भगवान बुद्ध और अवतारवाद का अधूरा सत्य..डॉ प्रभात टन्डन

ये आर्टिकल साभार  ब्लॉग   http://preachingsofbuddha.blogspot.in से लिया गया है जिसका लिंक  प्रकार से है

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हम  इस आर्टिकल के लेखक डॉ प्रभात टन्डन के आभारी हैं  जिन्होंने इतने महत्वपूर्ण तथ्य जन साधारण के लिए उपलब्ध करवाए

इस  आर्टिकल के साथ संलग्न चित्रों का वर्णन :

1. बलरामपुर में द्रौपदी मन्दिर मे भगवान बुद्ध की मूर्ति
2. हिन्दू मन्दिरों मे भगवान बुद्ध की मूर्ति पाये जाने का एक दुर्लभ चित्र
3. Vishnu as Buddha making gesture of dharmacakrapravartana flanked by two disciples ( साभार : विकीपीडिया )

यह अजीब सा विरोधाभास है  कि एक तरफ़  तो हिन्दू धर्म मे भगवान बुद्ध को विष्णु  का नंवा अवतार माना जाता  हैं और दूसरी  तरफ़ हिन्दू मन्दिरों में बुद्ध की मूर्ति को ढूँढ पाना एक दुर्लभ कार्य है । पिछ्ले साल हरिद्वार और देहारदून से लौटते समय मेरे मन मे यही विचार उमडते रहे । उन दिनों हरिद्वार मे कोई बौद्ध  सम्मेलन चल रहा था । लौटते समय मेरी मुलाकात ट्रेन में जिन महिला से हुयी , वह भी उसी सम्मेलन का हिस्सा थी । बनारस की रहने वाली श्रीमती मालती तिवारी सारनाथ में  केन्द्रीय तिब्बती अध्यन्न विशवविधालय ( Central University of Tibetan Studies (CUTS) ,  Sarnath ) में  अध्यापन कार्य करती हैं  । बुद्ध धम्म मे उनकी गहन रुचि थी और बातों –२ मे ज्ञात हुआ कि उनका शोध  कार्य डां अम्बेड्कर और बौद्ध धर्म  पर केन्द्रित था । लेकिन मेरे इस प्रशन  पर वह चुप रही ।

गत वर्ष ही दीपावली के अगले दिन श्रावस्ती जाने का अचानक प्रोग्राम बन गया । श्रावस्ती से लौटते समय बलरामपुर में द्रौपदी मन्दिर मे भगवान बुद्ध की मूर्ति को देखकर मै अचरज मे पड गया । ऊपर का यह चित्र उसी मन्दिर से ही है ।

अवतार वाद की यह  फ़िलोसफ़ी मेरे मन मे कभी भी मूर्त  रुप न ले पाई । अगर ईमानदारी से भगवान बुद्ध को विष्णु का अवतार माना गया होता तो हर मंदिर में आज उनकी मूर्ति होती ।

लेकिन ऐसा क्यूं  है कि  भगवान बुद्ध को हिन्दू धर्म में पूर्ण रुप से स्वीकार नही किया गया ।  हिन्दू पुराणॊं मे इसे इस तरीके से पेश किया गया है जिसे ज़्यादातर बौद्ध अस्वीकार्य और बेहद अप्रिय मानते हैं। कुछ पुराणों में ऐसा कहा गया है कि भगवान विष्णु ने बुद्ध अवतार इसलिये लिया था जिससे कि वो “झूठे उपदेश” फैलाकर “असुरों” को सच्चे वैदिक धर्म से दूर कर सकें, जिससे देवता उनपर जीत हासिल कर सकें। इसका मतलब है कि बुद्ध तो “देवता” हैं, लेकिन उनके उपदेश झूठे और ढोंग हैं। ये बौद्धों के विश्वास से एकदम उल्टा है: बौद्ध  गौतम बुद्ध को कोई अवतार या देवता नहीं मानते, लेकिन उनके उपदेशों को सत्य मानते हैं। कुछ हिन्दू लेखकों (जैसे जयदेव) ने बाद में यह भी कहा है कि बुद्ध विष्णु के अवतार तो हैं, लेकिन विष्णु ने ये अवतार झूठ का प्रचार करने के लिये नहीं बल्कि अन्धाधुन्ध कर्मकाण्ड और वैदिक पशुबलि रोकने के लिये किया था।
लेकिन फ़िर सच क्या है ? क्या यह ब्राहम्ण्वादी  मानसिकता का बौद्ध दर्शन को सोखने की एक चाल थी ? संभवत: यह ही सच है !! मगर कैसे ? श्री आलोक कुमार पाण्डेय की पुस्तक , “ प्राचीन भारत ” जो मैने अभी हाल ही मे फ़िल्पकार्ड से मँगाई थी , इस विषय पर काफ़ी प्रकाश डालती है । आलोक जी जो सन २००२ बैच के IAS  हैं , उन्होने निष्पक्ष रुप से इसकी विवेचना की है । आप  लिखते हैं ,

लगभग छ्ठी ई.पू. में गंगा घाटी में रहने वालों के धार्मिक जीवन मे अनेकों परिवर्तन देखने को मिले । तत्कालीन परम्परावादी ब्राहम्ण धार्मिक व्यवस्था के विरोध मे लोग उठ खडे हुये तथा आन्दोलन का स्वरुप इतना तीव्र हो उठा कि ईशवर की सत्ता तक को अस्वीकार करने वाले सम्प्रदाय एवं मत अस्तित्व में  आये । तत्कालीन ग्रंथों में लगभग ६२ मुख्य और अनेक छोटे –२ धार्मिक सम्प्रदायों का परिचय मिलता है जो इस बात का परिचायक  है कि धर्म की जडता के विषय मे कितना असंतोष था । ……. प्रशन उठता है कि वह कौन से कारण थे जिनके चलते इस प्रकार का धार्मिक आन्दोलन उठ खडा हुआ । इन्हें निम्म रुप से समझा जा सकता है :

१. आर्थिक २. धार्मिक ३. सामाजिक ४. राजनैतिक

सम्भवत: नास्तिक सम्प्रदाओं के उदय के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण आर्थिक ही थे । यह शती लोहे के उपकरणों के कृषि मे प्रयोग होने की शती थी । हाँलाकि इसके पूर्व लोहे का ज्ञान हो चुका था किन्तु ज्यादतर वे शास्त्रास्त्रॊं  में प्रयुक्त होते थे । ……लौह उपकरणो के ज्ञान से विस्तूत मैदानों  की प्राप्ति हुई । इस विस्तूत मैदान पर अब गहन कृषि प्रारम्भ  हुई जिससे एक वर्ग को खाध सामग्री की चिन्ता से मुक्ति मिली और वे व्यापार , वाणिज्य और शिल्प कलाओं मे लग गये । …खेती  के लिये पशुओं की आवशयकता पडी । विशेष रुप से उन पशुओं की जो कृषि के काम आते थे जबकि  ब्राहम्ण धर्म की कर्मकाण्डीय यज्ञ परम्परा मे बलि दी जाती थी । इससे एक धार्मिक द्धंदं खडा हुआ । कृषक वर्ग और शिल्प या वाणिज्य से जुडे हुये लोगों ने ब्राहम्णीय परम्परा का विरोध किया ।

राम शरण शर्मा के अनुसार , “ वैदिक प्रथानुसार पशु अंधाधुंध माए जा रहे थे , यह खेती की प्रगति मे बाधक हुआ । यदि नई कृषि मूलक अर्थव्यवस्था को बचाना था तो पशुधन को संचित करना आवाशयक था । ” इस समय जितने भी नास्तिक संप्रदाओं ने पनपना प्रारम्भ किया सबने ब्राहम्णीय व्यवस्था का विरोध किया । इन सबमें बौद्ध और जैन धर्मों का स्वर सर्वाधिक तीव्र था । इन संप्रदाओं ने पशुओं को सुखदा और अन्नदा कहा और उनके वध का विरोध किया ।

यह समय व्यापार , वाणिज्य एवं नगरीय क्रांति का समय था । ६००-३२३ ई.पू. में लगभग ६२ नगरों का अस्तित्व था । व्यापार वाणीज्य से प्राप्त धन को एकत्र कर के वैशय वर्ग ने अपने निवास नगरों मे बनाये ।….. व्यापारियों ने निरंतर ब्राहम्णीय व्यवस्था का विरोध किया । एक अन्य कारण वैशव वर्ग का इन सम्प्रदाओं की ओर आकर्षित होना था क्योंकि व्यापार से इस वर्ग ने अकूत धन प्राप्त कर लिया था जब्कि हर तरफ़ महत्ता ब्राहम्णॊ की थी वह इस समृद्ध वर्ग को स्वीकार नही हुआ । अनाथपिण्डक , घोषित जैसे विभिन्न श्रेषठियों ने इसी कारण बौद्ध/जैन सम्प्रदाओं को मुक्त हस्त दान दिया । ऋण का कार्य ब्राहम्णीय परम्पराओं मे दूषित कार्य कहा गया था जबकि यह वैशवों तथा व्यपारियों का मुख्य कार्य था ।…. इन सबके अतिरिक्त नास्तिक सम्प्रदाओं का उदय चूँकि ब्राहम्णीय परम्परा के विरुद्ध हुआ था इसी कारण उनकी सहानुभूति हर उस वर्ग के प्रति थी जो आर्थिक रुप से कमजोर था और इसी  कारण इन समस्त वर्गॊ ने तन , मन और धन से इन सम्प्रदाओं के वर्धन हेतु कार्य किया । इन सम्प्रदाओं का ऐसा दृष्टिकोण बुद्ध के उस कथन से मिलता है जिसमे उहोने कहा कि , “ कृषकों को बीज , श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक और व्यवसासियों को धन देना चाहिये । “

धार्मिक कारणॊं के चलते हुये भी जैन/ बौद्ध सम्प्रदाऒ के उदय को बल मिला । ब्राहम्णीय व्यवस्था , देवों की कृपा को मानवों के शुभ के लिये आवशयक मानती थी । देवों को प्रसन्न करने के लिये विभिन्न उपाय किये जा रहे थे जो अब कर्मकाण्डॊं में बदल गये थे और जटिल से जटिलतर होते जा रहे थे । वैदिक ऋचाओं का स्थान मंत्रों ने ले लिया था तथा मंत्रों के माध्यम से देवों को वश मे करने की बात कही जा रही थी जो मंत्रों का ज्ञान नही रखते थे , वे अब जादू टोने तथा तंत्र  मंत्रों का सहारा लेने लगे थे । समाज का निम्म वर्ग इनके चक्कर मे फ़ँस कर भट्काव की स्थिति मे था । यह एक असंतोष का कारण बना ।पशु बलि और यज्ञीय कर्म कांडं  वे दूसरे तत्व थे जो सामान्य जनता को कष्ट ही देते थे । अनेक श्रोत यज्ञ कई –२ वर्षॊं तक चलते थे जिसमें यज्ञ कराने वाले को अनेकों दास – सासियाँ उपहार स्वरुप प्रदान की जाती थी । जहाँ  पहले ६ ऋषियों द्वारा यज्ञ कराया जाता था , उत्तर वैदिक काल मे आगे चलकर इनकी सँख्या १६ हो गयी थी | दूसरी ओर नास्तिक सम्प्रदाऒ   ने सदैव इसका विरोध किया । बुद्ध ने कहा , “ ब्राहम्ण , लकडी नही अपितु आन्तरिक ज्योति जला । “

सामाजिक कारणॊं का भी नास्तिक सम्प्रदाओं के उदय मे महती योगदान था । तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में चार वर्णॊं की स्थापना पूर्णरुपेण  हो चुकी थी तथा ब्राहम्ण एंव छत्रिय , दो सामाजिक उच्च वर्णॊ में सम्मलित थे जबकि वैशय एवं शूद्र को महत्व प्राप्त नही था । इस प्रकार समाज दो वर्गों मे विभाजित हो चुका था :

१. गैर उत्पादक वर्ग : ब्राहम्ण , छत्रिय

२. उत्पादक वर्ग : वैशय , शूद्र

समाज के उत्पादक वर्ग होते हुये भी उचित सम्मान न हो पाने के कारण वैशय एंव शूद्र वर्गों मे असंतोष व्याप्त था । इतना ही नही समाज का वर वर्ग जो उत्पादन मे कही शामित ही नही था सर्वाधित उपभोग करता था तथा इसे इसके पशचात अनेकों विशेषधिकार मिले हुये थे । तत्कालीन साहित्य से ज्ञात होता है कि गौतम , आपस्तंब आदि ऋषियों ने ऐसी व्यवस्था  बनाई थी कि ब्राहम्ण वर्ग को सर्वाधिक घोर अपराध करने पर भी सबसे कम द्ण्ड मिलता था । वैशव वर्ग व्यपार – वाणिजय के फ़लस्वरुप  अत्याधिक संपदा एकत्रित कर चुका था किन्तु उसे भी उचित आदर प्राप्त नही होता था । “  महाजनी , ऋण आदि जैसे कार्यों को ब्राहम्णीय व्यवस्था मे अपमान की दृष्टि से देखा जाता था “ राम शरण शर्मा

शूद्रों की दशा तो अत्यन्त खराब थी । शूद्र वध जैसे अपराध के लिये भी अपराधी को वही दण्ड दिया जाता था जो कौवे , उलूक आदि की हत्या के लिये दिया जाता था । मातंग जातक एवं चित्तसंभूत जातकों मे दी हुई कथायें शूद्रॊं पर होने वाले अत्याचारों का वर्ण करती है । नास्तिक सम्प्रदाय ने इन सबका प्रबल विरोध किया । जहाँ एक ओर वैशवों के ऋण , महाजनी एवं दास सम्बन्धी अधिकारों को मान्यता दी , वही बौद्ध धर्म ने सभी वर्णॊ के लिये अपने दरवाजे  खोल दिये । सामाजिक संदर्भ में भी बुद्ध ने जातिवाद का घोर विरोध किया , वस्तुत:  तपस्सु एवं भाल्लुक जैसे शूद्रॊ को बुद्ध ने संघ मे प्रथम प्रवेश दिया । विभिन्न धार्मिक पाखंडो एवं यज्ञीय कर्मकांडो का उन्होने विरोध किया तथा सरल और आडम्बररहित  मार्ग का प्रतिपादन किया । बुद्ध ने अपने सिद्धांत पालि भाषा मे दिये जो जनसामान्य एवं लोकोन्मुखी स्वरुप को दर्शाता है ।  बुद्ध ने कर्मकांडो का विरोध करने के पीछे मुख्य तर्क यह दिया कि समाज मे जन्म के अनुसार कोई उच्च या निम्म नही होता है । उच्चता का निर्धारण कर्म से होता है ।  इसी प्रकार ब्राहम्ण एवं छत्रियों ने भी नास्तिक सम्प्रदाओं जैसे बौद्ध एवं जैन सम्प्रदाओं का सहयोग किया ।

आशर्चजनक तथ्य यह कि बुद्ध जिन उच्च जातियों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे संघ मे सम्मिलित होने का उनका प्रतिशत सर्वाधिक था यथा –

जाति  आवृति प्रतिशत
छत्रिय 706 51.5%
ब्राहम्ण 400 29.1%
वैशव 155 11.02%
शूद्र 110 8.3%

भिक्षुओं का जातीय आधार ( विनय एवं सुत्त पिटक के आधार पर ) साभार : श्री आलोक पान्डॆ

राजनैतिक कारणो का नास्तिक सम्प्रदाओं के उदय मे दो प्रकार से सकरात्मक उपयोग रहा ।

१. ब्राहम्ण – राजन्य द्धंद

२. गणराज्यों का स्वतंत्र वातावरण

ब्राहम्ण एवं क्षत्रिय राजन्य वर्ग के मध्य उत्तरवैदिक काल से द्धंद आरम्भ हो चुका था । प्रवाहण्जाबालि , अशवपति तथा मिथिला के विदेह जैसे विद्धान ने कई ब्राहम्णॊ को ज्ञान के स्तर पर पिछाडा था । परिस्थितियाँ ऐसी थी कि ब्राहम्ण हर ओर से लेने वाले थे जबकि क्षत्रियों को देना भी पडता था ऐसी स्थिति में द्धंद सामने जब आया तो वास्तविक शक्ति क्षत्रियों को देकर ब्राहम्ण ने आदरसूचक प्रथम स्थान ले लिया । ऐसी स्थिति में नास्तिक संप्रदाओं ने राजन्य वर्ग का पक्ष लिया और इसी कारण इस वर्ग का समर्थन हासिल किया । अजातशत्रु , बिम्बसार , प्रसेनजित और आगे चलकर अशोक आदि का समर्थन बौद्ध एंव जैन धर्मॊ को न मिला होता तो इन धर्मॊ का वास्तविक रुप कुछ और ही होता ।

हाल ही में रिलीज हुई “ OH MY GOD “ जिन्होने देखी हो वह आसानी से समझ सकते हैं कि अवतार कैसे और क्यूं बनाये जाते हैं । फ़िल्म में परेश रावल ( कांजीलाल  की भूमिका में ) जब ईशवर के होने या न होने पर प्रशन खडा करता है , धर्म के नाम पर धन्धा कर रहे धंधेवाजों की जब पोल खोलने लगता है तो अंत मे वही दुकान चलाने वाले उसको ही अवतार घोषित कर देते हैं ।  देखिये एक झलक OH MY GOD से  http://youtu.be/BkO4Hgg4YMI

बुद्ध को अवतार साबित करना महज एक दिखावा और ढोंग है , सच तो यह है कि बुद्ध धम्म और  हिंदू धर्म में कही दूर दूर तक कोई समानता नही है ,  हाँ समानता है कि हिन्दू  , जैन , सिक्ख और चार्वाक दर्शन की तरह बुद्ध धम्म का दर्शन भी भारत की गौरवशाली पंरपरा से ही उत्पन्न हुआ है . यह विदेशी संस्कृतियों की तरह किसी को जबरन या लालचवश  धर्मातरण पर मजबूर नही करता , किसी के ऊपर बिलावजह अत्याचार करने की अनुमति नही देता , हाँ कुछ सोचने को मजबूर अवशय करता है  । यह आप पर निर्भर करता है कि अपने द्धीप आप अवंय बनना चाहते हैं या दूसरे के सहारे अपनी नैया पार करना चाहते हैं ।

अप्प दीपो भव ! ( अपना प्रकाश स्वयं बनो )  Be your own LAMP !  Realize yourself and the World !!

डॉ प्रभात टन्डन

कबीर – एक महान क्रन्तिकारी

kabeerकबीर – एक महान क्रन्तिकारी – कबीर साहब के आश्रम के पास एक मंदिर था। एक दिन कबीर साहब की बकरी मंदिर के अन्दर प्रवेश कर गयी। मंदिर का पुजारी ब्राम्हण कबीर साहब के पास पहुंचा और कहा ‘कबीर’! तुम्हारी बकरी मंदिर में प्रवेश कर गयी है जो ठीक नहीं है। कबीर साहब ने जवाब दिया – पंडित! जानवर है, प्रवेश कर गयी होगी, मै तो नहीं गया। जवाब सुनकर मंदिर का पुजारी ब्राह्मण निरुत्तर हो गया।

ऐसे बाहर के कई संगठन / प्रकाशक हैं जो बुद्ध साहित्य से जुडी किताबों का निशुल्क वितरण का काम करते हैं

ऐसे बाहर के कई संगठन / प्रकाशक हैं जो बुद्ध साहित्य से जुडी किताबों का निशुल्क वितरण का काम करते हैं , उनसे संपर्क किया जा सकता है । ऐसे ही ताईवान की एक संस्था है , “ The Corporate Body of the Buddha Educational Foundation, Taiwan ” जो अंगेजी के अलावा हिन्दी और अन्य कई भारतीय भाषा में पुस्तके छापती और वितरित करती है। डा अम्बेडकर की “ भगवान बुद्ध और उनका धम्म “ मुझे इसी संस्था से निशुल्क प्राप्त हुय़ी थी “ The Corporate Body of the Buddha Educational Foundation, Taiwan ” की साईट पर जाने के लिये http://www.budaedu.org/en/book/ पर जायें । कम संख्या मे व्यक्तिगत रूप से मगाने के लिये आन्लाइन फ़ार्म भरें और अधिक संख्या के लिये फ़ैक्स/मेल/ से संपर्क करें जिसका विवरण इनकी साइट पर उपलब्ध है ।
हिन्दी / पालि/और अन्य भारतीय भाषाओं में पुस्तकों की लिस्ट http://www.budaedu.org/en/book/II-08main.php3 पर उपलब्ध है । इसके अलावा अगर आप कम्पयूटर पर pdf के जरिये पढना चाहते हैं तो कुछ पुस्तकों को सीधे अपने सेट मे डाउअनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये http://www.budaedu.org/ebooks/6-IN.php पर जाये । हाँ , डा अम्बेडकर की “ भगवान बुद्ध और उनका धम्म “ पुस्तक उपभ्ध है , इसको सीधे फ़ार्म भरकर ही मँगाया जा सकता है ।

A comment by Dr Prabhat Tondon

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25-APRIL-2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- “शूद्र ,अछूत,राक्षश,हरिजन की तरह “दलित” शब्द भी कलंक है इसे त्यागो, अपने लिए सम्मानजनक सम्बोधन चुनो बहुजन/बौद्ध बनो” …समयबुद्धा

जब भगवन बुद्धा ने हमको बहुजन और श्रमण कहा जब साहब कांशीराम ने हमें बहुजन बनाने को कहा, जब बाबा साहब ने कभी हमें दलित नहीं कहा, तो फिर हमारे लोग अपने लिए विरोधियों का दिया हुआ नाम दलित क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं|खुद को दलित कहने से आपको केवल अपमान ही मिलेगा, हो सकता है जरा सी झूठी सहानुभूति मिल भी जाए पर अगर सम्मान चाहिए तो आपको बहुजन बौद्ध बनना ही पड़ेगा | ये जिन्दगी का नियम है की कमजोर कोई कोई नहीं और शक्तिशाली का सब साथ देते हैं|आखित कब तक आप दलित बने रहोगे ?
कुछ बेवकूफों को अपने शूद्र होने का अफ़सोस नहीं है बल्कि अपनी विरोधियों का गुलाम होने में फक्र है

“ज्ञात हो कि शूद्र ,अछूत,राक्षश की तरह “दलित” शब्द भी धम्म विरोधियों द्वारा फैलाया गया भ्रामक जाल है जो भारतीय बहुजनों  की इस पीढ़ी और आने वाली पीढयों को मानसिक रूप से कमजोर बनाये रखेगा। दलित शब्द कलंक है इसे त्यागो,अपने लिए ऐसे सम्भोधन चुनो जो आपकी शक्ति दिखाए कमजोरी नहीं| दलित शब्द कमजोरी बताता है,खुद को बौद्ध कहो और गौरवशाली विजेता बौद्ध इतिहास से जोड़ो |खुद को बहुजन कहो, बहुजन शब्द जनसंक्या बल दर्शाता है जिसमें सभी 6000 जातियां में बटे भारतीय लोग आते हैं|इन छह हज़ार जातियों में से कुछ को छोड़कर ९५% जातियां कभी खुद को दलित कहलवाना पसंद नहीं करेंगी, इससे तो वो हिन्दू रहना पसंद करेंगे| कमजोर के साथ कोई नहीं जुड़ना चाहता|इन छह हज़ार जातियों में कई जातियां ऐसी हैं जो उन्नत हैं वे बहुजन होते हुए भी अपने भाइयों से घृणा करते हैं उनपर अत्याचार करते हैं क्योंकि वो खुद को हिन्दू और इनको दलित समझते हैं|जबकि बहुजन निति कहती है की हमें ऐसे लोगों को अगड़े बहुजन और दलितों को पिछड़े बहुजन कहना और कहलाना होगा|इससे इन लोगों को लगेगा की हाँ दोनों ही बहुजन हैं| ये बहुत गहरी बात है गहरी नीति है इसे समझने के लिए उतना मानसिक स्थर होना जरूरी है | इज्ज़त मांगी नहीं जाती कमाई जाती है,जब तुम अपनी इज्ज़त खुद करोगे तभी तो दुनिया भी करेगी

धम्म विरोधियों की सबसे बड़ी ताकत ये है की उनमे से एक निति बनता है और बाकि साब उसको मानते हैं चलते हैं क्योंकि उनमें उस निति को समझने कीक्षमता होती है| वहीँ हमारे लोगों को नीति समझ में ही नहीं आती अपने दिमाग में जो भी भरा है वो उसे बदलने को टायर नहीं उल्टा विरोध करते हैं|उदाहरण के लिए छह हजार जातियों में बंटे भारत की संतानों को हम उनकी अलग अलग जाती से और आंबेडकरवादियों को दलित कहकर सम्भोदित करने की बजाये  हम कहते हैं की इन सभी को भगवन बुद्धा और साहब कांशीराम का दिया हुआ नाम “बहुजन” कहो|जब तक दलित बने रहोगे आपके अपने लोग जो SC/ST/OBC/Minorities में आते हैं वही आपके साथ नहीं जुडेगें| जब तक संगठित नहीं होगे तो स्तिथि कैसे बदलेगी|दलित को दलित बनाये रखने के लिए वो लोग संगर्ष कर रहे हैं आप अपने को उठाने के लिए क्या कर रहे हो|हमारे लोग अक्सर शिकायत करते मिल जायेंगे की वैदिक/ब्राह्मण धर्म का नाम बदल कर हिन्दू रख लिया |उनमें निति बने समझने और सामूहिक रूप से लागू करने क्षमता थी, उन्होंने समय और परिस्थिति को समझ कर नाम रखने और बदलने की निति लागू की,संगठन देखिये की बाकि के सभी मनुवादियों ने इस नाम का महत्व समझा और अपनाया,क्या हमारे लोगों में है ये क्षमता? |परिणाम इस निति से बहुत से बहुजन को अपने शूद्र होने का अफ़सोस नहीं है बल्कि हिन्दू होने का गर्व करते हैं और हमारे लोग केवल शिकायत करते हैं …. उस वर्ग विशेष का संगठन  देखिये की से लाख अन्याय होने के बावजूद कोई  विरोध नहीं करता| पर हमारे लोगों को देखो निति की कीमत और फायदा तो समझते नहीं हैं उल्टा भरपूर विरोध करते हैं |इस तरह क्या दलित अपनी दुर्दशा का खुद ही जिम्मेदार नहीं है ?

जातिसूचक शब्द, शूद्र ,अछूत,राक्षश की तरह “दलित”  शब्द का सम्भोदन आपको आपके विरोधियों द्वारा दिया गया है| उन्होंने आपको इन्हीं नामों से सरे इतिहास में बेईज्ज़त किया है|मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ क्या आप उन्हीं के दिए नामों में खुश हो?क्या आप अपने लिए कोई इज्जतदार नाम रखना या चुनना नहीं चाहते| आप आने लिए अपने लिखित और मौखिक व्यवहार  में बहुजन /बौध शब्द का प्रयोग कर विरोधियों को करने दो उनके बनाये शब्धों का प्रयोग आप खुद क्यों करते हो| समय आने पर उनको भी सम्मानजनक शब्द स्वीकार करने पर बाध्य होना  पड़ेगा| नाम में बहुत बात होई है हमारे लोग इसे नहीं समझ पाते|बस किसी भी तरह जैसे तैसे पैदा हो गए कुछ भी कलुआ,चंगु,मंगू ,अदि शब्दों से अपने आप नाम पड़ जाता है| नाम के आगे विजय को सूचित करता हुआ टायटल  तो इस्टेमाल करते ही नहीं है क्योंकि ये लोग अपना इतिहास ही नहीं जानते|जबकि इनके विरोधी अपना खानदानी नाम बड़े गर्व से अपने नाम के पीछे  लगाये घुमते हैं|कुछ सोचते ही नहीं बाद जैसे तैसे जीते हैं बेहतरी के लिए कुछ नहीं करना चाहते|जब अपना खुद का नाम आप नहीं रख पाते तो फिर अपनी कौम का नाम क्या रखोगे| तो बस आपके विरोधयों ने रख दिया जो उनकी अच्छा लगा| एक और बात है नाम में ज्यादा जोर देने से भी फर्क नहीं पड़ेगा ये कर्मों से जुड़ा होता है| उदाहरण के लिए सफाई कर्मचारी को नाम बदल कर राजाधिकारी रख दे पर वो अपना काम न बदले तो जब भी राजाधिकारी नाम बोल जायेगा तो वो निम्नता को ही सूचित करेगा| केवल अच्छा नाम रख लेबे से भी समाधान नहीं होगा उसे अच्छा बनाना  भी होगा|

अछूतपन बौद्धों पर लगाया गया कलंक है, हमे इससे खुद को और बाबा साहब को आजाद करने की जरूरत है। तभी बाबा साहब के सपने को साकार कर पाएंगे। बाबा साहब ने हमे दलित नाम नहीं दिया था, उन्होने हमे केवल ‘अनुसूचित जाति’ नाम दिया था और अपने अनुयायियों से बौद्ध धम्म अपनाने की अपील की थी। उनके 2 बड़े सपने थे, पहला की कोई अनुसूचित जाति का व्यक्ति भारत का हुक्मरान हो, और दूसरा की ये लोग बौद्ध धम्म का सारे संसार मे प्रचार करें, बौद्ध धम्म का प्रचार करना ही मानवता की सेवा करना है। इनके अनुयाई अपने बाबा साहब के सपनों से बहुत दूर दिखाई देते हैं, बाबा साहब ये सारे काम अपने जीवन मे ही करना चाहते थे पर उम्र ने साथ नहीं दिया। उन्होने अपने धर्म ग्रहण के 15 वर्षों के अंदर भारत के बौद्ध देश होने की कल्पना की थी, ये लोग अभी भी ‘दलित’ जैसे घटिया तमगों से चिपके हुए हैं। सपना क्या खाक पूरा करेंगे!!!!!!!!!!!!!!!

इस देश में बौद्ध क्रांति होकर दबा दी गई, बाबा साहब आंबेडकर आके चले गए, पर अफ़सोस कुछ जागरूक लोगों को छोड़कर बाकी पूरा बहुजन समाज आज भी सो रहा है| इस देश में बहुजन ने अपने उद्धारक को  देखने को आँखे नहीं खोली, उनकों सुनने को कान नहीं खोले, उनके बारे में अपनी अगली पीढ़ी को बताने को अपनी जबान नहीं खोली|बहुजनों की दुर्दशा केवल इसलिए नहीं है क्योंकि उसके विरोधी धनि और शक्तिशाली हैं बल्कि इसलिए भी है क्योंकि वो 6000 से ज्यादा जातियों में बटा हुआ है|जब एक जाती का दमन होता है तो बाकि 5999 जातियां चुपचाप देखती और दमन करने में परोक्ष या अपरोक्ष रूप से विरोधितों की मदत करती हैं|अफ़सोस डॉ आंबेडकर और भगवान् बुद्धा जो की समस्त बहुजन समाज के मार्गदाता  हैं सारा अन्भिग्ये बहुजन समाज उनको केवल दलितों तक सीमित रककर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं”.

बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने १९५६ में बुद्ध के धम्म की दीक्षा ली, परन्तु वास्तविक बुद्ध का प्रचार 1932-1935 से ही सुर किया था, बाबासाहेब डॉ. आम्बेकर ने जितने भी उपदेश लोगो को दिए उसमे अनेको बार बुद्ध का उल्लेख करने मे कोई कही कसर नहीं छोड़ी है। इसके अनेको भाषणों के उदारण दे सकते है। 9/10/2012 का आदरणीय बहन मायवती का भाषण सुना, लगभग आ. बहन मायवती ने 100 जादा बार दलित शब्द का प्रयोग करके बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, के बुद्धवाद का अपमान करने में कोई कसर नहीं छोडती। इनके साथ इनके कार्यकर्ता भी बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर का अपमान करने में कही कसर नहीं छोड़ते। इसी प्रकार बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, के नाम से चलने वाले गैर राजनेतिक संघटन, चाहे बामसेफ हो या और कोई भी बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, के बुद्धवाद का अपमान करने में कही कोई कसर नहीं छोड़ते।

जो लोग दलित-शुद्र-अतिशूद्र शब्दों का प्रयोग करते है, उनसे निवेदन है की उन्होंने Dr. Ambedkar, writing & Speeches, सम्पूर्ण खंड पड़े और विशेष करके Vol. 18-3 पड़े। दलित-शुद्र-अतिशूद्र यह शब्द बुद्धिज्म के विकास के लिए कैसे घातक है, यह डॉ. आम्बेडकर ने अपने भाषणों से लोगो को समजाया है। (Ref. Dr. Ambedkar, writing & Speeches, Vol. 18-3,) और यह भी स्पष्ट किया है की मेरे जीवनकाल के अंतिम दिन बुद्ध के प्रचार के लिए समर्पित करूंगा। जिन लोगो ने दलित इस शब्द को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल की है और दलित-शुद्र-अतिशूद्र शब्दों का प्रयोग करते है यह लोग दुनिया में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के घोर विरोधी और डॉ. आंबेडकर के बौद्धवाद के हत्यारे है।

the bombay cronical

हमारे लोग हर वक़्त खुद पर हुए अन्याय की   शिकायत करते रहते हैं , ठीक है कीजिये जनजागरण भी जरूरी है|अगर पुराने अत्याचार की चर्चा नहीं करेंगे तो आज की  आराम तलब पीढ़ी को कैसे पता चलेगा की ये समय आराम का नहीं शक्ति इकठ्ठा करने का है|इस सब प्रचार प्रसार में मेरी इच्छा ये है की जब भी कोई कहीं कोई शिकायत या अत्याचार की चर्चा करता है वो उसके अंत में उसका  समाधान निति, जो भी उसके मन में हो जरूर लिखे|कमेंट में भी लोग समाधान लिखें| आज बहुजन के बड़ते वर्चस्व की शिकायत ब्राह्मणवादी लोग तो नहीं कर रहे उनका जवाब होता है – हर बार नई नीति बनाते और लागू करते हैं | हमारे लोग क्यों निति नहीं बनाते, अगर कोई बनाये भी तो बाकि उसे नहीं समझते, उद्धरण के लिए मैंने हर बार कहा की दलित शब्द का प्रयोग न करो पिछड़े बहुजन कहो, ओ बी सी को अगड़े बहुजन कहो, एस टी को आदिवासी बहुजन कहो| हम सब बहुजन हैं इस शब्द से ही सबकी संबोधित करो तो आपस में एक होने की भावना जागृत होगी| पर क्या इस बात को कोई समझा, हमारे लोग बड़े गर्व से दूसरों का दिया नाम दलित लगा कर घूम रहे हैं और सारे संगर्ष पर पानी फेर रहे हैं| ध्यान रहे कमजोर का कोई नहीं होता जब तक दलित बने रहोगे आपके अपने लोग ओ बी सी और एस टी भी आपका साथ नहीं देंगे, वो भी घृणा करेंगे|

…समयबुद्धा

jileraj@gmail.com

बौद्ध धम्म मत ने पंडित दामोदर स्वामी को बनाया राहुल सांकृत्यायन

बौद्ध  धम्म मत ने पंडित दामोदर स्वामी को बनाया राहुल सांकृत्यायन
 
भगवान् बुद्धा ने कहा है “मोह में हम किसी की बुराई नहीं देख पते और घृणा में किसी की अच्छाई ” 
 
आज बौध धर्म का सबसे बड़ा नुक्सान ये बात कर रही है की ये दलितों का धर्म है जिसके वजह से इसे लोग समझने के लिए भी तयार नहीं जबकि ये वो मत है की इसे जो भी एक बार ठीक से समझ ले उसे फिर दुनिया में किसी भी धर्म के सिद्धांत खोकले लगते हैं। कहा जाता है जी बौध और ब्राह्मण एक दुसरे के परस्पर विरोधी रहे हैं पर असल में ये बात केवल राजनेतिक कारणों से ही सही है। धार्मिक कारणों से तो क्या ब्राह्मण क्या मुसलमान क्या इसाई क्या अन्य कोई बौध मत के आगे कोई ज्यादा देर तक इसे अपनाने से खुद को नहीं रोक सकता। ऐसा इसलिए नहीं की ये सबसे अच्छा धर्म है बल्कि इसलिए की केवल यहाँ सत्य और तर्क  ज्यादा  है बाकि जगह कल्पना,गुटबाजी और पुरोहितवाद ज्यादा है । इसी कड़ी में प्रस्तुत है बौध धम्म महाज्ञाता श्री  राहुल सांकृत्यायन का छोटा सा परिचय :

बौध धम्म महाज्ञाता श्री  राहुल सांकृत्यायन (जन्म- 9 अप्रैल, 1893; मृत्यु- 14 अप्रैल, 1963) को हिन्दी यात्रा साहित्य का जनक माना जाता है। वे एक प्रतिष्ठित बहुभाषाविद थे और 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में उन्होंने यात्रा वृतांत तथा विश्व-दर्शन के क्षेत्र में साहित्यिक योगदान किए। बौद्ध धर्म पर उनका शोध हिन्दी साहित्य में युगान्तरकारी माना जाता है, जिसके लिए उन्होंने तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक भ्रमण किया था।

राहुल सांकृत्यायन जी का जन्म 9 अप्रैल, 1893 को पन्दहा ग्राम, ज़िला आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। राहुल सांकृत्यायन के पिता का नाम गोवर्धन पाण्डे और माता का नाम कुलवन्ती था। इनके चार भाई और एक बहिन थी,  भाइयों में ज्येष्ठ राहुल जी थे। पितृकुल से मिला हुआ उनका नाम ‘केदारनाथ पाण्डे’ था। बचपन से ही वे अन्धविश्वास और कर्मकांड को पसंद नहीं करते थे,धर्म की जिज्ञासा पूर्ती उन्हें  सन् 1930 ई. में  लंका में बौद्ध मत को समझने से मिली जिसके बाद उन्होंने बौध मत को हिंदी में उपलब्ध करने में अपना सारा जीवन लगा दिया । उन्होंने भगवान् बुद्धा और उनके धम्म मार्ग से पिता के सामान प्रेम किया और खुद को बेटा मानकर भगवान् बुद्धा के बेटे राहुल के नाम पर अपना नाम भी राहुल रख लिया ।बौद्ध होने के पूर्व राहुल जी ‘दामोदर स्वामी’ के नाम से भी पुकारे जाते थे। ‘राहुल’ नाम के आगे ‘सांस्कृत्यायन’ इसलिए लगा कि पितृकुल सांकृत्य गोत्रीय है।

कट्टर सनातनी ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी सनातन या ब्राह्मण या हिन्दू धर्म की रूढ़ियों को राहुल जी ने अपने ऊपर से उतार फेंका और जो भी तर्कवादी धर्म या तर्कवादी समाजशास्त्र उनके सामने आते गये, उसे ग्रहण करते गये और शनै: शनै: उन धर्मों एवं शास्त्रों के भी मूल तत्वों को अपनाते हुए उनके बाह्य ढाँचे को छोड़ते गये।

सनातन धर्म से, आर्य समाज से और बौद्ध धर्म से साम्यवाद-राहुल जी के सामाजिक चिन्तन का क्रम है, राहुल जी किसी धर्म या विचारधारा के दायरे में बँध नहीं सके। ‘मज्झिम निकाय’ के सूत्र का हवाला देते हुए राहुल जी ने अपनी ‘जीवन यात्रा’ में इस बौध धर्म पर अपने हिंदी साहित्य का स्पष्टीकरण इस प्रकार किया है-
“बड़े की भाँति मैंने तुम्हें उपदेश दिया है, वह पार उतरने के लिए है, सिर पर ढोये-ढोये फिरने के लिए नहीं-तो मालूम हुआ कि जिस चीज़ को मैं इतने दिनों से ढूँढता रहा हूँ, वह मिल गयी”।385px-Rahul_Sankrityayan

बौध धर्म पर उनके कुछ हिंदी लेखन निम्न प्रकार से हैं
*  बुद्धचर्या’ (1930 ई.)
*  धम्मपद’ (1933 ई.)
*  विनय पिटक’ (1934 ई.)
*  महामानव बुद्ध’ (1956 ई.)
*  मज्झिम निकाय – हिंदी अनुवाद (1933)
*  दिघ निकाय –  हिंदी अनुवाद  (1935 ई.)
*  संयुत्त निकाय –  हिंदी अनुवाद
*  ऋग्वैदिक आर्य 
*  दर्शन दिग्दर्शन 
*  तुम्हारी  क्षय – भारतीय जाती व्यवस्था, चल चलन पर व्यंग

घुमक्कड़ी स्वभाव वाले राहुल सांकृत्यायन सार्वदेशिक दृष्टि की ऐसी प्रतिभा थे, जिनकी साहित्य, इतिहास, दर्शन संस्कृति सभी पर समान पकड़ थी। विलक्षण व्यक्तित्व के अद्भुत मनीषी, चिन्तक, दार्शनिक, साहित्यकार, लेखक, कर्मयोगी और सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत रूप में राहुल ने जिन्दगी के सभी पक्षों को जिया। यही कारण है कि उनकी रचनाधर्मिता शुद्ध कलावादी साहित्य नहीं है, वरन् वह समाज, सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, विज्ञान, धर्म, दर्शन इत्यादि से अनुप्राणित है जो रूढ़ धारणाओं पर कुठाराघात करती है तथा जीवन-सापेक्ष बनकर समाज की प्रगतिशील शक्तियों को संगठित कर संघर्ष एवं गतिशीलता की राह दिखाती है। ऐसे मनीषी को अपने जीवन के अंतिम दिनों में ‘स्मृति लोप’ जैसी अवस्था से गुजरना पड़ा एवं इलाज हेतु उन्हें मास्को भी ले जाया गया। पर घुमक्कड़ी को कौन बाँध पाया है, सो अप्रैल १९६३ में वे पुन: मास्को से दिल्ली आ गए और १४ अप्रैल, १९६३ को सत्तर वर्ष की आयु में दार्जिलिंग में सन्यास से साम्यवाद तक का उनका सफर पूरा हो गया पर उनका जीवन दर्शन और घुमक्कड़ी स्वभाव आज भी हमारे बीच जीवित है।राहुल जी घुमक्कड़ी के बारे मे कहते हैं:

“मेरी समझ में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है घुमक्कड़ी। घुमक्कड़ से बढ़कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता। दुनिया दुख में हो चाहे सुख में, सभी समय यदि सहारा पाती है तो घुमक्कड़ों की ही ओर से। प्राकृतिक आदिम मनुष्य परम घुमक्कड़ था। आधुनिक काल में घुमक्कड़ों के काम की बात कहने की आवश्यकता है, क्योंकि लोगों ने घुमक्कड़ों की कृतियों को चुरा के उन्हें गला फाड़–फाड़कर अपने नाम से प्रकाशित किया। जिससे दुनिया जानने लगी कि वस्तुत: तेली के कोल्हू के बैल ही दुनिया में सब कुछ करते हैं। आधुनिक विज्ञान में चार्ल्स डारविन का स्थान बहुत ऊँचा है। उसने प्राणियों की उत्पत्ति और मानव–वंश के विकास पर ही अद्वितीय खोज नहीं की, बल्कि कहना चाहिए कि सभी विज्ञानों को डारविन के प्रकाश में दिशा बदलनी पड़ी। लेकिन, क्या डारविन अपने महान आविष्कारों को कर सकता था, यदि उसने घुमक्कड़ी का व्रत न लिया होता। आदमी की घुमक्कड़ी ने बहुत बार खून की नदियाँ बहायी है, इसमें संदेह नहीं, और घुमक्कड़ों से हम हरगिज नहीं चाहेंगे कि वे खून के रास्ते को पकड़ें। किन्तु घुमक्कड़ों के काफले न आते जाते, तो सुस्त मानव जातियाँ सो जाती और पशु से ऊपर नहीं उठ पाती। अमेरिका अधिकतर निर्जन सा पड़ा था। एशिया के कूपमंडूक को घुमक्कड़ धर्म की महिमा भूल गयी, इसलिए उन्होंने अमेरिका पर अपनी झंडी नहीं गाड़ी। दो शताब्दियों पहले तक आस्ट्रेलिया खाली पड़ा था। चीन, भारत को सभ्यता का बड़ा गर्व है, लेकिन इनको इतनी अक्ल नहीं आयी कि जाकर वहाँ अपना झंडा गाड़ आते।”

पुरस्कार
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन को सन् 1958 में ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ और सन् 1963 भारत सरकार द्वारा ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया।

मृत्यु
राहुल सांकृत्यायन को अपने जीवन के अंतिम दिनों में ‘स्मृति लोप’ जैसी अवस्था से गुजरना पड़ा एवं इलाज हेतु उन्हें मास्को ले जाया गया। मार्च, 1963 में वे पुन: मास्को से दिल्ली आ गए और  अप्रैल, 1963 को सत्तर वर्ष की आयु में संन्यास से साम्यवाद तक का उनका सफर पूरा हो गया।

 Below Photo provides to us by   

Dr. Jaywant Khandare
S.R.F(Pali Language)
Rashtriya Sanskrit Sansthan(Deemed University)
Lucknow Campus .Lucknow, UP INDIA.

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‘DHAMMDAAN MAHADAAN’ DHAN SE VICHARON KA PRACHAR UTTHAN KA EKMATRA MARG HAI

 
“धम्म दान महादान’ धन से विचारों का प्रचार ही उत्थान का एकमात्र मार्ग है
 
 
“धम्म दान महादान’ धन से विचारों का प्रचार ही उत्थान का एकमात्र मार्ग हैबाबा साहेब द्वारा लिखित “भगवन बुद्धा और उनका धम्म” जैसी 300-400 पन्नो की किताब मार्किट में करीब 300-400 रूपए की ही बिकती है। इतने रूपए हमारे गाँव में बसने वाली जनता के लिए खर्च करना मुश्किल है।पर उन तक बाबा साहेब और भगवान् बुद्धा का सन्देश पहुचना जरूरी है ,तो ये समाज के सक्षम लोगों का फर्ज बनता है की वे ऐसी पुस्तकें गाँव में पहुचने के लिए समयबुद्धा मिशन ट्रस्ट की मदत करें। किताबें एक हज़ार के लौट में छपती  हैं, 300-400 पन्नो की किताब के कागज़,टाइप और छपाई का एक हज़ार किताबों के लौट की लगत करीब  50000 है या कहें  1 किताब का खर्च करीब 50 रूपए मात्र आता है जो की 300-400  रूपए की बिकती है। हम जानते हैं की एक हज़ार से कम के लौट में छापी नहीं होगी और होगी तप बहुत महंगी पड़ेगी दूसरा  एक आदमी अकेला 50000 रूपए आज की तरीक में खर्च नहीं करेगा, जागरण या साईं संध्या करवा लेगा पर  बौध धम्म के नाम पर तो नहीं करगा पर क्या एक आदमी 5000 रूपए भी खर्च नहीं करेगा।
 
इस हिसाब से पचास हज़ार की रकम इकट्टा करने के लिए पाच हज़ार के दस दानदाता चाहिए जिससे 1000 किताबे छपेंगी और हर किसी के हिस्से में सौ किताबें आएँगी बाटने के लिए जिसे वो हमसे ले सकता है या हमारे संसथान को दूर गाँव में बांटने के लिए छोड़ सकता है। कई लोग अपनी तस्वीर और दान को दिखाना चाहते हैं तो वो भी इस किताब में छापा जा सकता है । 
 
क्या कोई है जो ऐसा करने का इच्छुक हो, जब 10 आदमी हो जयगे तभी पैसे लिए जायेंगे वो भी चेक से या ड्राफ्ट से। इसी तरह अगर बीस आदमी हो जाये तो हर आदमी को केवल ढाई हज़ार देना होगा और उसे 50 किताबें मिल जाएँगी।
 
इसी तरह हम हर साल कलेंडर छापते हैं जिसमें केवल बौध की तस्वीर ही नहीं होती बल्कि लिखित सन्देश भी होते हैं जैसे
 
-बौध धर्म पर 10 बुनियादी सवाल-जवाब जैसे हमारा धार्मिक किताब,चिन्ह,स्थल,परंपरा  त्यौहार अदि क्या है
-भगवन बुद्ध के प्रभावशाली वचन
-धम्म प्रचार के चुने हुए प्रभावशाली सन्देश
 
अच्छा कलेंडर आज-कल करीब दस हज़ार के हज़ार छपते हैं, ज्यादा छपवाने पर उससे भी कम लगत आती है। मतलब अगर आप 1000 रूपए दान देते हैं तो आपको मिलता है एक सौ कलेंडर जिसे आप अपने हिसाब से बाँट सकते हैं ।केलेंडर की विशेषता है की ये साल भर टगा रहता है किताब की तरह कोने में नहीं होता और पूरा साल अनेकों लोग इससे प्रेरणा लेते हैं ।
 
नोट: समय बुद्धा मिशन ट्रस्ट के सभी कार्यकर्त्ता उछ शिक्षित, जुझारू, संगर्शील और आर्थिक रूप से सक्षम हैं जिनमे टुच्चापन नहीं है । बौध धम्म के प्रचार में समर्पित लोग ही कृपया आवेदन करे, बदनामी फ़ैलाने और हिम्मत तोड़ने वाले अलग रहें ।
 
आवेदन के लिए कृपया jileraj@gmail.com पर मेल करें  अपनी इच्छा प्रकट करें। एक लौट के मेम्बर पूरे होने के बाद आपको धन के लिए संपर्क किया जायेगा कृपया तब विश्वास न तोड़े ।
 
हमारा मकसद बौध धम्म का प्रचार है पर ये भी एक कडवा सच है की धन के  ये नहीं हो सकता । हम ये भी जानते हैं की अजनबी को धन देना एक विश्वास और अविश्वास का मुद्दा है । यदि आप ट्रस्ट में न देना चाहे तो   ट्रस्ट का ये काम आप लोग अपने खास विश्वस्निये दोस्त के साथ मिल कर भी कर सकते हो ।
 
 
ध्यान रहे अगर आप सौ रूपए कमाते हैं तो उसमें से अगर 5 रूपए धम्म संगठन पर खर्चा नहीं किया तो  पूरे  बचाने  के चक्कर में वो दिन दूर नहीं जब पूरे 100 रुपये छीनने वाले सामने होंगे ।
 
ध्यान रहे :
 
धन से धर्म चलता है, धर्म से संगठन चलता है और संगठन से सुरक्षा होती है और सुरक्षा ही सर्वोपरि जरूरत है, बाकि की सभी चीज़े जैसे रोटी,कपडा,माकन,शिक्षा,संसाधन,संतान अदि आत्म  सुरक्षा के बाद ही आते हैं ।

some videos and quotes on ASHOKA THE GREAT on ASHOKA JAYANTI (18-April)

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Documentary on Ashoka the Great- SamayBuddha Mishan

Bharat Ek Khoj- Episode on Ashoka the great SAMAYBUDDHA MISHAN

Bharat ek Khoj Episode on ASHOKA the great…SAMAYBUDDHA MISHAN

‘महान अशोक’ के “महान वचन” //”चाहे ‘मैं’ खाना, खाता होऊं, या ‘महल’ में ‘आराम’ कर रहा होऊं, चाहे ‘शयनगार’ में रहूँ या ‘उद्यान’ में, चाहे ‘बगीचे’ में ‘टहलता’ होऊ… या ‘सवारी’ पर होऊं’ या कहीं के लिए, ‘कूच’ कर रहा होऊं / हर ‘जगह’, हर ‘समय’ ‘प्रतिवेदक’ (फरियादी) ‘प्रजा’ का हाल मुझे ‘सुनाएँ //” ………….. सम्राट अशोक महान

सम्राट अशोक महान से पहले या बाद में कभी कोई ऐसा राजा या सम्राट नहीं हुआ जिसने अखंड भारत जितने बड़े भूभाग पर राज किया हो| सम्राट अशोक महँ का काल ही भारत का सबसे स्वर्णिम काल था जब भारत विश्व गुरु था सोने की चिड़िया था| साडी जनता खुशाल और बेदभाव रहित थी|कमाल की बात ये है की सम्राट अशोक महान की उन्हीं की मात्रभूमि भारत में नज़रअंदाज क्यों किया जा रहा है? क्या इसके पीछे भी वही घृणा की भावना है जो भगवान् बुद्धा, बाबा साहब जैसे महानतम महापुरुषों की महानता को न देख पाने की इच्छा के पीछे है| क्या हम इस सब को देखते हुए कह सकते हैं की अपने देश में अपना राज है?

The Emperor Ashoka who was the greatest and mightiest King of India. There was not a single king before him or after him who could rule such a huge Indian continent ever after. The only king who ruled and governed his kingdom with peace and love. The king on his reign India ws known as “Golden Bird”.
WHY is he been ignored in his own mother land???
Ur views??