भगवान बुद्ध और अवतारवाद का अधूरा सत्य..डॉ प्रभात टन्डन


ये आर्टिकल साभार  ब्लॉग   http://preachingsofbuddha.blogspot.in से लिया गया है जिसका लिंक  प्रकार से है

http://preachingsofbuddha.blogspot.in/2012/10/blog-post.html

हम  इस आर्टिकल के लेखक डॉ प्रभात टन्डन के आभारी हैं  जिन्होंने इतने महत्वपूर्ण तथ्य जन साधारण के लिए उपलब्ध करवाए

इस  आर्टिकल के साथ संलग्न चित्रों का वर्णन :

1. बलरामपुर में द्रौपदी मन्दिर मे भगवान बुद्ध की मूर्ति
2. हिन्दू मन्दिरों मे भगवान बुद्ध की मूर्ति पाये जाने का एक दुर्लभ चित्र
3. Vishnu as Buddha making gesture of dharmacakrapravartana flanked by two disciples ( साभार : विकीपीडिया )

यह अजीब सा विरोधाभास है  कि एक तरफ़  तो हिन्दू धर्म मे भगवान बुद्ध को विष्णु  का नंवा अवतार माना जाता  हैं और दूसरी  तरफ़ हिन्दू मन्दिरों में बुद्ध की मूर्ति को ढूँढ पाना एक दुर्लभ कार्य है । पिछ्ले साल हरिद्वार और देहारदून से लौटते समय मेरे मन मे यही विचार उमडते रहे । उन दिनों हरिद्वार मे कोई बौद्ध  सम्मेलन चल रहा था । लौटते समय मेरी मुलाकात ट्रेन में जिन महिला से हुयी , वह भी उसी सम्मेलन का हिस्सा थी । बनारस की रहने वाली श्रीमती मालती तिवारी सारनाथ में  केन्द्रीय तिब्बती अध्यन्न विशवविधालय ( Central University of Tibetan Studies (CUTS) ,  Sarnath ) में  अध्यापन कार्य करती हैं  । बुद्ध धम्म मे उनकी गहन रुचि थी और बातों –२ मे ज्ञात हुआ कि उनका शोध  कार्य डां अम्बेड्कर और बौद्ध धर्म  पर केन्द्रित था । लेकिन मेरे इस प्रशन  पर वह चुप रही ।

गत वर्ष ही दीपावली के अगले दिन श्रावस्ती जाने का अचानक प्रोग्राम बन गया । श्रावस्ती से लौटते समय बलरामपुर में द्रौपदी मन्दिर मे भगवान बुद्ध की मूर्ति को देखकर मै अचरज मे पड गया । ऊपर का यह चित्र उसी मन्दिर से ही है ।

अवतार वाद की यह  फ़िलोसफ़ी मेरे मन मे कभी भी मूर्त  रुप न ले पाई । अगर ईमानदारी से भगवान बुद्ध को विष्णु का अवतार माना गया होता तो हर मंदिर में आज उनकी मूर्ति होती ।

लेकिन ऐसा क्यूं  है कि  भगवान बुद्ध को हिन्दू धर्म में पूर्ण रुप से स्वीकार नही किया गया ।  हिन्दू पुराणॊं मे इसे इस तरीके से पेश किया गया है जिसे ज़्यादातर बौद्ध अस्वीकार्य और बेहद अप्रिय मानते हैं। कुछ पुराणों में ऐसा कहा गया है कि भगवान विष्णु ने बुद्ध अवतार इसलिये लिया था जिससे कि वो “झूठे उपदेश” फैलाकर “असुरों” को सच्चे वैदिक धर्म से दूर कर सकें, जिससे देवता उनपर जीत हासिल कर सकें। इसका मतलब है कि बुद्ध तो “देवता” हैं, लेकिन उनके उपदेश झूठे और ढोंग हैं। ये बौद्धों के विश्वास से एकदम उल्टा है: बौद्ध  गौतम बुद्ध को कोई अवतार या देवता नहीं मानते, लेकिन उनके उपदेशों को सत्य मानते हैं। कुछ हिन्दू लेखकों (जैसे जयदेव) ने बाद में यह भी कहा है कि बुद्ध विष्णु के अवतार तो हैं, लेकिन विष्णु ने ये अवतार झूठ का प्रचार करने के लिये नहीं बल्कि अन्धाधुन्ध कर्मकाण्ड और वैदिक पशुबलि रोकने के लिये किया था।
लेकिन फ़िर सच क्या है ? क्या यह ब्राहम्ण्वादी  मानसिकता का बौद्ध दर्शन को सोखने की एक चाल थी ? संभवत: यह ही सच है !! मगर कैसे ? श्री आलोक कुमार पाण्डेय की पुस्तक , “ प्राचीन भारत ” जो मैने अभी हाल ही मे फ़िल्पकार्ड से मँगाई थी , इस विषय पर काफ़ी प्रकाश डालती है । आलोक जी जो सन २००२ बैच के IAS  हैं , उन्होने निष्पक्ष रुप से इसकी विवेचना की है । आप  लिखते हैं ,

लगभग छ्ठी ई.पू. में गंगा घाटी में रहने वालों के धार्मिक जीवन मे अनेकों परिवर्तन देखने को मिले । तत्कालीन परम्परावादी ब्राहम्ण धार्मिक व्यवस्था के विरोध मे लोग उठ खडे हुये तथा आन्दोलन का स्वरुप इतना तीव्र हो उठा कि ईशवर की सत्ता तक को अस्वीकार करने वाले सम्प्रदाय एवं मत अस्तित्व में  आये । तत्कालीन ग्रंथों में लगभग ६२ मुख्य और अनेक छोटे –२ धार्मिक सम्प्रदायों का परिचय मिलता है जो इस बात का परिचायक  है कि धर्म की जडता के विषय मे कितना असंतोष था । ……. प्रशन उठता है कि वह कौन से कारण थे जिनके चलते इस प्रकार का धार्मिक आन्दोलन उठ खडा हुआ । इन्हें निम्म रुप से समझा जा सकता है :

१. आर्थिक २. धार्मिक ३. सामाजिक ४. राजनैतिक

सम्भवत: नास्तिक सम्प्रदाओं के उदय के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण आर्थिक ही थे । यह शती लोहे के उपकरणों के कृषि मे प्रयोग होने की शती थी । हाँलाकि इसके पूर्व लोहे का ज्ञान हो चुका था किन्तु ज्यादतर वे शास्त्रास्त्रॊं  में प्रयुक्त होते थे । ……लौह उपकरणो के ज्ञान से विस्तूत मैदानों  की प्राप्ति हुई । इस विस्तूत मैदान पर अब गहन कृषि प्रारम्भ  हुई जिससे एक वर्ग को खाध सामग्री की चिन्ता से मुक्ति मिली और वे व्यापार , वाणिज्य और शिल्प कलाओं मे लग गये । …खेती  के लिये पशुओं की आवशयकता पडी । विशेष रुप से उन पशुओं की जो कृषि के काम आते थे जबकि  ब्राहम्ण धर्म की कर्मकाण्डीय यज्ञ परम्परा मे बलि दी जाती थी । इससे एक धार्मिक द्धंदं खडा हुआ । कृषक वर्ग और शिल्प या वाणिज्य से जुडे हुये लोगों ने ब्राहम्णीय परम्परा का विरोध किया ।

राम शरण शर्मा के अनुसार , “ वैदिक प्रथानुसार पशु अंधाधुंध माए जा रहे थे , यह खेती की प्रगति मे बाधक हुआ । यदि नई कृषि मूलक अर्थव्यवस्था को बचाना था तो पशुधन को संचित करना आवाशयक था । ” इस समय जितने भी नास्तिक संप्रदाओं ने पनपना प्रारम्भ किया सबने ब्राहम्णीय व्यवस्था का विरोध किया । इन सबमें बौद्ध और जैन धर्मों का स्वर सर्वाधिक तीव्र था । इन संप्रदाओं ने पशुओं को सुखदा और अन्नदा कहा और उनके वध का विरोध किया ।

यह समय व्यापार , वाणिज्य एवं नगरीय क्रांति का समय था । ६००-३२३ ई.पू. में लगभग ६२ नगरों का अस्तित्व था । व्यापार वाणीज्य से प्राप्त धन को एकत्र कर के वैशय वर्ग ने अपने निवास नगरों मे बनाये ।….. व्यापारियों ने निरंतर ब्राहम्णीय व्यवस्था का विरोध किया । एक अन्य कारण वैशव वर्ग का इन सम्प्रदाओं की ओर आकर्षित होना था क्योंकि व्यापार से इस वर्ग ने अकूत धन प्राप्त कर लिया था जब्कि हर तरफ़ महत्ता ब्राहम्णॊ की थी वह इस समृद्ध वर्ग को स्वीकार नही हुआ । अनाथपिण्डक , घोषित जैसे विभिन्न श्रेषठियों ने इसी कारण बौद्ध/जैन सम्प्रदाओं को मुक्त हस्त दान दिया । ऋण का कार्य ब्राहम्णीय परम्पराओं मे दूषित कार्य कहा गया था जबकि यह वैशवों तथा व्यपारियों का मुख्य कार्य था ।…. इन सबके अतिरिक्त नास्तिक सम्प्रदाओं का उदय चूँकि ब्राहम्णीय परम्परा के विरुद्ध हुआ था इसी कारण उनकी सहानुभूति हर उस वर्ग के प्रति थी जो आर्थिक रुप से कमजोर था और इसी  कारण इन समस्त वर्गॊ ने तन , मन और धन से इन सम्प्रदाओं के वर्धन हेतु कार्य किया । इन सम्प्रदाओं का ऐसा दृष्टिकोण बुद्ध के उस कथन से मिलता है जिसमे उहोने कहा कि , “ कृषकों को बीज , श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक और व्यवसासियों को धन देना चाहिये । “

धार्मिक कारणॊं के चलते हुये भी जैन/ बौद्ध सम्प्रदाऒ के उदय को बल मिला । ब्राहम्णीय व्यवस्था , देवों की कृपा को मानवों के शुभ के लिये आवशयक मानती थी । देवों को प्रसन्न करने के लिये विभिन्न उपाय किये जा रहे थे जो अब कर्मकाण्डॊं में बदल गये थे और जटिल से जटिलतर होते जा रहे थे । वैदिक ऋचाओं का स्थान मंत्रों ने ले लिया था तथा मंत्रों के माध्यम से देवों को वश मे करने की बात कही जा रही थी जो मंत्रों का ज्ञान नही रखते थे , वे अब जादू टोने तथा तंत्र  मंत्रों का सहारा लेने लगे थे । समाज का निम्म वर्ग इनके चक्कर मे फ़ँस कर भट्काव की स्थिति मे था । यह एक असंतोष का कारण बना ।पशु बलि और यज्ञीय कर्म कांडं  वे दूसरे तत्व थे जो सामान्य जनता को कष्ट ही देते थे । अनेक श्रोत यज्ञ कई –२ वर्षॊं तक चलते थे जिसमें यज्ञ कराने वाले को अनेकों दास – सासियाँ उपहार स्वरुप प्रदान की जाती थी । जहाँ  पहले ६ ऋषियों द्वारा यज्ञ कराया जाता था , उत्तर वैदिक काल मे आगे चलकर इनकी सँख्या १६ हो गयी थी | दूसरी ओर नास्तिक सम्प्रदाऒ   ने सदैव इसका विरोध किया । बुद्ध ने कहा , “ ब्राहम्ण , लकडी नही अपितु आन्तरिक ज्योति जला । “

सामाजिक कारणॊं का भी नास्तिक सम्प्रदाओं के उदय मे महती योगदान था । तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में चार वर्णॊं की स्थापना पूर्णरुपेण  हो चुकी थी तथा ब्राहम्ण एंव छत्रिय , दो सामाजिक उच्च वर्णॊ में सम्मलित थे जबकि वैशय एवं शूद्र को महत्व प्राप्त नही था । इस प्रकार समाज दो वर्गों मे विभाजित हो चुका था :

१. गैर उत्पादक वर्ग : ब्राहम्ण , छत्रिय

२. उत्पादक वर्ग : वैशय , शूद्र

समाज के उत्पादक वर्ग होते हुये भी उचित सम्मान न हो पाने के कारण वैशय एंव शूद्र वर्गों मे असंतोष व्याप्त था । इतना ही नही समाज का वर वर्ग जो उत्पादन मे कही शामित ही नही था सर्वाधित उपभोग करता था तथा इसे इसके पशचात अनेकों विशेषधिकार मिले हुये थे । तत्कालीन साहित्य से ज्ञात होता है कि गौतम , आपस्तंब आदि ऋषियों ने ऐसी व्यवस्था  बनाई थी कि ब्राहम्ण वर्ग को सर्वाधिक घोर अपराध करने पर भी सबसे कम द्ण्ड मिलता था । वैशव वर्ग व्यपार – वाणिजय के फ़लस्वरुप  अत्याधिक संपदा एकत्रित कर चुका था किन्तु उसे भी उचित आदर प्राप्त नही होता था । “  महाजनी , ऋण आदि जैसे कार्यों को ब्राहम्णीय व्यवस्था मे अपमान की दृष्टि से देखा जाता था “ राम शरण शर्मा

शूद्रों की दशा तो अत्यन्त खराब थी । शूद्र वध जैसे अपराध के लिये भी अपराधी को वही दण्ड दिया जाता था जो कौवे , उलूक आदि की हत्या के लिये दिया जाता था । मातंग जातक एवं चित्तसंभूत जातकों मे दी हुई कथायें शूद्रॊं पर होने वाले अत्याचारों का वर्ण करती है । नास्तिक सम्प्रदाय ने इन सबका प्रबल विरोध किया । जहाँ एक ओर वैशवों के ऋण , महाजनी एवं दास सम्बन्धी अधिकारों को मान्यता दी , वही बौद्ध धर्म ने सभी वर्णॊ के लिये अपने दरवाजे  खोल दिये । सामाजिक संदर्भ में भी बुद्ध ने जातिवाद का घोर विरोध किया , वस्तुत:  तपस्सु एवं भाल्लुक जैसे शूद्रॊ को बुद्ध ने संघ मे प्रथम प्रवेश दिया । विभिन्न धार्मिक पाखंडो एवं यज्ञीय कर्मकांडो का उन्होने विरोध किया तथा सरल और आडम्बररहित  मार्ग का प्रतिपादन किया । बुद्ध ने अपने सिद्धांत पालि भाषा मे दिये जो जनसामान्य एवं लोकोन्मुखी स्वरुप को दर्शाता है ।  बुद्ध ने कर्मकांडो का विरोध करने के पीछे मुख्य तर्क यह दिया कि समाज मे जन्म के अनुसार कोई उच्च या निम्म नही होता है । उच्चता का निर्धारण कर्म से होता है ।  इसी प्रकार ब्राहम्ण एवं छत्रियों ने भी नास्तिक सम्प्रदाओं जैसे बौद्ध एवं जैन सम्प्रदाओं का सहयोग किया ।

आशर्चजनक तथ्य यह कि बुद्ध जिन उच्च जातियों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे संघ मे सम्मिलित होने का उनका प्रतिशत सर्वाधिक था यथा –

जाति  आवृति प्रतिशत
छत्रिय 706 51.5%
ब्राहम्ण 400 29.1%
वैशव 155 11.02%
शूद्र 110 8.3%

भिक्षुओं का जातीय आधार ( विनय एवं सुत्त पिटक के आधार पर ) साभार : श्री आलोक पान्डॆ

राजनैतिक कारणो का नास्तिक सम्प्रदाओं के उदय मे दो प्रकार से सकरात्मक उपयोग रहा ।

१. ब्राहम्ण – राजन्य द्धंद

२. गणराज्यों का स्वतंत्र वातावरण

ब्राहम्ण एवं क्षत्रिय राजन्य वर्ग के मध्य उत्तरवैदिक काल से द्धंद आरम्भ हो चुका था । प्रवाहण्जाबालि , अशवपति तथा मिथिला के विदेह जैसे विद्धान ने कई ब्राहम्णॊ को ज्ञान के स्तर पर पिछाडा था । परिस्थितियाँ ऐसी थी कि ब्राहम्ण हर ओर से लेने वाले थे जबकि क्षत्रियों को देना भी पडता था ऐसी स्थिति में द्धंद सामने जब आया तो वास्तविक शक्ति क्षत्रियों को देकर ब्राहम्ण ने आदरसूचक प्रथम स्थान ले लिया । ऐसी स्थिति में नास्तिक संप्रदाओं ने राजन्य वर्ग का पक्ष लिया और इसी कारण इस वर्ग का समर्थन हासिल किया । अजातशत्रु , बिम्बसार , प्रसेनजित और आगे चलकर अशोक आदि का समर्थन बौद्ध एंव जैन धर्मॊ को न मिला होता तो इन धर्मॊ का वास्तविक रुप कुछ और ही होता ।

हाल ही में रिलीज हुई “ OH MY GOD “ जिन्होने देखी हो वह आसानी से समझ सकते हैं कि अवतार कैसे और क्यूं बनाये जाते हैं । फ़िल्म में परेश रावल ( कांजीलाल  की भूमिका में ) जब ईशवर के होने या न होने पर प्रशन खडा करता है , धर्म के नाम पर धन्धा कर रहे धंधेवाजों की जब पोल खोलने लगता है तो अंत मे वही दुकान चलाने वाले उसको ही अवतार घोषित कर देते हैं ।  देखिये एक झलक OH MY GOD से  http://youtu.be/BkO4Hgg4YMI

बुद्ध को अवतार साबित करना महज एक दिखावा और ढोंग है , सच तो यह है कि बुद्ध धम्म और  हिंदू धर्म में कही दूर दूर तक कोई समानता नही है ,  हाँ समानता है कि हिन्दू  , जैन , सिक्ख और चार्वाक दर्शन की तरह बुद्ध धम्म का दर्शन भी भारत की गौरवशाली पंरपरा से ही उत्पन्न हुआ है . यह विदेशी संस्कृतियों की तरह किसी को जबरन या लालचवश  धर्मातरण पर मजबूर नही करता , किसी के ऊपर बिलावजह अत्याचार करने की अनुमति नही देता , हाँ कुछ सोचने को मजबूर अवशय करता है  । यह आप पर निर्भर करता है कि अपने द्धीप आप अवंय बनना चाहते हैं या दूसरे के सहारे अपनी नैया पार करना चाहते हैं ।

अप्प दीपो भव ! ( अपना प्रकाश स्वयं बनो )  Be your own LAMP !  Realize yourself and the World !!

डॉ प्रभात टन्डन

5 thoughts on “भगवान बुद्ध और अवतारवाद का अधूरा सत्य..डॉ प्रभात टन्डन

  1. Really agar ajatshatru,bimvisar, ashok jaise mahan samrat nahi hote to me samjhata hu ke yeh brahman log dalito ko kido mokodo se bhi buri avastha me la dete.

    Thanks Lord Buddha

    • भगवान् बुद्ध द्वारा बताये गए मार्ग और शिक्षा को जानने के लिए WEBSITE https://samaybuddha.wordpress.com/ पर जाकर बाएँ तरफ दिए Follow Blog via Email में अपनी ईमेल डाल कर फोल्लो पर क्लिक करें, इसके बाद आपको एक CONFIRMATION का बटन बनी हुए मेल आएगी निवेदन है की उसे क्लिक कर के कनफिरम करें इसके बाद आपको हर हफ्ते बौध धर्म की जानकारी भरी एक मेल आयेगी |ये ठीक इस तरह है जैसे कोई बौध धम्म की साप्ताहिक पत्रिका और वो भी फ्री में |

    • प्रिये अभिषेक

      सबसे पहले आपको कुछ बुनियादी सवालों के जवाब ढुंढने होंगे जैसे:

      1. आप धर्म परिवर्तन क्यों चाहते हैं ?

      इसके दो जवाब हैं आपन अन्याय युक्त धर्म को छोड़कर न्याय और सत्य को पाना चाहते हैं ।
      या किसी ऐसे धर्म से जुड़ना चाहते हैं जहाँ से आपको संगठन और सुरक्षा का लालच दिखे

      2. इसके लिए आपको सभी धर्मों की तुलना करनी पड़ेगी और ये जवाब खोजना पड़ेगा की इस धर्म को बनाने के पीछे लक्ष्य क्या था ?

      इसके उतसंभावित उत्तर हैं
      – किसी विदेसी कौम के जीवनयापन और पालन पोषण के लिए आम जनता को गुमराह करके दान दक्षिणा पाना
      – या धार्मिक साहित्य द्वारा गुटबाजी करके मजबूत संगठन के बल पर दुनिया की जमीन पर कब्ज़ा करना
      -या सत्य की खोज करके अपना जीवन के दुखों से छुटकारा पाना , अगर ये विकल्प है तो बुद्धा धर्म का अध्यान करें

      बौध धर्म में कुछ भी ऐसा स्वीकार्य नहीं जिसका सबूत उपलब्ध न हो और जिससे हमारी उन्नति न होती हो। भगवन बुद्ध की समस्त शिक्षा दो भागों में बनती हुए है एक वो जिसका सबूत है अर्थात जिसका वर्णन किया जा सकता है दूसरा वे जिसका अभी इस वक्त वर्णन नहीं किया जा सकता पर भविष्य में वर्णन मिल सकता है इसलिए उसे समय पर छोड़ दिया है । बौध धर्म में अन्य धर्मों की तरह अवर्णनिये बातों का काल्पनिक व्याख्यान धार्मिक पुस्तकों में लिखवाकर जनता को अन्धविश्वास में धकेलना नहीं हैं। भगवन बुद्धा ने अपनी शिक्षा को मानने के लिया किसी को बाध्य नहीं किया , भगवन बुद्धा का एक कथन देखें :

      “तुम किसी बात को केवल इसलिये मत स्वीकार करो कि यह अनुश्रुत है, केवल इसलिये मत स्वीकारो कि यह हमारे धर्मग्रंथ के अनूकूल है या यह तर्क सम्मत है , केअवल इसलिये मत स्वीकरो कि यह यह अनुमान सम्मत है , केवल इसलिये मत स्वीकारो कि इसके कारणॊं की सावधानी पूर्वक परीक्षा कर ली गई है , केवल इसलिये मत स्वीकरो कि इस पर हमने विचार कर अनुमोदन कर लिया है , केवल इसलिये मत स्वीकारो कि कहने वाले का व्यक्तित्व आकर्षक है, केवल इसलिये मत स्वीकारो कि कहने वाला श्रमण हमारा पूज्य है । जब तुम स्वानुभव से यह जानो कि यह बातें अकुशल हैं और इन बातों के चलने से अहित होता है , दुख होता है तब तुम उन बातों को छॊड दो !”

      आपकी इस सत्ये की खोज में और अधिक सहायता करने के लिए एक पुस्तक संलग्न है , कृपया इसे जरूर पढ़ें

      “मनुष्य जिन दु:खों से पीड़ित है, उनमे से कुछ दुःख(10%) तो असल दुःख है जैसे कोई बीमारी पर उनमें बहुत बड़ा हिस्सा (90%) ऐसे दु:खों का है, जिन्हें मनुष्य ने अपने अज्ञान, ग़लत ज्ञान या मिथ्या दृष्टियों से पैदा कर लिया हैं जैसे गरीबी | उन दु:खों का प्रहाण अपने सही ज्ञान और शिक्षा द्वारा ही सम्भव है, किसी के आशीर्वाद या वरदान, देवपूजा,यग,ब्रह्मणि कर्मकांडों, ज्योतिष आदि से उन्हें दूर नहीं किया जा सकता।बौध धम्म का उद्देश्य यही ज्ञान जनसाधारण तक पहुचाना है”…समयबुद्धा

      अन्य धर्मों की तरह बौध धर्म/धम्म का उद्देश्य किस इश्वरीय कल्पना और उसकी किताब के बहाने सामाजिक संगठन बनाकर राजनेतिक लक्ष्य साधना नहीं है| इसका लक्ष्य व्यक्ति को इस लायक बनाना है की वो अपना भला खुद कर सके इसीलिए भगवन बुद्ध कहते हैं “अतः दीपो भव” अर्थात अपना दीपक खुद बनो किसी पर भी निर्भर न रहो|बौद्ध धम्म की उत्पति ही इसलिए हुई की प्रत्येक व्यक्ति मनोवैज्ञानिक रूप से इस काबिल बन जाये की वो नेतिकता के मूल उदेश्य को समझ सके|यह सर्वमान्य है की एक व्यक्ति में सभी योग्यताये होती है इनको बहार किस प्रकार से या किस माध्यम से निकाला जाये यह बौध धम्म की मुख्य शिक्षा है…समयबुद्धा

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