धम्म क्रांति दिवस 14-अक्टूबर-2013 के धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- बौद्ध धम्म ही भारत के बहुजनों का स्थाई झंडा jhanda है, आओ हम सब इसके लिए संगठित हो जाये … समयबुद्धा


 

buddhist flag

झंडे का अर्थ है ऐसा कुछ भी जिसके नाम पर जनता एक विचारधारा के तहत संगठित हो जाये और आपस में अपना सुख दुःख साझा समझे|

झंडा ऐसा कुछ भी होता है जिसके नाम पर सब संगठित हो जाएँ और सबका संगर्ष उस झंडे की बुलंद करे| फिर जो भी लोग उस झंडे के नीचे बैठे हों वे या उनकी आने वाली पीढियां सभी उस संगर्ष से लाभान्वित होंगी|झंडे के उदाहरण हैं- जाती,कोई महापुरुष जैसे वाल्मीकि,रविदास अदि,कोई भाषा या प्रान्त, कोई प्रतापी राजा, कोई राजनेतिक दल या चिन्ह और अपना धर्म|इन सभी झंडों में से बाकि के सभी झंडे समय और परिस्थिति के साथ पुराने और अयोग्य हो जाते हैं पर धर्म कभी पुराना नहीं होता, धर्म एक स्थाई झंडा है| लोहिया जी न सही कहा है “राजनीती अल्पकालीन धर्म है पर धर्म दीर्घकालिक राजनीती|”

हमारी समस्या ये है की हमारे लोग कभी एक झंडे के नीचे संगठित नहीं रहे न ही रहने दिया गया| जाती वाला झंडा असल में बहुजनों में फुट डालने का काम कर रहा है, सरे बहुजन 6000 से ज्यादा जातियों में बटे हैं परिणामस्वरूप  कोई एक दुसरे के दुःख में मदत करने नहीं आता और शोषक मनुवादी एक एक कर अलग अलग इनका शोषण करते रहते हैं,हमेशा बिखरे रहे हैं, यही कारन है की हमारे लोग अपने ही लोगों द्वारा किये गया संगर्ष और योगदान को न तो पहचानते हैं न ही उसके श्रेय ले सकने में कामयाब हैं| हमारे लोग कुछ भी अच्छा करते हैं तो वो विरोधी अपने धर्म की शान बढ़ने में इस्तेमाल कर लेते हैं|ऐसा इसलिए क्योंकि बहुजन हमेशा बिना झंडे के ही संगर्ष करते रहे हैं या अपनी जाती को ही अपना झंडा मानके विरोधयों कि निति में फसे रहे| उदाहरण के लिए “दोहे” कहने की कला, ये दो लाइन में ज्ञान की शशक्त बात कहने का माध्यम है जो कबीर, रविदास जैसे बहुजनों द्वारा स्थापित की गई थी|कई ऐसे वाद्य यन्त्र हैं जो बौद्ध काल में ही खोजे गए थे|अब समय आ गया है जब हम सभी बहुजनों ये योगदान को बहुजनों के स्थाई और दीर्ग्कालिक झंडे बौद्ध धम्म से जोड़ दें|

भारत के सारे इतिहास में जो सेना आपस में लड़ी थी इन सभी सेनाओं में अधिकतम सैनिक बहुजन ही थे| आज तक जितने किले बने,महल बने, बिल्डिंग बनी उन सब के कारीगर और मजदूर दोनों बहुजन थे| पार आज उनको कोई याद नहीं करता क्योंकि वो बिना झंडे के लड़े थे|सीधे शब्दों  में कहूं तो आज तक बहुजन केवल दूसरों का झंडा अपना बलिदान दे देकर बुलंद करता रहा फिर भी उसके हाथ आज भी खली है|इसका सीधा कारन ये रहा है कि बहुजनों ने बौद्ध धम्म पर ध्यान देना छोड़ दिया परिणाम स्वरुप भोली भली जनता बन गए|ये भोले भले लोग अपना ही  भाग्ये तय करने वाली  चीज़ राजनीती से बहुत दूर हो गए तो झंडे का महत्व क्या समझेंगे|  हे बहुजनों झंडे के महत्व को समझो वर्ना ऐसे ही तुमसे  क़ुरबानी तो ले ली जाएगी पर उसे बदले में कुछ नहीं मिलेगा उल्टा जिल्लत अपमान और घृणा का पात्र बनना होगा|

झंडे कि खास बात ये है कि हमारा हर कर्म हमारे झंडे को शक्ति देता है चाहे वो गलत ही क्यों न हो जैसे युद्ध|सदियों से आज तक आज बहुजन ने हर जगह बहुत काम किये हैं और कर रहे हैं पर उस सब काम का महत्व जिस झंडे को मिल रहा है वो हिंदुत्व है और बहुजनो को क्या मिलता है केवल तिरस्कार| यही बहुजन खुद को बौद्ध कहें तो दुनिया ये कहेगी या समझेगी की भारत में बौद्धों ने कितना ज्यादा काम किया है,बौद्ध खिलाडी, बौद्ध नेता,बौद्ध अभिनेता,बौद्ध कारीगर,बौद्ध वैज्ञानिक,बौद्ध डॉक्टर अदि| इस तरह आपकी मेहनत आपके अपने झंडे में दर्ज होगी और जो भी लोग इस झंडे के नीचे आते हैं वे सभी दीर्घकाल तक लाभान्वित होते रहेंगे|

इतना ही नहीं पिछड़े बहुजनों पर होने वाले अत्याचार जो की आज एक हिन्दू द्वारा दूरे हिन्दू पर किया गए अत्याचार के रूप में दुनिया देखती है, जो की एक आन्तरिक हिन्दू मामला बन जाता है| यही वजह है की बिना झंडे के अत्याचार सह रही जनता के पक्ष में दुनिया से कोई आवाज़ नहीं उठती,दुनिया की तो छोड़ो उसके अपने बहुजन भाइयों में कोई आवाज़ नहीं उठती, क्योंकि 6000 में से जब एक जाती पिटती हैं तो बाकि कि 5999 जातियां तमाशा देखती हैं क्योंकि वो उनकी जाती का मामला नहीं होता | इसीलिए भारत के दुसरे बहुजन इसे दलितों पर होने वाला अत्याचार के रूप में देखता है पर कुछ नहीं कहता क्योंकि उसका झंडा और दलितों का झंडा अलग है, इसलिए  उसे दलित के दुःख से कोई मतलब नहीं| जब तक पिछड़े बहुजन अपने को ‘दलित’ समझते कहते और कहलवाते रहेंगे तब तक अकेले ही पिटते रहेंगे|ये जिन्दगी का नियम है की कमजोर का कोई नहीं| बहुजन केवल एक शब्द नहीं है ये वो ढाल है वो झंडा है  जो पिछड़े बहुजनों को अगड़े बहुजनों से सुख दुःख साझा करवाएगा| बहुजन जनसँख्या शक्ति का प्रतीक है जबकि दलित शब्द कमजोरी का कलंक| ये अत्याचार कहीं दर्ज नहीं होते, इनके खिलाफ कोई संगठन नहीं होता क्योंकि कोई एक स्थाई झंडा ही नहीं है सब अपना अपना अलग झंडा लेकर अकेले मनुवाद से लड़ रहे हैं जिसमें हार निश्चित है| आज बाबा साहब आंबेडकर एक झंडे का काम कर रहे हैं इसलिए दुनिया में अम्बेडकरवादियों  का अपना साहित्य बना  है, विचारधारा बनी है, मिशन बना है निति बनी है, ये सब क्यों है क्योंकि झंडा है| ये इसी झंडे कि बदलौत पिछड़े बहुजनों(दलित) पर होने वाले अत्याचा की थोड़ी चर्चा हो जाती थी| पर अब विरोधी मीडिया द्वारा बहुजनों(दलित) को एकदमन नज़रअंदाज कर दिया गया है ये उनकी निति है बहुजनों क्कि निति के विरोध में| क्या इस तथ्यों से भी आप स्थाई झंडे का अर्थ नहीं समझोगे| बहुत सोच समझ के मैंने बौद्ध धम्म को ही बहुजाओं का स्थाई और सर्व मान्य झंडा चुना है अब बहस छोड़ो और धम्म समझना शुरू करो पसंद ना आये तो जो मर्ज़ी करना, तुम बस अपने भले के लिए ही सही धम्म में लौटने का मेरा न्योता स्वीकार  करो,मानना या न मानना तुम्हारे ऊपर  है|

आज वो युग आ गया है जब लोग धर्म कि गुणवत्ता कि वजह से उससे नहीं जुड़ते बल्कि अपने सरक्षण के लिए उससे जुड़ते हैं| आज मान्यताओं के सच-झूठ, फायदा-नुक्सान अदि का ज्यादा महत्व नहीं रह गया है,आज धर्म संस्था का मुख्य लक्ष्य उससे जुडी कौम और उसके संगठन को दुसरे संगठन से व्यक्तिगत और सामाजिक सुरक्षा की नीति निर्धारण और क्रियान्वयन है|

असल में ये एक व्यवहारिक सत्य है की धर्म एक स्थाई झंडा है जिसे नीचे लोग सदियों के लिए लिए संगठित हो जाते हैं|अन्य झंडे जैसे राजनेतिक, जातिगत, भाषाई, प्रांतीय, देश अदि समय के साथ स्वरुप बदल लेते हैं|झंडे का अर्थ होता है ऐसा कुछ भी जिसके नाम पर लोग किसी मिशन के लिए संगठित हो जाएँ|जितने भी धार्मिक लोग हैं वो जानते हैं  तन मन धन से अपने धर्म की रक्षा अपनी स्वव की रक्षा है क्योकि धन से धर्म चलता है, धर्म से संगठन चलता है,संगठन से सुरक्षा होती है|

धर्म को चाहे कोई किसी भी तरह समझाए पर  किसी कौम की सुरक्षा ही किसी भी धर्म का सर्वोपरि लक्ष्य रहा है और हमेशा रहेगा| इस बात को गरीब और नए नए हुए सक्षम लोग नहीं समझ सकते, वो ये नहीं समझ सकते की धर्म को अपना समय,उर्जा और धन देना कितना जरूरी है,वो तो बस समय के साथ ढल जाते हैं,गुलामी भी कर लेते हैं और राज भी, पर इनका राज ज्यादा दिन नहीं चलता| धर्म के नाम पर शक्ति, धन,ज्ञान,संगठन और भविष्य नीति बनाना और चलाना ही धर्म के ठेकेदारों का असल काम है|सदियों से आप दूसरों द्वारा फुसलाये जाते रहे हो अब फैसला आपके हाथों में है की आप केवल दूसरों का ही झंडा बुलंद करते रहोगे या अपने खुद का बौद्ध  धम्म संगठन का महत्व व् जरूरत समझोगे, इसके लिए कुछ करेंगे|इससे ज्यादा खुलकर और कैसा समझाया जा सकता है, अगर अब भी आप नहीं समझ सकते तो फिर आपपर होने वाला अत्याचार जायद लगता है|

ध्यान रहे बौद्ध धम्म में आप कोई कन्वर्ट नहीं हो रहे हो आप अपने खुद के धम्म में वापस लौट  रहे हो|भारत के बहुजन पहले  बौद्ध जनता ही थी जिसे प्राचीन भारत में हुए राजनेतिक षडियंत्र  और बौद्ध राजाओं कि हार ने बौद्ध धम्म छोड़ने पर मजबूर किया गया| फिर समय समय पर हुई बहुजन  क्रांति के अगुवा या लीडर या  अलग अलग महापुरुष हुए या कल्पना द्वारा बनाये गए फिर उनको बहुजनों को  देकर अलग अलग खूंटे से बांध दिया है| इसे हमारे लोग समझ नहीं पा रहे हैं ,सभी बहुजन महापुरुष और गुरु एक ही मिशन या अंतिम लक्ष्य से जुड़े हैं-बहुजन हिताए बहुजन सुखाये | जब हम बुद्धा की बात करते हैं तो लोग वाल्मीकि, रविदास, कबीर अदि की बात करते हैं, निसन्देह ये भी बुद्धा के समतुल्य सम्माननिये हैं, पर जब तक हम एक सर्वमान्य सिद्धांत को नहीं पकड़ेंगे एक झंडे के नीचे नहीं आ पाएंगे,और जब तक एक झंडे के नीचे नहीं आ पाएंगे तब तक अकेले अकेले यूँ ही शोषित होते रहेंगे यूँ ही गुमनाम मौत मरते रहेंगे|बौद्ध धम्म में असंख्य संभावनाएं हैं जो की किसी और विचारधारा या धारा प्रवाह या झंडे  में नहीं है|आपसे प्रार्थना है की मानो या न मानो पर धम्म को जानो और इस झंडे के नीचे संगठित हो जाओ| मैं बहुत सोचने के बाद इस नतीजे पर पंहुचा हूँ ही की बहुजन लोगों का स्थाई झंडा केवल बौद्ध धम्म ही हो सकता है, डॉ आंबेडकर का चुनाव बिलकुल सही है|हमें इस विवाद में नहीं पड़ना चाहिए कि गुरु वाल्मीकि सही हैं या गुरु रविदास या  कोई और क्योंकि इन सभी का मकसद एक ही रहा है बहुजन हिताए बहुजन सुखाये| जहाँ एक और बहुजन गुरु भी ईश्वर और मानव के रिश्ते पर जोर देने तक ही सीमित हैं वहीँ बौद्ध धम्म इस सब से बहुत आगे जाता है, मानव के समस्त दुखों का सही कारन और निवारण  बताता  है क्योंकि बुद्धा को धार्मिक बातों के साथ साथ राजनीती का भी अनुभव था|

कई लोगों के मन में ये सवाल जरूर होगा की आखिर हमें झंडे की जरूरत क्यों हैं| मैं आपको एक जमीने सच्चाई बताता हूँ, जाती क्या है लोग इससे यही मतलब समझते हैं की हम सब अपर मैं भाई हैं सुख दुःख साझा है| पर ये भी एक सच्चाई है की हम सभी ने महसूस किया होगा की कई मामलों में हमारे अपने रिश्तेदार भाई बंधू हमसे जलन मानते हैं और हमको हराना चाहते हैं|आपका कोई काम हो और अफसर अपनी रिस्तेदारी का बैठा हो तो भी कई मामलों में वो अफसर हमारी मदत नहीं करता|पर अगर वो अफसर रोस्तेदार नहीं पर जाती है तो काम कर देता है क्योंकि वो जाती के झंडे को मानता है | जाती के गद्दार अफसर भी होते हैं और ये हर कौम में होते हैं , वो काम नहीं करते क्योंकि उसको खुद को अपने सवर्ण साथियों का वफादार साबित करना होता है, इनको छोड़ दो इनमे और  मनुवादियों में कोई फर्क नहीं, बल्कि ये विभीषण हैं|पर अगर वही पर कोई और अनजान अफसर बैठा हो तो वो नार्मल तरीके से पेश आएगा आम जनता की तरह काम भी हो जायेगा|इस सब से मैं आपको ये बताने की कोशिश कर रहा हूँ की कई मामलों में अपने ही काम नहीं आते उल्टा विरोध झेलना पड़ता है|

चाचा ताऊ के लड़कों में कलह एक आम बात है अक्सर हम सुनते रहते हैं, सम्राट अशोक महान ने भी अपने ही भाइयों को अपने रस्ते से हटाया था | ये सब केवल हममे नहीं होता सभी में होता है और हमारे लोग बस शिकायत करते रहते हैं की बहुजनों में एकता नहीं है, विरोधितों में भी अब उतनी एकता नहीं रह गई है, उनकी वफादारी आपस में नहीं है अपने संगठन अपने झंडे के लिए है| हम पिछड़े बहुजन (दलितों) की मदत की बात दिन रात करते हैं लिखते हैं पर कई मामलों में ऐसा देखा गया है की जब आप असल में जमीन पर उनकी मदत करने  जाओगे तो वो उठने की बजाये आपकी हो अपने साथ नीचे खीचने की कोशिश करेंगे, क्योंकि वो अज्ञानी है| पर अगर आप झंडे को बुलंद करोगे झंडे द्वारा उनको योजना बनाकर मदत दोगे तो आप भी बचे रहोगे और वो भी तररकी करेंगे|

उदाहरण  के लिए आपका भाई से आपकी खटपट है ,ऐसे मानिये की आपकी उसकी बात चीत बंद है पर वो आंबेडकर और बौद्ध विहार के लिए संगर्ष कर रहा है, आप भी इन्हीं झंडों के नीचे हो तो इन झंडों के बढ़ने का लाभ आपको भी मिलेगा, इस तरह झंडे के होने से अपरोक्ष रूप आपके भाई ने आपकी मदत की|

आपको एक और उदाहरण देता हूँ,आपके प्रदेश का मुख्यमंत्री आपकी जाती है, आपने कभी उससे बात नहीं की न ही मौका मिलेगा|पर वो भी आपके झंडे जैसे जाती या धर्म के लिए काम कर रहा है उद्धरण के लिए अपने लोगों के कुछ गाँव चुन कर सड़कें बना रहा है|  या कहें कि उसने आयी0 ऐ0 एस० , आयी0 पि० एस०  आदि कि कीमती कोचिंग कि व्यस्था आपने लोगों के  लिए करवा  दी| अब आप भी उसे झंडे के नीचे बैठे हो,तो इस तरह सीधे न सही पर अपरोक्ष रूप से वो आपकी मदत कर रहा है| झंडा एक सेटलाइट के रूप में काम करता है जिसमें टीवी स्टेशन सिग्नल भेजता है और जनता उसे डाउनलोड करती है आपस में एक दुसरे कि छत से तार ले जाने का झाड़ा ही ख़तम| सब आपस में कितना भी झगड़ते हों पर झंडे को बढ़ाते और उन्नत करते रहते हैं और उससे पीढ़ियों तक लाभान्वित होते रहते हैं|

थोडा सा आप भी सोचोगे तो इस बात को समझ जाओगे और अगर समझ जाओ तो इस समयबुद्धा  सन्देश को जनता तक पहुचाओ|

सदा ध्यान रखें :

भारत के बहुजन लोग 6000 से भी ज्यादा जातियों में बिखरे हैं,और अपनी जाती को अपना झंडा मानकर अलग अलग शोषित होते रहते हैं, जब एक जाती पर आपत्ति आती है तो दूसरी चुप बैठती है|इसका एक ही समाधान है की सभी जाती तोड़ो और एक ही पहचान “बौद्ध” हो जाओ|क्योंकि ‘धर्म’ मानव संगठन का एक स्थाई झंडा है, बाकि के झंडे जैसे कोई राजा,कोई दार्शनिक,कोई पंचायत,कोई देवता,राजनेतिक पार्टी अदि समय गुजरने के साथ अपना महत्व खो देते हैं|लोहिया जी न सही कहा है “राजनीती अल्पकालीन धर्म है पर धर्म दीर्घकालिक राजनीती|”

 

…समयबुद्धा

13-oct-2013

Deliviered this speech at Ambedkar Memorial,26-Alipur Road, New Delhi

buddhist flag

8 thoughts on “धम्म क्रांति दिवस 14-अक्टूबर-2013 के धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- बौद्ध धम्म ही भारत के बहुजनों का स्थाई झंडा jhanda है, आओ हम सब इसके लिए संगठित हो जाये … समयबुद्धा

  1. राष्ट्रव्यापी परिवर्तन ,केवल राष्ट्रव्यापी संगठन कर सकता है और राष्ट्व्यापी संगठन केवल राष्ट्रव्यापी विचारधारा से बन सकता है ,”मूलनिवासी” (ओबीसी sc st) वो विचारधारा है जो राष्ट्रव्यापी विचारधारा बन सकती है ,और इसी विचारधारा से मूलनिवासियो का राष्ट्रव्यापी संगठन जो मूलनिवासियो के राष्ट्रव्यापी समस्याओ का समाधान कर सकता है …..http://www.facebook.com/dr.suniljyadav?hc_location=stream

    • ऐसे दलित समुदाय का अब कोई अम्बेडकर भी भला नहीं कर सकता…
      मध्य प्रदेश में बौद्धों को ओ,बी.सी. के सूचि में डाला गया और धर्मान्तर पर पाबंदी के साथ धर्मान्तर करने वाले को बिल में सजा का प्रावधान किया गया है, सविधान के धर्म निरपेक्ष के मौलिक अधिकारों के खिलाफ भाजपा सरकार ने अपना संक्रिन और संकुचित हिन्दुत्व के मानसिकता का परिचय इस विधान से दिया है जब यह पारित हुवा तब अन्य दल मौन सादे हुए थे
      अब कोई भी धर्मान्तर कर सिख /जैन /बौद्ध/मुस्लिम ईसाई बनता हे तो सजा का प्रावधान हे बिल मे …………………….. ……….. ……… …….. ……. ………………………. …………. ”दलितों के लिए ….पिछडो के लिए क्यों परेशान है …..इस देश में जिनके मकान की छत चू रही होती है सब अपने -अपने छत की मरम्मत करना जानते है, सिवाय obc /st/sc को छोड़कर ….नौकरियो में चाहे वह ग्रुप ‘ए’ ‘बी’ ‘सी ‘ अथवा ‘डी ‘ की हो , या लोकतंत्र में आरक्षण के तहत ग्राम प्रधान हो ,बी .डी . सी .सदस्य हो ,ब्लाक प्रमुख हो , न्यायिक व्यवस्था में जज तक हो , यहाँ तक की विधायक ,एम .पी तक फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर हो … नई -नई जातिओ को obc /sc/st में शामिल करने एलान राजनितिक पार्टिया कर रही हो ….ओर देश के पिछड़े दलित जो शुद्धतःobc / sc/st है चुप है ….उसका आयोग मौन है .. कटोरा लेकर भीखमंगे की तरह येobc sc/st के लोग पिछड़ो /दलितों के आकाओं और पार्टियों के दर पर नाक रगड़ रहे हो …

  2. Pingback: आईये मिलकर किताबों में दबे बौद्ध धम्म के कल्याणकारी ज्ञान को मिल जुल कर जन साधारण के लिए उपलब्ध क

  3. Pingback: युवा पीढ़ी का भ्रम- केवल आंबेडकर तक ही सीमित रहो बुद्ध और उनके धम्म तक जाने की जरूरत नहीं|…समयबुद

  4. very good, I know you are working very hard. Only if we all the Buddhist unite we can achieve some thing,the most divided people in Bharat are Buddhist. This is why we are getting no where. One day we will. Thank you

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