सामाजिक न्याय का महायान…प्रेमकुमार मणि


सामाजिक न्याय का महायान…

संपादकीय 
मैं समझता हूं, महायान से भारत के पढ़-लिखे लोग सुपरिचित हैं। बौद्धदर्शन के विकासक्रम में वहां हीनयान और महायान नाम से दो संप्रदाय विकसित हुए। ‘यान` का मतलब गाड़ी या छकड़ा होता है-जैसे वायुयान। हीनयान मतलब छोटी गाड़ी और महायान मतलब बड़ी गाड़ी।india poverty

बौद्धों के बीच से महायान का विकास अंतत: उनके विनाश का कारण बना। यह समाज के ऊंचे तबके का दर्शन-विलास था। वैचारिक रूप से ये महायानी वर्णाश्रम धर्म के विरोधी थे, किन्तु ये स्वयम् समाज के अनुत्पादक तबके से आते थे। उनकी वैचारिकता धीरे-धीरे अनुत्पादक तबके के अनुकूल होती गयी, बुद्ध के प्रतीत्य समुत्पाद से अनत्यिवाद और अनात्मवाद के जो स्वर फूटते थे, उसे महायानी शून्यवाद तक ले आये। वह शून्यवाद तर्क के रूप में तो खूब कसा हुआ था, लेकिन बौद्ध दर्शन की परिवर्तनकारी चेतना को कुंद करने वाला भी था। इसी शून्यवाद को शंकर ने अद्वैत वेदान्त अथवा मायावाद में परिवर्तित कर मूल बौद्ध दर्शन पर हमला बोल दिया और वेदांत के रूप में फिर से ब्राह्मण धर्म का वर्चस्व स्थापित कर दिया। शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध इसीलिए कहा जाता है। बौद्ध दर्शन पर हमला और उस पर वर्चस्य कोई शाब्दिक या दार्शनिक संग्राम भर नहीं था। इसका नतीजा बौद्धों के कत्लेआम के रूप में सामने आया था।

महायान के उलट बौद्धों के बीच जो हीनयान था उसका संबंध समाज के उत्पादक तबके से ज्यादा था, शंकर ने नेतृत्व में बौद्ध विरोधी जो मुहिम चली उसके कारण इनका नेतृ वर्ग या तो देश छोड़कर बाहर चला गया या मारा गया। महायानियों ने खुद को वर्णाश्रम धर्म में शामिल कर लिया। बचे हीनयानी औघर पंथ में तब्दील हो गये। इनके अनुयायियों ने वर्णाश्रम धर्म में शामिल होने से इनकार कर दिया और प्रतिक्रिया स्वरूप इस्लाम की शरण में चले गये।

लब्बोलुबाब यह कि महायान के विस्तार ने अंतत: बौद्धों को विनाश के रास्ते पर धकेल दिया और वे विनष्ट हो गये। किसी भी पंथ या आंदोलन का महायान उसे विनष्ट करने के लिए ही विकसित होता है।
दु:खद यह है कि इन दिनों सामाजिक न्याय के आंदोलन के बीच से भी एक महायान विकसित होता नजर आ रहा है। कुछ नेता अपना सहजयान पहले ही विकसित कर चुके हैं। इन दोनों अतियों से सामाजिक न्याय के मुख्य संघर्ष को क्षति हुई है। यही कारण है कि सामाजिक न्याय को लेकर सामाजिक या राजनीतिक क्षेत्र में आज कोई गंभीर विमर्श नहीं चल रहा है।

हिन्दी क्षेत्र में सामाजिक न्याय का संघर्ष पहले से ही कमजोर था। इसके कारणों पर विमर्श होना अभी बाकी है। (बुद्ध और कबीर की कर्मभूमि पर आधुनिक जमाने में किसी फुले या आंबेडकर जैसे व्यक्तित्व का न उभरना भी हैरानी की बात है।) राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान छिटपुट संघर्ष की ही सूचनायें मिलती हैं-जैसे बिहार में त्रिवेणी संघ का मामूली-सा संघर्ष। अंगरेजी राज के बाद के दिनों में डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में भी एक संघर्ष की शुरुआत हुई, जिसमें बड़े पैमाने पर लोग जुड़े। लेकिन स्वयम् लोहिया का व्यक्तित्व इतना विरोधाभासी था कि आज यह समझना कठिन है कि वह चाहते क्या थे। अपनी राजनीति को पुख्ता करने के लिए उन्होंने ‘पिछड़ा पावे सौ में साठ` का नारा देकर पिछड़े तबकों से अपनी पार्टी के लिए पर्याप्त समर्थन तो जुटाया, लेकिन ब्राह्मणवादी चिंतन परंपरा पर कोई व्यवस्थित हमला नहीं किया। इसके उलट हिन्दू पौराणिकता के मुख्य पात्रों राम, कृष्ण, शिव आदि की ‘आधुनिक` व्याख्यायें कर उस ब्राह्मणवादी हिन्दुत्व के लिए पिछड़े वर्गों में एक अनुकूलता बनायी जिसके आधार पर वे जनसंघ और कालांतर में ब्राह्मणवादी के साथ जुगलबंदी कर सकें।

लोहिया ने जो समझ विकसित की थी उसके बूते सरकार तो बनायी जा सकती थी कोई आंदोलन विकसित नहीं किया जा सकता था। उनकी मृत्यु के बाद रामस्वरूप वर्मा और जगदेव प्रसाद जैसे नेताओं ने लोहियावादी घेरे को तोड़ा और फुले-आंबेडकरवाद की ओर हाथ बढ़ाने की कोशिश की। यदि आखिरी दिनों में दिये गये कुछ भाषणों को आधार बनाया जाए तो कहा जा सकता है कि कर्पूरी ठाकुर का मोह भी पूरी तरह टूट चुका था। लेकिन इनके अनुयायियों का मोह नहीं टूटा। गांधीवाद लोहियावाद की जकड़न से वे मुक्त नहीं हो सके। एक सुसंगत विचारधारा के अभाव में उन्होंने आरक्षण को ही सामाजिक न्याय का केन्द्रक मान लिया। बिहार और यू.पी. में इनकी सरकारें बनीं, लेकिन ये कुछ खास कर नहीं सके।

हमारी चिंता यहां से शुरू होती है।

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