बौद्ध दर्शन के विकास व विनाश के षड़यंत्रों की साक्षी रही पहली सहस्राब्दी…डा0 तुलसी राम

बौद्ध दर्शन के विकास व विनाश के षड़यंत्रों की साक्षी रही पहली सहस्राब्दी…डा0 तुलसी राम
विगत् कुछ वर्षों में यूरोप तथा अमरीका के हजारों रोमन कैथोलिकों ने बौद्ध धर्म अपनाया है, जिनमें इटली के विश्व प्रसिद्ध फुटबाल खिलाड़ी राबर्टो बज्जियो तथा हालीबुड के सुपर स्टार रिचार्ड गेरे भी शामिल हैं। पिछले दिनों रोम के एक अखबार को दिये गये साक्षात्कार में सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति गोर्वाचोव ने ठीक ही कहा ‘इक्कीसवीं सदी बुद्ध की सदी होगी।`
“मैंने तुझे नौका दी थी नदी पार करने के लिए न कि पार होने के बाद सिर पर ढोने के लिए।” बुद्ध की इस उक्ति से उनके तर्क-संगत दर्शन की साफ झलक मिल जाती है। उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण शिक्षा यह थी कि सत्य को पहले तर्क की कसौटी पर परखो, फिर उसमें विश्वास करो। इसे उन्होंने अपनी शिक्षाओं पर भी लागू किया। उन्होंने साफ कहा कि मेरी बात इसलिए नहीं मानो कि मैं स्वयं (बुद्ध) कह रहा हूं, बल्कि ‘सत्य हो` तभी मानो। अब तक इस धरती पर किसी दार्शनिक या ईश्वर ने अपने बारे में ऐसा नहीं कहा।

ढाई हजार वर्ष पूर्व जब बुद्ध के विचार विकसित हुए उस समय भारत में कुल ६२ विचारधाराओं के मत केन्द्र प्रचलित थे, जिनमें ऊंच-नीच पर आधारित वैदिक विचारधारा सर्वोपरि थी। इस तथ्य की ज्वलंत पुष्टि संघ परिवार द्वारा शासित गुजरात के नवीं कक्षा के ‘सामाजिक अध्ययन` नाम पाठ्यक्रम से होती है, जिसमें कहा गया है : ‘वर्ण-व्यवस्था आर्यों द्वारा मानव जाति को दिया गया एक अमूल्य उपहार है।` यदि सही मायनों में देखा जाए तो इसी ऊंची-नीच पर आधारित वर्ण व्यवस्था के विरोध में तथागत् बुद्ध का दर्शन विकसित हुआ। यही कारण था कि आर्य संस्कृति की रक्षा करने का नारा देने वाले तत्वों ने हर सदी में बौद्ध धर्म को नष्ट करने का षड्यंत्र जारी रखा। इसी षड्यंत्र के तहत आज का ‘संघ परिवार` स्कूली पाठ्यक्रमों में आर्य संस्कृति का गुणगान करते हुए एक तरफ वर्ण व्यवस्था को न्यायोचित ठहरा रहा है, तो दूसरी ओर बौद्ध धर्म को रोकने का प्रयास कर रहा है।

यदि विश्व स्तर पर देखा जाय तो बुद्ध के समय में चीन में कनफ्यूसियस विचार तथा ईरान में जोरोस्टर या जर्तुस्ती विचारधारा का बोलबाला था। बाकी दुनिया ग्रीस को छोड़कर लगभग विचार शून्य ही थी। उस समय भारत सैकड़ों रियासतों में बंटा हुआ था तथा हर एक दूसरे के खून के प्यासे थे। स्वयं बुद्ध के पिता शक्यवंशीय शुद्दोधन की राजधानी कपिलवस्तु हमेशा से पासवर्ती राज्य कोसल के निशाने पर थी। अंततोगत्वा कोसल के राजा विदुदाभ ने शाक्यों को बर्बाद कर दिया तथा बुद्ध की प्रिय स्थली श्रावस्ती के राजा प्रसेनजित् को अपने ही बेटे ने पदच्युत कर दिया। प्रसेनजित बुद्ध के प्रशंसक मगध सम्राट अजातशत्रु से सहायता के लिए भागा, किन्तु रास्ते में ही मर गया। एक तरफ ऐसा अशांत वातावरण तो दूसरी ओर जिसे आर्य संस्कृति कहा जाता है, उसके तहत वर्ण व्यवस्था-जन्य ऊंच-नीच का भेदभाव, वैदिक कर्मकाण्डों के चलते हजारों पशुओं, जिनमें गाय भी शामिल थी, की बलि, नरबलि, घातक हथियारधारी भगवानों का भय, पुनर्जन्म का मिथकीय आविष्कार, आत्मा का अमरत्व, अंधविश्वास तथा युद्धोन्माद आदि का बोलबाला था। तथागत् बुद्ध के दर्शन ने इन्हीं मान्यताओं के विरूद्ध शीघ्र ही एक विश्वव्यापी आंदोलन का रूप ले लिया। हैरत सिर्फ इस बात पर होती है कि बुद्ध का यह महान दर्शन चीन, जापान, श्रीलंका, वर्मा, थाईलैंड, वियतनाम, कम्बोडिया, लाओस, मध्य एशिया, साइबेरिया समेत लगभग समस्त एशिया, तथा दुनिया के अन्य लाखों लोगों के बीच आज भी विकासमान है, किन्तु सदियों पहले अपनी जन्मभूमि भारत में क्यों विलुप्त हो गया? हकीकत यह है कि आर्य संस्कृति के पालकों ने भारत में बौद्ध धर्म की हत्या कर दी। आज बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव से पीड़ित होकर आर्य-पूजक लोग उसे हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग सिद्ध करने का विश्वव्यापी अभियान चला रहे हैं। यहां प्रश्न यह उठता है कि यदि हिन्दू धर्म तथा बौद्ध धर्म एक हैं, तो फिर विश्व भर के लोगों ने बौद्ध धर्म के बदले हिन्दू धर्म को क्‍यों नहीं अपनाया? जाहिर है, वर्ण व्यवस्था तथा ऊंच-नीच के कारण हिन्दू धर्म कहीं और नहीं फैला। विदेशों में यह सिर्फ प्रवासी भारतीयों तक सीमित है। एक समय था जब दुनिया की एक-तिहाई आबादी बौद्ध थी। अनेक हिन्दू इतिहासकार यह दावा पेश करते हैं कि अफ्रीकी देश मारीशस हिन्दू देश है किन्तु वहां वर्ण व्यवस्था नहीं है। इस संदर्भ में सर्वाधिक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि करीब १७० वर्ष पहले अंग्रेजों ने भारत से हजारों दलितों तथा अति पिछड़ी जातियों के लोगों को मारीशस में मजदूरी कराने के लिए जबरन भेजा था, जो वहीं बस गये तथा बाद में वे स्वयं वहां के शासक बन बैठे। असलियत यह है कि वहां आर्य संस्कृति के पोषक, विशेष रूप से ब्राह्मण तथा क्षत्रिय नहीं पहुंच सके, इसलिए मारीशस में वर्ण व्यवस्था उस रूप में नहीं जा सकी, जिस रूप में वह अभी भी भारत में है।

buddhist massacre

जहां तक बौद्ध धर्म का सवाल है, यह अन्य धर्मों की तरह नहीं है। बुद्ध ने इसे हमेशा ‘धम्म` कहा। पाली में ‘धम्म` का अर्थ सिद्धांत होता है, किन्तु संस्कृत में गलत अनुवाद करके इसे ‘धर्म` बना दिया गया। बुद्ध के दार्शनिक विचार मूल रूप से आर्य-सांस्कृतिक मान्यताओं के विरूद्ध ईश्वर को न मानने, आत्मा के अमरत्व को इनकार करने, किसी ग्रंथ को स्वत: प्रमाण न मानने तथा जीवन को सिर्फ इसी शरीर तक सीमित मानने से संबद्ध थे। एक बार आत्मा तथा पुनर्जन्म पर दो भिक्षुओं के बीच चल रही गहन बहस में हस्तक्षेप करते हुए बुद्ध ने कहा कि जिस किसी भी वस्तु का जन्म होता है, उसका विनाश अवश्यंभावी है, किन्तु उस रूप में नहीं, उसका रूप बदल जाता है, जिसे बुद्ध ने ‘प्रतीत्य-समुत्पाद` कहा तथा जिसमें आत्मा के लिए कोई स्थान नहीं है। इसे और भी साफ करते हुए बुद्ध ने कहा कि किसी भी जीवधारी की मृत्यु के साथ ही उसका हमेशा के लिए व्यक्तिगत विलोप हो जाता है, जिसे निर्वाण कहते हैं, अर्थात् पुनर्जन्म से संपूर्ण मुक्ति। यही प्रतीत्य-समुत्पाद बुद्ध के दर्शन की एकमात्र कुंजी है, जिसके कारण दुनिया के अनेक वैज्ञानिक दार्शनिकों ने उन्हें विश्व का पहला वैज्ञानिक बताया।

बुद्ध इस दुनिया को ईश्वर की कृति नहीं मानते थे। उनका तर्क यह था कि घड़ा मिट्टी का रूपान्तर है अर्थात् मिट्टी का गुण घड़े में चला गया। इसी तरह यदि शिशु पैदा होता है, तो वह अपने मां-बाप का रूपान्तर हो जाता है, न कि किसी ईश्वर की कृति का। मनुष्य अत्याचारी तथा दु:खदायी होता है, इसलिए मानव समाज का प्रचण्ड बहुमत दु:खी रहता है। यदि मनुष्य ईश्वर का रूपान्तर है तो ईश्वर स्वयं अत्याचारी एवं दु:खदायी है। यदि ईश्वर वैसा नहीं है तो मनुष्य उसका रूपान्तर या कृति भी नहीं है। इसी दार्शनिक पृष्ठभूमि में बुद्ध ने बौद्धगया में महाज्ञान प्राप्त करके दु:ख है, दु:ख का कारण है, दु:ख का निवारण है तथा दु:ख से मुक्ति है, का रहस्य ढूंढ निकाला। उनके दार्शनिक विचार शीघ्र ही अन्य विचारों पर हावी होकर उनके जीवनकाल में ही सारी दुनिया में फैल गये। बुद्ध के समकालीन राजा बिम्बसार, अजातशत्रु तथा प्रसेनजित ने बौद्ध धर्म के विकास में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया, किन्तु ईसा पूर्व तीसरी सदी में सम्राट अशोक ने इसे विश्वव्यापी बनाने का चमत्कारिक काम किया। अशोक के प्रयासों से श्रीलंका से लेकर यूनान तक बौद्ध धर्म की गूंज सुनायी देने लगी।

इस तरह हम देखते हैं कि ईसा पूर्व की अर्द्ध सहस्राब्दी बौद्ध धर्म के उत्तरोत्तर विकास की अवधि थी। इस बीच पुष्यमित्र तथा मिहिरकुल दो ऐसे शासक हुए, जिन्होंने बौद्ध धर्म को समूल नष्ट करने की कोशिश की। पुष्यमित्र ने अंतिम मोर्य बौद्ध सम्राट बृहद्रथ को ई.पू. १८७ में मार कर शुंगवंश की स्थापना की थी। पुष्यमित्र बृहद्रथ का सेनापति था। सोलवहीं सदी के महान तिब्बती बौद्ध भिक्षु तथा इतिहासकार तारानाथ के अनुसार पुष्यमित्र बौद्ध धर्म का घनघोर दुश्मन था तथा उसने मध्य प्रदेश से लेकर पंजाब के जालंधर तक सैकड़ों बौद्ध मठों को ध्वस्त करने के साथ-साथ अनेक विद्वान भिक्षुओं की हत्या कर दी थी। पुष्यमित्र ने पाटलीपुत्र के विख्यात मठ कुक्कुटराम को भी ध्वस्त करने की कोशिश की थी, किन्तु अंदर से सिंह के दहाड़ने जैसी आवाज सुनकर वह भाग गया। पुष्यमित्र ने वैदिक कर्मकाण्डों तथा ब्राह्मणों के वर्चस्व को पुनर्जीवित करने का अथक प्रयास किया था। इसी तरह हूण शासक मिहिरकुल ने छठी ईसवी में कश्मीर से लेकर गान्धार तक बौद्ध मठों की भयंकर तोड़फोड़ की। प्रख्यात् चीनी बौद्ध यात्री, ह्उावेन सांग के अनुसार मिहिरकुल ने १६०० मठों को ध्वस्त कर दिया था। वह भारत आकर शिवपूजक बन गया था।

ईसा मसीह के जन्म के पूर्व बौद्ध धर्म की गूंज येरुशलम तक पहुंच चुकी थी। यही कारण है कि बुद्ध की करुणा तथा शांति की झलक बाइबिल में साफ दिखायी देती है। अनेक यूरोपी विद्वानों ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि बुद्ध का ईसा मसीह पर गहरा प्रभाव पड़ा था, विशेष रूप से उनका चर्च-सिस्टम बौद्ध मठों का प्रतिरूप है। ईसा की प्रथम सहस्राब्दी में बौद्ध धर्म का दार्शनिक विकास बड़ी तेजी से हुआ। इसे बौद्ध दार्शनिकों की सहस्राब्दी कहा जाए, तो अनुचित न होगा। पहली सदी से लेकर हजारहवीं सदी के बीच अश्वघोष, नागार्जुन, आर्यदेव, मैत्रेय, असंग, वसुबन्धु, दिग्नाग, धर्मपाल, शीलभद्र, धर्मकीर्ति, देवेन्द्रबोधि, शाक्यबोधि, शान्त रक्षित, कमलशील, कल्याणरक्षित, धर्मोत्तराचार्य, मुक्तकुंभ, रत्नकीर्ति, शंकरानंद, शुभकार गुप्त तथा मोक्षकार गुप्त आदि अनेक बौद्ध दार्शनिक पैदा हुए। अश्वघोष ने प्रथम सदी में वर्ण व्यवस्था के विरूद्ध ‘वज्रसूची` (हीरे की सुई) नामक संस्कृत काव्य लिख कर ब्राह्मणवाद की नींव हिला दी थी। उक्त बौद्ध दार्शनिकों में नागार्जुन, असंग, वसुबन्धु, दिग्नाग तथा धर्मकीर्ति ने बौद्ध तर्कशा (लॉजिक) को वैज्ञानिक ऊंचाईयों तक पहुंचाते हुए हिन्दू तर्कशास्त्रियों को मूक बना दिया था। ‘माध्यमक` लिख कर नागार्जुन ‘शून्यवाद` के प्रवर्तक बने। वे बुद्ध के अनात्मवाद को शून्यवाद कहते थे। वे पूंजीवाद के भी प्रबल विरोधी थे। उन्होंने अपने समकालीन सत्वाहन राजा यज्ञश्री को एक पत्र लिखकर सारे धन को भिक्षुओं, गरीबों, मित्रों तथा ब्राह्मणों को दान में बांट देने का आग्रह किया था। नागार्जुन दूसरी सदी के दार्शनिक थे। चौथी सदी के पेशावर निवासी असंग अद्वैत विज्ञानवाद के प्रवर्तक थे। उनके छोटे भाई वसुबन्धु थे, जिन्होंने अयोध्या में रहकर बौद्ध त्रिपिटक के सार के रूप में ‘अभिधम्म कोश` की रचना की थी। दिग्नाग पांचवीं सदी के दार्शनिक थे। वे बौद्ध तर्कशा तथा ज्ञान मीमांसा के सबसे महान प्रवर्तक थे। रूस तथा विश्व के अति विशिष्ट बौद्ध दार्शनिक श्चेर्वात्सकी ने इस तथ्य का रहस्योद्घाटन किया है कि यदि दिग्नाग जैसे दार्शनिकों ने बौद्ध लॉजिक को विकसति नहीं किया होता, तो तथाकथित ‘हिन्दू लॉजिक` कभी पैदा ही नहीं होता, क्योंकि हिन्दू दार्शनिकों ने बौद्धों की तर्कसंगत तर्कणा के विरोध में अपनी लॉजिक विकसित की थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि सातवीं-आठवीं सदी के दो अति महत्वपूर्ण हिन्दू दार्शनिक कुमारिल भट्ट तथा आदि शंकराचार्य का सारा दर्शन बौद्धों के खण्डन-मण्डन पर आधारित है। बौद्धों की दार्शनिक परंपरा में सातवीं सदी के सबसे महान दार्शनिक धर्मकीर्ति थे, जिन्होंने दिग्नाग के प्रमाण शा को आगे विकसित करते हुए अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘प्रमाणवार्तिकम्` की रचना की। श्चेर्वात्स्की ने धर्मकीर्ति की तुलना जर्मन दार्शनिक कान्ट से की है। धर्मकीर्ति को तत्कालीन नालन्दा बौद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति तथा उद्भट विद्वान भिक्षु धर्मपाल ने भिक्षु बनाया था। धर्मकीर्ति ने ‘न्याय बिन्दु` लिखकर न्याय दर्शन को सर्वाधिक संपन्न बताया तथा उन्होंने अपने समय के तमाम ब्राह्मणों को शाा़र्थ के लिए ललकारा था और जिसने भी उनके साथ शाा़र्थ किया, हार गया। इन हारे हुए वैदिक विद्वानों में कुमारिल भट्ट भी शामिल थे, जो शर्त के अनुसार नालंदा में बौद्ध भिक्षु बन कर धर्मपाल के शिष्य बन गये थे। किन्तु बाद में कुमारिल भट्ट की विजय को वैदिक कर्मकांडों की विजय समझा गया। अत: उन्होंने बौद्ध धर्म को नष्ट करने का हिंसक अभियान चलाया। कुमारिल भट्ट ने बौद्ध धर्म को ‘फटा दूध` कहकर उस पर यह आरोप लगाया कि उसके चक्कर में आकर विभिन्न राजाओं ने वैदिक कर्मकांडों को नष्ट कर दिया था। हकीकत यह है कि बौद्ध धर्म ने हिंसा के बल पर कभी कोई परिवर्तन नहीं किया, बल्कि तर्कसंगत मस्तिष्क परिवर्तन के मध्यम से वैदिक कुरीतियों को बदला था, जबकि कुमारिल भट्ट ने स्वयं विभिन्न राजाओं को उकसा कर बौद्ध धर्म को समूल नष्ट करने का अभियान चलाया था, जिसमें आदि शंकराचार्य भी शामिल हो गये थे। शंकराचार्य दर्शन के प्रचारक स्वामी अपूर्नानन्द जी द्वारा मूलरूप से बांग्ला भाषा में लिखित तथा रामकृष्ण मठ द्वारा अधिकारिक रूप से प्रकाशित शंकराचार्य की आत्मकथा ‘अचार्य शंकर` में प्रस्तुत यह तथ्य विचारणीय है, जिसमें कहा गया है : ‘कुमारिल की इस विजय ने समस्त भारत के लोगों में वैदिक धर्म के नवजागरण की सृष्टि की। उस समय के मगध राज आदित्य सेन ने उस विजय को गौरवान्वित करने के लिए विशेष ठाट-बाट से कुमारिल भट्ट को प्रधान पुरोहित रख कर एक विराट अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान किया। गौड़ देश (बंगाल) के हिन्दू राजा शशांक नरेन्द्र वर्धन वैदिक धर्म के अनुरागी थे। उन्होंने मौका पाकर हिन्दू धर्म के विजय अभियान के यज्ञ में बोध गया के जिस बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर तथागत् ने सिद्धि प्राप्त की थी, उस बोधिद्रुम को काट डाला और बौद्ध मंदिर पर अधिकार स्थापित कर बुद्धदेव की मूर्ति को दिवाल उठा कर बंद कर दिया। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने तीन बार उस वृक्ष के मूल को खोद कर उसे समूल नष्ट कर दिया। कुमारिल भट्ट ने उत्तर भारत में सर्वत्र विजयी होकर बुद्ध और जैन धर्मों के प्राधान्य को नष्ट किया।`

कुमारिल भट्ट ने ‘श्लोक वार्तिका`, ‘तंत्र वार्तिका` तथा ‘तुप्तिका` नामक ग्रंथों को लिखकर वैदिक कर्मकाण्डों को चमत्कारित किया। उनके बौद्ध विनाश के अधूरे कार्य को शंकराचार्य ने पूरा किया। शंकराचार्य ने बौद्ध दर्शन को खण्डित करने के लिए अपनी प्रसिद्ध रचना ‘ब्रह्मसूत्र भाष्य` को दिग्नाग के विज्ञानवाद, धर्मकीर्ति के बौद्ध न्याय तथा नागार्जुन के माध्ययक (शून्यवाद) के विरुद्ध खड़ा किया। शंकराचार्य ने बड़ी चालाकी से बौद्ध धर्म के विरूद्ध अभियान चलाया था, यहां तक कि जनता में भ्रम पैदा करने के लिए उन्होंने अपनी पुस्तक ‘दसावतान स्न्नानेत` में बुद्ध वन्दना में एक श्लोक भी लिखा, जिसमें बुद्ध को सबसे बड़े योगी के रूप में प्रस्तुत करते हुए ध्यानमग्न अवस्था में उनके नेत्रों के नासिका पर उतरने का उन्होंने जिक्र किया है। शंकराचार्य ने बुद्ध को अपने मस्तिष्क का परिचालक भी बताया है, किन्तु दूसरी तरफ उन्होंने बौद्ध स्थलियों को नेस्तोनाबूद करने का अभियान भी चलाया। प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी तथा इतिहासकार विश्वंभर नाथ पाण्डे ने लिखा है कि बौद्ध विरोधी राजा ‘सुधन्वा की सेना के आगे-आगे शंरकाचार्य चलते थे। स्मरण रहे कि उज्जैन के राजा सुधन्वा ने अनगिनत मठों को धवस्त कराया था। जिन चार पीठों की स्थापना शंकराचार्य ने की, वहां पुराने बौद्ध मठ हुआ करते थे, आचार्य शंकर का तथाकथित ‘विश्व विजय` अभियान कुछ और न होकर वास्तव में बौद्धों के ऊपर हिंसक विजय का अभियान था। शंकर ने इसे ‘विश्व विजय` इस लिए कहा था, क्योंकि उनके समय (आठवीं सदी) तक बौद्ध धर्म विश्व के दर्जनों देशों में फैल चुका था। इस तरह हम देखते हैं कि पहली सहस्राब्दी जहां एक ओर बौद्ध दर्शन के विकास के रूप में उमड़ कर सामने आयी, वहीं दूसरी ओर कुमारिल भट्ट तथा शंकराचार्य ने उसके विनाश की ठोस नींव भी डाली। इस तरह पांचवीं सदी से दसवीं सदी के बीच वर्ण व्यवस्था पर आधारित ब्राह्मणवाद या आधुनिक हिन्दूत्व की नींव पड़ी। यह वही समय था जब वर्ण व्यवस्था को ईश्वरीय ठहराने वाले अनेक हिन्दू ग्रंथों की रचना की गयी, जिनमें याज्ञवल्क्य स्मृति, मनुस्मृति, गीता, महाभारत, कौटिल्य का अर्थशा, वाल्मीकि रामायण तथा सारे पुराण आदि शामिल थे। इन सारे ग्रंथों में वर्ण व्यवस्था को ईश्वरीय ठहराते हुए बौद्ध दर्शन पर हमला किया गया है, किन्तु अक्सर बुद्ध का जिक्र किए बिना। एक भी हिन्दू ग्रंथ ऐसा नहीं है, जिसमें वर्ण व्यवस्था को ईश्वरीय न कहा गया हो। हिन्दू लोग इन ग्रंथों को ईश्वर के मुख से निकला अनन्तकालीन कहकर रहस्यमयी सिद्ध करने का सतत् प्रयत्न करते रहते हैं, किन्तु एक अकाट्य सत्य यह है कि चूंकि बौद्ध दर्शनिकों ने हमेशा वर्ण व्यवस्था का विरोध किया, इसलिए उसे पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से ब्राह्मणों ने नये ग्रंथों की रचना करके उन्हें ‘इश्वरीय` बना दिया, जबकि ये सारे ग्रंथ बुद्ध के बाद के हैं। वर्ण व्यवस्था को दैवी ठहराने वाले इन तमाम हिन्दू ग्रंथों के रचनाकाल को निर्धारित करने की यह सबसे बड़ी कुंजी है। अन्यथा, इन ग्रंथों में बौद्धों का जिक्र कैसे आता? गीता का अठारहवां अध्याय सिर्फ वर्ण व्यवस्था को ईश्वरीय बताने के लिए लिखा गया। कौटिल्य के ‘अर्थशा` में शूद्र विरोधी कानून हंै। याज्ञवल्क्य स्मृति में बौद्धों के दर्शन को अपशकुन बताया गया है। वाल्मीकि रामायण में बौद्धों को चोरों की तरह दण्ड देने की बात है। मनुस्मृति की तो बात ही कुछ और है।

इस काल की एक खास बात यह है कि जहां एक तरफ ब्राह्मणों ने लाखों बौद्ध भिक्षुओं का कत्लेआम कराया तथा बौद्ध मठों को ध्वस्त करने के बाद बचे-खुचे को मंदिरों में बदल दिया था, वहीं इस कुत्सित उद्देश्य के साथ बड़ी चालाकी से बुद्ध के प्रति तथाकथित ‘आत्म सात्करण` के सिद्धान्त को अपनाते हुए ‘अग्निपुराण` में उन्हें विष्णु का अवतार घोषित कर दिया था। साथ ही, बुद्ध की नैतिक शिक्षाओं को अपना बनाकर ब्राह्मणों ने लोगों के समक्ष पेश करना शुरू कर दिया। उन्होंने पाली भाषा को प्रतिबंधित कर दिया, क्योंकि बौद्ध धर्म के वर्चस्व के स्थापित होते ही वर्ण व्यवस्था का मिथकीय रूप बड़ी तेजी से लागू होने लगा। कालिदास जैसे संस्कृत कवियों ने बौद्धों के खिलाफ टिप्पणी की। उन्होंने ‘मेघदूत` में ‘दिग्नागिनाम् पथि परिहरन्` अर्थात् दिग्नागों के बताये गये रास्ते पर चलने से लोगों को मना कर दिया। स्मरण रहे कि महान बौद्ध दार्शनिक दिग्नाग का आम जनता में बहुत असर था, इसलिए कालिदास को उक्त टिप्पणी करनी पड़ी। संस्कृत साहित्य में बौद्धों के खिलाफ अनगिनत टिप्पणियां मिलती हैं। आत्मसात्करण के संदर्भ में एक ऐतिहासिक तथ्य यह है कि आज हिन्दू लोग गाय को ‘गोमाता` कहकर गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए धार्मिक दंगा फैलाने का सतत् प्रयत्न करते रहते हैं, किन्तु सदियों पहले ये हिन्दू वैदिक यज्ञों में हजारों गायों की न सिर्फ बलि चढ़ाते थे, बल्कि उसका मांस भी खाया करते थे। सर्वप्रथम तथागत बुद्ध ने ही इन बलियों के विरूद्ध संघर्ष चलाकर गोहत्या बंद करायी थी तथा उन्होंने स्वयं गाय को माता कहकर पुकारा था। ‘दीर्घ निकाय` समेत अनेक बौद्ध ग्रंथों में इसके उदाहरण मिलते हैं। गोमाता तथा गोहत्या से संबंधित बुद्ध की शिक्षा को अपहृत करके ब्राह्मणों ने उल्टा आरोप बौद्धों पर लगा दिया कि वे गोमांस भक्षण करते हैं। बौद्धों के खिलाफ इस आरोप को ब्राह्मणों ने इतने बड़े पैमाने पर प्रचारित किया कि देश भर में बौद्ध बदनाम हो गये। वास्तविकता यह थी कि बुद्ध की शिक्षा के अनुसार भिक्षा में मिली किसी भी वस्तु को खाने का प्रावधान था, भले ही वह गोमांस क्यों न हो, किन्तु बुद्ध ने किसी जीव को मार कर खाने को कड़ाई से प्रतिबंधित किया था। इसके अनुसार बौद्ध भिक्षु भिक्षा में मिले किसी भी पशु मांस को खा लेते थे। स्वयं तथागत् बुद्ध ने कुशीनारा में चुन्दक नामक लोहार द्वारा भोजदान में दिये गये सूअर के मांस को खाकर निर्वाण प्राप्त किया था। इस तरह बुद्ध की नैतिक शिक्षाओं को ब्राह्मणों ने उल्टा करके बौद्धों को हमेशा बदनाम किया।

ईसा की दूसरी सहस्राब्दी भारत में बौद्ध धर्म के लिए समापन की अवधि थी। इसके पहले ही भारत में इस्लाम पहुंच चुका था तथा सल्तनत स्थापित हो चुकी थी। मध्य एशिया से आने वाले मुस्लिम हमलावरों ने बौद्ध स्थलियों को तोड़ऩे में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, जिसके पीछे स्वार्थी ब्राह्मणों की भूमिका पथ प्रदर्शक की थी। बारहवीं-तेरहवीं सदी में बख्तियार खिलजी नाम एक हमलावर उत्तर भारत की उन समस्त बौद्ध स्थलियों पर गया, जिनका सीधा संबंध बुद्ध से था। उसने कुशी नगर की विश्व प्रसिद्ध सात मीटर लंबी सुनहरी मूर्ति को तीन टुकड़ों में तोड़कर फेंक दिया था। उसने ही नालंदा विश्वविद्यालय को जलाकर हमेशा के लिए राख कर दिया था। इसके पहले हिन्दू राजा शशांक ने नालंदा विश्वविद्यालय को जलाया था। बख्तियार ने उदान्तपुरी (बिहार शरीफ) के प्रख्यात बौद्ध मठ के विशाल टावर को किला समझ कर ध्वस्त कर दिया, जिसमें सैकड़ों बौद्ध भिक्षु मारे गये तथा हजारों बौद्ध ग्रंथ खून से लथ-पथ होकर नष्ट हो गये। बचे-खुचे बहुमूल्य बौद्ध ग्रंथों को जीवित बचे कुछ भिक्षु अपने रक्त रंजित चीवरों में छिपाकर बर्मा, नेपाल तथा तिब्बत ले गये। स्मरण रहे कि हजरत मोहम्मद के समय बौद्ध पश्चिम एशिया में फैल चुका था, इसलिए वहां के अरबी भाषी लोगों ने ‘बुद्ध पूजा` को गलत उच्चारण के कारण ‘बुत पूजा` कहकर विरोध किया, जिसके चलते मुस्लिम हमलावार जहां भी गये, उन्होंने बुद्ध मूर्तियों को तोड़ डाला। मुस्लिम विजेताओं ने अफगानिस्तान से लेकर मध्य एशिया तक फैले बौद्ध धर्म को समूल नष्ट कर दिया।

बौद्धों की कीमत पर भारत में ईसाई तथा इस्लाम धर्म जरूर पनपा, जिसके कारण ए.एल. बाशम जैसे नामी इतिहासकारों ने हिन्दू धर्म को उदार कहकर अपनी श्रद्धांजली पेश की, जो सही नहीं है। हकीकत यह है कि इन दोनों धर्मों का विकास हिन्दू धर्म की उदारता के कारण नहीं, बल्कि उसके वर्ण व्यवस्थावादी कट्टरता के कारण हुआ। यदि हिन्दू धर्म उदार होता, तो इस धरती से उत्पन्न विश्व के सर्वश्रेष्ठ दर्शन बौद्ध धर्म को क्रूरता के साथ नष्ट नहीं करता। प्रसिद्ध भारतीय दार्शनिक देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने बौद्ध धर्म को भारतीय इतिहास का करिश्मा कहा है। अत: यह करिश्मा आज भी जारी है। हाल ही में एक अमरीकी मीडिया सर्वेक्षण में बौद्ध धर्म को सर्वाधिक तीव्र गति से पनपने वाला धर्म बताया गया। विगत् कुछ वर्षों में यूरोप तथा अमरीका के हजारों रोमन कैथोलिकों ने बौद्ध धर्म को अपनाया है, जिनमें इटली के विश्व प्रसिद्ध फुटबाल खिलाड़ी राबर्टो बज्जियो तथा हालीबुड के सुपर स्टार रिचार्ड गेरे भी शामिल हंै। विगत् दिनों रोम के एक अखबार को दिये गये एक साक्षात्कार में सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति गोर्वाचोव ने ठीक ही कहा : ‘इक्कीसवीं सदी बुद्ध की सदी होगी।`

डा0 तुलसी राम

dr tulsiram

Source: http://janvikalp.blogspot.in/2007/12/blog-post_1272.html

Sent us by Dr Prabhat Tandon <drprabhatlkw@gmail.com>

23 JUNE 2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- “आज आंबेडकर संविधान के राज में भी हमारे लोग ऊपर क्यों नहीं उठ पा रहे जबकि जो पहले से उठे हुए हैं वो और उठते जा रहे हैं? ” …समयबुद्धा

लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं कि आज जब बाबा साहब के संविधान का राज है, आज जब चरों तरफ मौकों कि कमी नहीं फिर भी हमारे लोग ऊपर क्यों नहीं उठ पा रहे जबकि जो पहले से उठे हुए हैं वो और उठते जा रहे हैं?

ambedkar sandesh

सबसे पहला कारन है बहुजनों के पास सही ज्ञान न होना:

ज्ञान ही शक्ति है ज्ञान के बिना मनुष्य पशु के सामान है| ज्ञान शिक्षा व्यस्था या स्कूल कॉलेज से मिलता है पर अगर वहाँ ज्ञान ही न मिले तो आम जनता कैसे ज्ञानी होगी वो किससे अपने दुःख दूर कर सकती है|पुराने समय में गुरुकुल शिक्षा व्यस्था के माध्यम से ज्ञान केवल सत्ताधारी और उसके सहयोगियों के बीच ही सदियों तक घूमता रहा|परिणाम आम जनता कभी समझ ही नहीं पायी की दिन रात मेहनत और ईमानदारी से जीने के बावजूद उनके हिस्से सिर्फ महा-दुःख ही क्यों आये|

आखिरकार बाबा साहब ने संविधान में सबके लिए सार्वजानिक शिक्षा की व्यस्था और शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित कर दिया|परिणाम ये हुआ की आम जनता समझने लगी की उनके जीवन का दुःख किसी इश्वर का दिया नहीं अपितु गलत सरकारी निति की वजह से है जिसका समाधान भी इश्वर नहीं राजनीति ही करेगी और उन्होंने राजनीती हिस्सा लेना शुरू कर दिया|ये बात इस देश के धम्म-विरोधियों को  को अच्छी नहीं लगी और सार्वजानिक शिक्षा व्यस्था (सरकारी स्कूल) आज संविधान लागू होने के लगभग साठ साल के अन्दर ही महत्व हीन कर दी गई और गुरुकुल शिक्षा व्यस्था को अंग्रेजी स्कूल के नए रूप में लागू कर दिया गया|सरकारी स्कूल में अक्सर देखा गया है की न तो वहां पढ़ाने वाले हैं न पढने वाले|पहले ज़माने के अनपढ़ के समतुल्य आज सार्वजानिक शिक्षा व्यस्था से निकले व्यक्ति से की जा सकती है और गुरुकुल के से पास सत्ताधारी की तुलना आज के प्राइवेट स्कूल से पास हो रहे लोगों से की जा सकती है|हमारे बहुत से बहुजन सरकारी अध्यापक हैं वे भी इसी रंग में हैं पढ़ाते नहीं जबकि  ऐसे स्कूलों में सबसे ज्यादा बहुजन के बच्चे ही पढ़ते हैं|मैं बहुजन अध्यापकों से अपील करता हूँ की बहुत ज्यादा नहीं पर जितना सिलेबस है उतना तो इमानदारी से पढ़ा ही दो,आपकी कमाई भी सार्थक होगी और बहुजनों का भला भी होगा…

अब तो हाल और भी बुरा है क्योंकि दसवी तक बच्चा पड़ता रहता है फ़ैल ही नहीं किया जाता| दसवीं से बोर्ड भी हटा दिया है| ऐसे में बच्चे और उसके माँ पिता को पता ही नहीं चल पता कि उनका बच्चा कितना ज्ञानी है| परिणाम वो बिना ज्ञान के ही बड़ा हो जाता है ऐसे में वो कोई हाथ का काम या हुनर  भी नहीं सीख पाता| परिणाम वो केवल दूसरों के यहाँ मजदूरी करने लायक ही बचता है|आप खुद देखो ऐसे बहुजनों के बच्चे कॅरिअर बॉय, पिज़्ज़ा बॉय, सेल्स मैन,गार्ड,कॉल सेंटर अदि में अपने जवानी गला रहे हैं और उनका बुढ़ापा अनिश्चित है|

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दूसरा कारन हैं बहुजनों में संगर्ष,समर्पण,प्रेरणा और उत्साह बहुजनों के मुकाबले कम है:

ये बुनियादी इंसानी फितरत है कि वो आराम से जिंदगी बिताना चाहता है, संगर्ष नहीं करना चाहता, ये बात बहुजनों पर भी लागु है और सवर्णों पर भी| ऊपर से नीचे गिरने से बचने को जो प्रेरणा और उत्साह चाहिए वो नीचे से ऊपर उठने वाले कि प्रेरणा और उत्साह से कहीं ज्यादा होती है|यही कारन है नीचे से ऊपर उठने के लिए लोग उतना संगर्ष नहीं करते जितना ऊपर पहुचे लोग अपने को ऊपर बनाये रखने के लिए करते हैं|

मैं टीवी पर किसी फ़िल्मी हीरो  का इंटरव्यू देख रहा था उससे सवाल पुछा गया:-  क्या कभी आप सुबह जिम जाना छोड़ देते हैं?

इसपर उसने जो जवाब दिया वो मुझे हमेशा याद रहता है, उसने कहा “ऐसा बहुत बार होता है कि सुबह उठने को मन नहीं करता, मन करता है कि एक घंटा और सो लूं पर मैं जिस मुकाम पर खड़ा हूँ वहाँ मैं एक घंटे कि नीद अफ्फोर्ड नहीं कर सकता| मैं ये सोच के उठ जाता हूँ कि सो लेंगे इकठ्ठा ही किसी दिन अभी काम कर लेते हैं” वहीँ दूसरी तरत जो नया नया हीरो बनने मुम्बई आया होगा वो चाहे तो एक दिन एक घंटा ज्यादा सो सकता है|

कहीं पढ़ा था कि सपने वो पूरे नहीं होते जिन्हें हम सोते हुए देखते हैं बल्कि सपने वो पूरे होते हैं जिनके लिए हम सोना छोड़ देते हैं|जब भी सुबह मेरा उठने का मन नहीं करता तब ये बात मुझे याद आ जाती है और मैं उठने ko प्रेरित हो जाता हूँ| इसी तरह हम अपने फायदे के बात कहीं से भी पकड़ सकते हैं| ध्यान रहे कि मेहनत है तो सुख है और सुख है तो और ज्यादा मेहनत करने कि प्रेरणा है|

डॉली पार्टन ने कहा था कि “मेरा दृष्टिकोण तो यह है कि आप इंद्रधनुष चाहते हैं तो आप को वर्षा सहन करनी ही होगी।”  यक़ीनन इस दुनिया में कुछ भी बिना संगर्ष के नहीं मिलगा|आपको जो भी चाहिए उसकी कीमत चुकानी ही पड़ेगी, हर चीज़ कि कीमत चाहे वो कोई वास्तु हो या कोई भावना या कोई सुख sabhi कीनैत पहले या बात में मेहनत से चुकानी ही पड़ेगी|

उचाई पर पहुचे शाषक लोग जो बहुत जुल्म कर के ऊपर पहुचते हैं वो जानते हैं कि अगर वो ताकतवर न रहे तो जनता उन्हें मार डालेगी| ये जो डर हैं उनका ये उनको कामयाब बने रहने को मजबूर कर देती है, वो भी आराम करना चाहते हैं पर अफ्फोर्ड नहीं कर सकते|यही वो डर है जिसकी वजह से न वो खुद चैन से बैठता है न ही जनता को चैन से बैठने देता है|वो अपने सपने पूरा करने को जनता का शोषण करते रहते हैं|

ये जिंदगी का बुनियादी नियम है की है कि जो जिस हाल में है वो उसे हालत में रहना चाहता है जब तक कि उसे बदलने को कोई ताकत न लगाई जाए|शाशक को उसकी कुर्सी से गिराने के लिए भी कोई शक्ति चाहिए शोषित को ऊपर उठने के लिए भी कोई शक्ति चाहिए|

यही कारन है की दूसरी तरफ जो शोषित आम जनता है उसने अपनी हालत से समझौता कर लिया होता है | ‘अपनी हालत को बदलने कि उसकी चाह’ शाषक कि ‘शाषक बने रहने कि चाह’ के मुकाबले बहुत कम होती है| जिस शोषित कि चाह शाषक कि चाह से ज्यादा होती है वही बदलाव ला पाता है|

दूसरी बात की जब मेहनत फल देती है तभी मेहनत करने को उत्साह आता है| शशक वर्ग के लोगों ने ऐसी व्यस्था बना राखी है की जो ताकतवर है वही मेहनत का श्रेय और फल ले लेता है|कोई क्यों ताकतवर बनना चाहता है इसीलिए न कि दूसरों कि मेहनत का फल ले सके| कई मानलो में खुद शोषित या आम जनता  में अपनी मेहनत का श्रेय लेने की क्षमता नहीं होती, तो जिसमे क्षणता होती है वो श्रेय ले लेता है| जब श्रेय नहीं फायदा नहीं तो उत्साह नहीं जब श्रेय है फायदा है तभी उत्साह है|

अपना उत्साह बनाये रखना और अपने हकों के लिए संगर्ष करना ही जीवन है वर्ना जानवर और इंसान होने में क्या फर्क रह जाता है|

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तीसरा बड़ा कारन है: शक्तिशाली बहुजनों का अहंकारी होना व् मिशन में रूचि न होना:

बदलाव केवल शक्तिशाली लाते हैं पर जो भी बहुजन शक्तिशाली हो जाता है वो अपने को समाज से काल लेता है|
बहुजनों के राजनेतिक बुद्धा मान्यवर कांशीराम जी ने एक सूत्र दिया था जिसे हम कांशीराम बदलाव सूत्र कह सकते हैं|उन्होंने कहा था कि बदलाव लाने का सूत्र है|

N x D x S= Change

where

N= Need यानि जरूरत

D= Desire  यानि इच्छा

S=STRENGTH  यानि क्षमता या शक्ति

अर्थात बदलाब के लिए तीन चीज़ें चाहिए

नंबर एक है    यानि जरूरत : जब तक लोगों को जरूरत नहीं होगी तब तक वो संगर्ष नहीं करेगा, जैसा कि आज हमारे ही समाज के पढ़े लिखे लोगों के साथ है, वो सुखी है,उनको कोई कष्ट ही नहीं उसलिये उनको जरूरत नहीं|

नम्बर दो DESIRE है  यानि इच्छा: बदलाव कि जरूरत होने से कुछ नहीं होता जब तक कि बदलाव कि इच्छा न हो| जब इच्छा होगी तभी तो संगर्ष किया जायेगा|जैसा कि आज हमारे ही समाज के पढ़े लिखे लोगों के साथ है, वो सुखी है और अपने सुख में वो अपने साथियों और कौम के लिए कुछ नहीं करना चाहते, उनको कोई कष्ट ही नहीं उसलिये उनको बदलाव कि जरूरत नहीं इसलिए उनमें इच्छा नहीं|

नम्बर तीन पर है STRENGTH  यानि क्षमता या शक्ति| बदलाव कि जरूरत और इच्छा से कुछ नहीं होता लैब तक कि बदलाव लाने के बुनियादी क्षमताएं न हों जैसे धन, शिक्षा व् ज्ञान, लीडर, नीति आदि|हमारे पढ़े लिखे लोगों बाद नाम के ही बहुजन रह गए हैं वो जैसे माहौल में पीला बढे होते हैं वहाँ उनकी मानसिकता कट्टर मन्दिरबाज़ कि हो गई है| वो अपने दरवाज़े जागरण करवाएगा मंदिरों को दान देगा, अपने शोषक पुरोहित वर्ग के पाओं पड़ेगा पर मजाज है कि कभी अपनेदकर वाद या बौद्ध धम्म कि बाते सुने भी ले| यही लोग तो समाज कि शक्ति हैं पर जब यही लोग संगर्ष नहीं करेंगे तो बस फिर क्या हो सकता है|

आज हमारे समाज में तीन तरह के लोग है-
१. अशिक्षित एव असक्षम वर्ग
२. शिक्षित वर्ग पर बहुजन संगर्ष से अपरिचित
३. शिक्षित,ज्ञानी,सक्षम और संगर्ष शील वर्ग
-इनमे से जो पहला वर्ग है वो जनसँख्या दबाव या भीड़ के रूप में सबसे ज्यादा संगर्ष को आगे ले जा रहा है |
-दूसरा वर्ग किसी काम का नहीं उल्टा ये विभीषण हैं |
-तीसरा वर्ग संगर्ष की अगुवाई करता है पर इन नए नए हुए ज्ञानियों में अपने आप को श्रेष्ट समझने और अन्य को हीन समझने का रोग लग गया है परिणाम मकसद एक होने के बावजूद ये लोग एक मंच पर नहीं आ पाते|
“ये जिन्दगी का नियम है की ज्ञानी बोलता पहले है पर समझदार पहले सुनता है, तोलता है फिर बोलता है| ज्ञानी होना काफी नहीं है समझदार होना जरूरी है अन्यथा हमारा संगर्ष कहीं नहीं पहुचेगा” .

kansiram change sutra

चौथा कारन है -बौद्ध धम्म नीति में सुरक्षा कि नीतियां नहीं बदली जा रहीं|

धर्म  किसी कौम कि सुरक्षा नीति से ज्यादा और कुछ नहीं, कहने को इसको किसी भी तरह परिभाषित करते रहो| अगर बौद्ध धम्म नीति इतिहास में असफल कर दी गई और अगर ये अपनी कौम को सुरक्षा नहीं दे पा रहा है तो इसकी नीति में कमी है जिसको सुधारना हमारा परम कर्तव्य है|अकेला सत्य किसी काम का नहीं क्योंकि सत्य वो नहीं जो सत्य है, सत्य वो होता है जो विजेता कह देता है या लिखवा देता है| इसके अलावा बाकि सब बस जनता कि यादें और चर्चाएं मात्र हैं जो समय के साथ धूमिल पड़ती जातीं हैं| कुछ चाहिए तो विजेता कि तरह छीन लो वर्ना विजेता बनने के लिए अपनी क्षमताओं को बढ़ाते रहो|क्षमता ही सबकुछ है”

…समयबुद्धा

ओशो दर्शन -क्या है धर्म संप्रदाय? – From Jago Bharat Jago

ओशो दर्शन -क्या है धर्म संप्रदाय?

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बुद्ध अनूठे हैं, अद्धितीय हैं। सैकड़ों शाखाएं हुईं। और प्रत्येक शाखा इतनी विराट थी कि उसमें से भी प्रशाखाएं हुईं। कहते हैं, जितने दर्शन के मार्ग अकेले बुद्ध ने खोले उतने मनुष्य-जाति में किसी व्यक्ति ने नहीं खोले…

अज्ञानी संप्रदाय बनाते हैं। ज्ञानी भी संप्रदाय बनाते हैं। लेकिन अज्ञानी का संप्रदाय कारागृह हो जाता है और ज्ञानी का संप्रदाय मुक्ति की एक राह। संप्रदाय का अर्थ होता है, मार्ग। संप्रदाय का अर्थ होता है, जिससे पहुंचा जा सकता है।

ज्ञानी मार्ग से पहुंचते हैं, मार्ग बनाते भी हैं। अज्ञानी मार्ग से जकड़ जाते हैं, पहुंचते नहीं। मार्ग बोझिल हो जाता है। छाती पर पत्थर की तरह बैठ जाता है। ज्ञानी मार्ग का उपयोग कर लेते हैं, अज्ञानी मार्ग से ही बंध जाते हैं। संप्रदाय मे कुछ बुराई नहीं है, अगर पहुंचाता हो।

संप्रदाय शब्द बड़ा बहुमूल्य है। जिससे पहुंचा जाता है, वही संप्रदाय है। लेकिन बड़ा गंदा हो गया। लेकिन गंदा हो जाने का कारण संप्रदाय नहीं है। अब कोई नाव को सिर पर रखकर ढोए तो इसमें नाव का क्या कसूर है? क्या तुम नाव के दुश्मन हो जाओगे, कि लोग नाव को सिर पर रखकर ढो रहे हैं। मूढ़ तो ढोएंगे ही। नाव न होती, कुछ और ढोते। मंदिर-मंस्जिद न होते लड़ने को तो किसी और बात से लड़ते। कुछ और कारण खोज लेते। जिन्हें जाना नहीं है, वे मार्ग के संबंध में विवाद करने लगते हैं। जिन्हें जाना है, वे मार्ग का उपयोग कर लेते हैं। और जिसने मार्ग का उपाय कर लिया, वह मार्ग से मुक्त हो जाता है। जिसने नाव का उपयोग कर लिया, वह नाव को सिर पर थोड़े ही होता है! नाव पीछे पड़ी रह जाती है, रास्ते पीछे पड़े रह जाते हैं। तुम सदा आगे बढ़ते चले जाते हो।

संप्रदाय में अपने आप कोई भूल-भ्रांति नहीं है। भूल-भ्रांति है तो तुम में है। तुम तो औषधि को भी जहर बना लेते हो। बड़े कलाकार हो! तुम्हारी कुशलता का क्या कहना! जो जानते हैं वे जहर को भी औषधि बना लेते हैं। वक्त पर काम पड़ जाता है जहर भी जीवन को बचाने के। तुम्हारी औषधि भी जीवन की जानलेवा हो जाती है। असली सवाल तुम्हारा है।

बुद्ध के जाने के बाद धर्म शाखा-प्रशाखाओं में बंटा। बंटना ही चाहिए। जब वृक्ष बड़ा होगा तो पींड ही पींड थोड़े ही रह जाएगा। शाखा-प्रशाखाओं में बंटेगा। पींड ही पींड बड़ी ठूठ मालूम पड़ेगी। उस वृक्ष के नीचे छाया किसको मिलेगी जिसमें पींड ही पींड़ हो।

वृक्ष तो वही शानदार है, वही जीवित है, जिसमें हजारों शाखाएं-प्रशाखाएं निकलती हैं। शाखाएं-प्रशाखाएं तो इसी की खबर है कि वृ़क्ष में हजार वृक्ष होने की क्षमता थी, किसी तरह एक में समा लिया है। हर्ज भी कुछ नहीं है। जितनी शाखाएं-प्रशाखाएं उतना ही सुंदर। क्योंकि उतने ही पक्षी बसेरा कर सकेंगे। उतने ही पक्षी घोंसले बना सकेंगे। उतने ही यात्री विश्राम पा सकेंगे। उतनी ही बड़ी छाया होगी, उतनी ही गहन छाया होगी। धूप से तपे-मांदों के लिए आसरा होगा, शरण होगी।

जो वृक्ष ठूंठ रह जाए, उसका क्या अर्थ हुआ? वृक्ष बांझ है। उसमें फैलने की क्षमता नहीं है। जीवन का अर्थ है, फैलने की क्षमता। सभी जीवित चीजें फैलती हैं। सिर्फ मृत्यु सिकुड़ती है। मृत्यु सिकोड़ती है, जीवन फैलाता है। जीवन विस्तार है, एक से दो, दो अनेक होता चला जाता है। परमात्मा अकेला था, फिर अनेक हुआ, क्योंकि परमात्मा जीवित था। अगर मुर्दा होता, तो अनेक नहीं हो सकता था। संसार को गाली मत देना, अगर तुम्हें मेरी बात समझ में आये तो तुम समझोगे कि संसार परमात्मा की शाखाएं-प्रशाखाएं है। तुम भी उसी की शाखा-प्रशाखा हो। इतना जीवित है कि चुकता ही नहीं, फैलाता ही चला जाता है।

वृक्ष भारत में बड़े प्राचीन समय से जीवन का प्रतीक रहा है। बुद्ध के वृक्ष में बड़ी क्षमता थी, बड़ा बल था, बड़ी संभावना थी। अकेली पींड़ से कैसे बुद्ध का वृक्ष चिपटा रहता? जैसे-जैसे बढ़ा, शाखाएं-प्रशाखाएं हुईं। लेकिन ज्ञानी की दृष्टि में उन शाखाओं-प्रशाखाओं में कोई विरोध न था। वे सभी एक ही वृक्ष से जुड़ी थीं और एक ही जड़ पर जीवित थीं। उन सभी का जीवन एक ही स्रोत से आता था। बुद्ध स्रोत थे। ज्ञानी ने इसमें कुछ विरोध न देखा। इसमें इतना ही देखा कि बुद्ध में बड़ी संभावना है।

यह जरा हैरानी की बात है, सारी मनुष्य-जाति में बुद्ध ने जितनी संभावनाओं को जन्म दिया, किसी दूसरे आदमी ने नहीं दिया।

महावीर के वृक्ष में केवल दो शाखाएं लगी-दिगंबर, श्वेतांबर। बस। और उनमें भी कोई बहुत फासला नहीं है। क्षुद्र बातों का फासला है। कि कोई महावीर का श्रृंगार करके पूजता है, कोई महावीर को नग्न पूजता है। श्रृंगार के भीतर भी महावीर नग्न हैं, और नग्न में भी उनका बड़ा श्रृंगार है। इसमें कुछ बड़ा फासला नहीं है। उनकी नग्नता ही श्रृंगार है, अब और क्या सजाना है? उनको और सजाना तो ऐसे ही है जैसे कोई सांप पर पैर चिपकाए। वह सांप अकेला बिना पैर के ही खूब चलता था। अब तुम और पैर चिपकाकर उसे खराब मत करो। यह तो उन पर और श्रृंगार करना ऐसे ही है जैसे कोई मोर को और रंगों से पोत दे। मोर वैसे ही काफी रंगीन था, अब तुम कृपा करके रंग खराब मत करो।

महावीर की नग्नता में ही खूब श्रृंगार है। उन जैसी सुंदर नग्नता कभी प्रगट हुई? पर फिर तुम्हारी मौज है। तुम्हारा मन नहीं मानता-इसलिए नहीं कि महावीर में कुछ कमी है-तुम्हारा मन बिना कुए कुछ नहीं मानता। तुम कुछ करना चाहते हो। करो भी क्या? महावीर जैसे व्यक्ति के सामने एकदम असमर्थ हो जाते हो। सुंदर कपड़े पहनाते हो, सुंदर आभूषण लगाते हो, यह तुम्हारी राहत है। इससे महावीर का कुछ लेना-देना नहीं। तुम्हारे सब वस्त्रों के पीछे भी वे अपनी नग्नता में खड़े हैं, नग्न ही हैं। ऐसे छोटे-छोटे फासले हैं।

दिगंबर कहते हैं कि उनकी कोई शादी नहीं हुई। श्वेतांबर कहते हैं, शादी हुई। क्या फर्क पड़ता है? दिगंबर कहते हैं, उनका कोई बच्चा नहीं हुआ-जब शादी ही नहीं हुई तो बच्चा कैसे हो? श्वेतांबर कहते हैं, उनकी एक लड़की थी। पर क्या फर्क पड़ता है? महावीर में इससे क्या फर्क पड़ता है? शादी हुई कि न हुई? ये तो फिजूल की विस्तार की बातें हैं। महावीर के होने का इससे क्या लेना-देना है? शादी हुई हो तो ठीक, न हुई हो तो ठीक। जिसको जैसी मौज हो वैसी कहानी बना ले। लेकिन कोई बहुत बड़ा विस्तार नहीं हुआ।

जीसस की भी दो शाखाएं फूटकर रह गयीं। प्रोटेस्टेंट और केथोलिक। कोई बड़ा विस्तार नहीं हुआ।

बुद्ध अनूठे हैं, अद्धितीय हैं। सैकड़ों शाखाएं हुईं। और प्रत्येक शाखा इतनी विराट थी कि उसमें से भी प्रशाखाएं हुईं। कहते हैं, जितने दर्शन के मार्ग अकेले बुद्ध ने खोले उतने मनुष्य-जाति में किसी व्यक्ति ने नहीं खोले। बुद्ध अकेले समस्त प्रकार के दर्शनों का स्रोत बन गये। ऐसी कोई दार्शनिक परंपरा नहीं है जगत में जिसके समतुल परंपरा बुद्ध-धर्म में न हो।

अगर तुम बुद्ध-धर्म का पूरा इतिहास समझ लो, तो बाकी सब धर्मों का इतिहास छोड़ भी दो तो कुछ हर्जा न होगा। क्योंकि सारे जगत में जो भी कहीं हुआ है, जो विचार कहीं भी जन्मा है, वह विचार बुद्ध में भी जन्मा है। बुद्ध अकेले बड़े विराट वृक्ष हैं।

यह तो सौंदर्य की बात है। यह तो अहोभाव और उत्सव की बात है। इसमें कुछ चिंता का कारण नहीं है। यह तो इतना ही बताता है कि बुद्ध में बड़ी में संभावना थी। ज्ञानी ने तो उस संभावना का उपयोग किया। उसमें कोई झगड़ा न था। बिल्कुल विपरीत जाने वाली शाखाएं भी-एक पूरब जा रही है, एक पश्चिम जा रही है-फिर भी एक ही तने से जुड़ी होती हैं, विरोध कहां है? और उन दोनों का जीवन-स्रोत एक ही जगह से आता है। एक बुद्ध ही फैलते चले गये सब में। इससे कुछ अड़चन न थी।

लेकिन ज्ञानी अड़चन खड़ी करता है। अज्ञानी की अड़चन ऐसी है कि वह यह भूल ही जाता है कि सभी विरोध अलग-अलग दिशाओं में जाती शाखाएं हैं। एक ही स्रोत से जन्मी हैं।

मैंने सुना है, एक गुरु के दो शिष्य थे। गर्मी की दोपहर थी, गुरु विश्राम कर रहा था, और दोंनो उसकी सेवा कर रहे थे। गुरु ने करवट बदली-तो दोनों शिष्यों ने आधा-आधा गुरु को बांट रखा था सेवा के लिए, बायां पैर एक ने ले रखा था, दायां पैर एक ने ले रखा था-गुरु ने करवट बदली तो बायां पैर दाएं पैर पर पड़ा गया। स्वभावतः झंझट खड़ी हो गई।

गुरु तो एक है। शिष्य दो थे। तो उन्होंने हिन्दुस्तान-पाकिस्तान बांटा हुआ था। तो जब दाएं पैर बायां पैर पड़ा, तो जिसका दायां पैर था उसने कहा, हटा ले अपने बाएं पैर को। मेरे पैर पर पैर! सीमा होती है सहने की। बहुत हो चुका, हटा ले। तो उस दूसरे ने कहा, देखूं किसकी हिम्मत है कि मेरे पैर को और कोई हटा दे! सिर कट जाएंगे, मगर मेरा पैर जहां रख गया। यह कोई साधारण पैर नहीं, अंगद का पैर है। भारी झगड़ा हो गया, दोनों लट्ठ लेकर आ गए।

यह उपद्रव सुनकर उसकी नींद खुल गई, उसने देखी यह दशा। उसने जब लट्ठ चलने के ही करीब आ गये-लट्ठ चलने वाले थे गुरु पर! क्योंकि जिसका दायां पैर था वह बाएं पैर को तोड़ डालने को तत्पर हो गया था। और जिसका बायां पैर था वह दाएं पैर को तोड़ डालने को तत्पर हो गया था। गुरु ने कहा, जरा रुको, तुम मुझे मार ही डालोगे। ये दोनों पैर मेरे हैं। तुमने विभाजन कैसे किया?,

अज्ञानी बांट लेता है और भूल ही जाता है। भूल ही जाता है कि जो उसने बांटा है वे एक ही व्यक्ति के पैर हैं, या एक ही वृक्ष की शाखाएं हैं। अज्ञानी ने उपद्रव खड़ा किया। अज्ञानी लड़े। एक-दूसरे का विरोध किया। एक-दूसरे का खंडन किया। एक-दूसरे को नष्ट करने की। जब संप्रदाय अज्ञानी के हाथ में पड़ता है तब खतरा शुरू होता है।

ज्ञानी संप्रदाय को बनाता है, क्योंकि धर्म की शाखाएं-प्रशाखाएं पैदा होती हैं। जितना जीवित धर्म, उतनी शाखाएं-प्रशाखाएं। दुनिया से संप्रदाय थोड़े ही मिटने हैं, अज्ञानी मिटाने हैं। जिस दिन संप्रदाय मिट जाएंगे, दुनिया बड़ी बेरौनक हो जाएगी। उस दिन गुरु बिना पैर के होगा। उसको फिर, जैसे भिखमंगों को ठेले पर रखकर चलाना पड़ता है, ऐसे चलाना पड़ेगा। फिर वृक्ष बिना शाखाओं के होगा। न पक्षी बसेरा करेंगे, न राहगीर छाया लेंगे। और जिस वृक्ष में पत्ते न लगते हों, शाखाएं न लगती हों , उसका इतना ही अर्थ है कि जड़ें सूख गयी। अब वहां जीवन नहीं। जीवन छोड़ चुका उसे, उड़ गया।

तुम पूछते हो, ‘बुद्ध के देह में जीवित रहते उनका भिक्षु-संघ एकता में रहा।’ नहीं, ज्ञानियों के लिए तो वह अब भी एकता में है। और तुमसे मैं कहता हूं अज्ञानी के लिए वह तब भी एकता में नहीं था जब बुद्ध जीवित थे। तब भी अज्ञानी अपनी तैयारियां कर रहे थे। तभी फिरके बंटने शुरू हो गये थे। बुद्ध के जीते जी अज्ञानियों ने अपने हिसाब बांट लिये थे, अलग-अलग कर लिये थे। बुद्ध के मरने से थोड़े ही अचानक अज्ञान पैदा होता है। अज्ञानी तो पहले भी अज्ञानी था, वह कोई अचानक थोड़े ही अज्ञानी हो गया। और जो अज्ञानी है, बुद्ध के जीवित रहने से थोड़े ही कुछ फर्क पड़ता है? अज्ञान तो तुम्हें छोड़ना पड़ेगा, बुद्ध क्या कर सकते है?

बुद्ध ने कहा है मार्ग दिखा सकता हूं, चलना तो तुम्हें पड़ेगा। समझा सकता हूं, समझना तो तुम्हें पड़ेगा। अगर तुम न समझने की ही जिद्द किये बैठे हो, अगर समझने के लिए तुम में जरा भी तैयारी नहीं है-तैयारी नहीं दिखाई है-तो बुद्ध लाख सिर पीटते रहें, कोई परिणाम नहीं हो सकता।

-ओशो
पुस्तकः जीने के दो ढंग
प्रवचन नं. 16 से संकलित

http://www.facebook.com/jagobhartjago/posts/349240485204508

धर्म से संगठन है,संगठन से सुरक्षा है,भय से भक्ति है और धन से धर्म चलता है

धर्म से संगठन है,संगठन से सुरक्षा है,भय से भक्ति है और धन से धर्म चलता है:

ये नियम है की भय से भक्ति होती है और धन से धर्म चलता है , बौध धर्म में न ही धन है न ही किसी इश्वर की शक्ति का भय, यही कारन है की लोग क्लासिकल डांस की तरह इसको अच्छा तो कहते हैं अपनाने का दिखावा भी करते हैं पर असल में अपनी जिन्दगी में नहीं अपनाते| समाज में तो खुद को बुद्धिस्ट कहेंगे पर मन्नत मांगने और उसके पूरे होने पर चड़ाव चडाने मंदिर ही जायेंगे | जिसकी मन्नत मांगते हैं उसे पाने की हर संभव कोशिश खुद करते है परिणामस्वरूप जब वो मिल जाती है तब नाम उस देवी देवता का होता है जिससे मनौती मांगी गई थी , कमाल है

साथिओं धर्म कितना भी अच्छा क्यों न हो पर उसे मानने वाले अगर कमजोर होंगे,  तो उस धर्म की कोई पूछ नहीं
धर्म कितना भी गन्दा हो पर अगर उसे मानने वाले शक्तिशाली और संगठित  हैं तो  वही चलेगा और जीतेगा..समयबुद्धा
गरुड़ पुराण में सालों  पहले ये लिख दिया गया था को “अगर आपके पास धन है तो आपके अवगुण भी छुप जायेंगे और अगर धन नहीं तो आपके सद्गुणों को भी पूछने वाला कोई नहीं होगा “
बौध धर्म की उन्नति बिना धनबल के संभव नहीं है, ये और बात है की आप लोग  इसके सिधान्तों को अपने जीवन में उतरने तक ही सीमित रहते हैं और इस धर्म को मुकाबले लायक बनाने में रूचि नहीं रखते|इस सबका एक ही समाधान है- हर बुध पूर्णिमा को सभी अपने निकटतम बौध विहारों पर संगठित हों और यथाशक्ति दान दें | अधिक जानकारी के लिए इसी ब्लॉग का पोस्ट  “बौध धर्म को कैसे सरक्षण दिया जाए ” जरूर पढ़ें और अपने लोगों तक पहुचाएं |

यदि आप खुद को जानते हैं पर अपने प्रतिद्वंदी को नहीं जानते तो आपकी हार निश्चित है
यदि आप खुद को नहीं  जानते हैं पर अपने प्रतिद्वंदी को जानते हैं तो भी आपकी हार निश्चित है
पर यदि आप खुद को जानते हैं और अपने प्रतिद्वंदी को भी जानते है तो आपको जीतने से कोई नहीं रोक सकता…एक चाइनीज बौध भिक्षु

जिनसे आपके धर्म का मुकाबला है उनकी नीती सदीओं पहले भी कितनी उन्नत थी इसका उदाहरण निम्न लिखित चाणक्य निति एक एक छोटे से हिस्से में देखें :
चाणक्य के 15 सूक्ति वाक्य —
-1) “दूसरो की गलतियों से सीखो अपने ही ऊपर प्रयोग …करके सीखने को तुम्हारी आयु कम पड़ेगी.”
2)”किसी भी व्यक्ति को बहुत ईमानदार नहीं होना चाहिए —सीधे वृक्ष और व्यक्ति पहले काटे जाते हैं.
“3)”अगर कोई सर्प जहरीला नहीं है तब भी उसे जहरीला दिखना चाहिए वैसे डंस भले ही न दो पर डंस दे सकने की क्षमता का दूसरों को अहसास करवाते रहना चाहिए.
“4)”हर मित्रता के पीछे कोई स्वार्थ जरूर होता है –यह कडुआ सच है.
“5)”कोई भी काम शुरू करने के पहले तीन सवाल अपने आपसे पूछो —मैं ऐसा क्यों करने जा रहा हूँ ? इसका क्या परिणाम होगा ? क्या मैं सफल रहूँगा ?
“6)”भय को नजदीक न आने दो अगर यह नजदीक आये इस पर हमला करदो यानी भय से भागो मत इसका सामना करो .”7)”दुनिया की सबसे बड़ी ताकत पुरुष का विवेक और महिला की सुन्दरता है.”8)”काम का निष्पादन करो , परिणाम से मत डरो.”9)”सुगंध का प्रसार हवा के रुख का मोहताज़ होता है पर अच्छाई सभी दिशाओं में फैलती है.”10)”ईश्वर चित्र में नहीं चरित्र में बसता है अपनी आत्मा को मंदिर बनाओ.”

11) “व्यक्ति अपने आचरण से महान होता है जन्म से नहीं.”

12) “ऐसे व्यक्ति जो आपके स्तर से ऊपर या नीचे के हैं उन्हें दोस्त न बनाओ,वह तुम्हारे कष्ट का कारण बनेगे. सामान स्तर के मित्र ही सुखदाई होते हैं .”

13) “अपने बच्चों को पहले पांच साल तक खूब प्यार करो. छः साल से पंद्रह साल तक कठोर अनुशासन और संस्कार दो .सोलह साल से उनके साथ मित्रवत व्यवहार करो.आपकी संतति ही आपकी सबसे
अच्छी मित्र है.”

14) “अज्ञानी के लिए किताबें और अंधे के लिए दर्पण एक सामान उपयोगी है .”

15) “शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है. शिक्षित व्यक्ति सदैव सम्मान पाता है. शिक्षा की शक्ति के आगे युवा शक्ति और सौंदर्य दोनों ही कमजोर हैं .”

धन के बिना बाबा साहब ने कितनी ज्यादा समस्याओं का सामना किया,कितनी क़ुरबानी दी इसका अहसास उनकी निम्नलिखित बात से ही हो जाता है:

“जब मेरे प्यारे बेटे गंगाधर का बीमारी के कारण निधन हुआ, तब उसके मृतदेह को ढकने के लिए नए कपडे लाने के लिए लोगो ने मेरे से पैसे मांगे, पर मेरे पास उतने भी पैसे नहीं थे तब मेरी पत्नी ने उसकी साडी का एक टुकड़ा फाड कर दिया ….और हम गंगाधर को स्मशान ले गए .मेने मेरी जिंदगी में गरीबी के जो दिन देखे है, वो भारत के किसी नेता ने नहीं देखे होंगे ……फिर भी मेने मेरी गरीबी के कारण कभी मेरा आत्म-सन्मान और मेरे आन्दोलन को कभी पीछे हटने नहीं दिया . ऐसी गरीबी में भी मेने अपने आप को किसी के हाथो बिकने नहीं दिया” ……डॉ. आंबेडकर.

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“धिक्कार हैं उन बहुजन दलितों पर जो अपने भाई बहनों के दुःख से बेखबर बस मजे में टाइम पास कर रहे हैं|किसी ने बिलकुल सही कहा है -अगर अमन से रहना चाहते हो तो जंग के लिए तयार रहो अर्थात अपनी क्षमता बढ़ाते रहो|अम्बेडकर संगर्ष के परिणाम स्वरुप आज जो सुख मिला है अगर केवल उसी सुख में डूबे रहे तो वो दिन दूर नहीं जब दोबारा पशु से बुरी स्तिथि हो जाएगी| साथियों सारा खेल शक्ति या क्षमता का ही है बाकि सब तो वक्ती दिखावा है| हर रोज़ सोने से पहले खुद से सवाल पूछो- आपने समाज या कौम और खुद को शक्तिशाली बनाने के लिए आज क्या किया? जवाब होना चाहिए वर्ना अगला नंबर आपका ही है|”….समयबुद्धाbahujan

इश्वर के काल्पनिक सिद्धांत को अब बहुजन ही नहीं समस्त विश्व समझ रहा है

भगवान् बुद्ध ने कहा था – ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण किया या नहीं – इस विषय पर विचार करना वैसा ही है जैसे किसी व्यक्ति को एक तीर आकर चुभ जाय तो वह उस तीर से हुए घाव का इलाज करने की बजाय यह सोचने लगे और पता करने लगे कि तीर कहाँ से आया?? किसने चलाया? किसने बनाया?? भगवान् ने कहा – सर्वं दुखं — यह संसार दुःख का एक समुद्र है .. इसमें रहते हुए यदि तुमने एक भी रोते हुए ह्रदय को हंसा दिया तो सहस्रों स्वर्ग तुम्हारे ह्रदय में विकसित होंगें.

आस्तिक कौन होता है ? जो व्यक्ति किसी अनदेखी अनजानी सत्ता के अस्तित्व को आँख मींच कर, बिना सोचे विचारे ही, दिमाग को बंद कर दिल से स्वीकार कर लेता है और तर्क नहीं करना चाहता है आस्तिक कहलाता है । वो किसी बात को इसलिए नहीं मानता है कि वो सही है बल्कि इसलिए मानता है कि और लोग उसको मानते है और इसमें उसका भय छिपा रहता है कि अगर वो अनजानी शक्ति के खिलाफ कुछ बोलेगा तो उसका अनिष्ट होगा और मरने के बाद भी उसको नर्क की भयानक यातनाये सहनी पड़ेंगी। किसी भी धर्म से जुड़ा व्यक्ति आस्तिक होता है
नास्तिक कौन है ? जो व्यक्ति किसी भी बात को तर्कों और विज्ञानं की कसौटी पर कसता है और आँख मींच कर किसी का अनुसरण नहीं करता है । किसी सर्वोच्च सत्ता के अस्तित्व में यकीन नहीं करता और अपनी बातो के समर्थन में तर्क देता है । बो दिल से नहीं दिमाग से सोचता है नास्तिक कहलाता है और नास्तिक का किसी धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं होता है…Ahibaran Singh

2000 वर्ष तक कोई भी इश्वर हमारी मदद करने को नहीं आया | किसी भी इश्वर ने ये नहीं सोचा कि ये भी इन्सान है इनको भी जीने का अधिकार है | किसी भी इश्वर ने ये नहीं सो…चा कि इनको भी मैंने बनाया है फिर मै इनको मंदिर में प्रवेश करने से क्यों रोकूँ ? किसी भी इश्वर ने ये नहीं सोचा कि इनकी भी आवश्यकताए है,इनको भी सुविधापूर्वक, सरल जीवन जीने का अधिकार है | किसी भी इश्वर ने ये नहीं सोचा जिस पानी को पशु पी सकते है वो पानी इन इंसानों के पीने से कैसे अपवित्र हो सकता है ? किसी भी इश्वर ने ये नहीं सोचा इनकी भी जरूरते है इसलिए इनको भी भविष्य के लिए धन और संपत्ति संचय200px-Dr_Bhimrao-Ambedkar करने का अधिकार है |किसी भी इश्वर ने ये नहीं सोचा जो लोग गाय का मूत्र पीकर अशुद्ध नहीं होते है वो किसी इन्सान की छाया पड़ने से कैसे अपवित्र हो सकते है ? किसी भी इश्वर ने ये नहीं सोचा कि इनको भी ऊपर उठने का अधिकार है और इनको भी शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है ? किसी भी इश्वर ने ये नहीं सोचा कि जब ये धरती पशु पक्षियों और इन तथाकथित उच्च वर्ण के लोगो के मलमूत्र से अपवित्र नहीं होता है तो फिर इन लोगो के थूक और पदचाप से कैसे अपवित्र हो सकती है ? फिर उस इश्वर को मै क्यों मानु जिस इश्वर ने इंसानों में ही फर्क किया और इंसानों को ६७४३ से अधिक श्रेणियों यानि कि जातियों में बाँट दिया | जिस इश्वर ने ये नहीं सोचा सभी को समानता का अधिकार है और सबको आजादी से जीने का अधिकार है, उस इश्वर को मै क्यों मानू ? मै उस इन्सान को मानता हूँ जिसने इन सभी बातो को जाना और हमको हर तरह की से मुक्ति दिलाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया | उन्होंने सारा जीवन हमको पशु से इन्सान बनाने के लिए बलिदान कर दिया और हमको इन्सान बना कर ही दम लिया | मेरे इश्वर तो वही बाबा साहब है जिनकी वजह से मै आज आजाद हूँ | नकी वजह से मैंने शिक्षा प्राप्त की, वही मेरे इश्वर है | जिनकी वजह से मै आज सिर उठाकर चल सकता हूँ वही बाबा साहब मेरे इश्वर है और मै उन बाबा साहब को नमन करता हूँ

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