इश्वर के काल्पनिक सिद्धांत पर बौद्ध मत


इश्वर के काल्पनिक सिद्धांत पर बौद्ध मत  

 

एक बार भगवान बुद्धा कहीं जा रहे थे उनके पीछे पीछे  एक व्यक्ति उनके पदचिन्हों को देखता चल रहा था| उसे वो पदचिन्ह बहुत अजीब और अनजाने लगे| जब आगे जाकर बुद्धा एक जगह पेड़ के नीचे बैठ गए तो वो उनके पास आया और नमन करके बोला की वो कुछ पूछना चाहता है| बुद्धा की इजाजत पाकर उसने पुछा:-

 

आप कौन हो क्या आप देवता हो ? बुद्धा ने कहानहीं |

क्या आप भूत हो ? बुद्धा ने कहानहीं |god

क्या आप जादूगर हो? बुद्धा ने कहानहीं |

क्या आप इंसान हो? बुद्धा ने कहानहीं |

ऐसे ही अनेकों प्रश्न पूछे पर सबका जवाब में पाकर आखिर उसने पूछ की क्याप्या बताये आप कौन हो ?

इसपर बुद्धा ने कहाँ मैं बुद्धा हूँ  तुम मुझे बुद्धा कह सकते हो|

उसने पुछा बुद्धा का मैं क्या मतलब समझूं

भाग बुद्धा ने बताया: बुद्धा का मतलब है वो व्यक्ति जो मोह माया , सुख दुःख, इच्छा तृष्णा अधि अनेकों दुख के कारणों से आगे निकल आया हो जो परम सत्य को जान गया हो

भगवन बुद्ध ने न तो कभी स्वव को भगवान और सर्व्सक्तिमान कहा न ही किसी के भगवान और सर्व्सक्तिमान होने की ही बात कही| उनका मन्ना था की जो साबित नहीं हो सकता और अविस्निये है, इसी लिए भगवान और सर्व्सक्तिमान के रूप में समय को मान लेना तर्क सांगत लगता है |  बौध मत में हम ये कह सकते हैं की इश्वर को इंसान ने बनाया न की इश्वर ने इंसान को|

ईशवर है या नही ? इस प्रशन पर भगवान बुद्ध प्राय: मौन रहे । अनाथपिण्डक के साथ चर्चा करते हुये श्रावस्ती मे बुद्ध ने अनाथपिण्डक को कुछ इस तरह समझाया – “ यदि यह सृष्टि किसी ईश्वर द्वारा बनाई गई होती , तो इसमे कुछ भी परिवर्तन न होता , कुछ भी वितुष्ट नही होता , दु:ख दर्द नाम की कोई चीज न होती । सही या गलत कुछ न होता । क्योकि पवित्र और अपवित्र सभी चीजों के मूल में वही होता । यदि दु:ख और सुख , प्रेम और घृणा जो सभी प्राणियों के चित्त मे निवास करती है ,ईशवर की कृति होती , तो उसी ईशवर मे भी उस दुख सुख का निवास होना चाहिये , प्रेम और घृणा का घर होना चाहिये । और यदि उस ईशवर मे भी यह सब कुछ है तो उसे परिपूर्ण कैसे मान सकते है ? यदि ईशवर सभी प्राणियों का निर्माता है और सभी प्राणियों को उसके सामने सर झुकाये खडा रहाना है तो शील के अभ्यास का क्या प्रयोजन ? पुण्य पाप करना समान होगा , क्योंकि सभी कर्म तो ईशवर की कृति हैं और अपने कर्ता की दृष्टि मे वे समान ही होगें । और यदि यह मान लिया जाये दु:ख सुख का कारण और भी होगा , जिस का कारण ईशवर नही है तब जो भी विधमान है उस सभी को बिना कारण के उत्पन्न क्यों न मान लिया जाये ? फ़िर यदि ईशवर को कर्ता माना जाये तो प्रशन यह उठता है कि उस की रचना सोद्देशय है या निरुद्देशय ? यदि यह माना जाये कि सोद्देशय तो ईशवर को परिपूर्ण नही माना जा सकता , क्योंकि सोद्देशय का मतलब है किसी की इच्छा की पूर्ति । इसलिये ईशवर का जि विचार है वह तर्क की कसोटी पर सही नही उतरता ।

( अशवघोष का बुद्ध चरित )

 

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