गर्व करो की आप बौद्ध हो ,बौद्ध धम्म ने भारत को विश्व गुरु बनाया और आगे भी बना सकता है|अरब के मरुभूमि से लेकर मिस्र और ग्रिक तक,यूनान से रोम तक बुद्ध की धम्म वाणी ने लगभग समस्त विश्व की अध्यात्म प्यास बुझाई थी… सत्यजीत मौर्य


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2600 वर्ष पूर्व जम्मुद्विप में एक महान सामाजिक परिवर्तन की क्रान्ति हुई थी, और यह सामाजिक परिवर्तन की क्रान्ति मात्र जम्मुद्विप तक सिमित नहीं थी बल्कि इस सामाजिक परिवर्तन की क्रान्ति ने विश्वमानव जगत के जिवनमुल्यो का विकास किया था और करते आ रहा है ! और इस संसार के सामाजिक परिवर्तन के प्रथम जनक गौतम बुद्ध थे ! भगवान बुद्ध के समय चार प्रमुख सम्प्रदाय हुवा करते थे, श्रमण परम्परा के ‘श्रमण’ और इस परम्परा के वर्धमान महावीर का जैन सम्प्रदाय ! बुद्ध और महाविर स्वय: ‘श्रमण’ समुदाय से थे ! आजीवक सम्प्रदाय के संस्थापक मंखालिपुत्त गोसाल का सम्प्रदाय और पाखंडी कर्मकाण्ड करने वाले वैदिकब्राम्हण सम्प्रदाय के 62 प्रकार के लोग थे ! 2600 वर्ष पुर्व इन सम्‍प्रदायों में हिन्‍दु कोई नहीं थे और भारत की पहचान उस समय जम्मुद्विप की थी ना की हिन्दुस्थान ! इस निर्विवाद सत्य पर विश्वजगत की मोहर लग चुकी है ! सवाल यह है की इन सम्प्रदायों के स्थापको में मात्र बुद्ध के ही धम्‍म को संसार में शीघ्रता के साथ सफलता क्‍यों मिली ? जबकि बुद्ध के समय बुध्‍द को चुनौती देने के लिये अन्य सम्प्रदाय के संस्थापक मैदान में खड़े थे !भगवान बुद्ध स्वयं श्रमण परम्परा के शाक्य संघ से संबन्धी होने से प्रजातंत्र के संघ के प्रति उनकी बहोत बड़ी आस्था थी और सम्यक सम्बोधि प्राप्ति और प्रथम धम्मचक्र के उपदेश के बाद सर्वप्रथम 60 भिक्खुओं का संघ बनाया जिसका आधार लोककल्याण के साथ प्रजातंत्र था ! इन 60 भिक्खुओं को प्रेरणा मिली और देश-विदेशो में बुद्ध के धम्म को जनमानस में सुनाया ! बुद्ध के समय वैदिकवाद की वर्ण व्यवस्था और पाखंडी अंधविश्वास की कुरतियां प्रचलित थी, यज्ञों में ब्राम्हणवर्गों द्वारा पशुबलि दी जाती थी, समाज का विविध पाखंडी कर्मकाण्डो से अन्याय-अत्याचार होते थे, विद्वानों की विद्धवत्ता सूखे रेगिस्थान की तरह विवादों में बित जाती थी, मुक्ति के नाम पर कोरे हठयोग और झूटी तपस्या से जनमानस की मानसिकता को गुलाम और कमजोर किया जाता था, इसका बुद्ध ने प्रबलता से प्रतिकार करने की आवाज सर्वप्रथम सारनाथ में उठाई!बुद्ध के प्रथम धम्मचक्र के वर्षावास समाप्ति के बाद सारनाथ में संघ की स्थापना की और इन सामाजिक बन्धनों की श्रृंखलांयों की बुराईयों को तोड़ने के लिए बुद्ध और उसके संघ के जनआन्दोलन का अनुमोदन करने के लिए मगध के बिम्बीसार, कौसल के प्रसेनजित, अन्वंती के प्रद्दोद, कौसंबी के उदयन, कापिलवस्तु के शाक्य, वैशाली के वज्जि, मल्ल, भग्ग, कोलिय, कुरु, काशी, गांधार राज्यों के साथ अन्य 6 गणराज्यों के महाराजाओं के साथ इनकी रानियाँ, अनाथपिण्डक और समृद्ध व्यापारी, काशी और 18 राज्यों के प्रतिष्ठित नागरिक, राजवैध जीवक, वैशाली के जनपथकल्याणी आम्रपाली, नाई उपाली, चुंद लोहार, और मल्लिका, अभयराज कुमार, ब्राम्हणों का नेता प्रतिभाशाली व्यक्ति सारिपुत्त और महामोगल्यान, महाप्रजापति गौतमी, शयामावती, शियालकोट की खेमा, भाद्रकापिलानी ऐसे शहस्त्रों व्यक्तिय बुद्ध के संघ में शरण आ चुके थे !बुद्ध की सामाजिक परिवर्तन के प्रचार-शैली बहुत रोचक थी, बुद्ध अपने वाणी से किसी भी सम्प्रदायों की आलोचना नहीं करते थे, जनमानस की योग्यता देखकर देशना देते थे और दान देने की प्रेरना देते थे जब की वैदिक कर्मकाण्डो के ब्राम्हण परस्पर गाली-गलौज और आपस में एक दूसरो का अपमान करते थे इसलिए पिछले 2600 सालो से वैदिकब्राम्हणवाद विदेशो में अंश: मात्र मे अपना स्थान नहीं बना सका और जम्मुद्विप के राजा-महाराजा, प्रतिष्टित व्यक्ति, व्यापारियों और जनमानस में अपना स्थान सुनिश्चित नहीं कर सका ! इन सम्प्रदायों का मात्र कुछ हिस्सों में आज जो स्थान है वह मात्र ब्राम्हणवाद की वर्णव्यवस्था के जातियों की वजह से है ! सम्राट अशोक ने बुद्ध के धम्म को राजाश्रय देकर भिक्खु संघ ने बुद्ध के धम्म की ज्ञान की ज्योति गाँव से गाँव, नगर से नगर, प्रांत से प्रांत, देश से लेकर विदेशों में और एक महाद्वीप से लेकर दुसरे महाद्वीप तक उस सम्यक-सम्बोधि के ज्ञान के प्रकाश की ज्योति को जनमानस में प्रकाशित किया और सामाजिक बन्धनों की श्रृंखलांयों की बुराईयों को तोड़कर जातिविहीन सामाजिक समता का विकास किया ! 12वि सदी के बाद सामाजिक बन्धनों की श्रृंखलांयों की बुराईयों को तोड़ने का श्रेय बाबासाहेब डॉ. आम्बेकर को ही जाता है! आज संसार में बुद्ध के धम्म का अनुकरण करने वाले अनुयायियो की संख्या विश्वजगत में दुसरे नम्बर पर है…….

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 अरब के मरुभूमि से लेकर मिस्र और ग्रिक तक, सम्राट अशोक ने  संसार के  सिरमौर प्रबुद्ध भारत के विस्तार का अध्ययन किया तब यह भी देखा की इन देशो में बुद्ध के सार्वभौमिक शिक्षा के कभी दिन थे, मिस्र के ‘थेराप्युतों’ का अपना जीवन भारतीय थेरवादी बौद्ध भिक्खु के परम्परा से बहुत अधिक मिलते थे ! आज इन थेराप्युतों की परम्परा की ‘थेराप्यूटिक्स’ नाम से पाश्चात्य चिकित्सा का एक अंग बन चुकी है! सम्राट अशोक द्वारा भेजे गए यह वही ‘थेरवादी’ भिक्षु थे जिन्होंने धम्म और जीवनमूल्यो को विकसित करने के लिए अरब के मरुभूमि में कभी हलचल मचाई थी ! सोचता हूँ कभी बुद्ध के धम्म का भी अरब के मरुभूमि में स्वर्णिम युग था ! अरब के मरुभूमि के मिस्र में विविध राजवंशो ने चार सहस्त्र वर्षो तक शासन किया यह भी मुझे याद है और अल-अजहर विश्वविद्यालय, की दीवारों पर आज भी सम्राट अशोक का ‘धम्मचक्र’ विधमान है यह इन्ही राजवंशो की देन है ! यह भी ज्ञात होता है की मिस्र का यूनानी राजा टॉल्मीन, भारतीय बौद्ध साहित्यों का अनुवाद कराने के लिए उत्सुक था ! संसार को मिस्र की सांस्कृतिक सभ्यता ने कुछ दिया तो बुद्ध के धम्म वाणी से कभी मिस्र और अरब के मरुभूमि का सितारा चमक रहा था !

संसार के सिरमौर प्रबुद्ध भारत की ग्रीक में कभी प्रतिष्ठा थी, रोम का सितारा भी कभी चमकता था, और संसार की आँखें कभी ग्रीक पर लगी थी ! बड़े बड़े पर्शियन के राजा साईरस, जराक्सिज और डेरियस अपने लाखो अनुयायों ले साथ एथेन्स पर चढ़े चले जाते थे! ग्रीक ने भी एशिया, यूरोप और अफ्रिका केमहाद्वीपों में कभी अपना राजनीतिक तथा सांस्कृतिक प्रसार किया! ग्रीक के गर्भ में कभी सिकंदर भी जन्मा था, जो सीजर और नेपोलियन के लिए आदर्श बना रहा लेकिन सिकंदर को भी चन्द्रगुप्त मौर्य के सौर्य से दो कदम पीछे हटना पड़ा और सैक्युलस ने भी प्रबुद्ध भारत पर अपने पैर रखना चहा तो ध्यान चन्द्रगुप्त मौर्य के वीरता पर गई और अपनी बेटी हेलना को चन्द्रगुप्त मौर्य को दे दिया! सम्राट अशोक के समय बौद्ध भिक्खु प्रचारक सिकन्दरिया पहुच चुके थे और बुद्ध के धरती के व्यापारीयों ने वहा बस्तिया भी बसा ली थी! ब्राम्हण सेनापति पुष्पमित्र शुंग ने बौद्ध सम्राट ब्रहदत मौर्य की हत्या की तो बौद्ध सम्राट मिलिंद राजा ने ब्राम्हण सेनापति पुष्पमित्र शुंग पर हमला किया और ब्राम्हण सेनापति पुष्पमित्र शुंग और पतांजलि जान हथेली पर लेकर भागते हुए उज्जैन आये !

रोम के इतिहास में संसार के सिरमौर प्रबुद्ध भारत का वैभव का भी अध्‍ययन किया और देखा की सम्राट अशोक द्वारा भेजे गए धम्म दूतो में महास्थविर महारक्खित ने बुद्ध के धम्म वाणी से प्यासे यूनानी जगत की प्यास बुझाई थी! सम्राट अशोक के ढाई सौ वर्ष के बाद जुडिया प्रदेश में ईसा का जन्म हुवा और बुद्ध के शिक्षा का प्रभाव स्पष्टता दृष्टी गोचर होता है ! सारे इसाई संसार में रोमनचर्च और लैटिन भाषा का एकछत्र आधिपत्य था ! ईसाईयों का पूजा पाठ, गाथाएँ तथा विहार बौध्‍द संस्‍कृतीसे परस्पर बहुत मिलते है ! रोमन कैथोलिक गिर्जे के युरोपियन यात्री तिब्बत के विहारों में स्पष्ट बैठे थे ! क्लेमेंट, क्रिसोस्टोम आदि और वर्तमान

 

यूरोप के इसाई लेखको का यहाँ तक कहना है की सिकन्दरिया में भारतीय नागरिकों की बस्तिया थी! यह सब प्रमाण स्पष्ट चीख-चीख कर कहते है की सम्राट अशोक द्वारा भेजे गए बौद्ध भिक्खुओं ने रोम साम्रराज्य के दुर्गम घाटियों में, निर्जन वनों में असभ्य मानव जातीयों मे, कुष्टादि व्याधिपीडित जनसमुहों मे, समाज के सर्वथा अपरिचीत व्यंक्तियो में निस्वार्थ और अनवरत सेवा द्वारा, जख्मों और फोंडो की पीप की परव्हा‍ न करते हुये, संपूर्ण आयु में अपने सम्‍बंधियों का मुंह तक न देखे बिना अपना कार्य वहा किया है! —·

बौद्ध धम्म ने भारत को विश्व गुरु बनाया और आगे भी बना सकता है|अरब के मरुभूमि से लेकर मिस्र और ग्रिक तक,यूनान से रोम तक बुद्ध की धम्म वाणी ने लगभग समस्त विश्व की अध्यात्म प्यास बुझाई थी…

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चीनी यात्री ह्वेनसांग जब शाक्यमुनि बुद्ध के धरती पर आये थे तब उत्तर प्रदेश के वर्तमान उन्नाव जनपद की पुरवा तहसील के डौंडिया खेड़ा नामक ग्राम गए थे, और इस डौंडिया खेड़ा नामक ग्राम का उल्लेख अपने यात्रा इतिवृत्त में ‘ओयमुख’ लिखा है। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग साधू के कहने से सोना खोज रही वास्तविक डौंडिया खेड़ा प्राचीन बौद्ध केंद्र है ! और भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग इस सच्चाई को जानता है ! सम्राट अशोक ने इस डौंडिया खेड़ा नगर के पास ही दक्षिण पूर्व में गंगा के किनारे 200 फिट ऊँचा स्तुपो का निर्माण किया था। यहाँ एक अशोक स्तम्भ है जिसे लोग इसे शिवलिंग कहते है वास्तविक यह शिवलिंग न होकर यह अशोक स्तम्भ है ! अलेक्जण्डर कनिंघम ने इसकी पहचान डौंडिया खेड़ा से की है। चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार यहाँ 5 बौद्ध संघाराम थे जिनमें 1000 भिक्षु रहते थे। ये स्थाविरवादी (थेरवादी) थे और उसकी सम्मतिय शाखा को मानते थे। यह वही स्थान था जहां तथागत गौतम बुद्ध ने 3 महीने धर्म का उपदेश दिया था। इसके अतिरिक्त यहाँ पर चार पूर्व बुद्धों के स्मारक भी यात्री ने देखे थे। इसके समीप ही एक दूसरा स्तूप भी था जिसमे भगवान बुद्ध के केश, नख धातु सन्निहित किये गए थे। इस स्तूप के पास एक बड़ा संघाराम था जिसमे यात्री ने 200 बौद्ध भिक्षु देखे थे।डौंडिया खेड़ा जिसका उल्लेख ह्वेनसांग ‘ओयमुख’ के नाम से लिखा है यह संघाराम वास्तविक एक बौद्ध विश्वविद्यालय के रूप में था और इस बौद्ध विश्वविद्यालय में बुद्ध की अनमोल अप्रतिम प्रतिमाये थी! बुद्ध की प्रतिमाये ऐसे थी मानो बुद्ध हमें धम्म देशना दे रहे हो, यह डौंडिया खेड़ा का प्राचीन बौद्ध विश्वविद्यालय विश्वजगत के लिए शिक्षा और साहित्य की दृष्टि से अनमोल खजाना था। इसी बौद्ध विश्वविद्यालय में बैठकर बौद्धाचार्य बुद्धदास ने सर्वास्तिवाद निकाय के महाविभाषा शास्त्र की रचना की थी। चीनी यात्री ह्वेनसांग के प्रामाणिक इतिहास के प्रमाणों को लेकर प्रोफ़ेसर अँगने लाल जी ने अपनी शोधपरक पुस्तक “उत्तर प्रदेश के बौद्ध केंद्र” की पृष्ठ संख्या 209-10 इसकी जानकारी दी है और इस ग्रन्थ को ‘उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान’, लखनऊ, ने 2006 में प्रकाशित किया है।प्राचीन बौद्ध स्थलों के प्रति भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग की भूमिका संधिगत रही है, इस विभाग ने इन स्थलों को लेकर कभी भी बौद्ध संघटनो के साथ कार्य नहीं किया, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग, प्राचीन बौद्ध स्थलों को लेकर ना ही स्वय: विकास करती है और ना ही बौद्ध संघटनो को साथ में लेकर कार्य करती है, इस दृष्टी से भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग की भूमिका बौद्धों के प्राचीन बौद्ध स्थलों के अस्थित्व को मिटाने की भूमिका निभा रही है ! विदेशो में चाहे वह मुस्लिम राष्ट्र या पश्चिम के राष्ट्र या पूर्व एशिया हो या दक्षिण-पूर्व एशिया के राष्ट्र सभी ने प्राचीन बौद्ध स्थलों के विश्व विरासत को संभालकर रखा है! भारत सरकार को इन प्राचीन बौद्ध स्थलों के विकास के लिए सयुक्त राष्ट्र संघ से धन मिलने के बाऊजुद इन स्थलों को बंदी बनाकर रखा है, इन प्राचीन बौद्ध स्थलों के आसपास ब्राम्हणों के मंदिर के निर्माण में खर्च किया गया है, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग की भूमिका प्राचीन बौद्ध स्थलों के अस्थित्व समाप्त करने की है !प्राचीन बौद्ध स्थलों की दशा देखर मन का दर्द उभर आता है | भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग तथा मायावती के शासन के दौरान उ.प्र. राज्य पुरातत्त्व विभाग, उत्तर प्रदेश के प्राचीन बौद्ध स्थलों के विकास के लिए गूंगी, बहरी, अंधी थी! बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर के प्रबुद्ध भारत के सपनो की घोर विरोध करने वाली मायावती सरकार ने कभी इन प्राचीन बौद्ध स्थलों के विकास के लिए बजेट में किसी प्रकार का प्रावधान भी नहीं किया! संसद में इन प्राचीन बौद्ध स्थलों को लेकर सादा सवाल भी नहीं किया की प्राचीन बौद्ध स्थलों के 180 मीटर के अंदर के आसपास के क्षेत्रो में ब्राम्हणों के मंदिर क्यों बन रहे है ? मायावती के गूंगे, बहरे और अंधे संसद सदस्यों ने संसद में कभी यह भी नहीं पूछा की सयुक्त राष्ट्र संघ से प्राचीन बौद्ध स्थलों के विकास लिए प्राप्त हुवा धन संस्कृत विश्व विश्वविद्यालय के विकास के लिए क्यों खर्च किया गया ? भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग, बौद्ध संघटनो का सहयोग लेकर प्राचीन बौद्ध स्थलों का विकास क्यों नहीं करती है ? क्यों पाली-प्राकृत बुद्ध वाणी को संस्कृत में अनुवाद किया जा रहा है ? क्यों प्रबुद्ध भारत के साम्राज्‍य की जनबोली ‘पाली प्राकृत’ राष्ट्रीय भाषा को UPSC से हटाया गया ? ऐसे अनेको सवाल है जिसे अपनों ने ही सत्ता के लालच में रोंधकर दुर्लक्षित किया है!================================================================================

कालिदास का एक नाटक है जिसका नाम है ‘विक्रमोर्वशीय’ और इस संस्कृत शब्द का इतिहासकारो ने ‘विक्रम’ नाम से प्रयोग किया,वास्तविक ‘विक्रमोर्वशीय’ इस संस्कृत शबद का प्रयोग होना चाहिए था ‘विक्रममौर्यवंशीय’। लेकिन प्रयोग हुवाँ काल्पनिक विक्रमादित्य, नाम के राजा से और जनमानस के मन-मानस में ठूस दिया गया। अल बेरुनी एक अरबी यात्री था जिसने भारत में रहकर गणित और ज्योतिविज्ञान और संस्कृत का अध्यन किया था। इनके प्रमाणिकता को आधार माने तो अलबेरुनी की रचनाओं में कहा गया है की हर्ष नाम का राजा था और इन्होने हूणों और शंकों का पराभव किया था, और जिसकी उपाधि विक्रमादित्य थी। बौद्ध प्रमाणित अनुश्रुतियो के अध्यन से यह तो स्पष्ट है की हर्षवर्धन मध्ययुग में बौद्ध सम्राट था और यह विजयवर्धन के वंशोजो में एक था और विजयवर्धन, खोतान का बौद्ध राजा था। सम्राट अशोक का पुत्र कुनाल ने खोतान को बसाया था और कुनाल के परिवार से विजयावर्धन के पारिवारिक सबंध थे।

कहा जाता है की विक्रमादित्य के राजदरबार के नव रत्नों में कालिदास नाम के एक कवी हुवा करते थे। इतिहासकारों ने विक्रमादित्य के एतिहासिकता की खोजबीन की है और स्पष्ट रूप से कहा है की विक्रमादित्य नाम का राजा धरती पर कभी हुवाँ ही नहीं और यह भी स्पष्ट शब्दों में कहा है की विक्रमादित्य यह राजा नहीं बल्कि यह उपाधि का नाम है। इसी प्रकार ईसा की पहली शताब्दी में कनिष्क के राज्यकाल में अश्वघोष नाम के बौद्ध भिक्षु थे, इनकी रचनाएं, कवितायें और काव्यों का प्रभाव जनमानस पर रहा है। और कालिदास के कालनिर्णय में अश्वघोष का उल्लेख है इतिहासकारों का मानना है की कालिदास ने अश्वघोष के रचनाओं की नक़ल की है और विभिन्नय संस्कृत के काव्यों रचनाओं में कालिदास ने अपना नाम गाड़ दिया। इसका प्रमाण कालिदास द्वारा रचित ‘विक्रमोर्वशीय’ के चौथे अंक में पाली-प्राकृत के सुत्त है।

एक फग्युर्सन नाम का विद्वान है, जिन्होंने अल बेरुनी के किताबो का तर्क देकर यह कहा है की विक्रमादित्य यह उपाधि हर्ष की थी। और हर्षवर्धन ने अपने विजय की स्मुर्ती को स्थाई बनाने के लिए एक सवंत (कैलेण्डर) चलाया था। हर्षवर्धन के इतिहासिक सत्य को काल्पनिक रंग देने के लिए वर्धन हटाकर हर्ष रखा गया और हर्षवर्धन के सवंत को विक्रमसवंत सवंत का नाम देकर इसका शून्य बिंदु ईसा पूर्व 57 दिया गया ताकि हर्षवर्धन की एतिहासिक सच्चाई काल्पनिक विक्रमादित्य के नाम से जनमानस में मनमानस में ठुसी जाए ! इस प्रकार से हर्षवर्धन के सवंत को शून्य बिंदु ईसा पूर्व 57 देकर विक्रमसवंत को हर्षवर्धन के कार्यकाल से पीछे धकेला गया इसलिए इस विक्रमसवंत के शून्य बिंदु ईसा पूर्व 57 का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। जैसे बुद्ध निर्वाण सवंत के शून्य बिंदु का आधार बुद्ध का महापरिनिर्वाण दिन है। ऐसा आधार विक्रमसवंत का नहीं है। सम्राट अशोक ने 256 पडाव के रात्री विश्राम बीत चुके है यह रघुनाथ के शिलालेख में कहा है और यह 256 रात्रि माया के कैलेण्डर से 260 दिन के वर्ष से मिलते जुलते है और 256 के रात्रि के पड़ाव के नक्षत्र 9 होते है…….।

डॉ. अमर्त्य सेन ने स्पष्ट कहा है की विक्रमसवंत की आधिकारिक की पुष्टि करना और समय के व्यवहार में इसकी एतिहासिकता के ठोस प्रमाण नहीं है। डॉ. अमर्त्य सेन के प्रमाणों को ठोस प्रमाण मानते है तो यह भी स्पष्ट होता है की आर्य भट्ट जिन्होंने कलिसवंत को चलाया और इस कलिसवंत का शून्य बिंदु 78 ईसवी शंक सवंत का शून्य बिंदु है और यह शून्य बिंदु बौद्ध सम्राट कनिष्क का है, क्योंकि शंक सवंत बौद्ध सम्राट कनिष्क ने सुरु किया था। इस दृष्टी से महास्थविर वज्रबोधी के शिष्य चीनी भिख्कू ई-शिंग जिन्होंने गणित और ज्योतिविज्ञान की रचना की थी और वर्ष की अवधि 365.25636 दिन आकलित किया है। कलिसवंत के निर्माता आर्य भट्ट और विहिरामिर, इन्ही के निर्मित कलिसवंत से यह स्पष्ट होता है की आर्य भट्ट और विहिरामिर यह महास्थविर वज्रबोधी के शिष्य चीनी भिख्कू ई-शिंग के बाद के होते है। समय और तिथिगणना के पुराने पाली-प्राकृत के ग्रन्थ बच पाते तो इन सवंत (कैलेण्डर) की खोजबिन में पता चलता संस्कृत साहित्य की जड़ें गहरी है या नहीं ! कभी-कभी सोचता हूँ की इन काल और तिथिगणना के सवंत (कैलेण्डर) में समय बर्बाद करके कुछ ख़ास व्यवहारीक दृष्टी से जनमानस को लाभ होने वाला नही है। लेकिन इसे एक लाभ है की ब्राम्हणवर्ग के लोगो ने बौद्ध साहित्यों की नक़ल संस्कृत में करके अपने नाम गाड़ दिए है और अपने जन्म तिथियों को बौद्ध सम्राटो के कार्यकाल से पहले धकेला और जनमानस को गुमराह किया यह सत्य है ……..।

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satyejeet maurye

सत्यजीत  मौर्य

https://www.facebook.com/Satyajitche

 

2 thoughts on “गर्व करो की आप बौद्ध हो ,बौद्ध धम्म ने भारत को विश्व गुरु बनाया और आगे भी बना सकता है|अरब के मरुभूमि से लेकर मिस्र और ग्रिक तक,यूनान से रोम तक बुद्ध की धम्म वाणी ने लगभग समस्त विश्व की अध्यात्म प्यास बुझाई थी… सत्यजीत मौर्य

  1. बहोथ ही अदभुत लगा पढ कर कृपया आगे भी  आप हमारा मार्गदर्शन करते रहे और हम ये सब अपने बंधुओ को भी  बताकर जागरूक करेगे
    जय भी म जय मुलनिवासी

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