19-Oct-2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा की विशेष धम्म देशना :- “धम्म इतना अच्छा है फिर भी इसकी बजाये लोग धार्मिक कर्मकांड क्यों पसंद करते हैं”….…समयबुद्धा


हमारे लोग अक्सर सोचते हैं की बौद्ध धम्म के इतना अच्छे होते होए भी लोग इसकी तरफ क्यों नहीं आ रहे ,धम्म की बजाये लोग धार्मिक कर्मकांड क्यों पसंद करते हैं?

दार्शनिक स्नेक्का ने कहा था “आम आदमी धर्म को सच्चा समझता है,विवेकशील बुद्धिजीवी या बौद्ध इसको गलत समझता है,धनवान इसे फायेदेमंद समझता है और शाशक धर्म को अपना शाशन चलने का जरूरी औजार समझता है |” इस कथन से हम समझ सकते हैं कि दिन रात बौद्ध लोग जिस धर्म को पाखंड और गरीब विरोधी षड्यंत्र समझाते रहते हैं उस षड्यंत्र के पक्ष में शाशक/पुरोहित वर्ग, धनवान और आम जनता होती है| ऐसे में बुद्धिजीवियों कि धर्म-षड्यंत्र विरोधी बातें केवल बुद्धिजीवी वर्ग तक ही सीमित रह जाती है|अगर कोई बुद्धिजीवी इस षड्यंत्र को जनता को समझाने कि कोशिश करता है तो शाशक उसे मार कर उसी को ईश्वर घोषित कर देते हैं, सरे संसार का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है|ध्यान रहे असल बौद्ध धम्म,  धर्म-षड्यंत्र के खिलाफ क्रांति था है और रहेगा|आम जनता बौद्ध धम्म को धर्म समझने कि गलती न करें इसी लिए बुद्ध कि शिक्षाओं को ‘धम्म’ कहते हैं न कि धर्म|darshnik skeka

साथियों इस चित्र मे जो आप लोग देख रहे हो, वैसे तो ये कोइ नयी बात नही है कि राह चलते किसी ब्राह्मणवादी को अगर रास्ते मे कोई गाय पेसाब करते दिख जाये तो उसके लिये अम्रत मिल जाने के समान होता है, लेकीन इस तरह के मुर्खता पूर्ण कार्यो को देखते हुई मन मे इस टिस उठती है कि

drinking cow urineयह कैसा समाज है जो कि किसी इन्सान को इंसान नही समझता है लेकिन किसी जानवर के शरीर के गन्दे पेशाब को अम्रत समान पवित्र मानता है ??

यह कैसा समाज है जो किसी मनुष्य मे स्पर्श मात्र से खुद को अपवित्र होना समझता है लेकिन अगर गाय का पेशाब अपने उपर छिडक ले तो खुद को पवित्र समझता है ??

यह कैसा समाज है जोकि किसी जानवर का पेशाब पी सकता है लेकीन निचली जानी के मनुष्य के हाथ का पानी नही ??

इन सभी सवालों का जवाब है दुनिया बहुत ज्यादा मतलबी होती है वो अपने “फायदे’ के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है, गए की पेशाब पीना इसी बात का एक उधाहरण है| वहीँ दूसरी तरफ पहले क्योंकि मूलनिवासी बहुजन बहुत दुर्दशा में जीते थे जिसकी वजह से मनुवादियों का कोई फायेदा नहीं होता था तब मनुवादी बहुजनों से घृणा करते थे| आज जब आंबेडकर मिशन और बौद्ध क्रांति के चलते जब बहुजनों के पार सम्पानता आई है तो आप खुद देखो किस तरह अपने मतलब के लिए इनको मंदिर में अब प्रवेश करने दिया जा रहा है| मैं तो बहुजन की बुद्धि पर हैरान हूँ की इसे अच्छी तरह पता है की इसके पूर्वजों को मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता था मार पड़ती थी , आज वही लोग मंदिर में बाबूजी बनकर जाते हैं और दान देते हैं जिसपर मनुवादी लोग पलते हैं|

खेर हमारा मुद्दा है आपको ये समझाना है की ‘फायदा’ ही वो बात है जिसपर आपका सम्मान टिका है| आप खुद देखिये आप लोगों ने नोट और वोट देकर अपनी सरकार बनाई, और आज वही मनुवादी लोग जो आप्नकी सरकार नहीं बाने देते थे अपने फायेदे के लिए न केवल आपका साथ दे रहे हैं बल्कि आपकी नेता के पैरों में पड़े हैं| आपकी पार्टी के कार्य कर्ताओं को मान्यवर मान्यवर कहकर चापलूसी कर रहे हैं|

मनुवादियों का इश्वर भी उसे का है जिसके पर पैसे और शक्ति है| एक मशहूर शेर याद आ गया

कर बुलंद खुदी को इतना की तेरी तकदीर लिखने से पहले
खुद भी तुजसे पूछे की बता,बता तेरी रजा क्या है

“फायदा” ही वो ताकत है जिसके बल पर संसार की सभी गतिविधियाँ चलतीं हैं|फायदे भी कई प्रकार के होते हैं जिसमें से प्रमुख फायदा होता है आर्थिक फायदा या धन लाभ|धार्मिक गतिविधि केवल आस्था मात्र का विषय नहीं होता उसमें कई लोगों का कई प्रकार का फायदा जुड़ा होता है जो उन लोगों को उस धार्मिक गतिविधि या समारोह को करने को प्रेरित करता है| वो सभी लोग जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष फायदा होता है वो उस धर्म और उसकी धार्मिक गतिविधि के समर्थन में होंगे जो उनको फायदा पहुचाये|उदाहरण के लिए टेंट और कुर्सी सप्लायर,केटरर या भोजन व्यस्था वाला,मूर्ती बनाने वाला, संगीत वाले, गाने वाले,भीड़ भाड़ के लिए दुकाने या स्टाल लगा कर बिक्री करने वाले,युवाओं को मस्ती करने का मौका मिलेगा, दुकानों में रौनक, खरीददारी बढने की वजह  से व्यापर जगत या सेठों का साथ और पुरोहित वर्ग की आजीविका अदि|

इसमें से सबसे आगे है पुरोहित वर्ग जिसे धार्मिक आयोजनों से सीधा  फायदा होता है इसीलिए वही तो इन सभी कर्मकांडों को सोचता बनता और संचालित करता है वो हर संभव प्रयास करता है की ये आयोजन सफल हों चाहे ऐसे या वैसे| जैसा की हम जानते हैं की धर्म वही फलता फूलता है जिसे राजनेतिक सरक्षण मिला होता है| पुरोहित वर्ग को प्रशाशन का समर्थन भी होता है क्योंकि ये जनता को धर्म में लगाये रखते हैं जिससे वो अपने प्रशाशनिक हकों के लिए ज्यादा प्रयत्नशील नहीं रह जाते| परिणाम स्वरुप शाषक को अपने मुताबिक प्रशाशन चलाने में मदत मिलती है|इतना ही नहीं धर्म जनता की सोच नियंत्रित करता है है या कहूं तो बड़ी जनसँख्या को एक मत में पिरो देता है,लोग अलग अलग नहीं रह जाते| आप ऐसे समझो की लोग मोती हैं और धर्म धागा अगर प्रशाशन एक एक मोती को सँभालने जाएगा तो उसे बहुत दिक्कत होगी और ये संभव भी नहीं है पर अगर ये सभी मोती एक धागे में पिरो दिए जाए तो प्रशाशन को केवल धागा संभालना है जनता तो अपने आप ही काबू में हो जाएगी| इसलिए धर्म भी जनता को मानसिक रूप से नियंत्रित करने का एक राजनयिक औज़ार है| आप कहीं भी किसी भी देश का इतिहास उठा कर देखो लो राजा के राजदरबार में पुरोहित उसका मुख्य सलाहकार होता है ये दोनों एक दुसरे के पूरक के रूप में काम करते हैं तभी प्रशाशन चला पाते हैं|

जरा ज़माने के चलन को देखो -ज्यादातर बच्चों और युवाओं को मस्ती शोर शराबा, खाना पीना,संगीत अदि अच्छे लगते हैं ,ज्यादातर माध्यम आयु वर्ग के लोगों को धन कमाना ज्यादा अच्छा लगता है और ज्यादातर वृद्धों को परालौकिक, धार्मिक,मृतु पर्यन्त की बाते ईश्वरवादी बातें अच्छीं लगतीं हैं| बौद्ध धम्म के वर्तमान स्वरुप में हर उम्र के व्यक्ति की रूचि के हिसाब से उसको धम्म को पसंद करने की वजह नहीं मिल पाती|ऐसे में धम्म को चाहने वाले वही बुद्धिजीवी लोग होते हैं जो दर्शन शास्त्र में रूचि रखते हैं| जहाँ धम्म का डिजाइन में जनता का भला प्रमुख लक्ष्य हैं वहीँ विरोधी धर्म को जनता क्या चाहती है इस मर्म को समझकर उसके हिसाब से डिजाइन किया गया है जिसमें पुरोहित वर्ग और शाषक की सत्ता सुनिश्चित की गई है|

उम्मीद है की इस चर्चा से आपको जवाब मिल गया होगा की धम्म की बजाये लोग धार्मिक कर्मकांड क्यों पसंद करते हैं| जनता को मस्ती चाहिए फायदा चाहिए उसे नीरस भाषण नहीं चाहिए,अधिकतर लोग अपने नजदीकी माता पिता और गुरु तक के भाषण को पसंद नहीं करते तो दूर से धम्म गुरु को क्या पसंद करेंगे|ये ठीक इस तरह है जैसे तरुण बच्चों को अपने माता पिता और गुरु की बात भाषण लगती है बोर लगती है जबकि इन्हीं बातों में उनका सबसे ज्यादा भला होता है|ये बच्चे इन भलाई की बातों को छोड़कर मीडिया की चकाचौंध, संगीत, बिगड़े दोस्त,तमाम रसिक मिजाज चीज़ों में मन लगाकर ध्यान देते हैं और अपने जीवन में उतारते हैं|ये जिन्दगी का नियम है की इंसान का बच्चा हर उस फल को चखना चाहता है जिसको उसके माँ बाप और गुरु मना करें|

ठीक इसी तरह जनता को बौद्ध धम्म ज्ञान भाषण लगता है बोर लगता है और वो अन्य धर्मों की चकाचौंध और मस्ती में मस्त रहना चाहता है| धर्म के नाम पर सुधार और संगर्ष के कठिन मार्ग को छोड़कर कुछ भी पुरोहितवादी कर्म कांड या शॉर्टकट मार के समझना चाहता है की उसने धर्म का पालन किया|आज कुछ पिछड़े बहुजनों(दलितों) का हाल ऐसा है की न तो अपने वर्तमान धर्म में ही मस्त हैं न ही बौद्ध बन पा रहे हैं| बौद्ध धम्म में आकार जब उन्हें कुछ भी चमत्कार नहीं मिलता और इसके कठिन सिद्धांत उसकी समझ में नहीं आते तो वो या तो लौट जाता है अपने पुराने धर्म में या मन में धर्म श्रद्धा रखता है और समाज को बौद्ध होने का दिखावा करके दोहरी जिन्दगी जीता है |

आप सोचिये की क्यों जनता मस्ती छोड़कर बौद्ध धम्म के नीरस ज्ञान को सुने समझे और अपनाए| यही कारन है की बौद्ध धम्म बुद्धिजीवियों तक ही सीमिnaga babaत है, आम जनता बौद्ध धम्म को नहीं अपना पाती|जब तक हम बौद्ध धम्म के ज्ञान तो जनता की रूचि के हिसाब से नहीं परोसेंगे वो इसे ग्रहण नहीं करेगी, रोचक कहानियां द्वारा शिक्षा और मन लुभावन संगीत धम्म प्रचार के शाशाक्त माध्यम हैं|ये जनता है इसे मस्ती चाहिए आप नहीं दोगे तो वो खुद विकल्प खोज लेगी|जनता को कुछ खास मौकों पर अपने दरवाजे पर रौनक रौशनी मस्ती और चहल पहल चाहिए ही होती है जैसे बच्चे का जन्म, नए घर में प्रवेश,शादी, या काम धंदे में कामयाबी, उनको रौनक चाहिए आप नहीं डोज तो वो कहीं और खोज लेगा| बौद्ध धम्म में हमें केवल इसके दमन की चर्चा ही करते नहीं रह जाना है आगे बढ़ कर अपने काएदे परम्पराएँ आदि बनाने होंगे| मैं मानता हूँ की धम्म कर्मकांड के विरुद्ध है पर आप भी मानो की ये गलत कर्मकांड के विरुद्ध है| आपको कुछ तो परम्पराएँ चलानी होंगी क्योंकि परम्पराएँ ही धम्म की जीविन्त रख पाएंगी| उदाहरण के लिए बौद्ध भंते का नारंगी चीवर क्या परंपरा नहीं है? आप नकार नहीं सकते|आप में से कितने हैं जो ऐसी पुस्तकें और साहित्य लिख रहे हैं प्रचार कर रहें हैं जिसमें लोगों को पता चले की वो जन्म,शादी,गृह प्रवेश, धंधे की शुरुआत,मृत्यु आदि की बौद्ध परम्पराएँ जनता जान जाए| केवल बुद्ध की जीवनी कहने सुनने तक हो सीमित न रहो| सब अपने साहित्य में मनुवादियों के दमन की बातों के बारे में लिखते हैं इससे उनका प्रचार होता है उनका महिमा मंडान होता है और हमारे लोग मानसिक रूप से कमजोर होते हैं| बहुजनों पर अत्याचार का प्रचार साहित्य का पहला चरण था अब आगे बढ़ो और बौधों/बहुजनों की भविष्य नीतीयाँ बनाओ , उनकी वीर गाथा खोजो बनाओ और प्रचारित करो|

ध्यान रहे ये जनता है बौद्ध धम्म को जनता धम्म के रूप में नहीं स्वीकार पाती वो इसे धर्म के रूप में ग्रहण करना चाहती है शायद इसिलए महायान का जन्म हुआ होगा| अब फैसला धम्म के लीडरों के हाथ में है की वो इसे केवल बुद्धिजीवी वर्ग की किताबों और तर्कों तक ही सिमित रहने देते हैं हैं या आम जनता का धम्म बनाते हैं| आज बहुजन अग्रसर है धम्म की तरफ निसंदेह इससे व्यक्तिगत और सामाजिक स्थर पर उनको बहुत लाभ होगा क्योंकि ये बुद्धि को सब मिथ्यों से दूर करके शुद्ध और परिपक्व बनता हैं| वहीँ दूसरी तरफ अगर हम ये सोचे की धम्म के वर्तमान स्वरुप से हम विरोधियों को टक्कर दे पाएंगे तो ये मुश्किल है कारण अब तक आप समझ ही गए होंगे|

आप में से कौन नहीं जानता कि नशा,झूठ,चोरी,कामुक पाप जैसे पञ्चशील तोड़ने उसे दुःख मिलेगा पर क्या कोई मानता है, जिसे मानना हैं वो ही मानता है जिसे नहीं मानना वो नहीं मानेगा| मानता कौन है जो अच्छे स्कूल, कालोनी और माहौल में पला बढ़ा है,अच्छे स्कूल, कालोनी और माहौल कैसे मिलेगा धन से मिलेगा|

ये दुनिया हैं इसे सत्य और अच्छाई से कोई मतलब नहीं ये फायदा चाहती है, फायदा जैसे सरक्षण,धन,सम्मान,धंधा,सुरक्षा अदि| बौद्ध धम्म में ये सब नहीं मिलता अगर कोई बौद्ध धम्म के नाम पर कुछ फायदा उठाने कि कोशिश करे तो बाकि के बौद्ध चिल्लाने लगेंगे, वो न ही खुद बढ़ेंगे न ही किसी और को बढ़ने देंगे| क्या बौद्ध धम्म में डूबने का अंत भीख मांगना ही है? विरोधियों को देखों कितने ही बाबा अम्मा और बापू कॉर्पोरेट घरानो कि तरह धर्म का बुइसनेस चलाते हैं और इसकी चलचौंध में दलित भी अपनी मारुती चार से सफ़ेद कुरता पजामा पहन के बापू बापू पहन कर पेट्रोल समय और धन खर्च कर के अपने विरोधी नीतिओं को पालने जाते हैं|उन्हें बाकि के हिन्दू कुछ नहीं कटे क्योंकि वो जानते हैं धन से धर्म चलता है धर्म से संगठन बनता है ,संगठन से रकनीति चलती है और राजनीती से धन और शक्ति आती है| जिंदगी के सत्तर से अस्सी प्रतिशत दुःख धन और शक्ति से प्राप्त सम्पन्नता से दूर होते हैं , बौद्ध धम्म के ज्ञान से नहीं| कुछ दिनों पहले एक बौद्ध भिक्कू मिला रोड के किनारे सवारी का इंतज़ार कर रहा था, मैंने गाड़ी रोकी और उसे लिफ्ट दे दी,वो बहुत खुद हुआ और कहने लगा कि आपका धन्यवाद आपने कम से कम चीवाद को पहचाना तो, लोग तो बिक्री समजते हैं, बड़ी देर से खड़ा हूँ कोई गाड़ी/सवारी वाला रोकता ही नहीं शायद वो ये सोचते हैं कि मैं किराया नहीं दूंगा| जबकि मैं किराया हमेशा देता हूँ, ये बोलते बोलते वो दुखी हो गया और बोला कि अब तो लगने लगा है कि चीवर लेकर मैंने अपना जीवन ही बर्बाद कर लिया| सुनकर दुःख हुआ जिसके कन्धों पर धम्म के प्रचार कि जिम्मेदारी है वो रोजमर्रा कि जरूरतों के लिए भी मोहताज़ है|मैं हमेशा इस बात कि देशना करता हूँ कि बौद्ध धम्म को उसके पुराने रूप में अपनाने से पहले कि तरह हार निश्चित है| आब इसकी अच्छाइयां ग्रहण करनी होंगी, हारने वाली बुराइयां छोड़नी होंगी| खासकर भीक मंगन बौद्ध धम्म प्रचारक को भिक्षु या भिकारी कहना या बनाना बंद करना होगा,उसे धर्म अधिकारी बनाना होगा|एक ऐतेहासिक उदहारण देता हूँ, त्यागी टाइटल सुना है, ये उन ब्राह्मणों का है जिन्होंने कभी इतिहाद में पंचायत कर के समूहित रूप से भिखसा का त्याग करके मेहनत से रोटी कमाने कि कसम कसम खाई थी| आज देखो कितने सफल हैं| ये एक उदहारण है कि जो समय के साथ नहीं बदलता समय उसे बदल देता है| भारत में विदेशी आक्रमणों के लम्बे दौर में बुद्ध धर्म ख़त्म हो गया पर ब्राह्मण धर्म ख़त्म नहीं हुआ, ऐसा क्यों? षड्यंत्रों और राजनेतिक संरक्षणों को एक मिनेट साइड रख दो तो क्या कारन रहे होंगे, वही समय के साथ न बदलना जबकि केवल बौद्ध धम्म में ही ऐसा प्रयोजन है कि सौ और पांच सौ सैलून में संघ्यायन करके इसकी निति दशा और दिशा में आयी कमियों को सुधारा जाए और जो पुराना है उसे स्क्रैप किया जाए, ऐसा किसी धर्म में नहीं, पर क्या बौद्ध धर्मी इसका फायदा उठा पाएंगे|

ध्यान रहे आपकी बात का वजन इस बात से नहीं होती कि वो कितनी अच्छी है बल्कि इस बात से होता है कि आप कितने शक्तिशाली हो|मैंने खुद महसूस किया है मेरे करीबी लोग मेरी बात इसलिए नहीं सुनते कि मैं बेहतर बौद्ध धम्म निति, नए धम्म उत्थान के रास्ते और वास्तविक बौद्ध ज्ञान जनता हूँ, बताता हूँ बल्कि इसलिए सुनते हैं क्योंकि मैं एक कामयाब इंजीनियर हूँ|आज अगर मैं इंजिनियर न रहूँ तो शायद उसे बौद्ध भंते के जैसे स्तिथि हो जायेगी| ये है कारन या है असली कारन जसी वजह से लोग बौद्ध धम्म में नहीं आते उनको कितने ही धक्के दे लो, ज्यादा धक्के डोज तो वो नाराज हॉजर आपसे ही रिस्ता तोड़ देंगे|बौद्ध धम्म अपनी दुर्दशा का खुद जिम्मेदार है, क्योंकि ये केवल उनका धम्म बन कर रह गया है जो गरीब है कमजोर है , ये इसकी रेपुटेशन है सच्चाई है| धम्म को दिखने और बताने से सवर्ण साथी ऐसे कानी काट जाते हैं जैसे धम्म अछूत हो| आज ज्ञान, धन और संसाधन सवर्णों के पास है क्या आप चाहोगे कि ज्ञान, धन और संसाधन के बिना आप बस नारे लगते रह जाओ| मैं आपको बताओं कि हमारी जनता बौद्ध धम्म का साथ देने को आतुर है पर इसमें उनको कुछ फायदा तो मिले, बौद्ध बिक्कु धम्म को समझा भी नहीं पा रहे< धम्म बहुत बेहतर चीज है पर लोगों को बेहतरी नहीं फायदा चाहिए| राजनेतिक पार्टी बी एस पी ने जब राजनीति फायदा दिया है कुछ कर के दिखाया है तभी लोगों को उसपर विश्वर हुआ है लोग उससे जुड़े हैं| इज़ज़त कमाई जाती है मांगी नहीं जाती|कहीं भी चले जाओ कोई बी ऐसा बाँदा नहीं मिलता जो सही से धम्म को समझा पाये दूसरी बात लोग समझना भी नहीं चाहते, सवाल वही है फायदा क्या है|

मैं अन्तत आपसे यही कहना चाहता हूँ की इतिहास में धम्म निति का पतन किया जा चुका है अगर हमने धम्म को ज्यों का त्यों अपना लिया तो दोबारा पतन होना निश्चित है| धम्म का मूल रूप परिवर्तित किये बिना हमें इसमें नई नीतियां अपनानी ही होंगी|क्या आपके पास कोई सुझाव है है तो हमें जरूर बातें(इस पोस्ट में कमेंट करें)

…समयबुद्धा

समयबुद्धा प्रवचन “अगर बौद्ध धम्म इतना अच्छा है तो ये सर्वमान्य क्यों नहीं “ का एक हिस्सा

religion

माना आप सही हो और वो गलत पर ये भी ध्यान रखना की सत्य वो नहीं जो सत्य है सत्ये वो है जो विजेता कहता है, चाहे वो गलत ही क्यों न हो| विजेता कौन है- वो जिसके पर धन और शक्ति है, जब तक आपके पास ये दोनों नहीं होंगे आपकी बात सही होते हुए भी कभी अहमियत नहीं पाएगी|

असल में धर्म वही फलता फूलता है जो या तो राजधर्म हो या जिस धर्म के अनुयायी लगनशील हों| किसी भी धर्म की कुल जनसँख्या का अमूमन 10% बुद्धिजीवी वर्ग धर्म का अध्यन करता है और समझता है पर 90% आम आदमी रोज़ी रोटी कमाने और अपने धर्म के गिने चुने सवालों के जानने और मानने तक ही सीमित रहता है|जैसे- हमारा पूजनीय इश्वर कोन है,हमरी धार्मिक किताब,चिन्ह,पूजास्थल क्या है,हमारे त्यौहार कौन से है और उनको कैसे मानते हैं | उन्हें बाकि बातें समझने के लिए जीवित गुरु के प्रवचनों की आवश्यकता होती है, सत्संग इसी जरुरत का एक उदाहरण है | आजकल भारत देश के मूलनिवासयों का रुझान बौध धर्म की तरफ बहुत बढ़ रहा है क्योंकि केवल यहीं धर्म से जुडी सभी जरूरतों की पूर्ण संतुस्टी मिल पाती है| कई जगह ऐसी पारिस्थि देखी गई है की जो लोग खुद को बौध कहते हैं उन्हें भी इन गिनेचुने आम सवालों का जवाब भी नहीं मालूम होता | बौध साहित्य बहुत व्यापक है जिसे हर व्यक्ति नहीं पढ़ पता और इस देश के सत्ताधारी लोग सच में बौध धर्म को उभारना नहीं चाहते |इस साहित्य को मीडिया में नहीं आने देते,कितने आश्चर्ये की बात है की इस देश में सभी धर्मीं के टीवी चैनल हैं पर भगवान् बुद्ध के देश में उन्ही के लिए एक चैनल तक नहीं | जबकि वे लोग ये बात अच्छी तरह जानते हैं की केवल यही विशुद्ध भारतीये धर्म भविष्य में देश को अखंड और उन्नत कर सकता है| ये कितने दुःख की बात है की इन लोगों ने देश की धार्मिक रूप से असंतुस्ट आम जनता को विदेशी धर्म की तरफ मुड़कर अलगाववाद की तरफ धकेल दिया है जो देश की अखंडता के लिए खतरनाक हो सकता है|ऐसे में सर्व जीव हितकारी बौध धर्म को हर खास-ओ-आम तक उन्ही की रूचि और बौध सिद्धांत अनुसार पहुचाने के लिए “समय-बुद्ध मिशन ट्रस्ट” प्रयासरत है |

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