नारायणा गुरु जी के जन्म दिवस (20-AUG) पर सभी देश्वसियों को हार्दिक शुभकामनायें …. SBMT Team


barayana guru” मेरा इस देश के, ‘बहिष्कृत’ लोगों से इतना ही कहना है कि, वे ‘कष्ट’ उठा कर भी, ‘शिक्षा’ ग्रहण करें / अपने बच्चों को भी, अच्छी ‘शिक्षा’ दिलाएं / सभी लोग ‘ज्ञान’ प्राप्त करें / इसी ‘शिक्षा’ से वे अपने मानव उचित, ‘अधिकारों’ की ‘रक्षा’ कर सकेंगे / जीवन के सभी क्षत्रों में, ‘उत्थान’ कर सकेंगे / ‘अन्धविश्वास’ और ‘अंधश्रधा’ से, ‘लड़ने’ की ‘ताकत’ भी हमें ‘शिक्षा’ और ‘ज्ञान’ से ही प्राप्त हो सकती है / “ ….नारायणा गुरु

barayana guruनारायण गुरु (20अगस्त1854–20 सितम्बर1928) भारत के महान संत एवं समाजसुधारक थे। कन्याकुमारी जिले में मारुतवन पहाड़ों की एक गुफा में उन्होंने तपस्या की थी। नारायण गुरु को उस परम की प्राप्ति गुफा में हुई।

नारायण गुरु का जन्म दक्षिण केरल के एक साधारण परिवार में 1854 में हुआ था। भद्रा देवी के मंदिर के बगल में उनका घर था। एक धार्मिक माहौल उन्हें बचपन में ही मिल गया था। लेकिन एक संत ने उनके घर जन्म ले लिया है, इसका कोई अंदाज उनके माता-पिता को नहीं था। उन्हें नहीं पता था कि उनका बेटा एक दिन अलग तरह के मंदिरों को बनवाएगा। समाज को बदलने में भूमिका निभाएगा।
उस परम तत्व को पाने के बाद नारायण गुरु अरुविप्पुरम आ गये थे। उस समय वहां घना जंगल था। वह कुछ दिनों वहीं जंगल में एकांतवास में रहे। एक दिन एक गढ़रिये ने उन्हें देखा। उसीने बाद में लोगों को नारायण गुरु के बारे में बताया। परमेश्वरन पिल्लै उसका नाम था। वही उनका पहला शिष्य भी बना। धीरे-धीरे नारायण गुरु सिद्ध पुरुष के रूप में प्रसिद्ध होने लगे। लोग उनसे आशीर्वादके लिए आने लगे। तभी गुरुजी को एक मंदिर बनाने का विचार आया। नारायण गुरु एक ऐसा मंदिर बनाना चाहते थे, जिसमें किसी किस्म का कोई भेदभाव न हो। न धर्म का, न जाति का और न ही आदमी और औरत का।

दक्षिण केरल में नैयर नदी के किनारे एक जगह है अरुविप्पुरम। वह केरल का एक खास तीर्थ है। नारायण गुरु ने यहां एक मंदिर बनाया था। एक नजर में वह मंदिर और मंदिरों जैसा ही लगता है। लेकिन एक समय में उस मंदिर ने इतिहास रचा था। अरुविप्पुरम का मंदिर इस देश का शायद पहला मंदिर है, जहां बिना किसी जातिभेद के कोई भी पूजा कर सकता था। उस समय जाति के बंधनों में जकड़े समाज में हंगामा खड़ा हो गया था। वहां के ब्राह्माणों ने उसे महापाप करार दिया था। तब नारायण गुरु ने कहा था – ईश्वर न तो पुजारी है और न ही किसान। वह सबमें है।

दरअसल वह एक ऐसे धर्म की खोज में थे, जहां आम से आम आदमी भी जुड़ाव महसूस कर सके। वह नीची जातियों और जाति से बाहर लोगों को स्वाभिमान से जीते देखना चाहते थे। उस समय केरल में लोग ढेरों देवी-देवताओं की पूजा करते थे। नीच और जाति बाहर लोगों के अपने-अपने आदिम देवता थे। ऊंची जाति के लाेेग उन्हें नफरत से देखते थे। उन्होंने ऐसे देवी-देवताओं की पूजा के लिए लोगों को निरुत्साहित किया। उसकी जगह नारायण गुरु ने कहा कि सभी मनुष्यों के लिए एक ही जाति, एक धर्म और एक ईश्वर होना चाहिए।

काश उस समय उनको बौद्ध धम्म की विचारधारा पता चल गई होती तो वो बहुजन समाज के लिए और भी ज्यादा मदत्गार साबित होते| भारत में सात सौ सात बौद्ध धम्म जो सुप्तावस्था में रहा यही वजह है की बौद्ध विचारधारा होते हुए भी इन सात सौ सालों में जो भी संत हुए उन्होंने बौद्ध धम्म का नाम नहीं लियाइन सात सौ सालों में जो भी संगर्ष बहुजनों ने किया वो बिना झंडे के ही किया इसी किये सभी बहुजन महापुरुष और उनका विचारधारा बिखरे हुए हैं||खेर कोई बात नहीं अब बहुजन बहुत समझदार हो गए हैं उन्होंने आंबेडकर की सहायता से अपना स्थाई झंडा बौद्ध धम्म चुन लिया है और वो अपने चम्म में वापर लौट रहे हैं|धीरे धीरे सभी बहुजन संतों की समस्त वाणी बौद्ध धम्म के झंडे को ही बुलंद करेगी|

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