क्या आपको पता है भारतीय डाक विभाग ने बौद्ध धम्म और भगवान् बुद्ध पर कुछ डाक टिकट जारी किये थे|…Jaywant Khandare

भारतीय डाक विभाग ने बौद्ध धम्म और भगवान् बुद्ध पर कुछ डाक टिकट जारी की थीं|

भारतीय डाक विभाग ने 21 जनवरी 2002 को चार पोस्टल स्टाम्प जारी किये थे|चार रूपए के इन पोस्टल स्टाम्पों में सारनाथ का धम्मिक स्तूप और ग्रिध्कूत पहाड़ी राजगीर को दर्शाया गया है|आठ रूपए के स्टाम्प में कुशीनगर विहार दर्शाया गया हैं जहाँ बुद्धा ने महापरिनिर्वन प्राप्त किया|बौद्ध गया का महाबोधि विहार पंद्रह रूपए के स्टाम्प पर दर्शयागाया है|

इसके आलावा भी हमें पांच रूपए का एक और  स्टाम्प मिला है जो गौतम बुद्धा के महापरिनिर्वान के २५५० वर्ष पूरे होने पर जारी किया गया था

 

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Jaywant Khandare <jkpali020@gmail.com>

बौद्ध धर्म में भिक्षा मांगने को बढ़ावा देना इस धर्म को कमजोर बनाये हुए है|

मुझे  लगता है की बौद्ध धर्म में भिक्षा मांगने को बढ़ावा देना इस धर्म को कमजोर बनाये हुए है|
हमें कुछ ऐसा करना पडेगा जिसे भंते आत्मनिर्भर हों और उन्हें भीक नहीं मंगनी पड़े|
भगवान् बुद्ध ने दान पर गुज़ारा किया क्योंकि तब ये धर्म नहीं फिलोसोफी थी
जिसे लोगों तक पहुचाने के लिए अपना निजी काम छोड़ना पड़ा अर्थात राजपाठ छोड़ना पड़ा|
राजपाठ छोड़ने के बाद जीवन चर्या चलने के लिए भिक्षा पर निर्भर रहना पड़ा |
 
पर आज वैसे स्तिथि नहीं है आज बौद्ध फिलोसोफी ने धर्म का रूप ले लिया है,
और धर्म से ये उम्मीद लगाई जाती है की वो अपने अनुयायिओं को आश्रय और सुरक्षा  देगा|
मेरे हिसाब से सभी बौद्ध अनुयायिओं की हर महीने को पूर्णिमा को बौद्ध विहार में एक ही समय
इक्कठा होना चाहिए, इसके कई फायदे हैं जिनमे से कुछ प्रमुख फायदे हैं :
१. बौद्ध धम्म अनुयायी संगठित होंगे और संगठन अपने मेम्बरों की  रक्षा करेगा
२. बौद्ध भिक्षो को धन दान दिया जाए जो उनके लिए एक तनखा के रूम में पूरे महीने की दिनचर्या के लिए पर्याप्त हो
   उदहारण के लिए १०० लोग यदि १०० रूपत दे तो महीने में १०००० होता है जो बौद्ध भिक्षु की जीवन चर्या के लिए काफी है
   

जहाँ धन होगा वही धर्म को बल मिलेगा, केवल धन से धर्म की रक्षा की जा सकती है |
 
जब धन आने लगेगा तो निकम्मे या कमजोर  बौद्ध भिक्षु की जगह उर्जावान और संगर्ष शील धर्म आचार्य उपलब्ध होंगे| जब  संगर्ष शील धर्म अधिकारी बौद्ध विहार में होंगे तो वहाँ की नीरसता और मुर्दानगी को समाधान होगा और नए लोग आकर्षित होंगे
 
 

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dhamm sahitye

प्रिय बंधुओं मुझे बहुत ख़ुशी है की पिछले एक साल के बौद्ध धम्म के अध्यन के बाद मैंने यह पाया है कि धन्य है डॉ भीमराव आंबेडकर जी जिन्होंने हमें बौद्ध धम्म (धर्म) की राह दिखाई. बौद्ध धर्म एक अत्यंत ही सरल धर्म है जो कि आसानी से मनुष्य का बौद्धिक एवं अध्यात्मिक विकास कर सकता है. इसके लिए मैंने त्रिपिटक और अभिधम्म कोष सहित अन्य प्राचीन बौद्ध साहित्य लोगों को उपलब्ध करने का निश्चय किया है जिससे कि बौद्ध धम्म की शिक्षा प्राप्त हो, धम्म का प्रचार हो और अध्यात्म का भी विकास हो सके. चूँकि यह एक बड़ा सेट है और देश की अलग अलग जगहों से प्राप्त किया गया है इसलिए इसका मूल्य चार से पांच हजार रुपयों के आस पास है. बौद्ध धम्म के सूत्रों को ढाई हजार वर्षों से संभाल कर रखने, उनका हिंदी अनुवाद करने और प्रकाशित करने के विशाल काम को देखा जाए तो यह एक तुच्छ रकम है जो कि एक अमुल्य ज्ञान को उपलब्ध करवाती है. तो आज ही बौद्ध साहित्य का संकलन शुरू करे और स्वयं को और समाज को बुद्ध की शिक्षा से अवगत करे और सबके अध्यात्म का विकास कर के समाज में अपना योगदान दे. खरीदने के लिए संपर्क: निखिल सबलणिया, दिल्ली, मो. 8527533051, 9013306236 sablanian@gmail.com
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बौद्ध धम्म साहित्य में एक तरफ तो लिखा है फलां बात ऐसे है वहीँ कहीं दूसरी तरफ लिखा है फलां बात ऐसे नहीं ऐसे है|आज बौध धम्म की तरफ अग्रसर लोगों की सबसे बड़ी परेशानी ये है की वो किसको सही माने किसको गलत,किसको अपनाएं किसको छोड़ें|बौद्ध धम्म के पतन के लिए न केवल दमन से बल्कि विरोधियों ने भिक्षु बन कर बौद्ध साहित्य में बहुत ज्यादा मिलावट कर दी थी| वही मिलावट का साहित्य आज मार्किट में उपलब्ध है जिसका सार यही बनता है जी जीवन नीरस है कुछ मत करो|असल में बौद्ध धम्म मनुवादी षडियन्त्र और अन्याय के खिलाफ क्रांति है|आप चाहते हैं तो जरूर पढ़िए पर मेरी राए में  सबसे पहले निम्न तीन पुस्तकों का अध्ययन आपको व् आपके परिवार को करना ही चाहिए|ये पुस्तकें आपके घर में होनी ही चाहिए|बाबा साहब आंबेडकर की निम्न तीन पुस्तकों को शुरुआती ज्ञान से लेकर अंतिम रेफरेंस तक मनो :

१. भगवन बुद्धा और उनका धम्म

२. भगवन बुद्धा और कार्ल मार्क्स

३. प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति

इन तीनो पुस्तकों से आगे जाना असल में अपने को धम्म विरोधी मिलावट में फ़साना होगा|इन तीन पुस्तकों की रचना डॉ आंबेडकर ने इसी भटकाव को रोकने के लिए किया है और ये बात उन्होंने खुद कही है|हमें आखिर कहीं किसी बिन्दु पर तो एक मत होना ही होगा वरना विरोधी अपनी चाल चल जायेंगे और हम सही गलत की बहस ही करते रह जायेंगे,अब फैसला आपके हाथ में है …समयबुद्धा

अगर आजादी चाहते हो तो पहले मरना सीखो …Mukesh Chavda

अगर आजादी चाहते हो तो पहले मरना सीखो ll
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एक गांव में एक आदमी अपने प्रिय तोते के साथ रहता था, एक बार जब वह आदमी किसी काम से दूसरे गांव जा रहा था, तो उसके तोते ने उससे कहा – मालिक, जहाँ आप जा रहे हैं वहाँ मेरा गुरु-तोता रहता है. उसके लिए मेरा एक संदेश ले जाएंगे ? क्यों नहीं ! – उस आदमी ने जवाब दिया, मेरा संदेश है, तोते ने कहा – आजाद हवाओं में सांस लेने वालों के नामएक बंदी तोते का सलाम | वह आदमी दूसरे गांव पहुँचा और वहाँ उस गुरु-तोते को अपने प्रिय तोते का संदेश बताया, संदेश सुनकर गुरु-तोता तड़पा, फड़फड़ाया और मरगया | जब वह आदमी अपना काम समाप्त कर वापस घर आया, तो उस तोते ने पूछा कि क्या उसका संदेश गुरु-तोते तक पहुँच गया था, आदमी ने तोते को पूरी कहानी बताई कि कैसे उसका संदेश सुनकर उसका गुरु – तोता तत्काल मर गया था |
यह बात सुनकर वह तोता भी तड़पा, फड़फड़ाया और मर गया | उस आदमी ने बुझे मन से तोते को पिंजरे से बाहर निकाला और उसका दाह-संस्कार करने के लिए ले जाने लगा, जैसे ही उस आदमी का ध्यान थोड़ा भंग हुआ, वह तोता तुरंत उड़ गया और जाते जाते उसने अपने मालिक को बताया – मेरे गुरु-तोते ने मुझे संदेश भेजा था कि अगर आजादी चाहते हो तो पहले मरना सीखो . . . . . . . . बस आज का यही सन्देश कि अगर वास्तव में आज़ादी की हवा में साँस लेना चाहते हो तो उसके लिए निर्भय होकरमरना सीख लो . . . क्योकि साहस की कमी ही हमें झूठे और आभासी लोकतंत्र के पिंजरे में कैद कर के रखती है l

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आज़ादी मुफ्त में नहीं मिलती इसके लिए क़ुरबानी देनी होती है| बाबा साहब आंबेडकर ने कहा है

“वही कौम तरक्की करती है जिसमें क़ुरबानी देने वाले होते हैं क़ुरबानी दो आगे बढ़ो”

क़ुरबानी तो देनी ही पड़ेगी अपनी इच्छा से दोगे तो कौम का भला नहीं तो दलित दमन कर के  जबरदस्ती तो ले ही ली जाती है| क़ुरबानी का मतलब केवल मरना मारना नहीं है बहुत से चीजें है जैसे अपना समय, धन, उर्जा, विचारों का फैलाव, नै नीति बनाना और उसे चलाना,दुनिया की चक चौंध का मोह छोड़कर पढाई करना और जबरदस्त कामयाबी हासिल करना,धम्म प्रचार करना,धम्म और आंबेडकर वाद की किताबें खरीद कर बाटना,बौद्ध सत्संग करवाना,केडर केम्प करवाना,राजनीति में आना,अविहित रहक कौम के लिए धम्म के लिए आगे आना अदि अनेकों ऐसे रास्ते हैं जहाँ से क़ुरबानी दी जा सकती है| बाबा साहब आंबेडकर चाहते तो उनके पास इतनी उची शिक्षा थी की वो अपना जीन बहुत ऐशों आराम से किसी बहुत बड़े ओहदे पर काट सकते थे पर क्योंकि उन्होंने क़ुरबानी दी उनका परिवार दरिद्रता से गुज़रा तब जाकर आज बहुजनों के हालात बदले हैं|