राजनीति अल्पकालीन धर्म है और धर्म दीर्घकालीन राजनीति


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यदि आपके जीवन में कोई दुख है तो इसमें ईश्वर की मर्जी नहीं है और ईश्वर आपको सुख देने वाला भी नहीं है। लोग यदि दानवी सोच रखते हैं, दानवी कर्म करते हैं तो वे कैसे सुखी रह सकते हैं और उनके आसपास दानवी आत्माएं ही विचरण करेंगी। कुछ लोग मिश्रित सोच के धनी हैं तो फिर उनका जीवन भी वैसा ही चलता रहता है।

तभी तो कृष्ण कहते हैं अर्जुन से कि यदि कोई अच्छे कर्म करता है तो देवता उसके साथ हैं और बुरे कर्म करता है तो दानव। …लेकिन यहां अधिकतर मानव अच्छे भी हैं और ‍बुरे भी, इसका यह मतलब है कि उनके साथ कोई नहीं है और वे अकेले हैं तभी तो उनकी प्रार्थनाएं असफल सिद्ध होती हैं।

ईश्वर पर अंधभक्ति की बातें पश्चिम के धर्मों से निकलीं। पूर्व के सभी धर्म कर्म के सिद्धांत को मानते हैं, लेकिन अब भारत में ये दोनों ही विश्वास एकसाथ अपना वजूद बना चुके हैं। पश्चिमी धर्म का ईश्वर लोगों को डराने वाला और उनको दंड देने वाला है जबकि पूर्व के धर्मग्रंथों के अनुसार ईश्वर दंडनायक नहीं है।

यहूदी धर्म और उससे निकले धर्मों ने जनमानस में यह विश्वास प्रचारित किया कि ईश्वर की मर्जी ही चलती है, क्योंकि ईश्वर हमारा और इस जगत का निर्माता है। यदि आप ईश्वर की निंदा करोगे तो ईश्वर आपको दंडित करेगा। आखिरी दिन आपका फैसला होगा। एकेश्वरवाद को ईश्वर के डर के आधार पर खड़ा किया गया इसलिए उन धर्मों में ‘ईश्वर’ ही कर्ता-धर्ता है प्रकृति या मनुष्य नहीं, देवी या देवता नहीं। सभी ईश्वर के अधीन हैं। लेकिन यह तार्किक रूप से सही है क्या?

गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि व्यक्ति के कर्म और उसके विचार ही उसके भाग्य और भविष्य का निर्माण करते हैं। जिन लोगों के कर्म और विचार दृढ़ नहीं हैं वे सभी प्रकृति के अधीन रहकर अपना जीवन-यापन करते हैं उनके जीवन में सुख-दुख की घटनाएं चलती रहती हैं। …सुख-दुख के लिए ईश्वर जिम्मेदार नहीं है।

कृष्ण पूर्णत: कर्म और विचार को ही सब कुछ मानते हैं, ऐसा नहीं है। एक प्रसंग में वे अर्जुन से कहते हैं कि ईहलोक में विचरण कर रहीं देव-दानवी आत्माएं भी व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करती हैं और कई तरह की प्राकृतिक घटनाएं भी अर्थात व्यक्ति खुद से और दूसरी गतिविधियों से संचालित होता रहता है। ब्रह्मांड के इस संपूर्ण खेल को समझने के लिए वेद, उपनिषद और गीता का अध्ययन किया जाना चाहिए।

अंतत: कोई भी सिद्धांत, मान्यता और विश्वास को मानने से पहले उसकी जांच-परख कर लेना चाहिए कि वह तार्किक और वैज्ञानिक रूप से सही है या धर्म हमें बेवकूफ बना रहा है। जैसे ज्यादातर ज्योतिष और धर्म की धारणाएं विज्ञानसम्मत नहीं हैं और जिससे हम बेवकूफ ही बनते हैं।

अंत में ‘धर्मों पर पुनर्विचार’ करने का दुस्साहस कौन कर सकता है? जब तक ईश्वर है तब तक धर्म रहेंगे और जब तक धर्म है लोकतंत्र और विज्ञान का कोई महत्व नहीं।

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डॉ॰ राममनोहर लोहिया ने कहा था ‘राजनीति अल्पकालीन धर्म है और धर्म दीर्घकालीन राजनीति’।डॉ॰ लोहिया को भारतीय समाज की गहरी समझ थी।उन्होँने समाज की दबी कुचली शोषित पीड़ित जनता को राजनीति रुपी युग धर्म को अपनाने की सलाह दी थी।उन्होँने इस बात को समझ लिया था कि हाशिये की जनता का राजनीतिकरण किए बिना किसी भी समस्या का समाधान ढूँढ़ना मुश्किल ही नहीँ नामुमकिन है।पर आज हाशिये पर पड़ी जनता राजनीति से दुर भाग रही है और राजनीति मेँ आगे आ रहे हैँ पुँजिपती के बेटे,ठेकेदार के बेटे,गुण्डोँ के बेटे,तश्कर और माफियाओँ के बेटे तो भला भी उन्हीँ का हो रहा है!जो मैदान मेँ उतरेगा जित तो उसी की होगी ना! बाहर मेँ तालियाँ बजाने वाले तालियाँ ही बजाते रहेँगे!

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