जेएनयू में मनाया गया महिषासुर का शहादत दिवस| इतिहास में जो छल करते रहे उन्हीं को देवत्व का तमगा मिल गया है और जिन्होंने अपनी सारी उर्जा समाज सुधार और वंचित तबकों के उत्थान के लिए झोंक दी, उन्हें असुर या राक्षस करार दे दिया गया


Mahishasuraजेएनयू में मनाया गया महिषासुर का शहादत दिवस

 

http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2013-10-17/delhi/43143194_1_mahishasur-day-all-india-backward-students-aryans

जेएनयू में पहली बार 25 अक्टूबर 2011 को ‘महिशासुर शहादत दिवस’ मनाया गया। 2013 का यह आयोजन शहादत दिवस की तीसरी वर्षगांठ होगी। विरोध और स्वीकार से गुजरते हुए इस वर्श देश के अलग-अलग60 जगहों पर महिशासुर शहादत दिवस का मनाया जाना अप्रत्याषित ही है। दरअसल, महिशासुर का प्रश्‍न देश के 85फीसदी पिछड़ों-दलितों और आदिवासियों के पहचान से जुड़ा हुआ है। अपनी जड़ों की तरफ लौट रहे हैं, अपने नायकों को इतिहास में तलाश रहे हैं। इतिहास का बहुजन पाठ अभी बाकी है।
महिशासुर-दुर्गा विवाद: 2011 के दशहरा के मौके पर ‘ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम’ ने ‘फारवर्ड प्रेस’ में प्रकाशित प्रेमकुमार मणि का लेख ‘किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन’ के माध्यम से जेएनयू छात्र समुदाय के बीच विमर्श के लिए महिशासुर के सच को सामाने लाया। दुर्गा ने जिस महिशासुर की हत्या की, वह पिछड़ा वर्ग का न्यायप्रिय और प्रतापी राजा था। आर्यों ने छलपूर्वक इस महाप्रतापी राजा की हत्या दुर्गा नामक कन्या के हाथों करवाई। जेएनयू मेंजारी इस पोस्टर को लेकर संघी-सवर्ण छात्रों ने बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम के छात्रों के साथ मारपीट की। इस प्रकरण में जेएनयू प्रशासन ने ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम के अध्यक्ष जितेंद्र यादव को धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में नोटिस जारी किया। लगभग 1 महीने तक चले इस विवाद में अंततः पिछड़े वर्ग के छात्रों की जीत हुई। देश के बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और राजनेताओं के दबाव में जेएनयू प्रशासन ने एआईबीएसएफ से लिखित रूप में मांफी मांगते हुए कहा कि जितेंद्र यादव के खिलाफ कोई प्रॉक्टोरियल जांच नहीं चल रही है। इस जीत से उत्साहित पिछड़े वर्ग के छात्रों ने 25 अक्टूबर 2011 को जेएनयू परिसर में महिशासुर शहादत दिवस मनाया। इस बार देश के 60 से अधिक जगहों पर महिशासुर शहादत दिवस का आयोजन हो रहा है।
इतिहास में महिशासुर:जब भारत पर आर्यों का हमला हुआ उस समय महिशासुर बंगाल-बिहार-उडी़सा के राजा थे। गंगा का दोआब होने के कारण बंगाल-बिहार-उडी़सा की जमीन बहुत उपजाऊ थी। आर्य इस पर कब्जा करना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने 7 बार आक्रमण किया और हर बार परास्त हुए। ‘बल नहीं तो छल, छल का बल’ अंत में आर्यों ने छलपूर्वक महिशासुर की हत्या का शड्यंत्र रचा। हिन्दू धर्मषास्त्रों के अनुसार दुर्गा नामक कन्या 8 दिन तक महिशासुर के भवन में रही और 9वें दिन उनकी हत्या कर दी। चुंकी महिशासुर ने स्त्रियों और पशुओं पर हाथ नहीं उठाने काप्रण किया था। उस समय के अनार्य समाज में स्त्रियों से युद्ध करना और पशुओं का वध परंपरा के विरूद्ध था। दुर्गा ने इसी का फायदा उठाया और महिशासुर की हत्या कर दी और उत्तर भारत पर आर्यों का कब्जा हो गया। अब बारी महिशासुर को उनके ही लोगों के बीच बदनाम करने की थी। क्योंकि आर्य को यह भय था कि महिशासुर के लोग उन पर कभी भी हमला कर सकते हैं और आमने-सामने की लड़ाई में आर्यों की हार सुनिश्‍चित है। एक बार फिर छल का सहारा। महिशासुर को बदनाम करने के लिए बड़े पैमाने पर उनकी हत्या के जश्‍न मनाए गए औरअनार्य के मन में उनके खिलाफ घृणा भरी गई। हत्या जश्‍न के पीछे के शड्यंत्र को समझना होगा। इस प्रकार आने यहां के मूल निवासियों को मानसिक रूप से गुलाम बना लिया और यह प्रक्रिया आज भी चल रही है। जातियों मेंविभक्त कर यहां के मूल निवासियों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से असक्त बना दिया गया। महिशासुर दुर्गा युद्ध दरअसल आर्य-अनार्य, ब्राम्हण-शु्द्र, सवर्ण-अवर्ण, निम्न-और उच्च जाति और देव-दानव का युद्ध था।
असुरः भारत के मूल निवासी: संस्कृति और भाषा कैसे किसी समाज पर कैसे वर्चस्व स्थापित करती है, हिन्दू/आर्य/देव/ब्राम्हण संस्कृति इसका सर्वश्रेष्‍ट उदाहरण है। असुर/दैत्य/राक्षस आदि शब्दों में घृणा भरे गए। असूर/दैत्य/राक्षस से यहां के मूल निवासी भी घृणा करने लगे। जबकि ये शब्द ब्राम्हण संस्कृति के शब्दों के विपरीतार्थक हैं। असुर अर्थात् जो सुर नहीं है। जो देवता नहीं है वह दानव है। जो आर्य नहीं वह अनार्य है। जबकि अर्थ लगाया गया कि देवता अच्छे हैं और दानव खराब हैं। आर्य अच्छे हैं और अनार्य बुरे हैं। इतिहास में देवताओं/आर्यों और सुरों ने हमेशा बुरा काम किया है। फिर भी वे अच्छे हैं जबकि असुरों ने एक भी मानवता विरोध काम नहीं किए। वे अपने और अपनेमूलनिवासियों की रक्षा में संघर्ष किए और छलपूर्वक मारे गए। आज की भाषा में असुर का तात्पर्य इस देष का दलित-पिछड़ा-आदिवासी है। समुद्र मंथन में जो लोग सांप की पूंछ की तरफ से उन्हें अमृत मिला और जो लोग मुंहकी तरफ थे उन्हें विष। यही है आर्यों का न्याय, देवताओं और सवर्णों का न्याय! आजादी के आंदोलन में भी जिन्होंने जान दी उन्हें क्या मिला? 50 वर्षो के बाद बधिया 27 प्रतिशत आरक्षण। सत्ता-संस्‍थानों और संसाधनों पर एकछत्र सवर्णों का कब्जा है। असुरों/पिछड़ों के हक की लड़ाई लड़ने वालों को आज भी दमन किया जा रहा है, बदनाम किया जा रहा है। जिसके कारण हमारे नेता पिछड़ों का नाम लेने से कतराने लगे हैं।
महिशासुरः पिछड़ों के नायक: देश के विभिन्न हिस्सों में कई जातियां महिशासुर को अपना नायक मानती हैं। बंगाल के पुरूलिया जिले में महिशासुर की पूजा होती है और मेला लगता है। वहां के लोग महिशासुर को अपना पूर्वज मानते हैं। झारखंड में असुर जनजाति के लोग अपने को महिशासुर का वंशज मानते हैं। कवयित्री सुषमा असुर ने ‘फारवर्ड प्रेस’के साथ साक्षात्कार में कहा था-‘देखो मैं महिशासुर की वंशज हूं।’ झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन भी महिशासुर को अपना पूर्वज मानते हैं। शिबू सोरेन ने रावण को अपना पूर्वज बताते हुए पुतला दहन से इनकार कर दिया था।मध्यप्रदेश में रहने वाली कुछ जनजातियां महिशासुर को अपना पूर्वज मानती है। 2008 में ‘यादव शक्ति’ पत्रिका नेदावा किया था कि महिशासुर पषुपालक जातियों के नायक थे। पत्रिका का आवरण कथा ही था-‘यदुवंश शिरोमणि महिशासुर।’
हत्या के जश्‍न दशहरा को प्रतिबंधित किया जायःअब जब यह साबित हो गया है कि यहां के मूल निवासियों (पिछड़ा-दलित-आदिवासी) के राजा थे तब उनकी हत्या के जश्‍न के रूप में दशहरा मनाने से मूलनिवासियों की भावनाएं आहत होती हैं। वैसे भी दुनिया केसबसे बड़े लोकतंत्र में किसी की हत्या का जश्‍न मनाना कहां तक जायज है? हम भारत के राष्‍ट्रपति, प्रधानमंत्री औरसवर्ण की पक्षधर सुप्रीम कोर्ट से मांग करते हैं कि दशहरा पर रोक लगाई जाय। हम सामाजिक न्याय की पक्षधरशक्तियों से महिशासुर के पक्ष में खड़े होने की अपील करते हैं। 17 अक्टूबर, 2013 को जेएनयू में आयोजित महिशासुर शहादत दिवस में आप सभी आमंत्रित हैं।
स्थानः .1 ऑडिटोरियम, जेएनयू, नई दिल्ली, 3 बजे दिन।
आमंत्रित अतिथिः कांचा इलैया, चंद्रभान प्रसाद, प्रेमकुमार मणि, प्रो विवेक कुमार

ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम संपर्कः 9716839326

http://dalit-movement-association.blogspot.in/2013/09/blog-post_30.html

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अगले सप्ताह ‘महिषासुर-दुर्गाः एक मिथक का पुनर्पाठ’ वि‍षय पर पुस्तिका जारी की जाएगी : इतिहास में जो छल करते रहे उन्हीं को देवत्व का तमगा मिल गया है और जिन्होंने अपनी सारी उर्जा समाज सुधार और वंचित तबकों के उत्थान के लिए झोंक दी, उन्हें असुर या राक्षस करार दे दिया गया : जेएनयू 30 अक्‍टूबर 2012 : विवादित विषयों पर बहस की अपनी पुरानी परंपरा को बरकरार रखते हुए जेएनयू के पिछडे समुदाय के छात्रों के संगठन ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट् फोरम (एआईबीएसएफ) के बैनर तले सोमावार (29 अक्‍टूबर) रात को महिषासुर का शहादत दिवस मनाया गया. देर रात तक चले इस समारोह में देश भर से आए विद्वानों ने महिषासुर पर अपने विचार रखे. इस अवसर पर प्रसिद्ध चित्रकार लाल रत्नाकर द्वारा बनाये गये महिषासुर के तैलचित्र पर माल्यार्पण किया गया.

 

समारोह को संबोधित करते हुए आदिवासी मामलों की विशेषज्ञ और ‘युद्धरत आम आदमी’ की संपादक रमणिका गुप्ता ने कहा कि ‘इतिहास में जेा छल करते रहे उन्हीं को देवत्‍व का तमगा मिल गया है और जिन्होंने अपनी सारी उर्जा समाज सुधार और वंचित तबकों के उत्थान के लिए झोंक दी उन्हें राक्षस करार दे‍ दिया गया. ब्रह्मणवादी पुराणकारों/ इ‍तिहासकारों ने अपने लेखन में इनके प्र‍ति नफरत का इजहार का भ्रम का वातावरण रच दिया है. आखिर समुद्र मंथन में जो नाग की मुंह की तरफ थे और जिन्हें विष मिला वे राक्षस कैसे हो गए? कामधेनु से लेकर अमृत के घडों को लेकर भाग जाने वाले लोग किस आधार पर देवता हो सकते हैं? ‘ उन्‍होंने कहा कि ‘वंचित तबका इन मिथकों का, अगर पुर्नपाठ कर रहा है तो किसी को दिक्कत क्यों हो रही है?’

जेएनयू की प्रो. सोना झरिया मिंज ने कहा कि हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित कहानियों के समानांतर आदिवासी समाज में कई कहानियां प्रचलित हैं. इन कहानियों के नायक तथाकथित असुर या राक्षस कहे जाने वाले लोग ही हैं जिन्हें कलमबद्ध करने की जरूरत है. प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. विवेक कुमार ने कहा कि मिथकों की राजनीति और राजनीति का मिथक पर बहस बहुत जरूरी है. हमारे नायकों को आज भी महिषासुर की भांति बदनाम करने की साजिश चल रही है. इतिहास-आलोचक ब्रजरंजन मणि ने कहा कि शास्त्रीय मिथकों से कहीं ज्याजदा खतरनाक आधुनिक विद्वानों द्वारा गढे जा रहे मिथक हैं. पौराणिक मिथकों के साथ-साथ हमें आधुनिक मिथकों का भी पुर्नपाठ करना होगा.

मंच का संचालन करते हुए  एआईबीएसएफ के अध्यीक्ष जितेंद्र यादव ने कहा कि पिछडा तबका जैसे-जैसे ज्ञान पर अपना अधिकार जमाता जाएगा वैसे-वैसे अपने नायकों को पहचानते जाएगा. महिषासुर की शहादत दिवस इसी कडी में है. संगठन महिषासुर शहादत दिवस को पूरे देश में मनाने के लिए प्रयत्‍नशील है. संगठन के जेएनयू प्रभारी विनय कुमार ने कहा कि अगले सप्‍ताह ‘महिषासुर-दुर्गा:एक मिथक का पुनर्पाठ’ वि‍षय पर पुस्तिका जारी की जाएगी, जिसका संपादन अकाद‍मिक जगत में लोकप्रिय पत्रिका ‘फारवर्ड प्रेस’ के संपादक प्रमोद रंजन ने किया है।

गौरतलब है कि ‘फारवर्ड प्रेस’ में ही पहली बार वे महत्‍वपूर्ण शोध प्रका‍शित हुए थे, जिससे यह साबित होता है ‘असुर’ एक (आदिवासी) जनजाति है, जिसका अस्तित्‍व अब भी झारखंड व छत्‍तीसगढ में और महिषासुर राक्षस नहीं थे बल्कि इस देश के बहुजन तबके के पराक्रमी राजा थे। उन्‍होंने कहा कि पुस्तिका में महिषासुर और असुर जा‍ति के संबंध में हुए नये शोधों को प्रकाशित किया जाएगा तथा इसे विचार-विमर्श के लिए उत्‍तर भारत की सभी प्रमुख यु‍निवसिटियों में वितरित किया जाएगा। इस मौके पर ‘इन साइट फाउंडेशन’ द्वारा महिषासुर पर बनाई गई डाक्युमेंट्री भी दिखाई गई. समारोह को एआईबीएसएफ कार्यकर्ता रामएकबाल कुशवाहा, आकाश कुमार, मनीष पटेल, मुकेश भारती, संतोष यादव, श्री भगवान ठाकुर आदि ने भी संबोधित किया.

प्रेषक :

prof vivek kumarविनय कुमार

जेएनयू अध्यक्ष

एआईबीएसएफ

158, साबरतमी जेएनयू

vivekkumar@mail.jnu.ac.in

http://news.bhadas4media.com/index.php/imotion/1768-2012-10-30-10-11-58

 

 

 

 

 

 

 

 

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