बौध धर्म को कैसे सरक्षण दिया जाए


जैसा की मैंने धर्म क्या है सवाल के जवाब में हम इस तथ्य पर पहुँचे हैं की आज के तकनीक और पूंजीवादी युग में धर्म एक सामाजिक गुट बनकर रह गया है | जिस धर्म का गुट जितना ज्यादा संगठित होगा वही धर्म उतना ज्यादा फैलेगा| किसी भी धर्म की विचारधारा चाहे अच्छी हो या बुरी अगर के पास निम्न तीन चीज़े हों तो वो कामयाब हो जाएगा
-संगठन बल
-धन बल
-राजनेतिक सरक्षण या इश्वरिये सरक्षण

अभी जल्दी की १५-फरवरी-२०१२ की ही खबर है की मालदीव देश में ७ फरवरी को  इस्लामिक कट्टरपंथी लोगों ने सरकारी मालदीव राष्ट्रीय  संग्रहालय में तालिबान की मूर्ती विरोधी तर्ज पर ३० से भी ज्यादा नोवी  शाताब्धि की बौध मूर्तिओं को ध्वस्त कर दिया |आज जब सारे संसार में इस्लाम तेज़ी से फ़ैल रहा है तो अन्य मान्यताओं को बलपूर्वक ख़तम किया जा रहा है| इस खबर को आप स्वव अंग्रेजी में  इस लिंक पर पढ़ें

http://www.asianews.it/news-en/Islamists-destroy-some-30-Buddhist-statues-23986.html

| असल में व्यापक प्रचार न होने के कारण बौध धम्म को समझने के लिए थोडा अध्यन करना पड़ता है इसलिए ये केवल बुद्धि-जीवी वर्ग तक ही सीमित होकर रह गया है| बौध साहित्य बहुत व्यापक है जिसे हर व्यक्ति नहीं पढ़ पता और इस देश के सत्ताधारी लोग सच में बौध धर्म को उभारना नहीं चाहते |इस साहित्य को मीडिया में नहीं आने देते,कितने आश्चर्ये की बात है की इस देश में सभी धर्मीं के टीवी चैनल हैं पर भगवान् बुद्ध के देश में उन्ही के लिए एक चैनल तक नहीं | जबकि वे लोग ये बात अच्छी तरह जानते हैं की केवल यही विशुद्ध भारतीये  धर्म भविष्य में देश को अखंड और उन्नत कर सकता है| ये कितने दुःख की बात है की इन लोगों ने देश की धार्मिक रूप से असंतुस्ट आम जनता को विदेशी धर्म  की तरफ मुड़कर अलगाववाद की तरफ धकेल दिया है जो देश की अखंडता के लिए खतरनाक हो सकता है| भारत में भी बौध धर्म की स्तिथि को सुधारने की सभी कोशिशें नाकामयाब हो रही हैं क्योंकि:

१. बहुजन समाज धर्म परिवर्तन सामाजिक सुरक्षा के लिए करता है पर यहाँ तो  बौध धर्म खुद ही खतरे में है, ऐसे में लोग हारकर इस्लाम या इसाइयत को अपना रहे हैं
२. बौध धर्म की अनीश्वरवाद या नास्तिकता पर अन्य धर्म भरी पड़ रहे है
३. बौध धर्म को राजनेतिक सरक्षण नहीं है
४. भारत के सक्षम लोग इस धर्म को मारा हुआ धर्म समझते हैं और इसके लिए कुछ नहीं करना चाहते

बौध धम्म पूर्णतः वैज्ञानिकता पर आधारित धर्म है जहाँ प्रमाणिकता के बिना कुछ भी स्वीकार्य नहीं, जबकि अन्य सभी धर्मों के सिद्धांत केवल आस्था और परंपरा के बल पर चल  रहे हैं| अब भी दुनियां में ऐसा बहुत कुछ है जो वैज्ञानिकता और इंसान के समझ के परे है जिसे अन्य धर्म अपने धर्म से जोड़कर जनता को अपने साथ मिलाये रखते हैं| बुद्ध धम्म में ऐसा नहीं है, भगवान् बुद्ध ने इस विषय में कहा है की “सर्वोच्च सत्य अवर्णननिये है” | पर ये भी एक सच्चाई है की जब किसी व्यक्ति के जीवन में भीषण दुःख या परालौकिक घटनाएँ होतीं हैं तब केवल इश्वर रुपी काल्पनिक सहारा ही उसे ढाढस  बंधता है| बौध धम्म की सभी बातें सभी को अच्छी लगती हैं पर अनीश्वरवाद की बात से पीछे हट जाता है , 10% बुद्धिजीवी वर्ग तो अनीश्वरवाद को समझ सकता है पर मानते वे भी नहीं हैं |इसपर 90% आम आदमी को तो अटूट विशवास है की कोई न कोई  सर्वशक्तिमान तो है जो दुनियां चलता है|आम आदमी चमत्कार को नमस्कार करता है,उसे कोई ऐसा चाहिए ही चाहिए जिसके आगे वो अपने सुख दुःख रख सके| वो सच्चाई जानना ही नहीं चाहता ऐसे में उन तक भगवान् बुद्ध का सन्देश कैसे पहुंचेगा? यही कारण रहा की ये महा-कल्याणकारी धर्म हर आदमी तक आज भी नहीं पहुँच पा रहा है | उन्हें बाकि बातें समझने के लिए जीवित गुरु के प्रवचनों की आवश्यकता होती है, मौलवी,पादरी,पुरोहित,सत्संग अदि इसी जरुरत का एक उदाहरण है | इसी बात का फायदा उठाकर अन्य धर्म बहुसंख्यक आम जनता को काल्पनिक आस्था,चमत्कार और कर्मकांडों में फसाकर सत्य से दूर कर देते हैं |शायद  इसी इश्वरिये कल्पना की जरूरत के चलते सभी धर्म किसी इश्वरिये नाम पर केन्द्रित होते हैं,यहाँ तक की कुछ अभिनज्ञ अनुयाई  भगवान् बुद्ध को ही इश्वरिये शक्ति के रूप में पूजते हैं | भगवान् बुद्ध हमारे लिए निसंदेह  पूजनीय हैं पर उन्होंने खुद को इश्वर नहीं मना है |

ऐसे में जो यत्न बौध धर्म को पुनर्जीवित करके सदा के लिए चरम पर स्थापित कर सकता है वो यही है की –

– अनइश्वर्वाद को छोड़कर समय को इश्वरिये शक्ति के रूप में अपना लिया जाए|

-जितने भी बौध विहार हैं वह पर हर सुबह समय की प्रार्थना की जाये

– हर पूर्णिमा को सारा बौध समाज बौध विहार पर एक साथ प्रार्थना करे दान दे ताकि संगठन शक्ति साबित हो

– बौध भिक्षु को ज्यादा तत्पर और श्रम शील होना होगा,

-सारे बौध विहारों को एक दुसरे से संपर्क में रहना होगा और गो महाविहार   फैसला ले उसे  सभी बौधविहरों पर पहुचाया और मनवाया जाये

पर ऐसा तभी संभव है जब लोग संगठित हो और बौध धम्म के लिए कुछ करना चाहें, और लोग संगठित और संगर्ष शील तभी होंगे जब उन्हें बौध विहारों में कोई आकर्षण मिले| उन्हें आकर्षण तभी मिलेगा जब हम समय को इश्वरिये शक्ति के रूप में स्ताफित करके परंपरा का सर्जन कर्नेगे | मैं फिर कहता हूँ की धर्म को दो ही तरह से जीवित रक्खा जाता है

– राजनेतिक सरक्षण द्वारा

– इश्वरिये सरक्षण द्वारा

आज के अनेकों बौध देशों के लोग बौध धम्म के अनीश्वरवाद को छोड़कर तेज़ी से इस्लाम अपना रहे है, चाइना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है|असल में इश्वर एक झंडे का कम् करेगा जिसके नीचे सभी लोग इकठ्ठा हो जायेंगे अन्यथा सभी बौध विहारों में जैसे मुर्दानगी छाई  हुई है वैसे ही चाही रहेगी और लोग इससे ज्द्के भी छोड़ जायेंगे\ चाहे कोई मने या न मने पर बौध धर्म का जब भी चरम था तब इसको राजनेतिक सरक्षण प्राप्त था, पर सत्ता पलट तो होती ही रहती है और आगे भी होती ही रहेगी, ऐसे में केवल  इश्वरिये सत्ता ही स्थाई सरक्षण दे सकता है |

7 thoughts on “बौध धर्म को कैसे सरक्षण दिया जाए

  1. किसी सम्प्रदाय को बने रहने के लिए ईस्वरिय नहीं राजनैतिक संरक्षण की जरूरत होती है . ईस्वर तो मात्र एक विस्वास है पर दैनिक जीवन में फर्क राजनैतिक ताकत से पड़ता है . जब बौद्ध दुसरे देशों मैं गए तो वहां पहले से ही ईस्वरिय विस्वास वाले सम्प्रदाय थे , फिर ये वहां कैसे फले और फूले ? जवाब है राजनैतिक संरक्षण ! अगर केवल ईस्वरिय संरक्षण या विस्वास से ही सम्प्रदाय बने रहते तो बहुत से ईस्वरिय आस्था रखने वाले सम्प्रदाय विलुप्त न हो गए होते ! बौद्ध सम्प्रदाय आज भी बहुत से देशों में है जो ये सिद्ध करता है की ईस्वरिय विस्वास के बिना भी सम्प्रदाय अस्तित्व में बने रह सकते हैं . भारत में ही एक अनीश्वरवादी सम्प्रदाय है जो अत्यंत समृद्ध है और भारत सरकार के आयकर में उनका ३०% योगदान है , आप समझ गए होंगे की मैं जैन सम्प्रदाय की बात कर रहा हूँ .
    नमो बुद्धाय
    भवतु सब्ब मंगलम

    • आप केवल नकारात्मक पहलू को देख रहे है सकारात्मक प्रयास के नहीं सराह रहे हैं, नकारात्मकता छोडिये |आपकी बात सही है हम मानते हैं ही इश्वर एक कल्पना है पर इस बात को आप 90 % आम आदमी को कैसे समझाओगे, क्या आप बौध धम्म को केवल 10 % बुद्धिजीवी वर्ग तक ही सीमित रखना चाहते हो | पकी हांड़ी पर मिटटी नहीं चढ़ती, ईश्वरवाद जिसके पूरे व्यक्तित्व में रचा बसा हो उससे आप सीधे अनीश्वरवाद की बात करेंगे तो टकराव की स्तिथि बन जाएगी और वो समझने की बजाये ईश्वरवाद की रक्षा में अड़ जायेगा| या तो आप राजनेतिक बल का प्रयोग करो और खिलाफत करने वालों का मुह बंद कर दो या धेरे धीरे स्टेप बाय स्टेप उसका मानसिक परिवर्तन करो| आज के युग में जबरदस्ती नहीं की जा सकती और अगर करोगे तो कसीस न किसी दिन विद्रोह होगा और पुनः इश्वार्वार की स्थापना की जाएगी, जैसे की सम्राट अशोक के प्रपौत्र को मार कर बामनों ने की थी | ईश्वरवाद और अनीश्वरवाद के बीच समय को इश्वर के रूप में स्थापित करना परिवर्तन चक्र या पुल का काम करेगा|
      सबसे पहले लोगों को किसी भी तरह बौध धम्म के प्रति आकर्षित करो और इसका सिद्धांत सुनने को राज़ी करो, इसके लिए आप समय का सहारा लेना पड़ेगा क्योंकि आज आप राजनेतिक सरक्षण का सहारा नहीं ले सकते| बौध धम्म के उत्थान के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है की हमारे लोग हर हफ्ते न सही कम से कम हर पूर्णिमा को बौध विहारों पर इकठ्ठा हों कृपया प्रश्न: बौध धम्म में परम शक्ति इश्वर कौन है? का जवाब दोबारा पड़ें,मैं यहाँ पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ

      प्रश्न: बौध धम्म में परम शक्ति इश्वर कौन है? भगवान् बुद्ध ने स्वयं के इश्वर होने,किसी इश्वर का अवतार होने या किसी इश्वर का दूत होने से साफ़ इनकार किया है,उन्होंने स्वयं को मार्गदाता कहा है| किसी और के इश्वर होने के प्रश्न पर वे मौन हो कर गुजरते हुए समय की तरफ इशारा किया है ,जिसे समय गुजरने के साथ कुछ बौध सम्प्रदाए में इंकार या अनीश्वरवाद समझा गया, जबकि कुछ सम्प्रदायें में भगवान् बुद्ध को ही इश्वरिये शक्ति के रूप में स्वीकार कर लिए|
      बौध धम्म पूर्णतः वैज्ञानिकता पर आधारित धर्म है जहाँ प्रमाणिकता के बिना कुछ भी स्वीकार्य नहीं, जबकि अन्य सभी धर्मों के सिद्धांत केवल आस्था और परंपरा के बल पर चल रहे हैं| अब भी दुनियां में ऐसा बहुत कुछ है जो वैज्ञानिकता और इंसान के समझ के परे है जिसे अन्य धर्म अपने धर्म से जोड़कर जनता को अपने साथ मिलाये रखते हैं| बुद्ध धम्म में ऐसा नहीं है, भगवान् बुद्ध ने इस विषय में कहा है की “सर्वोच्च सत्य अवर्णननिये है” | पर ये भी एक सच्चाई है की जब किसी व्यक्ति के जीवन में भीषण दुःख या परालौकिक घटनाएँ होतीं हैं तब केवल इश्वर रुपी काल्पनिक सहारा ही उसे ढाढस बंधता है| बौध धम्म की सभी बातें सभी को अच्छी लगती हैं पर अनीश्वरवाद की बात से पीछे हट जाता है , 10% बुद्धिजीवी वर्ग तो अनीश्वरवाद को समझ सकता है पर मानते वे भी नहीं हैं |इसपर 90% आम आदमी को तो अटूट विशवास है की कोई न कोई सर्वशक्तिमान तो है जो दुनियां चलता है|आम आदमी चमत्कार को नमस्कार करता है,उसे कोई ऐसा चाहिए ही चाहिए जिसके आगे वो अपने सुख दुःख रख सके| वो सच्चाई जानना ही नहीं चाहता ऐसे में उन तक भगवान् बुद्ध का सन्देश कैसे पहुंचेगा? यही कारण रहा की ये महा-कल्याणकारी धर्म हर आदमी तक आज भी नहीं पहुँच पा रहा है | उन्हें बाकि बातें समझने के लिए जीवित गुरु के प्रवचनों की आवश्यकता होती है, मौलवी,पादरी,पुरोहित,सत्संग अदि इसी जरुरत का एक उदाहरण है | इसी बात का फायदा उठाकर अन्य धर्म बहुसंख्यक आम जनता को काल्पनिक आस्था,चमत्कार और कर्मकांडों में फसाकर सत्य से दूर कर देते हैं |शायद इसी इश्वरिये कल्पना की जरूरत के चलते सभी धर्म किसी इश्वरिये नाम पर केन्द्रित होते हैं,यहाँ तक की कुछ अभिनज्ञ अनुयाई भगवान् बुद्ध को ही इश्वरिये शक्ति के रूप में पूजते हैं | भगवान् बुद्ध हमारे लिए निसंदेह पूजनीय हैं पर उन्होंने खुद को इश्वर नहीं मना है |
      बौध धर्म में हम मानते हैं की या तो कोई इश्वर नहीं है और अगर है तो समय के सिवा और कोई नहीं|

  2. जितने भी बौध विहार हैं वह पर हर सुबह समय की प्रार्थना की जाये

    मैं इस बात से पूर्ण्तया सहमत हूँ । संगठन चाहे वह किसी रुप मे हो वह संगठित होकर ही पूर्ण दिखता है । मुझे याद है कि पिछ्ली बुद्ध पूर्णिमा को जब मै सुबह -२ बुद्ध विहार गया और कुछ देर रुकने के बाद यह निशचय किया कि अब रोज तो नही हाँ इतवार-२ आता रहूगां लेकिन मुझे यह कभी भी खुला नही दिखा । अत: सबसे पहले इन बुद्ध विहारों या मन्दिरों को रोजाना , हर समय अगर नही तो सुबह-२ खोलने का प्रबंध अवशय किया जाये ।

  3. Pingback: भय से भक्ति होती है और धन से धर्म चलता है « SamayBuddha

  4. Pingback: संगठन से सुरक्षा,भय से भक्ति और धन से धर्म चलता है « SamayBuddha

  5. बौद्ध धम्म को यदि वैज्ञानिकों का संरक्षण मिले तो वो सबसे ज्यादा ताकतवर संरक्षण होगा। ये संरक्षण पूरे विश्व मे लोगो को लाभ पाहुचाएगा, बौद्ध धम्म को बालकों के शैशव अवस्था मे ही सीखा दिया जाए तो ज्यादा फलदायी होगा। उसके लिए मेरे द्वारा facebook मे लिखे नोट ‘धम्म’ को जो की संक्षिप्त रूप मे बुद्ध धम्म की व्याख्या है, का प्रचार किए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि लोग जानना तो चाहते हैं, पर ज्यादा पढ़ना नहीं चाहते हैं, अतः इस बात को ध्यान मे रखने की आवश्यकता है।

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