कहानी – बौध धम्म का सार

पो चीन के तांग राजवंश में उच्चाधिकारी और कवि था. एक दिन उसने एक पेड़ की शाखा पर बैठे बौद्ध महात्मा को धर्मोपदेश देते हुए देखा. उनके मध्य यह वार्तालाप हुआ:

पो: “महात्मा, आप इस पेड़ की शाखा पर बैठकर प्रवचन क्यों दे रहे हैं? ज़रा सी भी गड़बड़ होगी और आप नीचे गिरकर घायल हो जायेंगे!”

महात्मा: “मेरी चिंता करने के लिए आपका धन्यवाद, महामहिम. लेकिन आपकी स्थिति इससे भी अधिक गंभीर है. यदि मैं कोई गलती करूंगा तो मेरी ही मृत्यु होगी, लेकिन शासन के इतने ऊंचे पद पर बैठकर आप कोई गलती कर बैठेंगे तो सैंकड़ों-हजारों मनुष्यों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा”.

पो: “शायद आप ठीक कहते हैं. अब मैं कुछ कहूं? यदि आप मुझे बुद्ध के धर्म का सार एक वाक्य में बता देंगे तो मैं आपका शिष्य बन जाऊँगा, अन्यथा, मैं आपसे कभी मिलना नहीं चाहूँगा”.

महात्मा: “यह तो बहुत सरल है! सुनिए. बुद्ध के धर्म का सार यह है, ‘बुरा न करो, अच्छा करो, और अपने मन को शुद्ध रखो’.”

पो: “बस इतना ही!? यह तो एक तीन साल का बच्चा भी जानता है!”

महात्मा: “आपने सही कहा. एक तीन साल के बच्चे को भी इसका ज्ञान होता है, लेकिन अस्सी साल के व्यक्ति के लिए भी इसे कर सकना कठिन है.”

19 Sept 2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- “हमें अपने आप को कहीं भी सीमित नहीं करना चाहिए वर्ना हम कुए के मेडक कि भांति सत्य से अपरिचित रह जायेंगे,परिणाम हमें नुक्सान उठाना पड़ेगा|” …समयबुद्धा

आज पूर्णिमा है तारिख 19 सितम्बर 2013| आज कि धम्म चर्चा का विषय है :-

“हमें अपने आप को कहीं भी सीमित नहीं करना चाहिए वर्ना हम कुए के मेडक कि भांति सत्य से अपरिचित रह जायेंगे,परिणाम हमें नुक्सान उठाना पड़ेगा|”

आज हम देख रहे हैं कि भारत के बहुजन लोग अपने को किसी धर्म विशेष, मान्यता विशेष या गुरु विशेष तक ही सीमित रखना चाहते हैं|पर इससे तो हमारे लोग कुँए के मेडक कि भांति अपने कुँए को ही संसार मानकर सच्चाई से बेसुध हो खतरा मोल ले रहे हैं|अगर वाकई अपना उद्धार करना है तो सारा दर्शन खंगाल डालो यहाँ तक की सभी अन्य धर्म के ग्रन्थ भी पलट डालो और अपने लिए बेहतरीन मार्ग चुन लो| किसी से भी गुरेज न रखो, बौद्ध होने का यही तो मतलब है कि आपकी बुद्धि इतनी विकसित है कि आप अच्छाई और बुराई में फर्क समझ लो|आज जब सरे बहुजन अपने खुद के धर्म बौद्ध धम्म में लौट रहे हैं तो देश के अलग अलग कोने में हमारे लोग अपने को अपने इतिहासिक पुरुषों तक हो सीमित कर रहे हैं| ऐसा करने को दो कारन हैं एक तो हमारे लोगों को अहसास हो गया है कि उनका उद्धार वर्त्तमान धर्म और उसकी व्यस्था से नहीं हो सकता तो वो उसे छोड़ना चाहते हैं|दूसरा क्योंकि वो धर्म छोड़ रहे हैं तो उन्हें नया विकल्प चाहिए, इस विकल्प के रूप में हमारे लोग या तो ईसाइयत पर  गए या इस्लाम पर गए| आजकल हमारे लोग अपने इतिहास पुरुष को चुनकर उसके नाम पर अपना एक अलग कम्युनिटी बना रहे हैं| ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि हमारे लोगों तक बुद्ध का सन्देश पंहुचा ही नहीं, बुद्धा धर्म के विकल्प को वे समझ ही नहीं प् रहे हैं| परिणाम हमारे लोग अनेकों सम्प्रदायों में बाँट गए हैं|  ध्यान दें कि पहले हमारे लोग जातियों में बटे थे  अब सम्प्रदायों में बट गए| इस तरह बात वहीँ कि वहीँ रही हम्मे में आपस में फूट रही पर्णिमां विरोधी हमपर शाशन करने में कामयाब हो रहे हैं|

डॉ आंबेडकर का निम्न कोटेशन देखिये :

“मेरे अध्ययन के मुताबिक भारत देश के संतों ने कभी भी जात और छुआ-छुत को मिटाने के लिए आन्दोलन नहीं चलाया। वो मनुष्यों के बीच के संघर्ष के लिए चिंतित नहीं थे। बल्कि वो (ज्यादा) चिंतित थे मनुष्य और ईश्वर के बीच के सम्बन्ध के लिए। “~डॉ बी .आर. आंबेडकर~ सन्दर्भ:-Annihilation of castes – P-127. Author:- Dr. B.R.Ambedkar

आज हम देख रहे हैं की हमारे बहुत से लोग बहुजन  गुरुओं  ………..तक ही अपने को सीमित रखना चाहते हैं| मैं अपने ऐसे लोगों से अनुरोध करूंगा की बहुजन गुरुओं के दर्शन से थोडा आगे बढिए और  बौद्ध दर्शन को भी समझिये| मानना न मानना बाद की बात है पर खुद को सीमित मत करिए|

जरा सोचिये अगर डॉ आंबेडकर ने बौद्ध धम्म में वापस लौटने को चुना है तो जरूर कोई भला ही होगा|बाबा साहब ने धम्म इसलिए चुन था ताकि उनकी अनुपस्थिथि में उनका काम धम्म करता रहेगा उनके जाने के बाद बहुजनों की तरक्की का सिलसिला नहीं रुकेगा|jano tabi mano

हमारे लोगों की भी क्या गलती उसे तो जो मीडिया ने बता दिया वही मान लिए वो तो  मान कर बैठे हैं की अनीश्वर वाद और अहिंसा ही धम्म की शिक्षा है|

आप खुद सोचो की क्या सिर्फ अहिंसा से दुःख दूर किया जा सकता है अरे हमारे लोग तो पहले ही पिछड़े हैं कमजोर हैं और कमजोर तो पहले ही शील ,करुणा, मैत्री और अहिंसा के मार्ग पर चल रहा है वो चाहकर भी इनके विरुद्ध नहीं जा सकता|भगवान् बुद्ध एक क्रन्तिकारी हैं वो विश्व के पहले क्रन्तिकारी हैं जिन्होंने दुख का मूल कारन गलत सरकारी नीतियाँ, धार्मिक आडम्बर और आर्थिक विषमता (unequal distribution of national income) के खिलाफ न केवल आवाज़ उठाई बल्कि बड़े ही सुनियोजित तरीके से दर्शन ज्ञान और मार्ग खोज जिसके प्रचार प्रसार के लिए बौद्ध भिक्खुओं की फ़ौज खड़ी की| धम्म पूंजीपतियों और शोषकों के के खिलाफ क्रांति है|

सदा ध्यान रहे मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक विषमता (unequal distribution of national income) के खिलाफ जुझने वालों में पहला नाम गौतम बुद्ध का है|यह भारी दुःख का विषय है कि गौतम बुद्ध की छवि एक ऐसे व्यक्ति के रूप चित्रित की गयी है जिसने अहिंसा के धर्मोपदेश के साथ पंचशील का दर्शन दिया है,जबकि सचाई यह है कि वे दुनिया के पहले ऐसे क्रांतिकारी पुरुष थे जिन्होंने आर्थिक विषमता को इंसानियत की सबसे बड़ी समस्या चिन्हित करते हुए समतामूलक समाज निर्माण का युगांतरकारी अध्याय रचा|

बौद्ध धम्म का मकसद बहुत ज्यादा विस्तृत है जिसमें से एक है बहुजन हिताए बहुजन सुखाय है बहुजन का दुःख दूर करना है|पता नहीं हमारे लोग क्यों नहीं समझ रहे की विरोधी धम्म के कमजोर पक्ष को उजागर कर रहे हैं और शक्तिशाली पक्ष को दबा रहे हैं|महामानव बुद्ध और बहुजन गुरुओ दोनों ने जातिवाद और वर्णव्यस्था की बुराई की है और मानव कल्याण को प्राथमिकता दी| हम सभी जानते हैं की बहुजनों का ही नहीं समस्त भारतवर्ष का समस्त मानवता है भला जाती भेद नस्ल भेद और वर्णव्यस्था का दमन करने में हैं| सभी बहुजन गुरुओं ने भी अपने सरे जीवन इसी जातिवाद और वर्णव्यस्था और मनुवाद की खिलाफत की, अपने लेखन या दर्शन में मानव कल्याण के बातें की| बौद्ध धम्म मार्ग में भी जातिवाद और वर्णव्यस्था और मनुवाद की न केवल खिलाफत की बल्कि उसके मुकाबले सम्पूर्ण व्यस्था और कामयाब क्रांति खड़ी की| धम्म ने जीवन की हर पहलों पर व्यस्था दी| हमारे समस्या ये है की धम्म को ठीक से मीडिया में समझाने नहीं दिया जा रहा|

भारत की 80% बहुजन असल में बौध जनता है जिसे विरोधियों ने षडियंत्र के तहत अलग अलग महापुरुष देकर अलग अलग खूंटे से बांध दिया है|इसे हमारे लोग समझ नहीं पा रहे हैं, जब हम बुद्धा की बात करते हैं तो वे वाल्मीकि, रविदास, कबीर अदि की बात करते हैं, निसन्देह ये भी बुद्धा के समतुल्य हैं, पर जब तक हम एक सर्वमान्य सिद्धांत को नहीं पकड़ेंगे एक झंडे के नीचे नहीं आ पाएंगे|आपसे प्रार्थना है की मानो या न मानो पर धम्म को जानो तो सही|

जहाँ अन्य किसी भी गुरु के दर्शन या सन्देश  ईश्वरवादी सिद्धांत के बखान से ऊपर नहीं उठती वहीँ बौद्ध धम्म ने मानव विकास के हर पहलू को छुआ है| जीवन में हर दुःख का न केवल कारन खोज और बताया बल्कि उसका सही निवारण भी बताया है|

“जहाँ धर्म इश्वर को सबसे ऊपर रखता है और दावा करता है की उसी ने सबको बनाया वो ही सब सुख दुःख का जिम्मेवार है, वहीँ धम्म मानता है की इंसान की बुद्धि ने इश्वर को बनाया, हमारे कर्म, प्रकृति और सरकारी नीतियां हमारे सुख दुःख की जिम्मेवार हैं|धम्म ऐसी व्यस्था का पक्षधर है जहाँ मानवता,शांति,विज्ञान,कानून और न्याय को धर्म और इश्वर से भी जरूरी माना जाए|आज का अमबेडकर संविधान इसी बौद्ध सोच पर आधारित है, जरा सोच कर देखो की अगर संविधान किसी कट्टर मानसिकता के व्यक्ति ने लिखा होता तो क्या हाल होता”…समयबुद्धा

हमारी मुक्ति केवल मानव और इश्वर के सम्बन्ध की चर्चा से नहीं होगी|क्या आप कभी ये नहीं सोचते की बौद्ध साम्राज्य के पतन से लेकर आंबेडकर क्रांति के बीच के लगभग दो हजार सालों में कोई भी इश्वर बहुजनों को बचने क्यों नहीं आया, क्यों उस इश्वर ने इतनी सदियों तक अपने मानवों की सुध नहीं ली| इश्वर का सिद्धांत निसंदेह व्यावहारिक रूप से जरूरी है आम जनता कभी ईश्वरवाद को नहीं छोड़ पायेगी पर बौध धम्म में ईश्वरवाद का प्रश्न तो अव्याकृत प्रश्न है| आप मनो या न मानो ये आपकी इच्छा है बौध धम्म मार्ग में इस प्रश्न का कोई महत्व नहीं| इसके आलावा बौध धम्म में बाकि की बहुत से बातें ऐसी हैं जो बहुजन गुरुओं से कहीं ज्यादा आगे का दर्शन ज्ञान और मार्ग उपलब्ध करते हैं| बहुजन गुरुओं को छोड़ना नहीं है बल्कि हमें बस इतना समझना है की उनका ज्ञान जिस भी बिंदु पर संशयात्मक स्तिथि पैदा करता है वहां बुद्धा धम्म ज्ञान हर संशय का संतुस्ठ उत्तर उपलब्ध करता है|बहुजन गुरुओं और बौध धम्म दोनों एक दुसरे के पूरक हैं दोनों ही हमारा मार्गदर्शन करवाते हैं |

अपने आप को कहीं भी सीमित न करो, अगर वाकई अपना उद्धार करना है तो सारा दर्शन खंगाल डालो यहाँ तक की सभी अन्य धर्म के सभी ग्रन्थ भी और तभी आप फैसला कर पाओगे की क्या सही है क्या गलत|

… समयबुद्धा 19 september 2013