जब-जब बौद्ध धर्म कमजोर पड़ा है, तब-तब भारत में भ्रष्टाचार में वृद्धि हुई है

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भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि इस देश में जब-जब बौद्ध धर्म कमजोर पड़ा है, तब-तब भारत में भ्रष्टाचार में वृद्धि हुई है। यथार्थ में बौद्ध धर्म के सर्वोच्च नैतिक मूल्य प्रज्ञा, शील, मैत्री और करूणा मनुष्य को भ्रष्टाचार करने से रोकते हैं, उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इन मूल्यों और सदाचरण में उच्चकोटि का सकारात्मक सह-संबंध है।

आज भारत में बौद्ध धर्म शनै-शनै विकासोन्मुख है, लेकिन यह वर्तमान में इतनी व्यापक एवं सशक्त अवस्था में नहीं है, जो भ्रष्टाचार के विरूद्ध प्रभावकारी भूमिका का निर्वाह कर सके। उसका मुख्य कारण यह है कि वर्तमान भारत में बुद्ध विरोधियों और भ्रष्टाचार पर विश्वास करने वालों की संख्या अत्यधिक है। इसलिए भारत भ्रष्टाचार के विकास के लिए उपयुक्त उपजाऊ भूमि है।

संकुचित अर्थ में भ्रष्टाचार का अर्थ अनैतिक एवं गैरकानूनी माध्यम से चल-अचल संपत्ति एकत्रित करना होता है। व्यापक दृष्टि से त्रिपिटक के महत्वपूर्ण ग्रंथ सुत्त निपात के पराभव सुत्त में मनुष्य के पतन के जो अमंगल, अनैतिक एवं अशुभ कर्म बताए हैं, वे सभी कर्म भ्रष्टाचार में वृद्धि करते हैं, उदाहरण के लिए व्यभिचार करना, शराब पीना, जुआ-सट्टा खेलना, झूठ बोलना, गैर कानूनी माध्यम से धन संचय करना आदि भ्रष्टाचार की परिधि में आते हैं।

इतना ही नहीं, बल्कि धार्मिक क्षेत्र में प्रज्ञाहीन अंधविश्वास और पाखंडी कर्मकांडों की आड़ में भ्रष्टाचार दस्तक दे चुका है। इसके विपरीत भगवान बुद्ध ने सुत्त निपात में ही महामंगल सुत्त के अंतर्गत उन कर्मों को बताया है, जिनके अनुशीलन से भ्रष्टाचार समाप्त हो सकता है।

अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सर्वेक्षणों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि विश्व में बढ़ते हुए भ्रष्टाचार के मामले में भारत का स्थान अत्यधिक ऊंचा और चिंताजनक है। 30 मार्च, 2011 के समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार ‘भ्रष्ट देशों की लिस्ट में भारत नंबर चार पर’ पढ़ा था, जो बहुत ही शर्मनाक बात है।

पॉलिटीकल एंड इकोनोमिक रिस्क कंसलटैंसी लिमिटेड (पीईआरसी) ने भारत को भ्रष्टाचार के मामले में शून्य से दस अंक के पैमाने पर 8.67 अंक प्रदान किए हैं। जिसे पतन की दृष्टि से भारत के लिए खतरे की घंटी कहा जा सकता है।

इस स्थिति को देखकर यह स्पष्ट एवं निरपेक्ष रूप से कहा जा सकता है कि आज भारत में भ्रष्टाचार बड़ी तीव्र गति से फैल रहा है। यही नहीं बल्कि इसके अतिरिक्त हत्याएं, बलात्कार, चोरी-डकैती, नशाखोरी और अपहरण जैसे अपराध जंगल में आग की तरह फैल रहे हैं, जिससे समाज व राष्ट्र का पल पल में नैतिक पतन हो रहा है। और विश्व में भारत अपनी साख खोता जा रहा है।

भारत में तेजी से बढ़ते हुए भ्रष्टाचार को रोकने के लिए बुद्ध का अनुशीलन ही एक उचित एवं उपयोगी मार्ग है, जो भारत को पुनः एक महान देश बना सकता है।

Kamal Babu Sankhwar

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मैंने एक पुस्तक पढ़ी नाम है, ‘क्रांति और प्रतिक्रांति’ इसे बाबा साहब ने लिखा है। इसमे लिखा है बुद्धिज़्म से पहले केवल तीन वेद थे, ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और कोई ग्रंथ नहीं थे। इन्हे भी बुद्ध ने प्रमाण मानने से इंकार कर दिया था। मौर्यकाल के बाद अथर्ववेद, पुराण, उपनिषद, स्मृतियाँ, रामायण, महाभारत आदि लिखी गयी, और इंका उद्देश्य बौद्ध धर्म को खत्म करना था, क्योंकि भारत बौद्धमय हो गया था, ब्राह्मण धर्म खत्म हो गया रहा था। भगवतगीता तो बौद्ध ग्रंथ ‘धम्मपद’ की खुली चोरी है, बाकी ग्रंथ भी बौद्ध साहित्य के जातक से कहानिया चोरी करके लिखे गए हैं। अब बताओ जो धर्म ही चोरी के दम पर टिका हो, वो मानवता क्या खाक सिखाएगा। …http://www.facebook.com/rajkamalbauddh?hc_location=stream

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क्या श्रमण गौतम कभी कठोर वचन कहते हैं?

एक बार गौतम बुद्ध से अभय राजकुमार ने प्रश्न किया कि क्या श्रमण गौतम कभी कठोर वचन कहते हैं?
उसने सोच रखा था कि नहीं कहने पर वह बताएगा कि एक बार उन्होंने देवदत्त को नरकगामी कहा था और यदि हां कहे तो उसने पूछा जा सकता है कि जब आप कठोर शब्दों का प्रयोग करने से स्वयं को रोक नहीं पाते, तब दूसरों को ऐसा उपदेश कैसे देते हैं?

बुद्ध ने अभय के प्रश्न का आशय जान लिया। उन्होंने कहा, इसका उत्तर न तो हां में दिया जा सकता है और न नहीं में। अभय की गोद में उस समय एक छोटा बालक था। उसकी ओर इशारा करते हुए बुद्ध ने पूछा, ‘राजकुमार, यदि दाई के अनजाने में यह बालक अपने मुख में काठ का टुकड़ा डाल ले, तब तुम क्या करोगे?’

‘मैं उसे निकालने का प्रयास करूंगा।’ biddha outline

‘यदि वह आसानी से न निकल सकता हो तो?’

‘तो बाएं हाथ से उसका सिर पकड़कर दाहिने हाथ की उंगली को टेढ़ा करके उसे निकालूंगा।’

‘यदि खून निकलने लगे तो?’

‘तो भी मेरा यही प्रयास रहेगा कि वह काठ का टुकड़ा किसी न किसी तरह बाहर निकल आए।’

‘ऐसा क्यों?’

‘इसलिए कि भंते, इसके प्रति मेरे मन में अनुकंपा है।’

‘राजकुमार, ठीक इसी तरह तथागत जिस वचन के बारे में जानते हैं कि यह मिथ्या या अनर्थकारी है और उससे दूसरों के हृदय को ठेस पहुंचती है, तब उसका वे कभी उच्चारण नहीं करते। पर इसी तरह जो वचन उन्हें सत्य और हितकारी प्रतीत होते हैं तथा दूसरों को प्रिय लगते हैं, उनका वे सदैव उच्चारण करते हैं।

इसका कारण यही है कि तथागत के मन में सभी प्राणियों के प्रति अनुकंपा है।’

 

 

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शक्तिशाली शक्तिशाली का दोस्त होता है और कमजोर कमजोर का दुश्मन- समयबुद्धा (बौध /बहुजन दार्शनिक एव उपदेशक)

ये  जिन्दगी का नियम है की शक्तिशाली शक्तिशाली का दोस्त होता है और कमजोर कमजोर का दुश्मन 

इसीलिए  दलित ही दलित का सबसे बड़ा दुश्मन है|मैं दलित इतिहास की जितनी समीक्षा करता हूँ उतना ही ये तथ्य साबित होता है की दलित ही वास्तव में दलित का दुश्मन है|सारा इतिहास उठा कर देख लो मौकापरस्त मनुवादियों में कभी इतनी हिम्मत नहीं हुई की वो बहुजन शक्ति से सीधी टक्कर ले सकें,हमेश षडियन्त्र का सहारा लिया|जैसे लोहे सबसे जीत जाता है पर अपनी ही जंग से हार जाता है उसी तरह हर हार में अपने ही बहुजन साथी का निकम्मापन या दगाबाजी मिलेगी|इसीलिए मनुवादी हमेशा कहते हैं की ये लोग बलवान तो हो सकते हैं पर कभी स्थाई नहीं होंगे| हजारों साल की गुलामी के बाद भी क्या हम इतिहास से कुछ सीखेंगे?

किसी भी देश की शोषित कौम (दलित) का उद्धार करना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि  इसके लिए उन्हें उनकी कमियों का अहसास करके सुधरने को प्रेरित करना होता है|किसी को भी उसकी कमी बताओ तो वो बुरा मान कर अपने सुधारक की ही खिलाफत करता है| उधर दूसरी तरफ ऐसा सुधारक शोषक की नजरों में भी खटक जाता है परिणाम शोषित और शोषक दोनों का दुश्मन हो जाता है| जबकि अगर वही बुद्धिमान सुधारक शाषक का साथ दे तो लाभ में रहता है इसीलिए शायद ये कहावत बनी है की मूर्ख मित्र से बुद्धिमान दुश्मन ज्यादा हितकारी होता है|यही कारन है की सभी दार्शनिक और समाज सुधारक का शाशकों द्वारा दमन कर दिया जाता है| अफ़सोस जीते जी ऐसा व्यक्ति दुखी रहता है और लोग उसके मरने के बाद ही उसकी बातें समझते हैं|केवल एक बढ़ी क्रांति का बल ही परिस्थिति बदल पता है क्योंकि ये जिन्दगी का नियम है की जो जिस गति में हैं उसी गति में रहना चाहता है अगर उसकी गति या दिशा बदलनी है तो किसी बल का प्रयोग करना पड़ता है|

मूर्खों से बहस करने पर सबसे पहले वो तुमको अपने स्थर तक गिराएंगे और फिर तुमको ही मूर्ख साबित कर देंगे|अगर आप ऐसे मूर्खों को ज्ञान देने जाओगे तो आपको ही उल्टा अज्ञान परोस देंगे और आपके ज्ञान की खिल्ली उड़ाएंगे| बहुजनों के मिशन को कभी खतरा बहार से नहीं रहा अपने अंदर के विभीषणों ने लंका जलवाई है|मूर्खों को अपने शूद्र होने का अफ़सोस नहीं है बल्कि अपनी विरोधियों का गुलाम होने में फक्र है

खलील जिब्रान की एक कहानी में उन्होंने लिखा है कि मैंने जंगल में रहने वाले एक फ़कीर से पूछा कि आप इस बीमार मानवता का इलाज क्यों नहीं करते . तो उस फ़कीर ने कहा कि… तुम्हारी यह मानव सभ्यता उस बीमार की तरह है जो चादर ओढ़ कर दर्द से कराहने का अभिनय तो करता है. पर जब कोई आकर इसका इलाज करने के लिये इसकी नब्ज देखता है तो यह चादर के नीचे से दूसरा हाथ निकाल कर अपना इलाज करने वाले की गर्दन मरोड़ कर अपने वैद्य को मार डालता है और फिर से चादर ओढ़ कर कराहने का अभिनय करने लगता है .
धार्मिक, जातीय घृणा, रंगभेद और नस्लभेद से बीमार इस मानवता का इलाज करने की कोशिश करने वालों को पहले तो हम मार डालते हैं . उनके मरने के बाद हम उन्हें पूजने का नाटक करने लगते हैं|

मूर्ख खुद अपना,अपने परिवार का और अपनी कौम का  ही दुश्मन होता है |

सवर्णों और दलितों में जो सबसे बड़ा फर्क मुझे समझ में आया वो ये है की जैसे ही सुख के दिन आते हैं दलित अपने समाज और संगर्ष को छोड़ देता है जबकि सवर्ण इसके उलट जितना संपन्न होता जाता है उतना ही संगर्ष और अपने समाज के उत्थान के लिए समर्पित होता जाता है| हमारे सक्षम वर्ग को ये समझना होगा की अम्बेडकरवाद संगर्ष के चलते उनकी जिन्दगी में आज जो सम्पन्नता आई है उससे अर्जित ज्ञान,धन और समय का ५% हिस्सा इसी संगर्ष पर खर्च करना होगा वरना वो नीं दूर नहीं ये ५% बचने के चक्कर में पूरा १०० % छीनने वाले का सामना अकेले करना पड़ेगा|हमारा संगर्षबल है अपना शिक्षित और साधन संपन्न वर्ग, पर दुःख की बात ये है की वो अपने सुखों में इतना चूर है कि उसे संगर्ष कि जरूरत ही महसूस नहीं होती|अगर उससे संगर्ष कि बात करो तो ऐसे बिदक जाता है जैसे अपराध कर दिया हो|एक कहावत है-‘जाके पैर न फटी बिवाई सो का जाने पीर पराई’| जब इनके साथ अन्याय होता है तब इनको समाज क़ी याद आती है पर तब तक देर हो चुकी होती है| जिस समाज के शशक्तिकरन में इन्होने कोई योगदान नहीं दिया वो इनका लिए तब क्या कर सकेगा? इसके विपरीत मनुवादी लोग सुख में भी संगर्ष नहीं छोड़ते इसीलिए वो शासक हैं और हमारे लोग सुख में बावरे होकर सब भूल जाते हैं इसलिए शोषित होते हैं|क्या हम अपने शोषण के इस मूल कारण को कभी समझ पायेंगे?

आज हमारे समाज में तीन तरह के लोग है-

१. अशिक्षित एव असक्षम वर्ग

२. शिक्षित वर्ग पर बहुजन संगर्ष से अपरिचित

३. शिक्षित,ज्ञानी,सक्षम और संगर्ष शील वर्ग

-इनमे से जो पहला वर्ग है वो जनसँख्या दबाव या भीड़ के रूप में सबसे ज्यादा संगर्ष को आगे ले जा रहा है |

-दूसरा वर्ग किसी काम का नहीं उल्टा ये विभीषण हैं |

-तीसरा वर्ग संगर्ष की अगुवाई करता है पर इन नए नए हुए ज्ञानियों में अपने आप को श्रेष्ट समझने और अन्य को हीन समझने का रोग लग गया है परिणाम मकसद एक होने के बावजूद ये लोग एक मंच पर नहीं आ पाते|

“ये जिन्दगी का नियम है की ज्ञानी बोलता पहले है पर समझदार पहले सुनता है, तोलता है फिर बोलता है| ज्ञानी होना काफी नहीं है समझदार होना जरूरी है अन्यथा हमारा संगर्ष कहीं नहीं पहुचेगा”

अपनी दुर्दाशी के लिए केवल उनकी दमन निति को दोषी ठहराने के अलावा उन दिनों को जरूर याद करना-कराना जब तुम्हें शिक्षित संगठित और संगर्ष रहने का पाठ पढ़ाने की कोशिश की जा रही थी और तुम उसे अनसुना करके अपने तुच्छ आयाशिओं में मगन थे|

 

दुनियां में दो तरह के लोग होते हैं

-एक जो अपनी वर्तमान दशा से खुश हैं, अपना इतिहास जानना नहीं चाहते और भविष्य के लिए कोई नीति और संगर्ष नहीं,ऐसे लोग क्या जिये क्या मरे| इनको कोई नहीं उठा सकता इनका दमन निश्चित है|

-दुसरे जो अपने इतिहास से सबक लेकर भविष्य की नीति बनाते और उसको अमल में लाने को संगर्ष करते हैं|ये अपने आप को शोषण करने लायक बुलंद कर लेते हैं ये इनका अधिकार है|

असल में संगर्ष और ज्ञान उन लोगों के लिए है जो अपनी वर्तमान स्तिथि को बदलना चाहते हैं|आप सोचिये आप किस तरफ हैं ?

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गुरु  समयबुद्धा बौध /बहुजन दार्शनिक एव उपदेशक

 

25-May-2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- आज हमारा सबसे बड़ा त्यौहार बुद्ध पूर्णिमा है आओ जाने कि- बौद्ध धम्म क्या है,ये अन्य धर्मों से कैसे अलग है?…समयबुद्धा

बौध धम्म क्या है,ये अन्य धर्मों से कैसे अलग है ?biddha outlineBuddhism_Dharma_Chakra

‘बौद्ध’ शब्द बुद्धि से बना है जिसका अर्थ है “जागृत मस्तिष्क” जो सत्य को सत्य और असत्य की असत्य की दृष्टी से देखने में सक्षम हो|ये वो दर्शनशास्त्र है जिसकी शुरुआत लगभग ५६३ बी0 सी० में जन्मे महामानव सिद्धार्थ गौतम ने ३५ साल की उम्र में बोधिसत्व की प्राप्ति के बाद अपने अनुभव को देशना स्वरुप संसार को दिए|ये धम्म मार्ग पिछले ढाई हज़ार से भी ज्यादा सालों से मानव का कल्याण करता आ रहा है और आगे भी हमेशा करता रहेगा क्योंकि इसका मूल ज्ञान अन्य धर्मों की तरह समय के साथ पुराना और अस्वीकार्य नहीं होता| जनसँख्या की दृष्टी से कहें तो आज सरे संसार में बौद्ध धम्म को मानने वाले तीसरे नम्बर पर हैं, लगभग चार सौ मिलियन लोग इससे  लाभान्वित हैं|पहले ये एशिया महाद्वीप में ज्यादा प्रचलित था इसीलिए बुद्धा लो लाइट ऑफ़ एशिया भी कहते थे,पर अब इसे यूरोप आस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे उन्नत देश तेज़ी से अपना रहे हैं क्योंकि उनमें बौद्ध धम्म को समझने के लिए  वैज्ञानिक मानसिकता का प्रचार उपयुक्त मात्र में उपलब्ध है|DCP_0669

बौद्ध धम्म असल में धर्म शब्द  की परिभाषाओं से कहीं आगे का तत्व ज्ञान  है इसी लिए इसे हम धर्म न बोलकर धम्म बोलते हैं जिससे की इसे अन्य धर्मों के समतुल्य न समझा जाए । बौद्ध धम्म को हम धर्म इसलिए नहीं कहते क्योकि ये अन्य धर्मों की तरह केवल आस्था, गुटबाजी, पुरोहितवाद,  ईश्वरवाद और उनसे जुडी मान्यताओं पर नहीं चलता| इसका लक्ष्य मानव में ऐसे मानसिक योग्यता पैदा करना है जिससे वो असत्य को पहचान और नकार सके, सत्य, प्रमाणिकता और तर्क की क्षमता विकसित करता है| बौध धम्म ऐसी कसौटी या सन्दर्भ हवाला (रेफरेंस) का काम करता है जिसकी सहायता से व्यक्ति मानव संसार में व्याप्त हर तरह के इश्वरिय सिद्धांत या पैगम्बर के सन्देश का सही आंकलन करके कर्मकांड, परंपरा, धर्मादेशो, मान्यताओं अदि को परख सके चुन सके और नकार सके|

भगवान् बुद्ध ने कहा है: “तुम किसी बात को इसलिए मत स्वीकार करो क्योंकि ये पहले कभी नहीं सुनी,इसलिए मत स्वीकार करो क्योंकि ये सदियों से चली आ रही हैं,किसी चीज को इस लिए मत मानो की ये हमारे बुजुर्गो ने कही हैं,किसी चीज को इस लिए मत मानो की ये किसी धर्मग्रन्थ के अनुकूल है| है, किसी चीज को इस लिए मत स्वीकार करो क्योंकि कहने वाले का व्यक्तित्व आकर्षक है|किसी चीज को इस लिए मत सीकर करो क्योंकि ये स्वेव मैंने कही है|किसी चीज को मानने से पहले यह सोचो की क्या ये सही हैं,किसी चीज को मानने से पहले ये सोचो की क्या इससे आप का विकास संभव है, किसी चीज को मानने से पहले उसको बुद्धि की कसोटी पर कसो और स्वानुभव से हितकर जानो तो ही मानो नहीं तो मत मानो”KONICA MINOLTA DIGITAL CAMERA

बौध धम्म की ये विशेषता है की आप चाहे किसी भी धर्मिक समुदाय से सम्बन्ध रखते हो ये आपसे उसे छोड़कर उसे अपनाने को नहीं कहता|आप अपने समुदाय या धर्म में रहकर भी धम्म मार्ग से लाभान्वित हो सकते हैं|इसीलिए शायद बौध धम्म के लिए निम्न अंग्रेजी कहावत मशहूर है “Buddhism is not just for community it is for entire Humanity  ” अर्थात बौद्ध धम्म किसी समुदाय विशेष के लिए नहीं ये तो सम्पूर्ण मानवता के लिए है|

सत्य और अहिंसा के मार्ग को दिखाने वाले भगवान बुद्ध दिव्य आध्यात्मिक विभूतियों में अग्रणी माने जाते हैं। भगवान बुद्ध के बताए आठ सिद्धांत को मानने वाले भारत समेत दुनिया भर में करोड़ो लोग हैं।
भगवान बुद्ध के अनुसार धम्म जीवन की पवित्रता बनाए रखना और पूर्णता प्राप्त करना है। साथ ही निर्वाण प्राप्त करना और तृष्णा का त्याग करना है। इसके अलावा भगवान बुद्ध ने सभी संस्कार को अनित्य बताया है। भगवान बुद्ध ने मानव के कर्म को नैतिक संस्थान का आधार बताया है। यानी भगवान बुद्ध के अनुसार धम्म यानी धर्म वही है। जो सबके लिए ज्ञान के द्वार खोल दे । और उन्होने ये भी बताया कि केवल विद्वान होना ही पर्याप्त नहीं है। विद्वान वही है जो अपने की ज्ञान की रोशनी से सबको रोशन करे। धर्म को लोगों की जिंदगी से जोड़ते हुए भगवान बुद्ध ने बताया कि करूणा शील और मैत्री अनिवार्य है। इसके अलावा सामाजिक भेद भाव मिटाने के लिए भी भगवान बुद्ध ने प्रयास करते हुए बताया था कि लोगों का मुल्यांकन जन्म के आधार पर नहीं कर्म के आधार पर होना चाहिए । भगवान बुद्ध के बताए मार्ग पर दुनिया भर के करोड़ों लोग चलते है। जिससे वो सही राह पर चलकर अपने जीवन को सार्थक बनाते हैं

यदि आप देश  की किसी भी धर्म कौम या झंडे से ज्यादा प्रेम करते हैं,

यदि आप समानता के पक्षधर हैं

यदि आप भारत की सभी समस्याओं की जड़ में पहुचना चाहते हो

यदि आप अपने जीवन में दुखों से मुक्ति चाहते हो

यधि आपको धार्मिक सत्य जानना है

तो बस बौध धम्म के सिधान्तों और साहित्य को एक बार कुछ समय दे दो मानना  न मानना बाद की बात है|

आज बौध धर्म का सबसे बड़ा नुक्सान ये बात कर रही है की ये दलितों का धर्म है जिसके वजह से इसे लोग समझने के लिए भी तयार नहीं जबकि ये वो मत है की इसे जो भी एक बार ठीक से समझ ले उसे फिर दुनिया में किसी भी धर्म के सिद्धांत खोकले लगते हैं।

भगवान् बुद्धा ने कहा है :

मोह में हम किसी की बुराइयाँ नहीं देख सकते और घृणा में हम किसी की अच्छाईयाँ नहीं देख सकते  

धम्म विरोधी अवसरवादियों द्वारा फैलाई गई घृणा के कारन आज आम जनता दुखी है पर दुःख दूर करने के स्रोत तक नहीं जाना चाहती।आपसे आग्रह है की एक बार इसे जानकार तो देखो मानना न मानना तो बाद की बात है|

बुद्ध पूर्णिमा (25-MAY-2013)पर विशेष

समयबुद्धा (बौद्ध दार्शनिक एव उपदेशक)

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समयबुद्धा मिशन ट्रस्ट(दिल्ली) – उद्देश्य और लक्ष्य ||बहुजन हिताए बहुजन सुखाये||

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समयबुद्ध मिशन ट्रस्ट (दिल्ली)बौद्ध चिन्तक, सुधारक, दार्शनिक, दृष्टा, मार्गदाता एव गुरु मान्यवर समयबुद्धा जी के विचारों एव दूरदृष्टी से समस्त बहुजन समाज की क्षमता बढ़ाना को समर्पित है| समयबुद्धा का मानना है की बहुजन उत्थान के लिए जो भी मेहनत की जाती है वो बहुजनों  में क्षमता न होने की वजह से उनको लाभ नहीं पंहुचा पाती| गुरु मान्यवर समयबुद्धा जी के निम्न  कोटेशन पर ध्यान दीजिये:

“स्वास्थ्य, निति, ज्ञान, उत्साह और समर्पण न होने ही वो कारण हैं जिसके बिना कोई व्यक्ति या समाज एक  बंजर भूमि की तरह हो जाता है जिसमे कितनी ही खाद बीज पानी  (विचार, कानूनी और आर्थिक सहायता, मौके आदि) डालो परिणाम कुछ नहीं निकलता…समयबुद्धा”

गुरु मान्यवर समयबुद्धा जी के निम्नलिखित अतिविशिस्ट वचन सदा ध्यान रखें:

“अगर आपमें क्षमता नहीं है तो आपके सगे भाई के राजा बनने पर भी आप कोई फायदा नहीं उठा पाएंगे पर यदि आपमें क्षमता है तो आप अपने दुश्मनों से भी फायदा निकाल सकते हैं| इस संसार में आपको उतना ही  मिलता है जितने की “जम्मेदारी” लेने की क्षमता आप अपने अंदर विकसित कर लेते हो, ऐसे कुछ भी जो आपकी क्षमता से जयादा आपको  मिल भी जाता है तो वो मुश्किल ही टिक पता है, अगर कुछ चाहिए तो उसकी जम्मेदारी लेने की क्षमता अपने अंदर विकसित करो| हमारी क्षमता को मुख्य रूप से  तीन  प्रकार से वर्गीकरण कर सकते हैं:

1. व्यक्तिगत क्षमता

2. सामाजिक क्षमता

3. नीति  क्षमता

 1 व्यक्तिगत क्षमता: हमारे खुद अपनी  शैक्षणिक योग्यता, जीवन ज्ञान,शारीरिक क्षमता,व्यक्तिगत धन बल,  दूरद्रिष्टि , समझ, परख, संयम, आत्मनियंत्रण,आत्मविश्वास और इनसे प्राप्त उपलब्धियां व्यक्तिगत क्षमता के उदाहरण हैं|

2. सामाजिक क्षमता: व्यक्तिगत क्षमता से केवल एक हद तक ही पहुँच सकते हैं उसके बाद और उससे ऊपर जाने के लिए हमे सहयोगी समूह की जरूरत होती है| हमारा अपना समाज हमारा रेडीमेड सहयोगी समूह होता है,अफ़सोस ये है की भारत में समाज जाती के आधार पर बनता है  |

 3. नीति  क्षमता : अर्थात भविष्य का आंकलन और प्लानिंग करने की क्षमता, ये प्लानिंग व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्थर पर  होनी चाहिए  | सामाजिक स्थर की प्लानिंग सामाजिक पंचायत या हमारे लिए कहें तो बौद्ध धम्म के झंडे के नीचे होती है |व्यक्तिगत और सामाजिक क्षमता की रक्षा कूटनेतिक योजना की क्षमता द्वारा ही किया जा सकता है| कूटनेतिक योजना की क्षमता  असल में ऊपर लिखी हुए दोनों क्षमताओं का ही हिस्सा है पर इसका महत्व तब बढ़ जाता है जब दूसरे लोग हमारी  क्षमता,सुख  और समृधी  को ख़त्म करने के कायावाद में लगे होते हैं|  

हमें सारा जीवन इन तीन क्षमताओं को बढ़ाने में प्रयासरत रहना चाहिए|संसार में हर किसी का हर कर्म  बस अपने आप के  अस्तित्व को बचाए रखने का वक्ती संगर्ष होता है, ये सारी जद्दोजहद बस नस्लों का संगर्ष है जिसमें क्षमताओं का युद्ध है, जो चलता आया है और चलता रहेगा, इसलिए केवल अपनी क्षमता बढ़ाने पर केन्द्रित रहो|”…समयबुद्धा

 गुरु मान्यवर समयबुद्धा जी का कहना है की

 “ज्ञात हो कि शूद्र ,अछूत,राक्षश की तरह “दलित” शब्द भी धम्म विरोधियों द्वारा फैलाया गया भ्रामक जाल है जो भारतीय बहुजनों  की इस पीढ़ी और आने वाली पीढयों को मानसिक रूप से कमजोर बनाये रखेगा। दलित शब्द कलंक है इसे त्यागो,अपने लिए ऐसे सम्भोधन चुनो जो आपकी शक्ति दिखाए कमजोरी नहीं| दलित शब्द कमजोरी बताता है,खुद को बौद्ध कहो और गौरवशाली विजेता बौद्ध इतिहास से जोड़ो |खुद को बहुजन कहो, बहुजन शब्द जनसंक्या बल दर्शाता है जिसमें सभी 6000 जातियां में बटे भारतीय लोग आते हैं| इज्ज़त मांगी नहीं जाती कमाई जाती है,जब तुम अपनी इज्ज़त खुद करोगे तभी तो दुनिया भी करेगी| जब तक दलित शब्द का इस्तेमाल होता रहेगा, तब तक विश्व जगत से कोई हमे बचाने आने के लिए आवाज नहीं लगाएगा। बौद्ध लिखो, कहो, दिखो। फिर देखो विश्व मे सबसे ज्यादा तुम्हारा समाज होगा, और तुम्हारी आवाज विश्व के कोने-कोने से सुनी जाएगी और तब भारत सरकार अपने अन्याय के लिए विश्व समुदाय के सामने लताड़ा जाएगी। जागरूक बनो, बौद्ध बनो,अपने आप को नवयान बौद्ध कहो, बुद्धिज़्म पूरी तरह विज्ञान के तर्को पर आधारित है और वैज्ञानिक है।

 आज सभी बौद्ध विहारों मे नीरास्ता फैली हुई है,खंडर की तरह पड़े हैं, तर्क पर आधारित बेहतरीन बौद्ध साहित्य की पूछ नहीं है,भारत में बहुजन मेजोरिटी में हैं फिर भी जब एक पर अत्याचार होता है तो बाकि कोई उसके पीछे नहीं खड़ा होता,कभी सोचा ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए है की हममे संगठन की कमी है,संगठन केवल बोलने से नहीं बनेगा इसके लिए एक प्लेटफार्म एक स्थाई झंडा चाहिए जो की बाबा साहब ने बौद्ध धम्म के रूप में दे दिया है|धम्म ही वो स्थाई मुद्दा है जिसके नाम पर इकठ्ठा होकर हम सब साझा निति बना सकते हैं और उसे चला सकते हैं,विचारों का आदान प्रदान, आपस में भाईचारा विकसित कर सकते हैं|बाकि के मुद्दे जैसे राजनीती अदि समय के साथ आते जाते रहते हैं पर धम्म सदा के लिए स्थाई है | जीवन में तरक्की  के मौके एक दुसरे को बताना,धंदा की मार्केटिंग, रिश्ते नाते अदि अनेकों मुददों  पर संगठन का जबरदस्त फायदा होता है| क्या आप इसे समझ सकते हो की धम्म दान ही असल में महा दान है क्योंकि दान से धन होता है, धन से धर्म चलता है,धर्म से निति और संगठन चलता है,निति और संगठन से सुरक्षा होती है|तो क्या आप अपनी सुरक्षा और तरक्की के लिए अपने समय उर्जा और कमाई का मात्र १% भी खर्च नहीं करोगे|”… समयबुद्धा

 समयबुद्धा जी से लोग अक्सर  पूछते हैं की जब बौद्ध क्रांति का इस देश में पतन कर दिया गया तो आज वो हमें कैसे सुख और सुरक्षा प्रदान कर सकता है?

 समयबुद्धा का कहना है की “उनकी भी बात बिलकुल सही है सही है, अगर हमने अपने इतिहास से सीखकर बौद्ध  धम्म के लिए कुछ नए नियम नहीं बनाये तो इतिहास फिर हमें सबक सिखा देगा इसलिए मैं ऐसे नियम प्रस्तावित करता हूँ जो बौद्ध धम्म को सदा के लिए चरम पर स्थापित कर देंगे|

 नियम:सत्य और दुक्ख-निरोध के साथ सुरक्षा भी धम्म लक्ष्य बनाओ:  धम्म का लक्ष्य केवल सत्य की खोज ही नहीं होना चाहिए बल्कि अपने अनुयायिओं की सुरक्षा भी होनी चाहिए क्योंकि अगर मार दिए गए तो हम सत्य का क्या करेंगे, मृत्यु हमारे परिवार और समाज का सबसे बड़ा दुक्ख है तो दुःख निरोध कैसे हो पायेगा|

 नियम: हर पूर्णिमा पर बौद्ध विहारों में संगठित वंदना : नया नियम हर पूर्णिमा को बौध विहार पर संगठित वंदना का नियम अनिवार्य करना होगा | बौध धर्म में पूर्णिमा का बड़ा महत्व है हमें ये नियम बनाना होगा की कम से कम महीने में एक बार अर्थात पूर्णिमा के दिन अपने निकटतम बौध विहारों पर संगठित होना होगा| ये भारत के 6000 जातियों में बंटे सभी मूलनिवासियों को संगठित करने का बहेतरीन  माध्यम है|इसके दो फायेदे होंगे एक तो धार्मिक ज्ञान से जीवन बेहतर होगा दुसरे हमारा संगठन बल साबित होगा |विहारों से हमारे समाज को बढ़ाने वाली  नीति  को जनसाधारण  और जनसाधारण  की जरूरतों  को ऊपर  बैठे  अपने समाज के बुद्धिजीवियों  एव राजनीतिज्ञों तक पहुचाया जा सकेगा|केवल धर्म ही स्थाई झंडा है, राजनेतिक पार्टी के नाम और चिन्ह  तो बदलते रहेंगे पर किसे  चुनना है  इसका सामूहिक फैसला केवल बौध विहारों पर ही हो पायेगा|

 नियम:हर पूर्णिमा पर बौद्ध विहारों जो जनता का आर्थिक समर्थन :बौद्ध धम्म में भिक्षा ही वो वजह है जिसने इसे कमजोर बनाया हुआ है|जब बौद्ध धम्म प्रवर्तक भगवान् बुद्धा ने भिक्षा की सहारा लिया था तब और बात थी पर अब ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं रह गई है|मैंने अक्सर देखा है ही नीरस पड़े बौद्ध विहारों में रह रहे बौद्ध भंते को दो वत का भोजन भी नहीं मिल पाता, क्योंकि हमारे लोग बौद्ध विहार पर झाँकने भी नहीं जाते| मैं भिक्षा की विरोध करता हूँ और हर महीने संगठित वंदना पर बौधों द्वारा दान देने की राये देता हूँ| हर महीने इकठा होने वाले धन से बौद्ध विहार और बौद्ध भाते दोनों का कल्याण होगा जिससे बौद्ध धम्म की नीरसता ख़तम होगी और ये आकर्षित होगा|परिणाम स्वरुप बौद्ध धम्म शक्तिशाली होगा और अपने अनुयायिओं को सुरक्षा देने में सक्षम होगा| भ्रस्टाचार के डर से ही भगवान बुद्ध ने बौद्ध विहारों में धन संचय को नाकारा था पर उन्होंने ये भी कहा है की आप अपना दीपक स्वेव बनों| हम ऐसे नियम बना सकते हैं जिससे भ्रस्टाचार नहीं होगा और धम्म का कल्याण भी होगा| बौद्ध धम्म का मुख्य लक्ष्य दुखों से छुटकारा दिलाना है, पर एक भी एक सार्वभौम जिन्दगी का नियम है की धन से जिन्दगी के साठ प्रतिशत दुःख दूर हो जाते हैं|ध्यान रहे भगवान बुद्ध ने निर्धन रहने को नहीं कहा न ही उन्होंने ये कहा है की कैसे भी बौहुत ज्यादा धनि बनो|दोनों अवस्थाओं में दुक्ख है, माध्यम मार्ग उत्तम है-न अधिक गरीब न अधिक अमीर|

 धन संचय बुरी चीज़ है पर गुलामी और धम्म की नकादरी उससे भी बुरी चीज़ है, अब फैसला आपके हाथों में है|”

भगवान् बुद्धा ने कहाँ है  सत्य  जानने  के मार्ग में इंसान बस दो ही गलती करता है ,एक वो शुरू ही नहीं करता दूसरा पूरा जाने बिना  ही छोड़ जाता है

भले ही हमारा मीडिया में शेयर न हो हम अपना मीडिया खुद हैं | अगर हम में से हर कोई हमारे समाज के फायदे की बात अपने दस साथिओं जो की हमारे ही लोग हों को मौखिक बताये या SMS या ईमेल या अन्य साधनों से करें तो केवल ७ दिनों में हर बुद्धिस्ट भाई के पास  हमारा सन्देश पहुँच सकता है | इसी तरह हमारा विरोध की बात भी 9 वे दिन तक तो देश के हर आखिरी आदमी तक पहुँच जाएगी | नीचे लिखे टेबल को देखो, दोस्तों जहाँ चाह वह राह, भले ही हमारा मीडिया में शेयर न, हो हम अपना मीडिया खुद हैं :

1ST DAY =10
2ND DAY =100
3RD DAY =1,000
4TH DAY =10,000
5TH DAY =100,000
6TH DAY =1,000,000
7TH DAY =10,000,000
8TH DAY =100,000,000
9TH DAY =1,000,000,000
10TH DAY =1,210,193,422

बौध साहित्य बहुत विस्तृत है, अकेला कोई उतना नहीं कर सकता जितना की हम सब मिल कर कर सकते हैं| आओ हम मिलकर अपने दुखों से छुटकारा पा लें|आओ समयबुद्धा मिशन को तन मन धन से समर्थन कर के अपने समाज को शशक्त  करें| ध्यान रहे कमजोर का कोई नहीं होता|

 ट्रस्ट के अन्य कार्य और उद्देश्य इस प्रकास से हैं :

 – केवल सर्व शक्तिमान,सर्व समर्थ,सर्व व्याप्त ‘समय’ को ही प्रमाणित इश्वरिये शक्ति के रूप में स्वीकार करना

-इस समय चक्र के मर्ग्दाता भगवान् बुद्ध के ही मार्ग का अनुशरण करना या पर चलना

 -अपने अपने पेशा के व्यवहार की स्वतंत्रता को बढ़ावा देना व धर्म का प्रचार प्रसार करना

 -गरीब और पिछड़े वर्गों के प्रतिभावान व्यक्तिओं की प्रतिभा को पहचानना और उसको उभारना व बढ़ावा देना -धर्मनिरपेक्षवाद को उभारना व बढ़ावा देना

  -सर्वव्यापी शांति,तालमेल और सुरक्षा को उभारना व बढ़ावा देना -आर्ट, लिटरेचर, विज्ञानं और वाणिज्य को समाज व देश हित में प्रचार, प्रसार व बढ़ावा देना

 -गरीब पिछड़े और जरूरतमंदों की सहायता हेतु गरम कपडे, कम्बल, और एनी प्रकार के कपडे जुटाना व उन्हें बांटना -गरीब पिछड़े और जरूरतमंदों की सहायता हेतु शिक्षण संस्थान जैसे कालेज,स्कूल,पुस्तकालय,निशुल्क ज्ञान केंद्र, के लिए आर्थिक मदत,साजसामान जुटाना और इन्हें स्थापित करना व चलाना

 -गरीब पिछड़े और जरूरतमंदों की सहायता हेतु समस्त प्रकार से मेडिकल सहायता जैसे व्यायामशाला,हॉस्पिटल, नुर्सिंग होम,मेटरनिटी होम ,के लिए आर्थिक मदत,साजसामान जुटाना और इन्हें स्थापित करना

  -गरीब पिछड़े और जरूरतमंदों की सहायता हेतु धर्मशाला,सामुदायिक केंद्र, एव प्रेरणा स्थल के लिए आर्थिक मदत,साजसामान जुटाना और इन्हें स्थापित करना व चलाना -गरीब पिछड़े और जरूरतमंदों की सहायता हेतु स्वरोजगार व उसके लिए ट्रेनिंग आर्थिक मदत,साजसामान जुटाना और इन्हें आत्मनिर्भर करना

 -प्रकृति और पर्यावरण की हर संभव रक्षा करना खासकर पेड़ लगाना और उसके रक्षा करना -प्राकतिक आपदा में सरकारी तंत्र के साथ मिलकर हर क्षतिग्रस्थों की हर संभव मदत करना

 -मूल भारत की संस्कृति और परम्पराओं को उभारना व बढ़ावा देना|

 नमो बुद्धाय, जय भीम,नमो समयबुद्धा

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बुद्ध पूर्णिमा (25-MAY-2013) की शुभकामनायें:- भगवान् बुद्ध का जीवन परिचय

भगवान् बुद्ध  का जीवन परिचय 

 भगवान् बुद्ध  के बारे में कुछ भी कहना सूरज को दिया दिखाने जैसा है,उनके व्यक्तित्व और सिद्धांत के आगे कोई नहीं टिक सकता| जो एक बार बौध धम्म कोठीक से समझ लेता है वो फिर कहीं नहीं जा सकता| बौद्ध धर्म को पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं और यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है।  भगवान् बुद्ध  को ‘गौतम बुद्ध ‘, ‘ महात्मा बुद्ध ‘ आदि नामों से भी जाना जाता है। वे संसार प्रसिद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक हैं। बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है। आज बौद्ध धर्म सारे संसार के चार बड़े धर्मों में से एक है। इसके अनुयायियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। इस धर्म के संस्थापक भगवान् बुद्ध  राजा शुद्धोदन के पुत्र थे और इनका जन्म स्थान लुम्बिनी नामक ग्राम था। वे छठवीं से पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जीवित थे। उनके गुज़रने के बाद अगली पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ैला गया और अगले दो हज़ार सालों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फैल गया। आज बौद्ध धर्म में तीन मुख्य सम्प्रदाय हैं- ‘थेरवाद‘, ‘महायान‘ और ‘वज्रयान‘।Buddha24

जन्म भगवान् बुद्ध  का मूल नाम ‘सिद्धार्थ‘ था। सिंहली, अनुश्रुति, खारवेल के अभिलेख, अशोक के सिंहासनारोहण की तिथि, कैण्टन के अभिलेख आदि के आधार पर  भगवान् बुद्ध  की जन्म तिथि 563 ई.पूर्व स्वीकार की गयी है। इनका जन्म शाक्यवंश के राजा शुद्धोदन की रानी महामाया के गर्भ से लुम्बिनी में वेशाक  पूर्णिमा के दिन हुआ था। शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी में उनका जन्म हुआ। सिद्धार्थ के पिता शाक्यों के राजा शुद्धोधन थे। भगवान् बुद्ध  को शाक्य मुनि भी कहते हैं। सिद्धार्थ की माता मायादेवी उनके जन्म के कुछ देर बाद मर गई थी। कहा जाता है कि फिर एक ऋषि ने कहा कि वे या तो एक महान राजा बनेंगे, या फिर एक महान साधु। लुम्बिनी में, जो दक्षिण मध्य नेपाल में है, सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में भगवान् भगवान् बुद्ध  के जन्म की स्मृति में एक स्तम्भ बनवाया था। मथुरा में अनेक बौद्ध कालीन मूर्तियाँ मिली हैं। जो मौर्य काल और कुषाण काल में मथुरा की अति उन्नत मूर्ति कला की अमूल्य धरोहर हैं। भगवान् बुद्ध  की जीवन-कथाओं में वर्णित है कि सिद्धार्थ ने कपिलवस्तु को छोड़ने के पश्चात् अनोमा नदी को अपने घोड़े कंथक पर पार किया था और यहीं से अपने परिचारक छंदक को विदा कर दिया था।

 लुंबिनीग्राम-कपिलवस्तु के पास ही लुम्बिनी ग्राम स्थित था, जहाँ पर भगवान् बुद्ध  का जन्म हुआ था। इसकी पहचान नेपाल कीतराई में स्थित रूमिनदेई नामक ग्राम से की जाती है। बौद्ध धर्म का यह एक प्रमुख केन्द्र माना जाने लगा। महान सम्राट अशोक अपने राज्य-काल के बीसवें वर्ष धर्मयात्रा करते हुए लुम्बिनी पहुँचे  थे । उन्होंने इस स्थान के चारों ओर पत्थर की दीवाल खड़ी कर दी। वहाँ उन्होंने एक स्तंभ का निर्माण भी किया, जिस पर उनका  एक लेख ख़ुदा हुआ है। यह स्तंभ अब भी अपनी जगह पर विद्यमान है। विद्वानों का ऐसा अनुमान है कि महान सम्राट अशोक की यह लाट ठीक उसी जगह खड़ी है, जहाँ भगवान् बुद्ध  का जन्म हुआ था। अशोक ने वहाँ के निवासियों को कर में भारी छूट दे दी थी। जो तीर्थयात्री वहाँ आते थे, उन्हें अब यहाँ यात्रा-कर नहीं देना पड़ता था। वह कपिलवस्तु भी आये  हुए थे भगवान् गौतम भगवान् बुद्ध  के जिस स्तूप का निर्माण शाक्यों ने किया था, उसे उन्होंने आकार में दुगुना करा दिया था। लुम्बिनी में जन्म लेने वाले भगवान् भगवान् बुद्ध  को काशी में धर्म प्रवर्त्तन करना पड़ा। त्रिपिटक तथा जातकों से काशी के तत्कालीन राजनीतिक महत्त्व की सहज ही कल्पना हो जाती है। प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में भगवान् भगवान् बुद्ध  काल में (कम से कम पाँचवी शताब्दि ई.पूर्व) काशी की गणना चम्पा, राजगृह, श्रावस्ती, साकेत एवं कौशाम्बी जैसे प्रसिद्ध नगरों में होती थी। भगवान् बुद्ध  (सिद्धार्थ) के जन्म से पहले उनकी माता ने विचित्र सपने देखे थे। पिता शुद्धोदन ने ‘आठ‘ भविष्य वक्ताओं से उनका अर्थ पूछा तो सभी ने कहा कि महामाया को अद्भुत पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। यदि वह घर में रहा तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा और यदि उन्होंने गृह त्याग किया तो संन्यासी बन जाएगा और अपने ज्ञान के प्रकाश से समस्त विश्व को आलोकित कर देगा। शुद्धोदन ने सिद्धार्थ को चक्रवर्ती सम्राट बनाना चाहा, उसमें क्षत्रियोचित गुण उत्पन्न करने के लिये समुचित शिक्षा का प्रबंध किया, किंतु सिद्धार्थ सदा किसी चिंता में डूबे दिखाई देते थे। अंत में पिता ने उन्हें विवाह बंधन में बांध दिया। एक दिन जब सिद्धार्थ रथ पर शहर भ्रमण के लिये निकले थे तो उन्होंने मार्ग में जो कुछ भी देखा उन्होंने उनके जीवन की दिशा ही बदल डाली। एक बार एक दुर्बल वृद्ध व्यक्ति को, एक बार एक रोगी को और एक बार एक शव को देख कर वे संसार से और भी अधिक विरक्त तथा उदासीन हो गये। पर एक अन्य अवसर पर उन्होंने एक प्रसन्नचित्त संन्यासी को देखा। उसके चेहरे पर शांति और तेज़ की अपूर्व चमक विराजमान थी। सिद्धार्थ उस दृश्य को देख-कर अत्यधिक प्रभावित हुए।

गृहत्याग बालक  सिद्धार्थ के मन में निवृत्ति मार्ग के प्रति नि:सारता तथा निवृति मर्ण की ओर संतोष भावना उत्पन्न हो गयी। जीवन का यह सत्य सिद्धार्थ के जीवन का दर्शन बन गया। विवाह के उपरान्त उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। पुत्र जन्म का समाचार मिलते ही उनके मुँह से सहसा ही निकल पड़ा- ‘राहु‘- अर्थात बंधन। उन्होंने पुत्र का नाम ‘राहुल‘ रखा। इससे पहले कि सांसारिक बंधन उन्हें छिन्न-विच्छिन्न करें, उन्होंने सांसारिक बंधनों को छिन्न-भिन्न करना प्रारंभ कर दिया और गृहत्याग करने का निश्चय किया। एक महान रात्रि को 29 वर्ष के युवक सिद्धार्थ ज्ञान प्रकाश की तृष्णा को तृप्त करने के लिये घर से बाहर निकल पड़े। कुछ विद्वानों का मत है कि गौतम ने यज्ञों में हो रही हिंसा के कारण गृहत्याग किया। कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार गौतम ने दूसरों के दुख को न सह सकने के कारण घर छोड़ा था।

ज्ञान की प्राप्ति गृहत्याग करने के बाद सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में भटकने लगे। बिंबिसार, उद्रक, आलार एवम् कालाम नामक सांख्योपदेशकों से मिलकर वे उरुवेला की रमणीय वनस्थली में जा पहुँचे। वहाँ उन्हें कौंडिल्य आदि पाँच साधक मिले। उन्होंने ज्ञान-प्राप्ति के लिये घोर साधना प्रारंभ कर दी। किंतु उसमें असफल होने पर वे गया के निकट एक वटवृक्ष के नीचे आसन लगा कर बैठ गये और निश्चय कर लिया कि भले ही प्राण निकल जाए, मैं तब तक समाधिस्त रहूँगा, जब तक ज्ञान न प्राप्त कर लूँ। सात दिन और सात रात्रि व्यतीत होने के बाद, आठवें दिन वैशाख पूर्णिमा को उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और उसी दिन वे तथागत हो गये। जिस वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ वह आज भी ‘बोधिवृक्ष‘ के नाम से विख्यात है। ज्ञान प्राप्ति के समय उनकी अवस्था 35 वर्ष थी। ज्ञान प्राप्ति के बाद ‘तपस्सु‘ तथा ‘काल्लिक‘ नामक दो शूद्र उनके पास आये। भगवान् बुद्ध  नें उन्हें ज्ञान दिया और बौद्ध धर्म का प्रथम अनुयायी बनाया। बोधगया, बिहार से चल कर वे सारनाथ पहुँचे तथा वहाँ अपने पूर्वकाल के पाँच साथियों को उपदेश देकर अपना शिष्य बना दिया। बौद्ध परंपरा में यह उपदेश ‘धर्मचक्र प्रवर्त्तन‘ नाम से विख्यात है।  भगवान् बुद्ध  ने कहा कि इन दो अतियों से सदैव बचना चाहिये-

-काम,मोह,धन,विलास आदि सुखों में अधिक लिप्त होना तथा

-शरीर से कठोर साधना करना। उन्हें छोड़ कर जो मध्यम मार्ग मैंने खोजा है, उनका अनुसरण  करना चाहिये।

यही उपदेश इनका ‘धर्मचक्र प्रवर्तन‘ के रूप में पहला उपदेश था। अपने पाँच अनुयाइयों के साथ वे वाराणसी पहुँचे। यहाँ उन्होंने एक श्रेष्ठि पुत्र को अपना अनुयायी बनाया तथा पूर्णरुप से ‘धर्म प्रवर्त्तन‘ में जुट गये। अब तक उत्तर भारत में इनका काफ़ी नाम हो गया था और अनेक अनुयायी बन गये थे। कई वर्षों बाद महाराज शुद्धोदन ने इन्हें देखने के लिये कपिलवस्तु बुलवाना चाहा, लेकिन जो भी इन्हें बुलाने आता वह स्वयं इनके उपदेश सुन कर इनका अनुयायी बन जाता था। इनके शिष्य घूम-घूम कर इनका प्रचार करते थे।

भगवान् बुद्ध  की शिक्षा-मनुष्य जिन दु:खों से पीड़ित है, उनमें बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे दु:खों का है, जिन्हें मनुष्य ने अपने अज्ञान, ग़लत ज्ञान या मिथ्या दृष्टियों से पैदा कर लिया हैं उन दु:खों का प्रहाण अपने सही ज्ञान द्वारा ही सम्भव है, किसी के आशीर्वाद या वरदान, देवपूजा,यग,ब्रह्मणि कर्मकांडों, ज्योतिष आदि  से उन्हें दूर नहीं किया जा सकता। सत्य या यथार्थता का ज्ञान ही सम्यक ज्ञान है। हम अपने जन्म से मरण तक जो भी करते हैं उस सबका एक ही अंतिम मकसद होता है-स्थाई खुशी या निर्वाण  अत: सत्य की खोज- ‘निर्वाण या स्थाई ख़ुशी’ के लिए परमावश्यक है। खोज अज्ञात सत्य की ही की जा सकती है,यदि सत्य किसी शास्त्र, आगम या उपदेशक द्वारा ज्ञात हो गया है तो उसकी खोज नहीं। अत: बुद्ध ने अपने पूर्ववर्ती लोगों द्वारा या परम्परा द्वारा बताए सत्य को और वेद पुराण जैसे हर काल्पनिक धर्म ग्रंथों को नकार दिया और अपने लिए नए सिरे से सत्य की खोज की। बुद्ध स्वयं कहीं प्रतिबद्ध नहीं हुए और न तो अपने शिष्यों को उन्होंने कहीं बांधा। उन्होंने कहा कि मेरी बात को भी इसलिए चुपचाप न मान लो कि उसे बुद्ध ने कही है। उस पर भी सन्देह करो और विविध परीक्षाओं द्वारा उसकी परीक्षा करो। जीवन की कसौटी पर उन्हें परखो, अपने अनुभवों से मिलान करो, यदि तुम्हें सही जान पड़े तो स्वीकार करो, अन्यथा छोड़ दो। यही कारण था कि उनका धर्म रहस्याडम्बरों से मुक्त, मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत एवं हृदय को सीधे स्पर्श करता था। संसार में केवल गौतम बुद्ध का सिद्धांत ही ऐसा है तो हर युग में हर परिस्थिथि में एक सा ही लाभकारी  है जबकि अन्य धर्मों के सिद्धांत वैज्ञानिक  तरक्की और समय गुजरने के बाद झूठे साबित होते जाते हैं | ऐसा इसलिए है क्योंकि बौध धम्म में ऐसा कुछ भी स्वीकार नहीं होता जिसका प्रमाण उपलब्ध न हो यही बौध धम्म का सार है |

त्रिविध धर्मचक्र प्रवर्तन- भगवान बुद्ध प्रज्ञा व करुणा की मूर्ति थे। ये दोनों गुण उनमें उत्कर्ष की पराकाष्ठा प्राप्त कर समरस होकर स्थित थे। इतना ही नहीं, भगवान बुद्ध अत्यन्त उपायकुशल भी थे। उपाय कौशल बुद्ध का एक विशिष्ट गुण है अर्थात वे विविध प्रकार के विनेय जनों को विविध उपायों से सन्मार्ग पर आरूढ़ करने में अत्यन्त प्रवीण थे। वे यह भलीभाँति जानते थे कि किसे किस उपाय से सन्मार्ग पर आरूढ़ किया जा सकता है। फलत: वे विनेय जनों के विचार, रूचि, अध्याशय, स्वभाव, क्षमता और परिस्थिति के अनुरूप उपदेश दिया करते थे। भगवान बुद्ध की दूसरी विशेषता यह है कि वे सन्मार्ग के उपदेश द्वारा ही अपने जगत्कल्याण के कार्य का सम्पादन करते हैं, न कि वरदान या ऋद्धि के बल से, जैसे कि शिव या विष्णु आदि के बारे में अनेक कथाएँ पुराणों में प्रचलित हैं। उनका कहना है कि तथागत तो मात्र उपदेष्टा हैं, कृत्यसम्पादन तो स्वयं साधक व्यक्ति को ही करना है। वे जिसका कल्याण करना चाहते हैं, उसे धर्मों (पदार्थों) की यथार्थता का उपदेश देते थे। भगवान बुद्ध ने भिन्न-भिन्न समय और भिन्न-भिन्न स्थानों में विनेय जनों को अनन्त उपदेश दिये थे। सबके विषय, प्रयोजन और पात्र भिन्न-भिन्न थे। ऐसा होने पर भी समस्त उपदेशों का अन्तिम लक्ष्य एक ही था और वह था विनेय जनों को दु:खों से मुक्ति की ओर ले जाना। निर्वाण ही उनके समस्त उपदेशों का रस है।

अंतिम उपदेश एवं परिनिर्वाण- बौद्ध धर्म का प्रचार बुद्ध के जीवन काल में ही काफ़ी हो गया था, क्योंकि उन दिनों कर्मकांड का ज़ोर काफ़ी बढ़ चुका था और पशुओं की हत्या बड़ी संख्या में हो रही थी। इन्होंने इस निरर्थक हत्या को रोकने तथा जीव मात्र पर दया करने का उपदेश दिया। प्राय: 44 वर्ष तक बिहार तथा काशी के निकटवर्त्ती प्रांतों में धर्म प्रचार करने के उपरांत अंत में कुशीनगर के निकट एक वन में शाल वृक्ष के नीचे वृद्धावस्था में इनका परिनिर्वाण अर्थात शरीरांत हुआ। मृत्यु से पूर्व उन्होंने कुशीनारा के परिव्राजक सुभच्छ को अपना अन्तिम उपदेश दिया। कुशीनगर बुद्ध के महापरिनिर्वाण का स्थान है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले से 51 किमी की दूरी पर स्थित है। बौद्ध ग्रंथ महावंश में कुशीनगर का नाम इसी कारण कुशावती भी कहा गया है। बौद्ध काल में यही नाम कुशीनगर या पाली में कुसीनारा हो गया। एक अन्य बौद्ध किंवदंती के अनुसार तक्षशिला के इक्ष्वाकु वंशी राजा तालेश्वर का पुत्र तक्षशिला से अपनी राजधानी हटाकर कुशीनगर ले आया था। उसकी वंश परम्परा में बारहवें राजा सुदिन्न के समय तक यहाँ राजधानी रही। इनके बीच में कुश और महादर्शन नामक दो प्रतापी राजा हुए जिनका उल्लेख गौतम बुद्ध ने किया था।

मुख से निकले अंतिम शब्द-भगवान बुद्ध ने जो अंतिम शब्द अपने मुख से कहे थे, वे इस प्रकार थे-

“हे भिक्षुओं, इस समय आज तुमसे इतना ही कहता हूँ कि जितने भी संस्कार हैं, सब नाश होने वाले हैं, प्रमाद रहित हो कर अपना कल्याण करो।” यह 483 ई. पू. की घटना है। वे अस्सी वर्ष के थे। 

jileraj@gmail.com