22-July-2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा की विशेष धम्म देशना :-“युवा पीढ़ी का भ्रम- केवल आंबेडकर तक ही सीमित रहो बुद्ध और उनके धम्म तक जाने की जरूरत नहीं|”…समयबुद्धा


buddhist flag

ऊपर तस्वीर में : डॉ आंबेडकर स्टूडेंट फ्रंट ऑफ़ इंडिया DASFI  ने बौध धम्म का विशाल द्वाज बना कर बुद्धा पूर्णिमा का त्यौहार बनाया, DASFIजिंदाबाद.

कुछ बहुजन युवाओं की विचारधारा ऐसी बन गई है की  उनको लगता है की बौध धम्म हमें मानसिक रूप से कमजोर बनता है इसलिए वो भगवान् बुद्धा और उनके धम्म को नज़रंदाज़ कर रहे हैं और केवल अम्बेडकर तक ही सीमित रहना चाहते हैं| बाबा साहब ने धम्म इसलिए चुन था ताकि उनकी अनुपस्थिथि में उनका काम धम्म करता रहेगा उनके जाने के बाद ये सिलसिला नहीं रुकेगा|

हमारे युवा पीढ़ी की भी क्या गलती उसे तो जो मीडिया ने बता दिया वही मान लिए वो तो ते मान कर बैठे हैं की शील ,करुणा, मैत्री ,भिक्षा और अहिंसा आदि धनं की शिक्षा है|बौद्ध धम्म का मकसद बहुजन हिताए बहुजन सुखाय है बहुजन का दुःख दूर करना है|पता नहीं ये लोग क्यों दिमाग नहीं लगा रहे क्यों नहीं समझ रहे की विरोधी धम्म के कमजोर पक्ष को उजागर कर रहे हैं और शक्तिशाली पक्ष को दबा रहे हैं|

आप खुद सोचो की क्या सिर्फ शील ,करुणा, मैत्री ,भिक्षा और अहिंसा से दुःख दूर किया जा सकता है अरे हमारे लोग तो पहले ही पिछड़े हैं कमजोर हैं और कमजोर तो पहले ही शील ,करुणा, मैत्री और अहिंसा के मार्ग पर चल रहा है वो चाहकर भी इनके विरुद्ध नहीं जा सकता|मैं अपने सभी युवाओं से जोर देकर ये बात साफ़ कर देना चाहता हूँ भगवान् बुद्ध एक क्रन्तिकारी हैं वो विश्व के पहले क्रन्तिकारी हैं जिन्होंने दुख का मूल कारन गलत सरकारी नीतियाँ, धार्मिक आडम्बर और आर्थिक विषमता (unequal distribution of national income) के खिलाफ न केवल आवाज़ उठाई बल्कि बड़े ही सुनियोजित तरीके से दर्शन ज्ञान और मार्ग खोज जिसके प्रचार प्रसार के लिए बौद्ध भिक्खुओं की फ़ौज खड़ी की| धम्म पूंजीपतियों और शोषकों के के खिलाफ क्रांति है|

सदा ध्यान रहे मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक विषमता (unequal distribution of national income) के खिलाफ जुझने वालों में पहला नाम गौतम बुद्ध का है|यह भारी दुःख का विषय है कि गौतम बुद्ध की छवि एक ऐसे व्यक्ति के रूप चित्रित की गयी है जिसने अहिंसा के धर्मोपदेश के साथ पंचशील का दर्शन दिया है,जबकि सचाई यह है कि वे दुनिया के पहले ऐसे क्रांतिकारी पुरुष थे जिन्होंने आर्थिक विषमता को इंसानियत की सबसे बड़ी समस्या चिन्हित करते हुए समतामूलक समाज निर्माण का युगांतरकारी अध्याय रचा|

मैं युवाओं की बात समझ सकता हूँ की भिक्षा धम्म की सबसे कमजोर कड़ी है | बौद्ध धम्म में भिक्षा वाली बात तो मैंने स्वेव ही छोड़ने की देशनी दी है इसकी जगह पूर्णिमा मासिक वेतन व्यस्था का सुझाव दिया है| साथियों आज भिक्षा की जरूरत नहीं पर जब गौतम बुद्धा ने अपनी क्रांति शुरू की थी तब इसकी जरूरत थी |आप समझ सकते हो की जिस देश में रहते हो उसके के शाशक एयर पूंजीपतियों की नीतियों के खिलाफ अगर आप क्रांति करोगे तो सारे शोषक और धनि लोग खिलाफ हो जायेंगे|धन के बिना कोई संस्था नहीं चल सकती ऐसे में भिक्षा का सहारा लेने का क्र्नातिकारी मार्ग बुद्ध ने सोचा, देखो कमाल बिना धन के भी क्रांति कर दी बुद्धा ने, कोई मिसाल है विश्ववा के इतिहास में इस बात की|क्या आप नहीं समझ सकते की इतना बड़े संघ की व्यस्था को चलने को धन चाहिए तह जिसके जवाब में बुद्ध ने भिक्षा का प्रावधान बनाया| वो समय गुज़र गया बुद्ध ने ये भी कहा है की “समय के प्रवाह में बने रहो” तो अब इसे त्यागने में क्या दिक्कत है|

भगवान् बुद्ध ने कहा है: “तुम किसी बात को इसलिए मत स्वीकार करो क्योंकि ये पहले कभी नहीं सुनी,इसलिए मत स्वीकार करो क्योंकि ये सदियों से चली आ रही हैं,किसी चीज को इस लिए मत मानो की ये हमारे बुजुर्गो ने कही हैं,किसी चीज को इस लिए मत मानो की ये किसी धर्मग्रन्थ के अनुकूल है| है, किसी चीज को इस लिए मत स्वीकार करो क्योंकि कहने वाले का व्यक्तित्व आकर्षक है|किसी चीज को इस लिए मत सीकर करो क्योंकि ये स्वेव मैंने कही है|किसी चीज को मानने से पहले यह सोचो की क्या ये सही हैं,किसी चीज को मानने से पहले ये सोचो की क्या इससे आप का विकास संभव है, किसी चीज को मानने से पहले उसको बुद्धि की कसोटी पर कसो और स्वानुभव से हितकर जानो तो ही मानो नहीं तो मत मानो”

बौद्ध धम्म में किसी भी बात को मानने के लिए कोई भी बाध्य नहीं हैं, आप आगे धम्म की तरफ बढ़ो और मेरा यकीन करो आपको इतना कुछ मिलेगा की आप भी मान जाओगे की बाबा साहब आंबेडकर का चुनाव कितना सही है|अरे इतिहास गवाह है की जैसे ही धम्म की तरफ बहुजन बढे एक ही सदी के अध्ययन के अंदर ही कही बहुजन राजा हुए और कही बहुजन साम्राज्य आये|

आंबेडकर और बुद्धा दोनों का एक ही मकसद है|

सदा ध्यान रखें-भारत के बहुजन लोग ६००० से भी ज्यादा जातियों में बिखरे हैं,और अपनी जाती को अपना झंडा मानकर अलग अलग शोषित होते रहते हैं, जब एक जाती पर आपत्ति आती है तो दूसरी चुप बैठती है|इसका एक ही समाधान है की सभी जाती तोड़ो और एक ही पहचान “बौद्ध” हो जाओ|क्योंकि ‘धर्म’ मानव संगठन का एक स्थाई झंडा है, बाकि के झंडे जैसे कोई राजा,कोई दार्शनिक,कोई पंचायत,कोई देवता,राजनेतिक पार्टी अदि समय गुजरने के साथ अपना महत्व खो देते हैं|लोहिया जी न सही कहा है “राजनीती अल्पकालीन धर्म है पर धर्म दीर्घकालिक राजनीती|”

साहब कांशीराम ने भी कहा है की ”जिसकी गेर राजनेतिक जड़ें कमजोर हों वो राजनीती में ज्यादा नहीं ठहर सकता|”धर्म वही फलता फूलता है जिसको राजनेतिक सरंक्षण मिला होता है| और राजनीती वही फलती फूलती है जिसे धर्म का सहारा हो| धर्म जनता की विचारधारा को एक सूत्र में पिरो देता है, धर्म को पकड़ो जनता अपने आप पकड़ में आती है|

बौद्ध धम्म के लिए जो गलतफहमियां हैं उनका कारन इस्मने की गई विरोधियों की मिलावट है| बौद्ध धम्म साहित्य बहुत ज्यादा विस्तृत है साथ ही उसमें मूल धम्म से विरोधाभासी बातें यदा कदा मिल जातीं हैं जो उपासक को पथभ्रष्ट कर देती हैं|हम समझ सकते हैं की दो से ढाई हज़ार सालों में ऐसा भी समय आया होगा जब कुछ विरोधीयों ने इसमें मिलावट कर दी हो| बाबा साहब ने मूल धम्म को संचित कर विश्व चर्चित ऐतिहासिक एव महानतम धम्म-ग्रन्थ “भगवन बुद्धा और उनका धम्म” को रचकर व्यस्त जनता के लिए बौद्ध धम्म को सही रूप में समझने का सटीक साहित्य उपलब्ध करवाया है|जब मैं अन्यत्र उपलब्ध धम्म साहित्य पड़ता हूँ तब मुझे खुद महसूस हुआ की एक ऐसे संचित एव स्थापित धम्म साहित्य की जरूरत थी|बाबा साहेब का मानव सभ्यता पर ये उपकार बहुत सराहनिय है उनको कोटि कोटि नमन| बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने कई सालों तक विभिन्न धर्मों का अध्ययन किया और बौद्ध धम्म को चुना| वे बखूबी जानते थे की बौद्ध धम्म से न केवल बहुजनों का उद्धार होगा अपितु समस्त मानवता का कल्याण होगा| वे मानते थे की वास्तविक बौद्ध धम्म का प्रचार-प्रसार करना ही मानवता की सच्ची सेवा है,उन्होंने कहा था की “अगर में शोषित समाज से न भी होता तो भी एक अच्छा इंसान होने के नाते मैं सर्व जीवा हितकारी बौद्ध धम्म ही चुनता|”

बौद्ध धम्म साहित्य में एक तरफ तो लिखा है फलां बात ऐसे है वहीँ कहीं दूसरी तरफ लिखा है फलां बात ऐसे नहीं ऐसे है|आज बौद्ध धम्म की तरफ अग्रसर लोगों की सबसे बड़ी परेशानी ये है की वो किसको सही माने किसको गलत,किसको अपनाएं किसको छोड़ें|बौद्ध धम्म के पतन के लिए न केवल दमन से बल्कि विरोधियों ने भिक्षु बन कर बौद्ध साहित्य में बहुत ज्यादा मिलावट कर दी थी| वही मिलावट का साहित्य आज मार्किट में उपलब्ध है जिसका सार यही बनता है जी जीवन नीरस है कुछ मत करो या ये बनता है की भगवान् बुद्धा एक इश्वरिये शक्ति थे उनकी पूजा करो और कृपा लाभ मिलेगा |असल में बौद्ध धम्म मनुवादी षडियन्त्र और अन्याय द्वारा व्याप्त दुःख को मिटने वाली क्रांति है ये इश्वरिये सिद्धांत को नकारता है|इस सबसे बचने का यही इलाज है की आप अन्यत्र किसी धम्म साहित्य ज्यादा ध्यान मत दो| युगपुरुष महाज्ञानी बहुजन मसीहा एव आधुनिक भारत के उत्क्रिस्ट शिल्पकार बाबा साहेब डॉ आंबेडकर की निम्न तीन पुस्तकों को शुरुआती ज्ञान से लेकर अंतिम रेफरेंस तक मनो :
१. भगवन बुद्धा और उनका धम्म
२. भगवन बुद्धा और कार्ल मार्क्स
३. प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति
ये बात स्वेव बाबा साहब की है वे खुद बौध धम्म को सही मायेने में समझाना चाहते थे न की आम धर्म की तरह| इन तीनो पुस्तकों से आगे जाना असल में अपने को धम्म विरोधी मिलावट में फ़साना होगा|इन तीन पुस्तकों की रचना डॉ आंबेडकर ने इसी भटकाव को रोकने के लिए किया है और ये बात उन्होंने खुद कही है|हमें आखिर कहीं किसी बिन्दु पर तो एक मत होना ही होगा वरना विरोधी अपनी चाल चल जायेंगे और हम सही गलत की बहस ही करते रह जायेंगे,अब फैसला आपके हाथ में है|याद रहे बौद्धमय भारत ही बाबासाहब का सपना है ”

समयबुद्धा

Also read:

https://samaybuddha.wordpress.com/2013/08/18/buddhism-is-the-only-one-universal-falg-of-indian-bahujans/

https://samaybuddha.wordpress.com/2013/08/12/buddha-was-fisrt-person-on-earth-who-started-revolution-against-financial-disimalrities/

2 thoughts on “22-July-2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा की विशेष धम्म देशना :-“युवा पीढ़ी का भ्रम- केवल आंबेडकर तक ही सीमित रहो बुद्ध और उनके धम्म तक जाने की जरूरत नहीं|”…समयबुद्धा

  1. It is beautiful analysis of present day Buddhism and its importance in modern era. Dr Babasaheb Ambedkar draw real essence of Buddhism & put up before us in very pure form. It is our duty to understand in a logical way.
    What is most important today is…!
    1) we must run Sunday school for 2 hrs and those who are well studied in”The Buddha and His Dhamma” they should take responsibility to teach each topic in detail. If well knowledgable Bhikkhu takes this responsibility it is most appreciated.
    2) There should be monthly written & oral test on”The Buddha and His Dhamma”. We all must know this revolutionary book by heart.
    3) There should be quarterly lecturer series on this great book.
    4) Either corpus fund on monthly collection of fund may run all these activities.
    5)preferably students from age 5 to 15 should get compulsory teaching. This will creat new generation.
    6)in Sunday class all should get other knowledge too.
    7)step by step important sutras such as ” Mangalsutta”, Karneyameya sutta, Jaymangal Atthagatha, an so on… Should taught explaining with meaning.
    8)Dr Babasaheb’s “Annihilation of caste”, “Buddha & Carl Marx”,”revolution & counter revolution ” and other literature is a must to get understand by this class.
    9) preferable place should be Vihara or community hall or some well to do person can make available room.
    10) ten minute “Anapana”(concentration meditation) should also taught by well known teacher.
    In Maharashtra many places these activities r going on.
    To understand Babasaheb’s mission we must save & secure our youth because this is the only force who has to carry the mission of Casteless Society. Buddhism is only option. We must utilize our head properly. Because only we Ambedkariate have to run the revolution which will produce eternal peace in modern world.
    Namo Buddhay! Jay Bhim !!

  2. Pingback: हर पूर्णिमा पर समयबुद्धा कि धम्म देशना यहाँ इस वेब्साईट पर पब्लिश कि जाती है| सन 2013 कि समयबुद्धा कि

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