बौध धम्म कोई धर्म नहीं ये तो खुशहाल जीवन का मार्ग है,इसके लिए धर्म परिवर्तन नहीं चाहिए कोई भी लाभान्वित हो सकता है


Buddhism_Dharma_Chakra

 

महामानव गौतम बुद्ध ने धर्म को पहली बार वैग्यंकी प्रतिष्ठा दी,बुद्ध ने पहली दफे ही धर्म को विज्ञानं के सिंघासन पर विराजमान किया| इससे पहले तक धारक अन्धविश्वास था, बुद्धा ने उसे बड़ी गरिमा दी, उन्होंने कहा अन्धविश्वास की जरूरत ही नहीं है धर्म तो जीवन का परम सत्य है| एस धम्मो सनातानो – ये धर्म ही शाश्वत और सनातन है   जब तुम आँख खोलोगे तो इसे देख लोगे

धम्म आचरण का विषय है, इसको मानने के लिए भगवान को मानने की आवश्यकता नहीं, चाहो तो मानो, चाहो तो ना मानो, तुम्हारी मर्जी। गागर मे सागर भरना मुश्किल है फिर भी प्रयास करूंगा। आनंद सदैव मिलता रहे(राग), ऐसी उम्मीद ना करना। अहंकार असमानता की जननी है, ऐसा जानना, और इससे दूर रहना। सबसे मैत्री भाव रखना, चाहे वो तुम्हारा शत्रु ही क्यों ना हो, सचेत रह सकते हो। दुखी लोगों/जीवों के प्रति करुणा भाव (ऐसा भाव जिसमे दूसरे का दुख तुमसे देखा ना जाए, और यहाँ तक की आसू भी निकल आयें) उसके मजहब से कोई लेना-देना ना हो। मुदिताभाव (ऐसा भाव जिसमे दूसरे के सुख को देख कर आप भी हर्ष से आह्लादित हो उठे)। समताभाव (दुख/सुख/तारीफ/बुराई आदि स्थितियों मे संयत रहना)।संसार मे सब कुछ नित्य समझना दुख का कारण है, आसक्ति दुख का कारण है, लोभ, मोह , द्वेष दुख का कारण है, प्रेम त्यागपूर्ण होना चाहिए, तृष्णापूर्ण प्रेम दुखो का कारण है। व्याकुल होना, चिंतित होना, परेशान होना, उदास होना, तनावग्रस्त होना, भयभीत होना, रोना-पीटना, शोक करना, संताप करना, पश्चाताप करना, प्रिय के ना मिलने पर कष्ट, अप्रिय के मिलने पर कष्ट, इच्छा-अनुकूल ना मिलने पर कष्ट, जन्म से अविद्या और तृष्णा के कारण कष्ट, रोगी होना, बुढ़ापा, मृत्यु आदि को दुख का कारण मानना क्योंकि इनके साथ तृष्णा जुड़ी है। और इसका उपाय आष्टांगिक मार्ग को मानना। आष्टांगिक मार्ग मे सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि आते हैं। सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प को ‘प्रज्ञा’ कहा गया है, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम को ‘शील’ कहा गया है, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि को ‘समाधि’ कहा गया है। इस प्रकार प्रज्ञा, शील समाधि मे आष्टांगिक मार्ग शामिल हो जाता है।———-

सम्यक दृष्टि मे आता है, चार आर्य सत्यों को मानना, जीव हिंसा नहीं करना(हिंसा और मांसाहार मे अंतर है), चोरी नहीं करना, व्यभिचार( पर-स्त्रीगमन) नहीं करना, ये शारीरिक सदाचरण हैं। झूठ नहीं बोलना, चुगली नहीं करना, कठोर वचन नहीं बोलना, बकवास नहीं करना, ये वाणी के सदाचरण हैं। लालच नहीं करना, द्वेष नहीं करना, सम्यक दृष्टि रखना ये मन के सदाचरण है। धम्म आचरण का विषय है, आचरण करोगे तभी फल मिलेगा, और तुरंत फल मिलेगा और इसके लिए ईश्वर मानने या ना मानने के लिए आप स्वतंत्र है, कोई पाबंदी नहीं है, आँख, कान,नाक, मुख, त्वचा(पाँच इंद्रियाँ) के आनंद से बड़ा सुख है मन(छठी इंद्री) का सुख ये जानना और निर्वाण (सास्वत खुशी, परमानंद एवं विश्राम की स्थिति) को परम सुख जानना, धम्म के लिए परा-प्राकृतिक बातों की कोई आवश्यकता नहीं है, ऐसा जानना, दुनिया मे सब कुछ प्रतित्य-समुत्पाद (कार्य-कारण का सिद्धान्त) से हो रहा है, ये जानना।———-

सम्यक संकल्प मे आता है, चित्त से राग-द्वेष नहीं करना, ये जानना की राग-द्वेष रहित मन ही एकाग्र हो सकता है, करुणा, मैत्री, मुदिता, समता रखना, दुराचरण(सदाचरण के विपरीत कार्य) ना करने का संकल्प लेना, सदाचरण करने का संकल्प लेना, धम्म पर चलने का संकल्प लेना।———-

सम्यक वाणी मे आता है, सत्य बोलने का अभ्यास करना, मधुर बोलने का अभ्यास करना, टूटे हुओ को मिलने का अभ्यास करना, धम्म चर्चा करने का अभ्यास करना।———-

सम्यक आजीविका मे आता है, मेहनत से आजीविका अर्जन करना, पाँच प्रकार के व्यापार नहीं करना, जिनमे आते हैं, शस्त्रों का व्यापार, जानवरों का व्यापार, मांस का व्यापार, मद्य का व्यापार, विष का व्यापार, इनके व्यापार से आप दूसरों की हानि का कारण बनते हो।———-

सम्यक कर्मांत मे आता है, प्राणियों के जीवन की रक्षा का अभ्यास करना, चोरी ना करना, पर-स्त्रीगमन नहीं करना। बुद्ध ने सत्य और न्याय के लिए हिंसा को, यदि आवश्यक हो तो जायज ठहराया।———-

सम्यक व्यायाम मे आता है, आष्टांगिक मार्ग का पालन करने का अभ्यास करना, शुभ विचार पैदा करने वाली चीजो/बातों को मन मे रखना, पापमय विचारो के दुष्परिणाम को सोचना, उन वितर्कों को मन मे जगह ना देना, उन वितर्कों को संस्कार स्वरूप मानना, गलत वितर्क मन मे आए तो निग्रह करना, दबाना, संताप करना।———-

सम्यक स्मृति मे आता है, कायानुपस्सना, वेदनानुपस्सना, चित्तानुपस्सना, धम्मानुपस्सना, ये सब मिलकर विपस्सना साधना कहलाता है, जिसका अर्थ है, स्वयं को ठीक प्रकार से देखना। ये जानना की राग-द्वेष रहित मन ही एकाग्र हो सकता है। किसी भी मनुष्य को, जिसे स्वयं को जानने की इच्छा हो, को विपस्सना जरूर करनी चाहिए, इसी से दुख-निवारण के पथ की शुरुआत होगी। ———-

सम्यक समाधि मे आता है, अनुत्पन्न पाप धर्मो को ना उत्पन्न होने देना, उत्पन्न पाप धर्मो के विनाश मे रुचि लेना, अनुत्पन्न कुशल धर्मो के उत्पत्ति मे रुचि, उत्पन्न कुशल धर्मो के वृद्धि मे रुचि। इन सबको शब्दशः पालन करने से जीवन सुखमय होगा, निर्वाण (सास्वत खुशी, परमानंद एवं विश्राम की स्थिति) की प्राप्ति होगी।

निर्वाण का सुख स्वर्ग का सुख प्राप्त करने से भी बड़ा है और ये सबको प्राप्त हो सकता है, इसके लिए गृह-त्याग की आवश्यकता नहीं है।बस माध्यम मार्ग के पालन की आवश्यकता है। बहुत लोगों को गलतफहमी है की बुद्ध का धम्म भिक्षुओं का धम्म है। पर ऐसा नहीं है, बुद्ध का धम्म भिक्षुओं, भिक्षुणियों, उपासक और उपासिकाओ से पूर्ण होता है।

source : http://www.facebook.com/notes/rajkamal-bauddh/%E0%A4%A7%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE/4852277833341

बौध धम्म कोई धर्म नहीं ये तो खुशहाल जीवन का मार्ग है,इसके लिए धर्म परिवर्तन नहीं चाहिए कोई भी लाभान्वित हो सकता है

One thought on “बौध धम्म कोई धर्म नहीं ये तो खुशहाल जीवन का मार्ग है,इसके लिए धर्म परिवर्तन नहीं चाहिए कोई भी लाभान्वित हो सकता है

  1. बाहर विदेशों मे बौद्धों के साथ क्या हुआ, ये वहाँ उनकी समस्या है, और बौद्ध देशों के लोग इस चुनौती का अच्छे से सामना कर रहे हैं, पर भारत मे हमारी समस्या हिन्दू (चोर, डकैत, गुलाम) है, हमे सबसे पहले पुष्यमित्र शुंग का हिसाब चुकाना है, फिर शंकराचार्य का हिसाब चुकाना है, शशांक का भी हिसाब चुकाना है, सुधन्वा का भी हिसाब चुकाना है, हर उस ब्राह्मण का हिसाब चुकाना है, जिसने बौद्ध भिक्षुओं पर हमले किए, हत्याएँ की, आग मे जलाया, उन्हे विदेश भागने पर मजबूर किया, बौद्धों को जबरन हिन्दू बनने पर मजबूर किया, जो नहीं बना उसकी या तो हत्या की गयी, या उसे अछूत घोषित किया गया, जिस बौद्ध ने हार मान ली उसे हिन्दू धर्म मे शूद्र का दर्जा दिया, बौद्ध मंदिरों का हिंदुकरण किया, बौद्ध मंदिर तोड़े, उनके ऊपर अपने मंदिर बनाए, बौद्धों की सारी पहचान भारत से मिटाई, बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित किया। हमे तुम्हारी सारी धूर्तता अच्छे से याद है, चिंता मत करो, तुम ब्राह्मण धर्म के अनुयाई इतने भोले नहीं हो जितने बनाने की कोशिश करतेहो!!!!!!!!!!!!!! मुसलमानो से ज्यादा तुम खतरनाक हो बौद्ध धर्म के लिए, जो भारत कभी 90% बौद्धदेश था, कोई जाती-पाति नहीं थी, आज हजारो जतियों मे बटा है, हिन्दू के बराबर मुसलमान हैं, यदि पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश को भी मिला लिया जाए, क्यों की ये भी भारत के हिस्से थे। वो बौद्ध शासक ही था जिसके डर से सिकंदर भारत मे आगे नहीं बढ़ पाया, पर तुम लोग इतिहास का ये सारा सच छुपातेहो, चिंता मत करो तुम इतने भोले नहीं हो!!!!!!!!!!!!!

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