बहुजन/बौद्ध धम्म साहित्य से हम किसको सही माने किसको गलत,किसको अपनाएं किसको छोड़ें|…धम्म -गुरु समयबुद्धा


ambedkar making buddhis

धर्म असल में परिवार,कौम,देश,सरकार अदि की ही तरह एक ‘संस्था’ मात्र है| संस्था किसी लक्ष्य के लिए बनाई जाती है,जो समय के साथ बड़ी हो जाती है | धर्म संस्था का मुख्य लक्ष्य उससे जुडी कौम के व्यक्तिगत और सामाजिक सुरक्षा की नीति निर्धारण और क्रियान्वयन है|बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने कई सालों तक  विभिन्न धर्मों का अध्ययन किया और बौध धर्म को चुना| उन्होंने कहा था की

अगर में शोषित समाज से  भी होता तो भी एक अच्छा इंसान होने के नाते मैं सर्व जीवा हितकारी बौद्ध धम्म ही चुनता

बहुजनों का दर्शन शास्त्र/ बौद्ध धम्म साहित्य इतना विस्तृत है की कहीं और कुछ खोजने की जरूरत ही नहीं सबकुछ यहीं है| सारा संसार जानता है की बौद्ध साहित्य में दर्शन अधिक है जबकि शोषक साहित्य में दर्शन कम और विजेता का महिमा गान अधिक है| ध्यान से शोध करें तो हम जान सकते हैं संसार की अधिकतम सभ्यताओं के दर्शन पर बौद्ध दर्शन का प्रभाव है|अफ़सोस ऐसे विश्व गुरु रहे श्रेष्ठ लोग दलित बनकर अपने शोषक कि पूजा कर रहे हैं| इनका भी क्या दोष , इनको संगर्ष से जोड़ना थोडा मुश्किल है क्योंकि जिन्दगी का नियम कहता है कि किसी को मूर्ख बनाना ज्यादा आसान है बजाये उसे ये समझाना की उसे मूर्ख बनाया गया है| धीरे धीरे ही सही पर हम लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे हैं .

बौद्ध धम्म साहित्य में एक तरफ तो लिखा है फलां बात ऐसे है वहीँ कहीं दूसरी तरफ लिखा है फलां बात ऐसे नहीं ऐसे है|आज बौध धम्म की तरफ अग्रसर लोगों की सबसे बड़ी परेशानी ये है की वो किसको सही माने किसको गलत,किसको अपनाएं किसको छोड़ें|बौद्ध धम्म के पतन के लिए न केवल दमन से बल्कि विरोधियों ने भिक्षु बन कर बौद्ध साहित्य में बहुत ज्यादा मिलावट कर दी थी| वही मिलावट का साहित्य आज मार्किट में उपलब्ध है जिसका सार यही बनता है जी जीवन नीरस है कुछ मत करो|असल में बौद्ध धम्म मनुवादी षडियन्त्र और अन्याय के खिलाफ क्रांति है|आप किसी धम्म साहित्य की मत सुनो, बाबा साहब आंबेडकर की निम्न तीन पुस्तकों को शुरुआती ज्ञान से लेकर अंतिम रेफरेंस तक मनो :

१. भगवन बुद्धा और उनका धम्म

२. भगवन बुद्धा और कार्ल मार्क्स

३. प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति

इन तीनो पुस्तकों से आगे जाना असल में अपने को धम्म विरोधी मिलावट में फ़साना होगा|इन तीन पुस्तकों की रचना डॉ आंबेडकर ने इसी भटकाव को रोकने के लिए किया है और ये बात उन्होंने खुद कही है|हमें आखिर कहीं किसी बिन्दु पर तो एक मत होना ही होगा वरना विरोधी अपनी चाल चल जायेंगे और हम सही गलत की बहस ही करते रह जायेंगे,अब फैसला आपके हाथ में है|

अगर आप फिर भी इसे ज्यादा बौद्ध साहित्य को खंगालना चाहते हो तो आपको निम्न बात समझनी होगी  -मूल बुद्ध धम्म शिक्षाओं में अन्य धर्मों की तरह कल्पना नहीं है, भगवान् बुद्ध ने संसार के सभी तथ्यों को दो भागों में बांटा है:

-एक वर्णनिये अर्थात जिसे अस्तित्व हो या तर्क से प्रमाणित किया जा सके उदाहरण के लिए जीवन में दुःख के कारण और निवारण|

-दूसरा अवर्णनिये जिसका जवाब कल्पना से से देकर पथभ्रष्ट करने कि बजाये तथागत ने उसे आने वाले समय पर छोड़ दिया|तथागत दूर द्रष्टा थे वे जानते थे कि जिसका वर्णन आज संभव नहीं भविष्य में वैज्ञानिक तरक्की से संभव होगा|बाकि के सभी धर्मों में जिस भी सवाल का प्रमाणिक जवाब नहीं मिला उसका काल्पनिक जवाब खोज कर धर्म ग्रन्थ से जोड़ दिया गया जो आस्था बन गई| उदाहरण के लिए खगोलिग़ घटनाओं सूरज, चाँद अदि को देविये शक्ति की कल्पना की बजाये अवर्णनिये छोड़ा जिनका सत्य आज विज्ञानं ने जगजाहिर कर दिया है| अगर आप इस बात को अच्छी तरह समझ जाओगे तो आपको खुद ही समझ में आने लगेगा की कहा मिलावट है और कहाँ असल बौद्ध सिद्धांत है

…बहुजन /बौद्ध धम्म  गुरु समयबुद्धा

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