Bahujan Samaj aur Bharat me Baudh Dharm PunarUtthan


किसी ने एक दिन मुझसे प्रश्न उठाया की बौध भंते कहते हैं की बौध धम्म की शिक्षाएं सम्पूर्ण हैं, उनमे कुछ जोड़ने घटने की जरूरत नहीं है तो फिर मौर्या वंश के पतन से लेकर डॉ आंबेडकर के बौध धम्म में लौटने की घोषणा के बीच के ढाई हजार वर्षों में क्यों ये नहीं पनपा?क्यों इसको मौर्य शक्ति या अंग्रेजों की शक्तिशाली मध्यस्ता में आंबेडकर द्वारा स्थापित लोकतंत्र की शक्ति से ही इसका उद्धार संभव हो सका|

ये वो प्रश्न है जो की भारत में बौध धम्म में लौटने पर हर कोई पूछता है या उसके मन में होता है पर वो इसकी अभिव्यक्ति नहीं कर पाता|इसका एक पंक्ति में उत्तर ये है की
 “सुरक्षा सर्वोपरि है अगर सुरक्षा है तो सत्य है|”

आईये इस तथ्य को समझते हैं,जैसा की हम सभी जानते हैं की हर संस्था को बनाने के पीछे कोई लक्ष्य होता है इसी तरह बौध धम्म संस्था बनाने के पीछे तथागत भगवान् बुद्धा का भी लक्ष्य था| उस समय के धार्मिक शोषण अपने चरम पर था, उस समय के धम्र ग्रंथों परम्पराओं, पुरोहितवाद अदि के ज्ञान को ही अमिट और अंतिम सत्य मना जाता था और जो उनके खिलाफ जाता था उसे अधर्मी करार देकर ख़तम कर दिया जाता था| जनसाधारण की इस दुर्दशा को देखकर तथागत का मन करुणा से भर गया उन्होंने उस समय के धर्म सिद्धांतों को मानने से इनकार कर दिया और तब उन्होंने सत्य को नए सिरे से खोजकर जनसाधारण को उपलब्ध कराया| इस तरह हम कह सकते हैं की इस संस्था का मुख्य लक्ष्य जनसाधारण का दुःख दूर करने के लिए सत्य खोजना था|elephant dhamm chakra

बौध धम्म के ज्ञान को  95%आम आदमी नज़रंदाज़ करता है केवल 5% बुद्धिजीवी ही यदा कदा इसकी कहीं चर्चा या लेखन करते हैं| ये दुनिया है इसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता की आप कितने ज्ञानी हो, इसे इस बात से मतलब है की आपके ज्ञान से उन्हें क्या फायदा होगा| क्या सत्य है क्या असत्य है दुनिया नहीं जानना चाहती वो उसे सुनती है जिसकी आवाज़ शक्ति और धन की बुलंदी पर सवार है|सत्य अकेला कुछ नहीं शक्ति पर सवार होकर ही वो असत्य का मुकाबला कर सकता है| सत्य कौन नहीं जानता पर सभी शक्तिशाली सत्ताधारी का साथ देने पर मजबूर हैं| जो नहीं जनता वो अगर जान भी जाए तो शक्ति के बिना उस जानकारी से वो अपना जीवन ही दूभर कर लेगा| क्या आप समझ सकते हो की हम केवल बौध धम्म के सत्य से उद्धार नहीं पा सकते हमें इसे शक्ति पर सवार करना है| क्या करुणा (दया) मैत्री (भाईचारा) और प्रज्ञा(विवेक) से शोषित और कमजोर अपने पर होने वाली हिंसा को रोक सकता है, अगर हाँ तो क्या ये गुलामी स्वीकार करना न होगा| अगर नहीं तो हम ये क्यों नहीं मान लेते की ये तीनों गुण आत्मनिर्भर और शक्तिशाली बनने के बाद की बातें हैं| ये शक्तिशाली को संयमित करेंगी, शोषित तो पहले ही इतना दबा कुचला है की वो क्या दया दिखायेगा उसे खुद दया की जरूरत है| वो क्या भाईचारा निभाएगा उसकी बुनियादी जरूरतें छीनने-झपटने से भी पूरी नहीं हो पातीं| वो क्या अपनी बुद्धि बल को बढ़ायेगा जब पेट की भूख शांत करने में सारा समय निकल जायेगा|

हमें ये समझना होगा की ये संसार चक्र है जो यों ही चलता आया है और चलता रहेगा| इसमें सत्य-असत्य, हिंसा-अहिंसा,सम्पन्नता-निर्धनता,पाप-पुन्य, ईश्वरवाद-अनीश्वरवाद,शक्तिशाली-कमजोर, जीवित बचे रहने के लिए संघर्ष अदि अदि सभी कुछ चलता रहेगा| हमें इसी दुनिया में अपना अस्तित्व बनाना बचाना और चलाना है| बौध मत यकीनन सर्वश्रेष्ठ है पर क्या दुनिया उस तरह की नहीं है न ही बन पाई, न बन पायेगी|हम अहिंसावादी हैं सबपर दया करते हैं पर क्या इस बात की गारंटी है की सामने वाला हमपर दया करे ही देगा|कभी न कभी सबने अपने निजी जीवन में बिना गलती के भी हिंसा सही होगी, कई मूडी खपती लोग हैं दुनिया में मिले होंगे| जिनके खून में ही हिंसा है उनपर ज्ञान ध्यान की बातें असर नहीं करती, वे केवल हिंसा ही समझते हैं|हर कोई अंगुलिमाल की तरह हिंसा के पश्चाताप की आग में नहीं जल रहा जिसे करुणा की शीतलता रास आ जाये|

क्या आप लोग भूल गए हैं की लाखों-करोड़ों निरपराध बौध भिक्षुओं को मारा गया था| वे तो बौध धम्म के मार्ग पर चलकर केवल परोपकार हो करते थे|उनके लिए तो किसी प्रकार की धन संपत्ति या शक्ति इकठा करना मना था तब क्यों वे मरे गए|क्या उनको अपना बचाव नहीं करना था, क्या यही धम्म शिक्षा है, अगर हाँ तो फिर इस शिक्षा में विरोधाभास है|

धम्म का लक्ष्य सभी जीवों को इसी दुनियां में सुख और शांति से जीने का सत्य  मार्ग बताना है न की स्वर्ग और इश्वर कृपा का लालच देकर जीते जी शोषण का शिकार बनाना| जब बौध धम्म का पूरा जोर इसी दुनिया में जीवन उद्धार पर है तो
क़त्ल होने बाद हम सत्य का क्या करेंगे, उसके बाद तो कोई परलोक नहीं|

संसार में कभी भी एक विचारधारा का एक संगठन नहीं होगा, जब एक ही माता पिता की संतानों में विचारों का फर्क होता है तो इतने बड़े संसार में कई प्रकार की विचारधारों पर आधारित संगठन होना तय है| यही कटु सत्य है|इसलिए सदा ध्यान रखो
“ एक प्रकार के विचार समूह से धर्म बनता है,धन से धर्म चलता है,धर्म से संगठन होता है और संगठन से सुरक्षा होती है|”
 डॉ आंबेडकर की निम्न पंक्तियों पर कृपया गौर कीजिये:

“गाँवों में जिस प्रकार महार-चमार-मांग-भंगी के भी दो ही चार मकान होते हैं उसी प्रकार मुसलमानों के भी दो चार माकन होते हैं लेकिन उन मुसलामानों को कोई छेड़ता नहीं है. उन पर कोई अत्याचार करने का धैर्य नहीं करता है. लेकिन आप (अछुतों – शूद्रों पर) पर अत्याचार सदा ही होता रहता है और हिन्दू आप पर अत्याचार करना अपना धर्म समझते हैं. इसका कारण यह है की मुसलमानों के घरों के पीछे भारत का सारा मुसलमान समाज है. इस सचाई को हर हिन्दू समझता हैं और आपके सम्बन्ध में हिन्दुओं को पूर्ण विश्वास है की आप पर अत्याचार करने पर आपकी सहायता कोई भी नहीं करेगा. आपकी असमर्थता और निस्सहायता के कारण ही आप पर हिन्दू लोग अत्याचार करने का दुसहास करते हैं. – डॉ. बी आर आंबेडकर (३० – ३१ मई , १९३९ बम्बई)”

संगठन बल से प्राप्त सुरक्षा ने ही बहुजनों को भारत में इस्लाम की तरफ आकर्षित किया और हमारे लोग बौद्ध धम्म में न लौटकर इस्लाम में चले गए| आज वही  भारतीय लोग अपना इतिहास भूलकर खुद को कुछ और ही समझ रहे हैं| किसी न किसी दिन ये लोग भी इतिहास की सच्ची समीक्षा करेंगे और जानेंगे की शुरू से अंत तक हम केवल विशुद्ध भारतीय हैं, भारत ही सबकुछ है बाकि सब तो वक्ती संगर्ष के औज़ार मात्र हैं |अगर अपना पीछा भूलकर ये बौद्ध या बहुजन से भाईचारा न रखें तो क्या शोषकों की फुट डालो शाशन करो की नीति को कामयाबी नहीं दे रहे|शहरों के बहार की कच्ची बस्तियों में इन्हीं दोनों समाजों की जनसँख्या ज्यादा होती है तो सांप्रदायिक हिंसा से फिर नुक्सान किसे है फायदा किसे है ये समझना मुश्किल है क्या? 

अब प्रश्न उठता है की  संगठन शक्ति तो युद्ध को प्रेरित करता है तो सुरक्षा कहाँ रही? बिलकुल पर जब संगठन शक्ति आ जाये तब ही बौद्ध शिक्षाओ द्वारा हम अपने आप को और अपने संगठन को सयंमित रख सकते है| परिणाम सत्ता के शिखर पर जाकर भी हममे अहंकार और गेरजरूरी हिंसा नहीं पनप पाएंगे| तब सही मायेने में बौद्ध शिक्षा हमारे काम आएगी, आज के फटे हाल में उतना काम नहीं आ पायेगी|इसका जीवंत उदाहरण है जंगल का हाथी| वो  भयानक जंगल में शांति से अहिंसा से करुणा से मैत्री से इसलिए जीता है क्योंकि वो शक्तिशाली है| ये शक्तिशाले ले गुण हैं कमजोर के लिए अवगुण है जैसे उसी जंगल का हिरन जो इन गुणों के बावजूद शोषित और क़त्ल होता रहता है |

एक अंग्रेजी कहावत है “If you want peace be prepared for war” जिसका अर्थ है अगर आप शांति से जीना चाहते हैं तो जंग के लिए तयार रहो|

from SamayBuddha’s  book “Bahujan Samaj aur Baudh Dhamm ka bharat me Bhavishye”

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