सारनाथ धम्म्चकक महोत्सव-2013 … S.R. Darapuri


सारनाथ धम्म्चकक महोत्सव-2013
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भारत के बौद्ध धम्म के इतिहास में पहली बार दिनांक 21, 22 व् 23 जुलाई को मूलगंध कुटी विहार, सारनाथ वाराणसी में धम्मचक्क महोत्सव का आयोजन किया गया. इस में देश के विभिन्न बौद्ध विहारों के भिक्षुओं, बौद्ध उपासकों और उपासिकाओं ने भरी संख्या में भाग लिया. सम्मलेन के प्रथम दिन धम्मेक स्तूप पर पूजा पाठ किया गया और धम्म्देसना -धम्म की अपरिहारियता अर्थात धम्म विहीन जीवन की निरर्थकता पर प्रवचन किया गया.

आषाढ़ पूर्णिमा (22, जुलाई )का दिन बौद्ध धम्म के इतिहास में एक एतिहासिक दिवस है जो धम्म चक्र परिवर्तन दिवस के रूप मेंमनाया जाता है क्योंकि आज से 2600 वर्ष पहले इसी दिन भगवान बुद्ध ने इसी स्थान पर जो “इसीपत्तन” के नाम से जाना जाता है, पांच शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया था. इसी एतिहासिक दिवस के उपलक्ष्य में महाबोधि मंदिर के प्रांगन में धम्मचक्क महोत्सव के आयोजन के अंतर्गत 200 से अधिक श्रामनेरों को प्रव्रजित किया गया और इस सम्मलेन में पहली बार भारतीय भिक्खुओं के लिए चीवर का रंग निर्धारित किया गया जिस से भारतीय बौद्ध भिक्षुओं को एक अलग पहचान मिली है. इसी दिन अपरान्ह में “बुद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार में हमारी भूमिका” विषयक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया जिस में देश तथा विदेश के बौद्ध उपासकों और बौद्ध धम्म के विद्वानों ने भाग लिया. इस में वर्तमान में बौद्ध धम्म के प्रचार प्रसार की स्थिति, समस्याएं और भविष्य की कार्यनीति पर विस्तृत चर्चा की गयी. इस विचार गोष्ठी में डॉ. आंबेडकर द्वारा 21वीं सदी में धम्म चक्क प्रवर्तन , उन द्वारा भारत में बौद्ध धम्म के प्रचार प्रसार के लिए तैयार की गयी रूपरेखा पर प्रकाश डाला गया. अब आशा की जाति कि इस सम्मलेन से भारत में बौद्ध धम्म के प्रचार प्रसार को एक नई दिशा मिलेगी. इस अवसर पर एक अति सुन्दर ” धम्म्चकक महोत्सव-2013 समारिका” का वमोचन भी किया गया.

महोत्सव के तीसरे दिन बुद्ध्मय भारत के निर्माण का संकल्प लिया गया और उत्तर प्रदेश में बौद्ध धम्म की सेवा में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले वरिष्ठ उपासक एवं उपासिकाओं को सम्मानित किया गया तथा उनका उद्भोधन भी हुआ.

इसी महोत्सव में प्रवर्जित हुए श्राम्नेरों का 21 जुलाई से 27 जुलाई तक श्रामनेर शिविर भी चलेगा
.
इस पूरे महोत्सव का आयोजन भारतीय बौद्ध भिक्खुओं, उपासक और उपासिकाओं द्वारा किया गया. इस में महाबोधि सोसाइटी आफ इंडिया सारनाथ केंद्र के प्रभारी भिक्षु पी. शिवली का बहुत महतवपूर्ण योगदान और दिशा निर्देशन रहा. इस के साथ ही विभिन्न बौद्ध विहारों के भिक्खुओं ने इसे सफल बनाने के लिए बहुत परिश्रम किया. विभिन्न बौद्ध संस्थाओं, उपासक और उपासिकाओं ने भी तन, मन, धन से सहयोग देकर इस एतिहासिक महोत्सव को सफल बनाया. वे सभी बहुत बहुत साधुवाद के पात्र हैं.

इस महोत्सव का यह एतिहासिक महत्व है कि यह आषाढ़ पूर्णिमा के दिन आयोजित किया गया जिस दिन हिन्दू लोग गुरु पूर्णिमा मानते हैं.

ऐसा प्रतीत होता है कि शायद हिदुओं का गुरु पूर्णिमा दिवसं धम्म चक्क परिवर्तन दिवस से ही लिया गया है क्योंकि इस दिन ही बुद्ध ने अपने पंच वग्गीय भिक्षुओं को प्रथम उपदेश दिया था और यह उन शिष्यों की अपने शास्ता के प्रति कृतिग्यता प्रकट करने का दिवस है. बहरहाल सारनाथ में धम्मचक्क परिवर्तन दिवस और महोत्सव का मनाया जाना यह दर्शाता है कि भारत में अब बौद्ध धम्म का पौदा जड़ पकड़ चुका है जिसे बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने 14,अक्तूबर, 1956 को रोपित किया था. अब उम्मीद की जा सकती है कि भारत जल्दी ही बौध्मय हो जायेगा जो कि बाबा साहेब का सपना था.

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3 thoughts on “सारनाथ धम्म्चकक महोत्सव-2013 … S.R. Darapuri

  1. इसमें कोई शक नही की बुद्ध धम्म का पौधा अब भारत में एक बार फिर से वृक्ष की शक्ल लेता जा रहा है ,लेकिन अब जरूरी यह है की बुद्ध धम्म का फैलाव बुद्ध की शिक्षाओ पर हो न की उसकी इमेज एंटी हिन्दू के रूप में …..

  2. Dhamma ke chhetra me kam karne ke liye keval photo khichane or media men aane se kam nahin chalega
    Dhamma ke anusar Apane Acharan ko badlna hoga.Bharat men ab budh ke dhamm ki chahat bad rahi hai,hum sabko mil kar Dhamma Dhwaja ko apani nai pidi ke hathon men dena hoga.Ghar ke sabhi logon ko shramner pravajja dilvana jaruri hai.

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