बहुजन दार्शनिक एक मार्गदर्शक कबीर व् उनका लोटा


kabeer

संत कबीर प्रतिदिन स्नान करने के लिए गंगा तट पर जाया करते थे. एक दिन उन्होंने देखा की पानी काफी गहरा होने के कारण कुछ ब्राह्मणों को जल में घुसकर स्नान करने का साहस नहीं हो रहा है. उन्होंने अपना लोटा मांज धोकर एक व्यक्ति को दिया और कहा की जाओ ब्राह्मणों को दे आओ ताकि वे भी सुविधा से गंगा स्नान कर लें.

कबीर का लोटा देखकर ब्राह्मण चिल्ला उठे–अरे जुलाहे के लोटे को दूर रखो. इससे गंगा स्नान करके तो हम अपवित्र हो जायेंगे.

कबीर आश्चर्यचकित होकर बोले–इस लोटे को कई बार मिट्टी से मांजा और गंगा जल से धोया, फिर भी साफ़ न हुआ तो दुर्भावनाओं से भरा यह मानव शरीर गंगा में स्नान करने से कैसे पवित्र होगा?

सदा ध्यान रखें :

“भारत के बहुजन लोग 6000 से भी ज्यादा जातियों में बिखरे हैं,और अपनी जाती को अपना झंडा मानकर अलग अलग शोषित होते रहते हैं, जब एक जाती पर आपत्ति आती है तो दूसरी चुप बैठती है|इसका एक ही समाधान है की सभी जाती तोड़ो और एक ही पहचान “बौद्ध” हो जाओ|क्योंकि ‘धर्म’ मानव संगठन का एक स्थाई झंडा है, बाकि के झंडे जैसे कोई राजा,कोई दार्शनिक,कोई पंचायत,कोई देवता,राजनेतिक पार्टी अदि समय गुजरने के साथ अपना महत्व खो देते हैं|लोहिया जी न सही कहा है “राजनीती अल्पकालीन धर्म है पर धर्म दीर्घकालिक राजनीती|”…समयबुद्धा

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