गुजरात में 13-अक्टूबर-2013 को एक लाख बहुजन लोगों ने हिन्दू/ब्राह्मण धर्म को छोड़कर वापस अपने बौद्ध धम्म में लौटने की संगठित दीक्षा ली|…राकेश प्रियेदर्शी



back to buddhism in gujratIn Gujarat, thousands of Dalits choose Buddhism for a ‘new identity’

Thousands of Dalits from the state gathered at Patapar village near Junagadh and converted to Buddhism with an aim to “walk on the path of Truth” on Sunday.

Eyewitnesses said that around 5,000 Dalits from Saurashtra and Kutch and other parts of the state attended “Chalo Buddh Ki Aur” event and converted to Buddhism in the presence of Bikhhu Sanghasena, the founder of the Mahabodhi International Medication Centre (MIMC), and leaders of Mahabodhi Society from Sri Lanka.

Jaydev Bapa, a revered figure here, was among the Dalits who converted to Buddhism.

“We seek to walk on the path of Truth. Buddhism preaches equality, brotherhood and non-violence. This change would help develop the community,” Deven Vanvi, convenor of Buddha Diksha Mahotsav Samiti (BDMS), an umbrella organisation of Dalit associations, said.

The BDMS had organised the event.

“We all know what is happening in the society. This will change our identity as individuals. If someone asks us who we are, from now on we shall say we are Buddhists, forsaking the term ‘Harijan’ coined by Mahatma Gandhi for us and uncomfortable feelings associated with it,” Vanvi further said. Tushar Shripal, a member of BDMS, said, “This is a matter of self-respect. Being a Dalit is like living in a constant state of humiliation. The change will give people self-respect and self-pride.”

The organisers claimed that the event was largest of its kind in the state. Dalits from Kodinar, Manavadar, Keshod and Junagadh talukas attended the event with entire community.

“We took inspiration from Dr B R Ambedkar and had been planning the event since this February under the guidance of Jaydev Bapa,” Vanvi added.

Dr Ambedkar, the architect of our Constitution, had converted to Buddhism along with scores of his community members in protest against caste prejudice.

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बौद्ध विहारों पर कैसे कब्ज़ा करके वहां से बौद्धों को भगाया जा रहा है…धम्मउदय जाटव

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दिल्ली में हमारी कोलोनी में बहुजनों ने बहुत मेहनत क़ुरबानी और संगर्ष के बाद कुछ एकड़ पहाड़ी की बेकार कंटीली पथरीली जमीन पर बौद्ध विहार और बाबा साहब की मूर्ती लगाई| धीरे धीरे जब आबादी बढ़ी तो वही जमीन कोलोनी के बीच में आ गई| जब इस जमीन का महत्व और कीमत बढ़ी तो उस इलाके के मनुवादी लोगों की नज़र उसपर गई|आज ये बौद्ध विहार चमारों ने अपनी मूर्खता से खो दिया और बाबा साहब की मूर्ती बाउनड्री से बाहर महत्व हीन सी खड़ी है ये ऐसे हुआ:

१. सबसे पहले तो वहां जो बौद्ध विहार बना वो छोटा सा कमजोर से दो कमरे बनाये गए और बाबा साहब की मूर्ती लगाई गई| इसकी वजह ये रही की हमारे लोगों ने इसको बनाने को दान नहीं देते अगर देते भी हैं तो लेने वाली टीम गबन कर जाती है इस वजह से विश्वास का माहौल ही विकसित नहीं हो पाया|जैसे तसे बाबा साहब की मूर्ती लगाई गयी वो भी लोगों ने तोड़ दी|

२. धीरे धीरे वहां सवर्णों ने उठाना बैठना शुरू कर दिया और वहा की गतिविधियों पर नज़र रखने लगे|इन लोगों ने मौका पाकर बाबा साहब की मूर्ती तोड़ दी फिर हमारे लोगों ने नयी मूर्ती लगाई|इस बात को देखते हुए बहुत मेहनत से दान इकठा किया गया और एक बड़ा हौल बनाया गया| इसपर सवर्णों ने दिल्ली सरकार से शिकायत कर दी और उस हौल को तोड़ दिया गया| आज भी वो वह पर टूटा पड़ा है| इस तरह दान देना भी बेकार हो जाता है क्योंकि सर्कार में बैठे मनुवादी हमारी मेहनत पर पानी फेर देते हैं|

३. फिर जब बहुजनों ने रैली की प्रदर्शन किया तो सरकार ने बौद्ध विहार को बनवाने का आश्वासन दिया| उसे के बाद वहां पर काम शुरू करवा दिया | वहा एक बड़ा हौल बनाया गया पर जब वो बन कर तयार हो गया तो उसे बौद्ध विहार नहीं बनाने दिया गया उसको सार्वजानिक बारात घर घोषित कर दिया गता और उसकी बुकिंग तहसील से होने लगी|

४. फिर हमारे लोगों ने बौद्ध विहार को उन्हीं २ कच्चे कमरों में चलन जारी रखा और वह पर संगर्ष समिति बनाई गयी| इस समिति में वहां का जो गाँव था उसके चमारों ने वहां पर यूपी बिहार एम् पी पंजाब आदि से आये हुए बहुजनों को शामिल नहीं होने दिया गया जबकि इन्हीं लोगों के पास शिक्षा और जनसँख्या और धन था| इन गाँव के चमारों ने कहा की इस बौद्ध विहार पर हम ही राज करेंगे अगर नहीं कर पाए तो चाहे गाँव के सवर्णों को दे देंगे पर बहार से आये चमारों को नहीं देंगे|किसी को उनके राज करने पर अप्पति नहीं थी लोग ये चाहते थे की काबिल और मजबूत लोग ही वहां की समिति की अध्यक्षता करें डरपोक बूढ़े मूर्ख कम्जॊर और गुलामी की मानसिकता वाले लोग इसको बचा नहीं पायेंगे|

५. इसी तरह लड़ाई चलती रही धीरे धीरे हमारे लोगों ने वहां संगर्ष करना कम कर दिया उधर वहां शादी दावतें होने लगी जिससे अन्य जनता का वह पर दखल बहुत ज्यादा बढ़ गया|

६. जैसा की मैंने बताया इतना होने के बावजूद दो कच्चे कमरों में बौद्ध विहार चलता रहा| वहां के सवर्णों ने एक भ्रष्ट बौद्ध भंते को वहा पर बैठा दिया वो वहां पर सभी प्रकार के गंदे काम करने लगा| इससे लोगों की आस्था उस बौद्ध विहार में कम हो गई| तो चमारों ने उस बौद्ध भंते को वहां से मार मार कर भगाया और एक अन्य भंते को वहां पर रखा|

७. जब सवर्णों को पता चला और उन्होंने देखा की ये चाल कामयाब नहीं हुई तो उन्होंने फिर वहां पर उसी कोलोनी के भंगी जो की लड़ने मरने को तयार थे को उस बारात घर की सफाई का ठेका दिलवा दिया| ये भंगी लोग उस बारात घर में सफाई के नाम पर चार पांच हज़ार रुपये की रिश्वत लेते हैं| धीरे धीरे भंगियों ने वह पर कब्ज़ा कर लिए| इन्हि भंगियों ने उस नए बौद्ध भंते को मार कर भगा दिया|

८. सवर्णों की चाल देखो की उन्होंने सीधे बहुजनों जाटव चमारों से टक्कर नहीं ली , भंगी को आगे कर दिया और भागी अपने ही भाइयों से उनका हक़ छीन कर मनुवादियों को दे रहा है|

इस सब से हमें क्या शिक्षा मिलती है|

धर्म या धम्म क्या होता है- ये किसी भी कौम की सुरक्षा नीति होती है| इस घटना से हमें ये शिक्षा भी मिलती है की बौध धम्म की वर्तमान नीतियों से क्द्धर नहीं हो पायेगा| इनमें बदलाब और नयी निति बनानी पड़ेंगी|अगर हम संगठित नहीं, अगर हमारी सरकार नहीं, अगर हम शिक्षित नहीं, अगर हम धम्म दान नहीं करेंगे तो इसी तरह हमसे हमारे मेहनत से प्राप्त उपलब्धियों को छीन लिया जाएगा| जब तक हमारे लोग ये नहींसमझेंगे के केवल अच्छी बातों से हमारा भला नहीं होगा धन का अम्बार लगाना होगा बौद्ध विहारों में तब तक ऐसे ही लुटते पिटते रहोगे|

जरा सोच कर देखो की अगर वहां पर बौद्ध विहार न होकर वह ये संगर्ष किसी मंदिर मस्जिद के लिए हुआ हॊत तो आज वहां बहुत ही आलिशान मंदिर मस्जिद होता और ये बारातघर की तब सरकार को भी जरूरत नहीं लगती

ऐसी स्तिथि लगभग सभी जगह पर है

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some Sayings of Lord Buddha भगवान गौतम बुद्ध के कुछ कथन

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Quote  1  All that we are is the result of what we have thought. If a man speaks or acts with an evil thought, pain follows him. If a man speaks or acts with a pure thought, happiness follows him, like a shadow that never leaves him.

In Hindi :हम जो कुछ भी हैं वो हमने आज तक क्या सोचा इस बात का परिणाम है. यदि कोई व्यक्ति बुरी सोच के साथ बोलता या काम करता है , तो उसे कष्ट ही मिलता है. यदि कोई व्यक्ति शुद्ध विचारों के साथ बोलता या काम करता है, तो उसकी परछाई की तरह ख़ुशी उसका साथ कभी नहीं छोडती
Quote.2:Better than a thousand hollow words, is one word that brings peace.
In Hindi :हजारों खोखले शब्दों से अच्छा वह एक शब्द है जो शांति लाये.
Quote 3 :All wrong-doing arises because of mind. If mind is transformed can wrong-doing remain?
In Hindi : सभी बुरे कार्य मन के कारण उत्पन्न होते हैं. अगर मन परिवर्तित हो जाये तो क्या अनैतिक कार्य रह सकते हैं?
Quote 4: A jug fills drop by drop.
In Hindi : एक जग बूँद बूँद कर के भरता है.
Quote 5 : Do not dwell in the past, do not dream of the future, concentrate the mind on the present moment.
In Hindi :अतीत पे धयान मत दो, भविष्य के बारे में मत सोचो, अपने मन को वर्तमान क्षण पे केन्द्रित करो.

Quote 6 :Health is the greatest gift, contentment the greatest wealth, faithfulness the best relationship.

In Hindi :स्वस्थ्य सबसे बड़ा उपहार है, संतोष सबसे बड़ा धन है, वफ़ादारी सबसे बड़ा सम्बन्ध है
Quote 7 : Just as a candle cannot burn without fire, men cannot live without a spiritual life.

In Hindi :जैसे मोमबत्ती बिना आग के नहीं जल सकती , मनुष्य भी आध्यात्मिक जीवन के बिना नहीं जी सकता.
Quote 8 : Three things cannot be long hidden: the sun, the moon, and the truth.
In Hindi : तीन चीजें जादा देर तक नहीं छुप सकती, सूरज, चंद्रमा और सत्य.
Quote 9 :Work out your own salvation. Do not depend on others.
In Hindi :अपने मोक्ष के लिए खुद ही प्रयत्न करें. दूसरों पर निर्भर ना रहे.
Quote 10 : You will not be punished for your anger, you will be punished by your anger.
In Hindi : तुम अपने क्रोध के लिए दंड नहीं पाओगे, तुम अपने क्रोध द्वारा दंड पाओगे.

Quote 11: An insincere and evil friend is more to be feared than a wild beast; a wild beast may wound your body, but an evil friend will wound your mind.
In Hindi : किसी जंगली जानवर की अपेक्षा एक कपटी और दुष्ट मित्र से ज्यादा डरना चाहिए, जानवर तो बस आपके शरीर को नुक्सान पहुंचा सकता है, पर एक बुरा मित्र आपकी बुद्धि को नुक्सान पहुंचा सकता है.Quote 12:Do not overrate what you have received, nor envy others. He who envies others does not obtain peace of mind.
In Hindi : आपके पास जो कुछ भी है है उसे बढ़ा-चढ़ा कर मत बताइए, और ना ही दूसरों से इर्श्या कीजिये. जो दूसरों से इर्श्या करता है उसे मन की शांति नहीं मिलती.Quote 13:Hatred does not cease by hatred, but only by love; this is the eternal rule.
In Hindi : घृणा घृणा से नहीं प्रेम से ख़तम होती है, यह शाश्वत सत्य है.

Quote 14:He who loves 50 people has 50 woes; he who loves no one has no woes.
In Hindi : वह जो पचास लोगों से प्रेम करता है उसके पचास संकट हैं, वो जो किसी से प्रेम नहीं करता उसके एक भी संकट नहीं है.

Quote 15:Holding on to anger is like grasping a hot coal with the intent of throwing it at someone else; you are the one who gets burned.
In Hindi : क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकडे रहने के सामान है; इसमें आप ही जलते हैं.

Quote 16:However many holy words you read, however many you speak, what good will they do you if you do not act on upon them?
In Hindi : चाहे आप जितने पवित्र शब्द पढ़ लें या बोल लें, वो आपका क्या भला करेंगे जब तक आप उन्हें उपयोग में नहीं लाते?

Quote 17:I never see what has been done; I only see what remains to be done.
In Hindi : मैं कभी नहीं देखता की क्या किया जा चुका है; मैं हमेशा देखता हूँ कि क्या किया जाना बाकी है.

Quote 18:Without health life is not life; it is only a state of langour and suffering – an image of death.
In Hindi : बिना सेहत के जीवन जीवन नहीं है; बस पीड़ा की एक स्थिति है- मौत की छवि है.

Quote 19:What we think, we become.
In Hindi : हम जो सोचते हैं , वो बन जाते हैं.

जो अपने को बौद्ध धम्म की विचारधारा पर चलने वाला कहते है पर असली जिन्दगी में हिन्दुस्म से उबर नहीं पाए है

jano tabi manoजो अपने को बौद्ध धम्म की विचारधारा पर चलने वाला कहते है पर असली जिन्दगी में हिन्दुस्म से उबर नहीं पाए है ,जिनकी आदतें अभी पंचशील धारण नहीं कर पाई है पर मंचों पर सफ़ेद कपडे धारण करके बड़े बड़े भासनबाजी के व्यक्ख्यान देते है दूसरों को ज्ञान बाटते हुए खुद अज्ञानता वाले काम करते ,उनके घरों में महिलाओं से दोयम दर्जे का व्यवहार होता है ,नारी को जो बराबरीका दर्जा नहीं देते ,मंच पर आपने आपको विद्वान् और मंच्शीन लोगों को महाविदवान कहते नहीं थकते ,जो आपने मित्रों के साथ बराबरीका दर्जा न देकर विश्वासघात करते ,चोरी करते ,अपने कुकृत्यों को छिपाने के लिए दूसरों पर आरोप मढ़ते ,जिनका सूरा-सुन्दरी ,धुम्रपान ही साथी है |जो दिन रात दूसरों को नीच दिखाने का कार्य करते ,समाज को धोका देते हुए खुद को समाजवादी बताते ,अपनी चिकनी,चुपड़ी बातों से भोले भाले लोगों को धोका देते ,अपनी मक्कारी भरी सफ़लता से खुश होते ,इनसब दोषों के वावजूद अपने को धम्म का अगुआ घोषित करते ,ऐसे व्यक्तियों मेरी अपील है कि वो धम्म का सही अनुसरण करें | अतः आप अपने बुद्धि विवेक का इस्तेमाल करे किसी के आँख बंद कर फालोवर न बने |

क्योकि तथागत गौतम बुद्ध ने कहा था —

हे कालामो ! आओ सुनो ; तुम किसी बात को केवल इसलिए मत स्वीकार करो कि यह अनुश्रुत है |केवल इसलिए मत स्वीकार करो,कि यह बात परंपरागत है |केवल इसलिए मत स्वीकार करो कि यह बात इसी प्रकार कही गई है | केवल इसलिए मत स्वीकार करो कि यह तर्क संगत है |केवल इसलिए मत स्वीकार करो कि यह हमारे धर्मग्रन्थों के अनुकूल है |केवल इसलिए मत स्वीकार करो कि यह न्याय(शास्त्र) सम्मत है केवल इसलिए मत स्वीकार करो कि आकार प्रकार सुन्दर है |केवल इसलिए मत स्वीकार करो कि कहने वाले का व्यक्तित्व आकर्षण है|केवल इसलिए मत स्वीकार करो कि कहने वाला हमारा पूज्य है |अतः हे कालामो !जब तुम स्वतः के अनुभव से अपने आप ही यह जन लो कि ये बातें अनुकूल है |ये बातें सदोष है |ये बातें विज्ञ पुरषों द्वारा निन्दित है |इन बातों के अनुसार चलने से अहित होता है ,तो हे कालामो ! तुम उन बातों को छोड़ दो 
अतः हे कालामो !जो लोभी है लोभ से अविभूत,जो अ-संयत है |वह प्राणी हत्या भी करता है ,चोरी भी करता है ,परस्त्री गमन (व्याभिचार) भी करता है |झूठभी बोलता है ,दूसरों को भी वैसीकरने कि प्रेरणा देता है जो दीर्घ काल तक उसके अहित का तथा दुःख का कारण होता है 
,तो हे कालामो ! तुम उन बातों को छोड़ दो

साभार –भगवान् बुद्ध और उनका धम्म—लेखक–डॉ बी.आर.अम्बेडकर
संकलन–धम्मसेवा में रत—डॉ.एस.के.राज.–पनकी कानपूर —

साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज – भगतसिंह (1928)

Bhagat_Singh_1929_140x190साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज…भगतसिंह (1928)


1919 के जालियँवाला बाग हत्याकाण्ड के बाद ब्रिटिष सरकार ने साम्प्रदायिक दंगों का खूब प्रचार शुरु किया। इसके असर से 1924 में कोहाट में बहुत ही अमानवीय ढंग से हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। इसके बाद राष्ट्रीय राजनीतिक चेतना में साम्प्रदायिक दंगों पर लम्बी बहस चली। इन्हें समाप्त करने की जरूरत तो सबने महसूस की, लेकिन कांग्रेसी नेताओं ने हिन्दू-मुस्लिम नेताओं में सुलहनामा लिखाकर दंगों को रोकने के यत्न किये।
इस समस्या के निश्चित हल के लिए क्रान्तिकारी आन्दोलन ने अपने विचार प्रस्तुत किये। प्रस्तुत लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में छपा। यह लेख इस समस्या पर शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के विचारों का सार है। – सं.

भारत वर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है। यदि इस बात का अभी यकीन न हो तो लाहौर के ताजा दंगे ही देख लें। किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिन्दुओं को मारा है और किस प्रकार सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह मार-काट इसलिए नहीं की गयी कि फलाँ आदमी दोषी है, वरन इसलिए कि फलाँ आदमी हिन्दू है या सिख है या मुसलमान है। बस किसी व्यक्ति का सिख या हिन्दू होना मुसलमानों द्वारा मारे जाने के लिए काफी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था। जब स्थिति ऐसी हो तो हिन्दुस्तान का ईश्वर ही मालिक है।

ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नजर आता है। इन ‘धर्मों’ ने हिन्दुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है। और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। इन दंगों ने संसार की नजरों में भारत को बदनाम कर दिया है। और हमने देखा है कि इस अन्धविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं। कोई बिरला ही हिन्दू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठण्डा रखता है, बाकी सब के सब धर्म के यह नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रौब को कायम रखने के लिए डण्डे लाठियाँ, तलवारें-छुरें हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सर-फोड़-फोड़कर मर जाते हैं। बाकी कुछ तो फाँसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिये जाते हैं। इतना रक्तपात होने पर इन ‘धर्मजनों’ पर अंग्रेजी सरकार का डण्डा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने आ जाता है।

यहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्रा कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य-स्वराज्य’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं। सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आन्दोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं। जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं। और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।
दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, अखबार वाले हैं। पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था। आज बहुत ही गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक बहुत कम है जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो।
अखबारों का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’
जो लोग असहयोग के दिनों के जोश व उभार को जानते हैं, उन्हें यह स्थिति देख रोना आता है। कहाँ थे वे दिन कि स्वतन्त्राता की झलक सामने दिखाई देती थी और कहाँ आज यह दिन कि स्वराज्य एक सपना मात्रा बन गया है। बस यही तीसरा लाभ है, जो इन दंगों से अत्याचारियों को मिला है। जिसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया था, कि आज गयी, कल गयी वही नौकरशाही आज अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर चुकी हैं कि उसे हिलाना कोई मामूली काम नहीं है।
यदि इन साम्प्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है। असहयोग के दिनों में नेताओं व पत्राकारों ने ढेरों कुर्बानियाँ दीं। उनकी आर्थिक दशा बिगड़ गयी थी। असहयोग आन्दोलन के धीमा पड़ने पर नेताओं पर अविश्वास-सा हो गया जिससे आजकल के बहुत से साम्प्रदायिक नेताओं के धन्धे चौपट हो गये। विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल जरूर होता है। कार्ल मार्क्स के तीन बड़े सिद्धान्तों में से यह एक मुख्य सिद्धान्त है। इसी सिद्धान्त के कारण ही तबलीग, तनकीम, शुद्धि आदि संगठन शुरू हुए और इसी कारण से आज हमारी ऐसी दुर्दशा हुई, जो अवर्णनीय है।
बस, सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है दरअसल भारत के आम लोगों की आर्थिक दशा इतनी खराब है कि एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित करवा सकता है। भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धान्त ताक पर रख देता है। सच है, मरता क्या न करता। लेकिन वर्तमान स्थिति में आर्थिक सुधार होेना अत्यन्त कठिन है क्योंकि सरकार विदेशी है और लोगों की स्थिति को सुधरने नहीं देती। इसीलिए लोगों को हाथ धोकर इसके पीछे पड़ जाना चाहिये और जब तक सरकार बदल न जाये, चैन की सांस न लेना चाहिए।
लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की जरूरत है। गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं। इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथों मंे लेने का प्रयत्न करो। इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जायेंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्राता मिलेगी।
जो लोग रूस का इतिहास जानते हैं, उन्हें मालूम है कि जार के समय वहाँ भी ऐसी ही स्थितियाँ थीं वहाँ भी कितने ही समुदाय थे जो परस्पर जूत-पतांग करते रहते थे। लेकिन जिस दिन से वहाँ श्रमिक-शासन हुआ है, वहाँ नक्शा ही बदल गया है। अब वहाँ कभी दंगे नहीं हुए। अब वहाँ सभी को ‘इन्सान’ समझा जाता है, ‘धर्मजन’ नहीं। जार के समय लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही खराब थी। इसलिए सब दंगे-फसाद होते थे। लेकिन अब रूसियों की आर्थिक दशा सुधर गयी है और उनमें वर्ग-चेतना आ गयी है इसलिए अब वहाँ से कभी किसी दंगे की खबर नहीं आयी।
इन दंगों में वैसे तो बड़े निराशाजनक समाचार सुनने में आते हैं, लेकिन कलकत्ते के दंगों मंे एक बात बहुत खुशी की सुनने में आयी। वह यह कि वहाँ दंगों में ट्रेड यूनियन के मजदूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन् सभी हिन्दू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारखानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के भी यत्न करते रहे। यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे। वर्गचेतना का यही सुन्दर रास्ता है, जो साम्प्रदायिक दंगे रोक सकता है।
यह खुशी का समाचार हमारे कानों को मिला है कि भारत के नवयुवक अब वैसे धर्मों से जो परस्पर लड़ाना व घृणा करना सिखाते हैं, तंग आकर हाथ धो रहे हैं। उनमें इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नजर से-हिन्दू, मुसलमान या सिख रूप में नहीं, वरन् सभी को पहले इन्सान समझते हैं, फिर भारतवासी। भारत के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता है कि भारत का भविष्य सुनहला है। भारतवासियों को इन दंगों आदि को देखकर घबराना नहीं चाहिए। उन्हें यत्न करना चाहिए कि ऐसा वातावरण ही न बने, और दंगे हों ही नहीं।
1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है इसमें दूसरे का कोई दखल नहीं। न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए क्योंकि यह सरबत को मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता। इसलिए गदर पार्टी जैसे आन्दोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़कर फाँसियों पर चढ़े और हिन्दू मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।
इस समय कुछ भारतीय नेता भी मैदान में उतरे हैं जो धर्म को राजनीति से अलग करना चाहते हैं। झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुन्दर इलाज है और हम इसका समर्थन करते हैं।
यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते है। धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें।
हमारा ख्याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताये इलाज पर जरूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमे बचा लेंगे।


आभार : यह फाइल आरोही, ए-2/128, सैक्टर-11, रोहिणी, नई दिल्ली — 110085 द्वारा प्रकाशित संकलन ‘इन्कलाब ज़िन्दाबाद’ (सम्पादक : राजेश उपाध्याय एवं मुकेश मानस) के मूल फाइल से ली गयी है।
Date Written: June 1928
Author: Bhagat Singh
Title: Communal Riots and their Cure ( Sampradayik dangen aur unka illaj)
First Published: in Punjabi monthly Kirti in June 1928.
* Courtesy: This file has been taken from original file of Aarohi Books’ publication Inquilab Zindadad – A Collection of Essays by Bhagat Singh and his friends, edited by Rajesh Upadhyaya and Mukesh Manas.

गर्व करो की आप बौद्ध हो ,बौद्ध धम्म ने भारत को विश्व गुरु बनाया और आगे भी बना सकता है|अरब के मरुभूमि से लेकर मिस्र और ग्रिक तक,यूनान से रोम तक बुद्ध की धम्म वाणी ने लगभग समस्त विश्व की अध्यात्म प्यास बुझाई थी… सत्यजीत मौर्य

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2600 वर्ष पूर्व जम्मुद्विप में एक महान सामाजिक परिवर्तन की क्रान्ति हुई थी, और यह सामाजिक परिवर्तन की क्रान्ति मात्र जम्मुद्विप तक सिमित नहीं थी बल्कि इस सामाजिक परिवर्तन की क्रान्ति ने विश्वमानव जगत के जिवनमुल्यो का विकास किया था और करते आ रहा है ! और इस संसार के सामाजिक परिवर्तन के प्रथम जनक गौतम बुद्ध थे ! भगवान बुद्ध के समय चार प्रमुख सम्प्रदाय हुवा करते थे, श्रमण परम्परा के ‘श्रमण’ और इस परम्परा के वर्धमान महावीर का जैन सम्प्रदाय ! बुद्ध और महाविर स्वय: ‘श्रमण’ समुदाय से थे ! आजीवक सम्प्रदाय के संस्थापक मंखालिपुत्त गोसाल का सम्प्रदाय और पाखंडी कर्मकाण्ड करने वाले वैदिकब्राम्हण सम्प्रदाय के 62 प्रकार के लोग थे ! 2600 वर्ष पुर्व इन सम्‍प्रदायों में हिन्‍दु कोई नहीं थे और भारत की पहचान उस समय जम्मुद्विप की थी ना की हिन्दुस्थान ! इस निर्विवाद सत्य पर विश्वजगत की मोहर लग चुकी है ! सवाल यह है की इन सम्प्रदायों के स्थापको में मात्र बुद्ध के ही धम्‍म को संसार में शीघ्रता के साथ सफलता क्‍यों मिली ? जबकि बुद्ध के समय बुध्‍द को चुनौती देने के लिये अन्य सम्प्रदाय के संस्थापक मैदान में खड़े थे !भगवान बुद्ध स्वयं श्रमण परम्परा के शाक्य संघ से संबन्धी होने से प्रजातंत्र के संघ के प्रति उनकी बहोत बड़ी आस्था थी और सम्यक सम्बोधि प्राप्ति और प्रथम धम्मचक्र के उपदेश के बाद सर्वप्रथम 60 भिक्खुओं का संघ बनाया जिसका आधार लोककल्याण के साथ प्रजातंत्र था ! इन 60 भिक्खुओं को प्रेरणा मिली और देश-विदेशो में बुद्ध के धम्म को जनमानस में सुनाया ! बुद्ध के समय वैदिकवाद की वर्ण व्यवस्था और पाखंडी अंधविश्वास की कुरतियां प्रचलित थी, यज्ञों में ब्राम्हणवर्गों द्वारा पशुबलि दी जाती थी, समाज का विविध पाखंडी कर्मकाण्डो से अन्याय-अत्याचार होते थे, विद्वानों की विद्धवत्ता सूखे रेगिस्थान की तरह विवादों में बित जाती थी, मुक्ति के नाम पर कोरे हठयोग और झूटी तपस्या से जनमानस की मानसिकता को गुलाम और कमजोर किया जाता था, इसका बुद्ध ने प्रबलता से प्रतिकार करने की आवाज सर्वप्रथम सारनाथ में उठाई!बुद्ध के प्रथम धम्मचक्र के वर्षावास समाप्ति के बाद सारनाथ में संघ की स्थापना की और इन सामाजिक बन्धनों की श्रृंखलांयों की बुराईयों को तोड़ने के लिए बुद्ध और उसके संघ के जनआन्दोलन का अनुमोदन करने के लिए मगध के बिम्बीसार, कौसल के प्रसेनजित, अन्वंती के प्रद्दोद, कौसंबी के उदयन, कापिलवस्तु के शाक्य, वैशाली के वज्जि, मल्ल, भग्ग, कोलिय, कुरु, काशी, गांधार राज्यों के साथ अन्य 6 गणराज्यों के महाराजाओं के साथ इनकी रानियाँ, अनाथपिण्डक और समृद्ध व्यापारी, काशी और 18 राज्यों के प्रतिष्ठित नागरिक, राजवैध जीवक, वैशाली के जनपथकल्याणी आम्रपाली, नाई उपाली, चुंद लोहार, और मल्लिका, अभयराज कुमार, ब्राम्हणों का नेता प्रतिभाशाली व्यक्ति सारिपुत्त और महामोगल्यान, महाप्रजापति गौतमी, शयामावती, शियालकोट की खेमा, भाद्रकापिलानी ऐसे शहस्त्रों व्यक्तिय बुद्ध के संघ में शरण आ चुके थे !बुद्ध की सामाजिक परिवर्तन के प्रचार-शैली बहुत रोचक थी, बुद्ध अपने वाणी से किसी भी सम्प्रदायों की आलोचना नहीं करते थे, जनमानस की योग्यता देखकर देशना देते थे और दान देने की प्रेरना देते थे जब की वैदिक कर्मकाण्डो के ब्राम्हण परस्पर गाली-गलौज और आपस में एक दूसरो का अपमान करते थे इसलिए पिछले 2600 सालो से वैदिकब्राम्हणवाद विदेशो में अंश: मात्र मे अपना स्थान नहीं बना सका और जम्मुद्विप के राजा-महाराजा, प्रतिष्टित व्यक्ति, व्यापारियों और जनमानस में अपना स्थान सुनिश्चित नहीं कर सका ! इन सम्प्रदायों का मात्र कुछ हिस्सों में आज जो स्थान है वह मात्र ब्राम्हणवाद की वर्णव्यवस्था के जातियों की वजह से है ! सम्राट अशोक ने बुद्ध के धम्म को राजाश्रय देकर भिक्खु संघ ने बुद्ध के धम्म की ज्ञान की ज्योति गाँव से गाँव, नगर से नगर, प्रांत से प्रांत, देश से लेकर विदेशों में और एक महाद्वीप से लेकर दुसरे महाद्वीप तक उस सम्यक-सम्बोधि के ज्ञान के प्रकाश की ज्योति को जनमानस में प्रकाशित किया और सामाजिक बन्धनों की श्रृंखलांयों की बुराईयों को तोड़कर जातिविहीन सामाजिक समता का विकास किया ! 12वि सदी के बाद सामाजिक बन्धनों की श्रृंखलांयों की बुराईयों को तोड़ने का श्रेय बाबासाहेब डॉ. आम्बेकर को ही जाता है! आज संसार में बुद्ध के धम्म का अनुकरण करने वाले अनुयायियो की संख्या विश्वजगत में दुसरे नम्बर पर है…….

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 अरब के मरुभूमि से लेकर मिस्र और ग्रिक तक, सम्राट अशोक ने  संसार के  सिरमौर प्रबुद्ध भारत के विस्तार का अध्ययन किया तब यह भी देखा की इन देशो में बुद्ध के सार्वभौमिक शिक्षा के कभी दिन थे, मिस्र के ‘थेराप्युतों’ का अपना जीवन भारतीय थेरवादी बौद्ध भिक्खु के परम्परा से बहुत अधिक मिलते थे ! आज इन थेराप्युतों की परम्परा की ‘थेराप्यूटिक्स’ नाम से पाश्चात्य चिकित्सा का एक अंग बन चुकी है! सम्राट अशोक द्वारा भेजे गए यह वही ‘थेरवादी’ भिक्षु थे जिन्होंने धम्म और जीवनमूल्यो को विकसित करने के लिए अरब के मरुभूमि में कभी हलचल मचाई थी ! सोचता हूँ कभी बुद्ध के धम्म का भी अरब के मरुभूमि में स्वर्णिम युग था ! अरब के मरुभूमि के मिस्र में विविध राजवंशो ने चार सहस्त्र वर्षो तक शासन किया यह भी मुझे याद है और अल-अजहर विश्वविद्यालय, की दीवारों पर आज भी सम्राट अशोक का ‘धम्मचक्र’ विधमान है यह इन्ही राजवंशो की देन है ! यह भी ज्ञात होता है की मिस्र का यूनानी राजा टॉल्मीन, भारतीय बौद्ध साहित्यों का अनुवाद कराने के लिए उत्सुक था ! संसार को मिस्र की सांस्कृतिक सभ्यता ने कुछ दिया तो बुद्ध के धम्म वाणी से कभी मिस्र और अरब के मरुभूमि का सितारा चमक रहा था !

संसार के सिरमौर प्रबुद्ध भारत की ग्रीक में कभी प्रतिष्ठा थी, रोम का सितारा भी कभी चमकता था, और संसार की आँखें कभी ग्रीक पर लगी थी ! बड़े बड़े पर्शियन के राजा साईरस, जराक्सिज और डेरियस अपने लाखो अनुयायों ले साथ एथेन्स पर चढ़े चले जाते थे! ग्रीक ने भी एशिया, यूरोप और अफ्रिका केमहाद्वीपों में कभी अपना राजनीतिक तथा सांस्कृतिक प्रसार किया! ग्रीक के गर्भ में कभी सिकंदर भी जन्मा था, जो सीजर और नेपोलियन के लिए आदर्श बना रहा लेकिन सिकंदर को भी चन्द्रगुप्त मौर्य के सौर्य से दो कदम पीछे हटना पड़ा और सैक्युलस ने भी प्रबुद्ध भारत पर अपने पैर रखना चहा तो ध्यान चन्द्रगुप्त मौर्य के वीरता पर गई और अपनी बेटी हेलना को चन्द्रगुप्त मौर्य को दे दिया! सम्राट अशोक के समय बौद्ध भिक्खु प्रचारक सिकन्दरिया पहुच चुके थे और बुद्ध के धरती के व्यापारीयों ने वहा बस्तिया भी बसा ली थी! ब्राम्हण सेनापति पुष्पमित्र शुंग ने बौद्ध सम्राट ब्रहदत मौर्य की हत्या की तो बौद्ध सम्राट मिलिंद राजा ने ब्राम्हण सेनापति पुष्पमित्र शुंग पर हमला किया और ब्राम्हण सेनापति पुष्पमित्र शुंग और पतांजलि जान हथेली पर लेकर भागते हुए उज्जैन आये !

रोम के इतिहास में संसार के सिरमौर प्रबुद्ध भारत का वैभव का भी अध्‍ययन किया और देखा की सम्राट अशोक द्वारा भेजे गए धम्म दूतो में महास्थविर महारक्खित ने बुद्ध के धम्म वाणी से प्यासे यूनानी जगत की प्यास बुझाई थी! सम्राट अशोक के ढाई सौ वर्ष के बाद जुडिया प्रदेश में ईसा का जन्म हुवा और बुद्ध के शिक्षा का प्रभाव स्पष्टता दृष्टी गोचर होता है ! सारे इसाई संसार में रोमनचर्च और लैटिन भाषा का एकछत्र आधिपत्य था ! ईसाईयों का पूजा पाठ, गाथाएँ तथा विहार बौध्‍द संस्‍कृतीसे परस्पर बहुत मिलते है ! रोमन कैथोलिक गिर्जे के युरोपियन यात्री तिब्बत के विहारों में स्पष्ट बैठे थे ! क्लेमेंट, क्रिसोस्टोम आदि और वर्तमान

 

यूरोप के इसाई लेखको का यहाँ तक कहना है की सिकन्दरिया में भारतीय नागरिकों की बस्तिया थी! यह सब प्रमाण स्पष्ट चीख-चीख कर कहते है की सम्राट अशोक द्वारा भेजे गए बौद्ध भिक्खुओं ने रोम साम्रराज्य के दुर्गम घाटियों में, निर्जन वनों में असभ्य मानव जातीयों मे, कुष्टादि व्याधिपीडित जनसमुहों मे, समाज के सर्वथा अपरिचीत व्यंक्तियो में निस्वार्थ और अनवरत सेवा द्वारा, जख्मों और फोंडो की पीप की परव्हा‍ न करते हुये, संपूर्ण आयु में अपने सम्‍बंधियों का मुंह तक न देखे बिना अपना कार्य वहा किया है! —·

बौद्ध धम्म ने भारत को विश्व गुरु बनाया और आगे भी बना सकता है|अरब के मरुभूमि से लेकर मिस्र और ग्रिक तक,यूनान से रोम तक बुद्ध की धम्म वाणी ने लगभग समस्त विश्व की अध्यात्म प्यास बुझाई थी…

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चीनी यात्री ह्वेनसांग जब शाक्यमुनि बुद्ध के धरती पर आये थे तब उत्तर प्रदेश के वर्तमान उन्नाव जनपद की पुरवा तहसील के डौंडिया खेड़ा नामक ग्राम गए थे, और इस डौंडिया खेड़ा नामक ग्राम का उल्लेख अपने यात्रा इतिवृत्त में ‘ओयमुख’ लिखा है। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग साधू के कहने से सोना खोज रही वास्तविक डौंडिया खेड़ा प्राचीन बौद्ध केंद्र है ! और भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग इस सच्चाई को जानता है ! सम्राट अशोक ने इस डौंडिया खेड़ा नगर के पास ही दक्षिण पूर्व में गंगा के किनारे 200 फिट ऊँचा स्तुपो का निर्माण किया था। यहाँ एक अशोक स्तम्भ है जिसे लोग इसे शिवलिंग कहते है वास्तविक यह शिवलिंग न होकर यह अशोक स्तम्भ है ! अलेक्जण्डर कनिंघम ने इसकी पहचान डौंडिया खेड़ा से की है। चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार यहाँ 5 बौद्ध संघाराम थे जिनमें 1000 भिक्षु रहते थे। ये स्थाविरवादी (थेरवादी) थे और उसकी सम्मतिय शाखा को मानते थे। यह वही स्थान था जहां तथागत गौतम बुद्ध ने 3 महीने धर्म का उपदेश दिया था। इसके अतिरिक्त यहाँ पर चार पूर्व बुद्धों के स्मारक भी यात्री ने देखे थे। इसके समीप ही एक दूसरा स्तूप भी था जिसमे भगवान बुद्ध के केश, नख धातु सन्निहित किये गए थे। इस स्तूप के पास एक बड़ा संघाराम था जिसमे यात्री ने 200 बौद्ध भिक्षु देखे थे।डौंडिया खेड़ा जिसका उल्लेख ह्वेनसांग ‘ओयमुख’ के नाम से लिखा है यह संघाराम वास्तविक एक बौद्ध विश्वविद्यालय के रूप में था और इस बौद्ध विश्वविद्यालय में बुद्ध की अनमोल अप्रतिम प्रतिमाये थी! बुद्ध की प्रतिमाये ऐसे थी मानो बुद्ध हमें धम्म देशना दे रहे हो, यह डौंडिया खेड़ा का प्राचीन बौद्ध विश्वविद्यालय विश्वजगत के लिए शिक्षा और साहित्य की दृष्टि से अनमोल खजाना था। इसी बौद्ध विश्वविद्यालय में बैठकर बौद्धाचार्य बुद्धदास ने सर्वास्तिवाद निकाय के महाविभाषा शास्त्र की रचना की थी। चीनी यात्री ह्वेनसांग के प्रामाणिक इतिहास के प्रमाणों को लेकर प्रोफ़ेसर अँगने लाल जी ने अपनी शोधपरक पुस्तक “उत्तर प्रदेश के बौद्ध केंद्र” की पृष्ठ संख्या 209-10 इसकी जानकारी दी है और इस ग्रन्थ को ‘उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान’, लखनऊ, ने 2006 में प्रकाशित किया है।प्राचीन बौद्ध स्थलों के प्रति भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग की भूमिका संधिगत रही है, इस विभाग ने इन स्थलों को लेकर कभी भी बौद्ध संघटनो के साथ कार्य नहीं किया, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग, प्राचीन बौद्ध स्थलों को लेकर ना ही स्वय: विकास करती है और ना ही बौद्ध संघटनो को साथ में लेकर कार्य करती है, इस दृष्टी से भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग की भूमिका बौद्धों के प्राचीन बौद्ध स्थलों के अस्थित्व को मिटाने की भूमिका निभा रही है ! विदेशो में चाहे वह मुस्लिम राष्ट्र या पश्चिम के राष्ट्र या पूर्व एशिया हो या दक्षिण-पूर्व एशिया के राष्ट्र सभी ने प्राचीन बौद्ध स्थलों के विश्व विरासत को संभालकर रखा है! भारत सरकार को इन प्राचीन बौद्ध स्थलों के विकास के लिए सयुक्त राष्ट्र संघ से धन मिलने के बाऊजुद इन स्थलों को बंदी बनाकर रखा है, इन प्राचीन बौद्ध स्थलों के आसपास ब्राम्हणों के मंदिर के निर्माण में खर्च किया गया है, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग की भूमिका प्राचीन बौद्ध स्थलों के अस्थित्व समाप्त करने की है !प्राचीन बौद्ध स्थलों की दशा देखर मन का दर्द उभर आता है | भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग तथा मायावती के शासन के दौरान उ.प्र. राज्य पुरातत्त्व विभाग, उत्तर प्रदेश के प्राचीन बौद्ध स्थलों के विकास के लिए गूंगी, बहरी, अंधी थी! बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर के प्रबुद्ध भारत के सपनो की घोर विरोध करने वाली मायावती सरकार ने कभी इन प्राचीन बौद्ध स्थलों के विकास के लिए बजेट में किसी प्रकार का प्रावधान भी नहीं किया! संसद में इन प्राचीन बौद्ध स्थलों को लेकर सादा सवाल भी नहीं किया की प्राचीन बौद्ध स्थलों के 180 मीटर के अंदर के आसपास के क्षेत्रो में ब्राम्हणों के मंदिर क्यों बन रहे है ? मायावती के गूंगे, बहरे और अंधे संसद सदस्यों ने संसद में कभी यह भी नहीं पूछा की सयुक्त राष्ट्र संघ से प्राचीन बौद्ध स्थलों के विकास लिए प्राप्त हुवा धन संस्कृत विश्व विश्वविद्यालय के विकास के लिए क्यों खर्च किया गया ? भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग, बौद्ध संघटनो का सहयोग लेकर प्राचीन बौद्ध स्थलों का विकास क्यों नहीं करती है ? क्यों पाली-प्राकृत बुद्ध वाणी को संस्कृत में अनुवाद किया जा रहा है ? क्यों प्रबुद्ध भारत के साम्राज्‍य की जनबोली ‘पाली प्राकृत’ राष्ट्रीय भाषा को UPSC से हटाया गया ? ऐसे अनेको सवाल है जिसे अपनों ने ही सत्ता के लालच में रोंधकर दुर्लक्षित किया है!================================================================================

कालिदास का एक नाटक है जिसका नाम है ‘विक्रमोर्वशीय’ और इस संस्कृत शब्द का इतिहासकारो ने ‘विक्रम’ नाम से प्रयोग किया,वास्तविक ‘विक्रमोर्वशीय’ इस संस्कृत शबद का प्रयोग होना चाहिए था ‘विक्रममौर्यवंशीय’। लेकिन प्रयोग हुवाँ काल्पनिक विक्रमादित्य, नाम के राजा से और जनमानस के मन-मानस में ठूस दिया गया। अल बेरुनी एक अरबी यात्री था जिसने भारत में रहकर गणित और ज्योतिविज्ञान और संस्कृत का अध्यन किया था। इनके प्रमाणिकता को आधार माने तो अलबेरुनी की रचनाओं में कहा गया है की हर्ष नाम का राजा था और इन्होने हूणों और शंकों का पराभव किया था, और जिसकी उपाधि विक्रमादित्य थी। बौद्ध प्रमाणित अनुश्रुतियो के अध्यन से यह तो स्पष्ट है की हर्षवर्धन मध्ययुग में बौद्ध सम्राट था और यह विजयवर्धन के वंशोजो में एक था और विजयवर्धन, खोतान का बौद्ध राजा था। सम्राट अशोक का पुत्र कुनाल ने खोतान को बसाया था और कुनाल के परिवार से विजयावर्धन के पारिवारिक सबंध थे।

कहा जाता है की विक्रमादित्य के राजदरबार के नव रत्नों में कालिदास नाम के एक कवी हुवा करते थे। इतिहासकारों ने विक्रमादित्य के एतिहासिकता की खोजबीन की है और स्पष्ट रूप से कहा है की विक्रमादित्य नाम का राजा धरती पर कभी हुवाँ ही नहीं और यह भी स्पष्ट शब्दों में कहा है की विक्रमादित्य यह राजा नहीं बल्कि यह उपाधि का नाम है। इसी प्रकार ईसा की पहली शताब्दी में कनिष्क के राज्यकाल में अश्वघोष नाम के बौद्ध भिक्षु थे, इनकी रचनाएं, कवितायें और काव्यों का प्रभाव जनमानस पर रहा है। और कालिदास के कालनिर्णय में अश्वघोष का उल्लेख है इतिहासकारों का मानना है की कालिदास ने अश्वघोष के रचनाओं की नक़ल की है और विभिन्नय संस्कृत के काव्यों रचनाओं में कालिदास ने अपना नाम गाड़ दिया। इसका प्रमाण कालिदास द्वारा रचित ‘विक्रमोर्वशीय’ के चौथे अंक में पाली-प्राकृत के सुत्त है।

एक फग्युर्सन नाम का विद्वान है, जिन्होंने अल बेरुनी के किताबो का तर्क देकर यह कहा है की विक्रमादित्य यह उपाधि हर्ष की थी। और हर्षवर्धन ने अपने विजय की स्मुर्ती को स्थाई बनाने के लिए एक सवंत (कैलेण्डर) चलाया था। हर्षवर्धन के इतिहासिक सत्य को काल्पनिक रंग देने के लिए वर्धन हटाकर हर्ष रखा गया और हर्षवर्धन के सवंत को विक्रमसवंत सवंत का नाम देकर इसका शून्य बिंदु ईसा पूर्व 57 दिया गया ताकि हर्षवर्धन की एतिहासिक सच्चाई काल्पनिक विक्रमादित्य के नाम से जनमानस में मनमानस में ठुसी जाए ! इस प्रकार से हर्षवर्धन के सवंत को शून्य बिंदु ईसा पूर्व 57 देकर विक्रमसवंत को हर्षवर्धन के कार्यकाल से पीछे धकेला गया इसलिए इस विक्रमसवंत के शून्य बिंदु ईसा पूर्व 57 का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। जैसे बुद्ध निर्वाण सवंत के शून्य बिंदु का आधार बुद्ध का महापरिनिर्वाण दिन है। ऐसा आधार विक्रमसवंत का नहीं है। सम्राट अशोक ने 256 पडाव के रात्री विश्राम बीत चुके है यह रघुनाथ के शिलालेख में कहा है और यह 256 रात्रि माया के कैलेण्डर से 260 दिन के वर्ष से मिलते जुलते है और 256 के रात्रि के पड़ाव के नक्षत्र 9 होते है…….।

डॉ. अमर्त्य सेन ने स्पष्ट कहा है की विक्रमसवंत की आधिकारिक की पुष्टि करना और समय के व्यवहार में इसकी एतिहासिकता के ठोस प्रमाण नहीं है। डॉ. अमर्त्य सेन के प्रमाणों को ठोस प्रमाण मानते है तो यह भी स्पष्ट होता है की आर्य भट्ट जिन्होंने कलिसवंत को चलाया और इस कलिसवंत का शून्य बिंदु 78 ईसवी शंक सवंत का शून्य बिंदु है और यह शून्य बिंदु बौद्ध सम्राट कनिष्क का है, क्योंकि शंक सवंत बौद्ध सम्राट कनिष्क ने सुरु किया था। इस दृष्टी से महास्थविर वज्रबोधी के शिष्य चीनी भिख्कू ई-शिंग जिन्होंने गणित और ज्योतिविज्ञान की रचना की थी और वर्ष की अवधि 365.25636 दिन आकलित किया है। कलिसवंत के निर्माता आर्य भट्ट और विहिरामिर, इन्ही के निर्मित कलिसवंत से यह स्पष्ट होता है की आर्य भट्ट और विहिरामिर यह महास्थविर वज्रबोधी के शिष्य चीनी भिख्कू ई-शिंग के बाद के होते है। समय और तिथिगणना के पुराने पाली-प्राकृत के ग्रन्थ बच पाते तो इन सवंत (कैलेण्डर) की खोजबिन में पता चलता संस्कृत साहित्य की जड़ें गहरी है या नहीं ! कभी-कभी सोचता हूँ की इन काल और तिथिगणना के सवंत (कैलेण्डर) में समय बर्बाद करके कुछ ख़ास व्यवहारीक दृष्टी से जनमानस को लाभ होने वाला नही है। लेकिन इसे एक लाभ है की ब्राम्हणवर्ग के लोगो ने बौद्ध साहित्यों की नक़ल संस्कृत में करके अपने नाम गाड़ दिए है और अपने जन्म तिथियों को बौद्ध सम्राटो के कार्यकाल से पहले धकेला और जनमानस को गुमराह किया यह सत्य है ……..।

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satyejeet maurye

सत्यजीत  मौर्य

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वर्तमान में बौद्ध धम्म की प्रासंगिकता…एस आर. दारापुरी

वर्तमान में बौद्ध धम्म की प्रासंगिकता…एस आर. दारापुरीreligion

आज संसार में हिंसा, धर्मिक उन्माद और नस्लीय टकराव जैसी गंभीर समस्यायों का बोलबाला है. चारों तरफ मानव अस्तित्व को गंभीर खतरे दिखाई दे रहे हैं. एक ओर मानव ने विज्ञान, तकनीकि और यांत्रिकी में विकास एवं उसका उपयोग करके अपार समृद्धि प्राप्त की है, वहीँ दूसरी ओर मानव ने स्वार्थ, लोभ, हिंसा आदि भावनाओं के वशीभूत होकर आपसी कलह, लूट खसूट, अतिक्रमण आदि का अकल्याणकारी और विनाशकारी मार्ग भी अपनाया है. अतः आज की दुनिया में भौतिक सम्पदा के साथ साथ मानव अस्तित्व को भी बचाना आवश्यक हो गया है.

वैसे तो कहा जाता है कि हरेक आदमी अपना कल्याण चाहता है परन्तु व्यवहार में यह पूर्णतया सही नहीं है. यह यथार्थ है कि आदमी अपने कल्याण के साथ साथ अपना नुक्सान भी स्वयं ही करता है जैसा कि आज तक की हुयी तमाम लड़ाईयों, विश्व युद्धों तथा वर्तमान में व्यापत हिन्सा व आपसी टकराहट से प्रमाणित है. अतः आदमी के विनाशकारी विचारों को बदलना और उन पर नियंत्रण रखना बहुत ज़रूरी है. आज से लगभग 2558 वर्ष पहले बुद्ध ने मानवीय प्रवृतियों का विश्लेषण करते हुए कहा था कि मनुष्य का मन ही सभी कर्मों का नियंता है. अतः मानव की गलत प्रवृतियों को नियंत्रित करने के लिए उस के मन में सद विचारों का प्रवाह करके उसे सदमार्ग पर ले जाना आवश्यक है. उन्होंने यह सदमार्ग बौद्ध धम्म के रूप में दिया था. अतः आज मानव-मात्र की कुप्रवृतियों जैसे हिंसा, शत्रुता, द्वेष, लोभ आदि से मुक्ति पाने के लिए बौद्ध धम्म व् बौद्ध दर्शन को अपनाने कि बहुत ज़रुरत है.

आपसी शत्रुआ के बारे में बुद्ध ने कहा था कि ,” वैर से वैर शांत नहीं होता. अवैर से ही वैर शांत होआ है.” यह सुनहरी सूत्र हमेशा से सार्थक रहा है. डॉ. आंबेडकर ने भी कहा था कि हिंसा द्वारा प्राप्त की गयी जीत स्थायी नहीं होती क्योंकि कि उसे प्रतिहिंसा द्वारा हमेशा पलटे जाने का डर रहता है. अतः वैर को जन्म देने वाले कारकों को बुद्ध ने पहचान कर उनको दूर करने का मार्ग बहुत पहले ही प्रशस्त किया था. उन्होंने मानवमात्र के दुखों को कम करने के लिए पंचशील और अष्टांगिक मार्ग के नैतिक एवं कल्याणकारी जीवन दर्शन का प्रतिपादन किया था. यह ऐतिहासिक तौर पर प्रमाणित है कि बौद्ध काल में जब “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” के बौद्ध मार्ग का शासकों और आम जन द्वारा अनुसरण गया तो वह काल सुख एवं समृधि के कारण भारत के इतिहास का “स्वर्ण युग” कहलाया. उस समय शांति और समृधि फैली. इसके साथ ही दुनिया के जिन देशों में बौद्ध धम्म फैला, उन देशों में भी सुख, शांति तथा समृधि फैली. अतः बौद्ध धम्म का पंचशील और अष्टांगिक मार्ग आज भी विश्व में शांति और कल्याण हेतु बहुत सार्थक है.

यह कहा जाता है कि धर्म आदमी का कल्याण करता है परन्तु व्यवहार में यह देखा गया है यह पूर्णतया सही नहीं है. इतिहास इस बात का गवाह है कि संसार मे जितनी मारकाट धर्म के नाम पर हुयी है उतनी मारकाट अब तक की सभी लड़ाईयों और विश्व युद्धों में नहीं हुयी है. यह सब धार्मिक उन्माद, कट्टरपंथी एवं अपने धर्म को दूसरों पर जबरदस्ती थोपने के कारण हुआ है. धर्म के नाम पर तलवार का इस्तेमाल करने से मानव-मात्र का बहुत नुक्सान हुआ है. यह केवल बौद्ध धम्म ही है जो कि तलवार के बूते पर नहीं बल्कि करुना-मैत्री जैसे सद्गुणों के कर्ण संसार के बड़े भूभाग में फैला और आज भी बड़ी तेजी से फ़ैल रहा है. जहाँ एक ओर दूसरे धर्मों को मानने वालों की संख्या लगातार घट रही है और वे अपने अनुयायिओं क बाँध कर रखने के लिए तरह तरह के हथकंडे व आधुनिक प्रचार तकनीक को अपनाने के लिए बाध्य हो रहे हैं, वहीँ बौद्ध धम्म अपनी नैतिकता एवं सर्व कल्याणकारी शिक्षाओं के कारण स्वतः प्रसारित हो रहा है.

यह सर्वविदित है कि हमारा देश एक जाति प्रधान देश है जिस के कारण हमारी आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा सदियों से सभी मानव अधिकारों से वंचित रहा है और आज भी काफी हद तक वंचित है. यह बुद्ध ही थे जिन्होंने जाति-भेद को समाप्त करने के लिए अपने भिक्खु संघ में पहल की. उन्होंने सुनीत भंगी, उपली नाई तहत अन्य कई तथाकथित निचली जातियों के लोगों को संघ में राजा और राजकुमारों की बराबरी का स्थान दिया जिनमे से कई अर्हत बने. बुद्धा ने ही महिलायों को भिक्खुनी संघ में स्थान देकर नारी पुरुष समानता के सिधांत को मज़बूत किया. यद्यपि दास प्रथा तथा जाति भेद पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुआ परन्तु बुद्ध द्वारा वर्ण व्यवस्था तथा उसके धार्मिक आधार पर किया गया प्रहार बहुत कारगर सिद्ध हुआ. डॉ. आंबेडकर ने अपने लेखन में कहा है कि भारत में बौद्ध धम्म का उदय एक क्रांति थी और बाद में ब्राह्मण धर्म कि पुनर्स्थापना एक प्रतिक्रांति थी जिस ने बौद्ध धम्म द्वारा स्थापित सभी मानवीय सामाजिक मूल्यों को पलट कर रख दिया था. फलस्वरूप जाति व्यवस्था एवं ब्राह्मण धर्म को अधिक सख्ती से लागू करने के लिए मनुस्मृति तथा अन्य समृतियों कि रचना करके उन में प्रतिपादित नियमों और विधानों को कठोरता से लागू किया गया.

आज भारत तथा विश्व में जो धार्मिक कट्टरवाद व टकराव दिखाई दे रहा है वह हम सब के लिए बहुत बड़ी चिंता और चुनौती का विषय है. भारत में साम्प्रदायिक दंगों और जातीय जनसंहारों में जितने निर्दोष लोगों की जाने गयी हैं वे भारत द्वारा अब तक लड़ी गयी सभी लड़ाईयों में मारे गए सैनिकों से कहीं अधिक हैं. अतः अगर भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और धर्म निरपेक्षता के संवैधानिक अधिकार को बचाना है तो बौद्ध धम्म के धार्मिक सहिष्णुता, करुणा और मैत्री के सिद्धांतों को अपनाना ज़रूरी है. आज सांस्कृतिक फासीवाद और हिंदुत्ववाद जैसी विघटनकारी विचारधारा को रोकने के लिए बौद्ध धम्म के मानवतावादी और समतावादी दर्शन को जन जन तक ले जाने की ज़रुरत है.
दुनिया में धार्मिक टकरावों का एक कारण इन धर्मों को विज्ञानं द्वारा दी जा रही चुनौती भी है. जैसा कि ऊपर अंकित किया गया है कि विभिन्न ईश्वरवादी धर्मों के अनुयायिओं की संख्या कम होती जा रही है क्योंकि वे विज्ञानं की तर्क और परीक्षण वाली कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं. अतः वे अपने को बचाए रखने के लिए तरह तरह के प्रलोभनों द्वारा, चमत्कारों का प्रचार एवं अन्य हथकंडों का इस्तेमाल करके अपने अनुयायिओं को बांध कर रखना चाहते हैं. उनमे अपने धर्म की अवैज्ञानिक और अंध-विश्वासी धारणाओं को बदलने की स्वतंत्रता एवं इच्छाशक्ति का नितांत आभाव है. इस के विपरीत बौद्ध धम्म विज्ञानवादी, परिवर्तनशील तथा प्रकृतवादी होने के कारण विज्ञानं के साथ चलने तथा ज़रूरत पड़ने पर बदलने में सक्षम है. इन्हीं गुणों के कारण डॉ. आंबेडकर ने भविष्यवाणी की थी कि,” यदि भविष्य की दुनियां को धर्म की ज़रुरत होगी तो इसको केवल बौद्ध धम्म ही पूरा कर सकता है.” उनका भारत को पुनः बौद्ध्मय बनाने का सपना भी था. अतः हम निस्संकोच कह सकते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में बौद्ध धम्म एवं बौद्ध दर्शन पूर्णतया प्रासंगिक है.

 

S R DARAPURI

एस आर. दारापुरी