शक्तिशाली शक्तिशाली का दोस्त होता है और कमजोर कमजोर का दुश्मन- समयबुद्धा (बौध /बहुजन दार्शनिक एव उपदेशक)


ये  जिन्दगी का नियम है की शक्तिशाली शक्तिशाली का दोस्त होता है और कमजोर कमजोर का दुश्मन 

इसीलिए  दलित ही दलित का सबसे बड़ा दुश्मन है|मैं दलित इतिहास की जितनी समीक्षा करता हूँ उतना ही ये तथ्य साबित होता है की दलित ही वास्तव में दलित का दुश्मन है|सारा इतिहास उठा कर देख लो मौकापरस्त मनुवादियों में कभी इतनी हिम्मत नहीं हुई की वो बहुजन शक्ति से सीधी टक्कर ले सकें,हमेश षडियन्त्र का सहारा लिया|जैसे लोहे सबसे जीत जाता है पर अपनी ही जंग से हार जाता है उसी तरह हर हार में अपने ही बहुजन साथी का निकम्मापन या दगाबाजी मिलेगी|इसीलिए मनुवादी हमेशा कहते हैं की ये लोग बलवान तो हो सकते हैं पर कभी स्थाई नहीं होंगे| हजारों साल की गुलामी के बाद भी क्या हम इतिहास से कुछ सीखेंगे?

किसी भी देश की शोषित कौम (दलित) का उद्धार करना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि  इसके लिए उन्हें उनकी कमियों का अहसास करके सुधरने को प्रेरित करना होता है|किसी को भी उसकी कमी बताओ तो वो बुरा मान कर अपने सुधारक की ही खिलाफत करता है| उधर दूसरी तरफ ऐसा सुधारक शोषक की नजरों में भी खटक जाता है परिणाम शोषित और शोषक दोनों का दुश्मन हो जाता है| जबकि अगर वही बुद्धिमान सुधारक शाषक का साथ दे तो लाभ में रहता है इसीलिए शायद ये कहावत बनी है की मूर्ख मित्र से बुद्धिमान दुश्मन ज्यादा हितकारी होता है|यही कारन है की सभी दार्शनिक और समाज सुधारक का शाशकों द्वारा दमन कर दिया जाता है| अफ़सोस जीते जी ऐसा व्यक्ति दुखी रहता है और लोग उसके मरने के बाद ही उसकी बातें समझते हैं|केवल एक बढ़ी क्रांति का बल ही परिस्थिति बदल पता है क्योंकि ये जिन्दगी का नियम है की जो जिस गति में हैं उसी गति में रहना चाहता है अगर उसकी गति या दिशा बदलनी है तो किसी बल का प्रयोग करना पड़ता है|

मूर्खों से बहस करने पर सबसे पहले वो तुमको अपने स्थर तक गिराएंगे और फिर तुमको ही मूर्ख साबित कर देंगे|अगर आप ऐसे मूर्खों को ज्ञान देने जाओगे तो आपको ही उल्टा अज्ञान परोस देंगे और आपके ज्ञान की खिल्ली उड़ाएंगे| बहुजनों के मिशन को कभी खतरा बहार से नहीं रहा अपने अंदर के विभीषणों ने लंका जलवाई है|मूर्खों को अपने शूद्र होने का अफ़सोस नहीं है बल्कि अपनी विरोधियों का गुलाम होने में फक्र है

खलील जिब्रान की एक कहानी में उन्होंने लिखा है कि मैंने जंगल में रहने वाले एक फ़कीर से पूछा कि आप इस बीमार मानवता का इलाज क्यों नहीं करते . तो उस फ़कीर ने कहा कि… तुम्हारी यह मानव सभ्यता उस बीमार की तरह है जो चादर ओढ़ कर दर्द से कराहने का अभिनय तो करता है. पर जब कोई आकर इसका इलाज करने के लिये इसकी नब्ज देखता है तो यह चादर के नीचे से दूसरा हाथ निकाल कर अपना इलाज करने वाले की गर्दन मरोड़ कर अपने वैद्य को मार डालता है और फिर से चादर ओढ़ कर कराहने का अभिनय करने लगता है .
धार्मिक, जातीय घृणा, रंगभेद और नस्लभेद से बीमार इस मानवता का इलाज करने की कोशिश करने वालों को पहले तो हम मार डालते हैं . उनके मरने के बाद हम उन्हें पूजने का नाटक करने लगते हैं|

मूर्ख खुद अपना,अपने परिवार का और अपनी कौम का  ही दुश्मन होता है |

सवर्णों और दलितों में जो सबसे बड़ा फर्क मुझे समझ में आया वो ये है की जैसे ही सुख के दिन आते हैं दलित अपने समाज और संगर्ष को छोड़ देता है जबकि सवर्ण इसके उलट जितना संपन्न होता जाता है उतना ही संगर्ष और अपने समाज के उत्थान के लिए समर्पित होता जाता है| हमारे सक्षम वर्ग को ये समझना होगा की अम्बेडकरवाद संगर्ष के चलते उनकी जिन्दगी में आज जो सम्पन्नता आई है उससे अर्जित ज्ञान,धन और समय का ५% हिस्सा इसी संगर्ष पर खर्च करना होगा वरना वो नीं दूर नहीं ये ५% बचने के चक्कर में पूरा १०० % छीनने वाले का सामना अकेले करना पड़ेगा|हमारा संगर्षबल है अपना शिक्षित और साधन संपन्न वर्ग, पर दुःख की बात ये है की वो अपने सुखों में इतना चूर है कि उसे संगर्ष कि जरूरत ही महसूस नहीं होती|अगर उससे संगर्ष कि बात करो तो ऐसे बिदक जाता है जैसे अपराध कर दिया हो|एक कहावत है-‘जाके पैर न फटी बिवाई सो का जाने पीर पराई’| जब इनके साथ अन्याय होता है तब इनको समाज क़ी याद आती है पर तब तक देर हो चुकी होती है| जिस समाज के शशक्तिकरन में इन्होने कोई योगदान नहीं दिया वो इनका लिए तब क्या कर सकेगा? इसके विपरीत मनुवादी लोग सुख में भी संगर्ष नहीं छोड़ते इसीलिए वो शासक हैं और हमारे लोग सुख में बावरे होकर सब भूल जाते हैं इसलिए शोषित होते हैं|क्या हम अपने शोषण के इस मूल कारण को कभी समझ पायेंगे?

आज हमारे समाज में तीन तरह के लोग है-

१. अशिक्षित एव असक्षम वर्ग

२. शिक्षित वर्ग पर बहुजन संगर्ष से अपरिचित

३. शिक्षित,ज्ञानी,सक्षम और संगर्ष शील वर्ग

-इनमे से जो पहला वर्ग है वो जनसँख्या दबाव या भीड़ के रूप में सबसे ज्यादा संगर्ष को आगे ले जा रहा है |

-दूसरा वर्ग किसी काम का नहीं उल्टा ये विभीषण हैं |

-तीसरा वर्ग संगर्ष की अगुवाई करता है पर इन नए नए हुए ज्ञानियों में अपने आप को श्रेष्ट समझने और अन्य को हीन समझने का रोग लग गया है परिणाम मकसद एक होने के बावजूद ये लोग एक मंच पर नहीं आ पाते|

“ये जिन्दगी का नियम है की ज्ञानी बोलता पहले है पर समझदार पहले सुनता है, तोलता है फिर बोलता है| ज्ञानी होना काफी नहीं है समझदार होना जरूरी है अन्यथा हमारा संगर्ष कहीं नहीं पहुचेगा”

अपनी दुर्दाशी के लिए केवल उनकी दमन निति को दोषी ठहराने के अलावा उन दिनों को जरूर याद करना-कराना जब तुम्हें शिक्षित संगठित और संगर्ष रहने का पाठ पढ़ाने की कोशिश की जा रही थी और तुम उसे अनसुना करके अपने तुच्छ आयाशिओं में मगन थे|

 

दुनियां में दो तरह के लोग होते हैं

-एक जो अपनी वर्तमान दशा से खुश हैं, अपना इतिहास जानना नहीं चाहते और भविष्य के लिए कोई नीति और संगर्ष नहीं,ऐसे लोग क्या जिये क्या मरे| इनको कोई नहीं उठा सकता इनका दमन निश्चित है|

-दुसरे जो अपने इतिहास से सबक लेकर भविष्य की नीति बनाते और उसको अमल में लाने को संगर्ष करते हैं|ये अपने आप को शोषण करने लायक बुलंद कर लेते हैं ये इनका अधिकार है|

असल में संगर्ष और ज्ञान उन लोगों के लिए है जो अपनी वर्तमान स्तिथि को बदलना चाहते हैं|आप सोचिये आप किस तरफ हैं ?

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गुरु  समयबुद्धा बौध /बहुजन दार्शनिक एव उपदेशक

 

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