बौद्ध धम्म की सबसे लोकप्रिय पुस्तक धम्मपद का कहानियों और चित्रों से सुसज्जित संस्करण ‘धम्मपद गाथा और कथा’ का विवरण और डाउनलोड लिंक की जानकारी …Dr Prabhat Tondon

 

सर्वज्ञ बुद्ध की अमर कृति ‘धम्मपद’ का दुनिया भर की भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। लेकिन हिन्दी भाषा में अपेक्षाकृत उतने सहज और सरल अनुवाद अब तक उपलब्ध नहीं हैं। परिणाम यह है कि बौद्ध शिक्षा के प्रति हिंदी भाषी समाज, विशेषकर आम पाठकों में, में कई प्रकार के मिथकों और भ्रान्तियों की एक लम्बी परम्परा कायम हो गई है।

इस संदर्भ में बौद्ध साहित्यिक परम्परा के अध्ययनकर्ता ह्रषीकेश शरण द्वारा सम्पादित ‘धम्मपद: गाथा और कथा’ एक महत्वपूर्ण प्रयास है। पुस्तक में सहज व सरल भाषा में उन बौद्ध कथाओं का अनुवाद उपलब्ध है जो मूलत: पाली भाषा में होने के कारण हिंदी के पाठकों को एक जगह आसानी से उपलब्ध नहीं थीं। लेखक ह्रषीकेश शरण केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क विभाग में वरिष्ठ अधिकारी हैं और बौद्ध परम्पराओं के गहन अध्ययनकर्ता भी। इससे पहले 2007 में शरण सर एडविन ऑरनाल्ड की पुस्तक ‘लाइट ऑफ एशिया’ का हिंदी अनुवाद ‘जगदाराध्य तथागत’ के शीर्षक से कर चुके हैं।

गौरतलब है कि बुद्ध के वचनों को बुद्ध-देशना का नाम दिया गया था। आगे चलकर बुद्ध-देशना को तीन भागों में बांटा गया-सुत्तपिटक,अभिधम्मपिटक और विनयपिटक। सुत्तिपटक के अंतर्गत ‘खुद्धक निकाय’ आता है। खुद्धक निकाय के अंतर्गत 19 ग्रंथ आते हैं और इन्हीं ग्रंथों में से एक ग्रंथ है ‘धम्मपद’ जिसका अनुवाद विश्व की लगभग सभी भाषाओं में उपलब्ध है लेकिन कई भारतीय भाषाओं में अभी भी इसका अनुवाद उपलब्ध नहीं हैं।

धम्मपद को हिंदी में उपलब्ध करवाने की प्रक्रिया में कई बौद्ध साहित्य विशेषज्ञों से भी विचार-विमर्श किया। उनकी यह पुस्तक बुद्ध की शिक्षाओं और उनके वचनों को आम सुधी पाठकों तक लाने का प्रयास है भाषा, शैली और पुस्तक की साज सज्जा में इस बात का खास ध्यान रखा गया है कि धम्मपद की गाथाओं को क्लिष्टता के दायरे से बाहर निकालकर रोचक बनाया जाए जिससे सभी आयु वर्गो के पाठक इसका आनंद और लाभ उठा सकें।
शरण की यह पुस्तक हिंदी भाषियों के लिए इस कमी को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। पुस्तक को आम पाठकों के लिए रोचक बनाने के लिए दाहिनी और के पृष्ठों पर कथाएं हैं जबकि बाईं और के पृष्ठों में उससे सम्बंधित चित्र, गाथा और उसका अर्थ दिया गया है।
पुस्तक में गाथाओं का अनुवाद इस शैली में किया गया है जिससे बुद्ध की शिक्षा मौजूदा समय में और भी अधिक व्यवहारिक और प्रासंगिक लगी है। मसलन पुस्तक में मौजूद ‘कौसाम्बी के भिक्षुओं की कथा’ का ‘अर्थ’ पाठकों को बताता है, “मूर्ख लोग नहीं समझते कि उन्हें एक दिन संसार से जाना ही होगा। जो इस बात को समझते हैं उनके कलह शांत हो जाते हैं। ”
शरण कहते हैं, “आज समाज में सर्वत्र उच्छृंखलता फैली हुई है। उसे दूर करने के लिए बुद्ध उपदेश से बढ़कर और कोई दवा नहीं है।”
धम्मपद की एक गाथा में बुद्ध स्पष्ट करते हैं, “जैसे कोई पुष्प सुंदर और वर्धयुक्त होने पर भी गंधरहित हो, वैसे ही अच्छी कही हुई बुद्धवाणी भी फलरहित होती है यदि कोई उसके अनुसार आचरण न करे। ” इस पुस्तक को ताईवान स्थित ‘द कारपोरेट बॉडी ऑफ बुद्ध एजुकेशनल फाऊंडेशन‘ द्वारा नि:शुल्क वितरित किया जा रहा है।

डाउनलोड लिंक 

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धम्मपद वर्ग १-७ :  http://tinyurl.com/3psp558
IN072
धम्मपद वर्ग ८-१४ : http://tinyurl.com/3os9y2w
IN073
धम्मपद वर्ग १५-२१: http://tinyurl.com/3ep555a
IN074
धम्मपद वर्ग २२-२६ :  http://tinyurl.com/3enpzlr

यह भी देखें :

हिन्दू-धर्म में गीता का जो स्थान है, बौद्ध धर्म में वही स्थान धम्मपद का है। गीता धम्मपद सुत्त पिटक के खुद्दक निकाय का एक अंश है।धम्मपद में 26 वग्ग और 423 श्लोक हैं।बौद्ध धर्म को समझने के लिए अकेला धम्मपद ही काफी है। मनुष्य को अंधकार से प्रकाशमें ले जाने के लिए यह प्रकाशमान दीपक है। यह सुत्त पिटक के सबसे छोटे निकाय खुद्दकनिकाय के 15 अंगों में से एक है।

यह भी देखें : https://samaybuddha.wordpress.com/2013/08/28/dhammapad-buddhist-religious-book/

हमारी धार्मिक पुस्तक -‘धम्मपद’

हमारी धार्मिक पुस्तक -धम्मपद
धम्मपद बौद्ध साहित्य का सर्वोत्कृष्ट लोकप्रिय ग्रंथ है। इसमें बुद्ध भगवान् के नैतिक उपदेशों का संग्रह यमक, अप्पमाद, चित्त आदि 26 वग्गों (वर्गों) में वर्गीकृत 423 पालि गाथाओं में किया गया है। त्रिपिटक में इसका स्थान सुत्तपिटक के पाँचवें विभाग खुद्दकनिकाय के खुद्दकपाठादि 15 उपविभागों में दूसरा है। ग्रंथ की आधी से अधिक गाथाएँ त्रिपिटक के नाना सुत्तों में प्रसंगबद्ध पाई जा चुकी हैं। कुछ गाथाएँ ऐसी भी प्रतीत होती हैं जो मूलत: परंपरा की नहीं थीं, किंतु भारतीय ज्ञान के उस अपार भंडार में से ली गई है जहाँ से वे उपनिषद्, गीता, मनुस्मृति, महाभारत, जैनागम एवं पंचतंत्र आदि कथा कहानियों में भी नाना प्रकार से प्रविष्ट हुई हैं। धम्मपद की रचना उपलब्ध प्रमाणों से ई.पू. 300 व 100 के बीच हो चुकी थी, ऐसा माना गया है।

Contents
1 महत्व
2 धम्मपद का वर्ण्य विषय
3 विभिन्न रूप
4 धम्मपद की संरचना
5 वाह्य सूत्र
महत्वबौद्ध संघ में इस ग्रंथ का इतना गहरा प्रभाव है कि उसमें पारंगत हुए बिना लंका में किसी भिक्षु को उपसंपदा प्रदान नहीं की जाती। ‘धम्मपद का व्युत्पत्तिगत अर्थ है धर्मविषयक कोई शब्द, पंक्ति या पद्यात्मक वचन’। ग्रंथ में स्वयं कहा गया है- अनर्थ पदों से युक्त सहस्रों गाथाओं के भाषाण से ऐसा एकमात्र अर्थपद, गाथापद व धम्मपद अधिक श्रेयकर है जिसे सुनकर उपशांति हो जाए (गा. 100- 102)। बौद्ध साधु प्राय: इसी ग्रंथ की किसी गाथा या उसके अंशमात्र का आधार लेकर अपना प्रवचन आरंभ करते हैं, जिस प्रकार ईसाई पादरी बाइबिल के किसी वचन से। इस कार्य में उन्हें धम्मपद की अट्ठकथा नामक टीका से बड़ी सहायता मिलती है जिसमें प्रत्येक गाथा के विशद् अर्थ के अतिरिक्त उसके दृष्टांत स्वरूप एक व अनेक कथाएँ दी गई हैं। यह अट्टकथा बुद्धघोष या उनके कालवर्ती किसी अन्य आचार्य द्वारा त्रिपिटक में से ही संगृहीत की गई हैं। इसमें वासवदत्ता और उदयन की कथा भी आई है।

धम्मपद का वर्ण्य विषयजो ग्रंथ इतना प्राचीन है, जिसकी बौद्ध संप्रदाय में महान् प्रतिष्ठा है, तथा अन्य विद्वानों ने भी जिसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की है, उसमें सामान्य व्यावहारिक नीति के अतिरिक्त कैसा तत्वचिंतन उपस्थित किया गया है, इसकी स्वभावत: जिज्ञासा होती हैं। ग्रंथ में बौद्धदर्शनसम्मत त्रिशरण, चार आर्यसत्य तथा अष्टांगिक मार्ग का तो उल्लेख है ही (गा. 190-192), किंतु उसमें आत्मा, निर्वाण, पुनर्जन्म, पुण्य-पाप वा स्वर्ग नरक आदि ऐसी बातों पर भी कुछ स्पष्ट विचार पाए जाते हैं जिनके संबंध में स्वयं बौद्ध धर्म के नाना संप्रदायों में मतभेद है। यहाँ स्वयं भगवान् बुद्ध कहते हैं, “मैं अनेक जन्मों रूप संसार में लगातार दौड़ा और उस गृहकारक शरीर के निर्माता को ढूंढता फिरा, क्योंकि यह बार-बार का जन्ममरण दु:खदायी है। रे गृहकारक, अब मैंने तुझे देख लिया, अब तू पुन: घर न बना पावेगा। मैंने तेरी सब कड़ियों को भग्न कर डाला, गृहकूट बिखर गया, चित्त संस्काररहित हो गया और मेरी तृष्णा क्षीण हो गई” (गा. 153-54) यहाँ एक जीव और उसके पुनर्जन्म तथा संस्कार व तृष्णा के विनाश द्वारा पुनर्जन्म से मुक्ति की मान्यता सुस्पष्ट है। मोक्ष का स्वरूप एवं उसे प्राप्त करने की क्रिया का यहाँ इस प्रकार वर्णन है- “जिनके पापों का संचय नहीं रहा या जिनका भोजनमात्र परिग्रहशेष रहा है, तथा आस्रव क्षीण हो गए हैं, उनको वह शून्यात्मक व अनिमित्तक मोक्ष गोचार है (गा. 92-93)। यहाँ पापबंध के कारणों, आस्रवों तथा संचित कर्मों के क्षय से मोक्षप्राप्ति मोक्ष के शून्यात्मक और अनिमित्तक स्वरूप का विधान किया गया है। “कोई पापकर्मी गर्भ से मनुष्य या पशुयोनि में उत्पन्न होते हैं, कोई नरक हो, और कोई सुमति द्वारा स्वर्ग को जाते हैं, तथा जिनके आस्रव नहीं रहा वे परिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं। अंतरिक्ष, समुद्र, पर्वतविवर आदि जगत् भर में ऐसा कोई प्रदेश नहीं जहाँ जाकर पापी कर्मफल पाने से छूट सके” (गा. 126-27) “असत्यवादी पापी और असंयमी कषायधारी भिक्षु प्रमादी, परधरसेवी, मिथ्यादृष्टि आदि सब नरकगामी है” (306-09)। यहाँ जीव की गर्भ योनि, नरक, स्वर्ग व मुक्ति इन गतियों तथा कर्मफल की अनिवार्यता की स्वीकृति में संदेह नहीं रहता। ब्राह्मण का स्वरूप एक पूरे वग्ग (गा. 383-423) में बतलाया गया है, जो ऐतिहासिक, धार्मिक, सामाजिक अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं। जाति, गोत्र, जटा तथा मृगचर्म मात्र से एवं भीतर मैला रहकर बाहर मल मलकर स्नान करने से कोई ब्राह्मण नहीं होता। मैं तो ब्राह्मण उसी को कहूँगा जो कामतृष्णा का त्यागी, अनासक्त, अहिंसक, मन-वचन-काय से पापहीन, रागद्वेष मान से रहित, क्षमाशील, ज्ञानी, ध्यानी, क्षीणस्रव अरहंत हैं। 100 वर्षों तक प्रति मास सहस्रों का दान देते हुए यज्ञ करनेवाले की अपेक्षा एक मूहर्तमात्र आत्मभावना से पूजा करनेवाला श्रेष्ठ है (गा.106)

विभिन्न रूपबौद्धधर्म विभिन्न संप्रदायों में बँटा, एशिया महाद्वीप के नाना देशों में फैला है। स्वभावत: देशकाल की सुविधानुसार उसके साहित्य ने भी विविध भाषात्मक रूप धारण किए। इस परिस्थिति में बौद्ध धर्म का यह प्रधान ग्रंथ भी एक रूप नहीं रह सका। उसके नाना रूपों में से एक का पता मध्य-एशिया के खुतान नामक प्रदेश में चला। वहाँ सन् 1892 में एक फ्रांसीसी यात्री को खरोष्ट्री लिपि में लिखित धर्म ग्रंथ का कुछ अंश मिला। उसी का दूसरा अंश पेत्रोग्राद पहुँचा। इन दोनों के मिलाकर सेनार्ट साहब ने सन् 1897 में उसका संपादन प्रकाशन किया। यही ग्रंथ अधिक व्यवस्थित रूप में वरुआ और मित्र द्वारा संपादित होकर सन् 1921 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्रकाशित हुआ। इन संपादकों के मतानुसार इस धम्मपद की भाषा गांधार प्रदेश की है, और वह अपनी ध्वनियों और भाषात्मक स्वरूप में अशोक की शहबाजगढ़ी व मनसेहरा वाली प्रशस्तियों की भाषा से मेल खाती है। इसलिए इस ग्रंथ का नाम “प्राकृत धम्मपद” रखा गया है। इसमें 12 वग्गा और 251 गाथाएँ हैं।

सेनार्ट द्वारा संपादित संस्कृत महावस्तु के तृतीय परिच्छेद में धम्मपद-सहस्सवग्र्ग (धर्मपदेसु सहस्र वर्ग:) के 24 पद्य उद्धृत किए गए हैं। जबकि पालि त्रिपिटक के सहस्सवग्ग में कुल 16 गाथाएं ही हैं। इससे प्रतीत होता है कि महावस्तु के कर्ता के संमुख एक संस्कृत पद्यात्मक धर्मपद था जिसमें पद्यों की सख्या पालि धम्मपद की अपेक्षा अधिक थी।

चीनी भाषा में धम्मपद के चार अनुवाद मिलते हैं, जिनमें से एक में 500, दूसरे में 700, तीसरे में 900 और चौथे में लगभग 1000 गाथाओं का अनुवाद है और उनकी अट्ठकथाएँ पाई जाती हैं। इनमें से प्रथम तीन का रचनाकाल ईसा की तीसरी शती व चतुर्थ का चौथी व नौंवी शतियों के बीच प्रमाणित होता है। इन चारों के मूल ग्रंथ उनके वर्गों तथा गाथाओं की संख्या एवं क्रम में बहुत कुछ स्वतंत्र रहे होंगे। इन चार में पालि एवं प्राकृत के उक्त दो रूपों को मिलाने से धम्मपद के कम से कम छह संस्करण हमारे संमुख आते हैं, जिनका प्रचार ई.पू. से लेकर 18वीं शती तक लंका, स्याम, बर्मा, मध्य एशिया तथा चीन देशों में हुआ पाया जाता है।

धम्मपद की संरचना1.यमक वग्ग
2.अप्पमाद वग्ग
3.चित्त वग्ग
4.पुष्फ वग्ग
5.बाल वग्ग
6.पण्डित वग्ग
7.अरहन्त वग्ग
8.सहस्स वग्ग
9.पाप वग्ग
10.दण्ड वग्ग
11.जरा वग्ग
12.अत्थ वग्ग
13.लोक वग्ग
14.बुद्ध वग्ग
15.सुख वग्ग
16.पिय वग्ग
17.कोध वग्ग
18.मल वग्ग
19.धम्मत्थ वग्ग
20.माग्ग वग्ग
21.पकीर्णक वग्ग
22.निरय वग्ग
23.नाग वग्ग
24.तन्हा वग्ग
25.भिक्खु वग्ग
26.ब्राह्मण वग्ग

बुद्ध पुरूष AWAKED HUMAN कहां पैदा होते है—(कथा यात्रा)…ओशो

बुद्ध पुरूष कहां पैदा होते है—(कथा यात्रा)

scwo27आनंद ने कहां, भगवान आपने बताया नहीं उत्‍तम पुरूष कौन है? कैसे उत्‍पन्‍न होते है? तब भगवान ये सुत्र कहां था। आनंद उत्‍तम पुरूष सर्वत्र उत्‍पन्‍न नहीं होते। वे मध्‍य देश में उत्‍पन्‍न होते है। और जन्‍म से ही धनवान होते है। वे क्षत्रिय या ब्राह्मण कुल में उत्‍पन्‍न होते है

दुल्‍लभो पुरिसाजज्जो न सो सब्‍बत्‍थ जायति।

यत्‍थ सो जायति धीरो तं कुलं सुखमधिति।।

पुरूष श्रेष्‍ठ दुर्लभ है, सर्वत्र उत्‍पन्‍न नहीं होता,वह धीर जहां उत्‍पन्‍न होता है, उस कुल में सुख बढ़ता है।

इस गाथा का अर्थ बौद्धो ने अब तक जैसा किया है, वैसा नहीं है। सीधा-सीधा अर्थ तो साफ़ मालूम होता है। कि बुद्ध महा धनवान घर में पैदा होते है। फिर कबीर का क्‍या होगा। फिर क्राइस्‍ट का क्‍या होगा। फिर मोहम्‍मद का क्‍या होगा। ये तो महा धनवान घरों में पैदा नहीं हुए। तो फिर ये बुद्ध पुरूष नहीं है। ये तो बड़ी संक्रीर्णता हो जाएगी। जैनों के चौबीस तीर्थंकर राजपुत्र थे। सही, हिंदुओं के सब अवतार राजाओं के बेटे है, सही, और बुद्ध भी राजपुत्र है सही। इस लिए इस वचन का बौद्धो ने यहीं अर्थ लिया। कि बुद्ध पुरूष राज घरों में पैदा होते है। महा धनवान।

मैं महा धनवान का अर्थ करता हूं—जन्‍म से ही महा धनवान होते है। इसका अर्थ हुआ कि बुद्ध पुरूष आकस्‍मिक पैदा नहीं होते, जन्‍मों-जन्‍मों की संपदा लेकर पैदा होते है। संपदा भीतर है। संपदा आंतरिक है। महा धनवान ही पैदा होते है। शायद बस आखिरी तिनका रखा जाना है और ऊँट बैठ जाएगा। सब हो चुका है शायद थोड़ी सी कमी रह गयी है। निन्यानवे डिग्री पर उबल रहा है पानी,एक डिग्री ओर, और फिर दुबारा जनम नहीं होगा।

लेकिन बौद्धो ने इसका क्‍या अर्थ लिया, जानते है? हिंदुओं ने इसका क्‍या अर्थ लिया? उन्‍होंने कहा कि बुद्ध पुरूष भारत में ही पैदा होते है—सर्वत्र पैदा नहीं होते। जातीय अहंकार, राष्‍ट्रीय अहंकार। भारत में ही पैदा होते है। यही है पवित्रतम देश। यही है धर्म भूमि। सदियों से भारत का अहंकार अपने आपकी पूजा करता रहा है। भारत का अहंकार कहता रहा है कि देवता भी यहां पैदा होने को तरसते है, क्‍योंकि यहां बुद्ध पुरूष पैदा होते है।

फिर क्राइस्‍ट को क्‍या कहोगे? फिर जरथुत्त्स को क्‍या कहोगे? फिर मोहम्‍मद का क्‍या करोगे? और फिर बुद्ध के चले जाने के बाद जो बुद्धों की असली परंपरा चली, वह तो चीन में चली और जापान में चली और जापान में चली और बर्मा में चली और लंका में चली। और सैकड़ों व्‍यक्‍ति बुद्धत्‍व को उपल्‍बध हुए। वे सब भारत के बाहर उपलब्‍ध हुए। उनको क्‍या कहोगे?

नहीं, ऐसी संकीर्ण बात इसका अर्थ नहीं हो सकती। भारतीय मन को यह बात सुख देती है। क्‍योंकि तुम्‍हारे अहंकार को तृप्‍ति मिलती है। मैं इसके लिए राज़ी नहीं हूं। बुद्ध पुरूष सर्वत्र पैदा नहीं होते,यह सच है। सभी के भीतर यह घटना नहीं घटती इसमें सच्‍चाई ज्‍यादा खोजने की जरूरत नहीं है। साफ ही है बात करोड़ों में कभी कोई एक होता है। लेकिन यह एक भारत में ही होता है। ऐसी भ्रांति मत पालना। वह एक कहीं भी हो सकता है। जहां कोई तैयार होगा वहां हो जाएगा।

दूसरी बात—वे मध्‍यदेश में ही उत्‍पन्‍न होते है। यह मध्‍यदेश ने बड़ी झंझट खड़ी की है। बौद्ध शास्‍त्रों में। उन्‍होंने तो हिसाब किताब भी आंककर बता दिया है कि कितना योजन लंबा और कितना योजन चौड़ा मध्‍यदेश है। तो मध्‍यदेश में बिहार आ जाता है, उत्तर प्रदेश आ जाता है। थोड़ा सा मध्‍यप्रदेश का हिस्‍सा आ जाता है। बस ये मध्‍य देश है। तो पंजाब में पैदा नहीं हो सकते। सिंध में पैदा नहीं हो सकते। बंगाल में पैदा नहीं हो सकते। ये तो सीमांत देश हो गए। ये मध्‍यदेश न रहे। यह बात बड़ी ओछी है। ऐसा अर्थ करना उचित नहीं है।

मैं कुछ इसका अर्थ करता हूं।

पश्‍चिम का एक बहुत बड़ा भौतिक शास्‍त्री है—ली कांत दूनाय। उसने एक अनूठी बात कहीं है। ली कांत दूनाय को पढ़ते वक्‍त अचानक मुझे लगा कि यह तो मध्‍यदेश की बात कर रहा है। मगर बुद्ध और ली कांत दूनाय में पच्‍चीस सौ साल का फासला है। और बिना ली कांत दूनाय के बुद्ध के मध्‍यदेश की परिभाषा नहीं हो सकती। इसलिए मैं क्षमा करता हूं जिन्‍होंने दो हजार पाँच सौ साल में मध्‍यदेश की इस तरह की व्‍याख्‍या की है। उन पर मैं नाराज नहीं हूं, क्‍योंकि वे कुछ कर नहीं सकते थे।

एक अनूठी बात दूनाय ने खोजी है। और वह यह कि मनुष्‍य अस्‍तित्‍व में ठीक मध्‍य में है। मध्‍य देश है। छोटे से छोटा है परमाणु, एटम और बड़ से बड़ा है विश्‍व। और ली कांत दूनाय ने सिद्ध किया है कि मनुष्‍य इनके,दोनो के ठीक बीच में मध्‍यदेश में है। मनुष्‍य ठीक बीच में खड़ा है। एक छोर पर परमाणु है, उतने ही गुना बड़ा विश्‍व है मनुष्‍य से। मनुष्‍य ठीक मध्‍य में खड़ा है। मनुष्‍य और परमाणु के बीच जितना फासला है। उतना ही फासला मनुष्‍य और विश्‍व की परिधि के बीच है। वे फासले बराबर है। और मनुष्‍य ठीक मध्‍य में खड़ा है।

ली कांत दूनाय को पढ़ते वक्‍त अचानक मुझे लगा। धम्‍म पद का यह बचन याद आया। शायद ली कांत दूनाय को तो बुद्ध के इस वचन का कोई पता भी न होगा। हो भी नहीं सकता। लेकिन यह मध्‍यदेश का अर्थ हो सकता है—होना चाहिए—कि मनुष्‍य में ही बुद्ध पुरूष हो सकता है। मनुष्‍य चौराहा है। चौराह है। मनुष्‍य की कुछ खूबी है, वह समझ लेनी चाहिए वह क्‍यों मध्‍यदेश है?

मध्‍यदेश की कुछ खूबी है, कुछ अड़चन भी है। मध्‍यदेश की। मध्‍यदेश का मतलब होता है। बीच में खड़ा है। न इस तरफ है, न उस तरफ। चौराहे पर खड़ा है। मनुष्‍य का अर्थ है, अभी कहीं गए नहीं, खड़े है, सीढ़ी के बीच में है। दोनों तरफ जाने की सुविधा है—निम्‍नतम होना चाहें तो ज्‍यादा नीच और कोई भी नहीं हो सकता। मनुष्‍य पशुओं से भी नीचे गिर जाता है। जब तुम कभी-कभी कहते हो, मनुष्‍य ने पशुओं जैसा व्‍यवहार किया, तो तुम कभी सोचना कि पशुओं ने ऐसा व्‍यवहार कभी किया है।

जानवर तो केवल तभी मारता है जब भूखा होता है। आदमी खेल में, खिलवाड़ में मारता है। हिंसा खिलवाड़ है। दूसरे का जीवन जाता है। तुम्हारे लिए खेल है।

फिर कोई जानवर अपनी ही जाती के जानवरों को नहीं मारता—कोई सिंह किसी सिंह को नहीं मारता। और कोई सांप किसी सांप को नहीं काटता। और कोई बंदर कभी किसी बंदर की गर्दन काटते नहीं देखा गया। आदमी अकेला जानवर है जो आदमियों को काटता है। और एक-दो को नहीं करोड़ों में काट डालता है। इसके पागलपन की कोई सीमा नहीं है।

आदमी जब गिरता है तो पशु से बदतर हो जाता है। और अगर आदमी उठे तो परमात्‍मा से उपर हो सका है। बुद्धत्‍व का अर्थ है: उठना पशुत्‍व का अर्थ है गिरना। और मनुष्‍य मध्‍य में है। इस लिए दोनों तरफ की यात्रा बराबर दूरी पर है। जितनी मेहनत करने से आदमी परमात्‍मा होता है। उतनी ही मेहनत करने से पशु भी हो जाता है। तुम यह मत सोचना कि एडोल्‍फ हिटलर कोई मेहनत नहीं करता है। मेहनत तो बड़ी करता है तब हो पाता है। यह मेहनत उतनी ही है जितनी मेहनत बुद्ध ने की भगवान होने के लिए,उतनी ही मेहनत से सह पशु हो जाता है।

जितने श्रम से तुम आपने को गंवा दोगे। तुम पर निर्भर है, तुम ठीक मध्‍य में खड़े हो। उतने कदम उठाकर तुम पशु के पार पहुंच जाओगे।

पुरूष श्रेष्‍ठ दुर्लभ है, वह सर्वत्र उत्‍पन्‍न नहीं होता। वह मध्‍यदेश में ही उत्‍पन्‍न होता है और जन्‍म से महाधन वान होता है।

तो मनुष्‍य की महिमा भी अपार है। क्‍योंकि यहीं से द्वार खुलता है। और मनुष्‍य का खतरा भी बहुत बड़ा है। क्‍योंकि यहीं से कोई गिरता है। तो सम्‍हलकर कदम रखना, एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखना। क्‍योंकि सीढ़ी यहीं है नीचे भी जाती है, जरा चूके कि चले जाओगे।

सदा ख्‍याल रखना, गिरना सुगम मालूम पड़ता है। क्‍योंकि गिरने में लगता है कुछ नहीं करना पड़ता, उठना कठिन मालूम पड़ता है। क्‍योंकि गिरना कभी सुगम नहीं है। उसमे भी बड़ी कठिनाई है, बड़ी चिंता, बड़ा दुःख बड़ी पीड़ा। लेकिन साधारण: ऐसा लगता है गिरने में आसानी है। उतार है—चढ़ाव पर कठिनाई मालूम पड़ती है। लेकिन चढ़ाव का मजा भी है। क्‍योंकि शिखर करीब आने लगता है आनंद का, आनंद की हवाएँ बहने लगती है। सुगंध भरने लगती है। रोशनी की दुनिया खुलने लगती है।

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तो चढ़ाव की कठिनाई है, चढ़ाव का मजा है। उतार की सरलता है, उतार की अड़चन है। मगर हिसाब अगर पूरा करोगे तो मैं तुमसे यह कहना चाहता हूं कि बराबर आता है। बुरे होने में जितना श्रम करना पड़ता है। उतना ही श्रम भले होने में पड़ता है। इसलिए वे नासमझ है, जो बुरे होने में श्रम लगा रहे है। उतने में ही तो फूल खिल जाते है। जितने श्रम से तुम दूसरों को मार रहे हो, उतने श्रम में तो अपना पुनर्जन्‍म हो जाता।

ओशो

एस धम्‍मो सनंतनो

प्रवचन—67

बहुजन दार्शनिक एक मार्गदर्शक कबीर व् उनका लोटा

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संत कबीर प्रतिदिन स्नान करने के लिए गंगा तट पर जाया करते थे. एक दिन उन्होंने देखा की पानी काफी गहरा होने के कारण कुछ ब्राह्मणों को जल में घुसकर स्नान करने का साहस नहीं हो रहा है. उन्होंने अपना लोटा मांज धोकर एक व्यक्ति को दिया और कहा की जाओ ब्राह्मणों को दे आओ ताकि वे भी सुविधा से गंगा स्नान कर लें.

कबीर का लोटा देखकर ब्राह्मण चिल्ला उठे–अरे जुलाहे के लोटे को दूर रखो. इससे गंगा स्नान करके तो हम अपवित्र हो जायेंगे.

कबीर आश्चर्यचकित होकर बोले–इस लोटे को कई बार मिट्टी से मांजा और गंगा जल से धोया, फिर भी साफ़ न हुआ तो दुर्भावनाओं से भरा यह मानव शरीर गंगा में स्नान करने से कैसे पवित्र होगा?

सदा ध्यान रखें :

“भारत के बहुजन लोग 6000 से भी ज्यादा जातियों में बिखरे हैं,और अपनी जाती को अपना झंडा मानकर अलग अलग शोषित होते रहते हैं, जब एक जाती पर आपत्ति आती है तो दूसरी चुप बैठती है|इसका एक ही समाधान है की सभी जाती तोड़ो और एक ही पहचान “बौद्ध” हो जाओ|क्योंकि ‘धर्म’ मानव संगठन का एक स्थाई झंडा है, बाकि के झंडे जैसे कोई राजा,कोई दार्शनिक,कोई पंचायत,कोई देवता,राजनेतिक पार्टी अदि समय गुजरने के साथ अपना महत्व खो देते हैं|लोहिया जी न सही कहा है “राजनीती अल्पकालीन धर्म है पर धर्म दीर्घकालिक राजनीती|”…समयबुद्धा

गौतम बुद्ध धर्म के पहले वैज्ञानिक हैं, उनके साथ श्रद्धा और आस्था की जरूरत नहीं है उनके साथ तो समझ पर्याप्त है।..ओशो

गौतम बुद्ध धर्म के पहले वैज्ञानिक हैं। उनके साथ श्रद्धा और आस्था की जरूरत नहीं है। उनके साथ तो समझ पर्याप्त है। अगर तुम समझने को राजी हो तो तुम बुद्ध की नौका में सवार हो जाओगे। अगर श्रद्धा भी आएगी तो समझ की छाया होगी। लेकिन समझ के पहले श्रद्धा की मांग बुद्ध की नहीं है। बुद्ध यह नहीं कहते कि जो मैं कहता हूं, भरोसा कर लो। वह सोचने, विचारने और जीने पर जोर देते हैं।

पर्वत तो और भी हैं, हिमाच्छादित पर्वत और भी हैं, पर हिमालय अतुलनीय है। उसकी कोई उपमा नहीं है। हिमालय बस हिमालय जैसा है। गौतम बुद्ध, बस गौतम बुद्ध जैसे। पूरी मनुष्य-जाति के इतिहास में वैसा महिमापूर्ण नाम दूसरा नहीं। गौतम बुद्ध ने जितने हृदयों की वीणा को बजाया है, उतना किसी और ने नहीं। गौतम बुद्ध के माध्यम से जितने लोग जागे और जितने लोगों ने परम-भगवत्ता उपलब्ध की है, उतनी किसी और के माध्यम से नहीं। गौतम बुद्ध की वाणी अनूठी है। विशेषकर उनके लिए, जो सोच-विचार,चिंतन-मनन, विमर्श के आदी हैं।

हृदय से भरे हुए लोग सुगमता से परमात्मा की तरफ चले जाते हैं। लेकिन हृदय से भरे हुए लोग कहां हैं? हृदय से भरने का कोई उपाय भी तो नहीं है। हो तो हो, न हो तो न हो। ऐसी आकस्मिक, नैसर्गिक बात पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। बुद्ध ने उनको चेताया, जिनको चेताना सर्वाधिक कठिन है। विचार से भरे लोग, बुद्धिवादी, चिंतन-मननशील।

प्रेम और भाव से भरे लोग तो परमात्मा की तरफ सरलता से झुक जाते हैं, उन्हें झुकाना नहीं पड़ता। उनसे कोई न भी कहे तो भी वे पहुंच जाते हैं, उन्हें पहुंचाना नहीं पड़ता। लेकिन वे तो बहुत थोड़े हैं, और उनकी संख्या रोज थोड़ी होती गयी है। उंगलियों पर गिने जा सकें, ऐसे लोग हैं। मनुष्य का विकास मस्तिष्क की तरफ हुआ है। मनुष्य मस्तिष्क से भरा है। बुद्ध प्राणों के अंतरतम में पहुंच जाते हैं।

बुद्ध का धर्म बुद्धि का धर्म कहा गया है। बुद्धि पर उसका आदि तो है, अंत नहीं। शुरुआत बुद्धि से है। प्रारंभ बुद्धि से है। क्योंकि मनुष्य वहां खड़ा है। लेकिन अंत! अंत उसका बुद्धि में नहीं है। अंत तो परम अतिक्रमण है, जहां सब विचार खो जाते हैं, जहां केवल साक्षी, मात्र साक्षी शेष रह जाता है। लेकिन बुद्ध का प्रभाव उन लोगों में तत्क्षण अनुभव होता है, जो सोच-विचार में कुशल हैं।

बुद्ध के साथ मनुष्य जाति का एक नया अध्याय शुरू हुआ। पच्चीस सौ वर्ष पहले बुद्ध ने वह कहा, जो आज भी सार्थक मालूम पड़ेगा, और जो आने वाली सदियों तक सार्थक रहेगा। बुद्ध ने विश्लेषण दिया, एनालिसिस दी। और जैसा सूक्ष्म विश्लेषण उन्होंने किया, कभी किसी ने न किया था, न दुबारा कोई कर पाया। उन्होंने जीवन की समस्या के उत्तर शास्त्र से नहीं दिए, विश्लेषण की प्रक्रिया से दिए।

दुनिया के सारे धर्मों ने भरोसे को पहले रखा है, सिर्फ बुद्ध को छोड़कर। दुनिया के सारे धर्मों में श्रद्धा प्राथमिक है, फिर ही कदम उठेगा। बुद्ध ने कहा, अनुभव प्राथमिक है, श्रद्धा आनुसांगिक है। अनुभव होगा तो श्रद्धा होगी। अनुभव होगा तो आस्था होगी। इसलिए बुद्ध कहते हैं, आस्था की कोई जरूरत नहीं है, अनुभव के साथ अपने से आ जाएगी, तुम्हें लानी नहीं है। और तुम्हारी लायी हुई आस्था का मूल्य भी क्या हो सकता है? तुम्हारी लायी आस्था के पीछे भी छिपे होंगे तुम्हारे संदेह।

तुम आरोपित भी कर लोगे विश्वास को तो भी विश्वास के पीछे अविश्वास खड़ा होगा। तुम कितनी ही दृढ़ता से भरोसा करना चाहो, लेकिन तुम्हारी दृढ़ता अस्थिर रहेगी और तुम जानते रहोगे कि जो तुम्हारे अनुभव में नहीं उतरा है, उसे तुम चाहो भी तो भी कैसे मान सकते हो? मान भी लो, तो भी कैसे मान सकते हो? तुम्हारा ईश्वर कोरा शब्दजाल होगा, जब तक अनुभव की किरण न उतरी हो। तुम्हारे मोक्ष की धारणा मात्र शाब्दिक होगी, जब तक मुक्ति का थोड़ा स्वाद तुम्हें न लगा हो।

बुद्ध ने कहा मुझ पर भरोसा मत करना। मैं जो कहता हूं, उस पर इसलिए भरोसा मत करना कि मैं कहता हूं। सोचना, विचारना, जीना। तुम्हारे अनुभव की कसौटी पर सही हो जाए तो ही सही है। मेरे कहने से क्या सही होगा! बुद्ध यह नहीं कहते कि जो मैं कहता हूं, भरोसा कर लो। बुद्ध कहते हैं, सोचो, विचारो, विश्लेषण करो, खोजो, पाओ अपने अनुभव से तो भरोसा कर लेना।

बुद्ध के अंतिम वचन हैं अप्प दीपो भव। अपने दीए खुद बनना। और तुम्हारी रोशनी में तुम्हें जो दिखायी पड़ेगा, फिर तुम करोगे भी क्या, आस्था न करोगे तो करोगे क्या? आस्था सहज होगी। उसकी बात ही उठानी व्यर्थ है। बुद्ध का धर्म विश्लेषण का धर्म है। लेकिन विश्लेषण से शुरू हो

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ता है, समाप्त नहीं होता वहां। समाप्त तो परम संश्लेषण पर होता है। बुद्ध का धर्म संदेह का धर्म है। लेकिन संदेह से यात्रा शुरू होती है, समाप्त नहीं होती। समाप्त तो परम श्रद्धा पर होती है।  इसलिए बुद्ध को समझने में बड़ी भूल हुई। क्योंकि बुद्ध संदेह की भाषा बोलते हैं। तो लोगों ने समझा, यह संदेहवादी है। हिंदू तक न समझ पाए, जो जमीन पर सबसे ज्यादा पुरानी कौम है।

बुद्ध निश्चित ही बड़े अनूठे रहे होंगे, तभी तो सभी उन्हें समझने से चूक गए। अन्य धर्मावलंबियों को यह आदमी खतरनाक लगा, घबड़ाने वाला लगा। उन्हें लगने लगा कि यह तो सारे आधार गिरा देगा धर्म के। पर यही वह आदमी है, जिसने धर्म के आधार पहली दफा ढंग से रखे।

(ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन के सौजन्य से)

बौद्ध/बहुजन सम्राट अशोक महान और बौद्ध धम्म

485346_347293812051902_1391234576_nसंसार के इतिहास में अशोक इसलिए विख्यात है कि उसने निरन्तर मानव की नैतिक उन्नति के लिए प्रयास किया। जिन सिद्धांतों के पालन से यह नैतिक उत्थान सम्भव था, अशोक के लेखों में उन्हें ‘धम्म’ कहा गया है। दूसरे तथा सातवें स्तंभ-लेखों में अशोक ने धम्म की व्याख्या इस प्रकार की है, “धम्म है साधुता, बहुत से कल्याणकारी अच्छे कार्य करना, पापरहित होना, मृदुता, दूसरों के प्रति व्यवहार में मधुरता, दया-दान तथा शुचिता।” आगे कहा गया है कि, “प्राणियों का वध न करना, जीवहिंसा न करना, माता-पिता तथा बड़ों की आज्ञा मानना, गुरुजनों के प्रति आदर, मित्र, परिचितों, सम्बन्धियों, ब्राह्मण तथा श्रवणों के प्रति दानशीलता तथा उचित व्यवहार और दास तथा भृत्यों के प्रति उचित व्यवहार।”

  • ब्रह्मगिरि शिलालेख में इन गुणों के अतिरिक्त शिष्य द्वारा गुरु का आदर भी धम्म के अंतर्गत माना गया है। अशोक के अनुसार यह पुरानी परम्परा[1] है।
  • तीसरे शिलालेख में अशोक ने अल्प व्यय तथा अल्प संग्रह का भी धम्म माना है। अशोक ने न केवल धम्म की व्याख्या की है, वरन् उसने धम्म की प्रगति में बाधक पाप की भी व्याख्या की है – चंडता, निष्ठुरता, क्रोध, मान और ईर्ष्या पाप के लक्षण हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इनसे बचना चाहिए।
  • अशोक ने नित्य आत्म-परीक्षण पर बल दिया है। मनुष्य हमेशा अपने द्वारा किए गए अच्छे कार्यों को ही देखता है, यह कभी नहीं देखता कि मैंने क्या पाप किया है। व्यक्ति को देखना चाहिए कि ये मनोवेग – चंडता, निष्ठुरता, क्रोध, ईर्ष्या, मान—व्यक्ति को पाप की ओर न ले जाएँ और उसे भ्रष्ट न करें।

धम्म में प्रवृत्त

कलिंग युद्ध के बाद ही अशोक अपने शिलालेखों के अनुसार धम्म में प्रवृत्त हुआ। यहाँ धम्म का आशय बौद्ध धर्म लिया जाता है और वह शीघ्र ही बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया। बौद्ध मतावलम्बी होने के बाद अशोक का व्यक्तित्व एकदम बदल गया। आठवें शिलालेख में जो सम्भवत: कलिंग विजय के चार वर्ष बाद तैयार किया गया था, अशोक ने घोषणा की- ‘कलिंग देश में जितने आदमी मारे गये, मरे या क़ैद हुए उसके सौंवे या हज़ारवें हिस्से का नाश भी अब देवताओं के प्रिय को बड़े दु:ख का कारण होगा।’ उसने आगे युद्ध ना करने का निर्णय लिया और बाद के 31 वर्ष अपने शासनकाल में उसने मृत्युपर्यंत कोई लड़ाई नहीं ठानी। उसने अपने उत्तराधिकारियों को भी परामर्श दिया कि वे शस्त्रों द्वारा विजय प्राप्त करने का मार्ग छोड़ दें और धर्म द्वारा विजय को वास्तविक विजय समझें। [2]

धम्म के सिद्धांत

धम्म के इन सिद्धांतों का अनुशीलन करने से इस सम्बन्ध में कोई संदेह नहीं रह जाता कि यह एक सर्वसाधारण धर्म है। जिसकी मूलभूत मान्यताएँ सभी सम्प्रदायों में मान्य हैं और जो देश काल की सीमाओं में आबद्ध नहीं हैं। किसी पाखंड या सम्प्रदाय का इससे विरोध नहीं हो सकता। अशोक ने अपने तेरहवें शिलालेख में लिखा है—ब्राह्मण, श्रमण और ग्रहस्थ सर्वत्र रहते हैं और धर्म के इन आचरणों का पालन करते हैं। अशोक के साम्राज्य में अनेक सम्प्रदाय के मानने वाले थे और हो सकता है कि उनमें थोड़ा बहुत विरोध तथा प्रतिद्वन्द्विता का भाव भी रहा हो। उसने सभी सम्प्रदायों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए सदाचार के इन नियमों पर ज़ोर दिया। बारहवें शिलालेख में अशोक में धर्म की सार-वृद्धि पर ज़ोर दिया है, अर्थात् एक धर्म—सम्प्रदाय वाले दूसरे धर्म—सम्प्रदाय के सिद्धांतों के विषय में जानकारी प्राप्त करें, इससे धर्मसार की वृद्धि होगी।

 

नैतिक उत्थान के लिए धम्म का प्रचार

बौद्ध अनुश्रुतियों और अशोक के अभिलेखों से यह सिद्ध नहीं होता कि उसने किसी राजनीतिक उद्देश्य से धम्म का प्रचार किया। तेरहवें शिलालेख और लघु शिलालेख से विदित होता है कि अशोक धर्म परिवर्तन का कलिंग युद्ध से निकट सम्बन्ध है। रोमिला थापर का मत है कि धम्म कल्पना अशोक की निजी कल्पना थी, किन्तु अशोक के शिलालेखों में धम्म की जो बातें दी गई हैं, उनसे स्पष्ट है कि वे पूर्ण रूप से बौद्ध ग्रंथों से ली गई हैं। ये बौद्ध ग्रंथ हैं—दीघनिकाय के लक्खण सुत्त चक्कवत्ती सीहनाद सुत्त, राहुलोवाद सुत्त तथा धम्मपद। इन ग्रंथों में वर्णित धर्मराज के आदर्श से प्रेरित होकर ही अशोक ने धम्म विजय आदर्श को अपनाया। लक्खण सुत्त तथा चक्कवत्ती सीहनाद सुत्त में धम्मयुक्त चक्रवर्ती सम्राट के विषय में कहा गया है कि वह भौतिक तथा आध्यात्मिक कल्याण के लिए प्रयत्नशाल रहता है। ऐसा राजा विजय से नहीं अपितु धम्म से विजयी होता है। वह तलवार के बजाय धम्म से विजय प्राप्त करता है। वह लोगों को अहिंसा का उपदेश देता है। अशोक ने धम्म की जो परिभाषा दी है वह ‘राहुलोवादसुत्त’ से ली गई है। इस सुत्त को ‘गेहविजय’ भी कहा गया है अर्थात ‘ग्रहस्थों के लिए अनुशासन ग्रंथ’। उपासक के लिए परम उद्देश्य स्वर्ग प्राप्त करना था न कि निर्वाण। चक्कवत्ती (चक्रवर्ती) धम्मराज के आदर्श को अपनाते हुए अशोक ने जनसाधारण के नैतिक उत्थान के लिए अपने धम्म का प्रचार किया ताकि वे एहिक सुख और इस जन्म के बाद स्वर्ग प्राप्त कर सकें। इसमें संदेह नहीं कि अशोक सच्चे हृदय से अपनी प्रजा का नैतिक पुनरुद्धार करना चाहता था और इसके लिए वह निरन्तर प्रयत्न शील रहा। वह निस्संदेह एक आदर्श को चरितार्थ करना चाहता था। यही अशोक की मौलिकता है।

अहिंसा का प्रचार

अशोक ने धम्म प्रचार के लिए बड़ी लगन और उत्साह से काम किया। अहिंसा के प्रचार के लिए अशोक ने कई क़दम उठाए। उसने युद्ध बंद कर दिए और स्वयं को तथा राजकर्मचारियों को मानव-मात्र के नैतिक उत्थान में लगाया। जीवों का वध रोकने के लिए अशोक ने प्रथम शिलालेख में विक्षप्ति जारी की कि किसी यज्ञ के लिए पशुओं का वध न किया जाए। ‘इह’ शब्द से यह अनुमान लगाया जाता है कि यह निषेध या तो राजभवन या फिरपाटलिपुत्र के लिए ही था, समस्त साम्राज्य के लिए नहीं। पशु—वध को एकदम रोकना असम्भव था। अतः अशोक ने लिखा है कि राजकीय रसोई में पहले जहाँ सैकड़ों हज़ारों पशु भोजन के लिए मारे जाते थे, वहाँ अब केवल तीन प्राणी—दो मोर और एक मृग मारे जाते हैं, और भविष्य में वे भी नहीं मारे जाएँगे। साथ ही अशोक ने यह भी घोषणा की कि ऐसे सामाजिक उत्सव नहीं होने चाहिए, जिनमें अनियंत्रित आमोद-प्रमोद हो। जैसे—सुरापान, मांस भक्षण, मल्लयुद्ध, जानवरों की लड़ाई आदि। इनके स्थान पर अशोक ने धम्मसभाओं की व्यवस्था की जिनमें विमान, हाथी, अग्निस्कंध, इत्यादि स्वर्ग की झाँकियाँ दिखाई जाती थी और इस प्रकार जनता में धम्म के प्रति अनुराग पैदा किया जाता था। बिहार—यात्राएँ, जिनमें पशुओं का शिकार राजाओं का मूल्य मनोरंजन था, बंद कर दी गई। उनके स्थान पर अशोक ने धम्म यात्राएँ प्रारम्भ कीं। इन यात्राओं के अवसर पर अशोक ब्राह्मणों और श्रवणों को दान देता था। वृद्धों को सुवर्ण दान देता था। व्यक्तिगत उपदेश से आम जनता में धर्म प्रसारण में सहायता मिली।

बौद्ध स्थानों की यात्रा

अशोक ने अनेक बौद्ध स्थानों की यात्रा की, जैसे—बोधगयालुम्बिनी, निगलीसागर आदि। इन धर्म यात्राओं से अशोक को देश के विभिन्न स्थानों के लोगों के सम्पर्क में आने का और धर्म तथा शासन के विषय में लोगों के विचार जानने का अवसर मिला। साथ ही इन यात्राओं से एक प्रकार से स्थानीय शासकों पर नियंत्रण रहता था। अशोक ने राज्य के कर्मचारियों—प्रादेशिक, राजुक तथा युक्तकों को प्रति पाँचवें वर्ष धर्म प्रचार के लिए यात्रा पर भेजा। अशोक के लेखों में इसे अनुसंधान कहा गया है।

बौद्ध धर्म में रुचि का कारण

अशोक के धम्म की विवेचना करते हुए रोमिला थापर ने लिखा है कि कुछ राजनीतिक उद्देश्यों से ही अशोक ने एक नए धर्म की कल्पना की तथा इसका प्रसार किया। चंद्रगुप्त मौर्य के समय शासन के केन्द्रीकरण की नीति सफलतापूर्वक पूरी हो चुकी थी। कुशल अधिकारतंत्र, अच्छी संचार व्यवस्था और शक्तिशाली शासक के द्वारा उस समय साम्राज्य का जितना केन्द्रीकरण सम्भव था, वह हो चुका था। किन्तु केन्द्र का आधिपत्य बनाए रखना दो ही तरह से सम्भव था, एक तो सैनिक शक्ति द्वारा कठोर शासन तथा राजा में देवत्व का आरोपण करके और दूसरे सभी वर्गों से संकलित सारग्राही धर्म को अपनाकर। यह दूसरा तरीक़ा ही अधिक युक्ति संगत था क्योंकि ऐसा करने से किसी एक वर्ग का प्रभाव कम किया जा सकता था और फलतः केन्द्र का प्रभाव बढ़ता। अशोक की यह नीति सार रूप में वही थी जो अकबर ने अपनाई थी। यद्यपि उसका रूप भिन्न था। सिंहासनारूढ़ होने के समय अशोक बौद्ध नहीं था। बाद में ही उसकी बौद्ध धर्म में रुचि बढ़ी क्योंकि उत्तराधिकार युद्ध के समय उसे सम्भवतः कट्टर समुदायों का समर्थन नहीं मिला। अतः बौद्ध धर्म को स्पष्ट रूप में समर्थन देकर उसने उन वर्गों का समर्थन प्राप्त किया जो कट्टर नहीं थे। रोमिला थापर का अनुमान है कि बौद्ध और आजीवकों को नवोदित वैश्य वर्ग का समर्थन प्राप्त था तथा जनसाधारण का इन सम्प्रदायों से तीव्र विरोध नहीं था। इस प्रकार अशोक ने धर्म को अपनाने में व्यावहारिक लाभ देखा। इस नए धर्म या धम्म की कल्पना का दूसरा कारण था छोटी—छोटी राजनीतिक इकाइयों में बंटे साम्राज्य के विभिन्न वर्गों, जातियों और संस्कृतियों को एक सूत्र में बाँधना। इनके साथ-साथ विभिन्न प्रदेशों में सत्ता को दृढ़ करने के लिए यह उपयोग में लाया जा सकता था। महत्त्वपूर्ण यह है कि एक शासक जिसके पास निरंकुश क़ानूनी विधान, विशाल सेना एंव अपरिमित संसाधन हो वह अपने शिलालेखों में स्वयं को नैतिक मूल्यों के विस्तारक के रूप में प्रस्तुत क्यों करता है? वस्तुतः योग्य व कुशल शासकों की नियुक्तियां सदैव साम्राज्य की रक्षा के लिए निर्मित की जाती हैं। बौद्ध धर्म की शिक्षा के केंद्र मगध में जनमानस में शोषण के विरुद्ध व्यापक चेतना थी।

उपगुप्त से मिली प्रेरणा

सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म का प्रचार करने और स्तूपादि को निर्मित कराने की प्रेरणा धर्माचार्य उपगुप्त ने ही दी। जब भगवान बुद्ध दूसरी बार मथुरा आये, तब उन्होंने भविष्यवाणी की और अपने प्रिय शिष्य आनंद से कहा कि कालांतर में यहाँ उपगुप्त नाम का एक प्रसिद्ध धार्मिक विद्वान होगा, जो उन्हीं की तरह बौद्ध धर्म का प्रचार करेगा और उसके उपदेश से अनेक भिक्षु योग्यता और पद प्राप्त करेंगे। इस भविष्यवाणी के अनुसार उपगुप्त ने मथुरा के एक वणिक के घर जन्म लिया। उसका पिता सुगंधित द्रव्यों का व्यापार करता था। उपगुप्त अत्यंत रूपवान और प्रतिभाशाली था। उपगुप्त किशोरावस्था में ही विरक्त होकर बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया था। आनंद के शिष्य शाणकवासी ने उपगुप्त को मथुरा के नट-भट विहार में बौद्ध धर्म के ‘सर्वास्तिवादी संप्रदाय’ की दीक्षा दी थी।

धम्म  परायण अशोक

बौद्ध धम्म ग्रहण करने के पश्चात अशोक ने धर्म प्रचार के लिए बड़ी लगन और उत्साह से काम किया। परन्तु शासन के प्रति वह क़तई उदासीन नहीं हुआ। धर्म परायणता ने उसमें प्रजा के ऐहिक एवं पारलौकिक कल्याण के लिए लगन पैदा की। उसने राजा और प्रजा के बीच पैतृक सम्बन्ध को बढ़ाने पर अधिक बल दिया। कलिंग में अशोक ने कहा है, “सारी प्रजा मेरी संतान है, जिस प्रकार मैं अपनी संतान के ऐहिक और कल्याण की कामना करता हूँ उसी प्रकार, अपनी प्रजा के ऐहिक और पारलौकिक कल्याण और सुख के लिए भी। जैसे एक माँ एक शिशु को एक कुशल धाय का सौंपकर निश्चिंत हो जाती है कि कुशल धाय संतान का पालन-पोषण करने में समर्थ है, उसी प्रकार मैंने भी अपनी प्रजा के सुख और कल्याण के लिए राजुकों की नियुक्ति की है” [3]। वह प्रजा के कार्य करने के लिए सदैव उद्यत रहता था। अपने छठे शिलालेख में उसने यह घोषणा की, “हर क्षण और हर स्थान पर—चाहे वह रसोईघर हो, अंतपुर में हो अथवा उद्यान में—मेरे प्रतिवेदक मुझे प्रजा के कार्यों के सम्बन्ध में सूचित करें। मैं जनता का कार्य करने में कभी भी नहीं आघाता। मुझे प्रजा के हित के लिए कार्य करना चाहिए।” इस प्रकार हम देखते हैं कि राजा के उत्थानव्रत और प्रजाहित आदर्श पर अशोक ने अत्यधिक बल दिया। यही नहीं, अशोक ने राजा के कर्तव्य का एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। राजा प्रजा का ऋणी है, प्रजा के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करके वह प्रजा का ऋण चुकाता है। अशोक के आठवें शिलालेख में तथा मास्की लघु शिलालेख में यह अनुमान लगाया गया है कि अशोक राज्य के विभिन्न भागों में निरीक्षाटन भी करता था। जिससे जनता के सुख—दुःख का सीधे पता लगा सके। पुरुषों और प्रतिवेदकों द्वारा जनसम्पर्क बना रहता था। अपने शासन को अधिक मानवीय बनाने के लिए अशोक ने शासन में कई सुधार किए। सर्वप्रथम प्रशासनिक सुधार यह था कि प्रादेशिक राजुक से लेकर युक्तक तक सभी अधिकारी हर पाँचवें साल (उज्जयिनी और तक्षशिला में हर तीसरे साल) राज्य में निरीक्षाटन के लिए जाते थे। प्रशासनिक कार्य के अतिरिक्त वे धम्म का प्रचार भी करते थे। कलिंग लेख से पता चलता है कि अकारण लोगों को कारावास तथा भय बचाने के लिए प्रत्येक पाँचवें वर्ष महामात्र निरीक्षाटन के लिए भेजे जाते थे। उनका एक कार्य यह भी था कि वे देखें कि नगर न्यायाधीश राजा के आदेश का पालन करें।

अशोक ने अपने राज्य के तेरहवें वर्ष के बाद एक सर्वथा नवीन प्रकार के उच्चाधिकारियों की नियुक्ति की। इन्हें धम्ममहामात्र कहा गया है। इनका प्रमुख कार्य जनता में धर्मप्रसार करना तथा दानशीलता को उत्साहित करना था। किन्तु प्रशासनिक दृष्टि से इनका कार्य यह था—जिन्हें कारावास का दंड दिया गया हो उनके परिवारों को आर्थिक सहायता देना, अपराधियों के सम्बन्धियों से सम्पर्क बनाए रखकर उन्हें सांत्वना देना। इस प्रकार अशोक ने न्याय और दंड में मानवीयता लाने का प्रयास किया। न्याय को दया से मिश्रित करके मृदु बना दिया।

कल्याणकारी कार्य

अशोक व्यावहारिक था। उसने मृत्युदंड को एक दम समाप्त नहीं किया, किन्तु यह व्यवस्था की कि यदि समुचित कारण उपस्थित हों, तो धम्म महामात्र न्यायाधिकारियों से दंड कम करवाने का प्रयत्न करें। जिन अपराधियों को मृत्युदंड दिया गया हो, उन्हें तीन दिन का अवकाश देने की व्यवस्था की गई, ताकि इस बीच उनके सम्बन्धी उनके जीवनदान के लिए (राजुकों से) प्रार्थना कर सकें, और (यदि यह सम्भव न हो सके तो) वे दान-व्रत प्रार्थना के द्वारा परलोक की तैयारी कर सकें। राजुकों को आदेश दिया गया कि अभिहार दंड में एकरूपता हो और पक्षपातरहित हो।

26वें वर्ष में अशोक ने राजुकों, अभिहार तथा दंडकों को स्वतंत्रता दी ताकि ऊपर से बिना हस्तक्षेप के वे आत्मविश्वास के साथ प्रजा का हित कर सकें। ये राजुक सैकड़ों—हज़ारों लोगों के ऊपर शासन करते थे और अशोक ने उन्हें स्वतंत्रता इसलिए दी कि वे निर्वघ्न शासन द्वारा जनता का हित करने में समर्थ हो सकें।

अशोक ने मनुष्यों और पशुओं के लिए चिकित्सालय खुलवाए। जहाँ मनुष्यों और पशुओं के लिए उपयोगी औषधियाँ उपलब्ध नहीं थी वहाँ बाहर से मँगाकर उन्हें लगाया जाता। कंदमूल और फल भी जहाँ कभी नहीं थे, वहाँ बाहर से मँगाकर लगवाए गए। सड़क के किनारे पर पेड़ लगाए गए ताकि मनुष्यों और पशुओं को छाया मिल सके। आठ कोस या 9 मील के फ़ासले पर जगह-जगह कुएँ खुदवाए गए। इसके अलावा अनेक प्याऊ स्थापित किए गए। इस प्रकार अशोक की धर्मपरायणता ने उसे अनेक प्रकार के कल्याणकारी कार्यों के लिए प्रेरित किया। उसका शासन केन्दित होते हुए भी मानवीय था।

 

Blockquote-open.gif सारी प्रजा मेरी संतान है, जिस प्रकार मैं अपनी संतान ऐहिक और कल्याण की कामना करता हूँ उसी प्रकार, अपनी प्रजा के ऐहिक और पारलौकिक कल्याण और सुख के लिए भी। जैसे एक माँ एक शिशु को एक कुशल धाय को सौंपकर निश्चिंत हो जाती है कि कुशल धाय संतान का पालन-पोषण करने में समर्थ है, उसी प्रकार मैंने भी अपनी प्रजा के सुख और कल्याण के लिए राजुकों की नियुक्ति की है”Blockquote-close.gif

– कलिंग में अशोक

 

Blockquote-open.gif धम्म है साधुता, बहुत से कल्याणकारी अच्छे कार्य करना, पापरहित होना, मृदुता, दूसरों के प्रति व्यवहार में मधुरता, दया-दान तथा शुचिता।” आगे कहा गया है कि, “प्राणियों का वध न करना, जीवहिंसा न करना, माता-पिता तथा बड़ों की आज्ञा मानना, गुरुजनों के प्रति आदर, मित्र, परिचितों, सम्बन्धियों, ब्राह्मण तथा श्रवणों के प्रति दानशीलता तथा उचित व्यवहार और दास तथा भृत्यों के प्रति उचित व्यवहार। Blockquote-close.gif

– अशोक

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