय में विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना नहीं हुई थी। नालंदा विश्‍वविद्यालय उदारता के लिए प्रसिद्ध था। इस विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना कब और कैसे हुई, उसका ठीक-ठाक पता नहीं, परंतु यह एक बहुत बड़ा अंतरराष्‍ट्रीय विश्‍वविद्यालय था और हर्ष के युग में यह अपने चरमोत्‍कर्ष पर था। प्रसिद्ध इतिहासकार लामा तारानाथ के अनुसार बुद्ध के शिष्‍य सारिपुत्र की जन्‍मभूमि होने से नालंदा विशेष आकर्षण का केंद्र बना। नालंदा विश्‍वविद्यालय की प्रसिद्धि ‌का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इसकी तुलना मध्‍ययुग में फ्रांस के क्‍लूंनी और वलेयरबॉक्‍स से की जाती है।
अनेक चीनी विद्वान इसका यश सुनकर यहाँ अध्‍ययन के लिए आए और स्‍वदेश लौटकर उन्‍होंने नालंदा विश्‍वविद्यालय की शिक्षा प्रणाली की भूरि-भूरि प्रशंसा की। हर्ष के शासन काल में प्रसिद्ध चीनीयात्री ह्वेनसांग भी अध्‍ययन करने नालंदा आया था। इस शृंखला में इत्‍सिंग अंतिम था जो 673 ई. में यहाँ पहुँचा।
नालंदा संस्‍कृत शब्‍द नालम् + दा से बना है। संस्‍कृत में नालम का अर्थ कमल होता है। कमल ज्ञान का प्रतीक है। नालम् + दा यानी कमल देनेवाली, ज्ञान देनेवाली। कालक्रम से यहाँ महाविहार की स्‍थापना के बाद इसका नाम नालंदा महाविहार रखा गया।
नालंदा विश्‍वविद्यालय के कुलपति के पद पर आसीन होने की एकमात्र कसौटी थी—विद्वत्ता में सर्वोपरि होना। उम्र या शिक्षण अनुभव के आधार पर इनकी नियुक्‍ति नहीं होती थी। इस विश्‍वविद्यालय के पहले कुलपति थे नागार्जुन, जो अपने समय के सर्वश्रेष्‍ठ महायानी दार्शनिक थे। उनकी ख्‍याति प्रसिद्ध रसायनविद् के रूप में दूर-दूर तक फैली हुई थी। उस समय विश्‍वविद्यालय के प्रधानाचार्य उद्भट विद्वान शीलभद्र थे। उन्‍हें सोलह भाषाओं का ज्ञान था और वे अनेक विधाओं के पारंगत आचार्य थे। यहाँ के अन्‍य प्रमुख कुलपतियों में आर्यवेद, असंग, वसुबंधु, धर्मपाल, राहुल, शीलभद्र और चंद्रपाल, प्रभाकर मित्र, अश्‍वघोष, पद्मसंभव के नाम उल्‍लेखनीय हैं। युवानच्‍वांग ने लिखा है कि नालंदा के सहस्र विद्वान आचार्यों में से कई ऐसे थे जो सूत्र और शास्‍त्र जानते थे। यहाँ हस्‍तकौशल की शिक्षा का भी सुप्रबंध था। यहाँ सौ ऐसी वेदियाँ थीं, जहाँ से शिक्षक व्‍याख्‍यान दिया करते थे। विश्‍वविद्यालय के प्रबंधक का नियामक महास्‍थाविर होता था, जिसके सहायतार्थ दो परिषदें रहती थीं।Nalanda_University_India_ruins nalandainfo nh4 nh2 nalandaruins2 nalandaruins1
नालंदा विश्‍वविद्यालय में प्रवेश के लिए बड़ी भीड़ होती थी, न केवल भारत से अपितु विदेशों से भी विद्यार्थी ज्ञान प्राप्‍ति के लिए यहाँ आते थे। फाहियान, ह्वेनसांग व इत्‍सिंग के
अतिरिक्‍त चीन, कोरिया, तिब्‍बत और मध्‍य एशिया से नालंदा आनेवाले विद्यार्थियों की एक लंबी तालिका दिखाई पड़ती है। यहाँ पर विद्यार्थी ज्ञान प्राप्‍त करते ही थे, इसके साथ ही यहाँ के पुस्‍तकालयों में सुलभ महत्त्वपूर्ण बौद्ध ग्रंथों की नकल भी कर लेते थे। प्रवेश के नियम कठिन थे।
विश्‍वविद्यालय में प्रवेश-द्वार पर बैठा द्वार-पंडित विश्‍वविद्यालय में प्रवेश के लिए इच्‍छुक छात्रों की परीक्षा लेता था। जो छात्र उसके द्वारा ली गई परीक्षा में पास हो जाते थे, उन्‍हें विश्‍वविद्यालय में प्रवेश मिल जाता था। शेष को अपने घर लौटना पड़ता था। प्रवेश परीक्षा अत्‍यंत कठिन होती थी, प्रवेश के लिए आए हुए छात्रों में से केवल 10 फीसदी छात्र ही सफल हो पाते थे। हजारों ‌किलोमीटर दूर की कष्‍टदायक पदयात्रा कर नालंदा में पढ़ने के लिए प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग, युवान च्‍वांग, या-कि बहुवैनन, चुवानिह, डिछ-निह, आर्यवर्मन, हाइनीज, फाहियान, इत्‍सिंग आदि अनेक विद्यार्थी, चीन, जापान, कोरिया, तिब्‍बत और तोखरा से नालंदा में अध्‍ययनार्थ आए। नालंदा में विद्यार्थियों की संख्‍या कितनी रही होगी, इस विषय पर मतांतर है। इत्‍सिंग के अनुसार यह संख्‍या तीन हजार के लगभग थी जबकि ह्वेनसांग दस हजार छात्रों की चर्चा करता है। फिर भी एक निश्‍चित मत के अनुसार यह तो कहा ही जा सकता है कि हर्ष के समय में छात्रों की सख्‍या पाँच हजार के लगभग थी।
यहाँ अध्‍ययन के लिए दो प्रकार के छात्र होते थे। एक तो वे, जो विद्याध्‍ययन के बाद बौद्ध भिक्षुक बनकर संघ में प्रवेश करते थे। दूसरे वे विद्यार्थी, जो विद्याध्‍ययन के बाद सांसारिक जीवन में जाते थे। ऐसे विद्यार्थी ब्रह्मचारी या मानव कहलाते थे, जो लोग भिक्षुक बनने के इच्‍छुक न थे लेकिन यहाँ अध्‍ययन करना चाहते थे। उन्‍हें अपना भोजन व्‍यय स्‍वयं उठाना पड़ता था या फिर विश्‍वविद्यालय के लिए शारीरिक श्रम करना होता था। नालंदा विश्‍वविद्यालय के अधिकांश विद्यार्थी काषाय वस्‍त्रधारी भिक्षु होते थे, जिनके रहने के लिए मठ बने थे। विश्‍वविद्यालय के कार्यक्रमों का नियमन कर्मदान नामक अधिकारी करता था। वही यह निश्‍चित करता था कि किस विद्यार्थी को क्‍या-क्‍या काम करना है। फाहियान ने लिखा है कि प्रतिदिन विश्‍वविद्यालय का कार्यक्रम घाटिका की सहायता से तैयार किया जाता था। घंटे की आवाज पर शयन, जागरण, भोजन, अध्‍ययन, पूजा आराधना आदि होते थे। संघाराम की एक-एक कोठरी में एक विद्यार्थी के रहने का प्रबंध था, जिसमें पत्‍थर की पट्टियों का शयनासन बना हुआ था। सभा तथा सामूहिक गोष्‍ठी के लिए अलग-अलग प्रशस्‍त मंडप थे, जिनमें 2000 भिक्षु एक साथ बैठ सकते थे।
विश्‍वविद्यालय की व्‍यवस्‍था अनुदान में प्राप्‍त हुए दो सौ गाँवों से चलती थी। विद्यार्थियों को निःशुल्‍क शिक्षा दी जाती थी। रहने, खाने एवं कपड़े की व्‍यवस्‍था स्‍वयं विश्‍वविद्यालय करता था।
नालंदा में भिक्षुओं के अतिरिक्‍त कुछ अन्‍य लोग भी शिक्षा प्राप्‍त करने आते थे। यहाँ शिक्षा प्राप्‍त करनेवाले विद्यार्थियों में हिंदू छात्रों की संख्‍या ज्‍यादा रही होगी, तभी तो हिंदू शासक उस विश्‍वविद्यालय के उत्‍थान में अत्‍यंत सक्रिय दिखाई पड़ते थे। विद्यार्थियों को सा‌त्‍विक एवं पौष्‍टिक भोजन मिलता था। भोजन इस प्रकार था—प्रातः चावल का पानी, दोपहर में चावल, मक्‍खन, दूध, फल, घी और मीठे तरबूज और शाम को हल्‍का भोजन। विश्‍वविद्यालय की अपनी मुद्रा थी, जिस पर श्री नालंदा महाविहार आर्य भिक्षुसंघस्‍य लेख उत्‍कीर्ण था। उससे संबद्धा जो विहार या विद्यालय थे, उनकी अलग-अलग मुद्राएँ थीं।
चीनीयात्री इत्‍सिंग भी नालंदा आया था। उसने नालंदा में रहकर शिक्षा और विशेषज्ञता प्राप्‍त की थी। उसने नालंदा विश्‍वविद्यालय में स्‍थित प्रमुख पुस्‍तकालयों का विशेष रूप से वर्णन किया है।
तिब्‍बती स्रोतों से पता चलता है कि नालंदा के ग्रंथालयों में हस्‍तलिखित ग्रंथों की कितनी विशाल संपदा थी। लामा तारानाथ और 18वीं शती के अन्‍य तिब्‍बती लेखक जिन्‍होंने बौद्ध धर्म के इतिहास लिखे हैं, इस संपदा के बारे में लिखते हैं कि विश्‍वविद्यालय के अहाते का बहुत बड़ा घेरा इन ग्रंथालयों के लिए अलग से रखा गया था और उस पर बड़ी-बड़ी, कई मंजिलोंवाली इमारतें थीं। उनमें से तीन के सुंदर नाम थे। रत्‍नसागर, रत्‍नोदधि और रत्‍नरंजक। इनमें सबसे बड़ा पुस्‍तकालय रत्‍नोदधि था, जिसका विस्‍तार नौ खंडों में था। उन खंडों में बहुमूल्‍य ग्रंथ और पांडुलिपियाँ सिलसिलेवार रखी हुई थीं। पुस्‍तकाध्‍यक्ष कोई वरिष्‍ठ प्राचार्य होता था। इन पुस्‍तकालयों में पांडुलिपियाँ तथा प्रतिलिपियाँ तैयार करने में अनेक भिक्षु और छात्र कार्यरत रहते थे। ह्वेनसांग ने नालंदा में रहकर करीब सात सौ ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ तैयार कीं और इन्‍हें बहुमूल्‍य धरोहर मानकर अपने देश चीन ले गया। उसी परंपरा में इत्‍सिंग ने भी प्रतिलिपि लेखन का कार्य किया और वैदिक तथा बौद्ध साहित्‍य के चार सौ ग्रंथ की प्रतियाँ सहेजकर चीन ले गया।
नालंदा के कई हस्‍तलिखित ग्रंथ कैंब्रिज ऑफ लंदन पुस्‍तकालय में प्राप्‍त हुए हैं। 11-12वीं शताब्‍दी में नालंदा में महायान बौद्ध धर्म के विख्‍यात भष्‍ट्रसाहसिका प्रज्ञापारामति नामक शास्‍त्र गंथ की पोथी थी। उसकी प्रतियाँ इस समय नेपाल तथा लंदन की रायल एशियाटिक सोसाइटी और ऑक्‍सफोर्ड की बटालियन लाइब्रेरी में सुरक्षित हैं।
ह्वेनसांग के अनुसार नालंदा में विशालकाय विश्‍वविद्यालय परिसर था, जिसमें संघाराम थे। सभी संघाराम एक ऊँची दीवारों से घिरे थे। इनके मध्‍य में विद्यापीठ स्‍थित थी। ऊँची दीवारों से सटे आठ आयताकार प्रकोष्‍ठ थे, जिनमें कक्षाएँ लगती थीं और आचार्यों के भाषण होते थे। दूसरी ओर कई वेधशालाएँ और कार्यशालाओं के भवन थे, जिनमें तरह-तरह के यंत्र लगे थे। उनसे जलवायु के अलावा ग्रह-नक्षत्रों की जानकारी प्राप्‍त की जाती थी। विहार के अलग चारमंजिला छात्रावास का भवन था, जिसमें पाँच हजार से अधिक छात्रों के निवास की व्‍यवस्‍था थी। संघारामों में अध्‍ययन करनेवाले भिक्षुओं की निम्‍न श्रेणियाँ थीं—श्रमनेर (निम्‍नतम श्रेणी), दहर (लघु मिक्षु), स्‍याविर, उपाध्‍याय और बहुश्रुत (श्रेष्‍ठतम श्रेणी)।
‌विहार का कार्यालय आठ घंटे का होता था। प्रातः और अपराह्न में चार घंटे काम करना पड़ता था। विद्यार्थियों की दिनचर्या सुबह चार बजे से शुरू हो जाती थी। नालंदा में पढ़नेवाले विदेशी विद्यार्थियों को भारतीय परिवेश में रहना पड़ता था। उनका नामकरण भी भारतीय संस्‍कार के अनुसार किया जाता था। नालंदा में अध्‍ययनरत रहते समय उनका विदेशी नाम हट जाया करता था। उदाहरण के तौर पर, शर्मन-ह्यून-चिन (प्रकाशभांति), वान-होंग यौब्‍दी (श्रीदेव), तोफांग (चंद्रदेव)।
नालंदा में दो प्रकार के पाठ्यक्रम थे—एक प्रारंभिक शिक्षा और दूसरा उच्‍च शिक्षा। प्रारंभिक शिक्षा को पूरा करके ही उच्‍च शिक्षा की पात्रता प्राप्‍त हो सकती थी। प्रारंभिक शिक्षा के लिए न्‍यूनतम आयु छह वर्ष और अधिकतम आठ वर्ष थी। प्रारंभिक पाठ्यपुस्‍तक का नाम सि‌‌द्धिरस्‍तु था, जिसमें वर्णमाला के 49 अक्षर होते थे। दूसरी पुस्‍तक जिसकी शुरुआत 8 वर्ष की अवस्‍था में होती थी, इनमें पाणिनि का व्‍याकरण होता था। इसके बाद धातु और कशिकावृ‌‌त्ति का अध्‍ययन होता था।
इत्‍सिंग के अनुसार—तरुण‌ विद्यार्थी हेतु विद्या और अभिधम कोश सीखते थे। न्‍याय द्वार तर्कशास्‍त्र सीखने से उनकी अनुमान शक्‍ति विकसित होती थी और जातक माला पढ़ने से उनकी कल्‍पना और विचार-शक्‍ति बढ़ती थी। भिक्षु केवल सब विनय सीखते थे, बल्‍कि समस्‍त सूत्रों एवं शास्‍त्रों का भी अनुसंधान करते थे।
नालंदा में पाँच विषयों की अनिवार्य पढ़ाई होती थी, जिसमें व्‍याकरण, शब्‍द विद्या, शिल्‍प शास्‍त्र विद्या, चिकित्‍सा विद्या हेतु विद्या (लॉजिक) तथा अध्‍यात्‍म विद्या प्रमुख थी। नालंदा में व्‍याख्‍यान, प्रवचन, वाद-विवाद और विमर्श के माध्‍यम से शिक्षा दी जाती थी। शिक्षा के विषय थे बौद्ध धर्म महायान, वज्रयान, सहजयान आदि संप्रदायों के धार्मिक साहित्‍य, तंत्र व ज्‍योतिष। इनके अलावा दर्शन, साहित्‍य, व्‍याकरण और कला की शिक्षा की भी व्‍यवस्‍था थी। चिकित्‍सा संबंधी शिक्षा अनिवार्य थी।
युआन च्‍वांग की जो जीवनी हुई-ली ने लिखा है, उसके अनुसार नालंदा में पढ़ाए जानेवाले विषयों का वर्णन दिया गया है। उसने लिखा है कि 18 पंथों के ग्रंथ पढ़ाए जाते थे, जिनमें वेद-वेदांग थे, हेतुविद्या, शब्‍द विद्या, चिकित्‍साविद्या, अर्थर्ववेद या मंत्रविद्या, संख्‍या आदि विद्याएँ थीं, साथ ही वे अन्‍य फुटकर ग्रंथों का भी सूक्ष्‍म अध्‍ययन करते थे। एक हजार व्‍यक्‍ति वहाँ ऐसे थे जो बीस सूत्र ग्रंथ और शास्‍त्र समझते थे। 500 ऐसे अध्‍यापक थे, जो ऐसे तीस ग्रंथ सिखा सकते थे और कदाचित दस ऐसे थे, जो पचास ग्रंथ समझ सकते थे। अकेले शीलभद्र ऐसे थे, जिन्‍होंने सारे ग्रंथ पूरी तरह पढ़े थे और सब ग्रंथों को समझा था।
इत्‍सिंग के अनुसार, विद्यार्थी के अध्‍ययन का एक मुख्‍य अनिवार्य विषय था संस्‍कृत व्‍याकरण। वे लिखते हैं कि पुराने अनुवादक संस्‍कृत भाषा के नियम हमें बताते…अब मुझे पूरा विश्‍वास है कि संस्‍कृत व्‍याकरण में संपूर्ण अध्‍ययन से इस अनुवाद में जो भी कठिनाई आएगी, दूरी हो जाएगी।
नालंदा विश्‍वविद्यालय में आमतौर पर छात्र दस वर्ष के लिए भरती किए जाते थे। बौद्ध भिक्षु बनने के लिए छात्र 20 वर्षों तक विद्यालय में रह सकते थे। शोध करनेवाले छात्र इससे अधिक समय तक नालंदा में रह सकते थे। ह्वेनसांग लिखित भारत यात्रा के विवरण गजेटियर स्‍वरूप में है। छाड़ राजवंश से पश्‍चिम की यात्रा में उन्‍होंने भारत के अनेक स्‍थानों का वर्णन किए हैं। इस पुस्‍तक में नालंदा का विस्‍तार से वर्णन है।
ह्वेनसांग ने महाविहार में होनेवाले वाद-विवाद की प्र‌क्रिया एवं उसमें सफलता के महत्त्व का उल्‍लेख किया है। ह्वेनसांग ने लिखा है कि एक बार लोकात्‍य समुदाय के एक आचार्य ने चालीस सिद्धांत लिखे और नालंदा महाविहार के विशाल द्वार पर सूचना लटका दिया। सूचना में था कि यदि कोई व्‍यक्‍ति इन सिद्धांतों को गलत सिद्ध कर दे तो उसकी विजय उपलक्ष्‍य में मैं अपना सिर दूँगा। ह्वेनसांग ने उस चुनौती को स्‍वीकार कर उस आचार्य को सार्वजनिक वाद-विवाद में हराया। किंतु ह्वेनसांग ने उसे माफ कर दिया। फलस्‍वरूप हारनेवाला आचार्य उनका शिष्‍य बन गया और नालंदा में छह वर्षों तक विद्यार्थी बनकर अध्‍ययन किया।
ह्वेनसांग के अनुसार, इस विद्या मंदिर में हजारों विद्वज्‍जन थे, जिनकी विद्वत्ता और योग्‍यता बहुत ही उच्‍चकोटि की थी। इन्‍हें सारे विश्‍व में आदर्श माना जाता था। विदेशी छात्र यहाँ अपनी शंकाओं का समाधान करने आते थे और गौरव तथा ख्‍याति प्राप्‍त करते थे।
युआन-च्‍वांग के अनुसार, विद्यार्थियों के पढ़ने और वाद-विवाद करने में दिन यों बीत जाता था कि दिन के घंटे उन्‍हें कम जान पड़ते थे। ह्वेनसांग ने महाविहार के प्रकांड विद्वान शिक्षक शीलभद्र से शिक्षा ग्रहण किया। शीलभद्र के आदेश पर ह्वेनसांग ने नालंदा महाविहार में एक वर्ष तक प्राध्‍यापक के रूप में पढ़ाया।
ह्वेनसांग के शब्‍दों में यदि लोग नालंदा के भ्रातृ समाज (छात्रवृंद) में सम्‍मलित रहने का मिथ्‍या प्रमाण भी जुटा लेते थे, तो उन्‍हें सभी स्‍थानों में उच्‍चकोटि के आवासीय विश्‍वविद्यालय में प्रवेश की सुविधा मिल जाती थी। नालंदा की एक उल्‍लेखनीय देन यह थी कि वहाँ विद्यार्थी एक-दूसरे के निर्माण में सहायता करते थे और इस प्रकार जीवन की सबसे आदर्श कला में यानी बुद्धि की दीप्‍ति से जाग्रत् एक विद्वज्‍जन समाज के निर्माण में पारस्‍परिक सहायता करते थे।
इत्‍सिंग के अनुसार, ख्‍यातिप्राप्‍त तथा प्रतिष्‍ठित विद्वान की यहाँ भीड़-सी लगी रहती थी और वे संभव तथा असंभव तथ्‍यों पर विचार किया करते थे और अंत में ज्ञानियों द्वारा अपने विचारों की श्रेष्‍ठता के संबंध में निश्‍चिंत होने के बाद अपने ज्ञान की दीप्‍ति से संसार में यश प्राप्‍त करते थे।
पाठ्यक्रम की समाप्‍ति पर दीक्षांत समारोह होता था, जिनमें विद्यार्थी की सामाजिक स्‍थिति और गुणों को देखते हुए उपाधियाँ दी जाती थीं। विनयपिटक के नियमानुसार विद्यार्थियों को धन-स्‍पर्श वर्जित था।
गुप्‍तकाल में स्‍थापित नालंदा विश्‍वविद्यालय लगभग 700 वर्षों तक सितारों की तरह जगमगाता रहा और ज्ञान महाकेंद्र के रूप में इसने संसार में प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त की। मुसलमान आक्रमणकारी मुहम्‍मद बिन अख्‍तियार खिजली ने 1303 में आक्रमण किया और इस विद्या मंदिर को नष्‍ट-भ्रष्‍ट कर दिया। यहाँ के सभी भिक्षुओं को हमलावरों ने मौत के घाट उतार दिया और यहाँ के पुस्‍तकालयों को जलाकर भस्‍मसात कर दिया था। तुर्की इतिहासकार मिनहाज के शब्‍दों में यह विध्‍वंस इतना प्रलयकारी और भयावह हुआ कि इसके बाद फिर नालंदा महाविहार का विकास न हो सका। प्राचीन नालंदा विश्‍वविद्यालय के सैकड़ों साल बाद विख्‍यात पुरातत्त्ववेता सर कनिंघम ने इस प्राचीन विश्‍वविद्यालय को खोज निकाला। प्राचीन नालंदा विश्‍वविद्यालय की खुदाई 1870 में एम.एम. ब्रेडलेने ने शुरू की थी और उसी ने नालंदा विश्‍वविद्यालय को उक्‍त स्‍थान पर होने का संकेत दिया था। नालंदा के जीर्णोद्धार के लिए 1915 ई. में खुदाई का कार्य आरंभ हुआ। यह कार्य रॉयल सोसाइटी ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड नामक संस्‍था की मदद से भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण की देखरेख में शुरू हुआ था जिसे बाद में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने अपने हाथ में लिया। खुदाई से प्राप्‍त चिह्नों से ज्ञात होता है कि नालंदा महाविहार का कम-से-कम सात बार पुनर्निर्माण या विस्‍तार हुआ होगा। अभी प्राचीन महाविहार के खंडहर संपूर्ण रूप से लगभग चौदह हजार हेक्‍टेयर भूमि में फैले हैं।
खुदाई के क्रम में अब तक नौ विहार प्रकाश में आए हैं जो दक्षिण से उत्तर की ओर एक पंक्‍ति में फैले हुए हैं। सभी एक ही प्रकार के समत्‍य हैं। इनके आँगन के चारों ओर कोष्‍ठक और बरामदे खुले हैं। सभी की दीवारों की चौड़ाई आठ फीट चौड़ी है। नालंदा के स्‍थापत्‍य के नमूने यानी पानी बहानेवाली नालियों, दीवारों में बनीं आलमारियाँ और ताखें, स्‍नानागार, शयनस्‍थल, अन्‍नागार, देव मंदिर, पूजा गृह, चिकित्‍सालय आदि आज भी दिख पड़ते हैं। इसे देखने से पता चलता है कि तत्‍कालीन वास्‍तुकला उत्‍कृष्‍टता के शिखर पर पहुँच चुकी थी। उत्‍खनन के फलस्‍वरूप 13 मठ प्रकाश में आए हैं। प्रत्‍येक मठ के कोने में एक कुआँ दिखाई पड़ता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि पानी की समस्‍या को लोगों ने नजरअंदाज नहीं किया था। इस स्‍थल पर पुराविदों के सफल प्रयास से विश्‍वविद्यालय की रूपरेखा एक भवन प्रकाश में आए। विश्‍वविद्यालय लंबे क्षेत्र में विस्‍तृत तथा जिसकी लंबाई एक मील, चौड़ाई आधा मील दिखाई पड़ती है। विश्‍वविद्यालय के पारित स्‍तूप और मठ भी थे, जिन्‍हें योजनाबद्ध तरीके से बनाया गया था। छात्रों के हितों को ध्‍यान में रखते हुए एक बड़ा-सा हॉल था एवं 300 छोटे-छोटे कमरे भी दिखाई पड़ते हैं। इनमें व्‍याख्‍यानों का आयोजन किया जाता था। ये भवन कई मंजिलों के होते थे।
अन्‍य भ्रमण
नालंदा संग्रहालय—नालंदा संग्रहालय में गुप्‍तकाल और पालवंश के बहुत सारी बौद्ध मूर्तियाँ संग्रहित हैं। इस संग्रहालय में खंडहरों की खुदाई में पाए गए ताम्र शिलालेख, मिट्टी के बर्तन और जल गए चावलों के नमूने तक सुरक्षित रखे गए हैं।
नव नालंदा महाविहार—सन् 1951 में नव नालंदा महाविहार की स्‍थापना की गई, जिसमें बौद्ध दर्शन और पाली भाषा तथा साहित्‍य पर अनुसंधान कार्य आरंभ किया गया। इस महाविहार की आधारशिला तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 20 जनवरी, 1951 में रखी थी तथा 20 मार्च, 1956 को तत्‍कालीन उपराष्‍ट्रपति डॉ. राधाकृष्‍णन् ने इसके भवन का उद्घाटन किया। बाद में चीन, जापान, श्रीलंका और इंडोनेशिया ने भी इस संस्‍था के विकास में योगदान दिया। अब नव नालंदा विहार को विश्‍वविद्यालय के समकक्ष मान्‍यता प्रदान की गई है। केंद्र सरकार ने बिहार के नालंदा में स्‍थित नालंदा महाविहार को डीम्‍ड यूनिवर्सिटी के समकक्ष विश्‍वविद्यालय का दर्जा दिया है।
ह्वेनसांग स्‍मृति भवन— ह्वेनसांग (श्‍वेन त्‍सांड्) स्‍मृति भवन सातवीं शताब्‍दी में ह्वेनसांग की भारत यात्रा की स्‍मृति में बनाया गया है। यह भवन भारत-चीन की दो महान सभ्‍यताओं के बीच सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान का प्रतीक है। ह्वेनसांग ने नालंदा महाविहार (नालंदा विश्‍वविद्यालय) में पाँच वर्षों तक शिक्षा ग्रहण की थी और एक वर्ष तक अध्‍यापन का कार्य किया था। चीन वापस जाते समय ह्वेनसांग अपने साथ कई पांडुलिपियाँ भी ले गए और इनका चीनी भाषा में अनुवाद किया। इससे न केवल चीन में बल्‍कि कोरिया और जापान में भी बौद्ध धर्म की मजबूत नींव रखी गई। राज्‍य के विश्‍वविख्‍यात नालंदा महाविहार में जगमगाता ह्वेनसांग स्‍मृति भवन अब देसी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का मुख्‍य केंद्र बन गया है।
नालंदा विश्‍वविद्यालय के खंडहर से लगभग एक किलोमीटर दूर एकांत वातावरण के बीच अवस्‍थित ह्वेनसांग स्‍मृति भवन एकाग्रता को समेटे प्राचीन ज्ञान स्‍थली की याद ताजा कर देती है। राजकुमार ह्वेनसांग के सम्‍मान में बने स्‍मृति भवन को चीनी मंदिर का स्‍वरूप दिया गया है। भारतीय और चीनी कलाओं से सुसज्‍जित इस भवन की दीवारें, कक्ष में प्रवेश करते ही एक अद्भुत दृश्‍य प्रस्‍तुत करती हैं। लगभग 65 एकड़ में फैले इस स्‍थल के मनोरम दृश्‍य अत्‍यंत लुभावने हैं।
सन् 1960-61 में बने लगभग 108 फीट लंबे और 54 फीट चौड़े इस भवन का विस्‍तार कर इसे 400 फीट लंबा और 400 फीट चौड़ा बना दिया गया है। इस भवन की दीवारों पर अविस्‍मरणीय चीनी पेंटिंग्‍स, पोट्रेट एवं तस्‍वीरें लगाई गई हैं। भवन की दीवारों में ह्वेनसांग के संपूर्ण जीवन और उनके कार्यों का उल्‍लेख किया ‌गया है। इसके अलावा चीन सरकार द्वारा दिए उनके अमूल्‍य पुस्‍तकों को प्रदर्शित करने के लिए स्‍मृति भवन को विकसित किया गया है। स्‍मृति भवन में 12 फीट ऊँची और छह टन भारी ह्वेनसांग की मूर्ति स्‍थापित की गई है। उसके ठीक पीछे दीवार पर लकड़ी पर भव्‍य भित्तचित्र लगाया गया है, जिसमें ह्वेनसांग अपने प्रकांड विद्वान् शिक्षक शीलभद्र से शिक्षा ग्रहण करते दिखलाया गया है। भवन के अंदर बाईं ओर की दीवार पर नालंदा महाविहार के प्रकांड विद्वान शिक्षक शीलभद्र का पोट्रेट लगा है और दाईं ओर विश्‍वयात्री की वेशभूषा में ह्वेनसांग की तस्‍वीर।
स्‍मृति भवन परिसर के मुख्‍य द्वार के बाईं ओर एक विशाल स्‍मृति स्‍तंभ और दाईं ओर एक विशाल घंटा लगाया गया है। वहीं स्‍मृति भवन के प्रवेश मार्ग पर चीनी मंदिर की छत का स्‍वरूप लिया एक भव्‍य द्वार बनाया गया है। भवन के मुख्‍य द्वार पर ह्वेनसांग की पीठ पर रूकसैक के लिए आदमकद प्रतिमा उस वक्‍त के यात्रियों के रहन-सहन की याद दिलाती है।
उल्‍लेखनीय है कि 12 जनवरी, 1957 में भारत के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री चाउ एन लाई से ह्वेनसांग के स्‍मृति चिह्न, ह्वेनसांग स्‍मृति भवन के निर्माण के लिए अनुदान और चीनी तृप्‍तिका (चीनी और बौद्ध साहित्‍य) तथा भवन का नक्‍शा चीन के प्रतिनिधि के रूप में धर्मगुरु दलाईलामा तथा पंचेन लामा की मौजूदगी में नालंदा के नव नालंदा महाविहार में आयोजित एक समारोह में ग्रहण किया था। ह्वेनसांग स्‍मृति भवन के निर्माण में नव नालंदा महाविहार के संस्‍थापक निदेशक भिक्षु जगदीश कश्‍यप का विशेष योगदान है।
कुंडलपुर—नालंदा खंडहर से लगभग दो किलोमीटर उत्तर कुंडलपुर (भगवान महावीर की जन्‍मस्‍थली) नामक स्‍थान है। यहाँ दिगंबर जैन धर्मावलंबियों द्वारा एक अति सुंदर नद्यवर्त महल का निर्माण कराया गया है जो एक दर्शनीय श्रद्धास्‍थल है। शिखर बंद इस मंदिर में भगवान महावीर की श्‍वेतवर्ण की साढ़े चार फीट अवगाहनवाली भव्‍य पद्मासन प्रतिमा विराजमान है। शास्‍त्रों में वर्णन है कि तीर्थंकर की जन्‍मनगरी को उनके जन्‍म के पूर्व स्‍वर्ग से आकर स्‍वयं भगवान इंद्र ने व्‍यवस्‍थित किया था। मान्‍यता है कि कुंडलपुरवासियों को 24वें तीर्थंकर के नानवंश में अवतरण की बेला में नमो मंडल से वैभव और विभूति की विपुलावृष्‍टि हुई थी, जिससे सभी नगरवासी समृ‌द्ध एवं सुखी हो गए थे।
उदंतपुरी विश्‍वविद्यालय
यह विश्‍वविद्यालय भी नालंदा और विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय की तरह विख्‍यात था, परंतु उदंतपुरी विश्‍वविद्यालय का उत्‍खनन कार्य नहीं होने के कारण आज भी धरती के गर्भ में दबा है, जिसके कारण बहुत ही कम लोग इस विश्‍वविद्यालय के इतिहास से परिचित हैं। अरक के लेखकों ने इसकी चर्चा अदबंद के नाम से की है, वहीं लामा तारानाथ ने इस उदंतपुरी महाविहार को ओडयंतपुरी महाविद्यालय कहा है। ऐसा कहा जाता है कि नालंदा विश्‍वविद्यालय जब अपने पतन की ओर अग्रसर हो रहा था, उसी समय इस विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना की गई थी। इसकी स्‍थापना प्रथम पाल नरेश गोपाल ने सातवीं शताब्‍दी में की थी।
तिब्‍बती पांडुलिपियों से ऐसा ज्ञात होता है कि इस महाविहार के संचालन का भार भिक्षुसंघ के हाथ में था, किसी राजा के हाथ नहीं। संभवतः उदंतपुरी महाविहार की स्‍थापना में नालंदा महाविहार और विक्रमशिला महाविहार के बौद्ध संघों का मतैक्‍य नहीं था। संभवतया इस उदंतपुरी की ख्‍याति नालंदा और विक्रमशिला की अपेक्षा कुछ अधिक बढ़ गई थी। तभी तो मुहम्‍मद बिन बख्‍तियार खिजली का ध्‍यान इस महाविहार की ओर उत्‍कृष्‍ट हुआ और उसने सर्वप्रथम इसी का अपने आक्रमण का पहला निशाना बनाया। खिलजी ने 1197 ई. में सर्वप्रथम इसी की ओर आकृष्‍ट हुआ और अपने आक्रमण का पहला निशाना बनाया। उसने इस विश्‍वविद्यालय को चारों ओर से घेर लिया, जिससे भिक्षुगण काफी क्षुब्‍ध हुए और कोई उपाय न देखकर वे स्‍वयं ही संघर्ष के लिए आगे आ गए, जिसमें अधिकांश तो मौत के घाट उतार दिए गए, तो कुछ भिक्षु बंगाल तथा उड़ीसा की ओर भाग गए थे और अंत में इसमें आग लगवा दी। इस तरह विद्या का यह मंदिर सदा-सदा के लिए समाप्‍त हो गया। उल्‍लेखनीय है कि उदंतपुर को ही इन दिनों बिहारशरीफ के नाम से जाना जाता है। बिहारशरीफ के पास नालंदा विश्‍वविद्यालय होने के बावजूद उसी काल में उसी के नजदीक एक अन्‍य विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना होना आश्‍चर्य की बात है। उदंतपुरी के प्रधान आचार्य जेतारि और अतिश के शिष्‍य थे। एक समय विद्या और आचार्यों की प्रसि‌द्धि के कारण इसका महत्त्व नालंदा से अधिक बढ़ गया था।
उदंतपुरी महाविहार के उन्‍नत तथा विकासशील बनाने में यहाँ के विद्यार्थियों तथा आचार्यों का विशेष योगदान रहा है। इनमें अतिश दीपंकर, ज्ञानश्रीमित्र, शांति-पा, योगा-पा, शांति रक्षित आदि के नाम उल्‍लेखनीय हैं। इस विश्‍वविद्यालय के प्रथम कुलपति प्रभाकर थे। मित्र योगी कुछ दिनों तक प्रधान आचार्य पद पर थे। तिब्‍बती पांडुलिपियों के अनुसार वहाँ के प्रसिद्ध राजा खरी स्‍त्रोन डसुत्‍सेन शिक्षा प्राप्‍त करने आए थे। शांतिरक्षित इस महाविहार के प्रथम शिष्‍य रहे हैं, जिनके द्वारा यहाँ के सांस्‍कृतिक वैभव को देश-विदेशों में ख्‍याति प्राप्‍त करने का श्रेय रहा। इस विश्‍वविद्यालय में देश-विदेश के लगभग एक हजार विद्यार्थी अध्‍ययन किया करते थे। नालंदा व विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय की तरह देश के राजाओं तथा धनाढ्य लोगों द्वारा सहायता मिलती थी। फिर भी उदंतपुरी विश्‍वविद्यालय बौद्ध धर्म के माननेवाले तथा भिक्षुओं का मुख्‍य केंद्र था। तिब्‍बत में इनकी भूरि-‌भूरि प्रशंसा की जाती है। आज भी उनके कमंडल, खोपड़ी और अस्‍थियाँ वहाँ के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। शांतिरक्षित लगभग 743 ई. में जब वे तिब्‍बत गए तो वहाँ पर उदंतपुरी महाविहार के समरूप ही एक बौद्ध विहार का निर्माण कराया, जिसे ‘साम्‍ये विहार’ के नाम से जाना जाता है। यहाँ भी एक बहुत बड़ा समृद्धशाली पुस्‍तकालय के संबंध में कहा जाता है कि जितना विशाल संग्रह यहाँ उपलब्‍ध था, उतना संग्रह विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय में भी नहीं था।
बुकानन और कनिंघम ने आधुनिक बिहारशरीफ शहर जो कि नालंदा जाने के मार्ग में पड़ता है, वहाँ एक विशाल टीला का उल्‍लेख करते हैं। यहाँ के एक बौद्ध देवी की कांस्‍य की प्रतिमा प्राप्‍त हुई है। इस पर एक अभिलेख अंकित है जिसमें एणकठाकुट का नाम उल्‍लेखित है। यह उदंतपुरी का निवासी था। शायद इसी अभिलेख के आधार पर इस स्‍थान की पहचान उदंतपुरी विश्‍वविद्यालय से की गई है।
             पहुँचने का मार्ग
सड़क मार्ग—पटना से 95 किलोमीटर, राजगीर से 12 किलोमीटर, बोधगया से 90 किलोमीटर (गया होकर), पावापुरी से 26 किलोमीटर
रेलमार्ग—निकटवर्ती रेलवे स्‍टेशन राजगीर व नालंदा
हवाई मार्ग—पटना और गया हवाई अड्डा
कहाँ ठहरें—यहाँ ठहरने के लिए आपको शहर में होटल-रेस्‍ट मिलेगा। सरकारी रेस्‍ट हाऊस तथा बँगला भी है, जिसमें ठहरने के लिए दो-तीन दिन पहले आदेश लेना पड़ता है। इसके अलावा यहाँ एक यूथ होस्‍टल भी है। फिर भी राजगीर में ठहरना अच्‍छा होता है क्‍योंकि यहाँ खाने के लिए होटल नहीं है।
सामान्‍य जानकारी
नालंदा (जिला नालंदा)
क्षेत्रफल—2367 वर्ग किलोमीटर
चौहद्दी—उत्तर—पटना एवं नवादा
दक्षिण—गया एवं नवादा
पूर्व—मुंगेर
पश्‍चिम—जहानाबाद
नदी—फल्‍गू और मुहाने
तापमान—गर्मी—अधिकतम 48 सेंटीग्रेड—न्‍यूनतम 18 सेंटीग्रेड
जाड़ा—अधिकतम 28 सेंटीग्रेड—न्‍यूनतम 15 सेंटीग्रेड
वर्षा—120 सेंटीमीटर
उत्तर मौसम—नवंबर से फरवरी
एस.टी.डी. कोड—06112
(लेखक हिंदुस्‍तान, पटना संस्‍करण में बिजनेस पेज के प्रभारी व ‌बिहार पर्यटन सम्‍मान से सम्‍मानित हैं।)