यौन कुंठा और भारत … डॉ0 प्रभात टंडन

भारत ने काम को पुरुषार्थ घोषित किया है.वात्स्यायन के काम सूत्र यहीं लिखे गये.लिंग उपासना से लेकर खजुराहो तक यह भूमि काम क्रिया से कुंठित कभी नही रही इस के समस्त देवता गृहस्थ हैं. इंद्र भी अप्सराये रखते हैं और शचि का सम्भोग नही कर पाते.प्रश्न यह है की एक अमेरिकी युवती

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 आरोप से आज धार्मिक बाबा तक ! सभी की एक ही समस्या है- यौन कुंठा. यह कहाँ से आ गयी? काम कुंठा देन है युद्ध प्रिय राजाओं, पंडितो-पुरोहितो, शास्त्रों, और स्मृतियों की. इसमें योगदान मुस्लिम आक्रान्ताओं से लेकर गांधीवादियों तक का है.काम क्रिया चोरी से सभी करते हैं और सामने प्रलाप करते हैं.वर्जना मुक्त समाज एक स्वस्थ समाज होता है.

काम क्रिया की हैसियत लघु शंका से अधिक मात्र इसलिए है क्यूँ की यह सृजन की प्रक्रिया है.अन्यथा इसमें छुपाने जैसा ऐसा क्या है की लोग छुप कर इसमें रत होते हैं?ओशो ने जब इसपर हुंकार भरी थी और परत दर परत काम से राम तक क मानचित्र दिया था तो पंडितों और अखाड़े बाजों की खटिया खड़ी हो गयी धार्मिक बाबा /बापू ने तो एक किताब तक लिख डाली थी उनके खिलाफ. आज खुद बलात्कारी बने भागे हुए फिर रहे हैं.काम का रस स्वीकार होने से इसमें रसजाता रहेगा.

स्त्री- पुरुष एक दुसरे को जाने और आकर्षण ज्यादा देर नही टिकता.हाँ- गर्हित और छुपा हुआ काम कुंठा बन कर विस्फोट करता है.काम का व्यापक प्रशिक्षण हो. कक्षाएं चले .काम को ध्यान और समाधि की भूमिका के रूप में पढाया जाय. सेक्स के हर पहलू पर खुलकर बात हो .वर्जना मुक्ति की तरफ समाज अग्रसर हो.प्रेम करने की स्वतंत्रता हो.फिर यह संग्रहालय की बाते रह जायेंगी. ओशो की देशना को लागू किया जाय. प्रत्येक को ‘सम्भोग से समाधि’ पुस्तकपढना अनिवार्य कर दिया जाय.

प्रभात टंडन

 

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