बहुजन क्रान्तिकारी शहीद श्री उधम सिंह का आज 31-JULY को बलिदान दिवस है

 

udham singhभारत की आज़ादी की लड़ाई में पंजाब के प्रमुख बहुजन क्रान्तिकारी सरदार उधम सिंह का नाम अमर है। उन्होने जालियाँवाला बाग हत्याकांड के उत्तरदायी जनरल डायर  कोलन्दन में जाकर गोली मारी और निर्दोष लोगों की हत्या का बदला लिया, लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उन्होंने माइकल ओडवायर को मारा था, जो जलियांवाला बाग कांड के समय पंजाब के गर्वनर थे।[1] ओडवायर जहां उधम सिंह की गोली से मरा, वहीं जनरल डायर कई तरह की बीमारियों से ग्रसित होकर मरा।

udham singh (1)

जीवन वृत्त

उधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में हुआ था। सन 1901 में उधमसिंह की माता और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। उधमसिंह का बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्तासिंह था जिन्हें अनाथालय में क्रमश: उधमसिंह और साधुसिंह के रूप में नए नाम मिले। इतिहासकार मालती मलिक के अनुसार उधमसिंह देश में सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद आजाद सिंह रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक है। अनाथालय में उधमसिंह की जिन्दगी चल ही रही थी कि 1917 में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया। वह पूरी तरह अनाथ हो गए। 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शमिल हो गए। उधमसिंह अनाथ हो गए थे, लेकिन इसके बावजूद वह विचलित नहीं हुए और देश की आजादी तथा डायर को मारने की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए लगातार काम करते रहे।

जनरल डायर की गोली मारकर हत्या

उधमसिंह १३ अप्रैल, १९१९ को घटित जालियाँवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे। राजनीतिक कारणों से जलियाँवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई। इस घटना से वीर उधमसिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीकानैरोबीब्राजील और अमेरिका की यात्रा की। सन् 1934 में उधम सिंह लंदन पहुंचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगा।

उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुंच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके।

बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल ओ डायर को लगीं जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। उधमसिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दुनिया को संदेश दिया कि अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी बख्शा नहीं करते। उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला। अदालत में जब उनसे पूछा गया कि वह डायर के अन्य साथियों को भी मार सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया। उधम सिंह ने जवाब दिया कि वहां पर कई महिलाएं भी थीं और भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है।

4 जून, 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई। इस तरह यह क्रांतिकारी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया। 1974 में ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए। एसा था यह वईर जवान्।

Source: http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%89%E0%A4%A7%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9

उधमसिंह 13 अप्रैल, 1919  को घटित जालियाँवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे। राजनीतिक कारणों से जलियाँवाला बागमें मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई। इस घटना से वीरउधमसिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकरमाइकल ओ डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली। अपने मिशन को अंजाम देनेके लिए उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिकाकी यात्रा की। सन् 1934 में उधम सिंह लंदन पहुंचे और वहां 9, एल्डरस्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य सेएक कार खरीदी और साथ में अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकानेलगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगा।

उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायलसेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल ओडायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल परपहुंच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिएउन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लियाथा, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके।

बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओडायर पर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल ओ डायर को लगीं जिससे उसकीतत्काल मौत हो गई। उधमसिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दुनिया को संदेशदिया कि अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी बख्शा नहीं करते। उधम सिंह नेवहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमाचला। अदालत में जब उनसे पूछा गया कि वह डायर के अन्य साथियों को भी मारसकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया। उधम सिंह ने जवाब दिया किवहां पर कई महिलाएं भी थीं और भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करनापाप है।

4 जून, 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसीदे दी गई। इस तरह यह क्रांतिकारी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास मेंअमर हो गया। 1974 में ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए।

जहा आज वो लोग सत्ताओ का सुख भोग रहे है…जिन्होंने कोई कुबानी नहीं दी……….वही ऐसे वीर शहीद जिन्होंने भारत माता के अपमान का बदला लेने के लिए अपनी संकल्प की अग्नि को २० साल तक दबाये रखा और….जलियावाला कांड का बदला लिया….ऐसे  ही  पंजाब के वीर शहीद उधम सिंह को हम नमन करते है…………..

नासिक महारास्ट्र में स्तिथ पांडव गुफाएं बौद्ध धम्म की बेजोड़ कलाकृति हैं

 नासिक महारास्ट्र में स्तिथ पांडव गुफाएं बौद्ध  धर्म की बेजोड़ कलाकृति हैं
 कमाल की बात है बौद्ध कला के इस बेजोड़ नमूने का नाम भी बौद्ध नहीं है,..
नासिक महारास्ट्र में स्तिथ पांडव गुफाएं बौध धर्म की बेजोड़ कलाकृति हैं| एक पूरे पहाड़ को काट कर पहले २२ चोकोर कमरे नुमा गुफाएं बनाई  गईं फिर उन कमरों के अंदर दीवारों पर बौध मूर्तियाँ उकेर कर बनायीं गईं| इन्हें बनाना  बेहद कठिन और कला से परिपूर्ण काम था , ये अजूबा ही हैं ये बेहतरीन टूरिस्ट स्पोट है पर आज बिलकुल सून सान पड़े  हैं | ये बेहद  दुःख की बात है की इन गुफाओं की देख भाल ठीक से नहीं की जा रही है, हद तो ये है की इन गुफाओं के अंदर सफाई और रौशनी तक नहीं है, इसलिए अंदर की तस्वीर नहीं खीच पाते | ये ही कोई मंदिर होता तो क्या रौशनी क्या सफाई यहाँ रोज़ लाखों की भीड़ अति और करोड़ों का चढ़ाव चड़ता| कमल की बात है की टूरिस्टों को ऐसे ऐसे जगह ले जाया जाता हैं जहाँ जाकर लगता है की “खुदा पहाड़ निकली चुहिया” पर इस जैसे अद्व्तीये कलाकृति के बेजोड़ नमूने को देखने के लिए टूरिस्टों का अकाल है | इसकी  ऐसी दुर्दशा का जिम्मेदार कोन  है |
मैंने स्वेव यहाँ से ये तस्वीरें ली हैं

बाबा साहेब डॉ आंबेडकर मानते थे की बौद्ध धम्म का प्रचार-प्रसार करना ही मानवता की सच्ची सेवा है…समयबुद्धा

ambedkar making buddhis

बाबा साहब आंबेडकर द्वारा रचित  महान धम्म-ग्रन्थ “भगवन बुद्धा और उनका धम्म”  में समयबुद्धा द्वारा लिखित प्रकथन का एक अंश यहाँ प्रस्तुत है:

नमो तस्य भगवतो अर्हतो समं सम बुद्धस्य

……….मैं —————— के संस्थापक श्री ————— जी को उनके धम्म एव मिशन में योगदान के लिए बहुत बहुत धन्यवाद देना चाहूँगा| मैं उनको इस महान बौद्ध धम्म ग्रन्थ में मेरी रचना “बहुजन क्षमता और जिन्दगी के नियम” के चंद अध्याय सारांश को प्रकथन के रूप में प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद् देता हूँ|

ये मेरे लिए गौरव की बात है की मुझे  युगपुरुष महाज्ञानी बहुजन मसीहा एव आधुनिक भारत के उत्क्रिस्ट शिल्पकार बाबा साहेब डॉ आंबेडकर के विश्व चर्चित ऐतिहासिक एव महानतम धम्म-ग्रन्थ “भगवन बुद्धा और उनका धम्म” का प्रकथन लिखने का अवसर प्राप्त हुआ |बौद्ध धम्म साहित्य बहुत ज्यादा विस्तृत है साथ ही उसमें मूल धम्म से विरोधाभासी बातें यदा कदा मिल जातीं हैं जो उपासक को पथभ्रष्ट कर देती हैं|हम समझ सकते हैं की दो से ढाई हज़ार सालों में ऐसा भी समय आया होगा जब कुछ विरोधीयों ने इसमें मिलावट कर दी हो| बाबा साहब ने मूल धम्म को संचित कर इस ग्रन्थ को रचकर व्यस्त जनता के लिए बौद्ध धम्म को सही रूप में समझने का सटीक साहित्य उपलब्ध करवाया है|जब मैं अन्यत्र उपलब्ध धम्म साहित्य पड़ता हूँ तब मुझ खुद महसूस हुआ की एक ऐसे संचित एव स्थापित धम्म साहित्य की जरूरत थी|बाबा साहेब का मानव सभ्यता पर ये उपकार बहुत सराहनिय है उनको कोटि कोटि नमन| बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने कई सालों तक  विभिन्न धर्मों का अध्ययन किया और बौद्ध धम्म को चुना| वे बखूबी  जानते थे की  बौद्ध धम्म से न केवल बहुजनों का उद्धार होगा अपितु समस्त मानवता का कल्याण होगा| वे मानते थे की बौद्ध धम्म का प्रचार-प्रसार करना ही मानवता की सच्ची सेवा है,उन्होंने कहा था की “अगर में शोषित समाज से न भी होता तो भी एक अच्छा इंसान होने के नाते मैं सर्व जीवा हितकारी बौद्ध धम्म ही चुनता|”

बाबा साहब ने बौद्ध धम्म में लौटना यूं ही नहीं स्वीकार किया था, वो केवल बुद्ध की अच्छाई से ही प्रभावित नहीं हुए थे बल्कि उनको पता था की उनकी अनुपस्थिति मे बुद्ध धम्म  ही हजारों वर्षों से शोषित रहे बहुजनों को मुक्ति दिला सकता है, उन्हे पहले की तरह फिर बुद्धि, बल, ऐश्वर्य न्याय और शक्ति  के शिखर पर पहुचा सकता है।वो जानते थे की अन्य धर्मों में जाने के बावजूद बहुजनों का भला नहीं हो पायेगा ये तो केवल स्वामी बदलना होगा, गुलामी तो जस की तस रहेगी|बहुजनों का भला तो केवल बौद्धिक विकास से ही संभव है और यही बौद्ध धम्म का मुख्य लक्ष्य होता है| बौद्ध धम्म ने ये काम बहुत पहले भी किया था,बौद्ध धम्म  ने सारी वर्णव्यवस्था ध्वस्त कर दी थी। बुद्ध ने संघ मे सबको समान स्थान दिया, बुद्ध की ही क्रांति का नतीजा था की उनके मृत्यु के 100 साल के अंदर ही मूल भारतवासी बहुजन राजा बनने लगे थे , नन्द वंश पहले बहुजन राजाओं का वंश था। मौर्य वंश भी बहुजन राजाओं का वंश था जिनके राज में अखंड भारत ने अपना सबसे स्वर्णिम समय देखा है। इसी समय के भारत को ही लोग ‘सोने की चिड़िया’ या विश्व गुरु नाम से संबोधित करते हैं|ये बहुजनों की आज़ादी का काल था जब भारत के शाषन की बागडोर भारतवासियों के हाथों में थी| बाबा साहब को शायद अंदाज़ा  था की उनकी अनुपस्थिति मे बौद्ध धम्म ही उनका स्थान पूरा कर सकता है, और कोई नहीं। उनका सारा संघर्ष बौद्ध मार्ग से प्रेरित था।परिणाम हम आज देख रहे हैं धम्म अपनाने की कुछ ही सालों में बहुजन न केवल अपनी दुर्दशा सुधार पा रहे हैं बल्कि शाषक बनने योग्य होते जा रहे हैं|बौद्ध मूल्यों पर आधारित भारत का संविधान रचकर बाबा साहब ने भारतियों को न्याय और समानता का कानूनी अधिकार दिलाया|जरा सोच कर देखिये की अगर कट्टर धार्मिक भावना रखने वालों में से किसी ने संविधान बनाया होता तो आज भारत एकजुट रह पाता? क्या न्याय मिल पाता?…

क्रमश जरी …

डा0 अम्बेडकर दूरदृष्टा थे,सभी धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन पश्चात वे बौद्ध धर्म की ओर उन्मुख हुए। …आकांशा यादव

AMBEDKAR best photoडा0 अम्बेडकर दूरदृष्टा और विचारों से क्रांतिकारी थे तथा सभी धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन पश्चात वे बौद्ध धर्म की ओर उन्मुख हुए। एक ऐसा धर्म जो मानव को मानव के रूप में देखता था, किसी जाति के खाँचे में नहीं। एक ऐसा धर्म जो धम्म अर्थात नैतिक आधारों पर अवलम्बित था न कि किन्हीं पौराणिक मान्यताओं और अंधविश्वास पर। अम्बेडकर बौद्ध धर्म के ‘आत्मदीपोभव’ से काफी प्रभावित थे और दलितों व अछूतों की प्रगति के लिये इसे जरूरी समझते थे।
1935 में नासिक जिले के भेवले में आयोजित महार सम्मेलन में ही अम्बेडकर ने घोषणा कर दी थी कि- ‘‘आप लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि मैं धर्म परिवर्तन करने जा रहा हूँ। मैं हिन्दू धर्म में पैदा हुआ, क्योंकि यह मेरे वश में नहीं था लेकिन मैं हिन्दू धर्म में मरना नहीं चाहता। इस धर्म से खराब दुनिया में कोई धर्म नहीं है इसलिए इसे त्याग दो। सभी धर्मों में लोग अच्छी तरह रहते हैं पर इस धर्म में अछूत समाज से बाहर हैं। स्वतंत्रता और समानता प्राप्त करने का एक रास्ता है धर्म परिवर्तन। यह सम्मेलन पूरे देश को बतायेगा कि महार जाति के लोग धर्म परिवर्तन के लिये तैयार हैं। महार को चाहिए कि हिन्दू त्यौहारों को मनाना बन्द करें, देवी देवताओं की पूजा बन्द करें, मंदिर में भी न जायें और जहाँ सम्मान न हो उस धर्म को सदा के लिए छोड़ दें।’’

अम्बेडकर की इस घोषणा पश्चात ईसाई मिशनरियों ने उन्हें अपनी ओर खींचने की भरपूर कोशिश की और इस्लाम अपनाने के लिये भी उनके पास प्रस्ताव आये। कहा जाता है कि हैदराबाद के निजाम ने तो इस्लाम धर्म अपनाने के लिये उन्हें ब्लैंक चेक तक भेजा था पर अम्बेडकर ने उसे वापस कर दिया।

वस्तुतः अम्बेडकर एक ऐसा धर्म चाहते थे, जिसकी जड़ें भारत में हों। अन्ततः 24 मई 1956 को बुद्ध की 2500 वीं जयन्ती पर अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म में दीक्षा लेने की घोषणा कर दी और अक्टूबर 1956 में दशहरा के दिन नागपुर में हजारों शिष्यों के साथ उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया। उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने के पीछे भगवान बुद्ध के एक उपदेश का हवाला भी दिया- ‘‘हे भिक्षुओं! आप लोग कई देशों और जातियों से आये हुए हैं। आपके देश-प्रदेश में अनेक नदियाँ बहती हैं और उनका पृथक अस्तित्व दिखाई देता है। जब ये सागर में मिलती हैं, तब अपने पृथक अस्तित्व को खो बैठती हैं और समुद्र में समा जाती हैं। बौद्ध संघ भी समुद्र की ही भांति है। इस संघ में सभी एक हैं और सभी बराबर हैं। समुद्र में गंगा या यमुना के मिल जाने पर उसके पानी को अलग पहचानना कठिन है। इसी प्रकार आप लोगों के बौद्ध संघ में आने पर सभी एक हैं, सभी समान हैं।’’

बौद्ध धर्म ग्रहण करने के कुछ ही दिनों पश्चात 6 दिसम्बर 1956 को डा0 अम्बेडकर ने नश्वर शरीर को त्याग दिया पर ‘आत्मदीपोभव’ की तर्ज पर समाज के शोषित, दलित व अछूतों के लिये विचारों की एक पुंज छोड़ गए। उनके निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं0 जवाहरलाल नेहरू ने लोकसभा में श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा था कि- ‘‘डा0 अम्बेडकर हमारे संविधान निर्माताओं में से एक थे। इस बात में कोई संदेह नहीं कि संविधान को बनाने में उन्होंने जितना कष्ट उठाया और ध्यान दिया उतना किसी अन्य ने नहीं दिया। वे हिन्दू समाज के सभी दमनात्मक संकेतों के विरूद्ध विद्रोह के प्रतीक थे। बहुत मामलों में उनके जबरदस्त दबाव बनाने तथा मजबूत विरोध खड़ा करने से हम मजबूरन उन चीजों के प्रति जागरूक और सावधान हो जाते थे तथा सदियों से दमित वर्ग की उन्नति के लिये तैयार हो जाते थे।’’

साभार: आकांशा यादव @ शब्द शिखर  http://shabdshikhar.blogspot.com/2010/04/0.html

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Digital Library Of India पर बुद्ध और बौद्ध धम्म से सम्बंधित पुस्तकें फ्री में उपलब्ध हैं …SBMT_Delhi

Digital Library Of India पर बुद्ध और बौद्ध धम्म से सम्बंधित पुस्तकें

ये पुस्तकें गौतम बुद्ध तथा बौद्ध धम्म (धर्मं) से सम्बंधित है . ये बहुत ही महत्वपूर्ण और इनमे से कई दुर्लभ हैं . ये पुस्तकें Digital Library of India पर संग्रहित हैं. ये सभी पुस्तकें स्कैन की हुई डिजिटल रूप में सुरक्षित की हुई हैं.
   Digital Library of India  एक एसा प्रोजेक्ट है जिसमें कई राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों द्वारा सम्मलित रूप से कई दुर्लभ एवं महत्वपूर्ण पुस्तकों को स्कैन कर डिजिटल रूप में सुरक्षित रखा गया है.   इनमें से ही एक है : http://www.new.dli.ernet.in/. ये सभी सेण्टर आपस में जुड़े हुए हैं तथा किसी भी एक सेंटर से संपूर्ण  Digital Library of India पर संग्रहित पुस्तकों को ढूंढा जा सकता है .
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Buddha – vachan., 99999990233624. Bikshu, Aanand kaushalyayan. 1954. hindi. Vachan sangrah. 99 pgs.
Buddha – vani., 99999990233626. Viyogi hari. 1935. hindi. NULL. 163 pgs.
Buddha Aur Naachghar., 5990010124474. Bachchan. . hindi. Literature. 186 pgs.
Buddha charitawali., 1990010087251. Ram Chandra Lal. 1953. hindi. Buddha-Biography. 129 pgs.
Buddha charrya., 99999990243331. Aacharya, Tripitak. 1931. hindi. Jivani – Bhagvan Buddha. 654 pgs.
Buddha chitrawali., 1990010087252. Vidya. 1956. hindi. Buddha-Biography. 63 pgs.
Buddha dharm ke upadesh., 1990010087253. Dharmarakshit. . hindi. Buddha religion. 149 pgs.
Buddha-charit., 5990010044621. . 1979. hindi. Literature. 298 pgs.
Buddham Sharanam., 5990010114124. Chandra Dev Singh. 1956. hindi. LANGUAGE. LINGUISTICS. LITERATURE. 130 pgs.
Gautam buddha., 5990010044879. Aanand prasad kapoor. 0. hindi. LANGUAGE. LINGUISTICS. LITERATURE. 140 pgs.
Mahamanav Buddha., 5990010116281. Rahul Sankratyayan. . hindi. LANGUAGE. LINGUISTICS. LITERATURE. 185 pgs.
Mahatma Buddha., 5990010115444. Sukhsampati Roy Bhandari. 1920. hindi. LANGUAGE. LINGUISTICS. LITERATURE. 155 pgs.
papancasudani majjhimanikayatthakatha of buddhaghosacariya., 5990010124569. J.H. WOODS AND D. KOSAMBI. 1922. hindi. LITRATURE. 334 pgs.
Sankshipta Buddha jeevani., 1990010087671. Amritanand Sthavir. 2013. hindi. Buddha biography. 151 pgs.
Siddharth Buddha., 5990010043250. Banaarasidaas ‘Karunaakar’. 1955. hindi. LITERATURE. 156 pgs.
Sri Buddha Geeta., 5990010116350. Swami satyadev ji paribrajak. . hindi. LANGUAGE. LINGUISTICS. LITERATURE. 126 pgs.

सारनाथ धम्म्चकक महोत्सव-2013 … S.R. Darapuri

सारनाथ धम्म्चकक महोत्सव-2013
darapuri
भारत के बौद्ध धम्म के इतिहास में पहली बार दिनांक 21, 22 व् 23 जुलाई को मूलगंध कुटी विहार, सारनाथ वाराणसी में धम्मचक्क महोत्सव का आयोजन किया गया. इस में देश के विभिन्न बौद्ध विहारों के भिक्षुओं, बौद्ध उपासकों और उपासिकाओं ने भरी संख्या में भाग लिया. सम्मलेन के प्रथम दिन धम्मेक स्तूप पर पूजा पाठ किया गया और धम्म्देसना -धम्म की अपरिहारियता अर्थात धम्म विहीन जीवन की निरर्थकता पर प्रवचन किया गया.

आषाढ़ पूर्णिमा (22, जुलाई )का दिन बौद्ध धम्म के इतिहास में एक एतिहासिक दिवस है जो धम्म चक्र परिवर्तन दिवस के रूप मेंमनाया जाता है क्योंकि आज से 2600 वर्ष पहले इसी दिन भगवान बुद्ध ने इसी स्थान पर जो “इसीपत्तन” के नाम से जाना जाता है, पांच शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया था. इसी एतिहासिक दिवस के उपलक्ष्य में महाबोधि मंदिर के प्रांगन में धम्मचक्क महोत्सव के आयोजन के अंतर्गत 200 से अधिक श्रामनेरों को प्रव्रजित किया गया और इस सम्मलेन में पहली बार भारतीय भिक्खुओं के लिए चीवर का रंग निर्धारित किया गया जिस से भारतीय बौद्ध भिक्षुओं को एक अलग पहचान मिली है. इसी दिन अपरान्ह में “बुद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार में हमारी भूमिका” विषयक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया जिस में देश तथा विदेश के बौद्ध उपासकों और बौद्ध धम्म के विद्वानों ने भाग लिया. इस में वर्तमान में बौद्ध धम्म के प्रचार प्रसार की स्थिति, समस्याएं और भविष्य की कार्यनीति पर विस्तृत चर्चा की गयी. इस विचार गोष्ठी में डॉ. आंबेडकर द्वारा 21वीं सदी में धम्म चक्क प्रवर्तन , उन द्वारा भारत में बौद्ध धम्म के प्रचार प्रसार के लिए तैयार की गयी रूपरेखा पर प्रकाश डाला गया. अब आशा की जाति कि इस सम्मलेन से भारत में बौद्ध धम्म के प्रचार प्रसार को एक नई दिशा मिलेगी. इस अवसर पर एक अति सुन्दर ” धम्म्चकक महोत्सव-2013 समारिका” का वमोचन भी किया गया.

महोत्सव के तीसरे दिन बुद्ध्मय भारत के निर्माण का संकल्प लिया गया और उत्तर प्रदेश में बौद्ध धम्म की सेवा में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले वरिष्ठ उपासक एवं उपासिकाओं को सम्मानित किया गया तथा उनका उद्भोधन भी हुआ.

इसी महोत्सव में प्रवर्जित हुए श्राम्नेरों का 21 जुलाई से 27 जुलाई तक श्रामनेर शिविर भी चलेगा
.
इस पूरे महोत्सव का आयोजन भारतीय बौद्ध भिक्खुओं, उपासक और उपासिकाओं द्वारा किया गया. इस में महाबोधि सोसाइटी आफ इंडिया सारनाथ केंद्र के प्रभारी भिक्षु पी. शिवली का बहुत महतवपूर्ण योगदान और दिशा निर्देशन रहा. इस के साथ ही विभिन्न बौद्ध विहारों के भिक्खुओं ने इसे सफल बनाने के लिए बहुत परिश्रम किया. विभिन्न बौद्ध संस्थाओं, उपासक और उपासिकाओं ने भी तन, मन, धन से सहयोग देकर इस एतिहासिक महोत्सव को सफल बनाया. वे सभी बहुत बहुत साधुवाद के पात्र हैं.

इस महोत्सव का यह एतिहासिक महत्व है कि यह आषाढ़ पूर्णिमा के दिन आयोजित किया गया जिस दिन हिन्दू लोग गुरु पूर्णिमा मानते हैं.

ऐसा प्रतीत होता है कि शायद हिदुओं का गुरु पूर्णिमा दिवसं धम्म चक्क परिवर्तन दिवस से ही लिया गया है क्योंकि इस दिन ही बुद्ध ने अपने पंच वग्गीय भिक्षुओं को प्रथम उपदेश दिया था और यह उन शिष्यों की अपने शास्ता के प्रति कृतिग्यता प्रकट करने का दिवस है. बहरहाल सारनाथ में धम्मचक्क परिवर्तन दिवस और महोत्सव का मनाया जाना यह दर्शाता है कि भारत में अब बौद्ध धम्म का पौदा जड़ पकड़ चुका है जिसे बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने 14,अक्तूबर, 1956 को रोपित किया था. अब उम्मीद की जा सकती है कि भारत जल्दी ही बौध्मय हो जायेगा जो कि बाबा साहेब का सपना था.

darapuri pichttp://www.facebook.com/srdarapuri

S.R. Darapuri

BBC द्वारा बनाया गया ये विडियो भगवान् बुद्धा के जीवन पर बहुत अच्छी डोकुमेंट्री है …SBMT(Delhi)

इस  डोकुमेंट्री का हिंदी रूपांतरण और उसका असल अंग्रेजी लिंक यहाँ दिया जा रहा है :

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Origional English Documentry is available on following link

http://www.youtube.com/watch?v=YsEksMEE2Eg