समयबुद्धा मिशन ट्रस्ट के संस्थापना दिवस 17 अगस्त पर विशेष “समयबुद्धा त्रिक्षमता सूत्र”


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संसार में सबसे शक्तिशाली है किस बुद्धिजीवी व्यक्ति या कौम का  नीति बनाना और सामूहिक रूप से उसे लागू करना, ये तभी संभव है जब वो इस लायक हो उसमें इतनी क्षमता हो| हमारे लोग संगर्ष कर रहे हैं पर उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए की ऐसे संगर्ष पहले भी कई बार हुए हैं पर किसी कूट नीति की भेंट चढ़ गए| संगर्ष जब सफल हो जाता है तो उसका सुख क्षमता और नीति संपन्न बुद्धिजीवी ही ले पता है और संगर्ष करने वाला हाथ मलता रह जाता है| इसलिए केवल संगर्ष करते नहीं रह जाना है हमें अपनी क्षमता इतनी बढ़नी होगी की हम भी  नीति का माहिर हो जाएँ निति बना सकें और लागू कर सकें|ध्यान रहे  नीति समझना,बनाना और सामूहिक रूप से लागू करने से ही हमारे संगर्ष की रक्षा परिणाम स्वरुप हमारी रक्षा हो पायेगी| बहुजन क्षमता बढ़ाना ही समयबुद्धा मिशन है|

क्षमता ही सबकुछ है,केवल क्षमता बढ़ने पर ध्यान दो क्योंकि इस संसार में आपको उतना ही मिलता है जितने की ‘जम्मेदारी’  लेने की क्षमता आप अपने अंदर और अपनी कौम या देश के अंदर विकसित कर लेते हो, ऐसे कुछ भी जो आपकी और आपनी कौम या देश की क्षमता से जयादा आपको  मिल भी जाता है तो वो मुश्किल ही टिक पता है, अगर कुछ चाहिए तो उसकी जम्मेदारी लेने की क्षमता अपने अंदर विकसित करो|अगर आपमें क्षमता नहीं है तो आपके सगे भाई के राजा बनने पर भी आप कोई फायदा नहीं उठा पाएंगे पर यदि आपमें क्षमता है तो आप अपने दुश्मनों से भी फायदा निकाल सकते हैं, इसलिए व्यक्तिगत, सामाजिक और निति क्षमता बढ़ाने में लगे रहो| क्षमता न होने का अर्थ जिन्दगी के नियम से अनभिज्ञ होना है|यही वो कारण हैं जिसके बिना कोई व्यक्ति या समाज एक बंजर भूमि की तरह हो जाता है जिसमे कितनी ही खाद बीज पानी  (विचार, कानूनी और आर्थिक सहायता, मौके आदि) डालो परिणाम कुछ नहीं निकलता| व्यक्तिगत विवेक क्षमता के बिना बहुजनों के लिए जितने भी संसाधन जुटा लो लाभ कुछ नहीं होगा| ये केवल विधिवत शिक्षा से ही संभव है पर उसका हाल तो सभी जानते हैं|

व्यक्तिगत क्षमता बढ़ाना : हजारों साल की गुलामी की वजह से लोगों में जो जंग लग गई है उसको बहुत तेजी से मिटाना होगा,इसका इलाज विधिवत शिक्षा या हुनर सीखने से ही हो पायेगा|हम में से हर किसी को ‘चल रहा है कट रहा है’ की नीति छोड़ कर अपनी मानसिकता और सोच ऐसी बनानी होगी की’ हमें श्रेष्ट बनना’ है| इसके लिए जो भी श्रेष्ट जहाँ भी मिले जैसे भी मिले पाने  का संगर्ष जरी रखना है ,जैसे बेहतरीन खान पान, बेहतरीन ज्ञान विज्ञान अदि जिससे शारीरिक मानसिक और बौद्धिक क्षमता में वृद्धि हो सके|हमारे लोगों को ठीक चुनाव  सीखना होगा|इस विषय पर मेरी पुस्तक “बहुजन क्षमता और जिन्दगी के नियम” में बहुत कुछ मिल जायेगा| उस किताब का मकसद ही बहुजनों की क्षमता बढ़ाना है|हमारे खुद अपनी शैक्षणिक योग्यता, जीवन ज्ञान,शारीरिक क्षमता,व्यक्तिगत धन बल,  दूरद्रिष्टि , समझ, परख, संयम, आत्मनियंत्रण,आत्मविश्वास और इनसे प्राप्त उपलब्धियां और संसाधन  व्यक्तिगत क्षमता के उदाहरण हैं| जिन्दगी के नियम सिद्धांत द्वारा मैंने व्यक्तिगत क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया है|

 कौमी संगठन क्षमता बढ़ाना :व्यक्तिगत क्षमता की रक्षा कौमी संगठन क्षमता से ही होती है| जिस तरह  एक ही मत पिता के चार बच्चे भी एक फैसले पर राजी नहीं हो पाते तो सारे संसार को एक मत होना असंभव है ये व्याहारिक बात है की विभिन्न सम्प्रदाए  और धर्म तो रहेंगे ही| किताबी बातें चाहए कितनी भी कर लो पर ऐसे में अपनी कौम को संगठित और सक्षम करना एक व्यहारिक जरूरत है, उदाहरण के लिए किसी थानेदार को लो जो बहुजन वर्ग से है और उसे थाने में दबंग वर्ग का सिपाही है तो आप बखूबी समझ सकते हैं की किसकी बात में ज्यादा वजन होगा|हमारी अहमियत इस देश में हमारे समाज से तय की जाती है|व्यक्तिगत क्षमता से केवल एक हद तक ही पहुँच सकते हैं उसके बाद और उससे ऊपर जाने के लिए हमे सहयोगी समूह की जरूरत होती है| हमारा अपना समाज हमारा रेडीमेड सहयोगी समूह होता है,अफ़सोस ये है की भारत में समाज जाती के आधार पर बनता है  | वर्णव्यस्था और जातिवाद जैसे भारत विरोधी नीतियों ने हमारे सामने और विकल्प ही क्या छोड़ा है| केवल कहने भर से लोग संगठित नहीं होंगे, इसके लिए झंडा चाहिए, राजनेतिक पार्टी या कोई पंचायत या कोई एजेंडा आदि जैसे झंडे एक समय के बाद अपनी साख खो देते हैं, केवल धर्म ही दीर्घकालिक झंडा है जिसे लिए जनता सदा के लिए संगठित हो जाती है|बहुजनों के लिए बौद्ध धम्म ही सबसे योग्य झंडा है|

 नीति  क्षमता बढ़ाना : व्यक्तिगत और सामाजिक क्षमता की रक्षा कूटनेतिक योजना  की क्षमता द्वारा ही किया जा सकता है | भविष्य का आंकलन और प्लानिंग करके  साझा भविष्य निति  बनाने की क्षमता, ये प्लानिंग व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्थर पर होनी चाहिए | व्यक्तिगत और संगठन क्षमता की रक्षा निति क्षमता द्वारा की जाती है जिसे लागू करने के लिए साम दाम दंड भेद कुछ भी करके बस निति को कामयाब करना होता है |सामाजिक स्थर की प्लानिंग सामाजिक पंचायत या हमारे लिए कहें तो बौद्ध धम्म के झंडे के नीचे होती है |व्यक्तिगत और सामाजिक क्षमता की रक्षा कूटनेतिक योजना की क्षमता द्वारा ही की जा सकती है| कूटनेतिक योजना की क्षमता  असल में ऊपर लिखी हुए दोनों क्षमताओं का ही हिस्सा है पर इसका महत्व तब बढ़ जाता है जब दूसरे लोग हमारी  क्षमता,सुख  और समृधी  को ख़त्म करने के कायावाद में लगे होते हैं|  केवल निति बनाने से कुछ न होगा, निति को लागू करने के लिए बहुजनों में समझ और ज्ञान तो होना ही चाहिए इसके अलावा धन और शक्ति  बल भी चाहिए| धर्म या धम्म क्या है ये असल में पुराने बुद्धिजीवियों का अनुभव होता है जिसके बल पर ऐसी नीतियों का संकलन किया जाता है जिसे आने वाली पीढियां सुरक्षित रहें और लाभान्वित हो| बौद्ध धम्म और उसकी नीतियाँ  से ने केवल बहुजनों का उद्धार होगा अपितु समस्त मानवता का उद्धार होगा|बौद्ध धम्म की नीतियां किसी वर्ग विशेष के लिए ही नहीं हैं ये समस्त मानवता के लिए हैं

पिछले हजारों साल से जब बहुजन इस देश में नर्किये जीवन जी रहे थे तब कोई भगवान् क्यों उनकी मदत करने नहीं आया| क्यों किसी भगवन ने ये नहीं सोचा की ये भी जीव हैं इन्हें भी सुखी रहने का अधिकार है….आज भी जब दलित पर अत्याचार होता है तो क्यों कोई भगवन वह प्रकट होकर उसको नहीं बचाता… अगर इश्वर कुछ है तो वो अपनी और अपनी कौम की क्षमता ही है इसलिए बस क्षमता बढ़ने में लगे रहो| इस दुनिया का एक ही नियम है FITTEST SURVIVES अर्थात  केवल सर्वोत्तम ही जियेगा कमजोर नस्ल को नष्ट होना होगा | संसार में हर किसी का हर कर्म  बस अपने आप के  अस्तित्व को बचाए रखने का वक्ती संगर्ष होता है, ये सारी जद्दोजहद बस नस्लों का संगर्ष है जिसमें क्षमताओं का युद्ध है, जो चलता आया है और चलता रहेगा, इसलिए केवल अपनी क्षमता बढ़ाने पर केन्द्रित रहो|

बौद्ध विचारक, समीक्षक और दार्शनिक मान्यवर धम्मगुरु समयबुद्धा का एक मूल सिद्धांत

2 thoughts on “समयबुद्धा मिशन ट्रस्ट के संस्थापना दिवस 17 अगस्त पर विशेष “समयबुद्धा त्रिक्षमता सूत्र”

  1. hum logo ki stithi aaj bhi nahi badli, bhale hi is desh ne apni tarakki ka pahad khada kar liya ho par sach to ye hai ki hum log aaj bhi sirf RESERVATION tak hi seemit hain, kyunki humne itne samay baad bhi apni capacity nahi increase kari. hum log pehle inke physical ghulaam they, lekin aaj hum maansik ghulaam (mental slave) hain hum loh sab jaante hue bhi aaj inke mandiro mein jaate hain sirf wo log jo badhiya naukri kar rahe hain, general logo ko hum se isliye parhez nahi hai kyunki hum mandir mein apne khoon pasine ki kamai daan mein de rahe hain, hum ye bhi nahi sochte ki ye paisa hamare paas kahan se aaya? ye sab kuchh to sirf hamare babasaheb ka diya hua hi hai, aur baba saheb ne kaha thaa ki jab aap kisi laayak ho jao toh turant buddhism apna lo kyunki buddhism jaisi education is solar system main toh kahi hai bhi nahi. phir bhi log naukri toh baba saheb ke reservation se lete hain lekin prashad jaakar mandir mein baithe hue shamkar to chadhaate hain. har insaan kitna paani kharaab kar raha hai mandiron mein jal chadhaa kar. woh bhi us dharm ke liye jisme sab kuchh kaalpanik hai, lekin hum aaj bhi us dhong ko apna ne ke liye in logo se gaali khaa rahe hain. zabardasti hum apne aap ko hindu kehte hain jabki reality mein hum koi hindu vindu nahi hain. jab inke dharm par aanch aa jati hai toh hum hindu dharm ke abhinn ang ban jaate hain lekin jab hum apne adhikaar maangte hain toh hum achhoot ho jaate hain. kitne hi log aise hain jo roj inse pooja paath karne ke liye pit te rahte hai
    pata nahi hame SHARM KAB AAYEGI ?

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