मुंबई में 5 अगस्त 2013 को महाबोधी विहार बम धमाकों के विरोध को लेकर बौद्ध भंतेगणोंने छत्रपती शिवाजी टर्मिनल निषेध/विरोध सभा का आयोजन किया


मुंबई में आज, सोमवार, दिनांक ५ अगस्त २०१३ को महाबोधी विहार बम धमाकों के निषेध को लेकर बौद्ध भंतेगणोंने छत्रपती शिवाजी टर्मिनल के पास शांततामय तरीके से निषेध/विरोध  सभा का आयोजन किया.. फोटो में आप देख सकते हो.. बौद्ध भंतेगण तथागत बुद्ध के शिक्षानुरूप अपने क्रोध पर कैसे संयम रखे हुए है…

भारत में बौद्ध/ बहुजन लोगों में सूचन के आदान प्रदान का कोई माध्यम या मीडिया नहीं है,शायद इसीलिए एक साथ भीषण विरोध नहीं हुआ| पर जो भी हो ये अच्छा है की रह रहकर कहीं न कहीं विरोध हो रहे हैं जिससे ये मामला शांत नहीं हो रहा है|

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समयबुद्धा का निम्न विषय उपयुक्त प्रवचन देखिये:

” भले ही मीडिया में हमारा हिस्सा न हो हमारी न चलती हो पर अगर हम कोशिश करें तो हम अपना मीडिया खुद बन सकते हैं, और बनना ही होगा|इसके लिए हर जागरूक बौद्ध/बहुजन अपने आस पास के दस बहुजनों की जिम्मेदारी ले: भगवान् बुद्धा ने कहा है:
“सत्य जानने के मार्ग में इंसान बस दो ही गलती करता है ,एक वो शुरू ही नहीं करता दूसरा पूरा जाने बिना ही छोड़ जाता है ”

यही कारन है की हमारे लोग बौद्ध की तरफ या तो चलना ही शुरू नहीं करते या समझने से पहले ही लौट आते हैं| धम्म का मीडिया इतना शक्तिशाली नहीं है तो धम्म को लगातार प्रचारित रखे,सर्कार के कितने उम्मीद है ये आप सब जानते हो,भले ही हमारा मीडिया में शेयर न हो हम अपना मीडिया खुद बनना होगा|

अगर हम में से हर कोई हमारे समाज के फायदे की बात अपने दस साथिओं जो की हमारे ही लोग हों को मौखिक बताये या SMS या ईमेल या अन्य साधनों से करें तो केवल ७ दिनों में हर बुद्धिस्ट भाई के पास हमारा सन्देश पहुँच सकता है | इसी तरह हमारा विरोध की बात भी 9 वे दिन तक तो देश के हर आखिरी आदमी तक पहुँच जाएगी | नीचे लिखे टेबल को देखो, दोस्तों जहाँ चाह वह राह, भले ही हमारा मीडिया में शेयर न, हो हम अपना मीडिया खुद हैं :
पहला दिन =10
दूसरा दिन =100
तीसरा दिन =1,000
चौथा दिन =10,000
पांचवा दिन =100,000
छठा दिन =1,000,000
साठव दिन =10,000,000
आठवा दिन =100,000, 000
नौवां दिन =1,000,000,000
दसवां दिन =1,210,193,422
हे बहुजनों, हे भारत की संतानों तुमने हजारों साल बहुत दुख सह लिया अब और नहीं आओ हम अपने बौद्ध धम्म में वापस लौट चलें|
अगर हमने अपने इतिहास से सीखकर बौध धम्म के लिए कुछ नए नियम नहीं बनाये तो इतिहास फिर हमें सबक सिखा देगा इसलिए नया नियम हर पूर्णिमा को बौध विहार पर संगठित वंदना का नियम अनिवार्य करना होगा | बौध धर्म में पूर्णिमा का बड़ा महत्व है हमें ये नियम बनाना होगा की कम से कम महीने में एक बार अर्थात पूर्णिमा के दिन अपने निकटतम बौध विहारों पर संगठित होना होगा| ये भारत के 6000 जातियों में बंटे सभी मूलनिवासियों को संगठित करने का बहेतरीन माद्यम है|इसके दो फायेदे होंगे एक तो धार्मिक ज्ञान से जीवन बेहतर होगा दुसरे हमारा संगठन बल साबित होगा |विहारों से हमारे समाज को बढ़ाने वाली नीति को जनसाधारण और जनसाधारण की जरूरतों को ऊपर बैठे अपने समाज के बुद्धिजीवियों तक पहुचाया जा सकेगा| राजनेतिक पार्टी के नाम और चिन्ह तो बदलते रहेंगे पर किसे चुनना है इसका सामूहिक फैसला केवल बौध विहारों पर ही हो पायेगा| इस संगठन के पीछे राजनेतिक पार्टियाँ और हुकुमरान बौद्ध विहारों के चक्कर काटेंगे |ये व्यस्था मीडिया का भी काम करेगी, बहुजन जनता तक वास्तविक सच्चाई पहुचाई जा सकती है, सभी बौद्ध विहारों को मोबाइल और इन्टरनेट से कनेक्ट कर के एक जबरदस्त सूचना नेटवर्क बनाया जा सकता है\ इस नेटवर्क के माध्यम से सभी सुख दुःख सरे बौद्ध/बहुजन समाज में साझा किये जा सकते हैं|

हे बहुजनों केवल विरोधियों के दमन की शिकायत करते मत रह जाओ,वो लोग तो शिकायत नहीं करते|अब समय आ गया है जब नीति बनाओ और उसे कामयाब करो| आंबेडकर संविधान से प्राप्त रहत का सिर्फ मजे मत लेते रहो इस स्वर्णिम समय में खुद को मजबूत करो, अब भी नहीं कर पाए तो क्या इस संविधान के खिलाफत के बाद करोगे?जब हमारे लोग हर पूर्णिमा पर संगठित होने लगेंगे तो अपने आप ही कई नयी नीतियाँ बनने और कामयाब होने लगेंगी| भगवान् बुद्धा ने कहा है:

“अपनी दुर्दशा के लिए दूसरों को उत्तरदायी ठहराने से यह पता चलता है कि व्यक्ति में सुधार की आवश्यकता है,स्वयं को दोषी ठहराने से यह पता चलता है कि सुधार आरंभ हो गया है,और किसी को भी दोषी नहीं ठहराने का अर्थ यह है कि सुधार पूर्ण हो चुका है|”

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