संसार में सभी कुछ है और हमें वही मिलता है जिसे हम चुनते हैं…समयबुद्धा


hum khud jimmedar

“बहुजनों के प्रतिभावान व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या ये है कि उसकी खुद कि कौम के अनपढ़ लोग उसको समझ नहीं पाते और जो शिक्षित हैं वो अपने को अधिक ज्ञानी मानकर उसको समझना नहीं चाहते|परिणाम अमृत पास होते हुए भी प्यासे रहते हैं| दुसरे तरफ बहुजन विरोधी शोषक समझ जाते हैं और उसे अपनी सत्ता के लिए खतरा समझ कर दमन करते हैं|इतना ही नहीं अगर बहुजन प्रतिभा मनुवदिओ के अनुकूल हो तो वे उसे इस्तेमाल करते हैं और जो लाभ होता है उसका श्रेय खुद ले लेते हैं|”

आज मैंने अपनी सोसाइटी के गार्डों और उनके जीवनचर्या पर गौर किया|गार्ड  की नौकरी एक ऐसी नौकरी है जिसमें बस खली बैठे रहना है, मतलब ये है की अगर ये लोग चाहें तो किताब पढ़ सकते हैं|ये मेरा अंदाज़ा है की इन गार्डों में से 80%  बहुजन ही होंगे|अधिकतर गार्ड अपने मोबाइल में गाने सुनकर फालतू की बातें और हरकतें करके अपना समय बर्बाद कर रहे हैं| इन सभी गार्डों में से एक ऐसा चुटिया वाला गार्ड लड़का भी था जिसे मैं अक्सर किताब पढ़ते देखता था| बातचीत की तो पता चला की उसने अपनी ड्यूटी जानकार बेसमेंट में लगवाई थी  ताकि वो शांति में पढ़ सके|आप आप समझ सकते हो की बाकि के गार्ड लड़के और इस लड़के का भविष्य क्या होगा, आज से १० साल बाद कौन कहाँ खड़ा होगा|यहाँ दिल्ली में बिहार से बहुजनों की तरह  दुबे, झा और चतुर्वेदी नामक लोग आते हैं छोटी मोटी नौकरी या हेल्परी से शुरू करते हैं, दस साल तब कटते हैं जब वो मकान परिवार और अपनी बस्ती में नाम सब बना लेते हैं, पर बहुजन वहीँ का वहीँ मिलता है| येकिनन कुछ जातिगत लाभ मिलता होगा इन ब्राह्मणों को पर अगर दिल्ली जैसे शहर के बेहतरीन माहौल में भी दलित दलित ही रह जाता है तो इसका सबसे ज्यादा जिम्मेदार वो खुद है|ये चुनाव की बात है सोच की बात है, संसार में सभी कुछ है और हमें वही मिलता है जिसे हम चुनते हैं|केवल शिकायत मत करते रह जाओ कुछ संगर्ष भी करो,बाबा साहब के संविधान के राज में भी अगर क्षमता न बढ़ा पाई तो कब बढाओगे? …

“प्राय देखा गया है की अन्य धर्मों के उपासना स्थल छोटे से कमरे से शुरू होकर जनता को आकर्षित करने लायक विशाल भवन बन जाते हैं| कुछ बौद्ध विहारों को छोड़कर धन के बिना सभी विहारों में नीरसता फैली रहती है, अपने समाज का व्यक्ति भी वहां झाँकने नहीं जाता|उसके अन्दर रहने वाले बौद्ध भंते भूख मिटने के लिए भीक मांगने पर मजबूर है जो की कमजोरी का प्रतीक है,और कमजोर का इस संसार में कोई नहीं | हमें बौद्ध धम्म के कुछ नियम बदलने होंगे वर्ना इतिहास फिर हमें हार का मुह दिखा देगा| धम्म को राजाश्रित न रखकर जन आश्रित बनाना होगा, इसे जनता प्रिये बनाना होगा वर्ना तेज़ी से बढ़ने वाला दूसरा धर्म इसे एक दिन निगल जायेगा|विहारों में केवल भ्रस्टाचार के डर से धनसंचय की खिलाफत करने वाले रूडिवादी बौद्ध लीडर भूतकाल में इतने खोये हैं की कौम की सुरक्षा,वर्गसंगर्ष का खतरा और भविष्य नहीं देख पा रहे|ध्यान रहे धन से धर्म चलता है,धर्म से संगठन और संगठन से सुरक्षा होती है\”….

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