सभी बहुजनों को महान बौद्ध सम्राट अशोक की जयंती (18 एप्रिल) की हार्दिक शुभकामनाएं…article-by-satyajit-maurya


**महान सम्राट अशोक की जयंती 18 एप्रिल 2013 को आती है**
महान सम्राट अशोक का नाम चीन देश के बौद्ध धर्म ग्रंथों के रिकॉर्ड के अनुसार चीन देश में अयुवंग (Ayuwang) है। बुद्ध की विश्वबन्धुता कि शिक्षा कई सदियों तक भारत के आसपास के देशों में मैत्री और सौम्सय की कड़ियों के बंधन में बन्धी थी और बन्धी है। बुद्ध की शिक्षा सीमाओं के परे प्रबल प्रचार हो रहा था, किन्तु भारतीय बौद्धानुयायियों को बुद्ध का विश्व ‘धम्म’ के रूप में उभरने की कोई अनुभूति नहीं थी। जब फाहियान चीन देश के ‘हान’ प्रदेश से जेतवन बौद्ध संघाराम (श्रावस्थी, उत्तर प्रदेश) में पहुचा तब भिक्षुओं का संघ फाहियान की अगवानी करते हुए आश्चर्यचकित हुवा की “सिमावर्तीय देशो के वासी भी हमारे नियमो की खोज करने यहाँ तक आ सकते है”।ashoka

महान सम्राट अशोक ने 273 BC to 232 BC. तक बुद्ध के विश्वबन्धुता के शिक्षा सर्वव्यापी-सर्वग्राही सहिष्णुता का प्रबल प्रचार एशिया के साथ पश्चिमी देशो में 84000 स्तुपो-शिलालेखों द्वारा और वाद-संवाद की आचार-सहिंता का व्यापक प्रचार भी किया था। यदि चीन भारत को अनेक वस्तुए भेज रहा था, तो भारत भी उसे बौद्ध धम्म द्वारा समृद्ध बना रहा था। 7-8 Century AD तक विश्व जगत में भारत की पहचान बुद्धत्तरभारत के नाम से थी और है। जिन बातो को दोहरा रहा हूँ वह इतिहास का अंग बन चुकी है, तभी इन सीधी-सपष्ट बातों की स्विकारोक्ति होनी ही चाहिए।

महान सम्राट अशोक के कार्यकाल के दौरान बुद्ध के महापरिनिर्वान के शरीर “अवशेष धातुओं” को 84,000 भागों विभाजित करके 84000 हजार स्तुपो का निर्माण किया था। और चीन देश के राजा को बुद्ध के शरीर ‘अवशेष धातु’ देकर उन्हें स्तूप बनवाने के आदेश दिए थे। और चीन देश के सम्राट ने चीन देश में 19 बौद्ध स्तूप बनवाकर एक स्तूप सम्राट अशोक के नाम से चीन देश के पश्चिमी जिन वंश (Ningbo City, Zhejiang, 265-316) में बनाया था। जहा बुद्ध के सिर के अवशेष धातु रखे है। मौजूदा सम्राट अशोक के विहार की इमारत को क्विंग राजवंश (1644-1840) के बाद पुनर्निर्माण किया गया। और इस नवीनीकरण का काम 1980 में पूरा करके बौद्ध सांस्कृतिक नैतिकमूल्यों की देखभाल की जा रही है।

महान सम्राट अशोक, विश्व जगत के इतिहास में मानव कल्याणकारी राजा थे, जिसके शासन में बुद्ध के धम्मकाया के नैतिकमूल्यों के आधार पर जपान से मिस्त्र तक बाली से लेकर यूनान तक समता-स्वातंत्र्य-बन्धुता और न्याय का सुवर्ण युग का विशाल भवन खडा था। नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री डॉ. अमर्त्य सेन के कथन के अनुसार सम्राट अशोक के काल में दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत की भागीदारी 35% थी। और सम्राट अशोक के काल में भारत जागतिक (ग्लोबल) महाशक्ति था। ”लेकिन उस महान सम्राट अशोक के जयन्ती को लेकर भारत सरकार,राज्य सरकार के साथ देश की जनता ओझल दिखाई देती है।इसका कारन क्या हो सकता है जरा सोचेंगे तो आप खुद ही समझ सकते हैं?

महान सम्राट अशोक के समय बौद्धकालखंड के अखंडभारत का बजेट 36 करोड़ का था, (Ref. Historical Geography of Ancient India by Sir Alexander Cunningham)। बौद्धकालीन अखंड भारत में बुद्ध के नैतिकमूल्यों के आधार पर जातीविहीन शील संपन्न गुणों से उच्च आदर्श विचारोका सामजिक विकास 92% था तो आर्थिक विकास दुनिया के “दो” रुपये तो भारत का “एक” रुपया था, सामाजिक-आर्थिक विषमता ना के बराबर। अगर बुद्ध की सामाजिक-आर्थिक निति ‘सामूहिक जीवनचर्या’ अर्थात 84000 स्तुपो और संघरामो से बौद्ध नैतिकमुल्यों के साथ अन्य विषयों की नि:शुल्क दी जाने वाली शिक्षा, खेतिका और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का राष्ट्रीयकरण यह सम्राट अशोक के राज्य की सामाजिक और आर्थिक नितिया थी। अगर यह बौद्ध सामाजिक और आर्थिक नीतिया कार्यांवित होती तो यह बजेट 1956 में 84 हजार लाख करोड़ होता, ओर भारत के आम आदमीकी महीने कि इन्कम 7 लाख 65 हजार होती।

महान सम्राट अशोक के सान्निध्य में बुद्ध की वादसंवाद की प्रतिबद्धता की परम्परा खुले विचार विमर्श के संवर्धन के समाधान का एशिया के उपमहाद्वीपो और पश्चिमी देशो का संसार का प्रथम समेलन का आयोजन ई.पूर्व. तीसरी शताब्दी में भारत में हुवा था। इस समेलन में विश्व जगत में बौद्ध नितिमुल्लयो के सभ्य संस्कृती में व्यक्तिक अधिकारों और स्वतंत्रा के प्रभाव के साथ पुलों-भवनों और प्राद्दोगिकी के संवर्धन की चर्चाये हुई थी। और इस समृद्ध शक्तिशाली अखंड ‘बुद्धत्तर’ भारत के परम्परा के स्त्रोत की गूंज अमेरिका स्थित “सयुक्त राष्ट्र संघ” में आज भी “व्यक्तिक अधिकारों और स्वतंत्रा” पर चर्चाये होते रहती है।

महान सम्राट अशोक द्वारा उत्कृष्ट बौद्ध स्मारकों, विहारों, और संघाराम और उनमे स्थापित की गई बुद्ध की मूर्तियों और चित्र संसार में श्रेष्टतम कृतियों में गणना होती है। बुद्ध के शिक्षा का सांस्कृतिक क्षेत्रों के साथ गणित और विज्ञान पर पड़े पारस्परिक प्रभावों पर विचार करते हुए यह विद्धित होता है की संसार के पुल,भवन और प्राद्दोगिकी के संवर्धन के निर्माण की कला का स्त्रोत बौद्ध संस्कृति की देन है। इसलिए बौद्ध सम्राट कनिष्क (पेषावर, पाकिस्थान) ने कहा है की “वादसंवाद की प्रतिबद्धता की परम्परा खुले विचार विमर्श, पुलों-भवनों और प्राद्दोगिकी के संवर्धन का सीधा सबंध बौद्ध विचारो और सिद्धान्तो से है”। अर्थात बुद्ध की शिक्षा वास्तविक मानव और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया है। और इसकी प्रारम्भिक प्रेरणा बुद्ध और उनके संघ के बौद्ध भिक्षुओ और भिक्षुणियो से ही मिली है। यदि किसी को इन रचनाओं में किसी को संदेह हो तो वह व्यक्ति नितान्त निरक्षर और उजड़ड ही होंगा।485346_347293812051902_1391234576_n

महान सम्राट अशोक के चौमुख प्राचीन सुवर्णयुग के अखंडभारत के विकास का आधार बुद्ध के नैतिकमूल्यों कि शिक्षा के आधुनिक भारत के प्रतिक चार दिशाओं के सिंह और धम्म चक्र, स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र के अखंडता के चिरस्थाई के लिए देश के जनमानस को बुद्धत्तरभारत के चौमुख नैतिकमूल्यों के विकासात्मक कार्यो के संस्करण की प्रेरक गाथा के प्रति बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर ने अपनी सन्मान जनक कृतज्ञता प्रकट करते हुए विश्व जगत में भारत के बौद्ध कालीन सुवर्ण युग को गौरवान्वित किया। जिसके लिए विश्व जगत बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर के संघर्षमय जीवन के लिए सदेव ऋणी है।

महान सम्राट अशोक के विशाल धम्मकाया के जनकल्याणकार्यो की दिघदर्शक कि गूंज जपान से मिस्त्र तक बाली से लेकर यूनान तक गौरवान्वित थी। इसीलिए बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने उनके कार्यो को और भी गौरवान्वित करने के लिए कहा “विजया दशमी” का पर्व महान बौद्ध सम्राट अशोक इनके विजय दिन के उपलक्ष में बड़े हर्ष उल्लाहस के साथ मनाई जानी चाहिए” (Ref . writings & Speeches Vol-18/3 pp 482 )। और इस दिन (14 October 1956) को बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर ने महास्थविर भदंत चंद्रमणि से बुद्ध के धम्म की दीक्षा लेकर 5 लाख लोगो धम्म दीक्षा दी और “विजया दशमी” को विश्व जगत में गौरवान्वित किया।

महान सम्राट अशोक की जयंती “एप्रिल” माह को लेकर चीन, थाईलैंड, बर्मा, श्रीलंका, लाओस और भी एशिया के बौद्ध राष्ट्रों में एक मत है। भलेही जन्म तिथि को लेकर कुछ तांत्रिक दृष्टी से भिन्नयता हो सकती है। भारत में सर्वाधिक प्रचलित (सरकारी तौरपर ) शक सम्वंत का नवर्ष अप्रैल के मध्य में आरम्भ होता है। अगर हम वर्ष 2544 के बुद्धनिर्वाण सम्वंत को देखे तो सम्राट अशोक, का 304 BC, का आरम्भ भी अप्रैल के मध्य से सुरु होता है। श्रीलंका में पहली शती ई.पु. से बुद्धनिर्वाण सम्वंत के प्रयोग के प्रमाण विद्धमान है। और बुद्धनिर्वाण सम्वंत यह कलिस्मवंत के प्रयोग के सभी प्रमाणों से अधिक पुराने है(Ref. The Agrumentative Indian by Dr.Amartya Sen pp.290)। और एशिया के बौद्ध राष्ट्रों में इसी बुद्धनिर्वाण सम्वंत के प्रयोग के प्रमाणों से ‘अप्रैल’ के मध्य में सम्राट अशोक की जयंती बड़े हर्ष उल्लाहस के साथ मनाई जाती है। ठीक इसी प्रकार उत्तरी भारत के प्रदेशो के कुछ हिस्सों में महान अशोक सम्राट की जयंती अप्रैल में मनाई जाती है। 10 अप्रैल 2010 में चीन में सम्राट अशोक की जयंती के उपलक्ष में कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जिसमे देश के पूर्व विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा गए थे।

अंत: हम बुद्धनिर्वाण सम्वंत के प्रयोग को देखे तो 304 BC, का आरम्भ अप्रैल के मध्य से सुरु होता है, जिसे “चैत्र शुल्क अष्टमी” कहा जाता है। इसे हम स्वीकारते है तो सम्राट अशोक की जयंती 18 एप्रिल 2013 को आती है। देशवाशियो को निवेदन है की सम्राट अशोक की जयंती इस तिथि को बड़े हर्ष उल्लाहस के साथ मनाये और उस सुवर्ण युग के बौद्ध नैतिकमुल्लो के मैत्री और सौमनस्य के सुखद सुहास के विकास के लिए विश्व जगत में मानवकल्याण की बौद्ध नैतिक सभ्य संस्कृति की समता-स्वातंत्र्य-बन्धुता और न्याय के ज्ञानमाला की करुना और सत्य, अहिंसा सेवार्थ के कार्यो के प्रचार को प्रबल प्रवाह के साथ प्रवाहित करे।

लेखक : सत्यजित मौर्या,

नागपुर – 440017 

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3 thoughts on “सभी बहुजनों को महान बौद्ध सम्राट अशोक की जयंती (18 एप्रिल) की हार्दिक शुभकामनाएं…article-by-satyajit-maurya

  1. sir aap achha kaam kar rahe ho magar kuchh badhi takate hamare ko upar nahi utha ne de rahi hai hamare uttam nagar me lord buddha chennal ko band kar diya gaya thik baba sahab ke birthday ke do din pehle ab es baat se pata chalta hai ki abhi bhi hame hamara adhikar nahi mila hai.

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